प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में, भारत न्याय, समानता और भाईचारे के संवैधानिक वादे को पूरा करने के लिए यह सुनिश्चित करते हुए तैयार है कि विकसित भारत का सपना एक वास्तविकता बने.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
1947 में, भारत को ब्रिटिशों ने धार्मिक आधार पर विभाजित किया, जिससे एक मुस्लिम बहुल देश पाकिस्तान का निर्माण हुआ, जबकि भारत, जिसे एक हिंदू राष्ट्र बनने की उम्मीद थी, उसे एक धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक देश घोषित किया गया. उस समय राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने लोगों से एकजुट रहने का आह्वान किया, लेकिन कई हिंदू निराश महसूस कर रहे थे, यह मानते हुए कि उनके अधिकारों की पर्याप्त सुरक्षा नहीं हो रही थी.
26 जनवरी, 1950 को भारत ने नया संविधान अपनाया, जो एक आधुनिक लोकतांत्रिक गणराज्य की नींव रखने वाला था. हालांकि, संविधान के निर्माताओं ने 1947 को भारत का जन्म नहीं माना; इसके बजाय उन्होंने देश की प्राचीन सभ्यता और समृद्ध धरोहर का सम्मान किया. उन्होंने भारत की हजारों साल पुरानी लोकतांत्रिक और सांस्कृतिक परंपराओं से प्रेरणा ली और इनका सार संविधान में समाहित किया, जो देश की शाश्वत धरोहर का प्रतिबिंब बन गया. अब जब हम स्वतंत्रता के 75 वर्षों का उत्सव मना रहे हैं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस यात्रा को एक असाधारण उपलब्धि के रूप में वर्णित किया. उन्होंने संविधान द्वारा पारित चुनौतियों और भारत के लोकतांत्रिक गणराज्य को बनाए रखने की क्षमता पर प्रारंभिक संदेहों को पार करने पर गर्व व्यक्त किया. नरेंद्र मोदी ने संविधान के निर्माताओं और भारत के लोगों के योगदान को स्वीकार करते हुए उनके प्रति हार्दिक आभार व्यक्त किया. उन्होंने यह जोर दिया कि असल में संविधान के मूल्यों को नागरिकों ने ही सही मायनों में बनाए रखा है. इसके सिद्धांतों को अपनाकर और हर चुनौती का सामना करते हुए, उन्होंने खुद को भारत की लोकतांत्रिक सफलता के असली आर्किटेक्ट साबित किया है. इसके लिए पीएम मोदी ने कहा कि भारत के नागरिकों को सर्वोच्च सम्मान मिलना चाहिए.
भारत के राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में संविधान पर बहस उतनी पुरानी है जितना कि यह दस्तावेज खुद. 1950 में इसकी शुरुआत के बाद से, भारतीय संविधान आशा, एकता और लोकतंत्र का प्रतीक बन गया. हालांकि, इस पवित्र दस्तावेज की यात्रा कई चुनौतियों से भरी रही है-जो अक्सर उन नेताओं द्वारा उत्पन्न की गईं हैं जिन्हें इसकी सुरक्षा का जिम्मा सौंपा गया था. इस बहस के केंद्र में दो दृष्टिकोणों के बीच एक स्पष्ट अंतर है: एक जो संविधान को राजनीतिक लाभ के लिए कमजोर करता है और दूसरा जो इसके पवित्रता का सम्मान करता है और इसे परिवर्तनकारी शासन के उपकरण के रूप में उपयोग करता है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 2014 से, संविधान को न केवल बनाए रखा गया है, बल्कि यह "विकसीत भारत 2047" की दिशा में भारत की यात्रा के लिए मार्गदर्शक प्रकाश बन गया है. मोदी सरकार का शासन संविधान के सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है, जो समानता, न्याय और लोकतंत्र के मूल्य हैं, और यह कांग्रेस पार्टी के संविधान के दुरुपयोग के इतिहास के विपरीत खड़ा है.
कांग्रेस और संविधान: विश्वासघात की विरासत
संविधान की 75वीं वर्षगांठ के दौरान लोकसभा में पीएम मोदी के हालिया संबोधन ने एक ऐतिहासिक सच्चाई सामने ला दी, जिसे अक्सर छुपाया जाता रहा है- कांग्रेस द्वारा संविधान के प्रति बार-बार की गई अवहेलना.
पहला संशोधन: संविधान के हेरफेर का उदाहरण
संविधान लागू होने के बमुश्किल एक साल बाद, जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने 1951 में पहला संविधान संशोधन पेश किया. इस संशोधन ने बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाए, जिससे नागरिक स्वतंत्रताओं को कुचलने का एक खतरनाक उदाहरण प्रस्तुत हुआ. संविधान विशेषज्ञों जैसे राजेंद्र प्रसाद और जेबी कृपलानी के विरोध के बावजूद, नेहरू की सरकार ने राजनीतिक सुविधा को संविधान की पवित्रता से ऊपर रखा.
आपातकाल: एक काला अध्याय
1975 में इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल को भारत के लोकतांत्रिक इतिहास का एक सबसे काला अध्याय माना जाता है. संविधान का इस्तेमाल असहमति को दबाने, स्वतंत्र अभिव्यक्ति को कुचलने और राजनीतिक विपक्षियों को बंदी बनाने के लिए किया गया. इस दौरान पारित 39वें संशोधन ने प्रमुख अधिकारियों, जिनमें प्रधानमंत्री भी शामिल थे, के चुनावों को न्यायिक जांच से बाहर कर दिया, जिससे शक्तियों के विभाजन को प्रभावी रूप से नष्ट कर दिया.
शाह बानो केस: वोट बैंक की वेदी पर न्याय की बलि
1985 में, कांग्रेस ने एक बार फिर शाह बानो मामले में संविधान के सिद्धांतों की उपेक्षा की. सुप्रीम कोर्ट का निर्णय, जिसमें एक तलाकशुदा मुस्लिम महिला को भत्ते का अधिकार दिया गया था, को राजीव गांधी की सरकार द्वारा विधायी हस्तक्षेप के माध्यम से पलट दिया गया, जिससे धार्मिक संप्रदायवाद को संतुष्ट करने के लिए न्याय की बलि दी गई. इन घटनाओं से यह स्पष्ट होता है कि कांग्रेस ने संविधान का इस्तेमाल एक राजनीतिक उपकरण के रूप में किया, न कि एक पवित्र दस्तावेज के रूप में जिसे शासन को मार्गदर्शन देने के लिए उपयोग किया जाए.
मोदी की संविधान प्रति प्रतिबद्धता: एक नया युग
इसके विपरीत, प्रधानमंत्री मोदी का शासन संविधान के सिद्धांतों पर आधारित रहा है, यह सुनिश्चित करते हुए कि इसकी भावना भारत के विकासात्मक लक्ष्यों के साथ मेल खाती है.
मार्जिनलाइज्ड वर्ग को सशक्त बनाना
मोदी सरकार के तहत किए गए सबसे महत्वपूर्ण संविधान संशोधनों में से एक था आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के लिए आरक्षण की शुरुआत, यह ऐतिहासिक कदम, जिसे 103वें संविधान संशोधन के माध्यम से लागू किया गया, जाति आधारित आरक्षण से आगे बढ़कर सामाजिक न्याय सुनिश्चित करता है, जो संविधान के समानता के सिद्धांत को साकार करता है.
एकता और अखंडता की बहाली
जम्मू और कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 और 35A का निरस्तीकरण मोदी सरकार की संविधान के प्रति प्रतिबद्धता का एक और प्रमाण है. कांग्रेस सरकार के दौरान बिना संसदीय स्वीकृति के लाए गए ये प्रावधान समानता के संविधानिक सिद्धांत के विपरीत थे. इन प्रावधानों की समाप्ति ने जम्मू और कश्मीर को मुख्यधारा में समाहित किया, जिससे एकता और राष्ट्रीय अखंडता को बढ़ावा मिला.
महिला आरक्षण: लिंग न्याय की ओर एक कदम
हाल ही में महिला आरक्षण विधेयक का पारित होना, जिसमें विधायिकाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित किया गया, मोदी सरकार की लिंग समानता के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है. यह प्रगतिशील कदम लंबित वादे को पूरा करता है और समावेशी लोकतंत्र के संविधानिक दृष्टिकोण को मजबूत करता है.
डॉ. अंबेडकर की धरोहर का सम्मान
प्रधानमंत्री मोदी का डॉ. बी. आर. अंबेडकर, संविधान के प्रमुख निर्माता के प्रति सम्मान उनकी पहलों में स्पष्ट है, जैसे अंबेडकर स्मारकों और संग्रहालयों का विकास। कांग्रेस के विपरीत, जिसने अंबेडकर के योगदान को पहचानने में देरी की, भाजपा ने उनके आदर्शों को अपनी शासन दर्शन का केंद्रीय तत्व बनाया है.
संविधान संशोधन: भाजपा बनाम कांग्रेस
प्रधानमंत्री मोदी ने सही ही कांग्रेस और भाजपा द्वारा लाए गए संविधान संशोधनों के बीच के अंतर को रेखांकित किया है. जहां कांग्रेस के संशोधन अक्सर राजनीतिक हितों से प्रेरित थे, जैसे आपातकाल के दौरान 25वें और 39वें संशोधन, वहीं भाजपा के संशोधन ऐतिहासिक गलतियों को सुधारने और विकास को बढ़ावा देने के उद्देश्य से किए गए हैं.
• कांग्रेस: छह दशकों में 75 बार संविधान में संशोधन किया, अक्सर वंशवादी हितों की सेवा करने या असहमति को दबाने के लिए.
• भाजपा: संविधान में संशोधन किया ताकि transformative नीतियाँ लागू की जा सकें, जैसे EWS आरक्षण, अनुच्छेद 370 का निरस्तीकरण और महिला आरक्षण.
विकसित भारत 2047: एक संविधानिक दृष्टिकोण
प्रधानमंत्री मोदी का 2047 तक विकसित भारत का सपना संविधान में गहरे तौर पर निहित है. सरकार की कल्याणकारी योजनाएं, जैसे आयुष्मान भारत, पीएम आवास योजना और डिजिटल इंडिया, संविधानिक सिद्धांतों जैसे न्याय और समानता से प्रेरित हैं. सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास, सबका प्रयास पर जोर देते हुए यह शासन का समावेशी दृष्टिकोण दिखाता है जो जाति, धर्म और क्षेत्र से परे है.
कांग्रेस का लोकतांत्रिक मूल्यों पर पाखंड
संविधान के आधार पर भाजपा की आलोचना कांग्रेस के अपने इतिहास के साथ तुलना करने पर खोखली लगती है.आपातकाल लगाने से लेकर आरक्षण नीतियों को कमजोर करने और वंशवादी राजनीति को प्राथमिकता देने तक, कांग्रेस ने संविधान के साथ बार-बार विश्वासघात किया है. दूसरी ओर, मोदी सरकार ने चुनौतीपूर्ण समय में भी लोकतांत्रिक मानदंडों का पालन किया, जैसे सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का सम्मान करना और स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराना.
निष्कर्ष: एक सम्मानित संविधान, एक परिवर्तित राष्ट्र
संविधान केवल एक दस्तावेज नहीं है; यह भारत के लोकतंत्र की आत्मा है, जहां कांग्रेस का इतिहास इस पवित्र ग्रंथ के साथ विश्वासघात से भरा हुआ है, वहीं प्रधानमंत्री मोदी इसके सच्चे संरक्षक के रूप में उभरे हैं. उनके शासन, जो संविधानिक मूल्यों पर आधारित है, भारत को एक उज्जवल और समावेशी भविष्य की ओर मार्गदर्शित कर रहा है.
जब हम 2047 में स्वतंत्रता की शताब्दी की ओर बढ़ रहे हैं, तो यह अत्यंत आवश्यक है कि हम ऐसे नेताओं को पहचानें और उनका समर्थन करें जो संविधान को अक्षरशः और भावना से बनाए रखते हैं. प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में, भारत न्याय, समानता और भ्रातृत्व के संवैधानिक वादे को पूरा करने के लिए तैयार है, जिससे एक विकसित भारत का सपना वास्तविकता बनेगा.
डिस्क्लेमर- इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के अपने विचार हैं और इसका प्रकाशन के विचारों से कोई संबंध नहीं है.
(अतिथि लेखक- डॉ. नरेश बंसल, राज्यसभा सांसद और भाजपा के राष्ट्रीय सह-कोषाध्यक्ष)
17 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 76 वर्ष के हो गए हैं. उनके जन्मदिन के मौके पर BJP देशभर में महीने भर चलने वाला ‘सेवा संकल्प अभियान’ शुरू करेगी.
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रितु राणा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 76वां जन्मदिन इस बार भारतीय जनता पार्टी (BJP) के लिए सिर्फ एक दिन का आयोजन नहीं है. 17 सितंबर से 17 अक्टूबर तक देशभर में ‘सेवा संकल्प अभियान’ चलाया जाएगा. BJP के मुताबिक अभियान के तहत रक्तदान शिविर, स्वास्थ्य शिविर, स्वच्छता अभियान, लाभार्थियों से संपर्क, पदयात्रा, बाइक रैली और जनभागीदारी से जुड़े कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे. पार्टी ने इसे प्रधानमंत्री मोदी के 25 साल के सार्वजनिक जीवन की यात्रा से भी जोड़ा है. 17 सितंबर को ‘सेवा दिवस’ के तौर पर कार्यक्रमों की शुरुआत होगी. BJP की ओर से लोगों से घरों में ‘आशीर्वाद का दिया’ जलाने की अपील भी की गई है. वहीं, पार्टी की योजना वडनगर और वाराणसी को जोड़ने वाली ‘सेवा संकल्प’ यात्राओं समेत कई कार्यक्रम आयोजित करने की है.
मोदी का जन्म 17 सितंबर 1950 को गुजरात के वडनगर में हुआ था. RSS के संगठनात्मक काम से शुरू हुआ उनका राजनीतिक सफर 2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री पद तक पहुंचा और 2014 में उन्होंने देश के प्रधानमंत्री के तौर पर राष्ट्रीय राजनीति में प्रवेश किया. 2019 में दूसरी बार और 2024 में तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने के साथ उनका राजनीतिक सफर भारतीय राजनीति के पिछले ढाई दशकों के एक महत्वपूर्ण दौर से जुड़ गया है.
वडनगर से RSS तक का सफर
नरेंद्र मोदी का जन्म गुजरात के मेहसाणा जिले के वडनगर में हुआ. शुरुआती जीवन के बाद वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े और संगठन के लिए काम किया. यहीं से उनके सार्वजनिक जीवन की शुरुआत हुई. RSS में लंबे समय तक संगठनात्मक जिम्मेदारियां निभाने के बाद उनका राजनीतिक सफर भारतीय जनता पार्टी के साथ आगे बढ़ा. BJP के संगठन में काम करते हुए उन्होंने गुजरात से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक पार्टी की गतिविधियों में भूमिका निभाई.
उनके राजनीतिक सफर की शुरुआती खासियत यह रही कि लंबे समय तक वे सीधे चुनावी राजनीति में रहने के बजाय संगठन के स्तर पर काम करते रहे. यही अनुभव आगे चलकर उनकी चुनावी राजनीति का आधार बना.
2001: गुजरात के मुख्यमंत्री बने
नरेंद्र मोदी के राजनीतिक करियर में सबसे बड़ा मोड़ 7 अक्टूबर 2001 को आया, जब उन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. वे अक्टूबर 2001 से मई 2014 तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहे. प्रधानमंत्री कार्यालय के अनुसार, यह गुजरात में किसी मुख्यमंत्री का सबसे लंबा कार्यकाल रहा है.
मुख्यमंत्री के तौर पर मोदी के कार्यकाल में गुजरात के औद्योगिक विकास, निवेश, बिजली, सड़क और बुनियादी ढांचे को प्रमुख मुद्दों के रूप में आगे रखा गया. इसी दौर में ‘गुजरात मॉडल’ राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बना.
समर्थकों ने गुजरात में निवेश और विकास को मोदी सरकार की उपलब्धियों से जोड़ा, जबकि आलोचकों ने राज्य में सामाजिक और मानव विकास से जुड़े सवाल उठाए. इस तरह गुजरात का उनका 13 साल का कार्यकाल आज भी उनके राजनीतिक सफर का अहम और बहस वाला अध्याय है.
2002 के दंगे और सबसे बड़ा राजनीतिक विवाद
मोदी के गुजरात कार्यकाल की चर्चा 2002 के सांप्रदायिक दंगों के बिना पूरी नहीं होती. फरवरी 2002 में गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस के एक कोच में आग लगने के बाद गुजरात के कई हिस्सों में हिंसा हुई. हिंसा में बड़ी संख्या में लोगों की मौत हुई और तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की भूमिका को लेकर लंबे समय तक राजनीतिक और कानूनी विवाद चलता रहा.
मामले की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में विशेष जांच दल यानी SIT गठित किया गया. 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने जकिया जाफरी की याचिका को खारिज करते हुए SIT की जांच और क्लोजर रिपोर्ट को बरकरार रखा. अदालत ने बड़े आपराधिक षड्यंत्र के आरोपों के समर्थन में पर्याप्त सामग्री नहीं पाए जाने की बात कही. इस मामले के बावजूद 2002 की हिंसा मोदी के राजनीतिक जीवन का ऐसा मुद्दा रहा जिस पर उनके समर्थकों और आलोचकों के बीच राजनीतिक मतभेद बने रहे.
गुजरात में लगातार चुनावी जीत
2002 के बाद गुजरात विधानसभा चुनाव में BJP ने सत्ता बरकरार रखी. इसके बाद 2007 और 2012 के विधानसभा चुनावों में भी BJP ने सरकार बनाई और नरेंद्र मोदी मुख्यमंत्री बने रहे. करीब 13 वर्षों तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहने के दौरान मोदी की राष्ट्रीय पहचान लगातार मजबूत हुई. निवेश सम्मेलन, औद्योगिक विकास, बुनियादी ढांचा और प्रशासनिक मॉडल उनके राजनीतिक प्रोफाइल के प्रमुख हिस्से बन गए.
2013 में BJP ने उन्हें 2014 लोकसभा चुनाव के लिए प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया. इसके साथ ही गुजरात के मुख्यमंत्री से राष्ट्रीय स्तर के नेता के रूप में उनकी भूमिका पूरी तरह बदल गई.
2014: गुजरात से दिल्ली तक
2014 का लोकसभा चुनाव नरेंद्र मोदी के राजनीतिक करियर का निर्णायक पड़ाव रहा. BJP ने 2014 में 282 लोकसभा सीटें जीतीं और अपने दम पर बहुमत हासिल किया. इसके बाद 26 मई 2014 को नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली. यहां से उनका राजनीतिक सफर राज्य की राजनीति से निकलकर पूरी तरह राष्ट्रीय राजनीति में बदल गया.
2014 के चुनाव अभियान में विकास, रोजगार, भ्रष्टाचार और मजबूत सरकार जैसे मुद्दे प्रमुख रहे. बड़े पैमाने पर चुनावी रैलियों और डिजिटल माध्यमों के इस्तेमाल ने भी इस चुनाव में मोदी की राजनीतिक संचार शैली को अलग पहचान दी.
पहले कार्यकाल में बड़े फैसले
प्रधानमंत्री के पहले कार्यकाल में कई बड़े आर्थिक और सामाजिक कार्यक्रम शुरू हुए. इनमें प्रधानमंत्री जनधन योजना, स्वच्छ भारत मिशन, मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया और प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना प्रमुख रहे.
2016 में नोटबंदी का फैसला लिया गया. 500 और 1,000 रुपये के पुराने नोटों को चलन से बाहर करने के फैसले को सरकार ने काले धन, नकली मुद्रा और आतंकवाद के वित्तपोषण पर रोक लगाने जैसे उद्देश्यों से जोड़ा. 2017 में GST लागू हुआ. इसका उद्देश्य देश में कई अप्रत्यक्ष करों को एक साझा कर व्यवस्था में लाना था.
2019: दूसरी बार प्रधानमंत्री
2019 के लोकसभा चुनाव में BJP ने 303 सीटें जीतीं और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एक बार फिर अपने दम पर बहुमत हासिल किया. इसके बाद मोदी ने दूसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली. प्रधानमंत्री कार्यालय के अनुसार, 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में BJP ने मोदी के नेतृत्व में पूर्ण बहुमत हासिल किया था. ([PM India][3])
दूसरे कार्यकाल की शुरुआत में ही सरकार ने जम्मू-कश्मीर से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों में बड़ा बदलाव किया. अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर को मिले विशेष प्रावधानों में बदलाव और राज्य के पुनर्गठन का फैसला हुआ. इसी कार्यकाल में नागरिकता संशोधन कानून, तीन तलाक कानून और अयोध्या में राम मंदिर निर्माण से जुड़े घटनाक्रम भी राष्ट्रीय राजनीति के प्रमुख मुद्दे बने.
अयोध्या से राम मंदिर तक
अयोध्या विवाद पर नवंबर 2019 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ हुआ. अगस्त 2020 में प्रधानमंत्री मोदी ने राम मंदिर निर्माण के लिए भूमि पूजन किया. जनवरी 2024 में अयोध्या में राम मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा हुई. यह घटना 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले BJP के राजनीतिक और सांस्कृतिक विमर्श में एक प्रमुख मुद्दा बनी.
कोविड महामारी का दौर
मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल की सबसे बड़ी चुनौतियों में कोरोना महामारी शामिल रही. मार्च 2020 में देशव्यापी लॉकडाउन लागू किया गया. इसके बाद आर्थिक गतिविधियों को धीरे-धीरे खोला गया. सरकार ने गरीबों, छोटे कारोबार और विभिन्न आर्थिक क्षेत्रों के लिए राहत उपायों की घोषणा की. इसके बाद भारत में बड़े पैमाने पर कोविड टीकाकरण अभियान चलाया गया. महामारी के दौरान लॉकडाउन, आर्थिक नुकसान, प्रवासी श्रमिकों की स्थिति और स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर सरकार की नीतियों पर व्यापक बहस हुई.
आत्मनिर्भर भारत और वैश्विक मंच पर भारत
महामारी के बाद ‘आत्मनिर्भर भारत’ सरकार के प्रमुख आर्थिक अभियानों में शामिल हुआ. विनिर्माण, इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा उत्पादन और सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों में घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया. इसी दौरान भारत की वैश्विक कूटनीतिक भूमिका पर भी सरकार ने जोर दिया. 2023 में भारत ने G20 की अध्यक्षता की और नई दिल्ली में G20 शिखर सम्मेलन आयोजित हुआ.
2024: तीसरी बार प्रधानमंत्री
2024 का लोकसभा चुनाव मोदी के राजनीतिक सफर का एक और अहम पड़ाव रहा. इस चुनाव में BJP को 240 सीटें मिलीं और वह अपने दम पर बहुमत के 272 के आंकड़े से नीचे रही. हालांकि BJP के नेतृत्व वाले NDA ने बहुमत हासिल किया और नरेंद्र मोदी ने 9 जून 2024 को लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली. इस तरह 2014 और 2019 में BJP के अकेले बहुमत वाली सरकार के बाद 2024 में केंद्र में NDA गठबंधन की भूमिका और महत्वपूर्ण हो गई. प्रधानमंत्री कार्यालय भी मोदी को जवाहरलाल नेहरू के बाद लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने वाले दूसरे व्यक्ति के रूप में दर्ज करता है.
मोदी की राजनीतिक संचार शैली
मोदी के राजनीतिक सफर में संगठन के साथ-साथ संचार शैली भी महत्वपूर्ण रही है. बड़ी जनसभाएं, सोशल मीडिया, डिजिटल प्लेटफॉर्म और ‘मन की बात’ जैसे माध्यमों के जरिए सीधे जनता से संवाद उनकी राजनीति का हिस्सा रहे हैं. उनके समर्थक इसे सीधे जनसंवाद की शैली मानते हैं, जबकि आलोचक प्रधानमंत्री-केंद्रित राजनीतिक संचार और सत्ता के केंद्रीकरण जैसे मुद्दे उठाते रहे हैं. इन दोनों दृष्टिकोणों ने मोदी के राजनीतिक विमर्श को आकार दिया है.
25 साल सरकार के मुखिया
मोदी के राजनीतिक जीवन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव अक्टूबर 2026 में आएगा. 7 अक्टूबर 2001 को गुजरात के मुख्यमंत्री बनने के बाद से वे लगातार किसी न किसी सरकार के प्रमुख रहे हैं. इस लिहाज से 7 अक्टूबर 2026 को सरकार के प्रमुख के रूप में उनके 25 वर्ष पूरे होंगे. इसी उपलब्धि को BJP ने इस साल के ‘सेवा संकल्प अभियान’ से जोड़ा है. अभियान 17 सितंबर से शुरू होकर 17 अक्टूबर तक चलाया जा रहा है. यानी इस बार जन्मदिन समारोह का दायरा सिर्फ 17 सितंबर तक सीमित नहीं रहेगा. BJP ने इसे एक महीने के देशव्यापी कार्यक्रम के रूप में तैयार किया है.
सेवा संकल्प अभियान में क्या-क्या होगा?
BJP के मुताबिक ‘सेवा संकल्प अभियान’ में देशभर में कई तरह की गतिविधियां आयोजित की जाएंगी. इनमें रक्तदान शिविर, स्वास्थ्य जांच और चिकित्सा शिविर, स्वच्छता अभियान, लाभार्थियों से संपर्क, जनजागरूकता कार्यक्रम, पदयात्रा और बाइक रैली शामिल हैं.
युवा, महिला सशक्तिकरण, स्टार्टअप, ‘लखपति दीदी’ और सरकार की विभिन्न योजनाओं से जुड़े कार्यक्रमों को भी अभियान में जगह दी गई है. BJP ने सांस्कृतिक विरासत से जुड़े मुद्दों को भी अभियान का हिस्सा बनाया है.
17 सितंबर को ‘आशीर्वाद का दिया’ जलाने की अपील भी की गई है. वहीं अलग-अलग राज्यों में अभियान के स्थानीय कार्यक्रमों की रूपरेखा अलग है. उदाहरण के तौर पर हरियाणा में 17 सितंबर से 17 अक्टूबर तक अभियान चलाने और विधानसभा क्षेत्रों में 30,000 ‘आशीर्वाद दीये’ जलाने की योजना बताई गई है.
वडनगर से वाराणसी तक
मोदी के जन्मस्थान वडनगर और उनके लोकसभा क्षेत्र वाराणसी को जोड़ते हुए ‘सेवा संकल्प’ बाइक यात्राओं की भी योजना बनाई गई है. रिपोर्टों के मुताबिक इन यात्राओं के जरिए पार्टी कार्यकर्ता विभिन्न क्षेत्रों में पहुंचकर सरकार की योजनाओं और मोदी के सार्वजनिक जीवन की यात्रा को लोगों तक पहुंचाएंगे. यह कार्यक्रम मोदी के राजनीतिक सफर के दो महत्वपूर्ण पड़ावों को जोड़ता है-वडनगर, जहां उनका जन्म हुआ, और वाराणसी, जहां से वे लोकसभा सांसद हैं.
76 साल की उम्र में मोदी के सामने तीसरा कार्यकाल
17 सितंबर 2026 को 76 वर्ष पूरे करने वाले नरेंद्र मोदी के सामने अब प्रधानमंत्री के रूप में तीसरा कार्यकाल है. 2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शुरू हुई उनकी सरकार के प्रमुख के रूप में यात्रा 2026 में 25 साल के पड़ाव तक पहुंच रही है. इस दौरान वे गुजरात की राजनीति से निकलकर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में पहुंचे, तीन लोकसभा चुनावों में BJP के नेतृत्व में सरकार बनाने में भूमिका निभाई और 2024 में गठबंधन सरकार के साथ तीसरी बार प्रधानमंत्री बने.
वडनगर के एक संगठनात्मक कार्यकर्ता से गुजरात के मुख्यमंत्री और फिर देश के प्रधानमंत्री तक पहुंचा यह सफर भारतीय राजनीति के पिछले करीब ढाई दशकों की कई महत्वपूर्ण घटनाओं से जुड़ा रहा है. 2026 का ‘सेवा संकल्प अभियान’ इसी लंबे सार्वजनिक जीवन को BJP द्वारा जनभागीदारी और सेवा गतिविधियों के जरिए रेखांकित करने की कोशिश है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन से मुलाकात की.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिश्केक में शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन के दौरान ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन से मुलाकात की. पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच दोनों नेताओं की यह बैठक बेहद अहम मानी जा रही है. दोनों नेताओं की यह बैठक SCO शिखर सम्मेलन से इतर हुई. यह मुलाकात ऐसे समय में हुई है, जब पश्चिम एशिया में तनाव बना हुआ है और क्षेत्रीय घटनाक्रम पर दुनियाभर की नजर है. हालांकि, मोदी और पेजेशकियन के बीच हुई बातचीत के एजेंडे और चर्चा के प्रमुख मुद्दों की विस्तृत जानकारी अभी सामने नहीं आई है. SCO शिखर सम्मेलन में क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों के अलावा सदस्य देशों के बीच सहयोग बढ़ाने पर भी चर्चा होनी है.
प्रधानमंत्री ने सोमवार को एक्स पर अपनी और ईरान के राष्ट्रपति की मुलाकात की फोटो शेयर करते हुए लिखा, 'उन्होंने बिश्केक में राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन से मुलाकात की. ईरान के साथ विभिन्न क्षेत्रों में भारत की लंबे समय से चली आ रही मित्रता को और मजबूत करने की हमारी प्रतिबद्धता दोहराई. आने वाले समय में हम अपने व्यापार के दायरे को बढ़ाने और उसमें विविधता लाने के इच्छुक हैं. हमने क्षेत्र में मौजूदा स्थिति पर चर्चा की. भारत स्थायी शांति सुनिश्चित करने के उद्देश्य से किए जा रहे सभी प्रयासों का समर्थन जारी रखेगा.'
Met President Masoud Pezeshkian in Bishkek. Reiterated our commitment to strengthening India’s long standing friendship with Iran across diverse sectors. We want to expand and diversify our trade basket in the times to come.
— Narendra Modi (@narendramodi) August 31, 2026
We had a discussion on the prevailing situation in… pic.twitter.com/qagQy5o108
मार्च में फोन पर हुई थी मोदी-पेजेशकियन की बातचीत
इस मुलाकात से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के बीच मार्च में फोन पर बातचीत हुई थी. उस दौरान पेजेशकियन ने प्रधानमंत्री मोदी को ईरान की स्थिति और क्षेत्र में चल रहे घटनाक्रम की जानकारी दी थी. बातचीत के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने भारत का रुख दोहराते हुए कहा था कि सभी मुद्दों का समाधान बातचीत और कूटनीति के जरिए किया जाना चाहिए. मोदी ने ईरान सहित पूरे क्षेत्र में रह रहे भारतीय नागरिकों की सुरक्षा पर भी जोर दिया था. इसके अलावा भारत ने ऊर्जा और सामान की आवाजाही को बिना किसी रुकावट के जारी रखने को महत्वपूर्ण बताया था.
युद्ध को लेकर पेजेशकियन ने क्या कहा?
SCO सम्मेलन में शामिल होने के लिए बिश्केक रवाना होने से पहले ईरानी राष्ट्रपति पेजेशकियन ने कहा था कि ईरान युद्ध नहीं चाहता है. हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अगर ईरान पर कोई हमला होता है तो उसका मजबूती से जवाब दिया जाएगा. पेजेशकियन ने कहा था कि क्षेत्र में अस्थिरता किसी भी देश के हित में नहीं है. उन्होंने आर्थिक और सुरक्षा से जुड़े लक्ष्यों को हासिल करने के लिए क्षेत्रीय देशों के बीच अधिक सहयोग की जरूरत पर जोर दिया. उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र के देशों का इतिहास और सभ्यता हजारों साल पुरानी है और ये देश लंबे समय से एक-दूसरे के संपर्क और सहयोग में रहे हैं.
पेजेशकियन ने SCO को बताया महत्वपूर्ण मंच
ईरानी राष्ट्रपति ने SCO सम्मेलन को भी काफी महत्वपूर्ण बताया. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पेजेशकियन ने कहा कि सम्मेलन में क्षेत्र के ज्यादातर नेता मौजूद रहेंगे और यह दुनिया में अलग-अलग और स्वतंत्र आवाजों की मौजूदगी का प्रतीक है. उन्होंने क्षेत्र में शांति और सुरक्षा बनाए रखने के साथ-साथ आर्थिक सहयोग को आगे बढ़ाने की जरूरत पर भी जोर दिया.
पुतिन से भी मिल सकते हैं पीएम मोदी
SCO शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कई देशों के नेताओं के साथ द्विपक्षीय बैठकें होने की उम्मीद है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, पीएम मोदी रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से भी मुलाकात कर सकते हैं. इसके अलावा किर्गिस्तान के राष्ट्रपति सदिर जापारोव के निमंत्रण पर प्रधानमंत्री मोदी छठे विश्व घुमंतू खेलों के उद्घाटन समारोह में भी शामिल हो सकते हैं.
नितिन नबीन की टीम में 8 राष्ट्रीय महामंत्रियों में शामिल स्मृति ईरानी, 2027 यूपी विधानसभा चुनाव से पहले अहम भूमिका में नजर आएंगी
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने स्मृति ईरानी को राष्ट्रीय महामंत्री बनाकर संगठन में उनकी दमदार वापसी कराई है. बीजेपी अध्यक्ष नितिन नबीन की टीम में आठ राष्ट्रीय महामंत्रियों में शामिल स्मृति ईरानी अब पार्टी के शीर्ष संगठनात्मक ढांचे का हिस्सा होंगी. 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले उनकी नियुक्ति को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है. चुनावी रणनीति, संगठन को मजबूत करने और पार्टी के संदेश को जमीनी स्तर तक पहुंचाने में उन्हें अहम जिम्मेदारी मिल सकती है.
दो दशक से ज्यादा का राजनीतिक अनुभव
स्मृति ईरानी ने 2003 में बीजेपी से अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत की थी. इसके बाद उन्होंने महाराष्ट्र बीजेपी की युवा इकाई में काम किया और संगठन में आगे बढ़ते हुए राष्ट्रीय महामंत्री बनीं. वह बीजेपी महिला मोर्चा की अध्यक्ष भी रह चुकी हैं. वर्ष 2011 में उन्हें राज्यसभा भेजा गया. करीब दो दशक से अधिक के राजनीतिक सफर में स्मृति ईरानी ने संगठन, संसद, सरकार और चुनावी राजनीति में अलग-अलग भूमिकाएं निभाई हैं.
अमेठी में राहुल गांधी को हराकर बनीं ‘जायंट किलर’
स्मृति ईरानी की राजनीतिक पहचान को सबसे बड़ी मजबूती अमेठी से मिली. 2014 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने कांग्रेस के गढ़ अमेठी से राहुल गांधी को चुनौती दी. हालांकि उस चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने अगले पांच वर्षों तक क्षेत्र में लगातार सक्रिय रहकर संगठन और मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत की. 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने राहुल गांधी को 55,120 वोटों के अंतर से हराकर बड़ा राजनीतिक उलटफेर किया. इस जीत के बाद उन्हें बीजेपी की ‘जायंट किलर’ के तौर पर पहचान मिली.
मोदी सरकार में संभालीं कई अहम जिम्मेदारियां
स्मृति ईरानी का केंद्रीय मंत्रिमंडल का अनुभव भी उनकी नई जिम्मेदारी में अहम भूमिका निभाएगा. उन्होंने मानव संसाधन विकास, कपड़ा, सूचना एवं प्रसारण, महिला एवं बाल विकास और अल्पसंख्यक मामलों जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय संभाले. मोदी सरकार में वह पार्टी और सरकार की प्रमुख एवं मुखर आवाजों में शामिल रहीं. संसद से लेकर पार्टी कार्यकर्ताओं और राष्ट्रीय मंचों तक उनकी प्रभावी संवाद क्षमता ने उन्हें बीजेपी के प्रमुख महिला नेताओं में स्थापित किया.
यूपी चुनाव से पहले नियुक्ति का खास महत्व
स्मृति ईरानी की नई जिम्मेदारी का महत्व उत्तर प्रदेश के संदर्भ में और बढ़ जाता है. 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी को ऐसे नेताओं की जरूरत है, जिनके पास राष्ट्रीय पहचान के साथ संगठनात्मक अनुभव और जमीनी राजनीति की समझ हो. अमेठी से उनका पुराना जुड़ाव, महिला मोर्चा की कमान संभालने का अनुभव और महिला एवं बाल विकास मंत्री के रूप में उनकी भूमिका उन्हें महिला मतदाताओं के बीच पार्टी का संदेश पहुंचाने के लिए महत्वपूर्ण चेहरा बनाती है.
संगठन में वापसी से बढ़ेगा राजनीतिक प्रभाव
राष्ट्रीय महामंत्री की भूमिका में स्मृति ईरानी से राजनीतिक संदेश को संगठन और जमीनी कार्यकर्ताओं तक पहुंचाने की अपेक्षा होगी. उनकी राष्ट्रीय लोकप्रियता और कार्यकर्ताओं से जुड़ने की क्षमता इस भूमिका में उनके लिए बड़ी ताकत साबित हो सकती है. यह नियुक्ति इस बात का भी संकेत है कि बीजेपी चुनावी राजनीति के साथ-साथ संगठन को मजबूत करने के लिए अपने अनुभवी नेताओं को फिर से सक्रिय भूमिका में ला रही है.
‘जायंट किलर’ से राष्ट्रीय संगठन की अहम जिम्मेदारी तक
स्मृति ईरानी का राजनीतिक सफर बीजेपी के संगठनात्मक मॉडल की एक मिसाल भी माना जा सकता है. पार्टी कार्यकर्ता के तौर पर शुरुआत करने से लेकर राष्ट्रीय स्तर की नेता, केंद्रीय मंत्री और अब राष्ट्रीय महामंत्री बनने तक उन्होंने कई महत्वपूर्ण पड़ाव तय किए हैं. नई जिम्मेदारी के साथ वह एक बार फिर पार्टी निर्माण और चुनावी रणनीति के केंद्र में लौट आई हैं. बीजेपी में उनकी यह वापसी ऐसे समय हुई है जब पार्टी 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव समेत आगामी राजनीतिक चुनौतियों के लिए संगठन को मजबूत करने में जुटी है.
नितिन नवीन ने की राष्ट्रीय पदाधिकारियों की नई टीम की घोषणा, 13 उपाध्यक्ष और 8 महासचिव शामिल
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने सोमवार को पार्टी की नई राष्ट्रीय टीम की घोषणा कर दी. नई टीम में कई बड़े और अनुभवी नेताओं को अहम संगठनात्मक जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं. पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी को राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया है, जबकि राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया और भाजपा के वरिष्ठ नेता राम माधव को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई है. नई राष्ट्रीय टीम में 13 राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और 8 राष्ट्रीय महासचिव शामिल हैं. पार्टी ने विभिन्न राज्यों और क्षेत्रों के नेताओं को जगह देकर संगठनात्मक और क्षेत्रीय संतुलन बनाने की कोशिश की है.
ये बने राष्ट्रीय उपाध्यक्ष
नई टीम में वसुंधरा राजे सिंधिया, तीरथ सिंह रावत, राम माधव, बैजयंत जय पांडा, डी. पुरंदेश्वरी, रेखा वर्मा, वर्षाबेन नरेंद्रभाई दोषी, डॉ. भारती प्रवीण पवार, मनप्रीत सिंह बादल, लाल सिंह आर्य, प्रो. एम. नागराजा, प्रो. तारिक मंसूर और डॉ. मधुचंद्र कर को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया है.
बीएल संतोष संगठन महासचिव, शिवप्रकाश को भी अहम जिम्मेदारी
बीएल संतोष राष्ट्रीय संगठन महासचिव के पद पर बने रहेंगे. वहीं शिवप्रकाश को राष्ट्रीय सह-संगठन महासचिव की जिम्मेदारी दी गई है.
स्मृति ईरानी को बड़ी जिम्मेदारी
स्मृति ईरानी को राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया है और उन्हें उत्तर प्रदेश का प्रभार भी सौंपा गया है. उनकी नियुक्ति को भाजपा की नई संगठनात्मक टीम में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है.
पीयूष गोयल बने कोषाध्यक्ष
केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल को भाजपा का राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष नियुक्त किया गया है. पार्टी ने इसके साथ विभिन्न मोर्चों और संगठनात्मक जिम्मेदारियों के लिए भी नई नियुक्तियां की हैं. भाजपा की नई राष्ट्रीय टीम को आगामी चुनावों और संगठन के विस्तार की रणनीति के लिहाज से अहम माना जा रहा है. पार्टी ने इस फेरबदल में अनुभवी नेताओं, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और नई पीढ़ी के नेतृत्व के बीच संतुलन साधने का प्रयास किया है.
भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने गुरुवार को अपने X प्रोफाइल का स्क्रीनशॉट साझा किया, जिसमें उनके बायो से 'नेशनल स्पोक्सपर्सन, BJP' हट चुका था.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय जनता पार्टी (BJP) के राष्ट्रीय प्रवक्ता शहजाद पूनावाला के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर प्रोफाइल बायो में बदलाव के बाद उनके पार्टी छोड़ने की अटकलें तेज हो गई हैं. पूनावाला ने अपने बायो से 'नेशनल स्पोक्सपर्सन, BJP' हटा दिया है, जिसके बाद सोशल मीडिया पर उनके इस्तीफे को लेकर चर्चाएं शुरू हो गईं. हालांकि, अब तक न तो BJP और न ही शहजाद पूनावाला की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक बयान जारी किया गया है.
बायो में किया ये बदलाव
नए बायो में उन्होंने लिखा है, "धर्म: इस्लाम, संस्कृति: हिंदू, विचारधारा: भारतीय, लेखक: GST की यात्रा, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आजीवन अनुयायी."
दिलचस्प बात यह है कि उनके इंस्टाग्राम प्रोफाइल पर अब भी उन्हें BJP का राष्ट्रीय प्रवक्ता बताया गया है. X पर भी पहले यही जानकारी दर्ज थी. इसके अलावा उन्होंने अपने कुछ पुराने इंटरव्यू के वीडियो भी दोबारा साझा किए हैं, जिनमें वे सक्रिय राजनीति छोड़ने पर विचार करने की बात करते नजर आते हैं.
हालांकि, इन बदलावों के बावजूद यह स्पष्ट नहीं है कि उन्होंने वास्तव में BJP या सक्रिय राजनीति से इस्तीफा दिया है. पार्टी और पूनावाला, दोनों की ओर से अब तक इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि या बयान सामने नहीं आया है.
कांग्रेस से BJP तक का सफर
पेशे से वकील और सामाजिक कार्यकर्ता शहजाद पूनावाला ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत कांग्रेस से की थी. वर्ष 2017 में कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव पर सवाल उठाने के बाद उन्होंने पार्टी छोड़ दी और बाद में BJP में शामिल हो गए. वर्ष 2021 में उन्हें दिल्ली BJP के सोशल मीडिया विभाग की जिम्मेदारी भी सौंपी गई. इसके बाद वे पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता बने और टीवी बहसों में BJP का पक्ष रखने वाले प्रमुख चेहरों में शामिल रहे.
फिलहाल, X बायो में बदलाव के आधार पर उनके इस्तीफे की चर्चा जरूर तेज है, लेकिन आधिकारिक पुष्टि होने तक इसे केवल अटकल के तौर पर ही देखा जा रहा है.
ट्रंप के अनुसार, इस समझौते के तहत हमास का निरस्त्रीकरण और इजरायली सैनिकों की गाजा से वापसी चरणबद्ध तरीके से होगी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि बोर्ड ऑफ पीस (Board of Peace) ने गाजा में हमास और अन्य सशस्त्र समूहों के पूर्ण निरस्त्रीकरण को लेकर समझौता कर लिया है. यह समझौता गाजा के लिए ट्रंप के व्यापक राजनीतिक और सुरक्षा ढांचे को लागू करने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है.
ट्रंप के अनुसार, इस समझौते के तहत हमास का निरस्त्रीकरण और इजरायली सैनिकों की गाजा से वापसी चरणबद्ध तरीके से होगी. इसके बाद एक अंतरराष्ट्रीय स्थिरीकरण बल (International Stabilization Force) और नई फिलिस्तीनी पुलिस बल सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालेंगे, जबकि एक फिलिस्तीनी प्रशासन गाजा के शासन का संचालन करेगा.
इजरायली सेना की वापसी होगी चरणों में
ट्रंप ने कहा कि यह व्यवस्था गाजा के लिए उनके 20-सूत्रीय शांति प्लान का हिस्सा है. इस योजना में सशस्त्र समूहों के निरस्त्रीकरण को इजरायली सेना की चरणबद्ध वापसी से जोड़ा गया है. उन्होंने इसे एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बताते हुए कहा, "यह एक ऐतिहासिक दिन है. हम युद्धविराम के बाद से जिस लक्ष्य की दिशा में काम कर रहे थे, यह उसकी ओर एक महत्वपूर्ण कदम है और मेरे 20-सूत्रीय प्लान को लागू करने की दिशा में बड़ी प्रगति है."
प्रस्तावित ढांचे के तहत जैसे-जैसे निरस्त्रीकरण की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी, वैसे-वैसे इजरायली सेना गाजा से पीछे हटेगी. अंतरराष्ट्रीय स्थिरीकरण बल नई फिलिस्तीनी पुलिस के साथ मिलकर काम करेगा और धीरे-धीरे सुरक्षा की जिम्मेदारी स्थानीय प्रशासन को सौंपी जाएगी.
ट्रंप ने कहा कि अंतिम लक्ष्य फिलिस्तीन के नेतृत्व वाली सरकार की स्थापना करना है, जो इजरायल की सुरक्षा चिंताओं को भी ध्यान में रखेगी. उन्होंने कहा, "गाजा का शासन एक नई फिलिस्तीनी सरकार के जरिए चलाया जाएगा, जो गाजा के लोगों की सेवा के लिए बोर्ड ऑफ पीस के साथ मिलकर काम करेगी."
मिस्र, कतर और तुर्किये की भूमिका की सराहना
अमेरिकी राष्ट्रपति ने वार्ता में भूमिका निभाने के लिए मिस्र, कतर और तुर्किये का धन्यवाद किया. उन्होंने अपने प्रशासन के अधिकारियों की भी सराहना की, जो इस प्रक्रिया में शामिल रहे.
ट्रंप ने कहा कि एक साल पहले की स्थिति की तुलना में काफी प्रगति हुई है, जब गाजा में युद्ध जारी था, बंधक कैद में थे और मानवीय संकट गहरा रहा था. हालांकि, उन्होंने यह भी माना कि अभी कई महत्वपूर्ण काम बाकी हैं. उन्होंने कहा, "हम एक साल पहले की स्थिति से काफी आगे आ चुके हैं, लेकिन अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है."
समझौते के क्रियान्वयन पर कई सवाल बाकी
हालांकि, इस घोषणा के बाद भी कई अहम मुद्दों का समाधान होना बाकी है. इनमें निरस्त्रीकरण की समयसीमा, इजरायली सेना की वापसी का कार्यक्रम, हथियारों के समर्पण की पुष्टि और सुरक्षा जिम्मेदारियों के हस्तांतरण की प्रक्रिया शामिल हैं.
2025 में संयुक्त राष्ट्र ने दी थी गाजा ढांचे को मंजूरी
यह घोषणा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा 17 नवंबर 2025 को प्रस्ताव 2803 पारित किए जाने के बाद आई है. इस प्रस्ताव में गाजा संघर्ष को समाप्त करने के लिए ट्रंप की व्यापक योजना का समर्थन किया गया था. इस प्रस्ताव को 13 देशों का समर्थन मिला था, जबकि चीन और रूस ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया था.
प्रस्ताव में बोर्ड ऑफ पीस को अंतरिम प्रशासन के रूप में मान्यता दी गई थी और गाजा में अस्थायी अंतरराष्ट्रीय स्थिरीकरण बल की तैनाती को मंजूरी दी गई थी. इसके तहत संक्रमण काल के दौरान रोजमर्रा के नागरिक प्रशासन के लिए एक फिलिस्तीनी तकनीकी समिति बनाने का भी प्रावधान किया गया था.
जनवरी 2026 में इस ढांचे को और आगे बढ़ाया गया, जब अली शआथ (Ali Sha’ath) को गाजा प्रशासन के लिए राष्ट्रीय समिति का प्रमुख नियुक्त किया गया और मेजर जनरल जैस्पर जेफर्स को अंतरराष्ट्रीय स्थिरीकरण बल का कमांडर बनाया गया.
हमास के हथियार बने सबसे बड़ी चुनौती
प्रशासनिक ढांचे में प्रगति के बावजूद हमास के हथियारों का भविष्य इस योजना को लागू करने में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक बना हुआ था.
बोर्ड ऑफ पीस की मई में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को दी गई रिपोर्ट में हथियारों के सत्यापित निष्क्रियकरण और हमास से नियंत्रण हस्तांतरण को प्रमुख लंबित मुद्दों के रूप में बताया गया था.
रॉयटर्स के अनुसार, मार्च में बोर्ड ऑफ पीस ने हमास को लिखित निरस्त्रीकरण प्रस्ताव दिया था. यह प्रस्ताव युद्ध के बाद की सुरक्षा व्यवस्था और गाजा में सत्ता हस्तांतरण को लेकर चल रही बातचीत का हिस्सा था.
ट्रंप की ताजा घोषणा इस योजना के सबसे विवादित हिस्सों में से एक पर प्रगति का संकेत देती है. हालांकि, इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि निरस्त्रीकरण, इजरायली सेना की वापसी और गाजा में सुरक्षा व प्रशासनिक जिम्मेदारियों के हस्तांतरण की प्रक्रिया किस तरह आगे बढ़ती है.
प्रधानमंत्री ने कहा कि सरकार लंबे समय से परीक्षा प्रणाली में सुधार, तकनीक के बेहतर इस्तेमाल और मजबूत कानूनी प्रावधानों के जरिए पारदर्शी एवं प्रभावी व्यवस्था बनाने पर काम कर रही है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद से पारित संशोधित एंटी-पेपर लीक विधेयक का स्वागत करते हुए इसे देश की परीक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने की दिशा में बड़ा कदम बताया है. उन्होंने कहा कि सरकार छात्रों के भविष्य की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है और पेपर लीक माफियाओं व संगठित गिरोहों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी. प्रधानमंत्री ने कहा कि नई व्यवस्था से सार्वजनिक परीक्षाएं अधिक पारदर्शी, निष्पक्ष और भरोसेमंद बनेंगी.
प्रधानमंत्री ने कहा कि सरकार लंबे समय से परीक्षा प्रणाली में सुधार, तकनीक के बेहतर इस्तेमाल और मजबूत कानूनी प्रावधानों के जरिए पारदर्शी एवं प्रभावी व्यवस्था बनाने पर काम कर रही है. उन्होंने बताया कि परीक्षा प्रक्रिया को सुरक्षित बनाने के लिए बेहतर सिस्टम, फास्ट-ट्रैक व्यवस्था और राज्यों के साथ लगातार विचार-विमर्श किया गया है.
पेपर लीक पर और सख्त होगी सजा
संशोधित विधेयक को गुरुवार को राज्यसभा ने ध्वनिमत से पारित किया, जबकि लोकसभा इसे एक दिन पहले मंजूरी दे चुकी थी. यह संशोधन सार्वजनिक परीक्षाओं में पेपर लीक और अन्य अनुचित गतिविधियों पर लगाम लगाने के लिए मौजूदा कानून को और मजबूत बनाता है.
यह कानून संघ लोक सेवा आयोग (UPSC), कर्मचारी चयन आयोग (SSC), रेलवे भर्ती बोर्ड (RRB), इंस्टीट्यूट ऑफ बैंकिंग पर्सोनल सेलेक्शन (IBPS) और राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) जैसी संस्थाओं द्वारा आयोजित सार्वजनिक परीक्षाओं पर लागू होगा.
10 साल तक की जेल और 50 लाख रुपये तक जुर्माना
संशोधित कानून के तहत सार्वजनिक परीक्षाओं में पेपर लीक या अनुचित साधनों का दोषी पाए जाने पर पांच से 10 वर्ष तक की जेल और 50 लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान किया गया है. वहीं, संगठित अपराध या पेपर लीक गिरोहों के मामलों में कम से कम सात वर्ष की सजा और न्यूनतम 10 करोड़ रुपये के जुर्माने का प्रावधान रखा गया है.
'पेपर माफियाओं को नहीं बख्शा जाएगा'
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि पेपर लीक कई वर्षों से देश के लिए गंभीर चुनौती रहा है, जिससे केंद्र और राज्यों की विभिन्न परीक्षाएं प्रभावित हुई हैं और लाखों युवाओं के भविष्य पर असर पड़ा है. उन्होंने कहा कि सरकार ने इस समस्या से निपटने के लिए विशेष टास्क फोर्स का गठन, फास्ट-ट्रैक तंत्र और राज्यों से सुझाव लेने जैसे कई कदम उठाए हैं. प्रधानमंत्री ने कहा, "पेपर माफिया और पेपर लीक में शामिल गिरोह, जो देश के बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ करते हैं, उन्हें किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा."
परीक्षा प्रणाली को और पारदर्शी बनाने की कोशिश
सरकार का मानना है कि संशोधित कानून से सार्वजनिक परीक्षाओं में पारदर्शिता, निष्पक्षता और विश्वसनीयता बढ़ेगी. हाल के वर्षों में विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं और भर्ती प्रक्रियाओं में पेपर लीक की घटनाओं के बाद परीक्षा प्रणाली को और मजबूत बनाने की मांग लगातार उठ रही थी. नए संशोधन को इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है.
केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने 27 जुलाई को यह संशोधन विधेयक लोकसभा में पेश किया था. यह कदम देश में प्रतियोगी परीक्षाओं में गड़बड़ी और पेपर लीक को लेकर बढ़ी चिंताओं के बीच उठाया गया है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
परीक्षाओं में होने वाली गड़बड़ियों और पेपर लीक पर सख्ती बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है. लोकसभा ने बुधवार को लोक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026 को मंजूरी दे दी. नए प्रावधानों के तहत पेपर लीक और परीक्षा में अनुचित साधनों के इस्तेमाल के दोषियों को अधिकतम 10 साल तक की सजा और 50 लाख रुपये तक के जुर्माने का सामना करना पड़ सकता है.
पेपर लीक मामलों में कड़ी सजा का प्रावधान
लोकसभा ने बुधवार को लोक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026 को पारित कर दिया. यह विधेयक परीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ाने और पेपर लीक जैसी घटनाओं पर रोक लगाने के उद्देश्य से लाया गया है. विपक्ष के विरोध और नारेबाजी के बीच यह बिल सदन से पास हुआ.
केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने 27 जुलाई को यह संशोधन विधेयक लोकसभा में पेश किया था. यह कदम देश में प्रतियोगी परीक्षाओं में गड़बड़ी और पेपर लीक को लेकर बढ़ी चिंताओं के बीच उठाया गया है.
NEET पेपर लीक मामले में 52 FIR दर्ज
विधेयक पर चर्चा के दौरान केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने कहा कि सरकार ने NEET पेपर लीक मामले में तेजी से कार्रवाई की है. उन्होंने बताया कि साल 2024 में पेपर लीक विरोधी कानून लागू होने के बाद से अब तक 52 FIR दर्ज की जा चुकी हैं.
उन्होंने कहा कि संशोधन विधेयक सरकार के अनुभवों से सीखने और परीक्षा व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में उठाया गया कदम है. उन्होंने यह भी दावा किया कि पिछले कुछ वर्षों में पेपर लीक से जुड़े मामलों के कारण होने वाली आत्महत्याओं की संख्या में कमी आई है.
विपक्ष पर जितेंद्र सिंह का हमला
लोकसभा में बोलते हुए जितेंद्र सिंह ने विपक्ष के नेता राहुल गांधी पर भी निशाना साधा. उन्होंने कहा कि उन्हें संसदीय नियमों और सरकार के कामकाज की पूरी जानकारी नहीं है. बिल पारित होने के बाद लोकसभा की कार्यवाही दिनभर के लिए स्थगित कर दी गई.
राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद जोशी को उनके मौजूदा मंत्रालयों के साथ शिक्षा मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद केंद्र सरकार ने वरिष्ठ भाजपा नेता प्रल्हाद जोशी को केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी है. राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद जोशी को उनके मौजूदा मंत्रालयों के साथ शिक्षा मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है. ऐसे में आइए जानते हैं कि नए शिक्षा मंत्री प्रल्हाद जोशी कौन हैं और उनका राजनीतिक सफर कैसा रहा है.
पांच बार के सांसद, संगठन से सरकार तक मजबूत पकड़
प्रल्हाद जोशी भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेताओं में शामिल हैं और कर्नाटक के धारवाड़ लोकसभा क्षेत्र का लगातार पांच बार प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. उन्होंने पहली बार 2004 में लोकसभा चुनाव जीता था. इसके बाद 2009, 2014, 2019 और 2024 में भी लगातार जीत दर्ज कर संसद पहुंचे. पार्टी संगठन और संसदीय राजनीति, दोनों में उनकी मजबूत पकड़ मानी जाती है.
कर्नाटक से हुई राजनीतिक शुरुआत
जोशी का राजनीतिक सफर कर्नाटक से शुरू हुआ. 1990 के दशक में हुबली के ईदगाह मैदान विवाद के दौरान हुए आंदोलनों में उनकी सक्रिय भूमिका ने उन्हें राज्य की राजनीति में पहचान दिलाई. इसके बाद उन्होंने संगठन में लगातार काम किया और भाजपा के प्रमुख नेताओं में शामिल हो गए.
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष भी रह चुके हैं
प्रल्हाद जोशी ने 2012 से 2016 तक भाजपा की कर्नाटक इकाई के अध्यक्ष के रूप में भी जिम्मेदारी निभाई. उनके कार्यकाल में पार्टी ने राज्य में अपने संगठन को मजबूत किया और चुनावी रणनीति को नई दिशा दी.
मोदी सरकार में संभाले कई अहम मंत्रालय
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भरोसेमंद सहयोगियों में गिने जाने वाले प्रल्हाद जोशी केंद्र सरकार में कई महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं. उन्होंने संसदीय कार्य मंत्री, कोयला एवं खनन मंत्री के रूप में काम किया है. वर्तमान में उनके पास उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय और नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय की जिम्मेदारी भी है.
अब शिक्षा मंत्रालय की बड़ी चुनौती
जोशी ने ऐसे समय में शिक्षा मंत्रालय का कार्यभार संभाला है, जब नीट पेपर लीक विवाद के बाद परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता और राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठे हैं. उनके सामने परीक्षा व्यवस्था में छात्रों का भरोसा बहाल करने, सुधारों को लागू करने और शिक्षा क्षेत्र से जुड़े दीर्घकालिक मुद्दों के समाधान की बड़ी चुनौती होगी.
उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर एक लंबा पत्र साझा करते हुए बताया कि उन्होंने अपना इस्तीफा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भेज दिया है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
नीट पेपर लीक विवाद और छात्रों के लगातार विरोध-प्रदर्शन के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने अपने पद से इस्तीफा देने की घोषणा कर दी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस्तीफा भेजने की जानकारी खुद सोशल मीडिया पर साझा करते हुए प्रधान ने बड़ा राजनीतिक संकेत दिया. यदि उनका इस्तीफा स्वीकार होता है, तो वह मोदी सरकार के 12 साल के कार्यकाल में इस्तीफा देने वाले दूसरे केंद्रीय मंत्री होंगे. इस घटनाक्रम को छात्रों के आंदोलन और बढ़ते जनदबाव की बड़ी जीत के तौर पर देखा जा रहा है.
— Dharmendra Pradhan (@dpradhanbjp) July 25, 2026
धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा ऐसे समय आया है जब नीट पेपर लीक मामले को लेकर देशभर में छात्रों का विरोध प्रदर्शन लगातार तेज हो रहा है. इसे मोदी सरकार के कार्यकाल में दूसरा ऐसा मौका माना जा रहा है, जब किसी बड़े जनआंदोलन और सामाजिक दबाव के बाद किसी केंद्रीय मंत्री को पद छोड़ना पड़ा है.
पहले भी जनदबाव में बदले हैं सरकार के फैसले
मोदी सरकार के पिछले 12 वर्षों में कुछ ऐसे अवसर भी आए हैं, जब व्यापक विरोध के बाद सरकार को अपने फैसलों में बदलाव करना पड़ा. वर्ष 2015 में भूमि अधिग्रहण संशोधन विधेयक विपक्ष और आरएसएस से जुड़े संगठनों के विरोध के चलते वापस लेना पड़ा था. वहीं, नवंबर 2021 में एक साल से अधिक चले किसान आंदोलन के बाद केंद्र सरकार ने तीनों कृषि कानूनों को भी वापस ले लिया था.
इसके अलावा नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ हुए व्यापक विरोध प्रदर्शनों के बाद भी सरकार ने लंबे समय तक इसके नियम लागू नहीं किए थे. हालांकि, विवादों में घिरे मंत्रियों को आमतौर पर तत्काल हटाने के बजाय मंत्रिमंडल विस्तार या फेरबदल के दौरान हटाया जाता रहा है.
नीट आंदोलन ने बढ़ाया सरकार पर दबाव
नीट परीक्षा में कथित गड़बड़ी और पेपर लीक के खिलाफ 20 जुलाई से छात्रों का आंदोलन लगातार तेज हुआ. 'संसद चलो' मार्च के दौरान भारी भीड़ उमड़ी, जिसके बाद पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) ने लाठीचार्ज और आंसू गैस का इस्तेमाल किया. इस कार्रवाई की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद सरकार की व्यापक आलोचना हुई.
बढ़ते दबाव के बीच शिक्षा मंत्रालय में प्रशासनिक फेरबदल किए गए और राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) के 47 अधिकारियों को हटाया गया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी सोशल मीडिया के जरिए युवाओं से संवाद किया और पेपर लीक मामलों के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट तथा सख्त कानून का भरोसा दिया. केंद्रीय कैबिनेट ने भी पेपर लीक से जुड़े कानून में संशोधन को मंजूरी दे दी है, जिसे जल्द संसद में पेश किया जाएगा.
प्रदर्शनकारियों की बाकी मांगें अब भी कायम
सरकार की ओर से केंद्रीय मंत्री जे.पी. नड्डा और जितेंद्र सिंह प्रदर्शनकारियों के प्रतिनिधियों से बातचीत कर रहे हैं. हालांकि, आंदोलनकारी संगठनों का कहना है कि उनकी चार प्रमुख मांगों में से अभी केवल एक ही पूरी हुई है. उनका कहना है कि जब तक नीट पेपर लीक से प्रभावित परिवारों को 1 करोड़ रुपये का मुआवजा, प्रदर्शनकारी छात्रों पर दर्ज मामलों की वापसी और पुलिस कार्रवाई पर सार्वजनिक माफी जैसी मांगें पूरी नहीं होतीं, तब तक आंदोलन जारी रहेगा.