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दाल के दाम बने दर्द, आखिर क्या है चढ़ती कीमतों की वजह और कब मिलेगा छुटकारा?

दाल की कीमतों में लगातार हो रहा इजाफा नई मोदी सरकार की परेशानी की वजह बन सकता है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 2 years ago

चढ़ती महंगाई ने लोगों को परेशान कर रखा है. खासकर दालों की कीमतों में अच्छी-खासी वृद्धि देखने को मिली है. तुअर या अरहर दाल की कीमतों में आग लगी हुई है. यह प्रति किलोग्राम 150 रुपए से लेकर 185 रुपए तक बिक रही है. तुअर दाल सबसे ज्यादा डिमांड में रहती है, इसलिए इसकी कीमत भी तेजी से बढ़ रही है. इसके अलावा, कई दूसरी दालें भी कीमत का शतक लगा चुकी हैं. दालों के बढ़ते दामों के चलते अब आम आदमी पर 'दाल-रोटी खाओ, प्रभु के गुण गाओ' वाला गाना भी सटीक नहीं बैठता. 

इतने चढ़ गए हैं दाम
एक रिपोर्ट के मुताबिक, तुअर दाल की कीमतों में एक साल में 31% की भारी बढ़ोतरी हुई है. इसी तरह, उड़द दाल के भाव भी करीब 15% चढ़े हैं. 13 जून को चना दाल का औसत खुदरा मूल्य 87.74 रुपए प्रति किलोग्राम, उड़द 126.67 रुपए प्रति किलोग्राम, मूंग 118.9 रुपए प्रति किलोग्राम और मसूर 94.34 रुपए प्रति किलोग्राम के हिसाब से मिल रही थी. भारत में दालें सबसे ज्यादा इस्तेमाल की जाती हैं. अधिकांश घरों में बिना दाल के खाना ही नहीं बनता. ऐसे में दालों के चढ़ते दामों ने व्यापक स्तर पर लोगों को प्रभावित किया है. 

मूल्यवृद्धि के प्रमुख कारण
दालों की बढ़ती कीमत की कई वजह हैं. जिसमें बिचौलिए दाल की दालों भंडारण और कम उत्पादन प्रमुख हैं. किसान दालों के बजाये चावल और गेहूं की खेती को प्राथमिकता देते रहे हैं. 1951 से 2008 तक दालों का उत्पादन महज 45% ही बढ़ा. जबकि इसी अवधि में गेहूं के उत्पादन में 320 प्रतिशत की रिकॉर्ड बढ़ोतरी देखी गई. किसानों को दालों की खेती में ज्यादा रुचि नहीं है. इसका एक कारण दोनों फसलों के बीच पैदावार में भारी अंतर भी है. दालों से प्रति हेक्टेयर करीब 800 किलोग्राम उत्पादन होता है. वहीं, गेहूं से 3,000 किलोग्राम से ज्यादा उत्पादन होता है. डिमांड के अनुरूप उत्पादन न होने से भारत को दूसरे देशों से दालें आयात करनी पड़ती हैं.  

जुलाई में दिखेगी नरमी
दालों की चढ़ती कीमतों के बीच सरकार को उम्मीद है कि अच्छे मानसून से स्थिति में सुधार होगा. केंद्रीय उपभोक्ता मामलों की सचिव निधि खरे का कहना है कि बेहतर मानसून की उम्मीद और आयात बढ़ने से तुअर, चना और उड़द दाल की कीमतों में जुलाई से नरमी देखने को मिल सकती है. उन्होंने यह भी कहा कि अगले महीने से इन तीन दालों का आयात बढ़ेगा और इससे घरेलू आपूर्ति बढ़ाने में मदद मिलेगी. खरे ने बताया कि तुअर (अरहर), चना और उड़द दाल के दाम पिछले छह महीनों से उच्च स्तर पर हैं. जबकि मूंग और मसूर दाल में कीमतों की स्थिति संतोषजनक है. 

पिछले साल किया इतना इम्पोर्ट
खरे ने कहा कि हम अच्छे मानसून की उम्मीद कर रहे हैं, जिसमें औसत से अधिक बारिश होगी. हमें यह भी उम्मीद है कि दलहन के रकबे में इस साल सुधार होगा. किसान उच्च बाजार कीमतों को देखते हुए अधिक क्षेत्रफल में इसकी खेती करेंगे. उन्होंने कहा कि सरकार किसानों को बेहतर बीज उपलब्ध कराने का प्रयास कर रही है. साथ ही सरकार उपलब्धता बढ़ाने और खुदरा कीमतों को नियंत्रण में रखने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाएगी. बता दें कि भारत ने पिछले वित्त वर्ष में करीब 8 लाख टन अरहर और 6 लाख टन उड़द दाल का आयात किया था. म्यांमार और अफ्रीकी देश भारत के प्रमुख निर्यातक हैं. 


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