पंजाब के CM भगवंत मान की शादी, जानें कौन बनने जा रहीं दुल्हनिया

दोनों की शादी चंडीगढ़ में होगी. शादी की तैयारियां जोरों पर हैं. इसकी पूरी जिम्मेदारी पंजाब के आम आदमी पार्टी के प्रभारी राघव चड्ढा के पास है.

Last Modified:
Wednesday, 06 July, 2022
Bhagwant Mann marriage

नई दिल्ली: पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान कल यानी 7 जुलाई को दूसरी बार शादी के बंधन में बंधने जा रहे हैं. उनकी दुल्हनिया का नाम है डॉ. गुरप्रीत कौर. शादी में चुनिंदा लोगों को ही बुलाया गया है. खबरों के अनुसार दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया भी शादी में शामिल होंगे.

चंडीगढ़ में होगी शादी
दोनों की शादी चंडीगढ़ में होगी. शादी की तैयारियां जोरों पर हैं. इसकी पूरी जिम्मेदारी पंजाब के आम आदमी पार्टी के प्रभारी राघव चड्ढा के पास है. आपको बता दें कि भगवंत मान की ये दूसरी शादी है. 6 साल पहले उन्होंने पहली पत्नी इंदरप्रीत कौर से तलाक ले लिया था. उनके दो बच्चे हैं, जो मां के साथ अमेरिका में रहते हैं. इस शादी में कुछ रिश्तेदारों और आम आदमी पार्टी के कुछ बड़े नेताओं को आमंत्रित किया गया है. 

कौन हैं डॉ. गुरप्रीत कौर
डॉ. गुरप्रीत कौर के बारे में अभी कोई विशेष जानकारी उपलब्ध नहीं है, लेकिन उन्हें परिवार के काफी करीब बताया जा रहा है. गुरप्रीत और भगवंत कई सालों से एक-दूसरे को जानते हैं. गुरप्रीत कई बार भगवंत के घर भी आ चुकी हैं. वे मूल रूप से पंजाब की ही रहने वाली हैं. भगवंत की मां ने ही गुरप्रीत को शादी के लिए चुना है. दोनों सिख रीति-रिवाज से शादी करेंगे.

2014 में रखा था राजनीति में कदम
2014 में राजनीति में कदम रखने के बाद ही भगवंत मान जनता के बीच ज्यादा रहने लगे. परिवार से उनकी दूरियां बढ़ती गईं. एक साल बाद ही भगवंत मान और इंद्रप्रीत कौर ने तलाक की अर्जी दाखिल कर दी. दोनों को फिर से विचार करने के लिए 6 महीने का समय भी दिया गया, लेकिन बात नहीं बन पाई और दोनों का तलाक हो गया. भगवंत मान अब फिर शादी करने जा रहे हैं.


कांग्रेस ने अंबानी के करीबी परिमल नथवानी को राज्यसभा का तख्त सौंपा

जब राहुल गांधी "मोदी के दो दोस्त" का राग अलाप रहे हैं, उसी समय झारखंड में उनके अपने महागठबंधन ने मुकेश अंबानी के करीबी ग्रुप प्रेसिडेंट परिमल नथवानी को राज्यसभा की सीट थाली में परोस दी.

Last Modified:
Friday, 19 June, 2026
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पलक शाह 

परिमल नथवानी एक बार फिर राज्यसभा जा रहे हैं.

जो लोग नथवानी से परिचित नहीं हैं, उनके लिए संक्षिप्त परिचय: वह रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड में ग्रुप प्रेसिडेंट (कॉरपोरेट अफेयर्स) हैं. यानी मुकेश अंबानी की रिलायंस. वही मुकेश अंबानी, जिनके खिलाफ राहुल गांधी पिछले लगभग एक दशक से हर मंच, हर भाषा, हर राज्य और हर चुनाव में बोलते रहे हैं,  "मोदी के दो दोस्त: अडानी और अंबानी."

नथवानी किसी भी मायने में पारंपरिक राजनेता नहीं हैं, वह कॉरपोरेट दुनिया के उस सीनेटर जैसे व्यक्ति हैं, जिनकी उपयोगिता रिलायंस के लिए उन कमरों में मौजूद रहने में है जहां कानून बनाए जाते हैं. वह कई कार्यकालों से इस भूमिका में रहे हैं, पहले गुजरात से और अब झारखंड से. हमेशा निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में, हमेशा भाजपा के समर्थन के साथ, और इस व्यवस्था को लेकर शामिल सभी लोग भलीभांति जानते रहे हैं.

इसमें कुछ भी नया नहीं है.

जो नया है और जो 18 जून, 2026 को नथवानी की संसद में वापसी को अलग बनाता है, वह यह है कि उन्हें वहां पहुंचाने में किसने मदद की.

क्योंकि इस बार परिमल नथवानी कांग्रेस के बिना नहीं जीते, वे कांग्रेस की वजह से जीते.

अंबानी को कोसने के 10 साल, उन्हें चुनने की एक दोपहर

आइए, अभी जो हुआ है उसकी लगभग काव्यात्मक विडंबना को समझें.

राहुल गांधी ने 2019 के बाद अपनी राजनीतिक पहचान एक केंद्रीय तर्क पर बनाई है: कि नरेंद्र मोदी भारत को दो लोगों गौतम अडानी और मुकेश अंबानी के हित में चलाते हैं. उन्होंने यह बात संसद में कही. हजारों किलोमीटर लंबी भारत जोड़ो यात्राओं में कही. इंटरव्यू में, प्रेस कॉन्फ्रेंस में और सोशल मीडिया पोस्ट में कही, जिन्हें उनके समर्थक लगभग धार्मिक ग्रंथ की तरह साझा करते हैं.

चुनाव हार गए? अडानी, अंबानी.
बाजार ऊपर गया? अडानी, अंबानी.
लोकतंत्र कमजोर हुआ? अडानी, अंबानी.

"मोदी के दो दोस्त," वह गरजते हैं और भीड़ जवाब देती है, "अडानी और अंबानी."

सच कहें तो यह प्रभावी ब्रांडिंग है. यह जटिल सवालों को सरल बना देती है और आसानी से लोगों तक पहुंचती है. उन्होंने इसे संसद में, लंदन में, वाशिंगटन में और उन पत्रकारों के सामने दोहराया है जो इसे सत्ता से सच बोलना बताते हैं. एक ऐसे नेता के लिए जिनके अन्य राजनीतिक तर्क ज्यादा असरदार नहीं रहे, यह नारा बहुत लंबे समय तक चला.

जब तक आप यह न पढ़ लें कि नाथवानी को राज्यसभा किसने भेजा.

यही बात रांची में हुई घटना को असाधारण बनाती है.

18 जून को कांग्रेस के नेतृत्व वाले महागठबंधन, जिसका कांग्रेस हिस्सा है, जिसे संभालने के लिए कांग्रेस ने वरिष्ठ नेताओं को भेजा था और जो झारखंड सरकार चलाता है, मुकेश अंबानी के ग्रुप प्रेसिडेंट को राज्यसभा लौटने से रोक नहीं पाया. सिर्फ रोक नहीं पाया, बल्कि अनजाने में उनकी राह आसान भी कर दी.

दो अरबपतियों के खिलाफ दस साल तक लड़ने के बाद अंततः उनमें से एक के लिए संसदीय नियुक्ति एजेंसी की तरह काम करने की राजनीतिक प्रतिभा वास्तव में दुर्लभ होती है.

गणित हमेशा निर्मम था

इस चुनाव का गणित जटिल नहीं था. झारखंड विधानसभा में 81 सदस्य हैं. राज्यसभा सीट जीतने के लिए 28 प्रथम वरीयता वोट चाहिए थे.

महागठबंधन झामुमो, कांग्रेस, राजद और भाकपा (माले) का गठबंधन के पास 56 विधायक थे. ठीक 56. यानी दो उम्मीदवारों को जिताने के लिए बिल्कुल पर्याप्त संख्या. न 57. न 60. सिर्फ 56. 28 गुणा 2. एकदम सटीक.

एनडीए, भाजपा और उसके सहयोगियों के पास 24 विधायक थे. कोटे से चार कम.

इसके अलावा एक निर्दलीय विधायक भी थे: टाइगर मेहता. उनका नाम भले अंतरात्मा की आवाज पर वोट देने वाले व्यक्ति का आभास देता हो, लेकिन उनकी राजनीतिक प्रवृत्तियां नथवानी के पक्ष में झुकी हुई दिखती थीं.

तो समीकरण था: एनडीए 24 से अधिक टाइगर मेहता 1 = 25. फिर भी तीन वोट कम.

कागज पर नथवानी की हार तय लग रही थी. फिर उन्हें किसने बचाया? इसका जवाब कहीं न कहीं राहुल गांधी तक पहुंचता है.

कांग्रेस को सिर्फ एक दोपहर के लिए 56 लोगों को एकजुट रखना था.

झामुमो को पता था कि गणित तंग है. उन्होंने सार्वजनिक रूप से दावा किया कि उनके पास 61 वोट हैं. जबकि विधानसभा में उनके गठबंधन के पास 56 सदस्य ही थे. अगर यह सच होता तो पांच विधायक प्रेस कॉन्फ्रेंस और मतदान के बीच अचानक प्रकट हो गए होते.

बांध में रिसाव था और हर कोई उसकी आवाज सुन सकता था.

तीन वोट बाहर, बीस वोट अंदर. कांग्रेस का उम्मीदवार खत्म

छोटे गठबंधन सहयोगियों में असंतोष की एक खास किस्म होती है और झारखंड में राजद के चार विधायक कुछ समय से उसी में डूबे हुए थे.

सत्ता साझेदारी से नाराज. सम्मान को लेकर नाराज. अपने वोटों की उपयोगिता के बावजूद उपेक्षित महसूस करने से नाराज.

कांग्रेस यह जानती थी. कांग्रेस ने नेताओं को स्थिति संभालने भेजा था. बताया गया कि तेजस्वी यादव से भी अपने विधायकों को एकजुट रखने को कहा गया था.

लेकिन तीन विधायक साथ नहीं रहे.

महागठबंधन के भीतर से तीन वोट नथवानी को चले गए. उनके 25 वोटों के आधार में ये तीन वोट जुड़ गए और वह 28 के आंकड़े तक पहुंच गए. कुल 30 वोट पड़े, जिनमें दो अमान्य घोषित हुए. नथवानी पहली वरीयता के वोटों से सीधे जीत गए.

कांग्रेस के उम्मीदवार प्रणव झा को 20 वोट मिले. उन्हें 28 चाहिए थे. उन्हें 20 ही मिले.

56 विधायकों वाले गठबंधन में. उस राज्य में जहां कांग्रेस 2019 से सत्ता में साझेदार है. ऐसे चुनाव में जिसकी तैयारी के लिए महीनों का समय था.

झामुमो के बैद्यनाथ राम अपनी सीट जीत गए. गठबंधन का उम्मीदवार, जिसे झामुमो के 34 अनुशासित विधायकों का समर्थन मिला, आराम से जीत गया. हार केवल कांग्रेस के उम्मीदवार की हुई.

भाजपा ने यह सीट नहीं छीनी, कांग्रेस ने दरवाजा खुला छोड़ा

भाजपा ने क्या किया, इसका श्रेय उसे देना चाहिए. उसने नथवानी को भाजपा उम्मीदवार नहीं बनाया. वे निर्दलीय उम्मीदवार थे.

इसका मतलब यह था कि उनके पक्ष में वोट देने वाले विधायक यह कह सकते थे कि उन्होंने अंतरात्मा की आवाज पर वोट दिया, न कि "भाजपा के आदमी" को.

"निर्दलीय उम्मीदवार" एक ऐसा सौदा है जिसकी ज्यादा व्याख्या नहीं करनी पड़ती.

भाजपा ने कमजोरी पहचान ली, असंतुष्ट राजद विधायक. उसने अपनी रणनीति बनाई और बाकी काम कांग्रेस पर छोड़ दिया.

जिसे आप कभी चुनौती नहीं देते, वह दुश्मन नहीं होता. वह चुनावी बजट होता है

घटनाओं का एक ऐसा संस्करण भी है जिसमें कांग्रेस नेतृत्व के प्रति थोड़ी सहानुभूति महसूस की जा सकती है. गठबंधन प्रबंधन वास्तव में कठिन काम है. राजद के साथ संबंध पहले से ही तनावपूर्ण थे. भारत में छोटे सहयोगी दल अक्सर ऐसे ही होते हैं.

लेकिन यह तर्क उस नारे के सामने टिक नहीं पाता.

आप "अंबानी" को अपनी राजनीति का सबसे बड़ा खलनायक बनाकर फिर उसी व्यक्ति के करीबी को संसद पहुंचाने का कारण नहीं बन सकते. और फिर भी उसी नारे को जारी नहीं रख सकते.

भीड़ अब भी यह नारा लगाएगी. लेकिन उसका असर कम हो चुका है.

क्योंकि अब स्वाभाविक सवाल यह है: अगर भाई-भतीजावादी पूंजीवाद वास्तव में उतना बड़ा मुद्दा है जितना आप बताते हैं, और सत्ता में आने पर आप यही करते हैं, तो फिर आप वास्तव में क्या पेश कर रहे हैं?

रिलायंस का एक भी अनुबंध प्रभावित नहीं हुआ. कंपनी के खिलाफ एक भी नियामकीय फैसला नहीं गया. अंबानी के करीबी लगातार संसद में रहे और भाषण जारी रहे.

एक विचारधारा यह भी कहती है कि राहुल गांधी के लिए अरबपति खलनायक को स्थायी निशाने के रूप में बनाए रखना, उसे वास्तव में पराजित करने से अधिक राजनीतिक रूप से उपयोगी है.

इसलिए जिसे आप कभी वास्तव में चुनौती नहीं देते, वह दुश्मन नहीं होता. वह सिर्फ एक सहारा होता है.

मोदी के दो दोस्त. और तीसरा कभी-कभी कांग्रेस

सालों से नारा सरल रहा है.

"मोदी के दो दोस्त: अडानी और अंबानी."

लेकिन 18 जून को, जब परिमल नथवानी को तीन अतिरिक्त वोटों की जरूरत थी, तो वे वोट भाजपा से नहीं आए. भाजपा अपनी पूरी क्षमता के साथ 25 वोटों पर थी.

ये तीन वोट महागठबंधन के भीतर से आए. उस गठबंधन से जिसका नेतृत्व राहुल गांधी करते हैं. कांग्रेस के गठबंधन से.

शायद अब नारे में थोड़ा बदलाव चाहिए.

मोदी के दो दोस्त.
और तीसरा: कभी-कभी, कांग्रेस.

राहुल गांधी के नारे ने मदद की

परिमल नथवानी फिर संसद जा रहे हैं. मुकेश अंबानी का प्रतिनिधि दिल्ली में बना रहेगा और राहुल गांधी, जिन्होंने तीन महाद्वीपों में एक दशक तक कथित क्रोनी कैपिटलिज्म के खिलाफ भाषण दिए, अब हालिया संसदीय इतिहास में कॉरपोरेट हितों की सबसे प्रभावी सेवाओं में से एक की निगरानी करते नजर आते हैं.

अगली बार जब वह पूछेंगे कि मोदी के दोस्त कौन हैं, तो भीड़ हमेशा की तरह जवाब देगी.

लेकिन असली जवाब में शायद कोई और भी शामिल है.

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
 


देश के सबसे अमीर मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं डीके शिवकुमार, जानिए कितनी है नेटवर्थ

मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के इस्तीफे की चर्चाओं के बीच कांग्रेस के दिग्गज नेता और राज्य के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के मुख्यमंत्री बनने की संभावना लगभग तय मानी जा रही है.

Last Modified:
Friday, 29 May, 2026
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कर्नाटक की राजनीति में बड़ा बदलाव होने जा रहा है. मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के इस्तीफे की चर्चाओं के बीच कांग्रेस के दिग्गज नेता और राज्य के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के मुख्यमंत्री बनने की संभावना लगभग तय मानी जा रही है. अगर डीके शिवकुमार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते हैं, तो वह देश के सबसे अमीर मुख्यमंत्री बन जाएंगे. उनकी घोषित संपत्ति इतनी ज्यादा है कि वह आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू और अभिनेता-राजनेता थलपति विजय को भी पीछे छोड़ देंगे.

पांच साल में तेजी से बढ़ी संपत्ति

2023 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव के दौरान दाखिल हलफनामे के अनुसार डीके शिवकुमार और उनके आश्रितों की कुल संपत्ति करीब ₹1,413.78 करोड़ है. इससे पहले 2018 के विधानसभा चुनाव में उनकी घोषित संपत्ति करीब ₹840 करोड़ थी. यानी सिर्फ पांच वर्षों में उनकी संपत्ति में रिकॉर्ड बढ़ोतरी हुई है. चुनावी हलफनामे के मुताबिक उनके पास करीब ₹273.42 करोड़ की चल संपत्ति और ₹1,140.36 करोड़ की अचल संपत्ति है. इनमें से लगभग ₹972 करोड़ की संपत्ति सीधे उनके नाम पर दर्ज है. हालांकि उन पर करीब ₹263 करोड़ का कर्ज भी है.

अरबों की संपत्ति, लेकिन सिर्फ एक कार

डीके शिवकुमार की संपत्ति का आंकड़ा भले ही हजार करोड़ के पार हो, लेकिन उनके नाम पर सिर्फ एक टोयोटा क्वालिस कार दर्ज है. वहीं उनके पास रोलेक्स और हुबलॉट जैसी महंगी लग्जरी घड़ियों का बड़ा कलेक्शन है. इसके अलावा सोने और चांदी में भी उनका भारी निवेश बताया गया है.

रियल एस्टेट से खड़ा किया बड़ा कारोबार

डीके शिवकुमार की संपत्ति का सबसे बड़ा हिस्सा रियल एस्टेट कारोबार से जुड़ा हुआ है. हलफनामे के अनुसार उनकी करीब ₹852 करोड़ की संपत्ति ‘दावनम कंस्ट्रक्शंस’ और उससे जुड़े प्रोजेक्ट्स के जरिए बनी है.

इनमें बेंगलुरु के चर्चित ग्लोबल मॉल और ग्लोबल डिविनिटी मॉल जैसे बड़े कमर्शियल प्रोजेक्ट शामिल हैं. राजाजीनगर स्थित ग्लोबल मॉल को बाद में लुलु ग्रुप के साथ साझेदारी में विकसित किया गया था. यह बेंगलुरु के सबसे बड़े शॉपिंग और एंटरटेनमेंट हब में गिना जाता है.

कई सेक्टर में फैला है निवेश

रियल एस्टेट के अलावा डीके शिवकुमार का निवेश कंस्ट्रक्शन, हॉस्पिटैलिटी, शिक्षा, मीडिया और कृषि जैसे कई सेक्टर में फैला हुआ है. उन्होंने कई कंपनियों और फर्मों में हिस्सेदारी ले रखी है, जिससे उनकी कारोबारी पकड़ काफी मजबूत मानी जाती है.

अमीर मुख्यमंत्रियों की सूची में होगा बड़ा बदलाव

डीके शिवकुमार के मुख्यमंत्री बनते ही देश के सबसे अमीर मुख्यमंत्रियों की सूची में बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा. फिलहाल आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू करीब ₹931 करोड़ की संपत्ति के साथ इस सूची में शीर्ष पर हैं. वहीं अभिनेता और राजनेता थलपति विजय करीब ₹600 करोड़ से अधिक की संपत्ति के साथ दूसरे स्थान पर बताए जाते हैं. लेकिन डीके शिवकुमार के शपथ लेते ही यह समीकरण बदल जाएगा. वह सीधे पहले स्थान पर पहुंच जाएंगे, जबकि चंद्रबाबू नायडू दूसरे और थलपति विजय तीसरे स्थान पर खिसक जाएंगे.
 


केरल में यूडीएफ सरकार की वापसी, वीडी सतीशन के नेतृत्व में 20 मंत्रियों ने ली शपथ

एक दशक बाद सत्ता में लौटा कांग्रेस गठबंधन, तिरुवनंतपुरम में भव्य शपथ ग्रहण समारोह आयोजित

Last Modified:
Monday, 18 May, 2026
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केरल की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिला है. कांग्रेस नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) ने एक दशक बाद सत्ता में वापसी करते हुए सोमवार को नई सरकार का गठन किया. वीडी सतीशन के नेतृत्व में 20 मंत्रियों ने तिरुवनंतपुरम में आयोजित भव्य समारोह में पद और गोपनीयता की शपथ ली. केरल के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर ने सेंट्रल स्टेडियम में मंत्रियों को शपथ दिलाई. समारोह का समापन वंदे मातरम और राष्ट्रगान के साथ हुआ.

आईयूएमएल और कांग्रेस नेताओं को कैबिनेट में प्रमुख स्थान

मुख्यमंत्री वीडी सतीशन के बाद इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) के वरिष्ठ नेता पीके कुन्हालीकुट्टी ने मंत्री पद की शपथ ली. नई कैबिनेट में कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं को जगह दी गई है. इनमें रमेश चेन्निथला, के मुरलीधरन और सनी जोसेफ प्रमुख हैं. इसके अलावा यूडीएफ सहयोगी दलों के नेताओं को भी मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है. केरल कांग्रेस के मॉन्स जोसेफ और रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी (आरएसपी) के शिबू बेबी जॉन ने भी मंत्री पद की शपथ ली.

कई नए चेहरों को भी मिला मौका

नई सरकार में कांग्रेस नेता अनूप जैकब, सीपी जॉन और एपी अनिल कुमार को भी मंत्री बनाया गया है. आईयूएमएल के एन समसुद्दीन, केएम शाजी, पीके बशीर और वीई अब्दुल गफूर को भी कैबिनेट में जगह मिली है. कांग्रेस विधायक पीसी विष्णुनाथ और रोजी एम जॉन ने भी मंत्री पद की शपथ ली, जबकि बिंदू कृष्णा और एम लिजू को भी सरकार में शामिल किया गया है. इसके अलावा टी सिद्दीकी, केए थुलसी और ओजे जनीश भी नई कैबिनेट का हिस्सा बने हैं.

चुनाव में मिली थी बड़ी जीत

2026 के केरल विधानसभा चुनाव में यूडीएफ ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 140 सदस्यीय विधानसभा में 102 सीटों पर जीत दर्ज की थी. कांग्रेस 63 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, जबकि आईयूएमएल को 22 सीटें मिलीं. वहीं, वामपंथी गठबंधन एलडीएफ को बड़ा झटका लगा और वह केवल 35 सीटों पर सिमट गया. भाजपा को तीन सीटों पर जीत मिली.

शपथ समारोह में जुटे कांग्रेस के दिग्गज नेता

शपथ ग्रहण समारोह में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा और कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल समेत कई वरिष्ठ नेता मौजूद रहे. इसके अलावा कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री भी कार्यक्रम में शामिल हुए. इनमें सिद्धारमैया, डीके शिवकुमार, ए रेवंत रेड्डी और सुखविंदर सिंह सुक्खू प्रमुख रहे.
 


विवाद के बाद तमिलनाडु सरकार ने वापस लिया ज्योतिषी की नियुक्ति, CM विजय ने रद्द किया OSD पद का आदेश

निजी ज्योतिषी को सरकारी पद देने पर उठे सवाल, विपक्ष और सहयोगियों के दबाव में सरकार का यू-टर्न

Last Modified:
Wednesday, 13 May, 2026
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चंद्रशेखरन जोसेफ विजय सरकार ने भारी विवाद और आलोचना के बाद मुख्यमंत्री के निजी ज्योतिषी रिक्की राधान पंडित वेट्रिवेल की नियुक्ति रद्द कर दी है. तमिलनाडु सरकार ने 13 मई 2026 को जारी आदेश में कहा कि वेट्रिवेल को मुख्यमंत्री के विशेष कार्याधिकारी (OSD-Political) के पद पर नियुक्त करने संबंधी आदेश तत्काल प्रभाव से वापस लिया जाता है.

एक दिन पहले हुई थी नियुक्ति

रिकी राधान पंडित वेट्रिवेल, जो ज्योतिषी होने के साथ-साथ TVK के प्रवक्ता भी हैं, को 12 मई 2026 को मुख्यमंत्री के राजनीतिक OSD के रूप में नियुक्त किया गया था. इस संबंध में राज्य सरकार के सार्वजनिक विभाग ने आदेश जारी किया था, जिसमें कहा गया था कि नियुक्ति की शर्तें अलग से जारी की जाएंगी.

कौन हैं राधान पंडित वेट्रिवेल?

वेट्रिवेल को ज्योतिष और मेडिटेशन के क्षेत्र में चार दशक से अधिक का अनुभव बताया जाता है. वह पूर्व मुख्यमंत्री जे जयललिता के करीबी सलाहकारों में भी शामिल रहे थे. बताया जाता है कि 1990 के दशक में उन्होंने जयललिता को कानूनी रणनीतियों को लेकर सलाह दी थी, साथ ही उनके नाम के अंत में दूसरा “a” जोड़ने और Jaya TV के लोगो को अंतिम रूप देने में भी भूमिका निभाई थी.

राजनीतिक और फिल्मी हलकों में वेट्रिवेल अपने ज्योतिषीय और न्यूमरोलॉजी आधारित पूर्वानुमानों के लिए चर्चित रहे हैं. उन्होंने पहले यह भविष्यवाणी भी की थी कि विजय राजनीति में आएंगे और बड़ी चुनावी सफलता हासिल करेंगे.

नियुक्ति पर क्यों शुरू हुआ विवाद?

इस नियुक्ति के सामने आते ही विपक्षी दलों और प्रगतिशील संगठनों ने तीखी प्रतिक्रिया दी. कई नेताओं ने सवाल उठाया कि एक ज्योतिषी को सरकारी पद देना संविधान की भावना और वैज्ञानिक सोच के खिलाफ है.

सीपीएम के राज्य सचिव पी. शन्मुगम ने कहा कि सरकारों की जिम्मेदारी वैज्ञानिक सोच और तर्कवादी मूल्यों को बढ़ावा देना है, न कि अंधविश्वास को प्रोत्साहित करना. वहीं CPI ने भी बयान जारी कर कहा कि TVK खुद को धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय की राजनीति का समर्थक बताती रही है, ऐसे में यह फैसला चौंकाने वाला है.

कांग्रेस सांसद कर्ति पी चिदंबरम ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक सांकेतिक टिप्पणी करते हुए इस फैसले की तुलना रोमन सम्राट कैलिगुला द्वारा अपने घोड़े को कौंसल नियुक्त करने से कर दी.

विधानसभा में विरोध के बाद बदला फैसला

सरकार पर दबाव तब और बढ़ गया जब DMDK महासचिव प्रेमलता विजयकांत ने विधानसभा में इस फैसले का खुलकर विरोध किया. बढ़ती आलोचना और राजनीतिक दबाव के बीच मुख्यमंत्री विजय सरकार ने एक दिन के भीतर ही नियुक्ति वापस लेने का फैसला कर लिया.

तमिलनाडु की राजनीति और ज्योतिष का पुराना रिश्ता

तमिलनाडु की राजनीति में ज्योतिष और आस्था का प्रभाव लंबे समय से देखा जाता रहा है. चुनाव टिकट, नामांकन की तारीख, शुभ रंग और जीत की संभावनाओं को लेकर कई नेता ज्योतिषीय सलाह लेते रहे हैं. वेट्रिवेल भी पिछले कुछ वर्षों से विजय के करीबी माने जाते हैं और कई राजनीतिक तथा निजी कार्यक्रमों में उनके साथ देखे गए हैं.

हाल ही में विजय के तिरुचेंदूर मुरुगन मंदिर दौरे के दौरान भी वेट्रिवेल उनके साथ कार में नजर आए थे, जिसके बाद राजनीतिक गलियारों में काफी चर्चा हुई थी.

निजी आस्था बनाम सार्वजनिक पद पर बहस

यह विवाद एक बार फिर निजी धार्मिक विश्वास और सार्वजनिक पद की मर्यादा के बीच संतुलन को लेकर बहस छेड़ गया है. हालांकि सरकार ने नियुक्ति रद्द करने के अलावा विपक्ष द्वारा उठाए गए सवालों पर अब तक कोई विस्तृत प्रतिक्रिया नहीं दी है.
 

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असम में फिर भाजपा सरकार, हिमंता बिस्वा सरमा ने दूसरी बार ली मुख्यमंत्री पद की शपथ

इस भव्य समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अमित शाह, जेपी नड्डा, सीएम योगी आदित्यनाथ सहित देशभर के कई बड़े नेता शामिल हुए. 

Last Modified:
Tuesday, 12 May, 2026
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असम में भारतीय जनता पार्टी (BJP) नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की लगातार तीसरी सरकार के गठन के साथ राज्य में एक बार फिर राजनीतिक स्थिरता का संदेश देने की तैयारी है. मुख्यमंत्री पद के लिए निर्वाचित नेता हिमंता बिस्व सरमा ने बुधवार को गुवाहाटी में दूसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण की. अपने तेज तर्रार बयानों के लिए देश भर में फेमस सरमा हमेशा सुर्खियों में रहते हैं, जहां पर उनका शपथ हुआ, उस इलाके को हाई सिक्योरिटी जोन में बदल दिया गया है. हिमंत बिस्वा सरमा के साथ असम सरकार में रमेश्वर तेली, अतुल बोरा, चरण बोरो और अजंता नेओग ने मंत्री पद की शपथ ग्रहरण की. इस भव्य समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अमित शाह, जेपी नड्डा, सीएम योगी आदित्यनाथ सहित देशभर के कई बड़े नेता शामिल हुए. 

असम सरकार में अनुभवी चेहरों की एंट्री
हिमंता बिस्वा सरमा के अलावा जिन चार नेताओं ने मंत्री पद की शपथ ली, वे असम की राजनीति के अलग-अलग क्षेत्रों से आने वाले प्रभावशाली चेहरे माने जाते हैं. रमेश्वर तेली भाजपा के वरिष्ठ नेता हैं और केंद्र सरकार में पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस, श्रम एवं रोजगार जैसे मंत्रालयों में राज्य मंत्री रह चुके हैं. वे असम के चाय बागान समुदाय और ऊपरी असम में मजबूत जनाधार रखते हैं. अतुल बोरा असम गण परिषद (AGP) के अध्यक्ष हैं और लंबे समय से क्षेत्रीय राजनीति का अहम चेहरा रहे हैं. वहीं चरण बोरो बोडोलैंड क्षेत्र से जुड़े नेता हैं और बोडो समुदाय के बीच उनकी अच्छी राजनीतिक पकड़ मानी जाती है. दूसरी ओर अजंता नेओग असम की अनुभवी महिला नेताओं में शामिल हैं. वे पहले कांग्रेस में थीं और बाद में भाजपा में शामिल हुईं. वित्त और प्रशासनिक मामलों में उनकी मजबूत पकड़ मानी जाती है.

पीएम ने दी बधाई

प्रधानमंत्री मोदी ने हिमंत बिस्वा सरमा सहित शपथ ग्रहण करने वाले सभी मंत्रियों को बधाई देते हुए कहा, असम की विकास यात्रा को और मजबूत बनाने की दिशा में उनके सफल कार्यकाल के लिए मेरी शुभकामनाएं.

पीएम मोदी का गुवाहाटी दौरा और स्वागत

इस समारोह से पूर्व सोमवार रात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुवाहाटी पहुंचे, जहां एयरपोर्ट पर मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा और भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने उनका स्वागत किया.  यह शपथ ग्रहण समारोह खानापारा स्थित वेटरनरी कॉलेज फील्ड में आयोजित हुआ. इ

देशभर के एनडीए शासित राज्यों के नेता हुए शामिल

इस भव्य समारोह में 40 से अधिक एनडीए शासित राज्यों के मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री भी शामिल हुए. इसके अलावा दिल्ली, महाराष्ट्र, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और अन्य राज्यों के शीर्ष नेता भी मौजूद रहे.


बंगाल में नई सरकार का बड़ा एक्शन, BSF को 600 एकड़ जमीन आवंटन समेत 6 बड़े फैसलों को मंजूरी

सरकार ने BSF को बाड़ लगाने और सुरक्षा ढांचा मजबूत करने के लिए 600 एकड़ जमीन हस्तांतरित करने को मंजूरी दे दी है. मुख्यमंत्री ने कहा कि अगले 45 दिनों के भीतर जमीन सौंपने की प्रक्रिया पूरी कर ली जाएगी.

Last Modified:
Monday, 11 May, 2026
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पश्चिम बंगाल के नए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने पद संभालने के बाद अपनी पहली कैबिनेट बैठक में कई बड़े फैसलों का ऐलान किया. नबन्ना भवन में हुई इस बैठक में सीमा सुरक्षा, जनगणना, आयुष्मान भारत योजना, भर्ती प्रक्रिया और प्रशासनिक सुधारों से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए. मुख्यमंत्री ने कहा कि उनकी सरकार “सभी के लिए काम करेगी” और राज्य में पारदर्शी, सुरक्षित और जनहितैषी प्रशासन स्थापित करना उनकी प्राथमिकता होगी.

BSF को मिलेगी 600 एकड़ जमीन

कैबिनेट बैठक में सबसे बड़ा फैसला भारत-बांग्लादेश सीमा पर सुरक्षा मजबूत करने को लेकर लिया गया. सरकार ने सीमा सुरक्षा बल (BSF) को बाड़ लगाने और सुरक्षा ढांचा मजबूत करने के लिए 600 एकड़ जमीन हस्तांतरित करने को मंजूरी दे दी है. मुख्यमंत्री ने कहा कि अगले 45 दिनों के भीतर जमीन सौंपने की प्रक्रिया पूरी कर ली जाएगी. सरकार का मानना है कि इससे अवैध घुसपैठ और सीमा पार तस्करी पर नियंत्रण लगाने में मदद मिलेगी.

जनगणना प्रक्रिया फिर से शुरू करने का आदेश

मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने राज्य में जनगणना प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश भी जारी किए. उन्होंने आरोप लगाया कि पिछली सरकार ने राजनीतिक कारणों से जनगणना प्रक्रिया को जानबूझकर रोके रखा था. अधिकारी ने कहा कि अब इस प्रक्रिया को तेजी से आगे बढ़ाया जाएगा और मामले की जांच के लिए तथ्य-जांच समिति भी बनाई जाएगी.

आयुष्मान भारत योजना को मंजूरी

नई सरकार ने केंद्र सरकार की आयुष्मान भारत योजना को पश्चिम बंगाल में लागू करने का फैसला किया है. मुख्यमंत्री ने कहा कि स्वास्थ्य विभाग से जुड़े सभी जरूरी समझौते और प्रशासनिक प्रक्रियाएं तुरंत शुरू की जाएंगी ताकि राज्य के लोगों को जल्द से जल्द योजना का लाभ मिल सके. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना समेत केंद्र की अन्य योजनाओं को भी राज्य में लागू किया जाएगा.

अधिकारियों की ट्रेनिंग नीति में बदलाव

शुभेंदु अधिकारी सरकार ने एक और बड़ा प्रशासनिक फैसला लेते हुए IAS, IPS और WBPS अधिकारियों को ट्रेनिंग के लिए दूसरे राज्यों में भेजने की अनुमति बहाल कर दी है. पिछली सरकार ने इस नीति को सीमित कर दिया था, जिसे अब पलट दिया गया है.

भर्ती प्रक्रिया में आयु सीमा में राहत

सरकार ने रोजगार भर्ती प्रक्रिया से वंचित रहे उम्मीदवारों को बड़ी राहत दी है. नई कैबिनेट ने भर्ती परीक्षाओं के लिए अधिकतम आयु सीमा में 5 साल की छूट देने का फैसला किया है. इससे लंबे समय से नौकरी की तैयारी कर रहे युवाओं को फायदा मिलने की उम्मीद है.

बंगाल में तुरंत लागू होगी भारतीय न्याय संहिता

मुख्यमंत्री ने राज्य में भारतीय न्याय संहिता (BNS) को तत्काल प्रभाव से लागू करने का निर्देश दिया है. उन्होंने आरोप लगाया कि पिछली सरकार ने नई कानूनी व्यवस्था को लागू नहीं किया था. अब राज्य में नई न्यायिक व्यवस्था को तेजी से लागू किया जाएगा.

कानून व्यवस्था और प्रशासनिक हालात की समीक्षा

कैबिनेट बैठक के बाद मुख्यमंत्री ने राज्य के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ कानून व्यवस्था और प्रशासनिक स्थिति की समीक्षा बैठक भी की. इस बैठक में मुख्य सचिव, गृह सचिव, डीजीपी और कोलकाता पुलिस आयुक्त समेत कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे. मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार की पहली प्राथमिकता राज्य में सुरक्षा और शांति सुनिश्चित करना है.

नबन्ना में मिला गार्ड ऑफ ऑनर

मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी को नबन्ना भवन पहुंचने पर गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया.

इस दौरान राज्य के मुख्य सचिव, डीजीपी और कई वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी मौजूद रहे.

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# बंगाल की राजनीति में बड़ा बदलाव

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में भाजपा ने 294 में से 207 सीटें जीतकर बड़ी जीत दर्ज की है.

इस जीत के साथ राज्य में तृणमूल कांग्रेस के 15 साल पुराने शासन का अंत हो गया और शुभेंदु अधिकारी राज्य के पहले भाजपा मुख्यमंत्री बने हैं.
 


बंगाल एक ब्रांड: नवयुग, आत्मविश्वास और नियति का जनादेश

इस लेख में डॉ. अनुराग बत्रा बताते हैं कि कैसे हालिया बंगाल विधानसभा चुनाव केवल राजनीति से परे एक जनादेश था.

डॉ. अनुराग बत्रा by
Published - Saturday, 09 May, 2026
Last Modified:
Saturday, 09 May, 2026
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इतिहास में कुछ ऐसे क्षण आते हैं जब चुनाव केवल सत्ता की प्रतिस्पर्धा नहीं रह जाते. वे लोगों के जीवन में भावनात्मक मोड़ बन जाते हैं. बंगाल का नया चुनावी जनादेश भी ऐसा ही एक क्षण बनने की संभावना रखता है, केवल एक राजनीतिक फैसला नहीं, बल्कि यह घोषणा कि बंगाल फिर से सपने देखने के लिए तैयार है.

बहुत लंबे समय तक बंगाल अपने ही गौरवशाली अतीत की छाया में जीता रहा है. यही वह भूमि है जिसने भारत के पुनर्जागरण को प्रज्वलित किया, आधुनिक साहित्य को आकार दिया, सुधार आंदोलनों का नेतृत्व किया, संस्थानों का निर्माण किया और देश को उसके कुछ महानतम विचारक, कलाकार, वैज्ञानिक और क्रांतिकारी दिए. Kolkata कभी भारत की बौद्धिक और व्यावसायिक धड़कन हुआ करता था. बंगाल ने केवल भारत की कहानी में भाग नहीं लिया, बल्कि उसे लिखने में मदद की.

लेकिन कहीं न कहीं पुरानी यादों और राजनीतिक संघर्षों के बीच आत्मविश्वास की जगह हिचकिचाहट ने ले ली. एक पीढ़ी ऐसी बड़ी हुई जिसने यह अधिक सुना कि बंगाल पहले क्या था, बजाय इसके कि बंगाल क्या बन सकता है. बहुत से युवा अपने मन में महत्वाकांक्षा लेकिन दिल में अनिश्चितता लेकर राज्य छोड़ते गए. कई परिवारों ने यह मानना शुरू कर दिया कि अवसर कहीं और हैं.

नया जनादेश उस मानसिकता को बदलने की ताकत रखता है.

स्मृतियों से गति की ओर

बंगाल का भविष्य केवल नीतियों, बुनियादी ढांचे या नारों से नहीं बनाया जा सकता. सबसे पहले इसे लोगों के मन में फिर से खड़ा करना होगा. इसलिए “ब्रांड बंगाल” कोई मार्केटिंग अभियान नहीं है. यह एक सभ्यतागत विचार है. यह विश्वास है कि बंगाल फिर से ऐसी जगह बन सकता है जहाँ संस्कृति और व्यापार, बुद्धिमत्ता और उद्योग, पहचान और नवाचार आत्मविश्वास के साथ साथ मौजूद हों.

ब्रांड बंगाल को एक नई तरह की आकांक्षा का प्रतीक बनना होगा, जो गरिमा में निहित हो. बंगाल को समृद्धि हासिल करने के लिए किसी दूसरे राज्य या विकास मॉडल की नकल करने की आवश्यकता नहीं है. उसे अपनी आत्मा मिटाने की जरूरत नहीं है.

बंगाल की ताकत हमेशा विचार और रचनात्मकता, भावना और बुद्धिमत्ता, मानवता और महत्वाकांक्षा के संतुलन में रही है. यही संतुलन 21वीं सदी में उसकी सबसे बड़ी ताकत बन सकता है.

नई सदी के लिए नया पुनर्जागरण

भविष्य का बंगाल भारत की ज्ञान और नवाचार राजधानी बन सकता है. इसके विश्वविद्यालय, शोध संस्थान, स्टार्टअप, डिज़ाइनर, तकनीकी विशेषज्ञ और उद्यमी एक नए पुनर्जागरण को आगे बढ़ा सकते हैं, जो केवल कारखानों से नहीं बल्कि विचारों से संचालित होगा.

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से लेकर बायोटेक्नोलॉजी तक, रचनात्मक उद्योगों से लेकर डिजिटल सेवाओं तक, बंगाल के पास भारत की अगली विकास लहर का नेतृत्व करने के लिए बौद्धिक पूंजी मौजूद है.

लेकिन केवल विकास ही ब्रांड बंगाल को परिभाषित नहीं कर सकता.

एक सचमुच सफल बंगाल मानवीय भी होना चाहिए. विकास करुणा और संस्कृति की कीमत पर नहीं आना चाहिए. बंगाल के लोग ऐसे शहरों के हकदार हैं जो आधुनिक होने के साथ रहने योग्य भी हों, ऐसे उद्योग जो रोजगार पैदा करें लेकिन समुदायों का सम्मान भी करें, और ऐसी शासन व्यवस्था जो आम नागरिकों को गरिमा के साथ सशक्त बनाए.

एक गांव की माँ, Kolkata का छात्र, उत्तर बंगाल का चाय श्रमिक और स्टार्टअप शुरू करने वाला युवा उद्यमी, सभी को यह महसूस होना चाहिए कि भविष्य उनका है.

यही है ब्रांड बंगाल का भावनात्मक वादा.

घर छोड़े बिना अवसर

ब्रांड बंगाल, बंगाल के युवाओं से किया गया एक वादा भी है.

यह वादा है कि युवा बंगालियों को अब केवल अवसर खोजने के लिए अपना घर नहीं छोड़ना पड़ेगा. यह वादा है कि प्रतिभा को बाहर भेजने के बजाय उसे विकसित किया जाएगा. यह वादा है कि महत्वाकांक्षा और पहचान साथ-साथ चल सकती हैं, कि कोई वैश्विक कंपनी बना सकता है और फिर भी रबिंद्रनाथ टैगोर की भाषा बोल सकता है, गर्व के साथ Durga Puja मना सकता है और बंगाल की सांस्कृतिक भावना को दुनिया तक पहुँचा सकता है.

लक्ष्य केवल आर्थिक विकास नहीं है. लक्ष्य आत्मविश्वास है,  यह विश्वास कि बंगाल फिर से सपनों की मंजिल बन सकता है, न कि केवल उनसे विदा लेने की जगह.

संस्कृति: केवल यादें नहीं, बल्कि ताकत

संस्कृति को भी ब्रांड बंगाल का केंद्र बनना होगा.

बंगाल का सिनेमा, साहित्य, संगीत, व्यंजन, कला, हथकरघा परंपराएँ और बौद्धिक विरासत अतीत की धरोहर मात्र नहीं हैं. वे भविष्य की आर्थिक और सांस्कृतिक संपत्तियाँ हैं. आज दुनिया प्रामाणिकता, कहानी कहने की कला, रचनात्मकता और पहचान को महत्व देती है और ये सभी क्षेत्र बंगाल की असाधारण ताकत हैं.

कोलकाता फिर से एशिया की महान सांस्कृतिक राजधानियों में से एक बन सकता है, जो कलाकारों, विचारकों, रचनाकारों, छात्रों और वैश्विक ध्यान को आकर्षित करे.

ब्रांड बंगाल को केवल संग्रहालयों में संस्कृति को संरक्षित नहीं करना चाहिए. उसे संस्कृति को ऐसी जीवंत शक्ति बनाना चाहिए जो गर्व, रोजगार, पर्यटन और वैश्विक प्रभाव पैदा करे.

बदलते भारत में बंगाल की भूमिका

साथ ही, बंगाल को अपनी रणनीतिक महत्ता फिर से खोजनी होगी. भौगोलिक और आर्थिक दृष्टि से यह भारत के पूर्वी द्वार के रूप में उभर सकता है, जो व्यापार, लॉजिस्टिक्स, विनिर्माण और क्षेत्रीय सहयोग को बंगाल की खाड़ी और दक्षिण-पूर्व एशिया से जोड़ता है.

इसके बंदरगाह, बुनियादी ढाँचा और उद्यमशील ऊर्जा बंगाल को पूर्वी भारत के विकास का प्रमुख इंजन बना सकते हैं.

लेकिन शायद ब्रांड बंगाल जो सबसे बड़ा परिवर्तन ला सकता है, वह मनोवैज्ञानिक है.

सालों से बंगाल अपने अतीत के गर्व और भविष्य की चिंता के बीच फँसा रहा है. नया जनादेश उस चक्र को तोड़ने का अवसर देता है. यह ऐसी पीढ़ी तैयार कर सकता है जो फिर से विश्वास करे कि बंगाल भारत की विकास गाथा के केंद्र में है, ऐसी पीढ़ी जो पतन की भाषा छोड़कर संभावनाओं की भाषा बोलना शुरू करे.

विश्वास की वापसी

जब लोग फिर से विश्वास करना शुरू करते हैं तो समाज की ऊर्जा बदल जाती है.

यही विश्वास निवेश को आकर्षित करता है. यही विश्वास नवाचार को प्रेरित करता है. यही विश्वास प्रतिभाशाली युवा बंगालियों को अपने भविष्य का निर्माण अपने घर में करने के लिए प्रेरित करता है. और यही विश्वास बंगाल को इतिहास के लिए याद किए जाने वाले राज्य से इतिहास बनाने वाले राज्य में बदल सकता है.

आखिरकार, ब्रांड बंगाल किसी लोगो, सम्मेलन या राजनीतिक नारे के बारे में नहीं है.

यह आत्मविश्वास बहाल करने के बारे में है.

यह विश्वास कि बंगाल खुद के प्रति सच्चा रहते हुए सर्वश्रेष्ठ के साथ प्रतिस्पर्धा कर सकता है. यह विश्वास कि विकास समावेशी और मानवीय हो सकता है. यह विश्वास कि संस्कृति कमजोरी नहीं बल्कि ताकत का स्रोत है. यह विश्वास कि जिस सभ्यता ने कभी भारत के पुनर्जागरण का नेतृत्व किया था, वह एक बार फिर उसके भविष्य का नेतृत्व कर सकती है.

इसलिए यह चुनावी जनादेश केवल शासन करने का जनादेश नहीं है.

यह जागृति का जनादेश है.


पश्चिम बंगाल में नया राजनीतिक युग शुरू, शुभेंदु अधिकारी ने ली मुख्यमंत्री पद की शपथ

शुभेंदु अधिकारी के मुख्यमंत्री बनने के साथ पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक नया अध्याय शुरू हो गया है.

Last Modified:
Saturday, 09 May, 2026
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पश्चिम बंगाल की राजनीति में आज एक ऐतिहासिक बदलाव दर्ज किया गया, जब भारतीय जनता पार्टी ने पहली बार राज्य में सरकार बनाते हुए सत्ता की कमान संभाली. इस राजनीतिक बदलाव के साथ आज यानी 09 मई को भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण की. कोलकाता में हुए भव्य समारोह में आयोजित यह शपथ ग्रहण राज्य की राजनीति में एक नए दौर की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है.

शुभेंदु अधिकारी के साथ 5 अन्य मंत्रियों ने ग्रहण की शपथ

कोलकाता में आयोजित शपथ ग्रहण समारोह में राज्यपाल आर. एन. रवि ने शुभेंदु अधिकारी को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई. इस अवसर पर केंद्र और राज्य के कई वरिष्ठ नेता मौजूद रहे. शपथ ग्रहण के साथ ही शुभेंदु अधिकारी पश्चिम बंगाल में भाजपा के पहले मुख्यमंत्री बन गए, जिससे राज्य की राजनीतिक दिशा में बड़ा बदलाव देखने को मिला. वहीं, शुभेंदु अधिकारी के साथ अशोक किर्तनिया, निशीथ प्रमाणिक, खुदीराम टुडु, अग्निमित्रा पॉल और दिलीत घोष ने भी मंत्री पद की शपथ ग्रहण की.

विधायक दल की बैठक में हुआ था सर्वसम्मति से चयन

मुख्यमंत्री पद के लिए शुभेंदु अधिकारी के नाम पर भाजपा विधायक दल की बैठक में सर्वसम्मति से सहमति बनी. इसके बाद उन्होंने राज्यपाल से मुलाकात कर सरकार गठन का औपचारिक दावा पेश किया. पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं ने उनके नेतृत्व पर भरोसा जताते हुए इसे संगठनात्मक मजबूती का संकेत बताया.

प्रधानमंत्री सहित कई राजनीतिक दिग्गज हुए शामिल 

शपथ ग्रहण समारोह को भव्य रूप से आयोजित किया गया, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह सहित कई केंद्रीय मंत्री और देश के करीब 20 राज्यों के मुख्यमंत्री शामिल हुए. बड़ी संख्या में भाजपा कार्यकर्ता और समर्थक भी मौजूद रहे, जिससे पूरा आयोजन एक शक्ति प्रदर्शन के रूप में नजर आया.

विधानसभा चुनाव परिणामों ने बदली तस्वीर

हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा ने 293 में से 207 सीटों पर जीत दर्ज कर स्पष्ट बहुमत हासिल किया, जबकि तृणमूल कांग्रेस 80 सीटों पर सिमट गई. इन परिणामों के बाद पहली बार राज्य में भाजपा के नेतृत्व में सरकार बनी, जिसे पार्टी ने “परिवर्तन की शुरुआत” करार दिया है.

 


शुभेंदु अधिकारी: ममता को दो बार हराने वाला नेता, अब मुख्यमंत्री रेस में सबसे आगे

भाजपा का 2026 में पश्चिम बंगाल में बहुमत और ममता बनर्जी पर अधकारी की दोहरी जीत ने शुभेंदु अधिकारी को राज्य में मुख्यमंत्री पद के प्रमुख दावेदार के रूप में स्थापित किया.

Last Modified:
Wednesday, 06 May, 2026
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पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता और भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेताशुभेंदु अधिकारी, राज्य के बदलते राजनीतिक समीकरणों में एक केंद्रीय भूमिका निभाने वाले नेता के रूप में उभरे हैं. उन्होंने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को दो बार हराया है, पहली बार 2021 के विधानसभा चुनावों में नंदीग्राम में और फिर 2026 में भवानीपुर में, भारतीय जनता पार्टी द्वारा हालिया चुनावों में बहुमत हासिल करने के बाद पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री पद के प्रमुख दावेदार के रूप में उभरते हुए.

2026 के परिणामों ने भाजपा के लिए एक ऐतिहासिक सफलता दर्ज की, जिसमें पार्टी ने 294 में से 206 सीटें जीतकर ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 15 साल के शासन का अंत कर दिया, जबकि TMC केवल 80 सीटों पर सिमट गई.

ममता बनर्जी के पूर्व करीबी रहे शुभेंदु अधिकारी का राजनीतिक सफर एक ऐसे बदलाव को दर्शाता है जिसमें वह एक भरोसेमंद सहयोगी से उनके सबसे मजबूत प्रतिद्वंद्वी बन गए.

शुरुआती करियर और TMC में उदय

राजनीतिक रूप से प्रभावशाली परिवार से आने वाले अधिकारी, सिसिर अधिकारी के पुत्र हैं, जिन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल में केंद्रीय मंत्री के रूप में सेवा दी थी. उन्होंने 1990 के दशक के मध्य में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत की और बाद में 1990 के दशक के अंत में TMC में शामिल हो गए. 2006 में वे कांथी दक्षिण से विधानसभा पहुंचे और पूर्वी बंगाल के तटीय क्षेत्रों में मजबूत संगठनात्मक आधार तैयार किया.

2007 का नंदीग्राम भूमि अधिग्रहण विरोध आंदोलन शुभेंदु अधिकारी के राजनीतिक जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ, जिसने उन्हें जमीनी स्तर पर एक मजबूत नेता के रूप में स्थापित किया और 2011 में TMC के सत्ता में आने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. इसके बाद उन्होंने 2009 और 2014 में तमलुक लोकसभा सीट से दो बार जीत हासिल की.

2016 में TMC की वापसी के बाद ममता बनर्जी ने उन्हें अपने मंत्रिमंडल में शामिल किया, जहां उन्होंने परिवहन और पर्यावरण जैसे महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी संभाली.

BJP में शामिल होना और सीधा मुकाबला

दिसंबर 2020 में आंतरिक मतभेदों के बीच शुभेंदु अधिकारी ने TMC से इस्तीफा देकर भाजपा का दामन थामा, जिसे पार्टी के वरिष्ठ नेता अमित शाह की मौजूदगी में औपचारिक रूप दिया गया. यह कदम TMC के लिए एक बड़ा संगठनात्मक झटका और भाजपा के लिए रणनीतिक लाभ माना गया. उन्होंने खुद को TMC की संगठनात्मक संरचना से परिचित एक नेता के रूप में पेश किया और “आमी एकांकर छेले” (मैं इस मिट्टी का बेटा हूं) जैसे नारे के जरिए अपनी क्षेत्रीय पहचान को मजबूत किया.

2021 का विधानसभा चुनाव उनके लिए ममता बनर्जी के खिलाफ पहला सीधा चुनावी मुकाबला था. नंदीग्राम में कड़े मुकाबले में उन्होंने मुख्यमंत्री को हराया, जो पश्चिम बंगाल के राजनीतिक इतिहास में एक बड़ा उलटफेर माना गया. हालांकि, भाजपा उस समय केवल 77 सीटें जीत सकी और सरकार नहीं बना पाई, जबकि TMC सत्ता में बनी रही.

भवानीपुर में दूसरी बड़ी जीत

2026 के चुनाव शुभेंदु अधिकारी और भाजपा दोनों के लिए निर्णायक साबित हुए. भवानीपुर, जिसे ममता बनर्जी का गढ़ माना जाता है, वहां से चुनाव लड़ते हुए उन्होंने 15,000 से अधिक मतों से जीत दर्ज की. यह ममता बनर्जी पर उनकी दूसरी जीत थी, जिसने उन्हें राज्य की राजनीति में सबसे मजबूत प्रतिद्वंद्वी के रूप में स्थापित किया.

इस जीत के बाद उन्होंने इसे जनता की भावना का प्रतिबिंब बताते हुए कहा कि यह “ममता बनर्जी की राजनीति से विदाई का संकेत” है.

शपथपत्र: मामले बढ़े, आय बढ़ी, संपत्ति घटी

भारत निर्वाचन आयोग को दिए गए हलफनामे के अनुसार, शुभेंदु अधिकारी के खिलाफ वर्तमान में 25 आपराधिक मामले दर्ज हैं, जिनमें से अधिकांश 2020 में TMC छोड़ने के बाद दर्ज हुए हैं. 2021 में उनके खिलाफ केवल एक मामला था.

उनकी कुल संपत्ति लगभग 85.9 लाख रुपये बताई गई है और कोई देनदारी नहीं है. उनके खिलाफ कुल 29 मामले लंबित बताए गए हैं.

इन मामलों में आपराधिक धमकी, हत्या के प्रयास, दंगा, धार्मिक भावनाएं भड़काना और जातिगत टिप्पणी जैसे आरोप शामिल हैं.

2022 में कलकत्ता हाई कोर्ट ने उन्हें अंतरिम संरक्षण दिया था और बिना अनुमति नए मामले दर्ज करने पर रोक लगा दी थी. अक्टूबर 2025 में कोर्ट ने उनके खिलाफ 15 मामलों को खारिज कर दिया और नई पाबंदियां भी हटा दीं.

आर्थिक रूप से उनकी आय 2020–21 के 8,13,170 रुपये से बढ़कर 2024–25 में 17,38,590 रुपये हो गई, लेकिन इस दौरान उनकी संपत्ति में गिरावट दर्ज की गई.

दोहरी जीत से बदली राजनीति की तस्वीर

दो अलग-अलग चुनावों में दो बार मुख्यमंत्री को हराकर शुभेंदु अधिकारी ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक दुर्लभ उपलब्धि हासिल की है. उनकी जीतों ने भाजपा की स्थिति को मजबूत किया है और राज्य की राजनीतिक कहानी को नए सिरे से परिभाषित किया है.

2026 के चुनाव 29 अप्रैल को हुए थे और परिणाम 4 मई को घोषित किए गए, जिसके बाद भाजपा की बड़ी जीत और अधिकारी की लगातार सफलता ने उन्हें मुख्यमंत्री पद के प्रमुख दावेदारों में शामिल कर दिया है.

रिपोर्ट्स के अनुसार, मुख्यमंत्री पद की दौड़ में दिलीप घोष, सामिक भट्टाचार्य, रूपा गांगुली, अग्निमित्रा पॉल और स्वपन दासगुप्ता जैसे नाम भी शामिल हैं.
 


AAP में बड़ी राजनीतिक हलचल, राघव चड्ढा समेत 7 राज्यसभा सांसद BJP में होंगे शामिल

राघव चड्ढा सहित आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संदीप पाठक और अशोक मित्तल ने भी भाजपा में शामिल होने की बात कही है.

Last Modified:
Friday, 24 April, 2026
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आम आदमी पार्टी (AAP) के भीतर एक बड़ी राजनीतिक उथल-पुथल देखने को मिली है, जहां राज्यसभा में पार्टी के वरिष्ठ नेता राघव चड्ढा समेत तीन सांसदों के भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल होने का दावा किया गया है. इस घटनाक्रम को AAP के लिए अब तक के सबसे बड़े राजनीतिक झटकों में से एक माना जा रहा है.

दिल्ली में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान राघव चड्ढा ने यह दावा किया कि राज्यसभा में AAP के दो-तिहाई सांसदों ने मिलकर भाजपा में विलय का निर्णय लिया है. उनके साथ राज्यसभा सांसद संदीप पाठक और अशोक मित्तल भी मौजूद रहे, जिन्होंने भी भाजपा में शामिल होने की बात कही. चड्ढा ने कहा कि यह निर्णय संविधान में दिए गए दल-विलय के प्रावधानों के तहत लिया गया है.

‘गलत पार्टी में सही इंसान’ का बयान

पार्टी छोड़ने की वजह बताते हुए राघव चड्ढा भावुक नजर आए. उन्होंने कहा कि जिस पार्टी को उन्होंने वर्षों तक मजबूत करने में योगदान दिया, वह अब अपने मूल सिद्धांतों से भटक गई है. उन्होंने आरोप लगाया कि Aam Aadmi Party अब जनहित के बजाय व्यक्तिगत हितों की ओर बढ़ रही है. चड्ढा ने कहा कि उन्हें लंबे समय से यह महसूस हो रहा था कि वे “गलत पार्टी में सही इंसान” हैं.

AAP के अन्य सांसदों को लेकर भी बड़ा दावा

रिपोर्टर्स से बातचीत में राघव चड्ढा ने यह भी दावा किया कि कई अन्य AAP सांसदों ने भी भाजपा में शामिल होने का फैसला किया है. इनमें पार्टी की असंतुष्ट नेता स्वाति मालीवाल, पूर्व क्रिकेटर हरभजन सिंह, राजेंद्र गुप्ता और विक्रम सहनी के नाम शामिल बताए गए हैं. इस दावे के साथ राज्यसभा में AAP की स्थिति काफी कमजोर होने की बात सामने आई है.

राज्यसभा में समीकरण पूरी तरह बदलने का दावा

दावों के मुताबिक, कुल सात AAP राज्यसभा सांसदों के भाजपा में शामिल होने के बाद अब उच्च सदन में पार्टी के पास केवल तीन प्रतिनिधि ही बचे हैं. इनमें संजय सिंह, एन.डी. गुप्ता और बलबीर सिंह सीचेवाल के नाम बताए जा रहे हैं.

AAP के भीतर बढ़ता संकट

राज्यसभा में नेतृत्व और आंतरिक मतभेदों को लेकर पिछले कुछ समय से तनाव की स्थिति बनी हुई थी. हालिया घटनाक्रम को उसी राजनीतिक असंतोष का नतीजा माना जा रहा है. पार्टी के भीतर यह बदलाव AAP की संगठनात्मक स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है.

भाजपा में नई राजनीतिक हलचल

इस घटनाक्रम के बाद राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है. हालांकि भाजपा की ओर से अभी तक इस कथित शामिलीकरण पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह बदलाव आधिकारिक रूप से होता है, तो यह राज्यसभा में AAP की ताकत को काफी प्रभावित कर सकता है.

फिलहाल इस पूरे घटनाक्रम को लेकर आधिकारिक पुष्टि और विस्तृत बयान का इंतजार किया जा रहा है. राजनीतिक विश्लेषकों की नजर अब इस बात पर है कि AAP नेतृत्व इस स्थिति पर क्या प्रतिक्रिया देता है और राज्यसभा में समीकरण कैसे बदलते हैं.