ट्रंप का दावा- हमास के निरस्त्रीकरण पर बनी सहमति, गाजा से चरणबद्ध तरीके से हटेगी इजरायली सेना

ट्रंप के अनुसार, इस समझौते के तहत हमास का निरस्त्रीकरण और इजरायली सैनिकों की गाजा से वापसी चरणबद्ध तरीके से होगी.

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Friday, 31 July, 2026
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि बोर्ड ऑफ पीस (Board of Peace) ने गाजा में हमास और अन्य सशस्त्र समूहों के पूर्ण निरस्त्रीकरण को लेकर समझौता कर लिया है. यह समझौता गाजा के लिए ट्रंप के व्यापक राजनीतिक और सुरक्षा ढांचे को लागू करने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है.

ट्रंप के अनुसार, इस समझौते के तहत हमास का निरस्त्रीकरण और इजरायली सैनिकों की गाजा से वापसी चरणबद्ध तरीके से होगी. इसके बाद एक अंतरराष्ट्रीय स्थिरीकरण बल (International Stabilization Force) और नई फिलिस्तीनी पुलिस बल सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालेंगे, जबकि एक फिलिस्तीनी प्रशासन गाजा के शासन का संचालन करेगा.

इजरायली सेना की वापसी होगी चरणों में

ट्रंप ने कहा कि यह व्यवस्था गाजा के लिए उनके 20-सूत्रीय शांति प्लान का हिस्सा है. इस योजना में सशस्त्र समूहों के निरस्त्रीकरण को इजरायली सेना की चरणबद्ध वापसी से जोड़ा गया है. उन्होंने इसे एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बताते हुए कहा, "यह एक ऐतिहासिक दिन है. हम युद्धविराम के बाद से जिस लक्ष्य की दिशा में काम कर रहे थे, यह उसकी ओर एक महत्वपूर्ण कदम है और मेरे 20-सूत्रीय प्लान को लागू करने की दिशा में बड़ी प्रगति है."

प्रस्तावित ढांचे के तहत जैसे-जैसे निरस्त्रीकरण की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी, वैसे-वैसे इजरायली सेना गाजा से पीछे हटेगी. अंतरराष्ट्रीय स्थिरीकरण बल नई फिलिस्तीनी पुलिस के साथ मिलकर काम करेगा और धीरे-धीरे सुरक्षा की जिम्मेदारी स्थानीय प्रशासन को सौंपी जाएगी.

ट्रंप ने कहा कि अंतिम लक्ष्य फिलिस्तीन के नेतृत्व वाली सरकार की स्थापना करना है, जो इजरायल की सुरक्षा चिंताओं को भी ध्यान में रखेगी. उन्होंने कहा, "गाजा का शासन एक नई फिलिस्तीनी सरकार के जरिए चलाया जाएगा, जो गाजा के लोगों की सेवा के लिए बोर्ड ऑफ पीस के साथ मिलकर काम करेगी."

मिस्र, कतर और तुर्किये की भूमिका की सराहना

अमेरिकी राष्ट्रपति ने वार्ता में भूमिका निभाने के लिए मिस्र, कतर और तुर्किये का धन्यवाद किया. उन्होंने अपने प्रशासन के अधिकारियों की भी सराहना की, जो इस प्रक्रिया में शामिल रहे.

ट्रंप ने कहा कि एक साल पहले की स्थिति की तुलना में काफी प्रगति हुई है, जब गाजा में युद्ध जारी था, बंधक कैद में थे और मानवीय संकट गहरा रहा था. हालांकि, उन्होंने यह भी माना कि अभी कई महत्वपूर्ण काम बाकी हैं. उन्होंने कहा, "हम एक साल पहले की स्थिति से काफी आगे आ चुके हैं, लेकिन अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है."

समझौते के क्रियान्वयन पर कई सवाल बाकी

हालांकि, इस घोषणा के बाद भी कई अहम मुद्दों का समाधान होना बाकी है. इनमें निरस्त्रीकरण की समयसीमा, इजरायली सेना की वापसी का कार्यक्रम, हथियारों के समर्पण की पुष्टि और सुरक्षा जिम्मेदारियों के हस्तांतरण की प्रक्रिया शामिल हैं.

2025 में संयुक्त राष्ट्र ने दी थी गाजा ढांचे को मंजूरी

यह घोषणा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा 17 नवंबर 2025 को प्रस्ताव 2803 पारित किए जाने के बाद आई है. इस प्रस्ताव में गाजा संघर्ष को समाप्त करने के लिए ट्रंप की व्यापक योजना का समर्थन किया गया था. इस प्रस्ताव को 13 देशों का समर्थन मिला था, जबकि चीन और रूस ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया था.

प्रस्ताव में बोर्ड ऑफ पीस को अंतरिम प्रशासन के रूप में मान्यता दी गई थी और गाजा में अस्थायी अंतरराष्ट्रीय स्थिरीकरण बल की तैनाती को मंजूरी दी गई थी. इसके तहत संक्रमण काल के दौरान रोजमर्रा के नागरिक प्रशासन के लिए एक फिलिस्तीनी तकनीकी समिति बनाने का भी प्रावधान किया गया था.

जनवरी 2026 में इस ढांचे को और आगे बढ़ाया गया, जब अली शआथ (Ali Sha’ath) को गाजा प्रशासन के लिए राष्ट्रीय समिति का प्रमुख नियुक्त किया गया और मेजर जनरल जैस्पर जेफर्स को अंतरराष्ट्रीय स्थिरीकरण बल का कमांडर बनाया गया.

हमास के हथियार बने सबसे बड़ी चुनौती

प्रशासनिक ढांचे में प्रगति के बावजूद हमास के हथियारों का भविष्य इस योजना को लागू करने में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक बना हुआ था.

बोर्ड ऑफ पीस की मई में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को दी गई रिपोर्ट में हथियारों के सत्यापित निष्क्रियकरण और हमास से नियंत्रण हस्तांतरण को प्रमुख लंबित मुद्दों के रूप में बताया गया था.

रॉयटर्स के अनुसार, मार्च में बोर्ड ऑफ पीस ने हमास को लिखित निरस्त्रीकरण प्रस्ताव दिया था. यह प्रस्ताव युद्ध के बाद की सुरक्षा व्यवस्था और गाजा में सत्ता हस्तांतरण को लेकर चल रही बातचीत का हिस्सा था.

ट्रंप की ताजा घोषणा इस योजना के सबसे विवादित हिस्सों में से एक पर प्रगति का संकेत देती है. हालांकि, इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि निरस्त्रीकरण, इजरायली सेना की वापसी और गाजा में सुरक्षा व प्रशासनिक जिम्मेदारियों के हस्तांतरण की प्रक्रिया किस तरह आगे बढ़ती है.
 


एंटी-पेपर लीक कानून पर PM मोदी का बड़ा संदेश, बोले- पेपर माफियाओं के खिलाफ होगी कड़ी कार्रवाई

प्रधानमंत्री ने कहा कि सरकार लंबे समय से परीक्षा प्रणाली में सुधार, तकनीक के बेहतर इस्तेमाल और मजबूत कानूनी प्रावधानों के जरिए पारदर्शी एवं प्रभावी व्यवस्था बनाने पर काम कर रही है.

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Friday, 31 July, 2026
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद से पारित संशोधित एंटी-पेपर लीक विधेयक का स्वागत करते हुए इसे देश की परीक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने की दिशा में बड़ा कदम बताया है. उन्होंने कहा कि सरकार छात्रों के भविष्य की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है और पेपर लीक माफियाओं व संगठित गिरोहों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी. प्रधानमंत्री ने कहा कि नई व्यवस्था से सार्वजनिक परीक्षाएं अधिक पारदर्शी, निष्पक्ष और भरोसेमंद बनेंगी.

प्रधानमंत्री ने कहा कि सरकार लंबे समय से परीक्षा प्रणाली में सुधार, तकनीक के बेहतर इस्तेमाल और मजबूत कानूनी प्रावधानों के जरिए पारदर्शी एवं प्रभावी व्यवस्था बनाने पर काम कर रही है. उन्होंने बताया कि परीक्षा प्रक्रिया को सुरक्षित बनाने के लिए बेहतर सिस्टम, फास्ट-ट्रैक व्यवस्था और राज्यों के साथ लगातार विचार-विमर्श किया गया है.

पेपर लीक पर और सख्त होगी सजा

संशोधित विधेयक को गुरुवार को राज्यसभा ने ध्वनिमत से पारित किया, जबकि लोकसभा इसे एक दिन पहले मंजूरी दे चुकी थी. यह संशोधन सार्वजनिक परीक्षाओं में पेपर लीक और अन्य अनुचित गतिविधियों पर लगाम लगाने के लिए मौजूदा कानून को और मजबूत बनाता है.

यह कानून संघ लोक सेवा आयोग (UPSC), कर्मचारी चयन आयोग (SSC), रेलवे भर्ती बोर्ड (RRB), इंस्टीट्यूट ऑफ बैंकिंग पर्सोनल सेलेक्शन (IBPS) और राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) जैसी संस्थाओं द्वारा आयोजित सार्वजनिक परीक्षाओं पर लागू होगा.

10 साल तक की जेल और 50 लाख रुपये तक जुर्माना

संशोधित कानून के तहत सार्वजनिक परीक्षाओं में पेपर लीक या अनुचित साधनों का दोषी पाए जाने पर पांच से 10 वर्ष तक की जेल और 50 लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान किया गया है. वहीं, संगठित अपराध या पेपर लीक गिरोहों के मामलों में कम से कम सात वर्ष की सजा और न्यूनतम 10 करोड़ रुपये के जुर्माने का प्रावधान रखा गया है.

'पेपर माफियाओं को नहीं बख्शा जाएगा'

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि पेपर लीक कई वर्षों से देश के लिए गंभीर चुनौती रहा है, जिससे केंद्र और राज्यों की विभिन्न परीक्षाएं प्रभावित हुई हैं और लाखों युवाओं के भविष्य पर असर पड़ा है. उन्होंने कहा कि सरकार ने इस समस्या से निपटने के लिए विशेष टास्क फोर्स का गठन, फास्ट-ट्रैक तंत्र और राज्यों से सुझाव लेने जैसे कई कदम उठाए हैं. प्रधानमंत्री ने कहा, "पेपर माफिया और पेपर लीक में शामिल गिरोह, जो देश के बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ करते हैं, उन्हें किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा."

परीक्षा प्रणाली को और पारदर्शी बनाने की कोशिश

सरकार का मानना है कि संशोधित कानून से सार्वजनिक परीक्षाओं में पारदर्शिता, निष्पक्षता और विश्वसनीयता बढ़ेगी. हाल के वर्षों में विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं और भर्ती प्रक्रियाओं में पेपर लीक की घटनाओं के बाद परीक्षा प्रणाली को और मजबूत बनाने की मांग लगातार उठ रही थी. नए संशोधन को इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है.
 


लोकसभा से पास हुआ एंटी पेपर लीक संशोधन बिल; दोषियों को 10 साल जेल और 50 लाख रुपये तक जुर्माना

केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने 27 जुलाई को यह संशोधन विधेयक लोकसभा में पेश किया था. यह कदम देश में प्रतियोगी परीक्षाओं में गड़बड़ी और पेपर लीक को लेकर बढ़ी चिंताओं के बीच उठाया गया है.

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Wednesday, 29 July, 2026
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परीक्षाओं में होने वाली गड़बड़ियों और पेपर लीक पर सख्ती बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है. लोकसभा ने बुधवार को लोक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026 को मंजूरी दे दी. नए प्रावधानों के तहत पेपर लीक और परीक्षा में अनुचित साधनों के इस्तेमाल के दोषियों को अधिकतम 10 साल तक की सजा और 50 लाख रुपये तक के जुर्माने का सामना करना पड़ सकता है.

पेपर लीक मामलों में कड़ी सजा का प्रावधान

लोकसभा ने बुधवार को लोक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026 को पारित कर दिया. यह विधेयक परीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ाने और पेपर लीक जैसी घटनाओं पर रोक लगाने के उद्देश्य से लाया गया है. विपक्ष के विरोध और नारेबाजी के बीच यह बिल सदन से पास हुआ.

केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने 27 जुलाई को यह संशोधन विधेयक लोकसभा में पेश किया था. यह कदम देश में प्रतियोगी परीक्षाओं में गड़बड़ी और पेपर लीक को लेकर बढ़ी चिंताओं के बीच उठाया गया है.

NEET पेपर लीक मामले में 52 FIR दर्ज

विधेयक पर चर्चा के दौरान केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने कहा कि सरकार ने NEET पेपर लीक मामले में तेजी से कार्रवाई की है. उन्होंने बताया कि साल 2024 में पेपर लीक विरोधी कानून लागू होने के बाद से अब तक 52 FIR दर्ज की जा चुकी हैं.

उन्होंने कहा कि संशोधन विधेयक सरकार के अनुभवों से सीखने और परीक्षा व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में उठाया गया कदम है. उन्होंने यह भी दावा किया कि पिछले कुछ वर्षों में पेपर लीक से जुड़े मामलों के कारण होने वाली आत्महत्याओं की संख्या में कमी आई है.

विपक्ष पर जितेंद्र सिंह का हमला

लोकसभा में बोलते हुए जितेंद्र सिंह ने विपक्ष के नेता राहुल गांधी पर भी निशाना साधा. उन्होंने कहा कि उन्हें संसदीय नियमों और सरकार के कामकाज की पूरी जानकारी नहीं है. बिल पारित होने के बाद लोकसभा की कार्यवाही दिनभर के लिए स्थगित कर दी गई.
 


प्रल्हाद जोशी को मिली शिक्षा मंत्रालय की कमान, 5 बार के सांसद और कई अहम मंत्रालयों का अनुभव

राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद जोशी को उनके मौजूदा मंत्रालयों के साथ शिक्षा मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है.

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Monday, 27 July, 2026
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धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद केंद्र सरकार ने वरिष्ठ भाजपा नेता प्रल्हाद जोशी को केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी है. राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद जोशी को उनके मौजूदा मंत्रालयों के साथ शिक्षा मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है. ऐसे में आइए जानते हैं कि नए शिक्षा मंत्री प्रल्हाद जोशी कौन हैं और उनका राजनीतिक सफर कैसा रहा है.

पांच बार के सांसद, संगठन से सरकार तक मजबूत पकड़

प्रल्हाद जोशी भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेताओं में शामिल हैं और कर्नाटक के धारवाड़ लोकसभा क्षेत्र का लगातार पांच बार प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. उन्होंने पहली बार 2004 में लोकसभा चुनाव जीता था. इसके बाद 2009, 2014, 2019 और 2024 में भी लगातार जीत दर्ज कर संसद पहुंचे. पार्टी संगठन और संसदीय राजनीति, दोनों में उनकी मजबूत पकड़ मानी जाती है.

कर्नाटक से हुई राजनीतिक शुरुआत

जोशी का राजनीतिक सफर कर्नाटक से शुरू हुआ. 1990 के दशक में हुबली के ईदगाह मैदान विवाद के दौरान हुए आंदोलनों में उनकी सक्रिय भूमिका ने उन्हें राज्य की राजनीति में पहचान दिलाई. इसके बाद उन्होंने संगठन में लगातार काम किया और भाजपा के प्रमुख नेताओं में शामिल हो गए.

भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष भी रह चुके हैं

प्रल्हाद जोशी ने 2012 से 2016 तक भाजपा की कर्नाटक इकाई के अध्यक्ष के रूप में भी जिम्मेदारी निभाई. उनके कार्यकाल में पार्टी ने राज्य में अपने संगठन को मजबूत किया और चुनावी रणनीति को नई दिशा दी.

मोदी सरकार में संभाले कई अहम मंत्रालय

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भरोसेमंद सहयोगियों में गिने जाने वाले प्रल्हाद जोशी केंद्र सरकार में कई महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं. उन्होंने संसदीय कार्य मंत्री, कोयला एवं खनन मंत्री के रूप में काम किया है. वर्तमान में उनके पास उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय और नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय की जिम्मेदारी भी है.

अब शिक्षा मंत्रालय की बड़ी चुनौती

जोशी ने ऐसे समय में शिक्षा मंत्रालय का कार्यभार संभाला है, जब नीट पेपर लीक विवाद के बाद परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता और राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठे हैं. उनके सामने परीक्षा व्यवस्था में छात्रों का भरोसा बहाल करने, सुधारों को लागू करने और शिक्षा क्षेत्र से जुड़े दीर्घकालिक मुद्दों के समाधान की बड़ी चुनौती होगी.
 


नीट पेपर लीक विवाद के बीच धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा, पीएम मोदी को भेजा पद छोड़ने का प्रस्ताव

उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर एक लंबा पत्र साझा करते हुए बताया कि उन्होंने अपना इस्तीफा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भेज दिया है.

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Saturday, 25 July, 2026
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नीट पेपर लीक विवाद और छात्रों के लगातार विरोध-प्रदर्शन के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने अपने पद से इस्तीफा देने की घोषणा कर दी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस्तीफा भेजने की जानकारी खुद सोशल मीडिया पर साझा करते हुए प्रधान ने बड़ा राजनीतिक संकेत दिया. यदि उनका इस्तीफा स्वीकार होता है, तो वह मोदी सरकार के 12 साल के कार्यकाल में इस्तीफा देने वाले दूसरे केंद्रीय मंत्री होंगे. इस घटनाक्रम को छात्रों के आंदोलन और बढ़ते जनदबाव की बड़ी जीत के तौर पर देखा जा रहा है.

धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा ऐसे समय आया है जब नीट पेपर लीक मामले को लेकर देशभर में छात्रों का विरोध प्रदर्शन लगातार तेज हो रहा है. इसे मोदी सरकार के कार्यकाल में दूसरा ऐसा मौका माना जा रहा है, जब किसी बड़े जनआंदोलन और सामाजिक दबाव के बाद किसी केंद्रीय मंत्री को पद छोड़ना पड़ा है.

पहले भी जनदबाव में बदले हैं सरकार के फैसले

मोदी सरकार के पिछले 12 वर्षों में कुछ ऐसे अवसर भी आए हैं, जब व्यापक विरोध के बाद सरकार को अपने फैसलों में बदलाव करना पड़ा. वर्ष 2015 में भूमि अधिग्रहण संशोधन विधेयक विपक्ष और आरएसएस से जुड़े संगठनों के विरोध के चलते वापस लेना पड़ा था. वहीं, नवंबर 2021 में एक साल से अधिक चले किसान आंदोलन के बाद केंद्र सरकार ने तीनों कृषि कानूनों को भी वापस ले लिया था.

इसके अलावा नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ हुए व्यापक विरोध प्रदर्शनों के बाद भी सरकार ने लंबे समय तक इसके नियम लागू नहीं किए थे. हालांकि, विवादों में घिरे मंत्रियों को आमतौर पर तत्काल हटाने के बजाय मंत्रिमंडल विस्तार या फेरबदल के दौरान हटाया जाता रहा है.

नीट आंदोलन ने बढ़ाया सरकार पर दबाव

नीट परीक्षा में कथित गड़बड़ी और पेपर लीक के खिलाफ 20 जुलाई से छात्रों का आंदोलन लगातार तेज हुआ. 'संसद चलो' मार्च के दौरान भारी भीड़ उमड़ी, जिसके बाद पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) ने लाठीचार्ज और आंसू गैस का इस्तेमाल किया. इस कार्रवाई की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद सरकार की व्यापक आलोचना हुई.

बढ़ते दबाव के बीच शिक्षा मंत्रालय में प्रशासनिक फेरबदल किए गए और राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) के 47 अधिकारियों को हटाया गया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी सोशल मीडिया के जरिए युवाओं से संवाद किया और पेपर लीक मामलों के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट तथा सख्त कानून का भरोसा दिया. केंद्रीय कैबिनेट ने भी पेपर लीक से जुड़े कानून में संशोधन को मंजूरी दे दी है, जिसे जल्द संसद में पेश किया जाएगा.

प्रदर्शनकारियों की बाकी मांगें अब भी कायम

सरकार की ओर से केंद्रीय मंत्री जे.पी. नड्डा और जितेंद्र सिंह प्रदर्शनकारियों के प्रतिनिधियों से बातचीत कर रहे हैं. हालांकि, आंदोलनकारी संगठनों का कहना है कि उनकी चार प्रमुख मांगों में से अभी केवल एक ही पूरी हुई है. उनका कहना है कि जब तक नीट पेपर लीक से प्रभावित परिवारों को 1 करोड़ रुपये का मुआवजा, प्रदर्शनकारी छात्रों पर दर्ज मामलों की वापसी और पुलिस कार्रवाई पर सार्वजनिक माफी जैसी मांगें पूरी नहीं होतीं, तब तक आंदोलन जारी रहेगा.


पेपर लीक पर सरकार का बड़ा एक्शन, 10 साल की जेल और ₹10 करोड़ जुर्माने वाले बिल को कैबिनेट की मंजूरी

प्रस्तावित संशोधन के तहत पेपर लीक से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट को कानूनी आधार दिया जाएगा.

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Friday, 24 July, 2026
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प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक पर लगाम कसने के लिए केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है. शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में पेपर लीक कानून में संशोधन से जुड़े विधेयक को मंजूरी दे दी गई. सरकार इस विधेयक को अगले सप्ताह संसद के मानसून सत्र में पेश कर सकती है. सूत्रों के अनुसार, इसे 27 जुलाई या सोमवार को लोकसभा में लाया जा सकता है. 

फास्ट ट्रैक कोर्ट में तीन महीने के भीतर होगी सुनवाई

प्रस्तावित संशोधन के तहत पेपर लीक से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट को कानूनी आधार दिया जाएगा. सरकार का लक्ष्य है कि जांच और मुकदमे की पूरी प्रक्रिया अधिकतम तीन महीने के भीतर पूरी हो, ताकि दोषियों को जल्द सजा मिल सके और परीक्षा प्रणाली में छात्रों का भरोसा मजबूत हो.

दोषियों को 10 साल तक की जेल, ₹10 करोड़ तक जुर्माना

कैबिनेट से मंजूर प्रस्ताव में पेपर लीक माफियाओं के खिलाफ सख्त दंड का प्रावधान किया गया है. इसके तहत दोषी पाए जाने पर अधिकतम 10 साल तक की कैद और ₹10 करोड़ तक का जुर्माना लगाया जा सकेगा. सरकार का कहना है कि इस कदम से संगठित पेपर लीक गिरोहों पर प्रभावी कार्रवाई संभव होगी.

नीट विवाद के बाद बढ़ी सख्त कानून की मांग

पिछले कुछ वर्षों में कई भर्ती और प्रवेश परीक्षाओं में पेपर लीक के मामले सामने आए हैं. खासकर नीट परीक्षा में कथित अनियमितताओं के बाद देशभर में छात्रों ने विरोध प्रदर्शन किए थे. विपक्षी दलों ने भी परीक्षा प्रणाली को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाने के लिए कड़े कानून की मांग की थी.

पीएम मोदी ने पहले ही दिए थे संकेत

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार देर रात जारी अपने वीडियो संदेश में पेपर लीक को लाखों छात्रों और उनके परिवारों के भविष्य से जुड़ा गंभीर मुद्दा बताया था. उन्होंने कहा था कि सरकार इस अपराध के खिलाफ सख्त कानून लाएगी और मामलों की सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट की व्यवस्था करेगी. प्रधानमंत्री ने यह भी बताया था कि पिछले ढाई महीनों में कई आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है और 22 लाख छात्रों की परीक्षा कराकर 19 जुलाई को परिणाम भी घोषित किए गए.

पहले से लागू है यह कानून

केंद्र सरकार जून 2024 में 'पब्लिक एग्जामिनेशन (प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) एक्ट, 2024' लागू कर चुकी है. इस कानून के तहत पेपर लीक, संगठित नकल, इम्पर्सनेशन और परीक्षा से जुड़े कंप्यूटर सिस्टम या नेटवर्क से छेड़छाड़ को अपराध माना गया है. मौजूदा कानून में सामान्य मामलों में तीन से पांच साल तक की जेल और ₹10 लाख तक जुर्माने का प्रावधान है, जबकि संगठित पेपर लीक गिरोहों के लिए पांच से 10 साल की जेल और कम से कम ₹1 करोड़ जुर्माने का प्रावधान पहले से मौजूद है. अब सरकार इन प्रावधानों को और प्रभावी बनाने के साथ-साथ न्यायिक प्रक्रिया को भी तेज करने की तैयारी में है.
 


सरकार के आश्वासन के बाद सोनम वांगचुक ने खत्म किया अनिश्चितकालीन अनशन, मांगों पर सकारात्मक रुख का भरोसा

गुरुवार देर रात केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा और केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने मेदांता अस्पताल पहुंचकर वांगचुक से मुलाकात की, जिसके बाद उन्होंने अनशन खत्म करने का फैसला लिया.

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Friday, 24 July, 2026
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सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने केंद्र सरकार की ओर से उनकी प्रमुख मांगों पर सकारात्मक पहल का आश्वासन मिलने के बाद अपना अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल समाप्त कर दी. गुरुवार देर रात केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा और केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने मेदांता अस्पताल पहुंचकर वांगचुक से मुलाकात की, जिसके बाद उन्होंने अनशन खत्म करने का फैसला लिया.

देर रात अस्पताल में हुई अहम बैठक

गुरुवार देर रात केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा और केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने मेदांता अस्पताल में भर्ती सोनम वांगचुक से मुलाकात की. इस दौरान वांगचुक की पत्नी गीतांजलि आंगमो समेत अन्य लोग भी मौजूद रहे. बैठक में सरकार ने उनकी प्रमुख मांगों पर सकारात्मक रुख अपनाने का भरोसा दिया, जिसके बाद वांगचुक ने अपना अनिश्चितकालीन अनशन समाप्त कर दिया. इसे लेकर सोनम वांगचुक ने अपने एक्स हैंडल पर एक पोस्ट भी शेयर किया है.

प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई नहीं करने का भरोसा

सरकार ने संकेत दिया कि दिल्ली के जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले लोगों और 20 जुलाई को संसद मार्च में शामिल प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज मामलों पर सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाया जाएगा. सरकार ने कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वालों के खिलाफ कठोर कार्रवाई से बचने का प्रयास किया जाएगा.

किन मुद्दों पर बनी सहमति?

सरकार ने वांगचुक की ओर से उठाए गए विभिन्न मुद्दों पर सकारात्मक पहल का भरोसा दिया है. हालांकि, इन मांगों को लागू करने की समय-सीमा या विस्तृत रोडमैप फिलहाल सार्वजनिक नहीं किया गया है. सरकार और आंदोलनकारियों के बीच आगे भी बातचीत जारी रहने की संभावना है.


कैबिनेट फेरबदल की अटकलें तेज, कई वरिष्ठ मंत्रियों की छुट्टी तो कुछ के राज्यपाल बनाए जाने की चर्चा

रिपोर्ट्स के अनुसार, केंद्रीय मंत्रिमंडल में फिलहाल नौ पद खाली हैं और कुछ मौजूदा मंत्रियों को हटाया या नई जिम्मेदारी दी जा सकती है, जिन नेताओं के नाम संभावित बदलाव से जोड़े जा रहे हैं, उनमें निर्मला सीतारमण, धर्मेंद्र प्रधान, हरदीप सिंह पुरी सहित कई नाम शामिल हैं.

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Monday, 29 June, 2026
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केंद्र सरकार में संभावित मंत्रिमंडल विस्तार और फेरबदल को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई हैं. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अगले कुछ हफ्तों में केंद्रीय मंत्रिपरिषद में बदलाव के साथ-साथ पांच से छह नए राज्यपालों की नियुक्ति भी की जा सकती है. हालांकि, सरकार की ओर से अभी तक इस संबंध में कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है.

रिपोर्ट्स के अनुसार, केंद्रीय मंत्रिमंडल में फिलहाल नौ पद खाली हैं और कुछ मौजूदा मंत्रियों को हटाया या नई जिम्मेदारी दी जा सकती है. जिन नेताओं के नाम संभावित बदलाव से जोड़े जा रहे हैं, उनमें वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण, धर्मेंद्र प्रधान, मनोहर लाल खट्टर, हरदीप सिंह पुरी, संजय सेठ, हर्ष मल्होत्रा, पंकज चौधरी, रवनीत सिंह बिट्टू और नितिन गडकरी शामिल हैं.

रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि नितिन गडकरी स्वास्थ्य कारणों से मंत्रिमंडल से अलग होने का फैसला कर सकते हैं. वहीं, हाल ही में कथित तौर पर इस्तीफा देने वाले जॉर्ज कुरियन का नाम भी चर्चाओं में है. कुछ मौजूदा मंत्रियों को राज्यपाल की जिम्मेदारी दिए जाने की भी संभावना जताई जा रही है.

मंत्रिमंडल में नए चेहरों की हो सकती है एंट्री

केंद्रीय मंत्रिमंडल में संभावित नए चेहरों के तौर पर कई नेताओं और सार्वजनिक हस्तियों के नाम चर्चा में हैं. इनमें तेजस्वी सूर्या, स्मृति ईरानी, जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा, राघव चड्ढा, नीतीश कुमार, श्रीकांत शिंदे, सुरेश कश्यप, अनुराग ठाकुर, अरुण गोविल, संजय दीना पाटिल, तरुण चुघ, जनार्दन सिंह सिग्रीवाल, भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर शक्तिकांत दास, संजय बालियान, कमलजीत सहरावत, काकोली घोष, सुदीप बंद्योपाध्याय और शताब्दी रॉय के नाम शामिल बताए जा रहे हैं.

उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ को मिल सकता है प्रतिनिधित्व

रिपोर्ट्स के मुताबिक, उत्तर प्रदेश को मंत्रिमंडल में दो नए पद मिल सकते हैं. जयप्रकाश रावत और अनूप वाल्मीकि के नामों पर विचार किए जाने की चर्चा है. वहीं, छत्तीसगढ़ से रूपकुमारी चौधरी का नाम भी संभावित मंत्रियों की सूची में बताया जा रहा है.

राज्यपालों की नियुक्तियों में भी बदलाव की संभावना

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 1 जुलाई से 15 जुलाई के बीच राज्यपालों के स्तर पर भी बड़े बदलाव हो सकते हैं. कई राज्यपालों का कार्यकाल पूरा हो चुका है या समाप्ति के करीब है. इनमें गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत, उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल, तमिलनाडु के राज्यपाल आर.एन. रवि, जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा, उत्तराखंड के राज्यपाल गुरमीत सिंह, केरल के राज्यपाल राजेंद्र अर्लेकर, मध्य प्रदेश के राज्यपाल मंगूभाई पटेल, कर्नाटक के राज्यपाल थावरचंद गहलोत और ओडिशा के राज्यपाल हरि बाबू कंभमपति शामिल हैं.

रिपोर्ट्स के मुताबिक, कुछ राज्यपालों का कार्यकाल बढ़ाया जा सकता है, जबकि कुछ को दूसरे राज्यों में भेजा जा सकता है या उनकी जगह नए चेहरों की नियुक्ति की जा सकती है.

इन राज्यों में हो सकते हैं नए राज्यपाल

तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात, उत्तर प्रदेश, गोवा, पंजाब और जम्मू-कश्मीर में नए राज्यपालों की नियुक्ति की संभावना जताई जा रही है. इसके अलावा एक-दो अन्य राज्यों में भी बदलाव हो सकते हैं.

असम, मणिपुर, मिजोरम, झारखंड, राजस्थान, हरियाणा, ओडिशा, त्रिपुरा, केरल और सिक्किम में भी राज्यपालों के तबादलों की चर्चा चल रही है.

इन नेताओं के नाम राज्यपाल पद के लिए चर्चा में

जॉर्ज कुरियन, महेंद्र नाथ पांडेय, हरदीप सिंह पुरी और मनोहर लाल खट्टर के नाम संभावित राज्यपालों के रूप में सामने आ रहे हैं. हालांकि, मंत्रिमंडल फेरबदल और राज्यपालों की नियुक्तियों को लेकर अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है. जिन नामों की चर्चा हो रही है, वे फिलहाल केवल मीडिया रिपोर्ट्स और राजनीतिक अटकलों पर आधारित हैं.
 


मोदी मंत्रिमंडल में बदलाव की अटकलें तेज, सीतारमण का विभाग बदलने और कई मंत्रियों की छुट्टी की चर्चा

चर्चा है कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को वित्त मंत्रालय से हटाकर शिक्षा मंत्रालय (एचआरडी) की जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है. हालांकि इस संबंध में अभी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है.

Last Modified:
Friday, 26 June, 2026
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केंद्र सरकार के मंत्रिमंडल में बड़े फेरबदल की अटकलें तेज हो गई हैं. सूत्रों के मुताबिक, रविवार या सोमवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार में कैबिनेट विस्तार और फेरबदल हो सकता है. इस संभावित बदलाव में कई वरिष्ठ मंत्रियों के विभाग बदले जाने, कुछ मंत्रियों को बाहर किए जाने और कई नए चेहरों को शामिल किए जाने की चर्चा है.

राष्ट्रपति से अमित शाह की मुलाकात के बाद अटकलें तेज

सूत्रों के अनुसार, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने गुरुवार को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात की. माना जा रहा है कि इस दौरान संभावित मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर चर्चा हुई. इसके बाद राजनीतिक गलियारों में कैबिनेट फेरबदल की अटकलें और तेज हो गई हैं.

शक्तिकांत दास को मिल सकती है बड़ी जिम्मेदारी

पूर्व आरबीआई गवर्नर और प्रधानमंत्री के पूर्व प्रधान सचिव रहे शक्तिकांत दास को केंद्र सरकार में बड़ी जिम्मेदारी दिए जाने की चर्चा है. सूत्रों के मुताबिक उन्हें पूर्ण कैबिनेट मंत्री के रूप में शामिल किया जा सकता है.

निर्मला सीतारमण का बदल सकता है मंत्रालय

चर्चा है कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को वित्त मंत्रालय से हटाकर शिक्षा मंत्रालय (एचआरडी) की जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है. हालांकि इस संबंध में अभी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है.

धर्मेंद्र प्रधान और हरदीप सिंह पुरी पर अटकलें

राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान और हरदीप सिंह पुरी को मंत्रिमंडल से बाहर किया जा सकता है. हालांकि सरकार की ओर से इस संबंध में कोई संकेत नहीं दिए गए हैं.

अनुराग ठाकुर की हो सकती है वापसी

पूर्व केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर की एक बार फिर कैबिनेट मंत्री के रूप में वापसी की संभावना जताई जा रही है. माना जा रहा है कि पार्टी संगठन और सरकार दोनों में उनके अनुभव का लाभ लिया जा सकता है.

अरुण गोविल को मिल सकता है मौका

मेरठ से सांसद अरुण गोविल को मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने की चर्चा है. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों को देखते हुए पार्टी उन्हें महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दे सकती है.

उत्तर प्रदेश और बिहार पर विशेष फोकस

उत्तर प्रदेश चुनावों को ध्यान में रखते हुए केंद्रीय राज्य मंत्री पंकज चौधरी को संगठन में बड़ी जिम्मेदारी दिए जाने की अटकलें हैं. ऐसे में उन्हें मंत्रिमंडल से बाहर किया जा सकता है. वहीं, बिहार से महाराजगंज सांसद जनार्दन सिंह सिग्रीवाल और मध्य प्रदेश के खजुराहो सांसद विष्णु दत्त शर्मा को भी मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने की संभावना जताई जा रही है.

शिवसेना को मिल सकता है अतिरिक्त प्रतिनिधित्व

महाराष्ट्र में एनडीए को मजबूती देने वाली शिवसेना को मंत्रिमंडल में अतिरिक्त प्रतिनिधित्व मिलने की चर्चा है. सांसद श्रीकांत शिंदे को कैबिनेट में जगह मिल सकती है. इसके अलावा प्रतापराव जाधव से स्वास्थ्य राज्य मंत्री का प्रभार वापस लिया जा सकता है, जबकि आयुष मंत्रालय उनके पास बना रह सकता है.

पंजाब के राजनीतिक समीकरणों पर नजर

पंजाब में बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच राघव चड्ढा और अशोक मित्तल में से किसी एक को मौका मिलने की चर्चा है. वहीं रवनीत सिंह बिट्टू की जगह भाजपा नेता तरुण चुघ को जिम्मेदारी मिलने की संभावना भी जताई जा रही है.

नीतीश कुमार खेमे को मिल सकता है प्रतिनिधित्व

सूत्रों के अनुसार, जेडीयू और नीतीश कुमार खेमे को भी कैबिनेट विस्तार में प्रतिनिधित्व मिल सकता है. कुछ चर्चाओं में स्वयं नीतीश कुमार के केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल होने की संभावना भी व्यक्त की जा रही है.

कई राज्य मंत्रियों की भी हो सकती है छुट्टी

सूत्रों के मुताबिक, आधा दर्जन से अधिक केंद्रीय राज्य मंत्रियों को भी मंत्रिमंडल से बाहर किया जा सकता है. इसके साथ ही कई मंत्रालयों के प्रभार में बदलाव की भी संभावना जताई जा रही है. हालांकि इन सभी चर्चाओं और अटकलों पर सरकार की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है. संभावित कैबिनेट फेरबदल को लेकर राजनीतिक हलकों में चर्चाएं लगातार तेज बनी हुई हैं.

 


जन्मदिन विशेष: छात्र राजनीति से उपमुख्यमंत्री तक, ऐसा रहा ब्रजेश पाठक का राजनीतिक सफर

पेशे से वकील रहे ब्रजेश पाठक ने 2000 के दशक की शुरुआत में सक्रिय राजनीति में कदम रखा. वर्ष 2004 में उन्होंने उन्नाव लोकसभा सीट से चुनाव जीतकर संसद में प्रवेश किया.

Last Modified:
Thursday, 25 June, 2026
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उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक का राजनीतिक जीवन संघर्ष, जनसंपर्क और प्रशासनिक अनुभव की एक लंबी यात्रा का प्रतीक रहा है. छात्र राजनीति से शुरुआत कर प्रदेश की सत्ता के शीर्ष पदों तक पहुंचने वाले ब्रजेश पाठक आज राज्य की राजनीति के प्रमुख चेहरों में गिने जाते हैं. आज ब्रजेश पाठक अपना 62वां जन्मदिन मना रहे हैं, तो आइए इस खास अवसर पर आज हम उनके राजनीतिक और प्रशासनिक सफर पर एक नजर डालते हैं.

छात्र राजनीति से हुई सार्वजनिक जीवन की शुरुआत

25 जून 1964 को उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले के मल्लावां में जन्मे ब्रजेश पाठक ने लखनऊ विश्वविद्यालय से कानून की पढ़ाई की. छात्र जीवन के दौरान ही उन्होंने राजनीति में सक्रिय भूमिका निभानी शुरू कर दी थी. वर्ष 1990 में वह लखनऊ विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष चुने गए, जिसने उनके सार्वजनिक जीवन की मजबूत नींव रखी.

वकालत से संसद तक का सफर

पेशे से वकील रहे ब्रजेश पाठक ने 2000 के दशक की शुरुआत में सक्रिय राजनीति में कदम रखा. वर्ष 2004 में उन्होंने उन्नाव लोकसभा सीट से चुनाव जीतकर संसद में प्रवेश किया. इसके बाद वर्ष 2008 से 2014 तक उन्होंने राज्यसभा में उत्तर प्रदेश का प्रतिनिधित्व किया.

राज्यसभा सदस्य के रूप में उन्होंने विधि, वित्त, विदेश मामलों, गृह मामलों और लोक शिकायतों से जुड़ी संसदीय समितियों में काम किया. इन जिम्मेदारियों ने उन्हें शासन और प्रशासन के विभिन्न पहलुओं को समझने का अवसर दिया.

राज्य राजनीति में वापसी और मंत्री पद की जिम्मेदारी

वर्ष 2017 में ब्रजेश पाठक ने राज्य राजनीति में सक्रिय वापसी की और लखनऊ मध्य विधानसभा सीट से विधायक चुने गए. इसके बाद उन्हें उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री बनाया गया. उन्होंने कानून एवं न्याय विभाग की जिम्मेदारी संभाली. बाद में उन्हें संसदीय कार्य और ग्रामीण अभियंत्रण विभाग का दायित्व भी सौंपा गया. इस दौरान उन्होंने प्रशासनिक और नीतिगत स्तर पर कई महत्वपूर्ण कार्यों का नेतृत्व किया.

उपमुख्यमंत्री के रूप में बढ़ी जिम्मेदारी

वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में ब्रजेश पाठक ने लखनऊ कैंट सीट से जीत दर्ज की. इसके बाद उन्हें उत्तर प्रदेश का उपमुख्यमंत्री बनाया गया. वर्तमान में वह चिकित्सा स्वास्थ्य, परिवार कल्याण और चिकित्सा शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं. राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने, मेडिकल शिक्षा के विस्तार और स्वास्थ्य ढांचे में सुधार को लेकर उनकी भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है.

स्वास्थ्य क्षेत्र में सुधार पर विशेष फोकस

हाल के वर्षों में ब्रजेश पाठक राज्य की स्वास्थ्य संबंधी योजनाओं और सुधारों के केंद्र में रहे हैं. उन्होंने अस्पतालों की व्यवस्थाओं, चिकित्सा शिक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने पर जोर दिया है. उन्होंने कई बार कहा है कि गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं प्रदेश के दूरदराज और पिछड़े क्षेत्रों तक पहुंचनी चाहिए. इसी दिशा में चिकित्सा सुविधाओं के विस्तार और सुधार के प्रयास लगातार किए जा रहे हैं.

जनता से संवाद उनकी पहचान

प्रशासनिक जिम्मेदारियों के अलावा ब्रजेश पाठक की पहचान एक ऐसे जनप्रतिनिधि के रूप में भी बनी है जो आम लोगों से लगातार संवाद बनाए रखते हैं. जन शिकायतों की सुनवाई, अधिकारियों के साथ समीक्षा बैठकें और लोगों से सीधे संपर्क उनकी कार्यशैली का अहम हिस्सा रहे हैं. हाल ही में लखनऊ में हुई भीषण आग की घटना में कई युवाओं की मौत के बाद उन्होंने अपना जन्मदिन नहीं मनाने का निर्णय लिया था. उन्होंने कहा था कि शोकाकुल परिवारों के बीच उत्सव मनाना उचित नहीं होगा. उनके इस फैसले को जनभावनाओं के प्रति संवेदनशीलता के रूप में देखा गया.

राजनीति और प्रशासन का लंबा अनुभव

छात्र राजनीति से लेकर संसद, विधानमंडल और उत्तर प्रदेश सरकार के शीर्ष पदों तक का ब्रजेश पाठक का सफर भारतीय राजनीति के कई चरणों का साक्षी रहा है. एक छात्र नेता, सांसद, मंत्री और उपमुख्यमंत्री के रूप में उनकी यात्रा लगातार चर्चा में रही है. उत्तर प्रदेश के विकास और प्रशासनिक प्राथमिकताओं के बीच उनकी भूमिका आने वाले समय में भी महत्वपूर्ण बनी रहने की संभावना है.
 


कांग्रेस ने अंबानी के करीबी परिमल नथवानी को राज्यसभा का तख्त सौंपा

जब राहुल गांधी "मोदी के दो दोस्त" का राग अलाप रहे हैं, उसी समय झारखंड में उनके अपने महागठबंधन ने मुकेश अंबानी के करीबी ग्रुप प्रेसिडेंट परिमल नथवानी को राज्यसभा की सीट थाली में परोस दी.

Last Modified:
Friday, 19 June, 2026
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पलक शाह 

परिमल नथवानी एक बार फिर राज्यसभा जा रहे हैं.

जो लोग नथवानी से परिचित नहीं हैं, उनके लिए संक्षिप्त परिचय: वह रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड में ग्रुप प्रेसिडेंट (कॉरपोरेट अफेयर्स) हैं. यानी मुकेश अंबानी की रिलायंस. वही मुकेश अंबानी, जिनके खिलाफ राहुल गांधी पिछले लगभग एक दशक से हर मंच, हर भाषा, हर राज्य और हर चुनाव में बोलते रहे हैं,  "मोदी के दो दोस्त: अडानी और अंबानी."

नथवानी किसी भी मायने में पारंपरिक राजनेता नहीं हैं, वह कॉरपोरेट दुनिया के उस सीनेटर जैसे व्यक्ति हैं, जिनकी उपयोगिता रिलायंस के लिए उन कमरों में मौजूद रहने में है जहां कानून बनाए जाते हैं. वह कई कार्यकालों से इस भूमिका में रहे हैं, पहले गुजरात से और अब झारखंड से. हमेशा निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में, हमेशा भाजपा के समर्थन के साथ, और इस व्यवस्था को लेकर शामिल सभी लोग भलीभांति जानते रहे हैं.

इसमें कुछ भी नया नहीं है.

जो नया है और जो 18 जून, 2026 को नथवानी की संसद में वापसी को अलग बनाता है, वह यह है कि उन्हें वहां पहुंचाने में किसने मदद की.

क्योंकि इस बार परिमल नथवानी कांग्रेस के बिना नहीं जीते, वे कांग्रेस की वजह से जीते.

अंबानी को कोसने के 10 साल, उन्हें चुनने की एक दोपहर

आइए, अभी जो हुआ है उसकी लगभग काव्यात्मक विडंबना को समझें.

राहुल गांधी ने 2019 के बाद अपनी राजनीतिक पहचान एक केंद्रीय तर्क पर बनाई है: कि नरेंद्र मोदी भारत को दो लोगों गौतम अडानी और मुकेश अंबानी के हित में चलाते हैं. उन्होंने यह बात संसद में कही. हजारों किलोमीटर लंबी भारत जोड़ो यात्राओं में कही. इंटरव्यू में, प्रेस कॉन्फ्रेंस में और सोशल मीडिया पोस्ट में कही, जिन्हें उनके समर्थक लगभग धार्मिक ग्रंथ की तरह साझा करते हैं.

चुनाव हार गए? अडानी, अंबानी.
बाजार ऊपर गया? अडानी, अंबानी.
लोकतंत्र कमजोर हुआ? अडानी, अंबानी.

"मोदी के दो दोस्त," वह गरजते हैं और भीड़ जवाब देती है, "अडानी और अंबानी."

सच कहें तो यह प्रभावी ब्रांडिंग है. यह जटिल सवालों को सरल बना देती है और आसानी से लोगों तक पहुंचती है. उन्होंने इसे संसद में, लंदन में, वाशिंगटन में और उन पत्रकारों के सामने दोहराया है जो इसे सत्ता से सच बोलना बताते हैं. एक ऐसे नेता के लिए जिनके अन्य राजनीतिक तर्क ज्यादा असरदार नहीं रहे, यह नारा बहुत लंबे समय तक चला.

जब तक आप यह न पढ़ लें कि नाथवानी को राज्यसभा किसने भेजा.

यही बात रांची में हुई घटना को असाधारण बनाती है.

18 जून को कांग्रेस के नेतृत्व वाले महागठबंधन, जिसका कांग्रेस हिस्सा है, जिसे संभालने के लिए कांग्रेस ने वरिष्ठ नेताओं को भेजा था और जो झारखंड सरकार चलाता है, मुकेश अंबानी के ग्रुप प्रेसिडेंट को राज्यसभा लौटने से रोक नहीं पाया. सिर्फ रोक नहीं पाया, बल्कि अनजाने में उनकी राह आसान भी कर दी.

दो अरबपतियों के खिलाफ दस साल तक लड़ने के बाद अंततः उनमें से एक के लिए संसदीय नियुक्ति एजेंसी की तरह काम करने की राजनीतिक प्रतिभा वास्तव में दुर्लभ होती है.

गणित हमेशा निर्मम था

इस चुनाव का गणित जटिल नहीं था. झारखंड विधानसभा में 81 सदस्य हैं. राज्यसभा सीट जीतने के लिए 28 प्रथम वरीयता वोट चाहिए थे.

महागठबंधन झामुमो, कांग्रेस, राजद और भाकपा (माले) का गठबंधन के पास 56 विधायक थे. ठीक 56. यानी दो उम्मीदवारों को जिताने के लिए बिल्कुल पर्याप्त संख्या. न 57. न 60. सिर्फ 56. 28 गुणा 2. एकदम सटीक.

एनडीए, भाजपा और उसके सहयोगियों के पास 24 विधायक थे. कोटे से चार कम.

इसके अलावा एक निर्दलीय विधायक भी थे: टाइगर मेहता. उनका नाम भले अंतरात्मा की आवाज पर वोट देने वाले व्यक्ति का आभास देता हो, लेकिन उनकी राजनीतिक प्रवृत्तियां नथवानी के पक्ष में झुकी हुई दिखती थीं.

तो समीकरण था: एनडीए 24 से अधिक टाइगर मेहता 1 = 25. फिर भी तीन वोट कम.

कागज पर नथवानी की हार तय लग रही थी. फिर उन्हें किसने बचाया? इसका जवाब कहीं न कहीं राहुल गांधी तक पहुंचता है.

कांग्रेस को सिर्फ एक दोपहर के लिए 56 लोगों को एकजुट रखना था.

झामुमो को पता था कि गणित तंग है. उन्होंने सार्वजनिक रूप से दावा किया कि उनके पास 61 वोट हैं. जबकि विधानसभा में उनके गठबंधन के पास 56 सदस्य ही थे. अगर यह सच होता तो पांच विधायक प्रेस कॉन्फ्रेंस और मतदान के बीच अचानक प्रकट हो गए होते.

बांध में रिसाव था और हर कोई उसकी आवाज सुन सकता था.

तीन वोट बाहर, बीस वोट अंदर. कांग्रेस का उम्मीदवार खत्म

छोटे गठबंधन सहयोगियों में असंतोष की एक खास किस्म होती है और झारखंड में राजद के चार विधायक कुछ समय से उसी में डूबे हुए थे.

सत्ता साझेदारी से नाराज. सम्मान को लेकर नाराज. अपने वोटों की उपयोगिता के बावजूद उपेक्षित महसूस करने से नाराज.

कांग्रेस यह जानती थी. कांग्रेस ने नेताओं को स्थिति संभालने भेजा था. बताया गया कि तेजस्वी यादव से भी अपने विधायकों को एकजुट रखने को कहा गया था.

लेकिन तीन विधायक साथ नहीं रहे.

महागठबंधन के भीतर से तीन वोट नथवानी को चले गए. उनके 25 वोटों के आधार में ये तीन वोट जुड़ गए और वह 28 के आंकड़े तक पहुंच गए. कुल 30 वोट पड़े, जिनमें दो अमान्य घोषित हुए. नथवानी पहली वरीयता के वोटों से सीधे जीत गए.

कांग्रेस के उम्मीदवार प्रणव झा को 20 वोट मिले. उन्हें 28 चाहिए थे. उन्हें 20 ही मिले.

56 विधायकों वाले गठबंधन में. उस राज्य में जहां कांग्रेस 2019 से सत्ता में साझेदार है. ऐसे चुनाव में जिसकी तैयारी के लिए महीनों का समय था.

झामुमो के बैद्यनाथ राम अपनी सीट जीत गए. गठबंधन का उम्मीदवार, जिसे झामुमो के 34 अनुशासित विधायकों का समर्थन मिला, आराम से जीत गया. हार केवल कांग्रेस के उम्मीदवार की हुई.

भाजपा ने यह सीट नहीं छीनी, कांग्रेस ने दरवाजा खुला छोड़ा

भाजपा ने क्या किया, इसका श्रेय उसे देना चाहिए. उसने नथवानी को भाजपा उम्मीदवार नहीं बनाया. वे निर्दलीय उम्मीदवार थे.

इसका मतलब यह था कि उनके पक्ष में वोट देने वाले विधायक यह कह सकते थे कि उन्होंने अंतरात्मा की आवाज पर वोट दिया, न कि "भाजपा के आदमी" को.

"निर्दलीय उम्मीदवार" एक ऐसा सौदा है जिसकी ज्यादा व्याख्या नहीं करनी पड़ती.

भाजपा ने कमजोरी पहचान ली, असंतुष्ट राजद विधायक. उसने अपनी रणनीति बनाई और बाकी काम कांग्रेस पर छोड़ दिया.

जिसे आप कभी चुनौती नहीं देते, वह दुश्मन नहीं होता. वह चुनावी बजट होता है

घटनाओं का एक ऐसा संस्करण भी है जिसमें कांग्रेस नेतृत्व के प्रति थोड़ी सहानुभूति महसूस की जा सकती है. गठबंधन प्रबंधन वास्तव में कठिन काम है. राजद के साथ संबंध पहले से ही तनावपूर्ण थे. भारत में छोटे सहयोगी दल अक्सर ऐसे ही होते हैं.

लेकिन यह तर्क उस नारे के सामने टिक नहीं पाता.

आप "अंबानी" को अपनी राजनीति का सबसे बड़ा खलनायक बनाकर फिर उसी व्यक्ति के करीबी को संसद पहुंचाने का कारण नहीं बन सकते. और फिर भी उसी नारे को जारी नहीं रख सकते.

भीड़ अब भी यह नारा लगाएगी. लेकिन उसका असर कम हो चुका है.

क्योंकि अब स्वाभाविक सवाल यह है: अगर भाई-भतीजावादी पूंजीवाद वास्तव में उतना बड़ा मुद्दा है जितना आप बताते हैं, और सत्ता में आने पर आप यही करते हैं, तो फिर आप वास्तव में क्या पेश कर रहे हैं?

रिलायंस का एक भी अनुबंध प्रभावित नहीं हुआ. कंपनी के खिलाफ एक भी नियामकीय फैसला नहीं गया. अंबानी के करीबी लगातार संसद में रहे और भाषण जारी रहे.

एक विचारधारा यह भी कहती है कि राहुल गांधी के लिए अरबपति खलनायक को स्थायी निशाने के रूप में बनाए रखना, उसे वास्तव में पराजित करने से अधिक राजनीतिक रूप से उपयोगी है.

इसलिए जिसे आप कभी वास्तव में चुनौती नहीं देते, वह दुश्मन नहीं होता. वह सिर्फ एक सहारा होता है.

मोदी के दो दोस्त. और तीसरा कभी-कभी कांग्रेस

सालों से नारा सरल रहा है.

"मोदी के दो दोस्त: अडानी और अंबानी."

लेकिन 18 जून को, जब परिमल नथवानी को तीन अतिरिक्त वोटों की जरूरत थी, तो वे वोट भाजपा से नहीं आए. भाजपा अपनी पूरी क्षमता के साथ 25 वोटों पर थी.

ये तीन वोट महागठबंधन के भीतर से आए. उस गठबंधन से जिसका नेतृत्व राहुल गांधी करते हैं. कांग्रेस के गठबंधन से.

शायद अब नारे में थोड़ा बदलाव चाहिए.

मोदी के दो दोस्त.
और तीसरा: कभी-कभी, कांग्रेस.

राहुल गांधी के नारे ने मदद की

परिमल नथवानी फिर संसद जा रहे हैं. मुकेश अंबानी का प्रतिनिधि दिल्ली में बना रहेगा और राहुल गांधी, जिन्होंने तीन महाद्वीपों में एक दशक तक कथित क्रोनी कैपिटलिज्म के खिलाफ भाषण दिए, अब हालिया संसदीय इतिहास में कॉरपोरेट हितों की सबसे प्रभावी सेवाओं में से एक की निगरानी करते नजर आते हैं.

अगली बार जब वह पूछेंगे कि मोदी के दोस्त कौन हैं, तो भीड़ हमेशा की तरह जवाब देगी.

लेकिन असली जवाब में शायद कोई और भी शामिल है.

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)