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ट्रूप कम्फर्टस लिमिटेड की अनदेखी कर सरकार ने सैन्य जवानों की यूनिफॉर्म के लिए निकाला टेंडर

इससे टीसीएल के सभी कर्मचारी सरकार के फैसले से नाराज बताए जा रहे हैं. ज्यादातर सैनिकों की कॉम्बैट यूनिफॉर्म को अभी तक टीसीएल ही बनाता रहा है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 4 years ago

नई दिल्लीः केंद्र सरकार के आधीन रक्षा मंत्रालय के सैन्य मामलों के विभाग ने ट्रूप कम्फर्टस लिमिटेड (टीसीएल) जो कि ऑर्डिनेंस फैक्ट्री बोर्ड की एक इकाई है उसको नजरअंदाज करते हुए सैनिकों की यूनिफॉर्म बनाने का टेंडर जारी कर दिया है. इससे टीसीएल के सभी कर्मचारी सरकार के फैसले से नाराज बताए जा रहे हैं. ज्यादातर सैनिकों की कॉम्बैट यूनिफॉर्म को अभी तक टीसीएल ही बनाता रहा है. ये पहली बार है जब सेना मुख्यालय ने इसके लिए दूसरी कंपनियों को आमंत्रित करने के लिए टेंडर जारी किया है.   

6 अक्टूबर को जारी हुआ था टेंडर

सैन्य मामलों के विभाग/सेना मुख्यालय ने 6 अक्टूबर, 2022 को 4 आयुध कारखानों की अनदेखी करते हुए "जैकेट / ट्राउजर और पुरुष के लिए कैप के एक सेट के रूप में कॉम्बैट यूनिफॉर्म डिजिटल प्रिंट" के 11,70,159 सेट की आपूर्ति के लिए एक टेंडर जारी किया था. आयुध कारखानों के निगमीकरण के बाद पर्याप्त कार्यभार प्रदान करने में निगमों को सौंपने के उनके द्वारा दिए गए आश्वासन की याद दिलाते हुए एआईडीईएफ ने अपने प्रतिनिधित्व में विशेष रूप से भारतीय सेना की नई डिजिटल कॉम्बैट यूनिफॉर्म का मामला सामने रखा है.  

नहीं निकाला जाना चाहिए टेंडर

एआईडीईएफ ने रक्षा मंत्री से अनुरोध किया है कि टीसीएल ग्रुप ऑफ ऑर्डनेंस फैक्ट्रीज में उपलब्ध क्षमता का पूरी तरह से उपयोग किया जाना चाहिए और वर्दी बनाने का टेंडर नहीं निकालना चाहिए था.  मैन्युफेक्चरिंग के लिए निजी क्षेत्र को बाहर रखना चाहिए, क्योंकि यह टीसीएल के तहत 4 आयुध कारखानों के अस्तित्व को प्रभावित करेगा और टीसीएल के तहत आयुध कारखानों के भविष्य पर एक बड़ा प्रश्न चिह्न खड़ा करेगा. 

सेना नहीं देगी यूनिफॉर्म बनाने का आदेश

सेना द्वारा जारी निविदा से अब यह स्पष्ट हो गया है कि सरकार नई लड़ाकू वर्दी के निर्माण के लिए आयुध कारखानों को कार्य आदेश नहीं देने जा रही है. सी. श्रीकुमार, महासचिव, एआईडीईएफ बस इस बात से नाराज हैं और कहा कि "हम टीसीएल के तहत 4 आयुध कारखानों की अनदेखी करते हुए एक ओपन टेंडर जारी करने के सेना मुख्यालय के फैसले का विरोध करते हैं, जिसमें सभी प्रकार के ट्रूप कम्फर्ट के निर्माण की कैप्टिव क्षमता है. वास्तव में टीसीएल की ऑर्डिनेंस फैक्ट्री ने सेना के अधिकारियों और सैनिकों को उनके अनुरोध पर सैकड़ों नई वर्दी की आपूर्ति की है और वे सभी ओसीएफ के श्रमिकों द्वारा निर्मित वर्दी की गुणवत्ता से अत्यधिक संतुष्ट थे. मैं यह समझने में विफल हूं कि सेना वर्तमान की तरह एक खुली निविदा जारी करके स्मार्ट खेलने की कोशिश क्यों कर रही है.”

प्राइवेट कंपनियों को खुश करने की कोशिश

सी. श्रीकुमार ने आगे कहा, “मैंने सेना मुख्यालय द्वारा जारी किए गए निविदा दस्तावेज का पूरी तरह से अध्ययन नहीं किया है. हालांकि, प्रथम दृष्टया यह स्पष्ट रूप से एक आभास देता है कि निविदा की शर्तें या तो कुछ चुनिंदा उद्योगों के अनुकूल हैं. टेक्सटाइल मैन्युफैक्चरिंग और गारमेंट मैन्युफैक्चरिंग दो अलग-अलग प्रकार के उद्योग हैं. लेकिन सेना मुख्यालय निविदा ऐसी शर्त रखता है कि बोली लगाने वाले के पास क्षमता / गतिविधियां और मशीनरी होनी चाहिए, भले ही एक कानूनी इकाई के तहत गीले प्रसंस्करण, रंगाई, छपाई और परिधान के लिए एक पैन नंबर को भी अनिवार्य किया है. इस प्रकार की कपड़ा मिलों को मिश्रित मिलें कहा जाता है. 

पहले रखी जाती थी इस तरह की शर्त

पूर्व में आयुध वस्त्र फैक्ट्रियां फैब्रिक की खरीद के लिए कंपोजिट मिलों की इस शर्त को अपने टेंडर में रखती थीं.  कई टेक्सटाइल इंडस्ट्रीज जो समग्र मिल नहीं हैं, ने इस शर्त के खिलाफ शिकायत की और बाद में आयुध कारखानों ने इस शर्त को वापस ले लिया है.  जब यह तथ्य है कि सेना ने न केवल समग्र मिलों की शर्त लगाकर एक कदम आगे बढ़ाया है, बल्कि यह शर्त भी लगाई है कि उनके पास परिधान निर्माण की सुविधा भी होनी चाहिए. मेरी जानकारी में भारत में केवल एक या दो कपड़ा मिलों में ही यह सुविधा है, जिसका अर्थ है कि निविदा केवल इन एक या दो चयनित कपड़ा मिलों तक ही सीमित होगी.
 
टीसीएल नहीं ले पाएगा इस वजह से टेंडर में भाग

श्रीकुमार का कहना है कि अन्य सभी कपड़ा मिलें और गारमेंट उद्योग निविदा में भाग नहीं ले सकेंगे. खासतौर पर टीसीएल के तहत आने वाली आयुध कारखानों की तस्वीर खत्म हो जाएगी. अतीत में जब एनटीसी मिलों को बंद कर दिया गया था तो एआईडीईएफ ने सरकार को प्रस्ताव दिया था कि इन कपड़ा मिलों को आयुध निर्माणी बोर्ड द्वारा सशस्त्र बलों के लिए आवश्यक सभी प्रकार की कपड़ा सामग्री की आपूर्ति के लिए लिया जा सकता है. लेकिन तत्कालीन सरकार ने हमारे प्रस्ताव को खारिज कर दिया.  किसी भी तरह से थोड़े से कानूनी ज्ञान के साथ मुझे लगता है कि यह निविदा कानून की जांच को कायम नहीं रखेगी. 

रक्षा मंत्री से करेंगे टेंडर रद्द करने की अपील

श्रीकुमार का कहना है कि वे एक बार फिर रक्षा मंत्री के साथ इस मामले को उठाएंगे और उनसे इन सभी विरोधाभासों और विवादों से बचने और सरकार को अंतिम रूप से बदनाम करने का अनुरोध करेंगे, निविदा रद्द की जा सकती है और सीधे 11,70,159 लड़ाकू वर्दी के आदेश दिए जा सकते हैं. सेट को टीसीएल के तहत 4 आयुध कारखानों पर रखा जा सकता है. 

भारत सरकार की कंपनी है टीसीएल

चूंकि, भारत सरकार ने सशस्त्र बलों के लिए ट्रूप कम्फर्ट आइटम्स के निर्माण का ध्यान रखने के लिए इन कारखानों की स्थापना की है. ये समर्पित क्षमताएं राष्ट्रीय संपत्ति हैं. देश आयुध कारखानों में उपलब्ध क्षमताओं का कम उपयोग करने का जोखिम नहीं उठा सकता है. केवल रक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में लागत एक कारक नहीं हो सकती है. हर चीज को व्यावसायिक नजरिए से नहीं देखा जा सकता, खासकर राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों में।  

सेना भी कर चुकी है फैक्ट्रियों की सराहना

सेना पूर्व में कई बार आयुध कारखानों की इस क्षमता के बारे में लिखित रूप में कई बार सराहना कर चुकी है. यहां तक ​​कि कोविड-19 संकट के दौरान भी टीसीएल के अधीन ये आयुध फैक्ट्रियां ही कवरॉल, मेडिकल मास्क, अस्पताल टेंट आदि का निर्माण और आपूर्ति करती थीं. ये सभी तथ्य रिकॉर्ड में उपलब्ध हैं. मुझे विश्वास है कि भारत सरकार पर सद्बुद्धि हावी होगी और हमारी मांग के अनुसार सकारात्मक निर्णय लिया जाएगा. यहां तक ​​कि कोविड-19 संकट के दौरान भी टीसीएल के अधीन ये आयुध फैक्ट्रियां ही कवरॉल, मेडिकल मास्क, अस्पताल टेंट आदि की कमी का निर्माण और आपूर्ति करती थीं। ये सभी तथ्य रिकॉर्ड में उपलब्ध हैं. मुझे विश्वास है कि भारत सरकार पर सद्बुद्धि हावी होगी और हमारी मांग के अनुसार सकारात्मक निर्णय लिया जाएगा.

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