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5 साल में बैंकों के डूब गए इतने लाख करोड़, जानें कौन है सबसे बड़ा डिफॉल्टर

पिछले पांच साल के आंकड़े बताते हैं कि बैंकों ने लगभग 10 लाख करोड़ रुपए के लोन को बट्टे खाते में डाला है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 4 years ago

सरकारी बैंकों पर प्राइवेटाइजेशन की तलवार लटक रही है. ऊपर लगभग हर साल उनके करोड़ों रुपए बट्टे खाते में जा रहा है. यानी उसके वापस आने की उम्मीद न के बराबर है, ऐसे में बैंकों की आर्थिक सेहत और खराब होती जा रही है. पिछले पांच साल के आंकड़े बताते हैं कि बैंकों ने लगभग 10 लाख करोड़ रुपए के लोन को बट्टे खाते में डाला, टेक्निकल शब्दों में कहें तो राइट ऑफ कर दिया है.

वित्त राज्यमंत्री ने दी जानकारी
एक सवाल के जवाब में वित्त राज्यमंत्री भागवत कराड ने बताया कि वित्तवर्ष 2021-22 के दौरान, बट्टे खाते में डाली जाने वाली राशि पिछले वर्ष की तुलना में कम हुई है. पिछले वित्तवर्ष में यह आंकड़ा 2,02,781 करोड़ रुपए था, जो अब घटकर 1,57,096 करोड़ रुपए हो गया. 2019-20 में राइट ऑफ किया गया लोन अमाउंट 2,34,170 करोड़ रुपए रहा, जो 2018-19 के 2,36,265 करोड़ रुपए से कम था. 

गीतांजलि जेम्स सबसे ऊपर
मंत्री कराड ने बताया कि कुल मिलाकर पिछले पांच वित्त वर्ष (2017-18 से 2021-22) के दौरान 9,91,640 करोड़ रुपए का बैंक लोन बट्टे खाते में डाला गया है. उन्होंने कहा कि पिछले चार साल में ऋण अदायगी मामलों में जानबूझकर चूक करने वालों की सबसे अधिक संख्या वर्ष 2020-21 में थी. उस दौरान 2,840 ने लोन लौटाने में चूक की. उसके अगले वर्ष यह संख्या 2,700 रही. मार्च 2019 के अंत में लोन नहीं चुकाने वालों की संख्या 2,207 थी, जो 2019-20 में बढ़कर 2,469 हो गई थी. गीतांजलि जेम्स लिमिटेड इस सूची में सबसे ऊपर है. इसके बाद एरा इंफ्रा इंजीनियरिंग, कॉनकास्ट स्टील एंड पावर, आरईआई एग्रो लिमिटेड और एबीजी शिपयार्ड लिमिटेड का नाम है.

7,110 करोड़ रुपए बकाया
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, फरार हीरा कारोबारी मेहुल चोकसी की कंपनी गीतांजलि जेम्स पर बैंकों का 7,110 करोड़ रुपए बकाया है, जबकि एरा इंफ्रा इंजीनियरिंग पर 5,879 करोड़ और कॉनकास्ट स्टील एंड पावर लिमिटेड पर 4,107 करोड़ रुपए बकाया है. इसके अलावा, आरईआई एग्रो लिमिटेड और एबीजी शिपयार्ड ने बैंकों का क्रमश: 3,984 करोड़ और 3,708 करोड़ रुपए नहीं लौटाया है. इतना ही नहीं, फ्रॉस्ट इंटरनेशनल लिमिटेड पर 3,108 करोड़, विनसम डायमंड्स एंड ज्वैलरी पर 2,671 करोड़, रोटोमैक ग्लोबल प्राइवेट लिमिटेड पर 2,481 करोड़, कोस्टल प्रोजेक्ट्स लिमिटेड पर 2,311 करोड़ और कुडोस केमी पर बैंकों का 2,082 करोड़ रुपए बकाया है.

क्या होता है राइट ऑफ?
लोन देने के बाद जब बैंक तमाम प्रयासों के बाद भी उसे वसूल नहीं कर पाते, तो उस राशि को नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स यानी NPA मान लिया जाता है. जब बैंकों का NPA काफी ज्यादा हो जाता है, तो वे NPA की इस राशि को राइट ऑफ कर देते हैं. नियमों के अनुसार, बैंक चार साल पुराने फंसे हुए कर्ज को बैलेंस शीट से हटा देते हैं. इसे ही राइट ऑफ या बट्टे खाते में डाला जाना कहा जाता है.


 


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