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वैश्विक दबावों के बीच औद्योगिक विकास पर संकट, CRISIL की चेतावनी

अप्रैल 2025 में औद्योगिक विकास घटकर 2.7% पर पहुंचा, निर्यात में गिरावट और व्यापार तनाव से उद्योग पर दबाव बढ़ने की आशंका है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

प्रमुख रेटिंग एजेंसी क्रिसिल (CRISIL) ने चेतावनी दी है कि भारत का औद्योगिक क्षेत्र आने वाले महीनों में गंभीर चुनौतियों का सामना कर सकता है. वैश्विक व्यापार में बाधाएं, टैरिफ में वृद्धि और निर्यात में कमजोरी औद्योगिक पुनरुद्धार की राह में रोड़े अटका सकते हैं, भले ही घरेलू खपत में कुछ मजबूती के संकेत मिल रहे हों.

क्रिसिल की ताजा 'मैक्रोइकोनॉमिक्स फर्स्ट कट' रिपोर्ट के मुताबिक, औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) की वृद्धि दर अप्रैल 2025 में साल-दर-साल आधार पर घटकर 2.7% रह गई, जो मार्च में संशोधित रूप से 3.9% थी. यह गिरावट विनिर्माण, खनन और विद्युत तीनों क्षेत्रों में देखने को मिली, जिससे यह स्पष्ट होता है कि आर्थिक सुस्ती व्यापक है. माह-दर-माह (seasonally adjusted) आधार पर भी IIP में 0.7% की गिरावट दर्ज की गई है, जो नए वित्त वर्ष की शुरुआत में उद्योग क्षेत्र की कमजोर शुरुआत को दर्शाता है.

अमेरिका के टैरिफ बढ़ाने का असर
क्रिसिल ने बताया कि यह मंदी अमेरिका द्वारा अप्रैल में 10% यूनिवर्सल टैरिफ वृद्धि के समय के साथ मेल खाती है. यह निर्णय ट्रंप प्रशासन की संरक्षणवादी नीतियों का हिस्सा था. शुरुआत में मशीनरी, वस्त्र और अन्य उत्पादों के निर्यात में उछाल देखा गया, लेकिन क्रिसिल ने इसे “अस्थायी शोर” बताते हुए स्पष्ट किया कि यह वृद्धि स्थायी नहीं होगी.

फार्मा और केमिकल्स जैसे क्षेत्रों पर बनेगा दबाव
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जून के बाद संभावित बदले में लगने वाले टैरिफ (reciprocal tariffs) और वैश्विक मंदी भारत के माल निर्यात को और अधिक प्रभावित कर सकते हैं. खासकर फार्मा और केमिकल्स जैसे क्षेत्रों, जो अप्रैल में पहले ही सिकुड़ चुके हैं, पर दबाव बना रह सकता है. अमेरिका के साथ भविष्य के व्यापार समझौतों को लेकर बनी अनिश्चितता भी निवेशकों की मानसिकता पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है और निर्यात-आधारित उद्योगों में निवेश को धीमा कर सकती है.

घरेलू मांग से मिल सकती है राहत
इन बाहरी जोखिमों के बावजूद, क्रिसिल ने कहा कि घरेलू मांग से कुछ राहत मिल सकती है. एजेंसी को उम्मीद है कि घटती महंगाई, कृषि क्षेत्र में सुधार, मौद्रिक नीति का समर्थन और कर राहत जैसे कारकों के कारण घरेलू खपत में वृद्धि होगी, जिससे उद्योग को सहारा मिलेगा.

मानसून और कच्चे तेल की कीमतें बन सकती हैं सकारात्मक कारक
भारतीय मौसम विभाग ने औसत से अधिक मानसून (106%) का अनुमान जताया है, जिससे ग्रामीण आय बढ़ने, कृषि उत्पादन बढ़ने और खाद्य मुद्रास्फीति नियंत्रित रहने की उम्मीद है.
इसके अलावा, वित्त वर्ष 2026 में कच्चे तेल की कीमतें $65–70 प्रति बैरल रहने की संभावना है, जो पिछले वर्ष के औसत $78.8 प्रति बैरल से कम है. इससे इनपुट लागत और महंगाई दोनों में राहत मिल सकती है.

नीतिगत मोर्चे पर नरमी की उम्मीद
क्रिसिल का मानना है कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (Monetary Policy Committee) इस वित्त वर्ष में रेपो दर में और 50 आधार अंकों (bps) की कटौती कर सकती है. अप्रैल तक पहले ही इतनी ही कटौती की जा चुकी है. बैंकिंग प्रणाली में उधार दरों में नरमी आने लगी है, जिससे खासतौर पर खपत-आधारित क्षेत्रों में ऋण वृद्धि और निवेश को बढ़ावा मिलने की संभावना है.

उद्योगवार प्रदर्शन

पूंजीगत वस्तु (Capital Goods) क्षेत्र अप्रैल में एकमात्र उज्ज्वल पक्ष रहा, जिसमें 20.3% की सालाना वृद्धि दर्ज की गई. यह वृद्धि मुख्य रूप से मशीनरी और ट्रांसपोर्ट इक्विपमेंट के बेहतर उत्पादन के कारण रही. वहीं, मध्यम वस्तुएं (Intermediate Goods) क्षेत्र में भी मामूली सुधार देखा गया, जहां लकड़ी और प्लास्टिक उत्पाद जैसे क्षेत्रों में वृद्धि दर्ज की गई. 

उपभोक्ता वस्तुएं 
ड्यूरेबल्स (टिकाऊ वस्तुएं) ने अप्रैल में 6.4% की वृद्धि दर्ज की, हालांकि विस्तार की गति थोड़ी धीमी रही. वहीं, नॉन-ड्यूरेबल्स (अखपत टिकाऊ वस्तुएं) का उत्पादन लगातार तीसरे महीने घटा, हालांकि गिरावट की दर घटकर 1.7% रह गई. क्रिसिल ने बताया कि खाद्य उत्पादों का उत्पादन फिर से सकारात्मक क्षेत्र में लौट आया है, जो कम महंगाई से सहारा पा रहा है. इन्फ्रास्ट्रक्चर और कंस्ट्रक्शन गुड्स में विकास दर अप्रैल में घटकर 4.0% रह गई, जो मार्च में 9.9% थी. यह संभवत: सरकारी पूंजीगत खर्च में कमी का संकेत देता है.

GDP पूर्वानुमान और जोखिम
क्रिसिल ने वित्त वर्ष 2026 के लिए भारत की GDP वृद्धि का अनुमान 6.5% पर बरकरार रखा है. हालांकि, एजेंसी ने चेतावनी दी कि यह पूर्वानुमान वैश्विक व्यापार नीतियों में बदलाव और बाहरी मांग में कमजोरी जैसे जोखिमों से घिरा हुआ है। रिपोर्ट में कहा गया है, "औद्योगिक गति इस बात पर निर्भर करेगी कि वैश्विक व्यापार तनाव किस दिशा में बढ़ते हैं और घरेलू मांग निर्यात में आई गिरावट की कितनी भरपाई कर पाती है."

निष्कर्ष
जहां भारत का औद्योगिक क्षेत्र फिलहाल वैश्विक मोर्चे से दबाव का सामना कर रहा है, वहीं घरेलू अर्थव्यवस्था की संरचनात्मक मजबूती, नीतिगत समर्थन, और सकारात्मक मानसून की उम्मीद इस प्रभाव को कुछ हद तक कम कर सकती है. आगामी कुछ महीने यह तय करने में अहम होंगे कि क्या घरेलू सहायक कारक अंतरराष्ट्रीय चुनौतियों को पार कर पाएंगे.


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