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आस्था के महापर्व छठ पर बाजार में 50,000 करोड़ का कारोबार, अकेले बिहार में 15,000 करोड़ का व्यापार

छठ पूजा अब केवल श्रद्धा का पर्व नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक सशक्तिकरण का प्रतीक बन चुकी है. इस महापर्व ने एक बार फिर साबित किया कि भारत की पारंपरिक आस्थाएं जब बाजार से जुड़ती हैं, तो वे देश की अर्थव्यवस्था को नई ऊर्जा देती हैं.

रितु राणा 7 months ago

छठ पूजा सिर्फ आस्था और विश्वास का प्रतीक नहीं रही, बल्कि अब यह देश की अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने वाला बड़ा पर्व बन चुकी है. कंफेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (CAIT) की रिपोर्ट के मुताबिक इस साल छठ पूजा के अवसर पर देशभर में करीब 50,000 करोड़ रुपये का कारोबार हुआ है. यह आंकड़ा दिखाता है कि लोक आस्था का यह पर्व अब इकोनॉमिक एक्टिविटी का मेगा इवेंट बन चुका है. लाखों छोटे कारोबारी, फल-सब्जी विक्रेता और पूजा सामग्री बेचने वाले दुकानदारों के लिए छठ इस साल भी त्योहार के साथ रोजगार लेकर आई.

बिहार में 15,000 करोड़ का व्यापार, दिल्ली-एनसीआर भी पीछे नहीं

CAIT की रिपोर्ट के अनुसार, अकेले बिहार में लगभग 15,000 करोड़ रुपये का कारोबार हुआ. वहीं दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में 8,000 करोड़ रुपये और झारखंड में 5,000 करोड़ रुपये से अधिक का व्यापार दर्ज किया गया. अन्य राज्यों में भी छठ का प्रभाव दिखाई दिया. पूर्वांचली जनसंख्या वाले पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश, ओडिशा, कर्नाटक और तेलंगाना में भी घाटों और तालाबों पर पूजा का आयोजन हुआ, जिससे स्थानीय बाजारों में अच्छी-खासी बिक्री दर्ज की गई.

किन वस्तुओं की रही सबसे अधिक मांग

इस बार छठ पूजा में खरीदी गई वस्तुओं की लिस्ट काफी लंबी रही. मुख्य रूप से कृषि उत्पाद और पूजा सामग्री की बिक्री में जबरदस्त उछाल देखने को मिला.

1.  केला, गन्ना, नारियल और मौसमी फल, चावल, अनाज जैसे कृषि उत्पादों की भारी मांग रही.

2.  ठेकुआ, खीर, लड्डू और प्रसाद बनाने की सामग्री की बिक्री में रिकॉर्ड बढ़ोतरी हुई.

3.  पूजा के लिए टोकरी, दीये, पत्तल, फूल, कपड़े, और मिट्टी के बर्तन बड़ी मात्रा में बिके. 

4.  घाट निर्माण, लाइटिंग, सफाई, नाव सेवा और सुरक्षा से जुड़े कारोबार को भी अच्छा मुनाफा हुआ.

देशभर में 10 करोड़ से ज्यादा लोगों ने मनाया छठ

इस साल छठ पर्व में देशभर में 10 करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं ने भाग लिया. ग्रामीण से लेकर शहरी इलाकों तक घाटों पर महिलाओं की उपस्थिति और उत्साह ने यह साबित कर दिया कि यह पर्व सिर्फ पूजा नहीं, बल्कि लोक संस्कृति का आर्थिक उत्सव बन चुका है. केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से भी घाटों की साफ-सफाई, सुरक्षा और रोशनी की व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया गया, जिससे व्यापारिक गतिविधियों को और प्रोत्साहन मिला.

छठ पूजा बना अर्थव्यवस्था का 'लोकल ग्रोथ इंजन'

त्योहारों के मौसम में दीवाली और दुर्गा पूजा के बाद छठ पूजा अब तीसरा सबसे बड़ा आर्थिक अवसर बन चुकी है. गांवों से लेकर महानगरों तक इस दौरान खरीदी, ट्रांसपोर्ट, लाइटिंग और सर्विस सेक्टर में उल्लेखनीय बढ़ोतरी देखी जा रही है. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इस लोक पर्व को स्थानीय हस्तशिल्प और कृषि बाजार से जोड़ा जाए, तो आने वाले वर्षों में यह देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई ताकत दे सकता है.

छठ पूजा का आर्थिक प्रभाव महानगरों और उभरते राज्यों तक फैला

सीएआईटी के महासचिव और चांदनी चौक से सांसद प्रवीन खंडेलवाल ने बताया कि बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश जैसे पारंपरिक राज्य, विशेषकर पूर्वांचल क्षेत्र, इस बार भी छठ पूजा के प्रमुख केंद्र रहे. यहां सबसे बड़े घाट, भीड़ और पूजा सामग्री की मांग देखी गई. हालांकि दिल्ली और एनसीआर क्षेत्र में भी भारी व्यापारिक उछाल देखने को मिला, क्योंकि यहां बड़ी संख्या में पूर्वांचली आबादी रहती है. दिल्ली सरकार ने लगभग 1,500 घाटों का निर्माण कराया और पूजा सामग्री, अस्थायी ढांचे, सुरक्षा और स्वच्छता सेवाओं पर भारी खर्च किया.

पश्चिम बंगाल में गंगा तटों पर बसे प्रवासी समुदाय के कारण व्यापक स्तर पर छठ मनाया गया, जबकि मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान ने तालाबों और घाटों की मरम्मत और विकास पर विशेष ध्यान दिया. ओडिशा, कर्नाटक और तेलंगाना में भी प्रवासी जनसंख्या के कारण स्थानीय बाजारों में अच्छी खासी गतिविधि देखी गई. खंडेलवाल ने कहा कि अब छठ पूजा का आर्थिक प्रभाव पारंपरिक क्षेत्रों से निकलकर महानगरों और उभरते राज्यों तक फैल चुका है, जहां प्रवासी समुदायों ने स्थानीय मांग को मजबूती दी है.

देशभर में स्थानीय बाजारों में “स्वदेशी छठ” अभियान चलाया

खंडेलवाल ने बताया कि प्रधानमंत्री मोदी के स्वदेशी अभियान को व्यापारी संगठनों और जनता ने उत्साहपूर्वक अपनाया. देशभर में स्थानीय बाजारों में “स्वदेशी छठ” अभियान चलाया गया, जिसमें पारंपरिक ठेकुआ बनाने वाले, मिट्टी के बर्तन कारीगर, बांस और केले के पत्तों की टोकरियां बुनने वाले तथा गुड़ उत्पादक शामिल रहे. इस पहल से स्थानीय हस्तशिल्प और स्वदेशी उत्पादों की बिक्री में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई. उन्होंने आगे कहा कि वर्ष 2025 में प्रधानमंत्री के जीएसटी सेविंग्स फेस्टिवल के तहत कर दरों में भारी कटौती की गई थी, जिससे दिवाली बिक्री में पहले ही तेजी आई थी. यही सकारात्मक रुझान छठ पूजा की खरीदारी में भी जारी रहा, जिससे दिवाली और छठ के संयुक्त उत्सव ने उपभोक्ता मांग को और बढ़ाया.

देशभर में राज्य और स्थानीय सरकारों द्वारा घाट निर्माण, नागरिक तैयारियों और अन्य सेवाओं पर किए गए सार्वजनिक व्यय का अनुमान सैकड़ों से हजारों करोड़ रुपये तक है. छठ पूजा ने अल्पकालिक रोजगार के अनेक अवसर भी पैदा किए, जिससे ठेकुआ बनाने वालों, छोटे विक्रेताओं, सफाई कर्मियों, नाविकों, सुरक्षा कर्मियों और परिवहन संचालकों को लाभ हुआ.


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