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BW प्रभाव : Sebi ने फॉरेंसिक ऑडिटर विस्तार के संकेत दिए

SEBI की सुधारात्मक पहल सराहनीय है, लेकिन चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता में कमी अब भी चिंता का विषय है. भरोसा बहाल करने के लिए स्पष्ट मानदंड और व्यापक भागीदारी जरूरी है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

पलक शाह

बाजार नियामक सेबी (SEBI) का कहना है कि वह चालू वित्त वर्ष के भीतर अतिरिक्त फॉरेंसिक ऑडिटर्स को सूचीबद्ध करने की योजना बना रहा है, जो संभवतः बिजनेसवर्ल्ड (BW) की तीखी रिपोर्ट “सेबी की फॉरेंसिक ऑडिटर यू-टर्न: पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ विश्वासघात?” (25 मई 2025 को प्रकाशित) की प्रतिक्रिया के रूप में देखा जा रहा है. इस रिपोर्ट ने इस बात पर रोशनी डाली थी कि सेबी ने 2022 में 20 कंपनियों के फॉरेंसिक ऑडिटर पैनल को घटाकर 2025 में केवल नौ कर दिया, जिससे नियामक की चयन प्रक्रिया और पारदर्शिता की प्रतिबद्धता पर गंभीर सवाल उठे. हालांकि पैनल के विस्तार की सेबी की घोषणा जवाबदेही की भावना दिखाती है, लेकिन पात्रता मानदंडों को कैसे लागू किया गया  और क्या इन्हें कमजोर किया गया. इस पर स्पष्टता की कमी से नियामक की पारदर्शिता पर ध्यान बना हुआ है.

सेबी की प्रतिक्रिया: एक सकारात्मक कदम

बिजनेसवर्ल्ड की रिपोर्ट के बाद जारी एक स्पष्टीकरण में, सेबी ने अपनी सूचीबद्धता प्रक्रिया को रेखांकित किया और प्रक्रिया की कठोरता पर जोर दिया. नियामक ने कहा कि यह प्रक्रिया एमएसटीसी पोर्टल के माध्यम से आयोजित की गई, जिसमें 29 नवंबर 2024 को टाइम्स ऑफ इंडिया (अंग्रेजी), नवभारत टाइम्स (हिंदी), और नवराष्ट्र (मराठी) में केंद्रीय संचार ब्यूरो की व्यवस्था के तहत विज्ञापन प्रकाशित किए गए. आवेदन 19 दिसंबर 2024 तक स्वीकार किए गए थे, जिसकी अंतिम तिथि 5 जनवरी 2025 तक बढ़ाई गई थी. प्राप्त 52 आवेदनों में से, सेबी ने नौ कंपनियों का चयन किया जो इसके पात्रता मानदंडों पर खरी उतरीं, और 23 अप्रैल 2025 को सूची प्रकाशित की. नियामक ने यह भी उल्लेख किया कि पहले से सूचीबद्ध कई प्रमुख कंपनियों जैसे अर्न्स्ट एंड यंग (ईवाई), केपीएमजी एश्योरेंस एंड कंसल्टिंग सर्विसेज, और ग्रांट थॉर्नटन भारत ने इस बार आवेदन नहीं किया.

सेबी द्वारा यह स्पष्ट करना कि वह “चालू वित्त वर्ष के दौरान अतिरिक्त फॉरेंसिक ऑडिटरों की सूचीबद्धता पर विचार कर रहा है,” यह स्पष्ट संकेत है कि बिजनेसवर्ल्ड की रिपोर्ट का प्रभाव पड़ा है. रिपोर्ट में पैनल के घटे आकार की आलोचना की गई थी, जिससे संसाधनों पर बोझ और कॉरपोरेट धोखाधड़ी की जांचों में देरी की आशंका जताई गई थी, और यह बात सेबी को अपने दृष्टिकोण पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित करती प्रतीत होती है. पैनल को मजबूत करने की यह प्रतिबद्धता एक स्वागत योग्य कदम है, जो यह दर्शाता है कि सेबी अपनी फॉरेंसिक ऑडिट प्रणाली में क्षमता और विशेषज्ञता को लेकर उठे सवालों को सुलझाने के लिए तैयार है.

मापदंडों और पारदर्शिता पर बने सवाल
सेबी की 2021 की फॉरेंसिक ऑडिटरों के लिए दिशानिर्देशों ने एक उच्च मानक स्थापित किया था, कंपनियों के पास 10 वर्षों का फॉरेंसिक ऑडिट अनुभव होना चाहिए, कम से कम 10 भागीदार या निदेशक (जिनमें से पांच सक्रिय रूप से फॉरेंसिक कार्य में संलग्न हों), तीन वर्षों में 15 फॉरेंसिक ऑडिट पूरे किए हों (जिनमें से तीन नियामक निकायों, सार्वजनिक उपक्रमों या सरकारी एजेंसियों के लिए किए गए हों), और तीन वर्षों में फॉरेंसिक ऑडिट से ₹1 करोड़ का राजस्व प्राप्त हुआ हो. जिन कंपनियों के खिलाफ अनुशासनात्मक या कानूनी कार्यवाही चल रही हो, उन्हें प्रतिबंधित किया गया था. इन मानदंडों का उद्देश्य केवल शीर्ष श्रेणी की कंपनियों को संवेदनशील जांच सौंपना था, जिससे बाजार की अखंडता बनी रहे.

हालांकि, 2025 के पैनल में कुछ ऑडिटरों को शामिल करने और कुछ अधिक उपयुक्त कंपनियों को बाहर रखने से सवाल उठे हैं. जबकि 2022 के पैनल से कुछ कंपनियों को बनाए रखा गया, वहीं अन्य को जिनका फॉरेंसिक ऑडिट में अपेक्षाकृत कम अनुभव है, उन्हें शामिल किया गया. सेबी की सफाई में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि इन कंपनियों ने कठोर राजस्व या अनुभव मानकों को कैसे पूरा किया और यह भी नहीं बताया गया कि प्रतिष्ठित कंपनियों ने आवेदन क्यों नहीं किया. इस कमी से यह अटकलें लगाई जा रही हैं कि क्या मानदंडों को समान रूप से लागू किया गया था या कुछ आवेदकों को समायोजित करने के लिए इन्हें शिथिल किया गया था.

डेलॉयट और बीडीओ इंडिया की शामिली, जो दोनों आईएलएंडएफएस घोटाले से जुड़ी रही हैं, इस मामले को और जटिल बनाती है. डेलॉयट ने 2012 से 2017 तक आईएलएंडएफएस फाइनेंशियल सर्विसेज लिमिटेड का ऑडिट किया था, जिस पर गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय ने लेखा चूकों के लिए जांच की थी, जबकि बीडीओ इंडिया पर भी इसी तरह के सवाल उठे थे. हालांकि इन कंपनियों ने सेबी के तकनीकी मानदंडों को पूरा किया हो सकता है, लेकिन इन्हें कम प्रसिद्ध संस्थाओं के साथ शामिल करने से नियामक की जांच प्रक्रिया पर सवाल उठते हैं, खासकर उस नियम के संदर्भ में जो चल रही नियामक जांच का सामना कर रही कंपनियों को बाहर करता है.

संतुलन का प्रयास: प्रगति और खामियां
सेबी को उसके पारदर्शी विज्ञापन प्रक्रिया और सार्वजनिक निगरानी पर त्वरित प्रतिक्रिया के लिए श्रेय दिया जाना चाहिए. अतिरिक्त सूचीबद्धता पर विचार करने का निर्णय एक ऐसे नियामक को दर्शाता है जो सुधार के लिए तैयार है, जो भारत के वित्तीय बाजारों के लिए एक सकारात्मक संकेत है. हालांकि, यह जानकारी सार्वजनिक रूप से साझा न करना कि नौ कंपनियों का चयन कैसे हुआ  और अन्य को क्यों बाहर रखा गया सुधार की गुंजाइश छोड़ता है. निवेशकों और बाजार के हितधारकों को यह उम्मीद है कि सेबी, जो अपनी 2020 की फॉरेंसिक ऑडिट प्रकटीकरण नियमों के तहत सूचीबद्ध कंपनियों से पारदर्शिता की मांग करता है, खुद को भी उसी मानक पर कायम रखे.

बिजनेसवर्ल्ड की रिपोर्ट ने निस्संदेह कार्रवाई को प्रेरित किया है, जिससे सेबी को पैनल के आकार और क्षमता को लेकर उठी चिंताओं को संबोधित करने की जरूरत महसूस हुई. हालांकि, विश्वास को पूरी तरह बहाल करने के लिए, सेबी को अपने चयन मानदंडों पर अधिक स्पष्टता प्रदान करनी चाहिए और आगामी सूचीबद्धता में प्रतिष्ठित कंपनियों की व्यापक भागीदारी को प्रोत्साहित करना चाहिए. एक पारदर्शी, योग्यता-आधारित प्रक्रिया फॉरेंसिक ऑडिट ढांचे को मजबूत करेगी और सेबी की भूमिका को एक विश्वसनीय बाजार प्रहरी के रूप में सुदृढ़ करेगी.

आगे का रास्ता
नियामक की सफाई आलोचना को स्वीकार करने की तत्परता को दर्शाती है, लेकिन मानदंडों के लागू होने और कंपनियों के चयन को लेकर अनुत्तरित सवाल यह दिखाते हैं कि और अधिक पारदर्शिता की आवश्यकता है. जैसे-जैसे सेबी अतिरिक्त सूचीबद्धता की तैयारी कर रहा है, हितधारक इस प्रक्रिया पर बारीकी से नजर रखेंगे कि क्या इसमें विशेषज्ञता, विश्वसनीयता और पारदर्शिता को प्राथमिकता दी जाती है. बिजनेसवर्ल्ड की खोजी रिपोर्ट ने एक महत्वपूर्ण संवाद को जन्म दिया है, और सेबी के अगले कदम यह तय करेंगे कि क्या वह इस निगरानी को स्थायी सुधार में बदल सकता है.


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