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AI स्वास्थ्यकर्मियों का स्थान लेने के लिए नहीं, बल्कि सहयोग के लिए: स्वास्थ्य सचिव

इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट में स्वास्थ्य मंत्रालय ने ABDM के तहत इंटरऑपरेबल डिजिटल इकोसिस्टम की रूपरेखा प्रस्तुत की, जिसमें 859 मिलियन ABHA खाते और विस्तारित एआई-संचालित सार्वजनिक स्वास्थ्य पहल शामिल हैं

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 7 months ago

भारत के स्वास्थ्य पारिस्थितिकी तंत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के एकीकरण से सेवा वितरण में परिवर्तन आने की उम्मीद है, जो प्रणालीगत कमियों को पाटते हुए अग्रिम पंक्ति के कर्मचारियों पर दबाव कम करेगा. स्वास्थ्य सचिव पुण्य सलिला श्रीवास्तव ने सोमवार को कहा कि एआई का उद्देश्य मानव हस्तक्षेप का स्थान लेना नहीं, बल्कि उसका समर्थन करना है.

इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 के दौरान “नेशनल एआई स्ट्रेटेजी फॉर हेल्थ” पैनल में मुख्य भाषण देते हुए श्रीवास्तव ने कहा कि एआई स्वास्थ्य डेटा की अधिक प्रभावी व्याख्या और प्राथमिकता निर्धारण में मदद कर सकता है, जिससे तेज़ क्लिनिकल निर्णय-निर्माण संभव होगा और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों में दक्षता बढ़ेगी. उन्होंने कहा, “एआई से प्रमुख अपेक्षाओं में से एक, विशेषकर सार्वजनिक स्वास्थ्य में, यह है कि यह हमारे स्वास्थ्यकर्मियों पर बोझ कम करे.”

उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि चिकित्सक-रोगी संबंध स्वास्थ्य सेवा वितरण का मूल आधार बना हुआ है और एआई उपकरण चिकित्सा पेशेवरों के पूरक के रूप में डिज़ाइन किए गए हैं, विशेषकर उन उच्च-भार वाले सरकारी अस्पतालों में जहाँ प्रतिदिन 15,000 तक बाह्य रोगी पहुँच सकते हैं.

ABDM के तहत डिजिटल स्वास्थ्य पारिस्थितिकी तंत्र का विस्तार

श्रीवास्तव ने पिछले दशक में भारत के डिजिटल स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे के तीव्र विकास को रेखांकित किया—रिकॉर्ड के मूल डिजिटलीकरण से लेकर आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन (ABDM) के तहत निर्मित इंटरऑपरेबल इकोसिस्टम तक. उन्होंने बताया कि 2019 के नेशनल डिजिटल हेल्थ ब्लूप्रिंट ने ओपन स्टैंडर्ड्स और जनरेटिव एआई सहित उभरती प्रौद्योगिकियों को अपनाने की नींव रखी, साथ ही मजबूत गोपनीयता सुरक्षा उपाय भी सुनिश्चित किए.

सचिव के अनुसार, ABDM का दायरा तेज़ी से बढ़ रहा है, और अब 859 मिलियन नागरिकों के पास आयुष्मान भारत हेल्थ अकाउंट (ABHA) आईडी है, जो 878 मिलियन से अधिक स्वास्थ्य रिकॉर्ड से जुड़ी हुई है. उन्होंने कहा कि इस प्रणाली की मजबूती का परीक्षण प्रतिदिन भारत में बड़ी संख्या में मरीजों के कारण होता है.

भारत का टेलीमेडिसिन प्लेटफॉर्म ई-संजीवनी भी दुनिया की सबसे बड़ी प्राथमिक स्वास्थ्य पहल में से एक बनकर उभरा है, जिसने 2.2 लाख से अधिक पंजीकृत स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं के माध्यम से 449 मिलियन से अधिक परामर्श सक्षम किए हैं. यह प्लेटफॉर्म निदान और उपचार प्रक्रियाओं को बेहतर बनाने के लिए एआई-सहायता प्राप्त क्लिनिकल निर्णय समर्थन को एकीकृत करता है.

रोग प्रबंधन में एआई के उपयोग का विस्तार

श्रीवास्तव ने देशभर में पहले से संचालित कई एआई-आधारित स्वास्थ्य कार्यक्रमों का उल्लेख किया. नेशनल डायबिटिक रेटिनोपैथी स्क्रीनिंग प्रोग्राम के तहत मद्हुनेत्रएआई उपकरण गैर-विशेषज्ञ स्वास्थ्यकर्मियों को रेटिना की छवियाँ लेने में सक्षम बनाता है, जिससे 38 केंद्रों में 7,000 से अधिक मरीजों को लाभ मिला है.

क्षय रोग नियंत्रण में भी एआई उपकरणों का उपयोग हैंडहेल्ड एक्स-रे उपकरणों और “कफ अगेंस्ट टीबी” जैसी पहलों के माध्यम से किया जा रहा है, जो रोग की घटनाओं में कमी लाने में योगदान दे रहे हैं. इसके अतिरिक्त, मीडिया डिजीज सर्विलांस (MDS) प्रणाली सार्वजनिक सूचना स्रोतों की एआई-आधारित निगरानी के माध्यम से स्वास्थ्य जोखिमों और प्रकोपों की पहचान करने में नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल का समर्थन करती है.

आगे की ओर देखते हुए, सरकार ने स्वास्थ्य क्षेत्र में एआई अनुसंधान और कार्यान्वयन को तेज़ करने के लिए एम्स दिल्ली, पीजीआईएमईआर चंडीगढ़ और एम्स ऋषिकेश में उत्कृष्टता केंद्र स्थापित किए हैं. श्रीवास्तव ने कहा कि राज्यों और निजी क्षेत्र के साझेदारों से प्राप्त प्रतिक्रिया खरीद मॉडल और डेटा शासन ढांचे को आकार देने में महत्वपूर्ण होगी.

2047 तक विकसित भारत के व्यापक दृष्टिकोण को दोहराते हुए उन्होंने कहा कि डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना स्वास्थ्य सेवा में समावेशन और समानता को आगे बढ़ाने के लिए केंद्रीय भूमिका निभाती है. श्रीवास्तव ने कहा, “डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना समावेशन और समानता का एक उपकरण है,” और जोड़ा कि देश का एआई प्रयास उसी प्रतिबद्धता का विस्तार है.

सत्यम मिश्रा, BW रिपोर्टर्स
(लेखक BW बिजनेसवर्ल्ड के एक जूनियर संवाददाता हैं.)

 


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