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मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता: संयम से नेतृत्व, संकल्प से सफलता की मिसाल

यह लेख एक ऐसी मुख्यमंत्री के जन्मदिन का स्मरण है, जिनकी यात्रा छात्रावासों से राज्य के गलियारों तक आज भी मौन शक्ति और निष्ठावान सेवा की प्रेरणा देती है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

हरियाणा के जुलाना की धूल और गर्मी में, जहाँ अक्सर सपने जिम्मेदारियों में दबकर खो जाते हैं, वहां 19 जुलाई 1974 को एक ऐसी लड़की का जन्म हुआ, जो आगे चलकर राजधानी की सियासत की दिशा बदलने का हुनर रखती है. 

रेखा गुप्ता की राजनीतिक यात्रा न तो टीवी स्टूडियो से शुरू हुई, न ही किसी ऊँचे मंच से, यह यात्रा शुरू हुई चुपचाप कक्षाओं की चर्चाओं, छात्र बैठकों, हाथ से लिखे पोस्टरों और कैंपस मार्चों से, उस समय विश्वास भी तीखा था और आदर्शवाद मजाक नहीं, एक प्रेरणा हुआ करता था.

दिल्ली ने भले ही उन्हें मुकुट पहनाया हो, लेकिन उनकी जड़ें हरियाणा की धरती में गहराई तक थीं. साधारण परिवार की बेटी, वह अपने साथ एक अडिग पहचान लेकर आईं. पहले सुनना, फिर बोलना. पहले मेहनत करना, फिर अपेक्षा रखना, शायद यही गुण उनके राजनीतिक जीवन की हर सीढ़ी पर झलकता रहा है.

रेखा गुप्ता ने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत सुर्खियों से नहीं, बल्कि पर्चों से की. 1990 के दशक की शुरुआत में, दौलत राम कॉलेज की छात्रा के रूप में उन्होंने ABVP से जुड़ाव किया. जब बाकी छात्र कक्षा में अपनी जगह ढूंढ रहे थे, वह दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रांगण में अपनी आवाज़ तलाश रही थीं और वह आवाज साफ सुनाई दी.

1995 तक वह दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ (DUSU) की महासचिव बनीं, और अगले वर्ष अध्यक्ष. वह महज दिखावे के लिए उग्र नहीं थीं, उनका नेतृत्व सोच-समझ से भरा था, सहनशील था और लोगों को प्राथमिकता देने वाला था. उस दौर में जब छात्र राजनीति संसद की शोरगुल की नकल बन चुकी थी, उन्होंने उस अफरातफरी में स्पष्टता लाई, लेकिन यह सिर्फ एक कॉलेज का अध्याय नहीं था, यह नींव की ईंटें रखने का समय था, और उन्होंने हर ईंट सोच-समझ कर रखी.

स्थानीय राजनीति में उनकी एंट्री भी उतनी ही सोच-समझ कर थी. उत्तर दिल्ली से दो बार पार्षद चुनी गईं, और बाद में NDMC की शिक्षा समिति की अध्यक्ष बनीं. शिक्षा उनके लिए सिर्फ एक विभाग नहीं, एक मिशन था. बुनियादी ढांचा, पहुंच, सम्मान-इन सबको उन्होंने नीतियों में पिरोया, न कि किसी बड़े एलान से, बल्कि शासन की सतत और सधी हुई मेहनत से.
बहुतों के लिए यह एक शिखर होता. लेकिन रेखा गुप्ता ने कभी शिखर की चाह नहीं रखी, उन्होंने हमेशा जिम्मेदारियों को अपनाया.

2025 के दिल्ली विधानसभा चुनाव उस शहर में आए जो वादों से ऊब चुका था और दिखावटी शासन से थक चुका था और शालीमार बाग विधानसभा क्षेत्र से वह सामने आईं, सिर्फ एक उम्मीदवार के रूप में नहीं, बल्कि एक उम्मीद के रूप में उन्होंने अपने आम आदमी पार्टी के प्रतिद्वंद्वी को लगभग 30,000 वोटों के भारी अंतर से हराया. लेकिन असली क्षण कुछ दिन बाद आया: जब उनकी पार्टी, भाजपा, ने उन्हें सर्वसम्मति से दो दशकों में दिल्ली की पहली महिला मुख्यमंत्री चुना. वह पहली बार की विधायक थीं, हाँ. लेकिन अनुभवहीन नहीं.

एक ऐसे राजनीतिक माहौल में, जहाँ शोर को अक्सर नेतृत्व समझ लिया जाता है, रेखा गुप्ता का मुख्यमंत्री बनना एक ताजगी भरा, मेहनत से अर्जित क्षण जैसा लगा. वह किसी गड़गड़ाहट के साथ नहीं आईं. वह जैसे सुबह आती है शांत, निश्चित और स्थिर वैसे आईं.

तब से उनका शासन का तरीका भी उसी लहजे की निरंतरता है. उनकी प्रमुख पहल, “मुख्यमंत्री जन सेवा सदन,” दिखावे के लिए नहीं बनाई गई है. यह जवाबदेही के लिए बनी है. हर हफ्ते वह बैठती हैं ऐलान करने नहीं, सुनने के लिए नागरिकों की, स्थानीय संस्थाओं की, उन असली समस्याओं की जिन्हें असली ध्यान चाहिए. यह आधुनिक राजनीति में एक दुर्लभ क्षण है: एक नेता जो टीआरपी के लिए नहीं, गवाहियों के लिए समय निकालती है.

उन्होंने महिलाओं के सशक्तिकरण की भी लगातार वकालत की है नारों से नहीं, मंचों से उन्होंने खुले रूप से परिवारों, समाज और राज्य की भूमिका पर बात की है कि ये सब मिलकर महिलाओं को समर्थन दें. “समाज को अपनी बेटियों के साथ खड़ा होना चाहिए,” उन्होंने एक सार्वजनिक मंच पर कहा था और यह कोई नारा नहीं था, यह एक स्मरण था.

लेकिन शायद रेखा गुप्ता की सबसे बड़ी ताकत यह है कि ऊँचाई तक पहुँचने के बाद भी उन्होंने अपनी जड़ों से नाता नहीं तोड़ा. अपने 51वें जन्मदिन पर कोई भव्य मंच नहीं था, न चमचमाता केक. वह अपने पैतृक गांव लौटीं. उन्होंने अपनी दिवंगत मां की स्मृति में एक पेड़ लगाया. एक स्थानीय स्कूल गईं. विकास कार्यों की नींव रखी. यह एक ऐसा उत्सव था जिसे तालियों की जरूरत नहीं थी क्योंकि यह कर्म से बना था.

रेखा गुप्ता की यात्रा एक शांत क्रांति है. यह उस सोच को चुनौती देती है कि केवल शोर ही जीत सकता है. यह हमें याद दिलाती है कि नेतृत्व कोई ताज नहीं, एक जिम्मेदारी है, जिसे वह मंच पर नहीं, जनता के बीच, सुनते हुए, गढ़ते हुए और आगे बढ़ते हुए उठाती हैं.

एक ऐसे दौर में जब राजनीति अक्सर सिद्धांतों के बदले सुविधाएं चुनती है, रेखा गुप्ता की कहानी हमें उस युग की याद दिलाती है जब जन सेवा को सम्मानित काम माना जाता था. आस्था, परिश्रम और दबाव में गरिमा के कारण. वह कोई वायरल क्लिप नहीं हैं. वह एक बनती हुई विरासत हैं.

उनका अब तक का जीवन कोई परी की कथा नहीं है. यह कुछ और दुर्लभ है  धैर्य की एक गाथा, जहाँ हर छोटा कदम एक सीढ़ी बना और हर साधारण दिन किसी असाधारण बदलाव का बीज बनकर तैयार हुआ.

आज, जब वह सिर्फ एक और जन्मदिन नहीं, बल्कि एक और उद्देश्यपूर्ण वर्ष मना रही हैं, तो दिल्ली सिर्फ अपनी मुख्यमंत्री का जश्न नहीं मना रही, वह उस महिला को सलाम कर रही हैं, जिसने व्यवस्था को तोड़कर नहीं, बल्कि टिककर उसे पार किया.


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