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बिहार का माइक्रोफाइनेंस बिल बन सकता है सेक्टर के लिए चुनौती, रिकवरी में हो सकती है देरी: इंडिया रेटिंग्स

इस विधेयक को कानून बनने के लिए अभी बिहार विधान परिषद की मंजूरी, राज्यपाल की सहमति और आधिकारिक राजपत्र में अधिसूचना जारी होना बाकी है. इसके बाद ही यह पूरी तरह लागू हो सकेगा.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 6 months ago

भारत के माइक्रोफाइनेंस सेक्टर को बिहार सरकार के प्रस्तावित नए कानून से झटका लग सकता है. रेटिंग एजेंसी इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च (Ind-Ra) की एक रिपोर्ट के मुताबिक अगर बिहार का माइक्रोफाइनेंस संस्थानों से जुड़ा नया विधेयक कानून बनता है, तो इससे सेक्टर की मौजूदा कमजोर रिकवरी प्रभावित हो सकती है और देश के सबसे बड़े माइक्रोफाइनेंस बाजार में कर्ज वितरण पर असर पड़ सकता है.

क्या है बिहार माइक्रोफाइनेंस बिल

बिहार माइक्रो फाइनेंस इंस्टीट्यूशंस (रेगुलेशन ऑफ मनी लेंडिंग एंड प्रिवेंशन ऑफ कोअर्सिव एक्शन) बिल, 2026 को 26 फरवरी को बिहार विधानसभा में पेश किया गया था. इस विधेयक में राज्य में काम करने वाले माइक्रोफाइनेंस संस्थानों के लिए सख्त नियमों का प्रस्ताव है. इसके तहत बिना नियमन वाले संस्थानों के लिए अनिवार्य पंजीकरण, कर्ज लेने की सीमा तय करना और ब्याज दरों पर सीमा लगाने जैसे प्रावधान शामिल हैं.

सेक्टर में आ सकती है परिचालन बाधा

इंडिया रेटिंग्स के अनुसार यह कानून लागू होने पर माइक्रोफाइनेंस सेक्टर में परिचालन स्तर पर बाधाएं आ सकती हैं. इससे उधारकर्ताओं की क्रेडिट अनुशासन कमजोर हो सकती है और गैर-निष्पादित ऋण (डिफॉल्ट) बढ़ने की आशंका भी है. इसका असर खास तौर पर गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों-माइक्रोफाइनेंस संस्थानों (NBFC-MFIs), बैंकों और स्मॉल फाइनेंस बैंकों पर पड़ सकता है.

भारत का सबसे बड़ा माइक्रोफाइनेंस बाजार है बिहार

सितंबर 2025 तक बिहार देश का सबसे बड़ा माइक्रोफाइनेंस बाजार रहा है, जहां पूरे उद्योग के पोर्टफोलियो का लगभग 15 प्रतिशत हिस्सा है. हालांकि मार्च 2025 में यह हिस्सा 18 प्रतिशत था, जो अब कुछ कम हुआ है. राज्य में कई बड़े माइक्रोफाइनेंस संस्थानों की बड़ी हिस्सेदारी है, इसलिए यहां किसी भी नियामकीय बदलाव का पूरे सेक्टर पर बड़ा असर पड़ सकता है.

इंडिया रेटिंग्स में वित्तीय संस्थानों के प्रमुख करण गुप्ता ने कहा कि बिहार में हालिया घटनाक्रम माइक्रोफाइनेंस सेक्टर की चुनौतियों को और बढ़ा सकता है और इससे रिकवरी की प्रक्रिया में देरी हो सकती है.

कर्ज और ब्याज पर सख्त सीमा

प्रस्तावित कानून के तहत भारतीय रिजर्व बैंक से पंजीकृत नहीं होने वाले माइक्रोफाइनेंस संस्थानों को राज्य सरकार के वित्त विभाग से पंजीकरण कराना होगा. उन्हें 90 दिनों के भीतर यह प्रक्रिया पूरी करनी होगी और कर्ज देने से पहले अनुमति लेनी होगी.

विधेयक में यह भी प्रावधान है कि कोई भी व्यक्ति एक साथ दो से अधिक माइक्रोफाइनेंस संस्थानों से कर्ज नहीं ले सकेगा. इसके अलावा कुल ब्याज भुगतान को मूल राशि के 100 प्रतिशत से अधिक नहीं होने दिया जाएगा.

वसूली के नियमों पर भी सख्ती

बिल में कर्ज वसूली के दौरान जबरदस्ती, उत्पीड़न या उधारकर्ताओं और उनके परिवार को डराने-धमकाने जैसी गतिविधियों पर रोक लगाने का प्रस्ताव है. इसके साथ ही नियमों के उल्लंघन के मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतों या व्यवस्था बनाने की भी बात कही गई है.

रेटिंग एजेंसी का कहना है कि लंबे समय में यह कदम नैतिक और जिम्मेदार ऋण देने की प्रथाओं को बढ़ावा दे सकता है, खासकर ग्रामीण इलाकों में जहां माइक्रोफाइनेंस के अधिकतर ग्राहक स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाएं होती हैं.

अल्पकाल में कलेक्शन पर पड़ सकता है असर

हालांकि एजेंसी ने चेतावनी दी है कि अल्पकाल में सख्त नियमों और दंडात्मक प्रावधानों के कारण कलेक्शन प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है. इससे कर्ज देने वाली कंपनियां ज्यादा सतर्क हो सकती हैं और जोखिम वाले क्षेत्रों में ऋण वितरण कम कर सकती हैं.

इससे सेक्टर की पोर्टफोलियो वृद्धि धीमी हो सकती है और कुछ कंपनियां उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों से बाहर भी निकल सकती हैं. संक्रमण काल में अगर उधारकर्ता भुगतान टालते हैं तो परिसंपत्ति गुणवत्ता पर भी दबाव आ सकता है.

RBI से नियंत्रित संस्थानों पर लागू नहीं होगा कानून

माइक्रोफाइनेंस इंडस्ट्री नेटवर्क (MFIN) ने 27 फरवरी को जारी बयान में कहा कि यह प्रस्तावित कानून भारतीय रिजर्व बैंक से नियंत्रित या लाइसेंस प्राप्त संस्थानों पर लागू नहीं होगा. बिल की धारा 2(2) के तहत बैंक और NBFC-MFI जैसी RBI-नियंत्रित संस्थाओं को राज्य स्तर पर अलग से पंजीकरण कराने की जरूरत नहीं होगी.

सेक्टर की लागत और मुनाफे पर असर

इंडिया रेटिंग्स का अनुमान है कि इस बिल के कारण माइक्रोफाइनेंस सेक्टर की क्रेडिट लागत वित्त वर्ष 2027 में लगभग 80 बेसिस प्वाइंट तक बढ़ सकती है. इसके परिणामस्वरूप परिसंपत्तियों पर रिटर्न (RoAUM) पहले के अनुमान 2.7 प्रतिशत से घटकर लगभग 2.1 प्रतिशत रह सकता है.

एजेंसी का कहना है कि निजी इक्विटी निवेश से समर्थित बड़े माइक्रोफाइनेंस संस्थान मजबूत पूंजी और तरलता के कारण इस प्रभाव को बेहतर तरीके से संभाल सकते हैं. वहीं छोटे NBFC संस्थानों पर ज्यादा दबाव पड़ सकता है.

अभी कानून बनने की प्रक्रिया बाकी

इस विधेयक को कानून बनने के लिए अभी बिहार विधान परिषद की मंजूरी, राज्यपाल की सहमति और आधिकारिक राजपत्र में अधिसूचना जारी होना बाकी है. इसके बाद ही यह पूरी तरह लागू हो सकेगा.


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