टैक्सपेयर्स को वित्त वर्ष 2022-23 (AY 2023-24) के लिए अपडेटेड ITR (ITR-U) 31 मार्च 2025 से पहले फाइल करना जरूरी है, वरना 50% अतिरिक्त टैक्स लगेगा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
31 मार्च 2025 तक अपडेटेड इनकम टैक्स रिटर्न (ITR-U) फाइल करने की अंतिम तारीख है. अगर इस तारीख तक रिटर्न फाइल नहीं किया गया, तो टैक्सपेयर्स को 50% ज्यादा टैक्स भरना पड़ सकता है. इनकम टैक्स विभाग ने टैक्सपेयर्स को सलाह दी है कि वे बिना किसी देरी के अपना अपडेटेड ITR फाइल करें ताकि उन्हें अधिक जुर्माना न देना पड़े.
आयकर विभाग की एडवाइजरी
आयकर विभाग ने एक एडवाइजरी जारी कर टैक्सपेयर से आग्रह किया है कि वे 31 मार्च, 2025 से पहले कम पैनेल्टी और अतिरिक्त वित्तीय बोझ को कम करने के लिए अपना अपटेडेट इनकम टैक्स रिटर्न (ITR-U) तुरंत दाखिल करें. अपडेटेड इनकम टैक्स रिटर्न दाखिल करने से टैक्स देने वालों को स्वेच्छा से किसी भी अघोषित आय का खुलासा करने या पहले से दाखिल रिटर्न में गलती को ठीक करने की इजाजत मिलती है.
Kind Attention Taxpayers!
— Income Tax India (@IncomeTaxIndia) March 24, 2025
Please file Updated ITR for AY 2023-2024 by March 31st, 2025 to avail lower additional tax of 25% and Interest.
Don’t delay, file today! pic.twitter.com/8NUYG03yBF
4.64 लाख अपडेटेड आईटीआर किए गए हैं दाखिल
वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने लोकसभा में एक लिखित जवाब में बताया कि चालू आकलन वर्ष (2024-25) में 28 फरवरी तक 4.64 लाख अपडेटेड आईटीआर दाखिल किए गए हैं और 431.20 करोड़ रुपए का कर चुकाया गया है. वर्ष 2023-24 में 29.79 लाख से अधिक आईटीआर-यू दाखिल किए गए और 2,947 करोड़ रुपए अतिरिक्त कर चुकाए गए.
अपडेटेड रिटर्न
अपडेटेड रिटर्न (ITR-U) किसी भी करदाता द्वारा दाखिल किया जा सकता है, जिसमें व्यक्ति, व्यवसाय या अन्य संस्थाएं शामिल हैं. आयकर विभाग ने सोशल मीडिया पर पोस्ट किया X पर किया कि अभी ITR-U दाखिल करना = 25% अतिरिक्त टैक्स + ब्याज. 31 मार्च, 2025 के बाद दाखिल करना = 50% अतिरिक्त टैक्स + ब्याज. कृपया आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 139(8A) के प्रावधानों के अनुसार आयकर का अपडेटेड रिटर्न दाखिल करें. 25% अतिरिक्त टैक्स और ब्याज पर कम लाभ उठाने के लिए 31 मार्च, 2025 तक दाखिल करें.
क्या हैI TR-U?
ITR-U एक फॉर्म है, इसकी मदद से करदाता अपने पहले फाइल किए गए रिटर्न में गलतियों को सुधार सकते हैं या छूटी हुई आय को शामिल कर सकते हैं. इसे 2022 में पेश किया गया था. इसके जरिए असेसमेंट ईयर के दो साल तक रिटर्न अपडेट किया जा सकता है. अगर कोई टैक्सपेयर ओरिजिनल या बिलेटेड रिटर्न भी दाखिल नहीं कर पाया है, तो भी वह।TR-U फाइल कर सकता है. हालांकि, करदाता रिफंड का दावा करने, टैक्स देनदारी कम करने या घाटे को बढ़ाने के लिए ITR-U का उपयोग नहीं कर सकते हैं.
अप्रैल 2025 से नया नियम
सरकार ITR-U फाइलिंग की अवधि दो साल से बढ़ाकर चार साल करने की योजना बना रही है. इससे करदाताओं को अघोषित आय घोषित करने के लिए अधिक समय मिलेगा, लेकिन इसके साथ ही टैक्स पेनल्टी भी अधिक होगी. अब तक पिछले चार वर्षों में 90 लाख से अधिक अपडेटेड ITR फाइल किए जा चुके हैं, जिससे सरकारी खजाने में ₹9,118 करोड़ जोड़े गए हैं.
HDFC बैंक ने तीन साल की मार्जिनल कॉस्ट ऑफ फंड्स बेस्ड लेंडिंग रेट (MCLR) में 0.05% की बढ़ोतरी की है. इसके बाद यह दर 8.55% से बढ़कर 8.60% हो गई है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देश के सबसे बड़े प्राइवेट बैंक एचडीएफसी बैंक (HDFC Bank) ने अपनी लेंडिंग दरों में बदलाव कर ग्राहकों को बड़ा झटका दिया है. बैंक ने लंबी अवधि के कर्ज, खासकर होम लोन से जुड़े मार्जिनल कॉस्ट ऑफ फंड्स बेस्ड लेंडिंग रेट (MCLR) में बढ़ोतरी की है, जिससे आने वाले समय में ग्राहकों की ईएमआई (EMI) का बोझ बढ़ सकता है. हालांकि, इसी बदलाव में बैंक ने छोटे कारोबारियों और शॉर्ट-टर्म लोन लेने वालों को राहत भी दी है, जिससे उनके ब्याज बोझ में कमी आएगी.
3 साल वाले लोन हुए महंगे, EMI बढ़ने की आशंका
HDFC बैंक ने तीन साल की MCLR में 0.05% की बढ़ोतरी की है. इसके बाद यह दर 8.55% से बढ़कर 8.60% हो गई है. इसका सीधा असर उन ग्राहकों पर पड़ेगा जिनका होम लोन या लंबी अवधि का कर्ज इस बेंचमार्क से जुड़ा हुआ है. ऐसे ग्राहकों की मासिक किस्त (EMI) में बढ़ोतरी हो सकती है.
शॉर्ट-टर्म लोन पर मिली राहत
जहां लंबी अवधि के कर्ज महंगे हुए हैं, वहीं बैंक ने शॉर्ट-टर्म कर्जों पर राहत दी है. ओवरनाइट से लेकर 6 महीने तक के MCLR में 0.05% की कटौती की गई है. इसके बाद 1 महीने की दर 8.10% से घटकर 8.05%, 3 महीने की दर 8.15% और 6 महीने की दर 8.30% हो गई है. इस फैसले से छोटे कारोबारियों और वर्किंग कैपिटल पर निर्भर कंपनियों को फायदा मिलेगा.
1 और 2 साल की दरों में कोई बदलाव नहीं
बैंक ने 1 साल और 2 साल की MCLR दरों में कोई बदलाव नहीं किया है. 1 साल की दर 8.35% और 2 साल की दर 8.45% है. इसका मतलब है कि मिड-टर्म लोन लेने वाले ग्राहकों पर फिलहाल कोई अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ेगा.
MCLR क्या होता है?
मार्जिनल कोस्ट ऑफ बेस्ड लेडिंग रेट (MCLR) वह न्यूनतम ब्याज दर है, जिससे नीचे कोई भी बैंक लोन नहीं दे सकता. इसे भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने 2016 में लागू किया था ताकि लोन की ब्याज दरों में पारदर्शिता लाई जा सके. बैंक इसे फंड की लागत, ऑपरेशनल खर्च और बाजार स्थितियों के आधार पर तय करते हैं, और अलग-अलग अवधि के लिए अलग दरें निर्धारित की जाती हैं.
एचडीएफसी बैंक के इस फैसले से साफ है कि लंबी अवधि के कर्ज लेने वालों पर दबाव बढ़ सकता है, जबकि छोटे और शॉर्ट-टर्म कर्ज लेने वालों को राहत मिली है. आने वाले समय में इसका असर होम लोन EMI और रिटेल लोन बाजार पर दिखाई दे सकता है.
छोटे नोट और सिक्कों के कैश डिपॉजिट पर तय हुई मासिक सीमा, लिमिट पार करने पर देना होगा अतिरिक्त शुल्क
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देश के सबसे बड़े प्राइवेट बैंकों में से एक HDFC बैंक ने अपने करंट अकाउंट से जुड़े नियमों में अहम बदलाव किया है. बैंक ने छोटे नोट और सिक्कों के कैश डिपॉजिट पर नई लिमिट और शुल्क संरचना लागू करने का फैसला किया है. ये नए नियम 1 जून 2026 से प्रभावी होंगे और सीधे तौर पर करंट अकाउंट धारकों को प्रभावित करेंगे. बैंक के मुताबिक, अब छोटे मूल्य के नोटों और सिक्कों के नकद जमा पर मासिक फ्री लिमिट तय कर दी गई है, जिसके बाद अतिरिक्त जमा पर शुल्क देना होगा.
छोटे नोट और सिक्कों के लिए नई मासिक सीमा
नए नियमों के तहत 20 रुपये या उससे कम मूल्य के नोट और सिक्कों के डिपॉजिट पर अब एक निश्चित सीमा तय की गई है.
1. छोटे नोटों के लिए फ्री लिमिट: ₹10,000 प्रति माह
2. सिक्कों के लिए फ्री लिमिट: ₹5,000 प्रति माह
इस सीमा से अधिक कैश जमा करने पर ग्राहकों को अतिरिक्त शुल्क देना होगा.
लिमिट पार करने पर लगेगा 2% चार्ज
नए नियमों के अनुसार, अगर कोई ग्राहक तय सीमा से अधिक कैश जमा करता है तो उस पर 2% शुल्क लगाया जाएगा. यह शुल्क जमा की गई अतिरिक्त राशि पर लागू होगा. बैंक ने स्पष्ट किया है कि यह नियम अलग-अलग प्रकार के करंट अकाउंट पर लागू होंगे और शुल्क संरचना अकाउंट कैटेगरी के अनुसार बदल सकती है.
किन अकाउंट्स पर लागू होंगे नए नियम
यह बदलाव बैंक के कई करंट अकाउंट वेरिएंट पर लागू होंगे, जिनमें शामिल हैं:
- Biz Lite+ करंट अकाउंट
- Ascent करंट अकाउंट
- Max Advantage करंट अकाउंट
- Premium करंट अकाउंट
- Regular करंट अकाउंट
- E-commerce करंट अकाउंट
- Trade करंट अकाउंट
- Flexi करंट अकाउंट
- Ultima करंट अकाउंट
- Supreme करंट अकाउंट
इसके अलावा प्रोफेशनल्स और एग्रीकल्चर से जुड़े करंट अकाउंट भी इस दायरे में आएंगे.
पहले क्या थे नियम
पहले HDFC बैंक में छोटे मूल्य के नोटों के कैश डिपॉजिट पर कोई मासिक सीमा तय नहीं थी. हालांकि शुल्क जरूर लागू था जैसे नोट डिपॉजिट पर लगभग 4% चार्ज और सिक्कों के जमा पर करीब 5% शुल्क लगता था, लेकिन अब पहली बार छोटे नोट और सिक्कों दोनों के लिए फ्री लिमिट तय की गई है.
ग्राहकों के लिए क्या बदलेगा
नए नियम लागू होने के बाद उन ग्राहकों पर असर पड़ेगा जो नियमित रूप से छोटे नोट और सिक्कों में नकद जमा करते हैं. खासकर छोटे व्यापारियों और करंट अकाउंट यूजर्स को अब कैश डिपॉजिट की योजना अधिक सावधानी से बनानी होगी.
बैंक ने साफ किया है कि ये सभी बदलाव 1 जून 2026 से लागू हो जाएंगे. ऐसे में मौजूदा और नए दोनों तरह के करंट अकाउंट धारकों को इन नियमों को समझकर ही कैश ट्रांजैक्शन करना होगा.
यह प्लेटफॉर्म ज्वैलर्स, रिफाइनर्स, ट्रेडर्स और बड़े संस्थागत निवेशकों के साथ-साथ रिटेल निवेशकों के लिए भी फायदेमंद है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत में सोने में निवेश के पारंपरिक तरीकों के बीच अब एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है. नेशनल स्टॉक एक्सचेंज ऑफ इंडिया (NSE) ने इलेक्ट्रॉनिक गोल्ड रिसीट्स (EGRs) लॉन्च कर निवेशकों को एक नया, सुरक्षित और पारदर्शी विकल्प दिया है. यह पहल न केवल गोल्ड ट्रेडिंग को आधुनिक बनाएगी, बल्कि निवेशकों को डिजिटल और फिजिकल गोल्ड के बीच आसान कनेक्ट भी प्रदान करेगी.
क्या हैं इलेक्ट्रॉनिक गोल्ड रिसीट्स (EGRs)
इलेक्ट्रॉनिक गोल्ड रिसीट्स (EGRs) एक तरह की डीमैट सिक्योरिटीज होती हैं, जो वॉल्ट में सुरक्षित रखे गए फिजिकल गोल्ड के मालिकाना हक को दर्शाती हैं. इन्हें सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (SEBI) से मान्यता प्राप्त वॉल्ट में रखा जाता है और डिपॉजिटरी के जरिए इलेक्ट्रॉनिक रूप में मेंटेन किया जाता है. हर EGR एक तय मात्रा के सोने से जुड़ा होता है, यानी निवेशक के पास वास्तविक सोने का समर्थन मौजूद रहता है, भले ही वह डिजिटल फॉर्म में हो.
कैसे काम करेगा यह नया सिस्टम
EGRs को शेयरों की तरह एक्सचेंज पर खरीदा और बेचा जा सकता है. निवेशक जरूरत पड़ने पर इन्हें फिजिकल गोल्ड में भी बदल सकते हैं. इससे डिजिटल निवेश और वास्तविक सोने के बीच सीधा लिंक बनता है. यह सिस्टम उन निवेशकों के लिए खासतौर पर उपयोगी है जो बिना फिजिकल गोल्ड संभाले उसमें निवेश करना चाहते हैं, लेकिन जरूरत पड़ने पर उसे वास्तविक रूप में प्राप्त करने का विकल्प भी रखना चाहते हैं.
क्यों जरूरी है यह पहल
NSE के अनुसार, EGRs का उद्देश्य पारंपरिक गोल्ड ओनरशिप और फाइनेंशियल मार्केट के बीच की दूरी को कम करना है. गोल्ड ट्रेडिंग को रेगुलेटेड प्लेटफॉर्म पर लाने से कीमतों में पारदर्शिता बढ़ेगी और बेहतर प्राइस डिस्कवरी संभव होगी. इसके साथ ही यह पहल बाजार में भागीदारी बढ़ाने और निवेश प्रक्रिया को अधिक संगठित बनाने में भी मदद करेगी.
किन निवेशकों को होगा फायदा
यह प्लेटफॉर्म ज्वैलर्स, रिफाइनर्स, ट्रेडर्स और बड़े संस्थागत निवेशकों के साथ-साथ रिटेल निवेशकों के लिए भी फायदेमंद है. खास बात यह है कि छोटे निवेशक भी कम मात्रा में सोने में निवेश कर सकते हैं, जो पहले फिजिकल गोल्ड में आसान नहीं था. इससे निवेश का दायरा बढ़ेगा और गोल्ड मार्केट में नई भागीदारी देखने को मिल सकती है.
NSE की तैयारी और टेक्नोलॉजी
NSE ने इस सेगमेंट के लिए अपनी तैयारी भी पूरी कर ली है. एक्सचेंज पहले ही 1,000 ग्राम के गोल्ड बार को EGR में डीमैटेरियलाइज कर चुका है, जो इसकी ऑपरेशनल रेडीनेस को दिखाता है. यह कदम फिजिकल गोल्ड को पूरी तरह ट्रेडेबल इलेक्ट्रॉनिक फॉर्म में बदलने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
NSE के चीफ बिजनेस डेवलपमेंट ऑफिसर श्रीराम कृष्णन के मुताबिक, EGRs भारत के सबसे पसंदीदा एसेट यानी सोने से जुड़ने का एक नया और आधुनिक तरीका है. उनका कहना है कि मजबूत टेक्नोलॉजी और बेहतर लिक्विडिटी के जरिए निवेशकों को अब ज्यादा भरोसे और पारदर्शिता के साथ गोल्ड ट्रेडिंग का मौका मिलेगा.
इलेक्ट्रॉनिक गोल्ड रिसीट्स (EGRs) की शुरुआत से गोल्ड निवेश का तरीका बदल सकता है. जहां पहले निवेशक फिजिकल गोल्ड या ETF तक सीमित थे, वहीं अब उनके पास एक ऐसा विकल्प है जो डिजिटल भी है और जरूरत पड़ने पर फिजिकल में बदला भी जा सकता है.
यह पहल खासतौर पर उन निवेशकों के लिए अहम है जो सुरक्षित, पारदर्शी और आसान निवेश विकल्प की तलाश में हैं.
यह बदलाव क्रेडिट कार्ड उपयोगकर्ताओं के लिए राहत भरा कदम माना जा रहा है और आने वाले समय में बैंकिंग अनुभव को और बेहतर बनाने की दिशा में अहम भूमिका निभा सकता है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने क्रेडिट कार्ड धारकों को बड़ी राहत देते हुए लेट पेमेंट नियमों में अहम बदलाव किया है. नए नियमों के तहत अब बिल की ड्यू डेट के बाद भी ग्राहकों को 3 दिन का अतिरिक्त समय मिलेगा, जिसमें भुगतान करने पर कोई पेनल्टी नहीं लगेगी. यह नियम 1 अप्रैल 2027 से लागू होगा.
ड्यू डेट के बाद भी मिलेगा अतिरिक्त समय
नए दिशानिर्देशों के अनुसार, ड्यू डेट निकलते ही लेट फीस नहीं लगेगी. ग्राहकों को 3 दिन का ग्रेस पीरियड दिया जाएगा. उदाहरण के तौर पर, यदि आपके क्रेडिट कार्ड बिल की अंतिम तारीख 5 अप्रैल है, तो आप 8 अप्रैल तक बिना किसी अतिरिक्त शुल्क के भुगतान कर सकते हैं. यह सुविधा खासकर उन लोगों के लिए फायदेमंद होगी, जो व्यस्तता या तकनीकी कारणों से समय पर भुगतान नहीं कर पाते.
लेट फीस का नया नियम क्या है
आरबीआई ने लेट फीस की गणना को भी अधिक पारदर्शी बना दिया है. अब जुर्माना पूरे बिल पर नहीं, बल्कि केवल बकाया राशि पर लगाया जाएगा. मतलब, यदि आपने बिल का कुछ हिस्सा पहले ही चुका दिया है, तो लेट फीस सिर्फ बची हुई रकम पर ही लगेगी. इससे ग्राहकों पर अनावश्यक वित्तीय बोझ कम होगा. हालांकि, यदि 3 दिन की ग्रेस अवधि के बाद भी भुगतान नहीं किया जाता है, तो बकाया माना जाएगा और इसका असर आपके क्रेडिट स्कोर पर पड़ सकता है.
प्राकृतिक आपदा में भी मिलेगी राहत
आरबीआई ने प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित ग्राहकों के लिए भी राहत का प्रावधान किया है. अब बैंकों को राहत देने के लिए ग्राहक के आवेदन का इंतजार नहीं करना होगा. बैंक अपनी ओर से प्रभावित ग्राहकों को जरूरी सहायता प्रदान कर सकेंगे. यह नियम 1 जुलाई 2026 से लागू होगा.
किन ग्राहकों को होगा सबसे ज्यादा फायदा
इस फैसले से उन लाखों क्रेडिट कार्ड यूजर्स को फायदा मिलेगा, जो कभी-कभी ड्यू डेट मिस कर देते हैं. नया नियम न सिर्फ पेनल्टी से राहत देगा, बल्कि भुगतान प्रक्रिया को अधिक लचीला और ग्राहक-हितैषी बनाएगा.
आरबीआई के इस कदम से क्रेडिट कार्ड सिस्टम में पारदर्शिता बढ़ेगी और ग्राहकों का भरोसा मजबूत होगा. हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि ग्राहकों को फिर भी समय पर भुगतान करने की आदत बनाए रखनी चाहिए, ताकि क्रेडिट स्कोर पर कोई नकारात्मक असर न पड़े.
यह बढ़ोतरी खासतौर पर 12 से 36 महीने की FD और 36 महीने तक की RD पर लागू होगी, जो निवेशकों के बीच सबसे लोकप्रिय अवधि मानी जाती है.
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रितु राणा
बेहतर रिटर्न की तलाश कर रहे ग्राहकों के लिए एयू स्मॉल फाइनेंस बैंक (AU Small Finance Bank) ने बड़ी राहत दी है. बैंक ने सेविंग्स अकाउंट, फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) और रिकरिंग डिपॉजिट (RD) पर ब्याज दरों में बढ़ोतरी की घोषणा की है. नई दरें 23 अप्रैल 2026 से लागू हो गई हैं, जिसके तहत सीनियर सिटिजन्स को 7.75% तक और सामान्य ग्राहकों को 7.25% तक ब्याज मिलेगा.
FD और RD पर ज्यादा रिटर्न
बैंक के नए फैसले के बाद टर्म डिपॉजिट (FD और RD) पर निवेश करने वाले ग्राहकों को बेहतर रिटर्न मिलेगा. सीनियर सिटिजन्स को अधिकतम 7.75% प्रति वर्ष तक ब्याज मिलेगा, जबकि सामान्य ग्राहकों के लिए यह दर 7.25% तक है. यह बढ़ोतरी खासतौर पर 12 से 36 महीने की FD और 36 महीने तक की RD पर लागू होगी, जो निवेशकों के बीच सबसे लोकप्रिय अवधि मानी जाती है.
उदाहरण के तौर पर देखा जाए, तो अगर कोई सामान्य ग्राहक ₹1 लाख की FD एक साल के लिए 7.25% ब्याज पर करता है, तो उसे करीब ₹7,250 का ब्याज मिलेगा और मैच्योरिटी पर कुल रकम लगभग ₹1,07,250 हो जाएगी. वहीं सीनियर सिटिजन को 7.75% की दर से करीब ₹7,750 का ब्याज मिलेगा और मैच्योरिटी अमाउंट लगभग ₹1,07,750 तक पहुंच सकता है. वास्तविक रिटर्न कंपाउंडिंग और अवधि के अनुसार थोड़ा अलग हो सकता है.
वहीं, RD के मामले में, अगर कोई ग्राहक हर महीने ₹5,000 एक साल तक जमा करता है, तो कुल निवेश ₹60,000 होगा. इस पर 7.25% ब्याज दर के हिसाब से लगभग ₹2,300 से ₹2,500 तक ब्याज मिल सकता है और मैच्योरिटी पर कुल रकम करीब ₹62,300 से ₹62,500 के आसपास हो सकती है. सीनियर सिटिजन्स के लिए यह रिटर्न थोड़ा ज्यादा रहेगा.
सेविंग्स अकाउंट भी हुआ आकर्षक
सिर्फ FD और RD ही नहीं, बैंक ने सेविंग्स अकाउंट पर भी ब्याज दर बढ़ा दी है. अब ग्राहकों को सेविंग्स अकाउंट पर अधिकतम 6.75% प्रति वर्ष तक ब्याज मिलेगा. यह ब्याज दैनिक बैलेंस के आधार पर दिया जाता है, जिससे ग्राहकों को बेहतर लिक्विडिटी के साथ रिटर्न भी मिलता है.
उदाहरण के तौर पर, अगर किसी ग्राहक के अकाउंट में औसतन ₹1 लाख का बैलेंस रहता है, तो उसे सालाना करीब ₹6,750 तक का ब्याज मिल सकता है. इससे साफ है कि सेविंग्स अकाउंट अब सिर्फ पैसे रखने का जरिया नहीं, बल्कि बेहतर रिटर्न देने वाला विकल्प भी बनता जा रहा है.
नए और पुराने सभी ग्राहकों को फायदा
बैंक ने स्पष्ट किया है कि ये नई ब्याज दरें सभी ग्राहकों, नए और मौजूदा पर समान रूप से लागू होंगी. ग्राहक इन दरों का लाभ बैंक की शाखाओं और डिजिटल प्लेटफॉर्म दोनों के जरिए उठा सकते हैं.
तीनों निवेश विकल्पों का संतुलन
AU स्मॉल फाइनेंस बैंक के ये तीन प्रमुख डिपॉजिट प्रोडक्ट अलग-अलग जरूरतों को पूरा करते हैं.
1. सेविंग्स अकाउंट: दैनिक जरूरतों के लिए लिक्विडिटी
2. RD: नियमित बचत और फंड बनाने का विकल्प
3. FD: एकमुश्त निवेश पर तय रिटर्न
इन तीनों में बदलाव से ग्राहकों को शॉर्ट टर्म से लेकर लॉन्ग टर्म निवेश तक बेहतर विकल्प मिलेंगे.
ब्याज दरों में यह बढ़ोतरी ऐसे समय पर आई है जब निवेशक सुरक्षित और स्थिर रिटर्न की तलाश में हैं. AU स्मॉल फाइनेंस बैंक का यह कदम सेविंग्स और डिपॉजिट प्रोडक्ट्स को और आकर्षक बनाता है, खासकर सीनियर सिटिजन्स के लिए.
आरबीआई के अनुसार, ई-मैंडेट से जुड़े इन नियमों में बदलाव इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स और कंपनियों से मिले सुझावों के आधार पर किए गए हैं. इसका मकसद डिजिटल पेमेंट को ज्यादा सुरक्षित, सरल और यूजर-फ्रेंडली बनाना है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
डिजिटल पेमेंट को और आसान और सुरक्षित बनाने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने नए नियम लागू किए हैं. अब कार्ड बदलने पर भी ऑटोमैटिक पेमेंट (ई-मैंडेट) बाधित नहीं होगा और छोटे ट्रांजैक्शन के लिए बार-बार OTP डालने की जरूरत भी खत्म हो जाएगी.
आरबीआई के ताजा निर्देशों के मुताबिक, अगर किसी ग्राहक का डेबिट या क्रेडिट कार्ड दोबारा जारी होता है, तो पुराने कार्ड पर एक्टिव ई-मैंडेट अपने आप नए कार्ड पर ट्रांसफर हो जाएगा. इससे ग्राहकों को बार-बार ऑटो-पेमेंट सेट करने की झंझट से राहत मिलेगी.
₹15,000 तक के ऑटो-पेमेंट पर नहीं लगेगा OTP
नए नियमों के तहत हर महीने होने वाले ₹15,000 तक के ऑटोमैटिक पेमेंट के लिए अब OTP या पासवर्ड (AFA) की जरूरत नहीं होगी. इससे ओटीटी सब्सक्रिप्शन, बिजली बिल या अन्य नियमित भुगतान पहले से ज्यादा आसान हो जाएंगे. हालांकि, ₹15,000 से ज्यादा के ट्रांजैक्शन के लिए OTP आधारित वेरिफिकेशन अनिवार्य रहेगा.
कुछ मामलों में बढ़ाई गई लिमिट
आरबीआई ने कुछ जरूरी भुगतान कैटेगरी के लिए इस सीमा को बढ़ाया भी है.
1. इंश्योरेंस प्रीमियम
2. म्यूचुअल फंड की किश्तें
3. क्रेडिट कार्ड बिल पेमेंट
इन मामलों में ₹1 लाख तक के ऑटो-पेमेंट बिना OTP के किए जा सकेंगे, जिससे बड़े वित्तीय भुगतान भी सहज हो पाएंगे.
ग्राहकों से नहीं वसूला जाएगा कोई अतिरिक्त चार्ज
केंद्रीय बैंक ने साफ किया है कि ई-मैंडेट सुविधा देने के बदले ग्राहकों से किसी भी तरह का अतिरिक्त शुल्क या फीस नहीं ली जाएगी. यह कदम डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा देने के उद्देश्य से उठाया गया है.
शिकायत के लिए मजबूत सिस्टम जरूरी
आरबीआई ने बैंकों को निर्देश दिया है कि हर ऑटो-पेमेंट नोटिफिकेशन के साथ ग्राहकों को शिकायत दर्ज करने का पूरा तरीका बताया जाए. साथ ही, शिकायतों के समाधान के लिए एक मजबूत और पारदर्शी सिस्टम विकसित करना भी जरूरी होगा.
आरबीआई के अनुसार, ई-मैंडेट से जुड़े इन नियमों में बदलाव इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स और कंपनियों से मिले सुझावों के आधार पर किए गए हैं. इसका मकसद डिजिटल पेमेंट को ज्यादा सुरक्षित, सरल और यूजर-फ्रेंडली बनाना है.
इन नए नियमों से ग्राहकों को ऑटो-पेमेंट में सुविधा मिलेगी, फेल ट्रांजैक्शन कम होंगे और डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम में भरोसा बढ़ेगा. खासतौर पर सब्सक्रिप्शन और बिल पेमेंट करने वाले यूजर्स को बड़ा फायदा मिलेगा.
लोन लेते समय सिर्फ ब्याज दर ही नहीं, बल्कि प्रोसेसिंग फीस भी महत्वपूर्ण होती है. यह अलग-अलग बैंकों में 0.5% से लेकर 5% तक हो सकती है, जो कुल लोन लागत को प्रभावित करती है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
महंगाई के इस दौर में अचानक आने वाले बड़े खर्चों को पूरा करने के लिए पर्सनल लोन लोगों के लिए एक आसान विकल्प बनता जा रहा है. लेकिन सवाल यह है कि आखिर सबसे सस्ता पर्सनल लोन किस बैंक में मिल रहा है और EMI का बोझ कितना पड़ेगा. SBI, HDFC, ICICI और Axis Bank जैसे बड़े बैंकों के बीच ब्याज दरों में फर्क सीधे आपकी जेब पर असर डालता है. ऐसे में सही बैंक चुनना आपके हजारों रुपये बचा सकता है.
पर्सनल लोन लेते समय किन बातों का रखें ध्यान
विशेषज्ञों के अनुसार, पर्सनल लोन की EMI सीधे तौर पर उसकी ब्याज दर पर निर्भर करती है. कम ब्याज दर का मतलब है कम EMI. इसके अलावा अच्छा क्रेडिट स्कोर या सिबिल स्कोर होने पर बैंक बेहतर रेट पर लोन ऑफर करते हैं.
किस बैंक में मिल रहा सबसे सस्ता पर्सनल लोन
HDFC बैंक लगभग 9.99% ब्याज दर पर पर्सनल लोन दे रहा है, जबकि टाटा कैपिटल 10.99% तक चार्ज करता है, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) 10% से 15% के बीच ब्याज दर ऑफर करता है, ICICI बैंक भी करीब 9.99% पर लोन देता है, बैंक ऑफ बड़ौदा की दरें 10.15% से 18% तक जाती हैं, वहीं एक्सिस बैंक सबसे कम करीब 9.6% से लोन ऑफर कर रहा है, कोटक महिंद्रा बैंक लगभग 10.99% तक ब्याज लेता है, बैंक ऑफ इंडिया 10.85% से 16.15% के बीच लोन देता है, केनरा बैंक की दरें 9.70% से 15.15% तक हैं और पंजाब नेशनल बैंक (PNB) 10.25% से 16.80% के बीच पर्सनल लोन उपलब्ध कराता है.
विभिन्न बैंकों की ब्याज दरों की तुलना करने पर पता चलता है कि Axis Bank सबसे कम दर पर पर्सनल लोन दे रहा है. यहां ब्याज दर करीब 9.6% से शुरू होती है. अगर कोई व्यक्ति 5 लाख रुपये का लोन 5 साल के लिए लेता है, तो EMI लगभग ₹10,525 के आसपास बनती है. वहीं 1 लाख रुपये के लोन पर EMI करीब ₹2,105 रहती है.
SBI और ICICI बैंक की ब्याज दरें
स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) और ICICI बैंक भी प्रतिस्पर्धी दरों पर पर्सनल लोन ऑफर कर रहे हैं. दोनों बैंकों की ब्याज दरें लगभग 9.99% से शुरू होती हैं, जो ग्राहक की प्रोफाइल और क्रेडिट स्कोर के आधार पर बदल सकती हैं.
प्रोसेसिंग फीस भी बढ़ाती है कुल खर्च
लोन लेते समय सिर्फ ब्याज दर ही नहीं, बल्कि प्रोसेसिंग फीस भी महत्वपूर्ण होती है. यह अलग-अलग बैंकों में 0.5% से लेकर 5% तक हो सकती है, जो कुल लोन लागत को प्रभावित करती है. अगर आप सबसे सस्ता पर्सनल लोन ढूंढ रहे हैं तो केवल ब्याज दर ही नहीं, बल्कि क्रेडिट स्कोर, प्रोसेसिंग फीस और लोन टर्म की तुलना करना जरूरी है. मौजूदा डेटा के अनुसार Axis Bank और कुछ अन्य बैंक अपेक्षाकृत कम दरों पर लोन ऑफर कर रहे हैं.
नए ITR फॉर्म में बदलावों का उद्देश्य टैक्स सिस्टम को अधिक पारदर्शी, सरल और व्यवस्थित बनाना है जिसमें दो पते और दो संपर्क विवरण जैसी नई व्यवस्था के साथ कुछ जटिल रिपोर्टिंग नियमों में राहत दी गई है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) भरने वालों के लिए वित्त वर्ष 2025-26 से जुड़े असेसमेंट ईयर 2026-27 के फॉर्म में सरकार ने अहम बदलाव किए हैं. हाल ही में जारी किए गए अपडेटेड ITR फॉर्म्स में सबसे बड़ा बदलाव व्यक्तिगत जानकारी वाले सेक्शन में देखने को मिला है, जहां अब टैक्सपेयर्स को अधिक विस्तृत संपर्क और पते की जानकारी देनी होगी. इन बदलावों का उद्देश्य टैक्स फाइलिंग प्रक्रिया को अधिक सटीक और सरल बनाना बताया जा रहा है.
ITR फॉर्म में बड़ा बदलाव
नए नियमों के तहत ITR-1 से लेकर ITR-7 तक सभी फॉर्म्स में ‘पर्सनल इंफॉर्मेशन’ सेक्शन को अपडेट किया गया है. अब टैक्सपेयर्स को सिर्फ एक नहीं, बल्कि दो पते देने का विकल्प मिलेगा. पहले फॉर्म में केवल एक पता दर्ज करना होता था, लेकिन अब प्राइमरी (मुख्य) पता अनिवार्य होगा और इसके साथ सेकेंडरी (दूसरा) पता भी दर्ज किया जा सकेगा. यह बदलाव उन लोगों के लिए उपयोगी माना जा रहा है जो नौकरी या व्यवसाय के चलते अलग-अलग स्थानों पर रहते हैं.
प्राइमरी और सेकेंडरी डिटेल जरूरी
फॉर्म में संपर्क जानकारी वाले सेक्शन में भी बड़ा बदलाव किया गया है. अब एक प्राइमरी मोबाइल नंबर और ईमेल आईडी के साथ-साथ एक सेकेंडरी मोबाइल नंबर और ईमेल आईडी देने का विकल्प भी मिलेगा. इससे आयकर विभाग को टैक्सपेयर्स से संपर्क करने में अधिक सुविधा मिलेगी और रिकॉर्ड भी अधिक व्यवस्थित रहेगा.
टैक्स प्रतिनिधियों के लिए फॉर्म हुआ आसान
जो लोग किसी अन्य व्यक्ति की ओर से टैक्स रिटर्न दाखिल करते हैं, उन्हें ‘प्रतिनिधि’ कहा जाता है. पहले प्रतिनिधि से कई विस्तृत जानकारियां मांगी जाती थीं, लेकिन नए फॉर्म में प्रक्रिया को सरल कर दिया गया है. अब प्रतिनिधि के लिए केवल नाम, मोबाइल नंबर और ईमेल आईडी जैसी तीन मुख्य जानकारियां देना पर्याप्त होगा. इस बदलाव से रिटर्न फाइलिंग प्रक्रिया तेज और कम जटिल होने की उम्मीद है.
कैपिटल गेन रिपोर्टिंग में भी राहत
नए ITR फॉर्म में डुअल रिपोर्टिंग (दोहरी जानकारी देने) की व्यवस्था को हटा दिया गया है. पहले कुछ मामलों में अलग-अलग समय और दरों के आधार पर कैपिटल गेन की विस्तृत रिपोर्टिंग करनी होती थी, लेकिन चूंकि पिछले वर्ष 2024-25 में टैक्स स्लैब में कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ, इसलिए अब इस जटिल रिपोर्टिंग की आवश्यकता नहीं रही. इससे टैक्स फाइलिंग का ढांचा पहले की तुलना में अधिक सरल हो गया है.
आरबीआई ने 50,000 रुपये से अधिक के हाई-वैल्यू ट्रांजैक्शन पर अतिरिक्त ऑथेंटिकेशन की सिफारिश भी की है. इसमें विशेष रूप से वरिष्ठ नागरिकों और दिव्यांग व्यक्तियों के लिए “ट्रस्टेड पर्सन” द्वारा पुष्टि की व्यवस्था शामिल हो सकती है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय रिजर्व बैंक (Reserve Bank of India) ने डिजिटल पेमेंट फ्रॉड पर लगाम कसने के लिए एक बड़ा प्रस्ताव पेश किया है. प्रस्ताव के तहत 10,000 रुपये से अधिक के खाते-से-खाते ट्रांसफर पर एक घंटे की देरी (cooling-off period) लागू करने की बात कही गई है. इसका उद्देश्य तेजी से बढ़ रहे डिजिटल धोखाधड़ी मामलों को कम करना है.
भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में डिजिटल पेमेंट फ्रॉड के मामलों में तेज वृद्धि हुई है. अधिकतर मामले “ऑथराइज़्ड पुश पेमेंट (APP) फ्रॉड” के हैं, जहां उपयोगकर्ताओं को धोखे से खुद ही पैसे ट्रांसफर करने के लिए मजबूर किया जाता है.
1 घंटे का “कूलिंग-ऑफ पीरियड” प्रस्ताव
प्रस्ताव के मुताबिक, 10,000 रुपये से अधिक के ट्रांसफर पर 1 घंटे की देरी होगी. इस दौरान ग्राहक अपने ट्रांजैक्शन को कैंसिल भी कर सकेंगे और बैंक संदिग्ध गतिविधियों की जांच कर सकेंगे. इससे धोखेबाजों की तेजी से पैसे निकालने की रणनीति कमजोर होगी.
50,000 रुपये से ज्यादा ट्रांजैक्शन पर अतिरिक्त सुरक्षा
भारतीय रिजर्व बैंक ने 50,000 रुपये से अधिक के हाई-वैल्यू ट्रांजैक्शन पर अतिरिक्त ऑथेंटिकेशन की भी सिफारिश की है. इसमें विशेष रूप से वरिष्ठ नागरिकों और दिव्यांग व्यक्तियों के लिए “ट्रस्टेड पर्सन” द्वारा पुष्टि की व्यवस्था शामिल हो सकती है.
म्यूल अकाउंट्स पर सख्ती का प्रस्ताव
डिजिटल फ्रॉड में इस्तेमाल होने वाले “म्यूल अकाउंट्स” को रोकने के लिए भारतीय रिज़र्व बैंक ने एक और प्रस्ताव रखा है. इसके तहत कुछ खातों में सालाना 25 लाख रुपये तक की क्रेडिट लिमिट तय की जा सकती है, जब तक कि अतिरिक्त जांच पूरी न हो जाए.
यूजर कंट्रोल और “किल स्विच” की सुविधा
भारतीय रिजर्व बैंक ने सुझाव दिया है कि ग्राहकों को अपने डिजिटल ट्रांजैक्शन पर ज्यादा नियंत्रण दिया जाए. इसमें ट्रांजैक्शन लिमिट सेट करने और ऑन/ऑफ करने की सुविधा शामिल होगी. साथ ही, “किल स्विच” फीचर भी प्रस्तावित है, जिससे किसी भी संदिग्ध स्थिति में तुरंत डिजिटल ट्रांजैक्शन बंद किए जा सकेंगे.
डिजिटल पेमेंट ग्रोथ के साथ बढ़ते खतरे
पिछले एक दशक में डिजिटल पेमेंट ट्रांजैक्शन में 38 गुना वृद्धि हुई है. लेकिन इसके साथ ही फ्रॉड के मामले भी तेजी से बढ़े हैं. राष्ट्रीय साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल के अनुसार, 2021 में 2.6 लाख मामलों में 551 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था, जबकि 2025 में यह बढ़कर 28 लाख मामलों में 22,931 करोड़ रुपये तक पहुंच गया.
सोशल इंजीनियरिंग फ्रॉड बड़ी चुनौती
भारतीय रिज़र्व बैंक ने कहा है कि अब अधिकतर फ्रॉड सिस्टम हैकिंग से नहीं बल्कि सोशल इंजीनियरिंग, फर्जी पहचान, दबाव और डीपफेक जैसे तरीकों से किए जा रहे हैं. यह डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम के लिए एक नई चुनौती बन चुका है.
फायदे और चुनौतियां
इन प्रस्तावों से जहां उपभोक्ताओं की सुरक्षा बढ़ने की उम्मीद है, वहीं ट्रांजैक्शन में देरी और बैंकों पर बढ़ते अनुपालन बोझ जैसी चुनौतियां भी सामने आ सकती हैं. भारतीय रिज़र्व बैंक ने इस पर 8 मई तक हितधारकों से सुझाव मांगे हैं, जिसके बाद ड्राफ्ट गाइडलाइंस जारी की जाएंगी.
इस स्कीम का सब्सक्रिप्शन 8 अप्रैल 2026 को खुल चुका है और यह 22 अप्रैल 2026 तक निवेश के लिए उपलब्ध रहेगा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
कोटक महिंद्रा एसेट मैनेजमेंट कंपनी लिमिटेड (KMAMC) ने ‘Kotak Multi Asset Active FOF’ लॉन्च करने की घोषणा की है. यह एक ओपन-एंडेड फंड ऑफ फंड स्कीम है, जो इक्विटी-ओरिएंटेड, डेट-ओरिएंटेड और कमोडिटी-आधारित स्कीम्स में निवेश करेगी. इस स्कीम का सब्सक्रिप्शन 8 अप्रैल 2026 को खुल चुका है और यह 22 अप्रैल 2026 तक निवेश के लिए उपलब्ध रहेगा.
रिस्क-एडजस्टेड रिटर्न पर रहेगा फोकस
कोटक मल्टी एसेट एक्टिव FOF का उद्देश्य विभिन्न एसेट क्लास में निवेश के जरिए जोखिम-समायोजित (risk-adjusted) रिटर्न को बेहतर बनाना है. यह फंड सक्रिय रूप से प्रबंधित इक्विटी, डेट और कमोडिटी स्कीम्स में निवेश करेगा.
निवेशकों के लिए आसान मल्टी-एसेट समाधान
कोटक महिंद्रा एसेट मैनेजमेंट कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर निलेश शाह ने कहा कि मल्टी-एसेट पोर्टफोलियो को खुद मैनेज करना आसान लगता है, लेकिन असल में यह जटिल होता है. इसमें कई स्कीम्स पर नजर रखनी पड़ती है, रिबैलेंसिंग करनी होती है और हर बदलाव पर टैक्स का असर भी पड़ता है.
उन्होंने कहा कि यह नया फंड निवेशकों को एक ही फंड स्ट्रक्चर के तहत एसेट एलोकेशन, रिबैलेंसिंग और स्कीम चयन की सुविधा देगा, जिससे इक्विटी, डेट और कमोडिटी में डायवर्सिफिकेशन आसान होगा और टैक्स का बोझ भी कम होगा.
सक्रिय रणनीति के साथ स्थिरता और ग्रोथ का संतुलन
फंड मैनेजर देवेंद्र सिंगल ने कहा कि बाजार स्वभाव से चक्रीय (cyclical) होते हैं और कोई भी एक एसेट क्लास हमेशा बेहतर प्रदर्शन नहीं करता. यह फंड एक्टिव एलोकेशन स्ट्रेटजी अपनाएगा, जिसका उद्देश्य लॉन्ग टर्म ग्रोथ और स्थिरता के बीच संतुलन बनाना है. उन्होंने कहा कि डायवर्सिफिकेशन और अनुशासित रिबैलेंसिंग के जरिए यह फंड निवेशकों को बाजार की अस्थिरता से निपटने और लंबे समय तक निवेशित रहने में मदद करेगा.
निवेश की शर्तें और विवरण
इस स्कीम में न्यूनतम निवेश राशि 1,000 रुपये रखी गई है और इसके बाद किसी भी राशि का निवेश किया जा सकता है. अधिक जानकारी के लिए निवेशक कोटक म्यूचुअल फंड की आधिकारिक वेबसाइट पर जा सकते हैं.
कंपनी ने स्पष्ट किया है कि निवेशकों को किसी भी संदेह की स्थिति में अपने वित्तीय सलाहकार और टैक्स एक्सपर्ट से परामर्श लेना चाहिए. यह भी बताया गया है कि म्यूचुअल फंड निवेश बाजार जोखिमों के अधीन होते हैं.
(डिस्क्लेमर: म्युचुअल फंड्स बाजार निवेश जोखिमों के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)