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ISTS छूट की समाप्ति से वित्तीय दबाव में 26 GW नवीकरणीय परियोजनाएं : क्रिसिल

ISTS छूट खत्म होने से निर्माणाधीन नवीकरणीय परियोजनाएं वित्तीय दबाव में आ सकती हैं, लेकिन चरणबद्ध कटौती और अनुभवी डेवलपर्स की मौजूदगी से बड़े असर की आशंका कम है. हालांकि, नियामकीय स्पष्टता और समय पर फैसले जरूरी होंगे.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

30 जून 2025 को 100% इंटर-स्टेट ट्रांसमिशन सिस्टम (ISTS) शुल्क छूट की समय सीमा समाप्त होने के बाद, लगभग 26 गीगावॉट की निर्माणाधीन उपयोगिता स्तर की नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाएं अब आर्थिक दबाव में आ सकती हैं. इन सभी परियोजनाओं के लिए पहले ही बिजली खरीद समझौते (PPA) साइन किए जा चुके हैं. इस बाक का खुलासा क्रिसिल रेटिंग एजेंसी (Crisil) द्वारा जारी एक रिपोर्ट में हुआ है. 

समय सीमा से पहले कमीशनिंग नहीं होने पर लाभ घटेगा

रिपोर्ट के अनुसार इन परियोजनाओं को नियामकीय, प्रक्रिया संबंधी और आधारभूत ढांचे की चुनौतियों के कारण कमीशनिंग में देरी का सामना करना पड़ा है. अब ये परियोजनाएं चरणबद्ध रूप से ISTS शुल्क छूट में कटौती का सामना करेंगी. ऊर्जा मंत्रालय द्वारा 2016 में शुरू की गई और बाद में बढ़ाई गई इस योजना ने नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं को प्रोत्साहित करने में अहम भूमिका निभाई थी. इसके तहत राजस्थान और गुजरात जैसे सौर एवं पवन ऊर्जा समृद्ध राज्यों को देशभर में सस्ती दरों पर बिजली भेजने में मदद मिली.

हालांकि, यह छूट योजना पहले से तय ‘सनसेट क्लॉज’ के तहत सीमित समय के लिए ही थी. योजना के अनुसार, केवल वे परियोजनाएं जो 30 जून 2025 तक कमीशन हो जाएंगी, उन्हें 25 वर्षों तक पूर्ण छूट मिलती रहेगी. इसके बाद की परियोजनाओं के लिए छूट क्रमशः घटती जाएगी

- 30 जून 2026 तक पूर्ण होने पर 75% छूट
- 30 जून 2027 तक पूर्ण होने पर 50% छूट
- 30 जून 2028 तक पूर्ण होने पर 25% छूट
- इसके बाद कोई छूट नहीं दी जाएगी.

अगर देरी पूरी तरह से डेवलपर की गलती मानी गई, तो उन्हें यह ट्रांसमिशन शुल्क स्वयं वहन करना पड़ सकता है, भले ही सामान्यतः यह लागत ऑफटेकर्स उठाते हैं.

लागत बढ़ने से परियोजनाओं की रिटर्न क्षमता पर असर

ट्रांसमिशन लागत परियोजना के प्रकार, स्थान और उपयोग के आधार पर अलग-अलग होती है, जो आम तौर पर ₹0.5 से ₹1.5 प्रति यूनिट (kWh) के बीच होती है. ISTS छूट में कमी के कारण लंबे समय में नकदी प्रवाह पर असर पड़ेगा, जिससे डेब्ट सर्विस कवरेज रेशियो (DSCR) और परियोजना रिटर्न घट सकते हैं. उदाहरण के तौर पर, अगर कोई डेवलपर ₹0.65/kWh की लागत पर 25% ट्रांसमिशन शुल्क वहन करता है, तो DSCR 1.4 से घटकर 1.3 तक आ सकता है.

अधिकतर परियोजनाएं अब भी 75% छूट के दायरे

क्रिसिल रेटिंग्स के डायरेक्टर अंकित हाखू के अनुसार, लगभग तीन-चौथाई प्रभावित परियोजनाएं 30 जून 2026 तक कमीशन हो जाएंगी, जिससे उन्हें अब भी 75% छूट का लाभ मिलेगा. ऐसे में इस चरणबद्ध कटौती से सेक्टर पर व्यापक असर की संभावना कम है. इसके अलावा, ये परियोजनाएं अनुभवी और स्थापित डेवलपर्स के हाथ में हैं, जिनकी वित्तीय क्षमता बेहतर है. फिर भी, यदि कोई परियोजना समय पर पूरी नहीं होती, तो उसके रिटर्न पर 80 से 370 बेसिस पॉइंट्स तक की गिरावट आ सकती है, जो परियोजना के प्रकार, प्रतिस्पर्धी बोलियों और कमीशनिंग की तारीख पर निर्भर करेगा.

देरी पर छूट विस्तार संभव, लेकिन शर्तों के साथ

क्रिसिल रेटिंग्स की टीम लीडर मोहिनी चटर्जी बताती हैं, ISTS छूट सर्कुलर में प्रावधान है कि यदि देरी डेवलपर के नियंत्रण से बाहर की परिस्थिति (जैसे ट्रांसमिशन इन्फ्रास्ट्रक्चर की अनुपलब्धता) के कारण हुई हो, तो छूट की अवधि बढ़ाई जा सकती है. लेकिन यह नियामक की स्वीकृति पर निर्भर करेगा और केस-टू-केस आधार पर मूल्यांकन किया जाएगा. इसलिए, इन परियोजनाओं की क्रेडिट प्रोफाइल बनाए रखने के लिए विवादों का समय पर और संतोषजनक समाधान आवश्यक होगा.

सरकार का समर्थन बरकरार, कुछ प्रोजेक्ट्स को मिली राहत

हालांकि ISTS छूट में कटौती की गई है, सरकार ने बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) और पंप्ड हाइड्रो प्रोजेक्ट्स के लिए यह छूट जून 2028 तक बढ़ा दी है. इससे संकेत मिलता है कि सरकार अब भी ग्रिड स्थिरता को मजबूत करने और नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र को बढ़ावा देने के प्रति प्रतिबद्ध है.


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