मुर्मू की जीत की घोषणा के बाद एक के बाद एक ट्वीट में प्रधानमंत्री मोदी (PM Modi) ने कहा कि विधायक, मंत्री और झारखंड के राज्यपाल के रूप में उनका कार्यकाल बहुत उत्कृष्ट रहा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) ने राष्ट्रपति चुनाव में जीत हासिल करने पर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू (Draupadi Murmu) को बृहस्पतिवार को बधाई दी. उन्होंने कहा कि आजादी के अमृत महोत्सव में पूर्वी भारत के सुदूर हिस्से से ताल्लुक रखने वाली एक आदिवासी समुदाय में जन्मी नेता को राष्ट्रपति निर्वाचित कर भारत ने इतिहास रच दिया है.
पीएम मोदी ने किए कई ट्वीट
मुर्मू की जीत की घोषणा के बाद एक के बाद एक ट्वीट में प्रधानमंत्री मोदी (PM Modi) ने कहा कि विधायक, मंत्री और झारखंड के राज्यपाल के रूप में उनका कार्यकाल बहुत उत्कृष्ट रहा. उन्होंने कहा, "मुझे पूरा भरोसा है कि वह एक उत्कृष्ट राष्ट्रपति होंगी जो आगे बढ़कर नेतृत्व करेंगी और भारत की विकास यात्रा को मजबूत करेंगी."
India scripts history. At a time when 1.3 billion Indians are marking Azadi Ka Amrit Mahotsav, a daughter of India hailing from a tribal community born in a remote part of eastern India has been elected our President!
— Narendra Modi (@narendramodi) July 21, 2022
Congratulations to Smt. Droupadi Murmu Ji on this feat.
पीएम मोदी ने मुर्मू को बताया उम्मीद की किरण
प्रधानमंत्री ने कहा कि द्रौपदी मुर्मू का जीवन, उनके शुरुआती संघर्ष, उनकी सेवा और उनकी उत्कृष्ट सफलता हर भारतीय को प्रेरित करती है. उन्होंने कहा, "वह एक उम्मीद की किरण के रूप में उभरी हैं, खासकर गरीबों, वंचितों और पिछड़ों के लिए." उन्होंने दलगत राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रपति चुनाव में मुर्मू के पक्ष में मतदान करने वाले सभी सांसदों और विधायकों का धन्यवाद किया. PM मोदी ने कहा कि उनकी रिकॉर्ड जीत लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत है.
Met Smt. Droupadi Murmu Ji and congratulated her. pic.twitter.com/ALdJ3kWSLj
— Narendra Modi (@narendramodi) July 21, 2022
मुर्मू को मिले 64 प्रतिशत वोट
बता दें कि राष्ट्रपति चुनाव में 4,754 वैध निर्वाचकों में द्रौपदी मुर्मू को 2,824 वोट प्राप्त हुए, जिनमें 540 सांसदों के वोट भी शामिल हैं. वहीं, यशवंत सिन्हा को 1,187 मत मिले, जिनमें 208 सांसदों के वोट भी शामिल हैं. राष्ट्रपति चुनाव में मुर्मू को 64 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए, जबकि यशवंत सिन्हा को 36 प्रतिशत वोट मिले.
सर्बानंद सोनोवाल ने नवनिर्वाचित राष्ट्रपति को दी बधाई

केंद्रीय बंदरगाह, नौवहन और जलमार्ग एवं आयुष मंत्री, सर्बानंद सोनोवाल ने नवनिर्वाचित राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को पूर्वोत्तर भारत के सभी लोगों की ओर से बधाई दी. सोनोवाल ने नवनिर्वाचित राष्ट्रपति को असमिया गामोसा भी भेंट किया. उन्होंने कहा, "मैं द्रौपदी मुर्मू जी को भारत की 15वीं राष्ट्रपति के रूप में चुने जाने पर बधाई देता हूं. देश के सर्वोच्च पद पर निर्वाचित होने वाली पहली आदिवासी महिला बनकर, हम इस ऐतिहासिक अवसर का हिस्सा बनने के लिए भाग्यशाली हैं. मुर्मू जी का भारत के राष्ट्रपति के रूप में चुना जाना अंत्योदय की सर्वोच्च आकांक्षा को पूरा करता है. यह हमारे लोकतंत्र, एक राष्ट्र की शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है, जहां प्रत्येक नागरिक सामाजिक-आर्थिक बंधनों को पार कर सकता है. मुर्मू जी वास्तव में नए भारत की भावना का प्रतीक हैं."
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राघव चड्ढा सहित आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संदीप पाठक और अशोक मित्तल ने भी भाजपा में शामिल होने की बात कही है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
आम आदमी पार्टी (AAP) के भीतर एक बड़ी राजनीतिक उथल-पुथल देखने को मिली है, जहां राज्यसभा में पार्टी के वरिष्ठ नेता राघव चड्ढा समेत तीन सांसदों के भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल होने का दावा किया गया है. इस घटनाक्रम को AAP के लिए अब तक के सबसे बड़े राजनीतिक झटकों में से एक माना जा रहा है.
दिल्ली में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान राघव चड्ढा ने यह दावा किया कि राज्यसभा में AAP के दो-तिहाई सांसदों ने मिलकर भाजपा में विलय का निर्णय लिया है. उनके साथ राज्यसभा सांसद संदीप पाठक और अशोक मित्तल भी मौजूद रहे, जिन्होंने भी भाजपा में शामिल होने की बात कही. चड्ढा ने कहा कि यह निर्णय संविधान में दिए गए दल-विलय के प्रावधानों के तहत लिया गया है.
‘गलत पार्टी में सही इंसान’ का बयान
पार्टी छोड़ने की वजह बताते हुए राघव चड्ढा भावुक नजर आए. उन्होंने कहा कि जिस पार्टी को उन्होंने वर्षों तक मजबूत करने में योगदान दिया, वह अब अपने मूल सिद्धांतों से भटक गई है. उन्होंने आरोप लगाया कि Aam Aadmi Party अब जनहित के बजाय व्यक्तिगत हितों की ओर बढ़ रही है. चड्ढा ने कहा कि उन्हें लंबे समय से यह महसूस हो रहा था कि वे “गलत पार्टी में सही इंसान” हैं.
AAP के अन्य सांसदों को लेकर भी बड़ा दावा
रिपोर्टर्स से बातचीत में राघव चड्ढा ने यह भी दावा किया कि कई अन्य AAP सांसदों ने भी भाजपा में शामिल होने का फैसला किया है. इनमें पार्टी की असंतुष्ट नेता स्वाति मालीवाल, पूर्व क्रिकेटर हरभजन सिंह, राजेंद्र गुप्ता और विक्रम सहनी के नाम शामिल बताए गए हैं. इस दावे के साथ राज्यसभा में AAP की स्थिति काफी कमजोर होने की बात सामने आई है.
राज्यसभा में समीकरण पूरी तरह बदलने का दावा
दावों के मुताबिक, कुल सात AAP राज्यसभा सांसदों के भाजपा में शामिल होने के बाद अब उच्च सदन में पार्टी के पास केवल तीन प्रतिनिधि ही बचे हैं. इनमें संजय सिंह, एन.डी. गुप्ता और बलबीर सिंह सीचेवाल के नाम बताए जा रहे हैं.
AAP के भीतर बढ़ता संकट
राज्यसभा में नेतृत्व और आंतरिक मतभेदों को लेकर पिछले कुछ समय से तनाव की स्थिति बनी हुई थी. हालिया घटनाक्रम को उसी राजनीतिक असंतोष का नतीजा माना जा रहा है. पार्टी के भीतर यह बदलाव AAP की संगठनात्मक स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है.
भाजपा में नई राजनीतिक हलचल
इस घटनाक्रम के बाद राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है. हालांकि भाजपा की ओर से अभी तक इस कथित शामिलीकरण पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह बदलाव आधिकारिक रूप से होता है, तो यह राज्यसभा में AAP की ताकत को काफी प्रभावित कर सकता है.
फिलहाल इस पूरे घटनाक्रम को लेकर आधिकारिक पुष्टि और विस्तृत बयान का इंतजार किया जा रहा है. राजनीतिक विश्लेषकों की नजर अब इस बात पर है कि AAP नेतृत्व इस स्थिति पर क्या प्रतिक्रिया देता है और राज्यसभा में समीकरण कैसे बदलते हैं.
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील एम.आर. शमशाद ने अदालत में दलील देते हुए इसे पूरी तरह मनमाना और अनुचित बताया है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पश्चिम बंगाल में चुनावी प्रक्रिया के बीच एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां लोकतंत्र को सुचारु रूप से संचालित कराने वाले अधिकारी खुद ही मतदान के अधिकार से वंचित हो गए. मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के खिलाफ 65 चुनाव अधिकारियों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है. इस घटना ने चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता और प्रशासनिक व्यवस्थाओं पर सवाल खड़े कर दिए हैं.
क्या है पूरा मामला?
चुनाव ड्यूटी पर तैनात इन 65 अधिकारियों का कहना है कि उनके नाम अचानक मतदाता सूची (वोटर लिस्ट) से हटा दिए गए हैं. हैरानी की बात यह है कि उनके आधिकारिक ड्यूटी ऑर्डर पर उनके वोटर आईडी (EPIC) नंबर दर्ज हैं, लेकिन वही नंबर अब सूची में मौजूद नहीं हैं.
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील एम.आर. शमशाद ने अदालत में दलील देते हुए इसे पूरी तरह मनमाना और अनुचित बताया. उनका कहना है कि बिना किसी ठोस कारण के नाम हटाना न केवल नियमों के खिलाफ है, बल्कि इससे अधिकारियों के संवैधानिक अधिकारों का हनन भी होता है.
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी और रुख
मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल सीधे हस्तक्षेप करने से इनकार किया. मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि इस मुद्दे पर पहले अपीलेट ट्रिब्यूनल में सुनवाई होनी चाहिए. सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि संभव है कि ये अधिकारी इस बार मतदान न कर पाएं, लेकिन मतदाता सूची में उनका नाम बने रहना एक महत्वपूर्ण अधिकार है, जिसे सुरक्षित रखा जाना चाहिए.
अब आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद अब यह मामला अपीलेट ट्रिब्यूनल के पास जाएगा. ट्रिब्यूनल यह तय करेगा कि इन अधिकारियों के नाम वोटर लिस्ट में दोबारा जोड़े जाएं या नहीं. फिलहाल, इस चुनाव में उनके मतदान को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है.
मतदाता सूची संशोधन पर भी उठे सवाल
पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग द्वारा की गई *स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR)* प्रक्रिया के तहत बड़े पैमाने पर मतदाता सूची में बदलाव किए गए थे. आंकड़ों के मुताबिक, करीब 90.8 लाख से 91 लाख नाम सूची से हटाए गए.
इनमें से लगभग 58 लाख से 63 लाख नाम ‘ASDD’ (Absent, Shifted, Dead, Deleted) श्रेणी के तहत ड्राफ्ट रोल जारी होने के समय ही हटा दिए गए थे.
लोकतंत्र पर असर का सवाल
यह मामला केवल 65 अधिकारियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़ा करता है. जब चुनाव कराने वाले ही अपने मताधिकार से वंचित हो जाएं, तो यह प्रशासनिक खामियों की ओर इशारा करता है. अब सभी की नजरें ट्रिब्यूनल के फैसले पर टिकी हैं, जो इस मामले की दिशा तय करेगा.
दोनों नेता नीतीश कुमार के करीबी सहयोगियों में गिने जाते हैं और वर्षों से उनके नेतृत्व में बिहार सरकार में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालते रहे हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
बिहार की राजनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिला जब विजय कुमार चौधरी और बिजेंद्र प्रसाद यादव ने बुधवार को उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली. यह शपथ ग्रहण समारोह पटना में आयोजित हुआ, जो नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के एक दिन बाद हुआ. इस बदलाव के साथ ही भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने पहली बार राज्य में सीधे नेतृत्व संभाला है. वरिष्ठ भाजपा नेता सम्राट चौधरी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, जिससे बिहार की सत्ता संरचना में बड़ा परिवर्तन आया है.
भाजपा का उभार
इस राजनीतिक घटनाक्रम ने बिहार की राजनीति में शक्ति संतुलन को बदल दिया है. अब तक गठबंधन में सहयोगी की भूमिका निभा रही भाजपा ने नेतृत्व की कमान अपने हाथ में ले ली है. यह बदलाव न केवल सरकार के ढांचे में परिवर्तन दर्शाता है, बल्कि आगामी चुनावों और गठबंधन की राजनीति पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ने की संभावना है.
विजय कुमार चौधरी: नीतीश के करीबी और अनुभवी नेता
विजय कुमार चौधरी जनता दल (यूनाइटेड) के वरिष्ठ नेता हैं और लंबे समय से नीतीश कुमार के करीबी सहयोगी रहे हैं. वे 1982 से बिहार विधानसभा के सदस्य हैं और वर्तमान में सरायरंजन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं. राजनीति में आने से पहले वे भारतीय स्टेट बैंक में प्रोबेशनरी ऑफिसर के रूप में कार्यरत थे. अपने पिता और पूर्व विधायक जगदीश प्रसाद चौधरी के निधन के बाद उन्होंने सक्रिय राजनीति में कदम रखा. उन्होंने बिहार विधानसभा के अध्यक्ष, जेडीयू विधायक दल के नेता और जल संसाधन व संसदीय कार्य मंत्री जैसे कई महत्वपूर्ण पद संभाले हैं. उनका अनुभव नई सरकार में स्थिरता लाने में अहम भूमिका निभा सकता है. इसके अलावा, उन्होंने शिक्षा और वित्त जैसे अहम विभागों का कार्यभार संभालते हुए प्रशासनिक दक्षता का परिचय दिया. उनकी कार्यशैली को संतुलित और नीतिगत फैसलों पर केंद्रित माना जाता है.
बिजेंद्र प्रसाद यादव: प्रशासनिक अनुभव के धनी
बिजेंद्र प्रसाद यादव भी जेडीयू के वरिष्ठ और अनुभवी नेताओं में गिने जाते हैं. वे 1990 से सुपौल विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं और राज्य सरकार में ऊर्जा, जल संसाधन और अन्य महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी संभाली है. वर्तमान में उनके पास वित्त, योजना और विकास जैसे महत्वपूर्ण विभाग हैं. उनकी प्रशासनिक दक्षता और लंबे राजनीतिक अनुभव के कारण उन्हें नई सरकार में एक प्रमुख स्तंभ माना जा रहा है. उनकी पहचान एक जमीनी नेता की रही है, जिन्होंने ग्रामीण विकास और बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए लगातार काम किया. लंबे राजनीतिक अनुभव और प्रशासनिक समझ के कारण उन्हें सरकार में एक भरोसेमंद चेहरा माना जाता है.
नीतीश कुमार का इस्तीफा और उसका असर
करीब दो दशकों तक बिहार की राजनीति के केंद्र में रहे नीतीश कुमार के इस्तीफे ने राज्य की राजनीति में एक नया अध्याय शुरू किया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नए उपमुख्यमंत्रियों को बधाई देते हुए विश्वास जताया कि उनका अनुभव बिहार के विकास में सहायक होगा.
हालांकि नेतृत्व में बदलाव हुआ है, लेकिन जेडीयू नेताओं ने शासन में निरंतरता बनाए रखने की बात कही है. विजय कुमार चौधरी ने स्पष्ट किया कि नई सरकार नीतीश कुमार की कार्यशैली को आगे बढ़ाएगी. राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के इस नए समीकरण में भाजपा नेतृत्व कर रही है, जबकि जेडीयू को वरिष्ठ पदों के जरिए महत्वपूर्ण भूमिका दी गई है.
सम्राट चौधरी के नेतृत्व में नई सरकार के सामने राजनीतिक स्थिरता बनाए रखने और विकास कार्यों को गति देने की बड़ी चुनौती है. यह सत्ता परिवर्तन आने वाले चुनावों में बिहार की राजनीति की दिशा तय करने के साथ-साथ गठबंधन समीकरणों को भी प्रभावित कर सकता है.
अगर सम्राट चौधरी शपथ लेते हैं, तो यह बिहार की राजनीति में एक नया अध्याय होगा और राज्य में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में पहली बार सरकार बनने का ऐतिहासिक अवसर होगा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
सम्राट चौधरी को मंगलवार को भाजपा विधायक दल का नया नेता चुन लिया गया है. इसके साथ ही उनके नीतीश कुमार के इस्तीफे के बाद बिहार में सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया तेज हो गई है. सूत्रों के अनुसार, सम्राट चौधरी बुधवार (15 अप्रैल) को बिहार के नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ले सकते हैं. अगर ऐसा होता है तो वे राज्य में भारतीय जनता पार्टी के पहले ऐसे नेता होंगे, जो मुख्यमंत्री पद संभालेंगे.
भाजपा विधायक दल की बैठक में फैसला
मंगलवार को हुई भाजपा विधायक दल की बैठक में सर्वसम्मति से सम्राट चौधरी को नेता चुना गया. इसके बाद राज्य में नई सरकार के गठन की औपचारिक प्रक्रिया शुरू हो गई है. यह घटनाक्रम उस समय सामने आया है जब बिहार की राजनीति में बड़ा बदलाव देखा जा रहा है. नीतीश कुमार के इस्तीफे के बाद नए नेतृत्व को लेकर चर्चाएं तेज थीं, जिसके बाद भाजपा ने अपने नेता के नाम पर मुहर लगाई.
शपथ ग्रहण की संभावना
माना जा रहा है कि बुधवार को होने वाले शपथ ग्रहण समारोह में नई सरकार का औपचारिक गठन हो जाएगा. इस बदलाव को राज्य की राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखा जा रहा है.
राजनीतिक पृष्ठभूमि
सम्राट चौधरी बिहार की राजनीति में एक प्रमुख ओबीसी चेहरा माने जाते हैं. उन्होंने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत जनता दल से की थी और बाद में राष्ट्रीय जनता दल से भी जुड़े रहे. समय के साथ वे भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए और संगठन में तेजी से अपनी स्थिति मजबूत की. वे लंबे समय से राज्य में पार्टी के संगठनात्मक ढांचे और पिछड़े वर्गों की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाते रहे हैं. उनकी पहचान एक आक्रामक और संगठन-केन्द्रित नेता के रूप में भी रही है.
एक बार फिर राज्यसभा में हरिवंश नारायण की वापसी को केवल एक राजनीतिक नियुक्ति नहीं, बल्कि उस विचारधारा की निरंतरता के रूप में देखा जा रहा है जिसमें संवाद, संतुलन और जिम्मेदारी को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
वरिष्ठ पत्रकार और अनुभवी संसदीय नेता हरिवंश नारायण सिंह एक बार फिर राज्यसभा के लिए मनोनीत किए गए हैं. राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू ने उन्हें उच्च सदन का सदस्य नामित किया है. यह निर्णय उनके लंबे संसदीय अनुभव और पत्रकारिता से आए संतुलित दृष्टिकोण की मान्यता के रूप में देखा जा रहा है.
पत्रकारिता से राजनीति तक का प्रेरक सफर
हरिवंश नारायण सिंह का सफर भारतीय मीडिया जगत से शुरू होकर राजनीति के शीर्ष सदनों तक पहुंचा है. उन्होंने लंबे समय तक ‘प्रभात खबर’ में कार्य किया और इसे एक मजबूत क्षेत्रीय अखबार के रूप में स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई. पत्रकार के रूप में उन्होंने ग्रामीण भारत, सामाजिक मुद्दों और जमीनी समस्याओं को प्रमुखता दी, जिससे उनकी पहचान एक संवेदनशील और संतुलित संपादकीय दृष्टि वाले पत्रकार के रूप में बनी.
तीसरा कार्यकाल और बढ़ता संसदीय अनुभव
यह उनका तीसरा कार्यकाल होगा. इससे पहले वे 2014 में बिहार से राज्यसभा पहुंचे थे. हाल ही में उनका पिछला कार्यकाल 9 अप्रैल 2026 को समाप्त हुआ था, जिसके बाद उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर चर्चाएं तेज हो गई थीं.
अब राष्ट्रपति द्वारा उनके पुनर्नामांकन ने इन सभी अटकलों को समाप्त कर दिया है और इसे अनुभव तथा स्थिरता को प्राथमिकता देने के संकेत के रूप में देखा जा रहा है.
राज्यसभा उपसभापति के रूप में भूमिका
हरिवंश नारायण सिंह को 2018 में पहली बार राज्यसभा का उपसभापति चुना गया था और 2020 में उन्हें दोबारा इस पद की जिम्मेदारी मिली. सदन के संचालन में उनकी शांत, संतुलित और निष्पक्ष कार्यशैली की व्यापक सराहना होती रही है. उन्होंने कई बार सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच संवाद स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, खासकर तब जब सदन में गतिरोध की स्थिति बनी.
नियुक्ति का संवैधानिक आधार
सूत्रों के अनुसार, यह नामांकन संविधान के अनुच्छेद 80 के तहत राष्ट्रपति के अधिकार का प्रयोग करते हुए किया गया है. बताया जा रहा है कि जिस सीट पर उन्हें मनोनीत किया गया है, वह पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के कार्यकाल समाप्त होने के बाद खाली हुई थी.
सादगी और संतुलित छवि
राजनीतिक ऊंचाइयों के बावजूद हरिवंश नारायण सिंह की पहचान एक सरल और जमीन से जुड़े व्यक्तित्व के रूप में बनी हुई है. उनकी कार्यशैली में पत्रकारिता के मूल्यों—तथ्य, संतुलन और निष्पक्षता की स्पष्ट झलक दिखाई देती है. इसी कारण उन्हें विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है.
किदवई भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की वरिष्ठ नेता थीं और उनका राजनीतिक करियर छह दशकों से अधिक का रहा. उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के नेतृत्व में केंद्रीय मंत्री के रूप में कई महत्वपूर्ण विभाग संभाले.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री मोहसिना किदवई का बुधवार को 94 वर्ष की आयु में निधन हो गया, यह जानकारी उनके परिवार ने दी. उन्होंने नोएडा के एक अस्पताल में प्रातःकाल अंतिम सांस ली, जहां वे उम्र संबंधी बीमारियों से जूझ रही थीं. परिवार के अनुसार, उनका अंतिम संस्कार निज़ामुद्दीन के कब्रिस्तान में आज ही होगा.
राजनीतिक जीवन
किदवई भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की वरिष्ठ नेता थीं और उनका राजनीतिक करियर छह दशकों से अधिक का रहा. वे पार्टी की शीर्ष नेतृत्व टीम से लंबे समय तक जुड़ी रहीं. उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के नेतृत्व में केंद्रीय मंत्री के रूप में कई महत्वपूर्ण विभाग संभाले.
वे उत्तर प्रदेश से कई बार लोकसभा का प्रतिनिधित्व कर चुकी थीं, विशेषकर मेरठ निर्वाचन क्षेत्र से. इसके अलावा, 2004 से 2016 तक छत्तीसगढ़ से राज्यसभा सदस्य के रूप में भी सेवा दी. वर्षों में उन्होंने कांग्रेस संगठन में विभिन्न जिम्मेदारियां निभाई, जिसमें कांग्रेस कार्य समिति और केंद्रीय चुनाव समिति की सदस्यता शामिल थी.
पार्टी में योगदान
किदवई को पार्टी में भरोसेमंद नेता माना जाता था और वे वरिष्ठ कांग्रेस नेतृत्व, विशेषकर सोनिया गांधी के निकट थीं. उन्होंने अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की महासचिव के रूप में भी कार्य किया और विभिन्न चुनावी घोषणापत्र और नीतिगत पहलों में योगदान दिया.
कांग्रेस नेताओं की प्रतिक्रिया
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने उनके निधन पर शोक व्यक्त करते हुए उन्हें “कांग्रेस पार्टी की सशक्त स्तंभ” बताया और कहा कि उन्होंने अपना जीवन सार्वजनिक सेवा के लिए समर्पित किया. उन्होंने उनके दोनों सदनों में लंबे संसदीय करियर और पार्टी के कठिन समय में मार्गदर्शक भूमिका को याद किया. खड़गे ने कहा कि उनका निधन न केवल कांग्रेस पार्टी बल्कि पूरे देश के लिए एक महत्वपूर्ण क्षति है और उन्होंने उनके परिवार, मित्रों और समर्थकों के प्रति संवेदनाएं प्रकट कीं.
वॉशिंगटन ने तेहरान को मंगलवार रात 8 बजे (भारतीय समयानुसार बुधवार सुबह 5:30 बजे) तक की समय-सीमा दी है. इस डेडलाइन के तहत ईरान से हॉर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने और चल रहे अमेरिका-इज़राइल-ईरान संघर्ष में समाधान की दिशा में कदम बढ़ाने की मांग की गई है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को दी गई समय-सीमा से ठीक पहले तीखी चेतावनी जारी करते हुए कहा है कि दुनिया जल्द ही इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण क्षणों में से एक देख सकती है. इस बयान ने पहले से जारी अमेरिका-ईरान तनाव को और बढ़ा दिया है और वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता पैदा कर दी है.
ट्रंप का बड़ा बयान: “आज रात खत्म हो सकती है एक सभ्यता”
ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए कहा, “आज रात एक पूरी सभ्यता खत्म हो सकती है, लेकिन अगर पूर्ण शासन परिवर्तन होता है, तो कुछ क्रांतिकारी और सकारात्मक भी हो सकता है.” उन्होंने इसे दुनिया के “लंबे और जटिल इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण पल” बताया.
डेडलाइन से पहले बढ़ा तनाव
वॉशिंगटन ने तेहरान को मंगलवार रात 8 बजे (भारतीय समयानुसार बुधवार सुबह 5:30 बजे) तक की समय-सीमा दी है. इस डेडलाइन के तहत ईरान से हॉर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने और चल रहे अमेरिका-इजराइल-ईरान संघर्ष में समाधान की दिशा में कदम बढ़ाने की मांग की गई है. हालांकि ईरान ने इन प्रस्तावों को “एकतरफा” बताते हुए खारिज कर दिया है और अभी तक जलमार्ग खोलने पर सहमति नहीं दी है.
सैन्य कार्रवाई के संकेत
ट्रंप के बयान को अमेरिकी रणनीति में संभावित बड़े बदलाव के रूप में देखा जा रहा है. उन्होंने “शासन परिवर्तन” और निर्णायक कार्रवाई के संकेत दिए हैं. रिपोर्ट्स के मुताबिक, डेडलाइन पूरी न होने पर अमेरिका ईरान के बुनियादी ढांचे, जैसे पावर प्लांट और पुल पर हमले कर सकता है.
वैश्विक बाजारों में बढ़ी चिंता
इस तनाव का असर वित्तीय बाजारों पर साफ दिखाई दे रहा है.
1. कच्चे तेल की कीमतों में तेजी
2. सप्लाई बाधित होने की आशंका
3. निवेशकों में जोखिम से बचने की प्रवृत्ति
मिडिल ईस्ट संकट के चलते डॉलर मजबूत हुआ है और बाजारों में अस्थिरता बनी हुई है.
तेल आपूर्ति पर बड़ा खतरा
हॉर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया की तेल आपूर्ति का अहम मार्ग है. इसके बंद रहने से वैश्विक ऊर्जा बाजार पर गंभीर असर पड़ सकता है. विशेषज्ञों का कहना है कि यदि संघर्ष बढ़ता है, तो तेल आपूर्ति बाधित हो सकती है, महंगाई बढ़ सकती है और वैश्विक आर्थिक वृद्धि प्रभावित हो सकती है.
आगे क्या? कूटनीति या टकराव
डेडलाइन नजदीक आने के साथ अब पूरी दुनिया की नजर इस बात पर है कि क्या कूटनीतिक समाधान निकलेगा या फिर यह टकराव और गंभीर रूप लेगा. विश्लेषकों का मानना है कि स्थिति किसी भी समय बड़े भू-राजनीतिक संकट में बदल सकती है, जिसके दूरगामी वैश्विक परिणाम होंगे.
अधिकारिक नोटिफिकेशन के माध्यम से बदलाव, राघव चड्ढा की बोलने की भूमिका सीमित
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
आम आदमी पार्टी (AAP) ने गुरुवार को राज्यसभा सचिवालय को सूचित किया कि अशोक मित्तल अब पार्टी के उपनेता के रूप में कार्यभार संभालेंगे और राघव चड्ढा का स्थान लेंगे. साथ ही पार्टी ने यह भी कहा कि चड्ढा को अब पार्टी के कोटा से बोलने का समय नहीं दिया जाएगा, जो AAP की फ्लोर मैनेजमेंट रणनीति में बदलाव को दर्शाता है. पार्टी के वर्तमान में राज्यसभा में कुल 10 सांसद हैं, जिनमें सात पंजाब से और तीन दिल्ली से हैं, मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार.
अशोक मित्तल का राजनीतिक सफर
लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी के संस्थापक अशोक मित्तल ने 2022 में सक्रिय राजनीति में कदम रखा और उसी वर्ष राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए. इसके बाद वे कई महत्वपूर्ण संसदीय समितियों का हिस्सा रहे, जिनमें रक्षा समिति और वित्त समिति शामिल हैं. फरवरी 2026 में उन्हें भारत–यूएसए संसदीय मित्रता समूह में शामिल किया गया.
अशोक मित्तल कनिमोझी के नेतृत्व वाली बहु-पार्टी प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा भी रहे, जिसने पिछले साल के पहलगाम आतंक हमले के बाद रूस, लातविया, स्लोवेनिया, ग्रीस और स्पेन का दौरा किया.
संसद में शामिल होने के बाद, मित्तल ने शिक्षा, रोजगार और विकास जैसे प्रमुख नीतिगत मुद्दों पर चर्चा में सक्रिय भूमिका निभाई है. उनका शांत और व्यावहारिक दृष्टिकोण पार्टी की संसदीय कार्रवाइयों को मजबूत करने में मदद करेगा और राजनीतिक निर्णयों में विशेषज्ञता पर बढ़ते ध्यान को दर्शाता है.
राघव चड्ढा की भूमिका और कार्य
राघव चड्ढा भी अप्रैल 2022 से राज्यसभा सांसद हैं और संसद में AAP की प्रमुख आवाज़ों में शामिल रहे हैं. उन्होंने अक्सर सार्वजनिक मुद्दों को उठाया है.
पिछले महीने उन्होंने “सरपंच पति” या “पंचायत पति” प्रथा पर ध्यान आकर्षित किया, जहां आरक्षित पंचायत सीटों पर चुनी गई महिलाएं केवल नाममात्र प्रतिनिधि बनी रहती हैं, जबकि पुरुष रिश्तेदार वास्तविक शक्ति का प्रयोग करते हैं. उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि महिलाओं को स्वतंत्र रूप से अधिकार प्रयोग करने का अवसर दिया जाए, जो 73वें संविधान संशोधन की भावना के अनुरूप है.
इसके अलावा, चड्ढा ने संसद में मासिक धर्म स्वच्छता पर भी चर्चा की, इसे स्वास्थ्य, शिक्षा और समानता का मुद्दा बताया, जो 35 करोड़ से अधिक महिलाओं और लड़कियों को प्रभावित करता है. उन्होंने कहा कि यदि कोई लड़की स्कूल नहीं जा पाती क्योंकि वहाँ सैनिटरी पैड, पानी और गोपनीयता नहीं है, तो यह उसका व्यक्तिगत समस्या नहीं बल्कि सामाजिक विफलता है. उन्होंने यह भी कहा कि समाज ने एक जैविक तथ्य को सामाजिक वर्जना में बदल दिया है.
AAP का यह फैसला पार्टी के अंदर रणनीतिक बदलाव का संकेत देता है. आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि राज्यसभा में इस बदलाव का पार्टी की राजनीतिक दिशा और प्रभाव पर क्या असर पड़ता है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
आम आदमी पार्टी (AAP) ने राज्यसभा में अपने नेतृत्व ढांचे में बड़ा बदलाव करने की दिशा में कदम बढ़ाया है. पार्टी ने राज्यसभा सचिवालय को पत्र लिखकर राघव चड्ढा को डिप्टी लीडर पद से हटाने की मांग की है. इसके साथ ही पार्टी ने यह भी अनुरोध किया है कि उन्हें पार्टी कोटे से बोलने का समय न दिया जाए.
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार राघव चड्ढा की जगह पार्टी ने अशोक मित्तल को राज्यसभा में डिप्टी लीडर बनाने का प्रस्ताव रखा है. AAP ने सचिवालय से इस बदलाव को जल्द लागू करने की मांग की है. फिलहाल पार्टी के राज्यसभा में कुल 10 सांसद हैं, जिनमें 7 पंजाब और 3 दिल्ली से हैं.
रणनीति में बदलाव के संकेत
पार्टी का यह कदम राज्यसभा में अपनी रणनीति और फ्लोर मैनेजमेंट में बदलाव का संकेत माना जा रहा है. स्पीकिंग कोटा से हटाने की मांग इस बात की ओर इशारा करती है कि AAP संसद में अपनी भूमिका को नए तरीके से तय करना चाहती है.
राघव चड्ढा का राजनीतिक सफर
पंजाब का प्रतिनिधित्व करने वाले राघव चड्ढा आम आदमी पार्टी (AAP) के गठन के शुरुआती दिनों से ही जुड़े रहे हैं. उन्होंने 2012 में दिल्ली लोकपाल आंदोलन के दौरान अरविंद केजरीवाल के साथ काम करते हुए अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत की. समय के साथ उन्होंने संगठन में तेजी से जगह बनाई, राष्ट्रीय प्रवक्ता बने और 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में पार्टी की जीत के बाद सबसे युवा कोषाध्यक्ष बने.
उन्होंने 2019 का लोकसभा चुनाव दक्षिण दिल्ली से लड़ा, लेकिन रमेश बिधूड़ी से हार गए. इसके बाद 2020 में उन्होंने वापसी करते हुए राजेंद्र नगर विधानसभा सीट जीती और बाद में दिल्ली जल बोर्ड के उपाध्यक्ष बने.
राज्यसभा में भूमिका
साल 2022 में राघव चड्ढा 33 साल की उम्र में राज्यसभा पहुंचे और उस समय सबसे युवा सदस्य बने. बाद में 2023 में उन्हें संजय सिंह की जगह राज्यसभा में पार्टी का नेता बनाया गया. संसद में उन्होंने कई सामाजिक और प्रशासनिक मुद्दों को उठाया. हाल ही में उन्होंने “सरपंच पति” जैसी प्रथा पर सवाल उठाते हुए महिलाओं को स्वतंत्र रूप से काम करने का अधिकार देने की मांग की थी, जो 73वां संविधान संशोधन की भावना के अनुरूप है.
AAP नेता ने यह भी आरोप लगाया कि द टाइम्स ऑफ इंडिया के दिल्ली संस्करण में आम आदमी पार्टी के नेताओं की प्रतिक्रिया को प्रमुखता नहीं दी गई. उन्होंने इसे पक्षपातपूर्ण कवरेज का उदाहरण बताया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
टाइम्स नाउ समिट 2026 में दिए गए एक बयान को लेकर सियासी और मीडिया हलकों में विवाद गहरा गया है. आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता सौरभ भारद्वाज ने इस मामले पर कड़ी आपत्ति जताते हुए टाइम्स नाउ नेटवर्क के मैनेजिंग डायरेक्टर विनीत जैन को पत्र लिखकर कार्रवाई की मांग की है.
क्या है पूरा मामला
दरअसल, टाइम्स नाउ समिट 2026 के दौरान दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने एक्साइज मामले से जुड़े एक डिस्चार्ज ऑर्डर को लेकर टिप्पणी की. आरोप है कि उन्होंने इसे “सेट” या “फिक्स” बताया, जिसे न्यायपालिका की निष्पक्षता पर सवाल के तौर पर देखा जा रहा है.
एंकर की भूमिका पर भी उठे सवाल
सौरभ भारद्वाज ने कार्यक्रम की एंकर और ग्रुप एडिटर-इन-चीफ नविका कुमार की भूमिका पर भी सवाल खड़े किए. उनका कहना है कि इतने गंभीर आरोपों पर एंकर ने न तो कोई आपत्ति जताई और न ही संबंधित तथ्यों या सबूतों की मांग की. भारद्वाज के मुताबिक, इस तरह के संवेदनशील मुद्दों को बिना जांच के मंच देना पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है और इससे मीडिया संस्थानों की विश्वसनीयता पर असर पड़ता है.
मीडिया कवरेज पर पक्षपात का आरोप
AAP नेता ने यह भी आरोप लगाया कि द टाइम्स ऑफ इंडिया के दिल्ली संस्करण में आम आदमी पार्टी के नेताओं की प्रतिक्रिया को प्रमुखता नहीं दी गई. उन्होंने इसे पक्षपातपूर्ण कवरेज का उदाहरण बताया. उनके अनुसार, इस तरह की रिपोर्टिंग न सिर्फ मीडिया की निष्पक्षता पर सवाल उठाती है, बल्कि इससे आम जनता के बीच गलत संदेश भी जा सकता है.
न्यायपालिका की छवि को लेकर चिंता
सौरभ भारद्वाज ने कहा कि सार्वजनिक मंचों पर इस तरह के बयान न्यायपालिका की छवि को प्रभावित कर सकते हैं. उन्होंने इस पूरे मामले में जिम्मेदारी तय करने और उचित कार्रवाई की मांग की है.
बढ़ सकता है विवाद
यह मामला अब राजनीतिक और मीडिया दोनों स्तरों पर तूल पकड़ता नजर आ रहा है. आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि टाइम्स नाउ नेटवर्क इस पर क्या प्रतिक्रिया देता है और क्या इस मामले में कोई कार्रवाई की जाती है. वहीं, यह विवाद एक बार फिर मीडिया की जिम्मेदारी, निष्पक्षता और सार्वजनिक मंचों पर दिए जाने वाले बयानों की गंभीरता को लेकर बहस को तेज कर सकता है.