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SEBI का बड़ा फैसला : म्यूचुअल फंड खर्च ढांचे में बदलाव, निवेशकों को राहत

SEBI का यह नया म्यूचुअल फंड खर्च ढांचा निवेशकों के लिए लागत को अधिक पारदर्शी और समझने योग्य बनाता है, जिससे वे बेहतर निवेश फैसले ले सकेंगे.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 4 months ago

भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने घरेलू म्यूचुअल फंड उद्योग के लिए खर्च से जुड़ा पूरा ढांचा बदल दिया है. करीब 80 लाख करोड़ रुपये के इस उद्योग में लागत को ज्यादा पारदर्शी बनाने के साथ-साथ बाजार नियामक ने एसेट मैनेजमेंट कंपनियों (AMC) पर पड़ने वाले असर को भी संतुलित करने की कोशिश की है. यह नया फ्रेमवर्क 1 अप्रैल से लागू होगा और इससे निवेशकों को म्यूचुअल फंड खर्च की स्पष्ट तस्वीर मिलेगी.

TER की जगह आया BER, खर्चों की होगी अलग-अलग पहचान

SEBI ने मौजूदा टोटल एक्सपेंस रेशियो (TER) की जगह अब बेस एक्सपेंस रेशियो (BER) लागू करने का फैसला किया है. BER में केवल वही फीस शामिल होगी जो AMC निवेशकों के पैसे के प्रबंधन के लिए लेती है. ब्रोकरेज, सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (STT), स्टांप ड्यूटी और एक्सचेंज शुल्क जैसे खर्च अब BER से बाहर होंगे और इन्हें अलग से दर्शाया जाएगा. ये शुल्क स्कीम की कैटेगरी और एसेट साइज के अनुसार अलग-अलग होंगे.

इक्विटी और नॉन-इक्विटी स्कीम्स के लिए नई सीमाएं तय

ओपन-एंडेड इक्विटी स्कीम्स के लिए संशोधित BER 500 करोड़ रुपये तक की एसेट साइज पर 2.10 फीसदी से शुरू होकर 50,000 करोड़ रुपये से अधिक एसेट वाली स्कीम्स के लिए 0.95 फीसदी तक रखा गया है. वहीं, नॉन-इक्विटी स्कीम्स के लिए यही सीमा 1.85 फीसदी से 0.70 फीसदी के बीच तय की गई है. क्लोज-एंडेड स्कीम्स के लिए भी बेस एक्सपेंस रेशियो को पहले की तुलना में कम किया गया है.

AMC की चिंता दूर करने की कोशिश

SEBI के इस प्रस्ताव के शुरुआती संकेतों के बाद सूचीबद्ध AMC के शेयरों में दबाव देखा गया था, क्योंकि निवेशकों को मुनाफे पर असर की आशंका थी. SEBI चेयरमैन तुहिन कांत पांडेय ने कहा कि यह ढांचा निवेशकों को कम लागत और ज्यादा स्पष्टता देने के साथ-साथ एसेट मैनेजर्स पर अनुचित असर से बचाने के लिए तैयार किया गया है. उनके मुताबिक यह फैसला निवेशक हित और उद्योग की स्थिरता के बीच संतुलन बनाता है.

रिसर्च और ब्रोकरेज अलग करने का प्रस्ताव वापस

एक अहम फैसले में SEBI ने रिसर्च और ब्रोकरेज शुल्क को अलग करने का प्रस्ताव वापस ले लिया है. नियामक का कहना है कि यूरोप में ऐसा प्रयोग सफल नहीं रहा, इसलिए इसे आगे नहीं बढ़ाया गया. हालांकि, ब्रोकरेज की सीमा को तर्कसंगत बनाया गया है. नकद बाजार में वैधानिक शुल्क को छोड़कर ब्रोकरेज सीमा 8.59 बेसिस पॉइंट से घटाकर 6 बेसिस पॉइंट कर दी गई है, जबकि डेरिवेटिव सेगमेंट में यह सीमा 3.89 से घटाकर 2 बेसिस पॉइंट कर दी गई है.

पुराने नियमों में बदलाव, हितों के टकराव पर फैसला टला

SEBI ने करीब तीन दशक पुराने म्यूचुअल फंड और स्टॉक ब्रोकर्स से जुड़े नियमों में बदलाव को भी मंजूरी दी है. पुराने और अप्रासंगिक प्रावधानों को हटाया जाएगा या उन्हें आपस में मिलाया जाएगा. हालांकि, हितों के टकराव से जुड़ी हाई-लेवल कमेटी की सिफारिशों पर फैसला फिलहाल टाल दिया गया है. इसका कारण कर्मचारियों की संपत्ति के सार्वजनिक खुलासे और गोपनीयता से जुड़ी चिंताएं बताई गई हैं.

IPO नियमों पर भी SEBI का रुख साफ

IPO में सेकेंडरी शेयरों की बढ़ती हिस्सेदारी पर चल रही बहस के बीच SEBI चेयरमैन ने कहा कि भारतीय पूंजी बाजार अब काफी परिपक्व हो चुका है. उनके मुताबिक कंपनियों को IPO के दौरान पूंजी जुटाने के साथ-साथ प्रमोटर्स और शुरुआती निवेशकों को आंशिक एग्जिट की अनुमति देना भी उचित है. SEBI ने IPO चरण में लॉक-इन और गिरवी शेयरों के प्रबंधन के लिए नया ढांचा और IPO खुलासों को ज्यादा रिटेल-फ्रेंडली बनाने के उपाय भी किए हैं.

 


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