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EV कारों के बाजार में इंडिया शाइनिंग में लगेगा वक्त, ग्लोबल लेवल पर महज इतनी है हिस्सेदारी
भारत में भले ही EV कारों के इस्तेमाल में तेजी आई है, लेकिन वैश्विक बाजार में हमारी हिस्सेदारी काफी कम है.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 2 years ago
पिछले कुछ सालों में भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) के इस्तेमाल में इजाफा हुआ है. टू-व्हीलर्स के साथ-साथ EV कारें भी लोगों को पसंद आने लगी हैं. फिलहाल भारत के EV कार बाजार पर टाटा मोटर्स का कब्जा है. कंपनी की Nexon EV को काफी अच्छा रिस्पांस मिला है. हालांकि, इस इजाफे के बावजूद वैश्विक इलेक्ट्रिक कार बाजार में हमारी हिस्सेदारी बेहद कम है. इस मामले में हमारा पड़ोसी चीन काफी आगे है.
लग जाएंगे कई साल
गोल्डमैन सैक्स (Goldman Sachs) की एक रिपोर्ट बताती है कि ग्लोबल इलेक्ट्रिक कार मार्केट में भारत की हिस्सेदारी 2024 में महज एक प्रतिशत ही रह सकती है. इस एक प्रतिशत से 7 प्रतिशत तक आने में भारत को कई साल लग जाएंगे. 2040 तक भारत की हिस्सेदारी 7.1 प्रतिशत तक हो सकती है. इन्वेस्टमेंट बैंकिंग कंपनी Goldman Sachs का मानना है कि साल 2024 में इलेक्ट्रिक यात्री कारों की बिक्री कमोबेश साल 2023 वाले स्तर (लगभग एक लाख यूनिट) जितनी ही रहेगी, लेकिन 2030 में यह आंकड़ा 13 लाख तक पहुंच सकता है.
इस्तेमाल में आएगी तेजी
साल 2040 तक वैश्विक बाजार में भारत की हिस्सेदारी 7.1 प्रतिशत रह सकती है, लेकिन यह आंकड़ा वैश्विक औसत से काफी कम है. हालांकि, आने वाले सालों में भारत में EV के इस्तेमाल में तेजी आएगी. 2026 से लेकर 2030 के बीच अच्छी ग्रोथ होगी और इसी तरह 2030 से 2040 तक भी बाजार अच्छी-खासी बढ़त देखेगा. यूरोप में ईवी की बिक्री धीमी पड़ने के संबंध में गोल्डमैन सैक्स की रिपोर्ट में तीन प्रमुख कारण बताए गए हैं. पहला- सरकारी नीति में खराब दृष्टिकोण, दूसरा - क्विक चार्जिंग स्टेशनों की कमी और तीसरा - पुरानी EV के लिए मिलने वाली कम कीमत.
EV को प्रमोट करने की नीति
केंद्र सरकार EV को प्रमोट करने की नीति पर काम कर रही है. हाल ही में नई इलेक्ट्रिक व्हीकल पॉलिसी (EV Policy) को मंजूरी दी गई है. सरकार देश को एक मैन्युफैक्चरिंग डेस्टिनेशन के रूप में स्थापित करना चाहती है और इसी को ध्यान में रखते हुए इलेक्ट्रिक वाहन नीति को तैयार किया गया है. इस नीति के तहत, भारत में एंट्री की चाहत रखने वालीं विदेशी कंपनियों को भारत में मैन्युफैक्चरिंग प्लांट स्थापित करना होगा और कम से कम 4150 करोड़ रुपए का निवेश करना होगा. नई इलेक्ट्रिक व्हीकल पॉलिसी में आयात शुल्क में कटौती का भी जिक्र है. इस नीति के तहत भारत में न्यूनतम 4150 करोड़ रुपए का निवेश और इसके तीन साल के भीतर मैन्युफैक्चरिंग प्लांट लगाने वाली कंपनी को इम्पोर्ट टैक्स में छूट दी जाएगी.
कितनी ईको-फ्रेंडली हैं इलेक्ट्रिक कारें?
अब जब EV की बात निकली है, तो इलेक्ट्रिक कार और पर्यावरण के रिश्ते पर भी बात कर लेते हैं. 2022 में एक मीडिया रिपोर्ट में सोसायटी ऑफ रेयर अर्थ के हवाले से बताया गया था कि एक इलेक्ट्रिक कार बनाने में इस्तेमाल होने वाला 57 किलो कच्चा माल जमीन से निकालने में 4,275 किलो एसिड कचरा और 57 किलो रेडियो एक्टिव अवशेष पैदा होता है. इतना ही नहीं, EV बनाने में 9 टन कार्बन निकलता है, जो पेट्रोल वाली गाड़ी की तुलना में 3.4 टन ज्यादा है. EV तैयार करने की प्रक्रिया में करीब 13,500 लीटर पानी लगता है, जबकि पेट्रोल कार में यह करीब 4 हजार लीटर है. रिपोर्ट में बताया था कि अगर EV को कोयले से बनी बिजली से चार्ज करें, तो डेढ़ लाख किमी चलने पर पेट्रोल कार के मुकाबले 20% ही कम कार्बन निकलेगा. बता दें कि भारत में 70% बिजली कोयले से ही बन रही है.
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