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अब “कीमत” से “भावना” की ओर झुक रहे हैं खरीदारों के फैसले : Ipsos

आईप्सोस की नई शॉपर रिसर्च यह साफ़ करती है कि उपभोक्ता अब खरीदारी में कीमत और जरूरत से आगे बढ़कर भावना और अनुभव की ओर जा रहे हैं.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 5 months ago

आईप्सोस (Ipsos) की नई शॉपर रिसर्च में कहा गया है कि खरीदार अब सिर्फ जरूरी वस्तुओं की खरीद से आगे बढ़कर डिस्क्रीशनरी और “इंडल्जेंस” यानी मन भाने वाली चीजों की ओर जा रहे हैं, जिससे ब्रांड्स के लिए मार्केटिंग रणनीतियों को फिर से डिजाइन करना जरूरी हो गया है. रिसर्च के अनुसार, जैसे-जैसे खरीदारी की प्रकृति जरूरी से मनोरंजक होती जाती है, ब्रांड की भूमिका और प्रभाव बढ़ता जाता है.

खरीदारी का नया पैटर्न

आईप्सोस के शॉपर इनसाइट्स टीम ने कई वर्षों के शॉपर रिसर्च डेटा के आधार पर यह समझाया है कि खरीद निर्णय किस तरह बदलते हैं. यह बदलाव संदर्भ, मानसिकता और जरूरत पर निर्भर करता है. कंपनी ने इसे “डिसीजन ट्री” के रूप में एक फ्रेमवर्क में रखा है, जो बताता है कि खरीद के समय उपभोक्ता किन गुणों को प्राथमिकता देते हैं. इस फ्रेमवर्क को उन्होंने “स्पेक्ट्रम ऑफ नेसेसिटी” यानी जरूरत की श्रेणी में विभाजित किया है, जिसमें खरीद को तीन हिस्सों में बांटा गया है: Essential Commodities (जरूरी वस्तुएं), Casual Indulgence (आकस्मिक मनभरी खरीद) और Pleasurable Indulgence (पूरा आनंद देने वाली खरीद).

जरूरी वस्तुओं में ब्रांड का प्रभाव सीमित

रिसर्च के अनुसार जरूरी वस्तुओं (जैसे रोजमर्रा की जरूरतें) में ब्रांड की भूमिका सीमित रहती है. ये खरीदारी अक्सर कम इनवॉल्वमेंट वाली और आदत-आधारित होती है, जिसमें कीमत और प्रदर्शन सबसे अहम फैक्टर बनते हैं. आईप्सोस के मुताबिक, “जरूरी चीजों में ब्रांड केवल याद दिलाने या भरोसा जताने में मदद करता है, लेकिन सक्रिय विचार-विमर्श का कारण नहीं बनता.” ऐसे में बिक्री के बिंदु पर दिखावट, स्पष्ट फंक्शनल मैसेजिंग और मजबूत इन-स्टोर प्रमोशन निर्णायक भूमिका निभाते हैं. अलग पैकेजिंग और हर जगह उपलब्धता से उपभोक्ता का निर्णय सरल हो जाता है और वह जल्दी खरीदता है. मार्केटर्स के लिए इस क्षेत्र में सफलता का मतलब कहानी कहने से ज्यादा “क्यों खरीदें” का स्पष्ट संदेश देना है, जो फंक्शनल श्रेष्ठता और उपलब्धता पर आधारित हो.

मध्य श्रेणी में ब्रांड की ताकत बढ़ती है

Casual Indulgence यानी रोजमर्रा की डिस्क्रीशनरी खरीद में ब्रांड की भूमिका काफी बढ़ जाती है. इस श्रेणी में मजबूत ब्रांड उपभोक्ता के लिए गुणवत्ता और भरोसे का शॉर्टकट बन जाता है, जिससे निर्णय जल्दी हो जाता है. यहां सेंसरी संकेत जैसे स्वाद, खरीद को भावनात्मक रूप से प्रभावित करते हैं और दोबारा खरीदने की प्रवृत्ति बढ़ाते हैं. पैकेजिंग भी महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि पैक का आकार और फॉर्मैट यह दर्शाता है कि उत्पाद कब और कहां इस्तेमाल होगा. ऑन-द-गो कैटेगरी में पोर्टेबिलिटी और सुविधा प्राथमिक होती है, जबकि घर पर उपयोग में पैकेजिंग अनुभव, स्टोरेज और उपयोग के अवसरों से जुड़ती है.

आईप्सोस ने कहा कि इस मध्य स्तर में मार्केटर्स को रिश्वसनीयता और भरोसा बनाना चाहिए. विश्वसनीय जानकारी देना, चैनलों में निरंतरता बनाए रखना और गुणवत्ता संकेतों को मजबूत करना जरूरी है ताकि उपभोक्ता अपने निर्णय में आत्मविश्वास महसूस करें.

Pleasurable Indulgence में ब्रांड बन जाता है “मुख्य कारण”

सबसे अधिक ब्रांड प्रभाव Pleasurable Indulgence यानी लक्ज़री या आशापूर्ण श्रेणियों में देखा गया है. यहां फंक्शनल पहलू पीछे हट जाता है और निर्णय में भावना, पहचान और आत्म-अभिव्यक्ति प्रमुख हो जाती है. आईप्सोस के अनुसार, “इन इंडल्जेंस श्रेणियों में ब्रांड ही मुख्य आकर्षण बन जाता है.” ऐसी खरीद अक्सर जश्न या खुद को पुरस्कार देने से जुड़ी होती है, इसलिए मार्केटिंग में कहानी, विरासत और प्रतीकात्मकता का महत्व बढ़ जाता है.

रिसर्च में कहा गया कि लिमिटेड एडिशन, क्यूरेटेड अनुभव और वेटलिस्ट जैसे scarcity-ड्रिवन तरीके मांग बढ़ा सकते हैं, क्योंकि वे उत्पाद को विशेष और उच्च गुणवत्ता वाला दिखाते हैं. ब्रांड के आसपास “बेलॉन्गिंग” की भावना बनाना भी उतना ही जरूरी हो जाता है जितना कि उत्पाद स्वयं.

ब्रांड की भूमिका “संदर्भ पर निर्भर” है

आईप्सोस इंडिया की एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर और हेड ऑफ शॉपर इनसाइट्स, अर्चना गुप्ता ने कहा कि यह सीख बताती है कि ब्रांड की भूमिका स्थिर नहीं होती, बल्कि पूरी तरह संदर्भ-निर्भर होती है. खरीद के अवसरों के हिसाब से ब्रांड का महत्व बदलता है, और इसे समझकर मार्केटर्स बजट और संदेश को सही तरीके से अलॉट कर सकते हैं. उन्होंने कहा कि “कुंजी यह समझना है कि उपभोक्ता एक फंक्शनल चुनाव कर रहा है, मूल्य-आधारित निर्णय ले रहा है, या कहानी और पहचान में भावनात्मक निवेश कर रहा है.”

शॉपर इनसाइट्स की रिसर्च डायरेक्टर, श्रुति पतोडिया ने कहा कि जो मार्केटर्स खरीद स्पेक्ट्रम के साथ ब्रांड की बदलती भूमिका को समझते हैं, वे शॉपर जर्नी के हर चरण में प्रासंगिक रणनीति डिजाइन कर सकते हैं.

आईप्सोस ने यह भी बताया कि बजट सीमित और उपभोक्ता ध्यान अधिक fragmented होने के कारण, यह निष्कर्ष प्रिसिजन मार्केटिंग की जरूरत को रेखांकित करते हैं, ताकि हर निर्णय के पल पर खर्च, संदेश और एक्टिवेशन सही ड्राइवरों से मेल खाएं.

 


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