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रूस के बाद वेनेजुएला बना भारत का नया तेल विकल्प, ऊर्जा रणनीति को मिलेगी मजबूती

वेनेजुएला का कच्चा तेल भारत के लिए सिर्फ एक और सप्लाई सोर्स नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, कीमत नियंत्रण और भू-राजनीतिक संतुलन का अहम साधन बन सकता है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 8 months ago

वैश्विक ऊर्जा बाजार में बदलते समीकरणों के बीच भारत के लिए वेनेजुएला का कच्चा तेल एक बार फिर रणनीतिक हथियार साबित हो सकता है. रूस से तेल आयात पर बढ़ते दबाव और संभावित अमेरिकी टैरिफ के बीच, वेनेजुएला भारत को एक वैकल्पिक, राजनीतिक रूप से स्वीकार्य और किफायती विकल्प दे सकता है. अगर अमेरिकी प्रतिबंधों में ढील मिलती है, तो भारत रोजाना 1 लाख से 1.5 लाख बैरल तक वेनेजुएला का कच्चा तेल आयात कर सकता है, जिससे खासतौर पर कॉम्प्लेक्स रिफाइनरियों को बड़ा फायदा होगा.

प्रतिबंध हटे तो बढ़ेगा तेल आयात

कमोडिटी डेटा और शिप-ट्रैकिंग कंपनी Kpler के मुताबिक, अमेरिका के रुख में नरमी आने की स्थिति में भारत वेनेजुएला से बड़े पैमाने पर कच्चे तेल की खरीद दोबारा शुरू कर सकता है. वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को लेकर हालिया कूटनीतिक संकेतों के बाद वहां के तेल सेक्टर में स्थिरता की उम्मीद जताई जा रही है.

Kpler में रिफाइनिंग और रिसर्च के प्रमुख विश्लेषक सुमित रितोलिया का कहना है कि इससे वेनेजुएला का भारी कच्चा तेल फिर से भारत के आयात बास्केट में शामिल हो सकता है, जो मिड-टू-लॉन्ग टर्म में भारत के लिए फायदेमंद रहेगा.

कॉम्प्लेक्स रिफाइनरियों को मिलेगा सीधा लाभ

वेनेजुएला का तेल भारी और बहुत भारी श्रेणी में आता है, जिसे प्रोसेस करने के लिए उच्च तकनीक वाली कॉम्प्लेक्स रिफाइनरियों की जरूरत होती है. भारत में रिलायंस इंडस्ट्रीज की जामनगर रिफाइनरी और नायरा एनर्जी की वाडिनार रिफाइनरी इस तरह के तेल को अधिक मूल्यवान ईंधन और पेट्रोकेमिकल्स में बदलने में सक्षम हैं.

Kpler के अनुसार, अगर वेनेजुएला में राजनीतिक स्थिरता आती है और नए निवेश होते हैं, तो वहां का तेल उत्पादन धीरे-धीरे बढ़ सकता है. इससे भारत के लिए तेल खरीद के विकल्प बढ़ेंगे और इन रिफाइनरियों का मार्जिन भी बेहतर हो सकता है.

कभी भारत का बड़ा सप्लायर था वेनेजुएला

एक समय वेनेजुएला भारत के शीर्ष कच्चा तेल सप्लायर्स में शामिल था. FY18 में भारत के कुल तेल आयात में इसका हिस्सा 6.7 प्रतिशत था. Rubix Data Sciences के आंकड़ों के मुताबिक, FY18 से FY20 तक वेनेजुएला लगातार भारत के टॉप छह तेल सप्लायर्स में रहा.

FY19 में वेनेजुएला से भारत का तेल आयात बढ़कर 7.2 अरब डॉलर तक पहुंच गया था, जो भारत की ऊर्जा रणनीति में इसकी अहम भूमिका को दर्शाता है.

रूसी तेल पर दबाव, वेनेजुएला बना विकल्प

यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है, जब भारत सस्ते रूसी कच्चे तेल की खरीद को लेकर अमेरिकी दबाव और संभावित 500 प्रतिशत टैरिफ की आशंकाओं का सामना कर रहा है. Kpler का मानना है कि अगर ऐसे टैरिफ लागू होते हैं, तो भारत के लिए तेल सोर्सिंग रणनीति में बड़ा बदलाव जरूरी होगा.

इस संदर्भ में वेनेजुएला का कच्चा तेल भारत को एक संतुलित और राजनीतिक रूप से कम जोखिम वाला विकल्प देता है, जिससे मिडिल ईस्ट सप्लायर्स के साथ भी भारत की सौदेबाजी की ताकत बढ़ सकती है.

सभी रिफाइनरियों को नहीं मिलेगा बराबर फायदा

हालांकि वेनेजुएला का भारी कच्चा तेल सभी भारतीय रिफाइनरियों के लिए उपयुक्त नहीं है. सरकारी रिफाइनरियों में अभी इतनी क्षमता नहीं है कि वे बड़े पैमाने पर अत्यधिक भारी और अम्लीय तेल को प्रोसेस कर सकें. IOC की पारादीप रिफाइनरी, MRPL और HPCL-मित्तल एनर्जी में सीमित मात्रा में इस तेल की प्रोसेसिंग जरूर हुई है, लेकिन मुख्य लाभ फिलहाल चुनिंदा निजी रिफाइनरियों तक ही सीमित रहेगा.

छूट पर मिल सकता है तेल

मिडिल ईस्ट और अमेरिका से तेल खरीदने की तुलना में वेनेजुएला से आने वाला तेल लंबी दूरी और जोखिम के चलते छूट पर उपलब्ध हो सकता है. विशेषज्ञों का मानना है कि यही छूट इस तेल को भारतीय रिफाइनरियों के लिए आकर्षक बनाएगी. इससे भारत को खरीद में लचीलापन मिलेगा और दूसरे सप्लायर्स के साथ मोलभाव की ताकत भी मजबूत होगी.

उत्पादन बढ़ा तो अपस्ट्रीम निवेश को भी फायदा

S&P ग्लोबल एनर्जी के अनुसार, प्रतिबंध हटने की स्थिति में वेनेजुएला का तेल उत्पादन बढ़ सकता है. अगले 12 से 24 महीनों में उत्पादन को 15 लाख बैरल प्रतिदिन तक ले जाने के लिए अरबों डॉलर के निवेश की जरूरत होगी.

भारत के लिए यह इसलिए भी अहम है क्योंकि ONGC विदेश लिमिटेड, IOC और ऑयल इंडिया की वेनेजुएला के कुछ तेल क्षेत्रों में हिस्सेदारी है. लंबे समय से प्रतिबंधों और भुगतान दिक्कतों के चलते ये प्रोजेक्ट पूरी क्षमता से नहीं चल पाए हैं.

भारतीय कंपनियों की हिस्सेदारी बनी रह सकती है

Kpler के मुताबिक, अगर अमेरिकी निगरानी में एक स्थिर और स्पष्ट ढांचा बनता है, तो इन तेल क्षेत्रों का दोबारा विकास संभव है. इससे बकाया भुगतान की वसूली और नकदी प्रवाह सुधर सकता है.

हालांकि कुछ प्रशासनिक और अनुबंध संबंधी जोखिम बने रहेंगे, लेकिन वेनेजुएला को पूंजी, तकनीक और लंबे समय के खरीदारों की जरूरत है. ऐसे में संकेत यही हैं कि भारतीय कंपनियों की भूमिका वहां खत्म होने के बजाय आगे भी बनी रह सकती है.


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