स्पोर्ट्स लॉजिस्टिक्स में भारत की तेजी, DP World ने बताए ग्रोथ और चुनौतियों के ट्रेंड

DP World India के कंट्री मैनेजर, सबकॉन्टिनेंट, हेमंत कुमार रुइया के अनुसार, भारत में स्पोर्ट्स इवेंट्स के बढ़ते पैमाने, मल्टी-सिटी टूर्नामेंट्स और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के विस्तार ने लॉजिस्टिक्स सेक्टर के लिए नई चुनौतियां और अवसर दोनों पैदा किए हैं.

रितु राणा by
Published - Thursday, 30 April, 2026
Last Modified:
Thursday, 30 April, 2026
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वैश्विक सप्लाई चेन और स्पोर्ट्स लॉजिस्टिक्स का परिदृश्य तेजी से बदल रहा है, जहां गति, सटीकता और तकनीक की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है. भारत में स्पोर्ट्स इवेंट्स के बढ़ते पैमाने, मल्टी-सिटी टूर्नामेंट्स और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के विस्तार ने लॉजिस्टिक्स सेक्टर के लिए नई चुनौतियां और अवसर दोनों पैदा किए हैं. इसी पृष्ठभूमि में DP World India के कंट्री मैनेजर, सबकॉन्टिनेंट, हेमंत कुमार रुइया ने BusinessWorld हिंदी से विशेष बातचीत में स्पोर्ट्स लॉजिस्टिक्स की बदलती दुनिया, भारत की स्थिति और भविष्य की संभावनाओं पर विस्तार से चर्चा की.

प्रश्न 1. भारत में स्पोर्ट्स लॉजिस्टिक्स मार्केट का मौजूदा आकार क्या है और यह कितनी तेजी से बढ़ रहा है?

हेमंत कुमार रुइया: वैश्विक स्पोर्ट्स इंडस्ट्री 2025 में लगभग 534.5 अरब अमेरिकी डॉलर (करीब 44.3 लाख करोड़ रुपये) आंकी गई है, जबकि भारत में यह करीब 19 अरब अमेरिकी डॉलर (लगभग 1.3 लाख करोड़ रुपये) है. यह 12–14 प्रतिशत की CAGR से बढ़ते हुए 2030 तक 40 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक हो सकता है (KPMG डेटा). स्पोर्ट्स लॉजिस्टिक्स इस ग्रोथ का तेजी से उभरता हुआ हिस्सा है, जो लीग्स और मल्टी-सिटी टूर्नामेंट्स के विस्तार के साथ मजबूत हो रहा है.

प्रश्न 2. इस सेक्टर की सबसे बड़ी चुनौतियां क्या हैं?

हेमंत कुमार रुइया: सबसे बड़ी चुनौती सीमित समय में कई शहरों में ऑपरेशंस को मैनेज करना है. मैच शेड्यूल बेहद टाइट होते हैं, जिससे देरी की कोई गुंजाइश नहीं होती. अलग-अलग शहरों में इंफ्रास्ट्रक्चर की विविधता भी एक बड़ी चुनौती है. ऐसे में सटीक योजना और समय पर डिलीवरी बेहद जरूरी हो जाती है.

 

प्रश्न 3. वैश्विक स्पोर्ट्स लॉजिस्टिक्स के दृष्टिकोण से भारत की वर्तमान स्थिति क्या है और इस क्षेत्र में भविष्य में आपको क्या अवसर दिखाई देते हैं?

हेमंत कुमार रुइया: आज भारत उस पैमाने पर काम कर रहा है जो प्रमुख वैश्विक स्पोर्ट्स बाजारों के बराबर है. इवेंट्स की आवृत्ति और जटिलता लगातार बढ़ रही है. आगे चलकर बेहतर कनेक्टिविटी और अधिक एकीकृत (इंटीग्रेटेड) ऑपरेशंस के जरिए लॉजिस्टिक्स क्षमताओं को और मजबूत करने का एक बड़ा अवसर मौजूद है.

प्रश्न 4. भारत में स्पोर्ट्स इवेंट्स के तेजी से बढ़ने के साथ, DP World स्पोर्ट्स लॉजिस्टिक्स सेगमेंट में अपने नेटवर्क और सेवा क्षमताओं का विस्तार कैसे कर रहा है?

हेमंत कुमार रुइया: भारत में हमारा फोकस टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल के जरिए बड़े स्तर पर सप्लाई चेन को सरल और मजबूत बनाने पर है. पोर्ट्स, लॉजिस्टिक्स, रेल और वेयरहाउसिंग तक फैले हमारे ऑपरेशंस में डिजिटल सिस्टम्स का एकीकरण विजिबिलिटी और समन्वय को बेहतर बनाने के लिए बेहद जरूरी है. हम ऐसे अधिक कनेक्टेड एंड-टू-एंड सप्लाई चेन समाधान विकसित करने की दिशा में काम कर रहे हैं, जिससे कार्गो तेज़ी से और अधिक पूर्वानुमेय तरीके से मूव कर सके. इसके साथ ही हमारी मल्टीमॉडल क्षमताएं लॉजिस्टिक्स नेटवर्क के विभिन्न हिस्सों को सहज रूप से जोड़ने में मदद करती हैं. हमारा उद्देश्य अक्षमताओं को कम करना, विश्वसनीयता बढ़ाना और ऐसी सप्लाई चेन तैयार करना है जो भारत की वैश्विक व्यापार में बढ़ती भूमिका को बेहतर तरीके से सपोर्ट कर सके. 

 

प्रश्न 5.अगले एक वर्ष में DP World भारत में किन प्रमुख स्पोर्ट्स लॉजिस्टिक्स ऑपरेशंस या प्रोजेक्ट्स पर फोकस करेगा?

हेमंत कुमार रुइया: हम बड़े क्रिकेट टूर्नामेंट्स और मल्टी-सिटी ऑपरेशंस को सपोर्ट करना जारी रखेंगे, जहां सुचारु संचालन में लॉजिस्टिक्स की अहम भूमिका होती है. भारत में हमारा फोकस यह सुनिश्चित करने पर होगा कि स्पोर्ट्स लॉजिस्टिक्स विभिन्न स्थानों पर कुशलतापूर्वक काम करे और दिल्ली कैपिटल्स जैसी टीमों को समर्थन मिले, जिनके लिए हम ग्लोबल लॉजिस्टिक्स पार्टनर हैं. साथ ही हम ऐसे मजबूत सिस्टम्स विकसित करने पर काम कर रहे हैं जो भारत में बढ़ते स्पोर्ट्स इवेंट्स के पैमाने को संभाल सकें.

भारत के बाहर भी हम इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल को आगामी बड़े टूर्नामेंट्स से पहले लॉजिस्टिक जरूरतों को पूरा करने में सहयोग देना जारी रखेंगे, जिसमें जून में होने वाला ICC महिला T20 वर्ल्ड कप भी शामिल है. इसमें ब्रॉडकास्ट उपकरणों की आवाजाही जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं का समर्थन भी शामिल होगा.

प्रश्न 6. IPL जैसे टूर्नामेंट्स में, जहां लगातार अलग-अलग शहरों में मैच होते हैं, आपकी कंपनी समय-संवेदनशील लॉजिस्टिक्स को कैसे मैनेज करती है और स्पीड व एफिशिएंसी बढ़ाने के लिए कौन सी टेक्नोलॉजी या रणनीतियां अपनाती है?

हेमंत कुमार रुइया: यह पूरी तरह योजना और समन्वय पर निर्भर करता है. लगातार दिनों में अलग-अलग शहरों में मैच होने के कारण हर चीज का बेहद करीबी तालमेल जरूरी होता है. हमारी भूमिका यह सुनिश्चित करना है कि टीम को जो भी जरूरत हो, वह सही समय और सही स्थान पर पहुंचे, ताकि वे अपने प्रदर्शन पर ध्यान केंद्रित कर सकें. इन समयसीमाओं को देखते हुए निरंतरता और भरोसेमंदता बेहद महत्वपूर्ण है.

प्रश्न 7. हाई-वैल्यू और संवेदनशील स्पोर्ट्स इक्विपमेंट, जैसे ब्रॉडकास्टिंग गियर, का ट्रांसपोर्ट एक बड़ी चुनौती है. आपकी कंपनी ने सुरक्षित और समय पर डिलीवरी सुनिश्चित करने के लिए कौन से इनोवेशन, सेफ्टी प्रोटोकॉल या हैंडलिंग प्रोसेस अपनाए हैं?

हेमंत कुमार रुइया: संवेदनशील उपकरणों को संभालने के लिए हर चरण में सावधानीपूर्वक योजना और नियंत्रित मूवमेंट जरूरी होता है. इसमें उचित पैकेजिंग, सुरक्षित परिवहन और निरंतर निगरानी शामिल है. हमारा फोकस यह सुनिश्चित करने पर होता है कि उपकरण सुरक्षित पहुंचे और बिना किसी बाधा के इवेंट के लिए उपयोग हेतु तैयार रहे.

प्रश्न 8. आप अंतरराष्ट्रीय टीमों को क्रॉस-बॉर्डर लॉजिस्टिक्स में कैसे सपोर्ट करते हैं?

हेमंत कुमार रुइया: हमारा फोकस पहले से मूवमेंट की योजना बनाने और सभी संबंधित स्टेकहोल्डर्स के साथ करीबी समन्वय पर होता है. समय प्रबंधन बेहद महत्वपूर्ण है, खासकर निश्चित शेड्यूल वाले टूर्नामेंट्स में. वैश्विक स्पोर्ट्स इवेंट्स को संभालने के हमारे अनुभव से यह सुनिश्चित होता है कि उपकरण सुचारु रूप से मूव हो और समय पर अपने गंतव्य तक पहुंच जाए.

 

प्रश्न 9. स्पोर्ट्स लॉजिस्टिक्स में अचानक शेड्यूल बदलाव और मौसम से जुड़ी बाधाएं आम हैं. ऐसे में आपकी कंपनी विश्वसनीयता और निरंतरता बनाए रखने के लिए किस तरह की बैकअप प्लानिंग और रिस्क मैनेजमेंट रणनीतियां अपनाती है?

हेमंत कुमार रुइया: स्पोर्ट्स लॉजिस्टिक्स में फ्लेक्सिबिलिटी एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. हम आकस्मिक परिस्थितियों से निपटने के लिए कंटिजेंसी प्लान तैयार रखते हैं और वैकल्पिक विकल्प भी उपलब्ध रखते हैं. साथ ही, मजबूत समन्वय और रियल-टाइम विजिबिलिटी हमें तेजी से प्रतिक्रिया देने में मदद करती है. हमारी प्राथमिकता हमेशा यह रहती है कि संचालन में निरंतरता बनी रहे और किसी भी प्रकार की बाधा से इवेंट प्रभावित न हो.

यह बातचीत स्पष्ट करती है कि स्पोर्ट्स लॉजिस्टिक्स अब केवल सपोर्ट सिस्टम नहीं, बल्कि वैश्विक खेल आयोजन का एक रणनीतिक और तकनीक-आधारित स्तंभ बन चुका है. भारत इस बदलाव के केंद्र में तेजी से अपनी भूमिका मजबूत कर रहा है.


पिक्चर अभी बाकी है: ZEE की वापसी पर डॉ. सुभाष चंद्रा

डॉ. अनुराग बत्रा के साथ बातचीत में, भारत के मूल मीडिया पायनियर ने ZEE के 33 वर्षों, चुकाए गए ₹43,000 करोड़ के कर्ज और इस बात पर चर्चा की कि उनके समूह से सबसे बड़ा बदलाव अभी आना बाकी है.

डॉ. अनुराग बत्रा by
Published - Friday, 10 April, 2026
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Friday, 10 April, 2026
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भारतीय मीडिया उद्योग ने कई बदलाव देखे हैं: 1990 के दशक का एनालॉग केबल बूम, 2000 के दशक के DTH युद्ध, और आज सब कुछ बदल देने वाला स्ट्रीमिंग का दौर, लेकिन बहुत कम ऐसे लोग रहे हैं जो हर बदलाव के दौर में मौजूद रहे और सिर्फ उसका हिस्सा नहीं बने, बल्कि उसे दिशा भी दी. एस्सेल ग्रुप के चेयरमैन और जी एंटरटेनमेंट को राष्ट्रीय पहचान दिलाने वाले डॉ. सुभाष चंद्रा उन्हीं में से एक हैं.

अपने 75वें जन्मदिन के मौके पर BW बिजनेसवर्ल्ड के चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ तथा Exchange4media ग्रुप के फाउंडर व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा के साथ विस्तृत बातचीत में, सुभाष चंद्रा ने अपनी असफलताओं, चुनौतियों और इस विश्वास पर खुलकर बात की कि जी का सबसे अच्छा दौर अभी आना बाकी है.

वो शख्स जो उम्र नहीं गिनता

करीब छह दशकों से व्यवसाय में सक्रिय रहने वाले चंद्रा उम्र को लेकर बेहद सहज हैं. 30 नवंबर 2025 को वे 75 साल के हो गए.

“ये मेरे लिए सिर्फ एक संख्या है, इससे ज्यादा कुछ नहीं,” उन्होंने कहा. “मैं खुद को 35 या 37 साल जैसा महसूस करता हूं.” उनके साथ काम करने वाले भी इससे सहमत हैं. वे आज भी वीकेंड पर ऑफिस आते हैं, फैसले तेजी से लेते हैं और वही ऊर्जा दिखाते हैं जो जी के शुरुआती दिनों में दिखती थी.

यह ऊर्जा सिर्फ महत्वाकांक्षा से नहीं, बल्कि मजबूरी से आई. 1966 में उनके परिवार का व्यवसाय खत्म हो गया था. इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ रहे चंद्र को एक पोस्टकार्ड मिला, जिसमें घर लौटने को कहा गया क्योंकि परिवार उनकी पढ़ाई का खर्च नहीं उठा सकता था. तब उनकी उम्र 17 साल थी.

“तब से मैंने हमेशा अपनी सीमाओं को आगे बढ़ाया है. मुझे ऐसा करना ही था,” उन्होंने कहा.

इसके बाद उन्होंने हिसार में जूट बैग और दाल के उप-उत्पादों का व्यापार शुरू किया और धीरे-धीरे अपनी पहचान बनाई.

जी के 33 साल और आगे की कहानी

इस साल 34 साल पूरे करने जा रही जी एंटरटेनमेंट आज भी ब्रांड पहचान के मामले में सबसे बड़ा भारतीय भाषा टीवी नेटवर्क है, हालांकि पिछले तीन वर्षों से इसके वित्तीय प्रदर्शन पर दबाव रहा है.

फरवरी में जी टीवी ने पिछले चार वर्षों में अपनी सबसे ज्यादा व्यूअरशिप हासिल की.

Pitch Madison Advertising Report 2024 के अनुसार, भारतीय टीवी विज्ञापन बाजार करीब ₹30,000 करोड़ का है, जिसमें जनरल एंटरटेनमेंट और न्यूज़ चैनलों की सबसे बड़ी हिस्सेदारी है. हालांकि, कभी मार्केट लीडर रही ज़ी की मार्केट वैल्यू करीब $14 बिलियन से घटकर $1 बिलियन से भी कम रह गई.

चंद्रा ने इसके पीछे 2019 की घटनाओं को जिम्मेदार ठहराया. IL&FS संकट के चलते एसेट-लायबिलिटी असंतुलन पैदा हुआ और एस्सेल ग्रुप भी इससे प्रभावित हुआ. ज़ी में उनकी हिस्सेदारी 42% से घटकर 5% से कम रह गई. इसके बाद कंपनी को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा, जिनमें अधिग्रहण की कोशिश, सेबी की जांच और सोनी के साथ असफल मर्जर शामिल हैं.

“इन सभी कारणों से ज़ी की प्रगति प्रभावित हुई,” उन्होंने कहा.

₹43,000 करोड़ का कर्ज चुकाने की कहानी

26 जनवरी 2019 को चंद्रा ने 26 लेंडर्स के सामने बैठकर बिना किसी कानूनी जटिलता के पूरी स्थिति स्पष्ट की और अपने बेटों पुनीत और अमित के साथ हर पैसा चुकाने का वादा किया. “हमने ₹43,000 करोड़ चुकाए, अपनी अहम संपत्तियां बेचकर,” उन्होंने कहा. “मुझे कोई पछतावा नहीं है, बल्कि मैं अब ज्यादा हल्का और खुश महसूस करता हूं.”

आज के समय में जहां कई उद्योगपति कर्ज पुनर्गठन या दिवालियापन का रास्ता अपनाते हैं, यह कदम अलग नजर आता है.

वापसी और सुधार की शुरुआत

उन्होंने कहा, जब 2022-23 में जी बोर्ड ने उन्हें वापस बुलाया, तो उन्होंने पाया कि संगठन अपनी पुरानी सफलता में ही संतुष्ट हो गया था. “मुझे इसे बदलना पड़ा. जब तक आप अपनी गलती स्वीकार नहीं करेंगे, उसे सुधार नहीं सकते.”

अब कंपनी के प्रदर्शन में सुधार के संकेत दिख रहे हैं. जी टीवी के चार शो टॉप 10 में शामिल हैं और कंपनी की व्यूअरशिप हिस्सेदारी 17% से बढ़कर 18.8% हो गई है. लक्ष्य 20% से आगे जाना है.

ओम्नी-कंटेंट रणनीति पर फोकस

चंद्रा के अनुसार, जी अब ओम्नी-कंटेंट रणनीति पर काम कर रही है.

उन्होंने कहा, “दर्शक जहां भी है, वहां कंटेंट पहुंचना चाहिए, चाहे वह टीवी हो, डिजिटल हो या सोशल मीडिया.”

विज्ञापन कारोबार में बदलाव

उन्होंने जी की 500 सदस्यीय विज्ञापन टीम में से करीब 300 लोगों से मुलाकात की. उन्होंने कहा, “आपको अपने विज्ञापनदाता की समस्या हल करनी होगी. वही आपकी सैलरी देता है.”

ICL पर स्वीकार की गई गलती

2007 में शुरू हुई इंडियन क्रिकेट लीग (ICL) को लेकर चंद्रा ने पहली बार खुलकर कहा कि इसमें कंपनी की गलतियां थीं.

उन्होंने कहा, “ICL में हमने गलतियां कीं, इसलिए इसे बंद करना पड़ा.”

हालांकि उनका मानना है कि अगर लीग जारी रहती, तो कुछ सालों में लाभदायक हो सकती थी.

जी न्यूज और नेतृत्व की चुनौती

जी न्यूज पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि नंबर वन बनने के बाद अहंकार आ गया था और फोकस दर्शकों से हट गया था.उन्होंने कहा, “जब आप नंबर वन होते हैं, तो अहंकार आ जाता है.”

आगे क्या: एक बड़ा बदलाव संभव

चंद्रा ने संकेत दिया कि अगले दो वर्षों में जी कुछ ऐसा करने की तैयारी में है जो पूरी इंडस्ट्री के लिए बड़ा बदलाव साबित हो सकता है. हालांकि उन्होंने विस्तार से जानकारी नहीं दी, लेकिन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दौर में यह संकेत अहम माना जा रहा है.

अंतिम विचार

भारत का पहला निजी सैटेलाइट टीवी नेटवर्क शुरू करने वाले और कई नई पहल करने वाले चंद्रा आज भी कुछ नया करने की इच्छा रखते हैं.

उन्होंने कहा, “आज की ऊर्जा ही भविष्य को आकार देती है.”

उनके बाल भले ही सफेद हो गए हों, लेकिन जुनून आज भी वैसा ही है.


रेड चीफ का डिजिटल शिफ्ट: टियर-2 और टियर-3 बाजारों में बढ़े कदम, महिलाओं और सस्टेनेबिलिटी पर जोर

रेड चीफ के हेड ऑफ मार्केटिंग राहुल शर्मा का कहना है, रेड चीफ की रणनीति साफ है, डिजिटल की ओर मजबूत कदम, टियर-2 और टियर-3 बाजारों पर फोकस, और बदलती उपभोक्ता जरूरतों के अनुसार ब्रांड का विस्तार.

रितु राणा by
Published - Friday, 03 April, 2026
Last Modified:
Friday, 03 April, 2026
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डिजिटल मार्केटिंग के इस तेजी से बदलते दौर में पारंपरिक ब्रांड्स भी अपनी रणनीतियों को नए सिरे से गढ़ रहे हैं. ऐसे ही बदलाव के दौर से गुजर रहा है रेड चीफ, कंपनी ने गुरुवार को  अभिनेता आयुष्मान खुराना को अपना नया ब्रांड एंबेसडर बनाने के साथ ‘नो शॉर्टकट्स’ की नई ब्रांड फिलॉसफी पेश की है. इस मौके पर BW हिंदी ने रेड चीफ के हेड ऑफ मार्केटिंग राहुल शर्मा से खास बातचीत की, जिसमें उन्होंने डिजिटल शिफ्ट, टियर-2 और टियर-3 मार्केट पर फोकस और ब्रांड के भविष्य को लेकर खुलकर अपनी रणनीति साझा की. प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश:

रेड चीफ ने अपने मीडिया बजट में बड़े बदलाव किए हैं. इस बदलाव के पीछे आपकी रणनीति क्या रही?
राहुल शर्मा:  हमने यह बदलाव जानबूझकर और धीरे-धीरे किया है. पहले प्रिंट और टीवी पर हमारा खर्च 40-50% था, जिसे हमने घटाकर 20% कर दिया है. इस साल 60% बजट डिजिटल पर जाएगा. 10% केवल प्रिंट में, टीवी पर 10%, आउटडोर पर 10% और एक्सपीरिएंशियल मार्केटिंग में भी 10% निवेश किया जाएगा. यह कोई साहसिक रणनीति नहीं थी, बल्कि समय की जरूरत थी. लोग अब पारंपरिक मीडिया पर उतना समय नहीं दे रहे हैं, और बजट भी उसी दिशा में गया. आज कंटेंट ही सबसे अहम है. जितनी बेहतर स्टोरीटेलिंग होगी, ब्रांड उतना ही उपभोक्ताओं के दिमाग में रहेगा.

ई-कॉमर्स में रेड चीफ की रणनीति क्या है?

राहुल शर्मा: ई-कॉमर्स हमारे लिए बेहद महत्वपूर्ण है. हमारे करीब 80-85% बिजनेस का हिस्सा परफॉर्मेंस मार्केटिंग से आता है. हम Amazon, Flipkart, Myntra, Ajio जैसे सभी बड़े प्लेटफॉर्म्स पर मौजूद हैं. हमारा मानना है कि जहां पहले से करोड़ों यूजर्स आते हैं, वहीं अपनी विजिबिलिटी बढ़ाना ज्यादा समझदारी है, बजाय इसके कि हम खुद ट्रैफिक लाने पर भारी खर्च करें.

क्या आपका फोकस Gen Z पर है?

राहुल शर्मा: हमारी टारगेट ऑडियंस 25 से 40 साल की उम्र के लोग हैं. यही वह वर्ग है जहां हमारा ज्यादा मार्केटिंग निवेश जाता है. 18-24 आयु वर्ग से हमें कुछ ग्राहक अपने आप मिल जाते हैं, लेकिन हम सीधे उन्हें टारगेट नहीं करते क्योंकि हमारा प्रोडक्ट प्रीमियम है और क्वालिटी की कीमत होती है.

टियर-2 और टियर-3 शहरों को लेकर आपकी रणनीति क्या है?*

राहुल शर्मा: रेड चीफ का लगभग 70% बिजनेस टियर-2 और टियर-3 शहरों से आता है. टियर-1 से करीब 15% और मेट्रो से सिर्फ 5% योगदान है. इसलिए हमारा फोकस इन बाजारों पर बना हुआ है. यहां नई पीढ़ी को भी जोड़ना जरूरी है, क्योंकि पुरानी पीढ़ी ब्रांड को जानती है, लेकिन युवा वर्ग को जोड़ना हमारे लिए अगली चुनौती है.

रेड चीफ सिर्फ पुरुषों का ब्रांड है, लेकिन भारतीय मार्केट में महिलाओं का योगदान अधिक है. क्या आप महिलाओं के लिए भी प्रोडक्ट्स लाने पर विचार कर रहे हैं?
राहुल शर्मा:
 हां, बिल्कुल, हम महिलाओं के लिए भी अपना कैटेगरी एक्सपैंड करने जा रहे हैं. अगले सात से आठ महीनों में हम महिलाओं के लिए स्नीकर और स्पोर्ट्स शूज लॉन्च करने वाले हैं. हमारा फोकस यह सुनिश्चित करना है कि प्रोडक्ट्स सिर्फ स्टाइलिश ही न हों, बल्कि उन्हें पहनने में कम्फर्टेबल और परफॉर्मेंस फ्रेंडली भी बनाया जाए. भारतीय मार्केट में महिलाओं की खरीद शक्ति लगातार बढ़ रही है और हमें लगता है कि महिलाओं को टारगेट करना हमारे ब्रांड के विस्तार के लिए जरूरी है. हम उनके लिए डिजाइन और कलर ऑप्शन्स पर भी विशेष ध्यान दे रहे हैं, ताकि हर उम्र और लाइफस्टाइल के लिए प्रोडक्ट उपलब्ध हो.

क्या रेड चीफ पर्यावरण के अनुकूल या सस्टेनेबल प्रोडक्ट्स पर काम कर रहा है?
राहुल शर्मा:
 हां, यह हमारे ब्रांड की जिम्मेदारी का हिस्सा है. हम लगातार सस्टेनेबिलिटी प्रोडक्ट्स पर काम कर रहे हैं. इस दिशा में दो-तीन ट्रायल्स सफल हो चुके हैं, जिसमें हमने बॉयो-डिग्रेडेबल मटेरियल और पर्यावरण के अनुकूल पैकेजिंग को टेस्ट किया. अगले 7-8 महीनों में हम इन प्रोडक्ट्स को मार्केट में लॉन्च करेंगे. हमारा उद्देश्य है कि उपभोक्ताओं को क्वालिटी और स्टाइल देने के साथ-साथ पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी भी निभाई जाए. हम चाहते हैं कि युवा ग्राहक न सिर्फ हमारे डिज़ाइन और ब्रांड से जुड़ें, बल्कि हमारी सस्टेनेबिलिटी पहल को भी अपनाएं और उसका समर्थन करें.

आपने कहा कि अब आप साउथ इंडिया पर फोकस कर रहे हैं. क्या आप थोड़ा विस्तार से बता सकते हैं कि वहां आपकी रणनीति क्या होगी और क्यों यह बाजार खास है?

राहुल शर्मा: साउथ इंडिया हमारे लिए अब तक काफी अनछुआ बाजार रहा है. इस क्षेत्र में लोग रेड चीफ के नाम से परिचित हैं, लेकिन उत्पाद आसानी से उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए हमारा फोकस यहाँ सिर्फ ब्रांड जागरूकता बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि उत्पाद की उपलब्धता बढ़ाने पर भी है.

हमने यह तय किया है कि शुरुआत डिजिटल प्लेटफॉर्म्स से होगी. पहले हम ऑनलाइन रिटेल और ई-कॉमर्स का इस्तेमाल करेंगे ताकि लोगों तक हमारे प्रोडक्ट्स आसानी से पहुँचें. उसके बाद हम धीरे-धीरे रिटेल नेटवर्क बढ़ाएंगे, स्टोर और शोरूम की संख्या बढ़ाएंगे ताकि उपभोक्ता ब्रांड को न केवल ऑनलाइन बल्कि ऑफलाइन भी एक्सेस कर सकें.

साउथ इंडिया का महत्व इसलिए भी है क्योंकि यह एक बड़ा और तेजी से बढ़ता बाजार है, जहां युवा वर्ग बहुत सक्रिय है और ब्रांड्स के प्रति खुलापन ज्यादा है. हमारा उद्देश्य पुराने ग्राहकों को बनाए रखना और नए युवा उपभोक्ताओं को जोड़ना है. डिजिटल मार्केटिंग, सोशल मीडिया, और ई-कॉमर्स के माध्यम से हम पहले उन्हें ब्रांड के साथ जोड़ेगें, फिर रिटेल इंफ्रास्ट्रक्चर के जरिए उनके लिए आसान पहुँच सुनिश्चित करेंगे.

इस तरह हम सुनिश्चित करना चाहते हैं कि साउथ इंडिया में रेड चीफ सिर्फ एक जाना-पहचाना नाम न रहे, बल्कि आसानी से उपलब्ध और प्रिय ब्रांड भी बने.

 

रेड चीफ ने ‘नो शॉर्टकट्स’ की नई ब्रांड फिलॉसफी पेश की है. क्या आप बता सकते हैं कि इस सोच के पीछे कंपनी का उद्देश्य क्या है और यह उपभोक्ताओं तक क्या संदेश पहुंचाना चाहती है.

राहुल शर्मा: ‘नो शॉर्टकट्स’ हमारी ब्रांड यात्रा का मूल मंत्र है. इसका मतलब है कि किसी भी मंजिल तक पहुंचने के लिए समय, मेहनत और निरंतरता की जरूरत होती है. हम यह दिखाना चाहते हैं कि आसान या तेज रास्ता अपनाने से स्थायी गुणवत्ता और भरोसा नहीं मिलता.

हमारे फुटवियर और प्रोडक्ट्स में यह फिलॉसफी साफ झलकती है, चाहे वह डिजाइन हो, मटेरियल का चयन हो या कारीगरी. हम हर प्रोडक्ट को इस तरह तैयार करते हैं कि वह आरामदायक, स्टाइलिश और लंबे समय तक टिकाऊ हो. यह केवल एक प्रोडक्ट नहीं है, बल्कि हर कदम पर भरोसेमंद साथी के रूप में ग्राहकों के साथ खड़ा रहता है.

हमारा यह संदेश उपभोक्ताओं को प्रेरित करना है कि मेहनत और धैर्य के बिना कोई स्थायी सफलता संभव नहीं है. यही कारण है कि इस फिलॉसफी के माध्यम से हम अपने ब्रांड और प्रोडक्ट को एक नई लाइफस्टाइल और मूल्य की दिशा में प्रस्तुत कर रहे हैं.

आपने आयुष्मान खुराना को ब्रांड एंबेसडर बनाया है. क्या आप बता सकते हैं कि इस फैसले के पीछे क्या सोच है और यह ब्रांड की नई दिशा से कैसे मेल खाता है.

राहुल शर्मा: अब तक रेड चीफ की पहचान लेदर प्रोडक्ट्स और रग्ड इमेज के साथ जुड़ी थी. पहले हम ऐसे चेहरे चुनते थे जो इस रग्ड और हीरोइक इमेज को प्रतिबिंबित करें, जैसे विराट कोहली, विक्की कौशल और शाहिद कपूर. यह उस समय बिल्कुल उपयुक्त था, क्योंकि ब्रांड लेदर और ड्यूरेबिलिटी पर आधारित था. लेकिन अब हम ब्रांड के पोर्टफोलियो का विस्तार कर रहे हैं, स्पोर्ट्स शूज, स्नीकर्स और फैशन-लाइफस्टाइल सेगमेंट में कदम रख रहे हैं. ऐसे में हमें ऐसे चेहरा चाहिए था जो सिर्फ टफ या हीरोइक न हो, बल्कि आम उपभोक्ता के साथ आसानी से जुड़ सके और उनका ध्यान आकर्षित कर सके.

इस दिशा में आयुष्मान खुराना बिल्कुल फिट बैठते हैं. वह रिलेटेबल हैं, उनका मास अपील है, और उनकी इमेज अप्रोचेबल वाइब देती है जो फैशन और लाइफस्टाइल सेगमेंट में काम आती है. वह युवा वर्ग और बड़े उम्र के लोगों दोनों के साथ कनेक्ट कर सकते हैं.

यह बदलाव इसलिए भी जरूरी है क्योंकि अब हम सिर्फ लेदर पर निर्भर नहीं हैं. हमारा उद्देश्य है कि नया प्रोडक्ट सेगमेंट स्पोर्ट्स, स्नीकर्स और  लाइफस्टाइल शूज भी उपभोक्ताओं तक पहुंचे और उन्हें आकर्षित करे.

 


यूपी का औद्योगिक जोर इंफ्रा, वित्तीय अनुशासन और कानून के शासन पर आधारित है: IAS दीपक कुमार

उत्तर प्रदेश सरकार के अतिरिक्त मुख्य सचिव IAS दीपक कुमार बताते हैं कि यूपी खुद को निर्माण और आपूर्ति श्रृंखला के प्रमुख केंद्र के रूप में कैसे स्थापित कर रहा है.

Last Modified:
Monday, 30 March, 2026
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रुहैल आमीन 

जब भारत के विभिन्न राज्य निवेश को आकर्षित करने के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं, तब उत्तर प्रदेश एक अप्रत्याशित लेकिन निर्णायक अग्रणी के रूप में उभर कर सामने आया है. बड़े पैमाने पर अवसंरचना खर्च, शासन सुधारों पर तेज ध्यान और बढ़ती वैश्विक पहुँच के साथ, राज्य अपनी आर्थिक कहानी को नए सिरे से लिखने का प्रयास कर रहा है.

BW बिजनेसवर्ल्ड से इस विशेष बातचीत में, दीपक कुमार, IAS, अतिरिक्त मुख्य सचिव, उत्तर प्रदेश सरकार, इस परिवर्तन के पीछे की संरचना को स्पष्ट करते हैं. 1.78 लाख करोड़ रुपये के अवसंरचना आवंटन से लेकर प्लग-एंड-प्ले औद्योगिक हब तक, वित्तीय अनुशासन से लेकर वैश्विक निवेशक विश्वास तक, कुमार बताते हैं कि उत्तर प्रदेश खुद को निर्माण और आपूर्ति श्रृंखला का प्रमुख केंद्र कैसे बना रहा है.

उत्तर प्रदेश एकीकृत निर्माण हबों जैसे आगरा और प्रयागराज में 1,000 करोड़ रुपये से अधिक निवेश कर रहा है. ये क्लस्टर किस रणनीतिक अंतर को दूर करने के लिए बनाए गए हैं?
उत्तर प्रदेश का पिछली कई वर्षों में परिवर्तन संरचनात्मक रहा है, न कि केवल क्रमिक. आगरा और प्रयागराज में जो आप देख रहे हैं, वह एक बड़े बदलाव का हिस्सा है. राज्य औद्योगिकीकरण के लिए शहरी केंद्रों और उभरते क्षेत्रों को तैयार करने हेतु अवसंरचना में भारी निवेश कर रहा है. हाल ही में हमारे बजट में ही अवसंरचना विकास के लिए 1.78 लाख करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं. यह एक अस्थायी प्रयास नहीं है. पिछले चार से पांच वर्षों से, उत्तर प्रदेश ने लगातार हर साल 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक का अवसंरचना खर्च किया है.

आपके द्वारा उल्लेखित क्लस्टर UPSIDA और NICDC के बीच विशेष प्रयोजन वाहन के माध्यम से विकसित किए जा रहे हैं. विचार केवल भूमि आवंटन का नहीं बल्कि पूरी तरह से कार्यात्मक, प्लग-एंड-प्ले इकोसिस्टम बनाने का है. निवेशकों को सड़क, बिजली, अनुमोदन या कनेक्टिविटी की चिंता नहीं करनी पड़ती. सब कुछ पहले से तैयार है. इससे प्रवेश में बाधा काफी हद तक कम होती है और उत्पादन तक का समय तेज़ हो जाता है. यही रणनीतिक अंतर हम दूर कर रहे हैं. हम भूमि आवंटन से तैयारी की ओर बढ़ रहे हैं.

भारत में अक्सर घोषणाएँ की जाती हैं, लेकिन कार्यान्वयन असली परीक्षा बनता है. उत्तर प्रदेश में डिलीवरी सुनिश्चित करने के लिए कौन से तंत्र हैं?
उत्तर प्रदेश में कार्यान्वयन संस्थागत बना दिया गया है. हम अब अस्थायी प्रणालियों पर काम नहीं कर रहे हैं. हमने लगभग 75,000 एकड़ की मजबूत भूमि बैंक तैयार की है. इसके अलावा, हमने विभिन्न उद्योगों को कवर करने वाली 34 क्षेत्रीय नीतियाँ विकसित की हैं, जिनमें से कई को बेस्ट-इन-क्लास माना जाता है.

इन नीतियों में पूरी स्पष्टता है. सब्सिडी, प्रोत्साहन और प्रक्रियाएँ स्पष्ट रूप से परिभाषित हैं. कोई अस्पष्टता नहीं है. इसके अलावा, उत्तर प्रदेश ने प्रक्रियाओं के डी-रेगुलेशन और अपराधमुक्तिकरण में अग्रणी भूमिका निभाई है, जिससे व्यवसाय करने में आसानी बढ़ी है. राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों से प्राप्त रैंकिंग इस बदलाव को दर्शाती हैं.

सबसे महत्वपूर्ण बात, हमने अनिश्चितता को समाप्त कर दिया है. निवेशक जानते हैं कि क्या अपेक्षित है, और यह पूर्वानुमेयता अक्सर प्रोत्साहनों से अधिक मूल्यवान होती है.

भारत में औद्योगिक वृद्धि अक्सर क्षेत्रीय रूप से असंतुलित रहती है. उत्तर प्रदेश संतुलित और समावेशी विकास कैसे सुनिश्चित कर रहा है?
यह असंतुलन पहले ही पहचाना गया था. ऐतिहासिक रूप से, उत्तर प्रदेश में विकास NCR और पश्चिमी क्षेत्रों में केंद्रित था. वर्तमान दृष्टिकोण विकास का विकेंद्रीकरण है. औद्योगिक नोड पूरे राज्य में विकसित किए जा रहे हैं, विशेष रूप से पूर्वी उत्तर प्रदेश और बुंदेलखंड में.

इस बदलाव का सबसे बड़ा चालक अवसंरचना रही है. उत्तर प्रदेश भारत के लगभग 55 प्रतिशत एक्सप्रेसवे का हिस्सा है, और गंगा एक्सप्रेसवे के साथ यह 65 प्रतिशत तक बढ़ सकता है. इन कॉरिडोरों के साथ, हम 27 औद्योगिक नोड विकसित कर रहे हैं.

बुंदेलखंड इसका मजबूत उदाहरण है. बुंदेलखंड औद्योगिक विकास प्राधिकरण (BIDA) लगभग 56,000 एकड़ में फैला है, जो नोएडा से भी बड़ा है. लगभग 60 प्रतिशत भूमि पहले ही अधिग्रहित हो चुकी है. विचार सरल है: विकास प्रवासन को मजबूर नहीं करना चाहिए. अवसर लोगों तक वहीं पहुंचने चाहिए, जहाँ वे हैं.

विभिन्न उद्योगों की अलग-अलग आवश्यकताएँ होती हैं. हर क्षेत्र NCR में रहना नहीं चाहता. रक्षा, एयरोस्पेस और भारी निर्माण कम घनी क्षेत्रों को पसंद करते हैं. हमारी रणनीति उन वास्तविकताओं के अनुरूप है.

बड़े पैमाने पर अवसंरचना के लिए वित्तीय अनुशासन आवश्यक है. राज्य आक्रामक खर्च और वित्तीय विवेक को कैसे संतुलित कर रहा है?
वित्तीय अनुशासन हमारे सभी कार्यों का केंद्र है. उत्तर प्रदेश FRBM मानदंडों के तहत सबसे अनुपालनशील राज्यों में से एक है. सबसे बड़े बजट होने के बावजूद, हमने पिछले दो वर्षों से राजस्व अधिशेष बनाए रखा है, जो लगभग 36,000 से 37,000 करोड़ रुपये के बीच है.

साथ ही, हम पूंजी व्यय में सबसे बड़े निवेशकों में हैं. हमारे बजट का लगभग 20–22 प्रतिशत लगातार अवसंरचना में आवंटित किया जाता है.

यह संतुलन सतत विकास सक्षम बनाता है. अवसंरचना खर्च़ लापरवाह नहीं है. यह मापनीय, वित्तीय मजबूती और दीर्घकालीन योजना के साथ समर्थित है.

उत्तर प्रदेश में निवेशक विश्वास स्पष्ट रूप से बढ़ा है. कौन से शासन सुधारों ने यह बदलाव लाया है?
यदि मुझे एक आधारभूत कारक बताना हो, तो वह कानून के शासन की स्थापना होगी. निवेशकों को आश्वासन चाहिए कि उनके निवेश, अनुबंध और संचालन सुरक्षित हैं. यह विश्वास बन चुका है.

इसके अलावा, नीति स्पष्टता और स्थिरता ने बड़ी भूमिका निभाई है. 34 क्षेत्रीय नीतियों को नियमित रूप से अपडेट किया जाता है, जिसमें फीडबैक और सर्वोत्तम प्रथाएँ शामिल हैं.

हमने Invest UP और Nivesh Mitra प्लेटफ़ॉर्म जैसे संस्थागत समर्थन प्रणाली भी बनाई हैं. आगामी Nivesh Mitra 3.0 प्रक्रियाओं को और अधिक सुव्यवस्थित करेगा. निवेशकों को रिलेशनशिप मैनेजर नियुक्त किए जाते हैं जो उन्हें प्रवेश से वाणिज्यिक उत्पादन तक मार्गदर्शन करते हैं. मंजूरी, प्रोत्साहन और अनुमोदन तेज़ और मुख्य रूप से डिजिटाइज्ड हैं.

नेतृत्व तक पहुंच एक और महत्वपूर्ण अंतर है. निवेशक जानते हैं कि आवश्यकता होने पर वे सर्वोच्च स्तर तक पहुँच सकते हैं. यह विश्वास बनाता है.

अवसंरचना उत्तर प्रदेश की औद्योगिक रणनीति का केंद्र प्रतीत होती है. आप अवसंरचना-प्रधान विकास को राज्य के भविष्य को कैसे आकार देता देख रहे हैं?
अवसंरचना औद्योगिकीकरण की रीढ़ है. इसके बिना, केवल नीतियाँ परिणाम नहीं दे सकतीं. उत्तर प्रदेश आज देश के सबसे व्यापक अवसंरचना नेटवर्क वाले राज्यों में से एक है.

हमारे पास 16 हवाईअड्डे हैं, जिनमें चार अंतर्राष्ट्रीय हवाईअड्डे शामिल हैं. हम राष्ट्रीय जलमार्गों से जुड़े हैं, जिनमें वाराणसी-हल्दिया कॉरिडोर भी शामिल है. पूर्व और पश्चिम समर्पित फ्रेट कॉरिडोर उत्तर प्रदेश में मिलते हैं, जिसमें लगभग 33 प्रतिशत कॉरिडोर राज्य से होकर गुजरता है.

इसके अलावा, हमारे पास मजबूत जनसांख्यिकीय लाभ है. लगभग 56 प्रतिशत जनसंख्या कार्यशील श्रमशक्ति का हिस्सा है. 8,000 से अधिक उच्च शिक्षण संस्थान और STEM स्नातकों की स्थिर आपूर्ति के साथ, मानव संसाधन भी मजबूत है.

अवसंरचना, कार्यबल और नीति मिलकर एक शक्तिशाली इकोसिस्टम बनाते हैं.

कौशल विकास औद्योगिक वृद्धि के लिए महत्वपूर्ण है. राज्य कार्यबल क्षमताओं को उद्योग की आवश्यकताओं के अनुरूप कैसे बना रहा है?
कौशल विकास को संरचनात्मक और सहयोगात्मक दोनों रूपों में लिया जा रहा है. हमारे पास IITs, IIMs, तकनीकी विश्वविद्यालय, ITIs और पॉलीटेक्निक हैं, जो प्रतिभा आपूर्ति में योगदान दे रहे हैं. लगभग दो लाख युवा पहले ही STEM क्षेत्रों में प्रशिक्षित हो चुके हैं.

महत्वपूर्ण यह है कि उद्योग लिंकिंग हो. हम उद्योगों को प्रशिक्षण संस्थानों के साथ सीधे सहयोग करने का अवसर दे रहे हैं. वे पाठ्यक्रम प्रभावित कर सकते हैं, कौशल आवश्यकताएँ परिभाषित कर सकते हैं और छात्रों को प्रशिक्षित कर सकते हैं.

इसके अतिरिक्त, व्यावसायिक प्रशिक्षण को राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत कक्षा नौ से शिक्षा में शामिल किया गया है. यह सुनिश्चित करता है कि कौशल विकास जल्दी शुरू हो.

उत्तर प्रदेश विकास के लिए वैश्विक साझेदारी और बहुपक्षीय वित्त का कैसे लाभ उठा रहा है?
उत्तर प्रदेश में वैश्विक रुचि में स्पष्ट वृद्धि हुई है. विश्व बैंक और JICA जैसी संस्थाओं के साथ जुड़ाव मजबूत हुआ है. उदाहरण के लिए, हमारे पास विश्व बैंक के साथ 4,000 करोड़ रुपये की कृषि परियोजना चल रही है.

और भी उत्साहजनक यह है कि धारणा में बदलाव हुआ है. अंतर्राष्ट्रीय प्रतिनिधिमंडलों, जिनमें जापान और कनाडा शामिल हैं, ने राज्य में मजबूत रुचि दिखाई है. वे केवल हमारी नीतियों से अवगत नहीं हैं बल्कि निवेश करने के इच्छुक हैं.

यह बदलाव लगातार सुधार और जमीन पर दिखने वाली प्रगति का परिणाम है.

वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में बदलाव के साथ, आप अगले दशक में उत्तर प्रदेश को कहाँ देखते हैं?
उत्तर प्रदेश वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में प्रमुख केंद्र बनने के लिए अच्छी स्थिति में है. हमारे पास पहले से ही इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों में मजबूत निर्माण क्षमताएँ हैं. उदाहरण के लिए, भारत में मोबाइल फोन और इलेक्ट्रॉनिक घटकों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यहीं निर्मित होता है.

आगे चलकर, हम सेमीकंडक्टर, डेटा सेंटर, नवीकरणीय ऊर्जा, रक्षा और एयरोस्पेस में निवेश आकर्षित कर रहे हैं. हमारी क्षेत्रीय नीतियों की व्यापकता सुनिश्चित करती है कि हम केवल एक या दो उद्योगों तक सीमित नहीं हैं.

भू-राजनीतिक बदलाव और भारत को निर्माण स्थल के रूप में बढ़ती रुचि को देखते हुए, उत्तर प्रदेश स्वाभाविक रूप से लाभान्वित होगा. अगले 10 वर्षों में, मैं राज्य को उत्पादन और आपूर्ति श्रृंखलाओं में शीर्ष योगदानकर्ताओं में देखता हूँ.

आगामी जेवर अंतर्राष्ट्रीय हवाईअड्डा एक बड़ा आर्थिक चालक बन रहा है. आप इसके प्रभाव को कैसे देखते हैं?
जेवर अंतर्राष्ट्रीय हवाईअड्डा एक परिवर्तनकारी संपत्ति होगा, न केवल उत्तर प्रदेश के लिए बल्कि पूरे उत्तर भारत के लिए. इसे एक बहु-कार्यात्मक केंद्र के रूप में विकसित किया जा रहा है, जिसमें यात्री यातायात, कार्गो संचालन और MRO सुविधाएँ शामिल हैं.

शुरुआत में, यह लगभग 1.2 करोड़ यात्रियों को वार्षिक रूप से संभालेगा, जिसे 7 करोड़ तक बढ़ाने की क्षमता है. यह एक प्रमुख कार्गो हब के रूप में भी कार्य करेगा, जिससे विशेष रूप से कृषि और औद्योगिक उत्पादों के तेजी से परिवहन में मदद मिलेगी.

इसके चारों ओर कनेक्टिविटी बनाई जा रही है. एक्सप्रेसवे, फ्रेट कॉरिडोर और तेज रेल लिंक भी शामिल किए जा रहे हैं. यह बहुमोड़ल दृष्टिकोण लॉजिस्टिक्स दक्षता को काफी बढ़ाएगा.

कई मायनों में, जेवर उत्तर प्रदेश का विश्व से प्रवेश द्वार बनेगा.

अंत में, वर्तमान गति के साथ आप अगले पांच वर्षों में उत्तर प्रदेश को कहाँ देखते हैं?
गतिशीलता स्पष्ट है. उत्तर प्रदेश पहले से ही भारत की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, और पिछले सात वर्षों में प्रति व्यक्ति आय दोगुनी हो गई है. राजस्व में काफी वृद्धि हुई है, और वित्तीय अनुशासन बनाए रखा गया है.

अवसंरचना, औद्योगिकीकरण, कौशल विकास और शासन सुधारों पर लगातार ध्यान देने से, राज्य एक प्रमुख आर्थिक शक्ति बनने के रास्ते पर है.

दृष्टि महत्वाकांक्षी है. लक्ष्य ट्रिलियन-डॉलर अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ना है. वर्तमान गति और नीति दिशा के साथ, मुझे विश्वास है कि उत्तर प्रदेश केवल पैमाने पर नहीं बल्कि शासन और औद्योगिक विकास में मानक स्थापित करेगा.

रुहैल आमीन, BW रिपोर्टर्स
(रुहैल आमीन, सीनियर एडिटर, BW Businessworld, नई दिल्ली स्थित एक अनुभवी पत्रकार हैं. उन्हें विश्लेषणात्मक और गहन रिपोर्टिंग के लिए जाना जाता है. उनके कार्यों में पत्रकारिता की अखंडता और उत्कृष्ट कहानी कहने की प्रतिबद्धता दिखाई देती है, जिससे उन्हें उद्योग में विश्वसनीय आवाज़ के रूप में पहचान मिली है. उनके योगदान कई प्लेटफ़ॉर्मों में फैले हैं, जो लगातार पाठकों को जानकारी और मनोरंजन प्रदान करते हैं.)


CEQUIN का अगला चरण: सारा अब्दुल्ला पायलट से स्केल, सिस्टम और सामाजिक बदलाव पर बातचीत

CEQUIN की को-फाउंडर ने BW Businessworld से सामाजिक प्रभाव को बड़े स्तर पर ले जाने, बिना विश्वसनीयता या परिणामों से समझौता किए, इन सभी पहलुओं पर विस्तार से बातचीत की.

Last Modified:
Saturday, 28 March, 2026
BWHindia

रुहैल आमीन

ऐसे समय में जब जेंडर समानता की चर्चा अक्सर आंकड़ों और उपलब्धियों तक सिमट जाती है, Centre for Equity and Inclusion एक अधिक गहरे और संरचनात्मक बदलाव की दिशा में काम कर रहा है. सह-संस्थापक और चेयरपर्सन सारा अब्दुल्ला पायलट के नेतृत्व में, यह संगठन लगभग दो दशकों से जेंडर, सार्वजनिक स्थानों और सामुदायिक व्यवहार के जटिल संबंधों पर काम करते हुए केवल परिणामों पर नहीं, बल्कि उनके मूल कारणों पर भी ध्यान केंद्रित करता रहा है.

अब जब CEQUIN अपने विकास के अगले चरण में प्रवेश कर रहा है और नए भौगोलिक क्षेत्रों में विस्तार की तैयारी कर रहा है, पायलट BW Businessworld से सामाजिक प्रभाव को बड़े स्तर पर ले जाने, बिना विश्वसनीयता या परिणामों से समझौता किए, इन सभी पहलुओं पर विस्तार से बातचीत करती हैं. वह इस बात पर जोर देती हैं कि सामाजिक प्रभाव को बड़े स्तर पर फैलाना केवल विस्तार का प्रश्न नहीं है, बल्कि उसकी अखंडता और मूल भावना को बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है. पायलट बताती हैं कि दीर्घकालिक परिवर्तन के लिए सतही हस्तक्षेपों से आगे बढ़कर संरचनात्मक बदलाव आवश्यक हैं, और इसमें केवल महिलाओं ही नहीं, बल्कि पूरे समुदाय की सक्रिय भागीदारी अहम होती है. प्रस्तुत है इस बातचीत के प्रमुख अंश:

CEQUIN एक नए विकास चरण में प्रवेश कर रहा है. इस साल स्केल और प्रभाव के लिहाज से क्या मूलभूत बदलाव होंगे?

सारा अब्दुल्ला पायलट: हम एक बहुत ही रोमांचक चरण में प्रवेश कर रहे हैं. CEQUIN ने अभी 17 साल पूरे किए हैं, जो एक जमीनी संगठन के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है. यह हमें गर्व के साथ-साथ जिम्मेदारी भी देता है.

यह समय विस्तार जितना ही आत्ममंथन का भी है. हम गहराई से देख रहे हैं कि क्या काम किया है, क्या मजबूत करने की जरूरत है, और क्या आगे प्रासंगिक नहीं रहेगा. हमारे लिए विकास इसी ईमानदार आकलन से आता है.

जब हमने शुरुआत की, तो हमने छोटे और रणनीतिक रहने का निर्णय लिया था. हमारा काम दिल्ली से शुरू हुआ और फिर मेवात और राजस्थान के कुछ हिस्सों जैसे आसपास के क्षेत्रों में फैला, जहां हम करीबी जुड़ाव बनाए रख सकते थे. अब, वर्षों तक अपने मॉडलों को विकसित और परिष्कृत करने के बाद, हमें लगता है कि हम विस्तार के लिए तैयार हैं. इस साल हम बिहार में विस्तार कर रहे हैं, जो एक महत्वपूर्ण कदम है.

वर्षों में कौन-सी प्रमुख समझ ने आपके सामाजिक प्रभाव के दृष्टिकोण को आकार दिया है?

सारा अब्दुल्ला पायलट: शुरुआत में हमने जो सबसे बड़ी कमी देखी, वह सार्वजनिक स्थानों को लेकर थी. घरेलू हिंसा और कार्यस्थल असमानता पर पहले से चर्चा थी, लेकिन रोज़मर्रा के सार्वजनिक वातावरण में महिलाओं को जिन समस्याओं का सामना करना पड़ता है, उस पर बहुत कम ध्यान था.

हमने महसूस किया कि अगर कोई लड़की सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षित रूप से चल-फिर नहीं सकती, तो शिक्षा, रोजगार या समान वेतन पर बातचीत अधूरी रह जाती है. इससे हमें असमानता के “क्यों” पर ध्यान केंद्रित करने की प्रेरणा मिली.

CEQUIN में हम संरचनात्मक हिंसा को देखते हैं. लड़कियां स्कूल क्यों छोड़ रही हैं? महिलाएं कार्यबल में क्यों नहीं आ रहीं? ये अलग-अलग मुद्दे नहीं हैं. ये समाज की गहरी संरचनाओं में जड़े हुए हैं, जिनमें पितृसत्ता भी शामिल है.

हमारा काम इन मूल कारणों को संबोधित करने पर आधारित है, न कि केवल सतही हस्तक्षेप चलाने पर.

आप लड़कियों में आत्मविश्वास बढ़ाने पर व्यापक रूप से काम करते हैं. यह व्यापक सामाजिक बदलाव में कैसे बदलता है?

सारा अब्दुल्ला पायलट: हम 360-डिग्री मॉडल का पालन करते हैं. हम शुरुआत भले ही लड़की से करते हैं, लेकिन बदलाव की जिम्मेदारी केवल उसी पर नहीं होती.

हम पूरे इकोसिस्टम के साथ काम करते हैं. इसमें सामुदायिक कार्यक्रमों के जरिए पुरुष और लड़के, समूहों के माध्यम से महिलाएं, और स्कूल, RWA और कानून प्रवर्तन जैसी संस्थाएं शामिल हैं.

इसका प्रभाव समुदाय स्तर पर दिखाई देता है. उदाहरण के लिए, जिन क्षेत्रों में हमने हस्तक्षेप किया है, वहां जो स्थान पहले असुरक्षित थे, उन्हें फिर से हासिल कर सुरक्षित साझा स्थानों में बदला गया है.

जब एक लड़की आत्मविश्वास हासिल करती है, स्कूल में बनी रहती है, कम उम्र में शादी को टालती है और उच्च शिक्षा या रोजगार का सपना देखना शुरू करती है, तो इसका प्रभाव लहर की तरह फैलता है. पूरा समुदाय उसके साथ विकसित होता है.

कई वर्षों तक सीमित भौगोलिक क्षेत्र में काम करने के बाद अब विस्तार करने का आत्मविश्वास आपको कहां से मिलता है?

सारा अब्दुल्ला पायलट: यह कठोरता और सत्यापन से आता है. वर्षों में हमने संरचित मॉड्यूल, हैंडबुक और फ्रेमवर्क विकसित किए हैं, जिन्हें व्यापक रूप से परखा गया है.

हमने थर्ड-पार्टी ऑडिट, बेसलाइन और एंडलाइन आकलन, और निरंतर मॉनिटरिंग का सहारा लिया है ताकि प्रभाव को समझा जा सके. इस अनुशासन ने हमें अपने दृष्टिकोण को परिष्कृत करने में मदद की है.

आज हमें विश्वास है कि हमारा मॉडल अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में लागू किया जा सकता है, चाहे वह शहरी हो या ग्रामीण. अगर यह दिल्ली और मेवात जैसे स्थानों पर काम कर सकता है, तो अन्य जगहों पर भी कर सकता है.

जेंडर से जुड़े मुद्दों में पुरुषों की भागीदारी अभी भी विकसित हो रही है. आपने इसे कैसे अपनाया है?

सारा अब्दुल्ला पायलट: हम हमेशा मानते रहे हैं कि इस यात्रा में पुरुष और लड़के महत्वपूर्ण भागीदार हैं. जब हमने शुरुआत की थी, तब यह व्यापक रूप से समझा नहीं जाता था.

आज इसे लेकर स्वीकार्यता बढ़ी है, लेकिन हमारा दृष्टिकोण वही है. हम पुरुषों को केवल सहयोगी के रूप में नहीं देखते. हम मानते हैं कि पितृसत्तात्मक संरचनाएं उन पर भी दबाव डालती हैं.

संवाद के माध्यम से, निर्देश देने के बजाय, हम उन्हें मूल मुद्दों और बदलाव में उनकी भूमिका को समझने में मदद करते हैं. इससे अधिक टिकाऊ और समावेशी परिवर्तन आता है.

अगर जेंडर समानता हासिल करनी है, तो यह एक साझा यात्रा होनी चाहिए.

क्या आपको अभी भी जमीनी स्तर पर विरोध का सामना करना पड़ता है? यह कहां से आता है?

सारा अब्दुल्ला पायलट: हां, विरोध मौजूद है और इसे नकारना अवास्तविक होगा. यह अक्सर अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों और विश्वास प्रणालियों में मौजूद रूढ़िवादी समुदायों से आता है. लेकिन इसका समाधान टकराव नहीं, बल्कि विश्वास निर्माण है.

हमारी टीमें उन्हीं समुदायों से आती हैं जहां हम काम करते हैं. वे समय के साथ परिवारों, स्थानीय नेताओं और हितधारकों से जुड़ती हैं. बातचीत धीरे-धीरे होती है, अक्सर अनौपचारिक रूप से.

इस स्तर पर बदलाव को जल्दी नहीं लाया जा सकता. लेकिन एक बार विश्वास बन जाने के बाद, सबसे कठोर बाधाएं भी नरम पड़ने लगती हैं.

जैसे-जैसे CEQUIN विस्तार कर रहा है, आप यह कैसे सुनिश्चित करते हैं कि प्रभाव कम न हो?

सारा अब्दुल्ला पायलट: यह हमारे लिए लगातार ध्यान का क्षेत्र है. हम इस बात को लेकर स्पष्ट हैं कि हम केवल संख्या बढ़ाने के खेल में नहीं हैं.

विस्तार महत्वपूर्ण है, लेकिन गहराई की कीमत पर नहीं. हमारी प्राथमिकता प्रभाव की गुणवत्ता है. इसका मतलब है कि हम अपने मूल सिद्धांतों के प्रति सच्चे रहें, कार्यक्रमों पर करीबी निगरानी बनाए रखें और उन पहलों से पीछे हटने के लिए तैयार रहें जो हमारे विजन से मेल नहीं खातीं.

अगर कभी विस्तार और सार के बीच चयन करना पड़ा, तो हम हमेशा सार को चुनेंगे.

रुहैल आमीन, BW रिपोर्टर्स

(रुहैल आमीन, नई दिल्ली BW Businessworld के सीनियर एडिटर व एक अनुभवी पत्रकार हैं. वे अपनी पैनी विश्लेषण क्षमता और गहन रिपोर्टिंग के लिए जाने जाते हैं. उनका काम पत्रकारिता की सत्यनिष्ठा और उत्कृष्ट कहानी कहने की प्रतिबद्धता को दर्शाता है, जिससे उन्हें उद्योग में एक विश्वसनीय आवाज के रूप में पहचान मिली है. उनके योगदान कई प्लेटफॉर्म्स पर फैले हुए हैं और वे लगातार ऐसी सामग्री प्रस्तुत करते हैं जो व्यापक दर्शकों को जानकारी देने के साथ-साथ जोड़कर रखती है.)

 


स्केल तभी मायने रखता है जब उसका समझदारी से इस्तेमाल किया जाए: टोनी हर्राडीन

टोनी हर्राडीन के अनुसार भारत जैसे तेजी से उभरते बाजार में, जहां नवाचार और स्केल दोनों मौजूद हैं, कंपनियों के लिए अपार संभावनाएं हैं.

डॉ. अनुराग बत्रा by
Published - Friday, 27 March, 2026
Last Modified:
Friday, 27 March, 2026
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ओम्नीकॉम मीडिया (Omnicom Media) एशिया पैसिफिक के सीईओ टोनी हर्राडीन ने इंटीग्रेशन, क्लाइंट ट्रस्ट, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, टैलेंट इकोनॉमिक्स और वैश्विक नेटवर्क में भारत की बढ़ती भूमिका जैसे अहम विषयों पर बीडब्ल्यू बिजनेसवर्ल्ड के चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ अनुराग बत्रा से खास बातचीत की. इस विस्तृत चर्चा में उन्होंने इंडस्ट्री में हो रहे बदलावों, चुनौतियों और भविष्य की रणनीतियों पर अपनी स्पष्ट राय रखी, प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश:

ओम्नीकॉम, आईपीजी मर्जर को 90 दिन से अधिक हो चुके हैं, क्या उम्मीद से बेहतर रहा और इसने एक लीडर के रूप में आपको क्या सिखाया?

कम समय में बहुत कुछ हुआ है. हाल के समय में यह हमारे उद्योग में सबसे बड़ा संरचनात्मक बदलाव माना जा सकता है, इसलिए इसमें जटिलता होना स्वाभाविक था. जो बात सकारात्मक रूप से सामने आई है, वह है सहयोग का स्तर, जो लगभग तुरंत देखने को मिला. मर्जर के कुछ ही दिनों के भीतर अलग-अलग बाजारों की टीमें भविष्य के ऑपरेटिंग मॉडल को परिभाषित करने के लिए साथ काम करने लगी थीं.

लीडरशिप के दृष्टिकोण से यह एक मूल सत्य को दोहराता है, आप उतने ही अच्छे हैं जितनी आपकी टीम. इंटीग्रेशन के पैमाने और गति के लिए नेतृत्व स्तर पर गहरा भरोसा और क्रियान्वयन में स्पष्टता जरूरी होती है. उतना ही महत्वपूर्ण है संवाद. इस स्तर के मर्जर में स्वाभाविक रूप से अंदर और बाहर दोनों जगह चिंता होती है. साथ ही काफी अटकलें भी होती हैं, जिनमें से सभी वास्तविकता पर आधारित नहीं होतीं. ऐसे में भूमिकाओं, दिशा और उद्देश्य पर स्पष्टता देना जरूरी हो जाता है, ताकि टीमें अपने काम पर केंद्रित रहें.

संस्कृति अगला चरण है. इसमें समय लगता है, लेकिन शुरुआती संकेत, साझा सीख, खुलापन और टीमों के बीच सहयोग उत्साहजनक हैं.

क्लाइंट्स ने इस मर्जर पर कैसी प्रतिक्रिया दी है और अब आप उन्हें क्या ठोस मूल्य दे रहे हैं?

सबसे पहला और महत्वपूर्ण काम क्लाइंट्स को यह भरोसा दिलाना था कि काम सामान्य रूप से जारी रहेगा. यही कारण है कि हमारी एजेंसी ब्रांड्स, जिनमें ओएमडी, पीएचडी, हार्ट्स एंड साइंस, इनिशिएटिव, यूएम और मीडिया हब शामिल हैं, फ्रंट-एंड इंटरफेस के रूप में काम कर रही हैं. वहीं असली बदलाव पर्दे के पीछे हो रहा है. हम जुड़े हुए क्षमता इकोसिस्टम बना रहे हैं, जिसमें रणनीति, कॉमर्स, डेटा, इन्फ्लुएंसर और मापन को अधिक एकीकृत तरीके से जोड़ा जा रहा है. उद्देश्य केवल दक्षता बढ़ाना नहीं, बल्कि एक अधिक मजबूत और लचीला सिस्टम बनाना है, जिसे एजेंसियां क्लाइंट्स के लिए संचालित कर सकें.

क्लाइंट्स के नजरिए से मूल्य दो स्तरों पर है. पहला, बड़े और विविध टैलेंट पूल तक पहुंच. दूसरा, टेक्नोलॉजी क्षमताओं का एकीकरण, खासकर ओम्नी का विकास एक व्यापक, एंड-टू-एंड मार्केटिंग ऑर्केस्ट्रेशन प्लेटफॉर्म के रूप में, जिसे एक्जियम जैसे मजबूत डेटा एसेट्स का समर्थन प्राप्त है. हालांकि सबसे महत्वपूर्ण पहलू है स्पष्टता. क्लाइंट्स स्वाभाविक रूप से पूछते हैं - इसका मेरे लिए क्या मतलब है? हमारा ध्यान इस संरचनात्मक बदलाव को स्पष्ट और परिणाम-आधारित मूल्य में बदलने पर रहा है.

भारत जैसे प्रतिस्पर्धी बाजार में आपकी पेशकश को क्या अलग बनाता है?

उद्योग अक्सर समान शब्दों में बात करता है- टेक्नोलॉजी, डेटा, स्केल. अंतर इनके उपयोग में होता है. केवल स्केल अपने आप में कोई लाभ नहीं है, जब तक उसका समझदारी से इस्तेमाल न किया जाए. हमारे लिए अंतर यह है कि हम डेटा, टेक्नोलॉजी और टैलेंट को एक समेकित सिस्टम में कैसे जोड़ते हैं और हमारी टीमें विभिन्न क्षेत्रों में मिलकर कितनी प्रभावी ढंग से काम करती हैं. ओम्नीकॉम और आईपीजी दोनों की संस्कृति सहयोग पर आधारित रही है. इन्हें साथ लाकर हम अधिक एकीकृत और चुस्त सिस्टम बना सकते हैं.

कई बाजारों में हमने चैलेंजर माइंडसेट के साथ काम किया है. अब इस सोच को स्केल के साथ जोड़कर हम प्रतिस्पर्धा में बढ़त हासिल कर सकते हैं, बशर्ते इसका उपयोग सटीकता के साथ किया जाए.

क्या क्लाइंट्स फिर से इंटीग्रेटेड मॉडल की ओर बढ़ रहे हैं और आप कैसे अनुकूलन कर रहे हैं?

उद्योग हमेशा चक्रीय रहा है, कभी इंटीग्रेटेड, फिर स्पेशलाइज्ड और फिर दोबारा इंटीग्रेटेड. फिलहाल हम देख रहे हैं कि कुछ बड़े क्लाइंट्स अधिक समेकित, एंटरप्राइज-लेवल पार्टनरशिप की ओर बढ़ रहे हैं. वहीं कई क्लाइंट्स अब भी मल्टी-एजेंसी मॉडल को प्राथमिकता देते हैं, जिसमें स्वस्थ प्रतिस्पर्धा बनी रहती है. दोनों मॉडल आगे भी जारी रहेंगे. यही बात इन-हाउसिंग पर भी लागू होती है, जहां कुछ कार्य अंदर आते हैं और कुछ बाहर जाते हैं.

हमारी जिम्मेदारी है कि हम खुद को इस तरह संरचित करें कि दोनों मॉडलों को सहज रूप से सपोर्ट कर सकें. चाहे क्लाइंट एक ही पार्टनर चाहता हो या अलग-अलग विशेषज्ञ क्षमताएं, हमें दोनों ही स्थितियों में मजबूत डिलीवरी देनी चाहिए.

आउटकम-आधारित रेम्यूनरेशन को लेकर चर्चा बढ़ रही है. क्या उद्योग इसके लिए तैयार है?

हम उस दिशा में बढ़ रहे हैं, लेकिन यह बदलाव धीरे-धीरे होगा. एआई और ऑटोमेशन के बढ़ते उपयोग के साथ पारंपरिक भुगतान मॉडल, जो हेडकाउंट या कमीशन पर आधारित हैं, बदलेंगे. सिद्धांत रूप में आउटकम-आधारित मॉडल सही लगते हैं, लेकिन इन्हें लागू करना जटिल है. व्यापारिक परिणाम कई बाहरी कारकों से प्रभावित होते हैं, जिन पर एजेंसी का नियंत्रण नहीं होता.

ऐसे मॉडल के सफल होने के लिए गहरा भरोसा और साझेदारी जरूरी है. क्लाइंट्स को एजेंसी की विशेषज्ञता पर अधिक भरोसा करना होगा और एजेंसियों को अपनी क्षमता, डेटा और अनुभव से उस भरोसे को साबित करना होगा.

फीस पर दबाव के बीच क्या एजेंसियां टॉप टैलेंट को आकर्षित और बनाए रख सकती हैं?

यह इस बात पर निर्भर करता है कि हम मूल्य को कैसे परिभाषित करते हैं. कुछ पारंपरिक सेवाएं अब सामान्य हो चुकी हैं और इसमें बदलाव की संभावना कम है. लेकिन उच्च मूल्य वाले क्षेत्रों में बड़ी संभावनाएं हैं, जैसे कंसल्टेटिव थिंकिंग, एडवांस एनालिटिक्स, टेक्नोलॉजी प्लेटफॉर्म और विशेष क्षमताएं.

हमें अपने ऑपरेटिंग मॉडल पर भी पुनर्विचार करना होगा. ऑटोमेशन दोहराए जाने वाले कार्यों को संभाल सकता है, जिससे हम रणनीतिक और रचनात्मक टैलेंट में अधिक निवेश कर सकें. समय के साथ यह बदलाव अधिक टिकाऊ व्यावसायिक मॉडल बनाने में मदद करेगा.

कंसल्टिंग फर्म्स से प्रतिस्पर्धा को आप कैसे देखते हैं?

कुछ हद तक समानता है, लेकिन मुख्य अंतर क्रियान्वयन में है. कंसल्टेंट्स अक्सर रणनीतिक स्तर पर काम करते हैं. हमारी ताकत रणनीति को क्रियान्वयन से जोड़ने में है -- विचारों को बाजार में ले जाना, उनका परीक्षण करना, उनसे सीखना और लगातार सुधार करना. यह फीडबैक लूप ही एजेंसियों की प्रमुख ताकत है.

भारत की तुलना अन्य एपीएसी बाजारों से कैसे करते हैं?

भारत इस क्षेत्र के सबसे गतिशील और रोमांचक बाजारों में से एक है. इसकी खासियत है स्केल और नवाचार का संयोजन. यहां केवल वैश्विक ट्रेंड्स को अपनाया नहीं जाता, बल्कि उन्हें आकार भी दिया जाता है. डिजिटल इकोसिस्टम बेहद विविध है और क्विक कॉमर्स जैसे क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर नवाचार हो रहा है. यह उद्यमशीलता से भरपूर है और वैश्विक महत्व भी रखता है.

अगले 12 महीनों में भारत में ओम्नीकॉम मीडिया से क्या उम्मीद की जा सकती है?

निकट भविष्य में हमारे ऑपरेटिंग मॉडल को लेकर अधिक स्पष्टता सामने आएगी. इसके साथ ही टेक्नोलॉजी में निवेश जारी रहेगा, खासकर ओम्नी के विकास और भारत जैसे बाजारों के लिए उसके लोकलाइजेशन पर. जहां जरूरत होगी, वहां क्षमताओं को और मजबूत किया जाएगा. इंटीग्रेशन केवल मौजूदा ताकतों को जोड़ना नहीं है, बल्कि कमियों की पहचान कर उन्हें दूर करना भी है.

अंत में, आप किस तरह की संस्कृति बनाना चाहते हैं?

उद्यमशील, सहयोगी और जिज्ञासु. हम अपने स्केल के बावजूद चुस्त बने रहना चाहते हैं. जिज्ञासा नवाचार को बढ़ावा देती है और सहयोग विचारों को प्रभाव में बदलता है. अगर हम ऐसा वातावरण बना सकें जहां टैलेंट खुद को सशक्त महसूस करे, सीख सके, आगे बढ़ सके और प्रयोग कर सके, तो यही हमारी सफलता को परिभाषित करेगा.


“शहर तभी रहने लायक हैं जब वे प्रकृति के साथ संतुलन में हों”: दिया मिर्जा

दिया मिर्जा का मानना है कि पर्यावरण संरक्षण हमारी रोजमर्रा की आदतों से जुड़ा हुआ है. एक बोतल कम इस्तेमाल करना, पेड़ लगाना या प्लास्टिक से दूरी बनाना, ये छोटे कदम मिलकर बड़े बदलाव की दिशा तय करते हैं.

रितु राणा by
Published - Wednesday, 25 March, 2026
Last Modified:
Wednesday, 25 March, 2026
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गुरुग्राम के चक्करपुर-वजीराबाद बंध के पास Godrej Properties की ‘Neighbours with Nature’ पहल के तहत आयोजित सस्टेनेबिलिटी इवेंट में अभिनेत्री और संयुक्त राष्ट्र की पर्यावरण सद्भावना दूत (UN Environment Goodwill Ambassador) व अभिनेत्री दिया मिर्जा ने हिस्सा लिया. इस पहल का उद्देश्य शहरी क्षेत्रों में प्राकृतिक संपदाओं (ecological assets) के पुनर्स्थापन के महत्व को रेखांकित करना है. BW Businessworld की सीनियर कॉरेस्पॉन्डेंट रितु राणा से बातचीत में उन्होंने पर्यावरण, शहरीकरण और व्यक्तिगत जिम्मेदारी पर विस्तार से अपने विचार साझा किए. पेश हैं इस विशेष साक्षात्कार के विस्तृत अंश :

सवाल: गोदरेज की ‘Neighbours with Nature’ पहल को आप किस नजर से देखती हैं?

दिया मिर्जा: यह पहल मेरे वैल्यू सिस्टम से पूरी तरह मेल खाती है. चक्करपुर-वजीराबाद बंध जैसे इकोलॉजिकल कॉरिडोर का पुनर्स्थापन (restoration) बहुत जरूरी है. क्योंकि ये क्षेत्र जैव विविधता (biodiversity) को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं. आज शहरों के तेजी से फैलाव के कारण प्राकृतिक स्थान खत्म हो रहे हैं. ऐसे में अगर कंपनियां आगे आकर इन क्षेत्रों को पुनर्जीवित करने का काम करती हैं. तो यह बहुत सकारात्मक कदम है.

यह सिर्फ पर्यावरण संरक्षण नहीं. बल्कि लोगों को प्रकृति से दोबारा जोड़ने का भी प्रयास है, जो आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत है.

सवाल: आपने शहरीकरण और प्रकृति के संतुलन को लेकर क्या अनुभव किया?

दिया मिर्जा: “शहरीकरण ने हमें उन प्राकृतिक प्रणालियों से दूर कर दिया है. जिन पर हम निर्भर हैं. Godrej Properties की ‘Neighbours with Nature’ पहल यह याद दिलाती है कि अगर हम संरक्षण और पोषण का विकल्प चुनें, तो हमारे शहरों में भी प्रकृति सार्थक रूप से मौजूद रह सकती है. कोई शहर तब कहीं अधिक रहने योग्य बनता है. जब वह नेचर पॉजिटिव होता है. Godrej Miraya की मेरी यात्रा ने इस बात को और मजबूत किया कि आज के समय में असली लग्जरी अति (excess) में नहीं, बल्कि पर्यावरण के साथ संतुलन बनाने में है.”

सवाल: रियल एस्टेट सेक्टर में सस्टेनेबिलिटी को लेकर आप क्या बदलाव देखती हैं?

दिया मिर्जा: “यह देखना उत्साहजनक है कि Godrej Properties जैसे डेवलपर्स अब वैश्विक सस्टेनेबिलिटी मानकों, जैसे Indian Green Building Council के प्लैटिनम सर्टिफिकेशन के साथ खुद को जोड़ रहे हैं. इससे यह सुनिश्चित होता है कि इमारतें और स्पेस लंबे समय तक पर्यावरणीय जिम्मेदारी को ध्यान में रखकर डिजाइन और निर्मित किए जा रहे हैं. यह मुझे उम्मीद देता है कि हमारे शहरों का भविष्य सुरक्षित हाथों में है. मुझे खुशी है कि मैं ऐसी पहल का हिस्सा हूं. जो चुपचाप लेकिन सार्थक तरीके से इस बदलाव को आगे बढ़ा रही है.”

सवाल: आपके अनुसार भविष्य का एक आदर्श शहर कैसा होना चाहिए और “प्रकृति से जुड़ाव” जैसी पहल इसमें कैसे योगदान दे सकती है?

दिया मिर्जा: मेरे अनुसार आदर्श शहर वह होगा जहाँ लोग अपनी सब्ज़ियों. भोजन और प्राकृतिक संसाधनों को महत्व दें. और शहर का विकास प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर किया जाए. हर स्कूल में बच्चों द्वारा उगाए गए सब्ज़ी बगीचे हों. बच्चों के पास खेलने की खुली जगह हो. और वे स्वच्छ. स्वस्थ और प्राकृतिक वातावरण में रहें.

ऐसे शहरों में लोग अधिक पैदल चलें. साइकिल चलाएँ और निजी वाहनों की बजाय सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करें. साथ ही. कम आय वर्ग के लोग भी जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से सुरक्षित रहें. और सभी को बेहतर जीवन गुणवत्ता मिले.

“प्रकृति से जुड़ाव” जैसी पहल इस दिशा में एक मजबूत कदम है. क्योंकि यह हमें अपने प्रोजेक्ट्स की सीमाओं से बाहर निकलकर समुदाय के साथ मिलकर काम करने और पर्यावरण की जिम्मेदारी लेने के लिए प्रेरित करती है. यह पहल हमें याद दिलाती है कि छोटे-छोटे कदम, जैसे पेड़ों की रक्षा करना या लोगों को जागरूक करना भी बड़े बदलाव ला सकते हैं. जब पूरा समुदाय मिलकर काम करता है. तब ही एक आदर्श और टिकाऊ शहर का सपना साकार हो सकता है.

सवाल: आपने हाल ही में एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (TERI) द्वारा आयोजित एक समिट में बयान दिया था कि आपने करीब 15 हजार प्लास्टिक बोतलों को पर्यावरण में जाने से रोका है, यह कैसे संभव हुआ?

दिया मिर्जा: जी हां, मैंने करीब 15,000 प्लास्टिक बोतलों को पर्यावरण में जाने से रोका है और यह केवल एक आदत बदलने से संभव हुआ. हम अक्सर बाहर जाते समय पानी साथ लेकर नहीं चलते और हर जगह नई प्लास्टिक बोतल खरीद लेते हैं, चाहे वह होटल हो, ऑफिस मीटिंग हो या कोई इवेंट. मैंने 2015 से यह तय किया कि मैं हमेशा अपनी रिफिलेबल बोतल साथ रखूंगी. अगर हम यह समझें कि एक प्लास्टिक बोतल को पूरी तरह खत्म होने में लगभग *450 साल तक का समय* लग सकता है. तो यह छोटा कदम कितना बड़ा असर डाल सकता है. यह साफ हो जाता है. भारत में हर साल करोड़ों टन प्लास्टिक कचरा पैदा होता है. जिसमें सिंगल-यूज़ प्लास्टिक का बड़ा हिस्सा है. ऐसे में अगर हर व्यक्ति अपनी एक आदत बदल ले. तो इसका सामूहिक प्रभाव बहुत बड़ा हो सकता है.

सवाल: आपने अपने जीवन में और कौन-कौन से बदलाव किए हैं जो पर्यावरण के लिए महत्वपूर्ण हैं?

दिया मिर्जा: मेरे लिए सस्टेनेबिलिटी सिर्फ एक विचार नहीं. बल्कि जीवनशैली है. मैं कुछ बुनियादी बातों का हमेशा ध्यान रखती हूं जैसे मैंने सिंगल-यूज प्लास्टिक का उपयोग पूरी तरह बंद कर दिया है. हमेशा अपने बैग में कपड़े का थैला रखती हूं. जिससे प्लास्टिक बैग लेने की जरूरत नहीं पड़ती. घर में कचरे को अलग-अलग श्रेणियों में बांटकर (segregation) डिस्पोज किया जाता है.

इसके अलावा. मैं खास मौकों पर गिफ्ट देने के बजाय लोगों के नाम पर पेड़ लगवाती हूं. अब तक हजारों पेड़ लगाए जा चुके हैं. फैक्ट के तौर पर देखें. तो एक पेड़ अपने जीवनकाल में लगभग 1 टन तक कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर सकता है और वातावरण को शुद्ध करता है. इसलिए यह पहल सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि वास्तविक प्रभाव डालने वाली है.

सवाल: क्या आपको लगता है कि व्यक्तिगत स्तर पर लिए गए फैसले वास्तव में बड़े बदलाव ला सकते हैं?

दिया मिर्जा: बिल्कुल. और यही सबसे महत्वपूर्ण बात है. हम अक्सर सोचते हैं कि जब तक बड़े स्तर पर नीतियां नहीं बदलेंगी. तब तक कुछ नहीं होगा. लेकिन सच्चाई यह है कि बदलाव की शुरुआत व्यक्तिगत स्तर से ही होती है. अगर 100 लोग रोज एक प्लास्टिक बोतल कम इस्तेमाल करें. तो सालभर में यह संख्या *36,500 बोतलों* तक पहुंच जाती है. अब सोचिए. अगर लाखों लोग ऐसा करने लगें. तो इसका प्रभाव कितना व्यापक होगा.

इसी तरह, जब लोग अपने छोटे-छोटे फैसलों, जैसे पानी बचाना. प्लास्टिक से बचना. पेड़ लगाना, पर ध्यान देते हैं तो यह एक कलेक्टिव मूवमेंट बन जाता है.

निष्कर्ष

दिया मिर्जा के अनुसार. पर्यावरण संरक्षण केवल नीतियों या बड़े अभियानों तक सीमित नहीं है. बल्कि यह हमारी रोजमर्रा की आदतों और सोच से जुड़ा है. शहरों को बेहतर और रहने योग्य बनाने के लिए जरूरी है कि हम प्रकृति के साथ संतुलन बनाएं, क्योंकि असली विकास वही है. जो पर्यावरण के साथ मिलकर आगे बढ़े.


“स्पष्ट रूप से दीर्घकालिक प्रकृति का….” केंद्रीय बजट पर, बीएसई के पूर्व चेयरमैन व रवि राजन एंड कंपनी के संस्थापक और प्रबंध साझेदार एस रवि

एस रवि ने बजट पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, ''मैं टीडीएस में कुछ कमी देखना चाहता था, क्योंकि इससे नकदी प्रवाह में मदद मिल सकती थी, लेकिन परिस्थितियों को देखते हुए यह रुख समझ में आता है.”

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Thursday, 05 February, 2026
Last Modified:
Thursday, 05 February, 2026
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उर्वी श्रीवास्तव, BW रिपोर्टर्स

भारत का केंद्रीय बजट 2026 वैश्विक अनिश्चितता, भू-राजनीतिक तनावों और बाहरी मांग में सुस्ती की पृष्ठभूमि में प्रस्तुत किया गया है. इस संदर्भ में, सरकार ने सतर्क लेकिन दूरदर्शी दृष्टिकोण अपनाया है, जिसमें दीर्घकालिक विकास प्राथमिकताओं को बनाए रखते हुए राजकोषीय समेकन पर जोर दिया गया है.

बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज के पूर्व चेयरमैन और रवि राजन एंड कंपनी के संस्थापक और प्रबंध साझेदार एस रवि का मानना है कि यह बजट विवेक और रणनीतिक मंशा को दर्शाता है, भले ही इसमें सुर्खियां बटोरने वाली घोषणाएं न हों. BW बिजनसवर्ल्ड से बातचीत में, एस रवि ने बताया कि बजट क्या सही करता है, कहां यह पीछे रह जाता है, और निजी निवेश व विनिर्माण-आधारित विकास को गति देने के लिए क्या किया जाना चाहिए.

केंद्रीय बजट पर आपकी पहली प्रतिक्रिया क्या थी? आपके अनुसार इसमें क्या अच्छा किया गया है, और हम अभी भी किन बातों से चूक रहे हैं?

वर्तमान वैश्विक माहौल को देखते हुए, जिसमें भू-राजनीतिक तनाव और आर्थिक चुनौतियां शामिल हैं, यह एक काफी सुसंगत और समझदारी भरा बजट है. इसमें सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, एमएसएमई और डेटा सेंटर जैसे चुनिंदा प्राथमिक क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया गया है, जो सकारात्मक है.

यह बजट स्पष्ट रूप से दीर्घकालिक प्रकृति का है. सरकार ने 2047 तक की अपनी दृष्टि को स्पष्ट किया है, और हालांकि इसमें कुछ अल्पकालिक उपाय हैं, लेकिन व्यापक रुझान समय के साथ सतत विकास की ओर है. राजकोषीय अनुशासन बनाए रखा गया है, और परिस्थितियों को देखते हुए इसे एक काफी अच्छा बजट कहा जा सकता है.

क्या कोई ऐसे क्षेत्र हैं जिन्हें आपके अनुसार नजरअंदाज किया गया है?

मैं स्टार्टअप क्षेत्र में और अधिक की उम्मीद कर रहा था. रियल एस्टेट पर भी अधिक जोर दिया जा सकता था. ये ऐसे क्षेत्र हैं जहां अतिरिक्त उपाय मददगार हो सकते थे और जहां और अधिक किया जा सकता था.

बजट लगभग 7 प्रतिशत विकास को लक्षित करते हुए राजकोषीय समेकन को प्राथमिकता देता है. क्या सरकार ने विवेक और विकास के बीच सही संतुलन बनाया है, या जोखिमों को मध्यम अवधि के लिए टाल दिया गया है?

भारत विकास के मोर्चे पर मजबूत स्थिति में है, इसलिए उस दृष्टि से कोई बड़ी चिंता नहीं है. राजकोषीय दृष्टिकोण से भी विवेक का प्रदर्शन किया गया है. हमने अत्यधिक आवंटन या खर्च नियंत्रण की कमी नहीं देखी है.

यह भले ही कोई आकर्षक बजट न हो, लेकिन मौजूदा हालात को देखते हुए यह एक रक्षात्मक रूप से मजबूत बजट है. इसमें बचत पर भी ध्यान दिया गया है, जो एक सकारात्मक संकेत है, और एमएसएमई तथा डेटा सेंटर जैसे अधिक संवेदनशील या रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर भी ध्यान केंद्रित किया गया है.

हालांकि व्यक्तिगत कराधान लाभ को लेकर अपेक्षाएं काफी अधिक थीं, लेकिन पिछले वर्ष पहले ही महत्वपूर्ण राहत दी जा चुकी है. सरकार की अपनी राजस्व संबंधी बाध्यताएं हैं. मैं टीडीएस में कुछ कमी देखना चाहता था, क्योंकि इससे नकदी प्रवाह में मदद मिल सकती थी, लेकिन परिस्थितियों को देखते हुए यह रुख समझ में आता है.

पूंजी बाजारों में कई सुधार देखे गए हैं, जिनमें सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स में बदलाव भी शामिल है. बजट के बाद निवेशक भावना और बाजार की गहराई को आप कैसे देखते हैं?

भारतीय निवेशक लचीले हैं. सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स को लेकर अलग-अलग मत हैं. हालांकि वृद्धि शायद अपरिहार्य थी, लेकिन इसे अधिक संतुलित तरीके से, संभवतः स्लैब या वॉल्यूम आधार पर लागू किया जा सकता था.

फिर भी, जब पहले एसटीटी लागू किया गया था, तब बाजारों ने उसे आत्मसात कर लिया था. इसके पीछे एक अंतर्निहित उद्देश्य अत्यधिक सट्टेबाजी को हतोत्साहित करना भी प्रतीत होता है, विशेष रूप से डेरिवेटिव्स और फ्यूचर्स एवं ऑप्शंस में, जहां छोटे निवेशकों को अक्सर नुकसान होता है. उस दृष्टि से मंशा समझने योग्य है.

सेवाओं, विशेष रूप से वित्त और आईटी, को चयनात्मक समर्थन मिला है. क्या बजट सेवाओं को भारत के प्राथमिक विकास इंजन के रूप में पर्याप्त रूप से पहचानता है, या यह अत्यधिक विनिर्माण-केंद्रित है?

सेवाओं के लिए कुछ मजबूत उपाय हैं. सेफ हार्बर प्रावधानों में संशोधन, 15.5 प्रतिशत की दर के साथ, आईटी क्षेत्र को सार्थक संरक्षण प्रदान करता है. डेटा सेंटरों के लिए समर्थन, जिसमें कर प्रोत्साहन शामिल हैं, भी एक सकारात्मक कदम है.

वैश्विक डेटा हब बनने की भारत की महत्वाकांक्षा डिजिटल भुगतान में उसकी नेतृत्व क्षमता के अनुरूप है. डेटा और सूचना अवसंरचना भविष्य में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी. सेमीकंडक्टर के लिए 40,000 करोड़ रुपये का आवंटन भी दीर्घकालिक रणनीतिक सोच को दर्शाता है.

एक क्षेत्र जिसे पर्याप्त ध्यान नहीं मिला है, वह है रेयर अर्थ्स. भारत के पास इसके बड़े भंडार हैं, लेकिन वैश्विक उत्पादन में इसका हिस्सा केवल लगभग एक प्रतिशत है. यहां क्षमता बढ़ाने से स्वदेशी विनिर्माण को समर्थन मिल सकता है और यह एक महत्वपूर्ण राजस्व अवसर बन सकता है.

बजट निजी निवेश को आकर्षित करने के लिए सार्वजनिक पूंजीगत व्यय पर काफी हद तक निर्भर करता है. आपके अनुभव में, विशेष रूप से विनिर्माण और अवसंरचना में, निजी पूंजी के प्रवाह को क्या निर्धारित करेगा?

सरकार का 12 लाख करोड़ रुपये से अधिक का पूंजीगत व्यय आवंटन एक मजबूत संकेत है. हालांकि, कोर मैन्युफैक्चरिंग में निजी क्षेत्र की भागीदारी सीमित बनी हुई है. अधिकांश निजी निवेश बिजली, बंदरगाहों और अवसंरचना में गया है, न कि हार्डकोर विनिर्माण में.

सरकारी नीति केवल एक हद तक ही जा सकती है. निजी पूंजी को आगे आना होगा. कारोबार करने में आसानी, कर प्रोत्साहन, नियामक स्पष्टता और पूंजी तक पहुंच अत्यंत महत्वपूर्ण हैं. विशेष रूप से विनिर्माण-केंद्रित स्टार्टअप्स को कहीं अधिक प्रोत्साहन की आवश्यकता है. आज अधिकांश स्टार्टअप सेवाओं और प्रौद्योगिकी में केंद्रित हैं, न कि विनिर्माण में.

विनिर्माण में निजी खिलाड़ियों के लिए कारोबार करने में आसानी को बजट ने कितनी अच्छी तरह संबोधित किया है?

रक्षा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा सेंटर और सेमीकंडक्टर को समर्थन दिया गया है. वस्त्र क्षेत्र को भी कुछ ध्यान मिला है. हालांकि, भारी इंजीनियरिंग और कोर विनिर्माण को पर्याप्त रूप से संबोधित नहीं किया गया है.

यहीं सबसे बड़ा अंतर बना हुआ है.

विकसित भारत की भारत की दीर्घकालिक दृष्टि को देखते हुए, इस बजट में सबसे महत्वपूर्ण संरचनात्मक सुधार कौन सा गायब है?*

हार्ड मैन्युफैक्चरिंग सबसे बड़ा अंतर है. यदि भारत आयात कम करना, निर्यात बढ़ाना और रुपये को स्थिर करना चाहता है, तो विनिर्माण को बड़े पैमाने पर बढ़ाना होगा.

मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत जैसी पहलें मंशा के स्तर पर मजबूत हैं, लेकिन उनके कार्यान्वयन को और गहरा करने की आवश्यकता है. पूंजी निर्माण एक श्रृंखला है, जिसमें सरकारी नीति, निजी निवेश, बैंकिंग समर्थन और वित्तीय संस्थान शामिल हैं. इस सफलता के लिए सभी हितधारकों को सामंजस्य में काम करना होगा.

भारत हर वर्ष नवीकरणीय क्षमता जोड़ रहा है. हम सौर या पवन में एक्स गीगावाट की बात सुनते हैं. इस वृद्धि में से कितना वास्तव में आर्थिक मूल्य सृजित कर रहा है, और क्या यह क्षेत्र पूंजी पर प्रतिफल की तुलना में अधिक निर्माण कर रहा है?

अगर आप आज भारतीय नवीकरणीय क्षेत्र को देखें, तो यह नवीकरणीय ऊर्जा को लेकर वैश्विक अनिश्चितता के बावजूद एक मजबूत रुख अपना रहा है. वैश्विक स्तर पर दो विचारधाराएं हैं-एक जो नवीकरणीय ऊर्जा को स्पष्ट भविष्य मानती है, और दूसरी जो वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों को देखती रहती है.

भारत के लिए महत्वपूर्ण प्रश्न सतत विकास का है. क्या हमारा ऊर्जा संक्रमण सबसे कम लागत वाली ऊर्जा पर आधारित है? क्या यह भरोसेमंद और टिकाऊ आपूर्ति पर निर्मित है? और क्या यह उन ऊर्जा स्रोतों को प्राथमिकता देता है जो सबसे सस्ते, सबसे तेजी से लागू होने वाले और सबसे सुरक्षित हैं?

इस दृष्टि से उत्तर स्पष्ट है. आज नवीकरणीय ऊर्जा सबसे सस्ती, सबसे तेज़ और सबसे सुरक्षित ऊर्जा का स्वरूप है. सौर, पवन, हाइब्रिड मॉडल, राउंड-द-क्लॉक (आरटीसी) और फर्म एवं डिस्पैचेबल (एफडी) नवीकरणीय समाधान दीर्घकालिक रणनीति में स्पष्ट विजेता हैं.

अंततः, ऊर्जा का कोई भी रूप जो सबसे किफायती लागत प्रदान करता है, दीर्घकाल में वही प्रबल होगा, और नवीकरणीय ऊर्जा इस मोर्चे पर मजबूती से स्थापित है.

क्या ऐसे कोई अन्य क्षेत्र हैं जिन्हें अधिक ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है?

पर्यटन एक ऐसा क्षेत्र है जिस पर और अधिक ध्यान दिया जा सकता था. यह देश के सबसे बड़े नियोक्ताओं में से एक है, जो संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्रों में फैला हुआ है. यहां एक मजबूत नीतिगत पहल महत्वपूर्ण आर्थिक लाभ दे सकती है.

बैंकिंग सुधार भी महत्वपूर्ण होंगे. आज बैंकों की बैलेंस शीट कहीं अधिक मजबूत है और वे अधिक ऋण देने की स्थिति में हैं. डिजिटल बैंकिंग विकास के अगले चरण में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी.

कुल मिलाकर, यह एक उचित और व्यावहारिक बजट है. यह चुनिंदा प्राथमिकताओं पर केंद्रित है, और एक ही वर्ष में सब कुछ संबोधित नहीं किया जा सकता. असली परीक्षा यह होगी कि समय के साथ इन उपायों को कितनी प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है.

(उर्वी श्रीवास्तव BW बिजनेसवर्ल्ड में असिस्टेंट एडिटर हैं, जहां वह स्टॉक मार्केट, पब्लिक  मार्केट, एनर्जी, सोलर और इंफ्रास्ट्रक्चर पर लिखती हैं. उनका कार्य भारत के आर्थिक और औद्योगिक परिवर्तन को आगे बढ़ाने वाली गतिशीलताओं का विश्लेषण करता है, जिसमें पूंजी प्रवाह, नीतिगत बदलाव और टिकाऊ विकास के रुझानों पर नजर रखी जाती है. स्पष्टता और अंतर्दृष्टि पर विशेष ध्यान देते हुए, वह जटिल वित्तीय विकासों को प्रभावशाली कथाओं में ढालती हैं जो बाजारों को व्यापक अर्थव्यवस्था से जोड़ती हैं. उनसे [urvi@businessworld.in] पर संपर्क किया जा सकता है.)
 


बजट के मौके पर प्रॉपर्टी में निवेश: मेट्रो या टियर II शहर में कौन सा बेहतर

रियल एस्टेट अब स्थिर उछाल के दौर में है और भरोसेमंद बिल्डर्स के प्रोजेक्ट्स में निवेश करने का सही समय अभी है.

रितु राणा by
Published - Friday, 30 January, 2026
Last Modified:
Friday, 30 January, 2026
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केंद्रीय बजट नजदीक है और निवेशक सोच रहे हैं कि रियल एस्टेट में अभी निवेश करना सही है या बजट की नीतियों का इंतजार करना चाहिए. इस विषय पर जामश्री रियल्टी के फाउंडर एवं मैनेजिंग डायरेक्टर राजेश दमानी ने BW हिन्दी की सीनियर कॉरेस्पोंडेंट रितु राणा से अपने अनुभव और सुझाव साझा किए.

प्रश्न : केंद्रीय बजट नजदीक आ रहा है, तो क्या अभी रियल एस्टेट में निवेश करने का सही समय है, या निवेशकों को नीतियों की स्पष्टता मिलने का इंतजार करना चाहिए?

राजेश दमानी: कई निवेशक बजट में वित्त मंत्री की झोली खुलने के लिए "वेट एंड वॉच" की नीति अपनाते हैं. लेकिन मेरा मानना है कि रियल एस्टेट अब एक मजबूत और लंबे समय तक चलने वाले उछाल के दौर में प्रवेश कर चुका है, जो सिर्फ एक बजट पर निर्भर नहीं है. पहले का जमाना जहां सिर्फ सट्टेबाजी से बाजार चलता था, वो अब खत्म हो रहा है. अब बाजार असली खरीदारों की मांग और RERA द्वारा लाई गई पारदर्शिता से चल रहा है. बजट के इंतजार में "नीति स्पष्ट होने का" वक्त अक्सर "बजट से पहले वाली कीमतों" को मिस करने का कारण बन जाता है.

अभी प्रमुख शहरों के अच्छे इलाकों में उपलब्ध फ्लैट्स/प्रॉपर्टी की संख्या तेजी से कम हो रही है. बजट में कुछ अतिरिक्त टैक्स छूट या ब्याज सब्सिडी मिल भी सकती है, लेकिन आय में बढ़ोतरी, शहरीकरण और असली मांग जैसे मुख्य कारण तो पहले से ही काम कर रहे हैं. अगर आपको किसी भरोसेमंद बिल्डर का प्रोजेक्ट मिल रहा है, जिसकी डिलिवरी और काम की गुणवत्ता पर भरोसा हो, तो "सही समय" अभी है. अभी प्रॉपर्टी की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं, और इंतजार करने से मिलने वाली छोटी-मोटी बजट राहत से ज्यादा फायदा इस समय मिलने वाले कैपिटल गेन से हो रहा है.

प्रश्न : हाल के वर्षों में हुए जीएसटी संशोधन से प्रमुख सामग्रियों की कीमतें कम होने से निर्माण लागत कम होने की संभावना थी, क्या वास्तव में खरीदारों के लिए प्रॉपर्टी की कीमतें कम हुई हैं, या निवेशक बजट से कुछ उम्मीद कर सकते हैं?

राजेश दमानी : लोग अक्सर गलतफहमी में रहते हैं कि सीमेंट जैसी सामग्रियों पर जीएसटी कम होने से प्रॉपर्टी की कीमतें फौरन बहुत गिर जाएंगी. हकीकत में, इन बदलावों से निर्माण लागत में करीब 3–5% की कमी आई है. पर यह कमी ज्यादातर जमीन की बढ़ती कीमतों और मजदूरी में महंगाई के खिलाफ एक बफर बनकर काम कर रही है. खरीदारों के लिए इसका मतलब यह नहीं है कि घर "बहुत सस्ते" हो गए हैं, लेकिन कीमतों में तेजी से बढ़ोतरी जरूर रुकी है या धीमी हुई है. आगामी बजट में हम मुख्य रूप से डेवलपर्स के लिए इनपुट टैक्स क्रेडिट की बहाली की मांग कर रहे हैं. अगर ऐसा होता है, तो प्रोजेक्ट की व्यवहार्यता में सुधार आएगा, लागत बचत असली रूप से घर खरीदारों तक पहुंच सकती है, खासकर किफायती हाउसिंग सेगमेंट में.

प्रश्न 3 : क्या अब टियर II और टियर III शहरों में निवेश का मामला मेट्रो शहरों से ज्यादा मजबूत हो गया है, खासकर इंफ्रास्ट्रक्चर के जोर, शहरी प्रवास और किफायत को देखते हुए?

राजेश दमानी : टियर II और III शहरों में अब प्रॉपर्टी की कीमत में बढ़ोतरी के मामले में निवेश का केस निश्चित तौर पर मेट्रो शहरों से ज्यादा मजबूत हो गया है. वहीं मेट्रो शहर अभी भी किराए की अच्छी कमाई और आसानी से खरीद-बिक्री के मामले में अव्वल हैं. अब हम "इंफ्रास्ट्रक्चर के नेतृत्व वाले शहरीकरण" के दौर में हैं. रिंग रोड, मेट्रो का विस्तार, और क्षेत्रीय हवाई अड्डे लखनऊ, जयपुर, नागपुर जैसे शहरों को उच्च विकास वाले कॉरिडोर में बदल रहे हैं.

इन बाजारों में एंट्री पॉइंट कम है और कीमतों में बढ़ोतरी का "डेल्टा" यानी अंतर बहुत ज्यादा है. लेकिन मेट्रो शहर अभी भी ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स और बेहतरीन ऑफिस स्पेस की मांग के मुख्य केंद्र हैं. एक निवेशक के तौर पर, यदि आप स्थिर संपत्ति संरक्षण चाहते हैं और कम जोखिम लेना पसंद करते हैं, तो टॉप 7 मेट्रो शहरों में ही रहें. लेकिन अगर आप 5–7 साल के लंबे समय में बहुत तेज बढ़ोतरी की तलाश में हैं, तो टियर II शहरों में असली "अल्फा" मिलेगा, खासकर "विकसित भारत" के इंफ्रास्ट्रक्चर पुश के कारण ये शहर अब तेजी से आगे बढ़ रहे हैं.

प्रश्न 4 : लंबे समय के निवेशकों के लिए मौजूदा चक्र में कौन सा ज्यादा आकर्षक है - रेजिडेंशियल या कमर्शियल रियल एस्टेट, और क्यों?

राजेश दमानी : मौजूदा चक्र में व्यक्तिगत निवेशकों के लिए रेजिडेंशियल रियल एस्टेट साफ तौर पर विजेता है. कोरोना के बाद लोगों में बड़ी और बेहतर "लाइफस्टाइल-अपग्रेडेड" घरों की बहुत मजबूत इच्छा है. हम "प्रीमियमाइजेशन" का ट्रेंड देख रहे हैं, जहां हाई-एंड और लग्जरी रेजिडेंशियल प्रोजेक्ट्स तेजी से बिक रहे हैं.

लेकिन संस्थागत निवेशकों या एचएनआई के लिए कमर्शियल रियल एस्टेट अभी भी आकर्षक है - खासकर ग्रेड-ए ऑफिस स्पेस और डेटा सेंटर्स. आरईआईटी (REITs) अब भरोसेमंद एसेट क्लास बन चुके हैं, जो फिजिकल कमर्शियल प्रॉपर्टी में नहीं मिलने वाली लिक्विडिटी देते हैं.

प्रश्न 5 : केंद्रीय बजट में रियल एस्टेट की मांग पर असर डालने वाले सबसे महत्वपूर्ण ऐलान कौन से हो सकते हैं, टैक्स प्रोत्साहन, हाउसिंग सब्सिडी, ब्याज दर नीतियां या इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए आवंटन?

राजेश दमानी : रियल एस्टेट की मांग पर सबसे बड़ा असर "अफोर्डेबल हाउसिंग" की परिभाषा को फिर से तय करने से आएगा. अभी 45 लाख रुपये की सीमा काफी पुरानी हो गई है. अगर इसे बढ़ाकर 75–80 लाख रुपये कर दिया जाए, तो मिड-सेगमेंट के बहुत सारे घर तुरंत सब्सिडी और सरकारी लाभों के दायरे में आ जाएंगे.

दूसरा बड़ा बदलाव पूरे रियल एस्टेट सेक्टर को "इंफ्रास्ट्रक्चर का दर्जा" देना गेम चेंजर हो सकता है. इससे डेवलपर्स को सस्ता कर्ज मिलेगा, और ये बचत खरीदारों तक पहुंचेगी.

आखिर में, धारा 24(B) के तहत टैक्स छूट की सीमा पर नजर रखें. अभी यह 2 लाख रुपये है, अगर इसे बढ़ाकर 5 लाख रुपये कर दिया जाए, तो यह उन लोगों को जो अभी फैसला नहीं ले पा रहे हैं, बेहद आवश्यक प्रोत्साहन देगा. इससे मेट्रो के साथ ही नए उभरते शहरों में भी घरों की खरीदारी की रफ्तार बहुत तेज हो जाएगी.

 


Inkapreneur: टेक और डेटा के जरिए स्टार्टअप फाउंडर्स के लिए आसान और भरोसेमंद बीमा समाधान

Inkapreneur पहल भारतीय स्टार्टअप और एमएसएमई फाउंडर्स के लिए वित्तीय सुरक्षा का एक नया मानक स्थापित करती है.

रितु राणा by
Published - Wednesday, 12 November, 2025
Last Modified:
Wednesday, 12 November, 2025
BWHindia

भारत के स्टार्टअप और एमएसएमई इकोसिस्टम में उद्यमियों के लिए वित्तीय सुरक्षा सुनिश्चित करना हमेशा एक बड़ी चुनौती रहा है. इसी संदर्भ में Inka Insurance ने अपनी नई पहल ‘Inkapreneur’ लॉन्च की है. यह खास तौर पर स्टार्टअप फाउंडर्स और युवा उद्यमियों की अनियमित आय और भविष्य की संभावनाओं को ध्यान में रखकर डिजाइन किया गया है. BW हिन्दी की सीनियर कॉरेस्पोंडेंट रितु राणा ने इस पहल के संस्थापक वैभव कथजू से खास बातचीत की, जिसमें उन्होंने इस उत्पाद की प्रेरणा, चुनौतियाँ और भविष्य की योजनाओं पर प्रकाश डाला है.

1. Inkapreneur जैसी बीमा पहल का विचार कैसे आया, और इसे खास तौर पर भारत के फाउंडर्स के लिए डिजाइन करने की प्रेरणा कहाँ से मिली?
उत्तर: बीमा उद्योग में 20 वर्षों से अधिक के अनुभव के साथ, मेरी पहली प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना थी कि हम 'India@2047 तक सभी के लिए बीमा' के लक्ष्य में योगदान दें. भारत में SME और MSME सेक्टर में स्टार्टअप्स, फाउंडर्स और उद्यमियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है. हालाँकि, ये साहसी फाउंडर्स टर्म इंश्योरेंस के लिए आवेदन करते समय सबसे बड़ी बाधा का सामना करते हैं. उनकी अनियमित और अक्सर गैर-रेखीय आय पैटर्न के कारण, बीमा कंपनियाँ या तो उन्हें कवर करने से इंकार कर देती हैं या कवर को गंभीर रूप से सीमित कर देती हैं.
Inkapreneur का विचार इसी महत्वपूर्ण अंतर को भरने की आवश्यकता से उत्पन्न हुआ. यह पहल हमारे देश के भविष्य के निर्माता उद्यमियों के लिए एक सरल, भरोसेमंद और विशेष वित्तीय सुरक्षा नेटवर्क बनाने की हमारी प्रतिबद्धता को दर्शाती है.

2. पारंपरिक बीमा कंपनियाँ जहाँ कड़े दस्तावेजों और आय के सबूत पर निर्भर रहती हैं, वहाँ Inkapreneur इस प्रक्रिया को कैसे सरल बनाता है?

उत्तर: बीमा कंपनियाँ अनियमित आय को जोखिम का संकेत मानती हैं. Inkapreneur (Inka Insurance और Bajaj Life का उत्पाद) इसे 'ट्रस्ट-बेस्ड, डेटा-ड्रिवन' अंडरराइटिंग मॉडल के माध्यम से हल करता है. सरलीकृत अंडरराइटिंग: हम केवल पारंपरिक दस्तावेजों पर निर्भर नहीं होते. इसके बजाय, हम वैकल्पिक डेटा पॉइंट्स का उपयोग करते हैं. हम समझते हैं कि फाउंडर का वेतन कम हो सकता है, लेकिन उनके व्यवसाय का मूल्यांकन और भविष्य की इक्विटी उच्च होती है. कवर राशि तय करने के लिए हम फाउंडर की इक्विटी वैल्यू और भविष्य की कमाई की संभावना को ध्यान में रखते हैं, सिर्फ वर्तमान आय के बजाय.

3. भारत के स्टार्टअप इकोसिस्टम में यह उत्पाद किस तरह से बदलाव लाने वाला साबित होगा?
उत्तर: Inkapreneur तीन महत्वपूर्ण तरीकों से बदलाव लाएगा:

- वित्तीय सुरक्षा का लोकतंत्रीकरण: यह लाखों फाउंडर्स को वास्तविक वित्तीय सुरक्षा प्रदान करता है जो पहले उपेक्षित थे, जिससे वे बिना भय के जोखिम उठा सकते हैं.
- निवेशकों के लिए विश्वसनीयता: जब कोई फाउंडर पर्याप्त टर्म इंश्योरेंस कर लेता है, तो यह उनके व्यवसाय और परिवार के प्रति जिम्मेदारी को दर्शाता है, जिससे निवेशकों का भरोसा बढ़ता है.
- उद्योग मानकों में बदलाव: यह पहल बीमा सेक्टर को फाउंडर्स और स्व-नियोजित पेशेवरों के जोखिम का आकलन करने के लिए वैकल्पिक डेटा और तकनीकी समाधानों के उपयोग के बारे में शिक्षित करेगी, पारंपरिक कठोर आय नियमों से आगे बढ़ते हुए.

4. इस पहल में Bajaj Life के साथ साझेदारी के दौरान सबसे बड़ी चुनौती और सबसे बड़ी सीख क्या रही?
उत्तर: सबसे बड़ी चुनौती: सबसे बड़ी चुनौती थी पारंपरिक अंडरराइटिंग टीमों को जोखिम की नई परिभाषा स्वीकार करने के लिए राज़ी करना. बीमा एक जोखिम-आधारित व्यवसाय है, और फाउंडर्स के लिए नए नियम बनाना, खासकर यह तय करना कि इक्विटी और फंडिंग को पारंपरिक आय के बराबर कैसे माना जाए, समय और प्रयास मांगता था. सबसे बड़ी सीख: सबसे बड़ी सीख यह थी कि जब आप एक मजबूत डेटा मॉडल लाते हैं जो एक वास्तविक और उपेक्षित मार्केट समस्या को हल करता है, तो बड़े, स्थापित पार्टनर (जैसे Bajaj Life) भी बदलाव को अपनाने के लिए तैयार रहते हैं. यह साझेदारी साबित करती है कि तकनीक और विशेषज्ञता पुराने उद्योग मानकों को बदल सकती हैं.

5. क्या भविष्य में Inka ऐसे और प्रोडक्ट लाने की योजना बना रहा है जो खास तौर पर युवा उद्यमियों और फाउंडर्स की वित्तीय जरूरतों पर केंद्रित हों?
उत्तर: बिलकुल, हाँ. Inka की योजना केवल टर्म इंश्योरेंस तक सीमित नहीं है. हम सक्रिय रूप से और भी उत्पाद लॉन्च करने पर काम कर रहे हैं, जो युवा उद्यमियों और उच्च वित्तीय व्यवहार वाले लोगों की विशेष वित्तीय जरूरतों के लिए डिजाइन किए जाएंगे.

6. आपके अनुसार आने वाले वर्षों में बीमा और उद्यमिता के बीच भरोसे का यह नया मॉडल किस दिशा में जाएगा?
उत्तर: हम 'वन-साइज़-फिट्स-ऑल' पॉलिसी के युग को पीछे छोड़ रहे हैं. भविष्य हाइपर-पर्सनलाइज्ड रिस्क असेसमेंट से संचालित होगा. बीमा कंपनियाँ कठोर आय दस्तावेजों से आगे बढ़ेंगी और वास्तविक समय डेटा, व्यवसाय वृद्धि मेट्रिक्स और प्रेडिक्टिव एनालिटिक्स का उपयोग करेंगी. इससे कस्टमाइज्ड सुरक्षा संभव होगी, जहां कवर और प्रीमियम डायनेमिक होंगे, और फाउंडर की वास्तविक वित्तीय इकोसिस्टम और संभावनाओं को दर्शाएंगे, सिर्फ वर्तमान वेतन नहीं. जोखिम को केवल देयता से नहीं, बल्कि गति और संभावनाओं से मापा जाएगा. मेरा मानना है कि यह बीमा उद्योग में एक नया पैटर्न स्थापित करेगा.


सर्कुलर इकॉनमी केवल विचार नहीं, राष्ट्रीय औद्योगिक रणनीति : मसूद मलिक

रीसाइक्लिंग इंडस्ट्री ने पिछले तीन वर्षों में तेजी से विकास किया है, मटेरियल की संख्या 4 से 20 तक बढ़ी है, और बड़ी विनिर्माण कंपनियाँ सर्कुलैरिटी को मुख्यधारा में शामिल कर रही हैं.

रितु राणा by
Published - Wednesday, 05 November, 2025
Last Modified:
Wednesday, 05 November, 2025
BWHindia

भारत तेजी से विकासशील अर्थव्यवस्था के रूप में उभर रहा है, लेकिन इस प्रगति के साथ पर्यावरणीय चुनौतियां भी उतनी ही गंभीर होती जा रही हैं. बढ़ते शहरीकरण और औद्योगिकीकरण के बीच waste-to-worth यानी “कचरे से संसाधन” बनाने की तकनीकें, टिकाऊ भविष्य की कुंजी बनकर उभरी हैं. इस दिशा में Re Sustainability Limited अग्रणी भूमिका निभा रही है. Re Sustainability ने देशभर में 22 से अधिक शहरों में संचालित परियोजनाओं और उन्नत रीसायकलिंग तकनीकों के माध्यम से उन्होंने वेस्ट मैनेजमेंट को केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी सार्थक बनाया है. इसी विषय पर सीआईआई नेशनल कमेटी ऑन वेस्ट-टू-वर्थ टेक्नोलॉजीज के चेयरमैन और Re Sustainability Limited के मैनेजिंग डायरेक्टर एवं ग्रुप सीईओ मसूद मलिक से BW हिन्दी की वरिष्ठ संवाददााता रितु राणा ने विस्तार से चर्चा की, जिसमें उन्होंने बताया कि भारत को सर्कुलर इकॉनमी को केवल विचार के रूप में नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय औद्योगिक रणनीति के रूप में अपनाना चाहिए. तो प्रस्तुत हैं आपके सामने इस बातचीत के कुछ प्रमुख अंश :

प्रश्न: 'कचरे से संसाधन' की अवधारणा को भारत में लागू करने में सबसे बड़ी चुनौती आप किसे मानते हैं ?
उत्तर : देखिए, हमारे देश के पास बहुत अधिक प्राकृतिक संसाधन नहीं हैं. हमारे पास दुनिया की लगभग 18% जनसंख्या है, लेकिन भूमि क्षेत्र का हिस्सा 2.5% से भी कम है. अब ऐसे में क्या हमारे पास कचरे के पहाड़ बनाने की जगह है? बिल्कुल नहीं. इसीलिए केवल पर्यावरण के दृष्टिकोण से ही नहीं, बल्कि आर्थिक विकास, रणनीतिक प्रगति और आत्मनिर्भरता के लिए waste-to-worth तकनीकों को मुख्यधारा में लाना बहुत जरूरी है. हमें सिर्फ इस पर बात नहीं करनी चाहिए, बल्कि इसे एक बड़े उद्योग के रूप में विकसित करना चाहिए.

अगर हम इस समस्या के समाधान की बात करें, तो तीन बातें बहुत अहम हैं. पहली बात यह कि जब हम कोई भी उत्पाद खरीदते हैं, तो हमें यह जानना चाहिए कि उसका उपयोग या जीवनकाल कैसे अधिकतम किया जा सकता है. उदाहरण के लिए, क्या आपको अपना पहला मोबाइल फोन याद है? अधिकांश लोगों का जवाब होगा, हाँ, और वह कई साल चला था. लेकिन आजकल चीजों की उम्र घटती जा रही है. ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि हमारा उपभोग करने का तरीका बदल गया है. हमें इस आदत को बदलना होगा. किसी भी उत्पाद का life extension यानी जीवन बढ़ाना बहुत जरूरी है. अगर आप किसी वस्तु को रिपेयर कर सकते हैं, उसकी उपयोगिता बढ़ा सकते हैं, तो वह भी waste-to-worth है. यह केवल कचरा पैदा करने की बात नहीं है, बल्कि खुद को कचरा उत्पन्न करने से बचाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है.

प्रश्न: Re Sustainability इस समस्या को कैसे सुलझा रही है?

उत्तर : हमारा प्रयास है कि जिसे लोग ‘कचरा’ कहते हैं, उसमें भी मूल्य खोजा जाए. हम निर्माण कचरे से देशभर में नोएडा, कोलकाता, नागपुर, हैदराबाद नए निर्माण उत्पाद बना रहे हैं. हम विभिन्न प्रकार के प्लास्टिक कचरे से FMCG पैकेजिंग तैयार कर रहे हैं. जो प्लास्टिक रीसायकल नहीं हो सकती, उससे ईंधन बना रहे हैं ताकि वह कोयले की जगह इस्तेमाल हो सके. जहां ईंधन भी नहीं भेजा जा सकता, वहां हम अपनी बिजली बनाने के प्लांट लगा रहे हैं. इसके अलावा, देश में पहली बार हमने कचरे से सोना, चांदी, प्लेटिनम और पैलेडियम जैसी कीमती धातुएं सफलतापूर्वक निकाली हैं. ये सभी तकनीकें अब औद्योगिक पैमाने पर लागू की जा रही हैं.

प्रश्न : कचरा प्रबंधन में घरों की भूमिका को आप कैसे देखते हैं?
उत्तर : यह बहुत महत्वपूर्ण बाता है, दरअसल हमें यह समझना होगा कि यदि हम घर पर ही गीले और सूखे कचरे को मिला देते हैं, तो बाद में उसे अलग करना बहुत मुश्किल और महंगा हो जाता है. भारत में आज प्लास्टिक का केवल 15% ही रीसायकल होता है, बाकी 85% लैंडफिल में चला जाता है. इसके बाद हम नया तेल खरीदकर नई प्लास्टिक बनाते हैं और फिर वही प्लास्टिक वापस लैंडफिल में डालते हैं. इसलिए पहला सिद्धांत, हर संसाधन का अधिकतम उपयोग करें. दूसरा, कचरे को मिलाने से बचें ताकि रीसायकल आसान हो सके. तीसरा, उपभोक्ता को रीसायकल किए गए उत्पाद खरीदने की आदत डालनी चाहिए. जब उपभोक्ता रीसायकल उत्पादों की मांग करेगा, तब waste-to-worth केवल अवधारणा नहीं, बल्कि वास्तविकता बन जाएगा.

प्रश्न : सर्कुलर इकॉनमी (Circular Economy) को आप कैसे परिभाषित करते हैं?
उत्तर : हमारा पूरा काम ही सर्कुलर इकॉनमी पर आधारित है. जब भी हमें कोई कचरा मिलता है, चाहे वह औद्योगिक, नगरपालिका या मेडिकल कचरा हो, तो सबसे पहले हम उसे संसाधन के रूप में उपयोग करने की कोशिश करते हैं. अगर उपयोग नहीं कर सकते, तो रीसायकल करते हैं. रीसायकल नहीं कर सकते, तो उससे ईंधन बनाते हैं. और अगर ईंधन नहीं बना सकते, तो उससे बिजली उत्पन्न करते हैं. यह पूरी श्रृंखला ही असली सर्कुलैरिटी है. बाकी सर्कुलैरिटी केवल सिद्धांत में रहती है, पर यह सर्कुलैरिटी एक्शन में है. हम इसे “360 डिग्री सर्कुलैरिटी” कहते हैं.

प्रश्न : भारत में Critical Minerals की आवश्यकता को लेकर आपकी क्या पहलें हैं?
उत्तर : भारत में लिथियम, मैग्नेट और अन्य critical minerals की भारी जरूरत है. हम इस दिशा में विशेष ध्यान दे रहे हैं ताकि देश की सामरिक और संसाधन सुरक्षा को मजबूती मिल सके. हमने हैदराबाद में एक विशेष integrated refinery स्थापित की है, जहां औद्योगिक और इलेक्ट्रॉनिक कचरे से इन खनिजों को निकाला जाता है. भारत में इन खनिजों की खदानें नहीं हैं, इसलिए हम इसे Urban Mining कहते हैं, यानी शहरों के कचरे और लैंडफिल से संसाधन निकालना. यह देश की पहली एकीकृत रिफाइनरी है, जिसकी सालाना क्षमता लगभग 20,000 टन है. वर्तमान में यह संयंत्र अपने तीसरे वर्ष में है और हम सालाना लगभग 1 करोड़ टन से अधिक कचरे का प्रसंस्करण करते हैं.

प्रश्न : पिछले कुछ वर्षों में रीसाइक्लिंग इंडस्ट्री में आपने क्या परिवर्तन देखे हैं. इस संदर्भ में रीसाइक्लिंग प्रोजेक्ट की आर्थिक व्यवहार्यता और रणनीतिक महत्व को आप कैसे देखते हैं?

हमने सीआईआई के साथ मिलकर नेशनल सर्कुलर इकॉनमी फ्रेमवर्क (NCEF–3) का तीसरा संस्करण लॉन्च किया है. यह फ्रेमवर्क भारत को संसाधन-कुशल और सतत सर्कुलर इकॉनमी की ओर ले जाने के प्रयासों को तेज करेगा. इसमें पहले साल 4 सामग्रियां थी और अब हमने 20 प्राथमिक सामग्रियों को शामिल किया गया है. पहले संस्करण (2023) में चार प्रमुख सामग्रियों प्लास्टिक, निर्माण सामग्री, इलेक्ट्रॉनिक कचरा और मिश्रित नगर निगम अपशिष्ट पर ध्यान केंद्रित किया गया था. दूसरे संस्करण (2024) में यह संख्या बढ़कर 16 हुई, जिसमें वस्त्र, एंड-ऑफ-लाइफ वाहन, बैटरी, खतरनाक कचरा, टायर और स्क्रैप मेटल शामिल थे. अब NCEF संस्करण 3 में कुल 20 सामग्री शामिल की गई हैं, जैसे कि यूज़्ड कुकिंग ऑयल, कैटालिटिक कन्वर्टर्स, पेपर और कार्डबोर्ड, तथा एब्जॉर्बेंट हाइजीन प्रोडक्ट्स, यह विस्तार भारत की बदलती उपभोग प्रवृत्तियों, नई नीतिगत पहलों और तकनीकी प्रगति का प्रतिबिंब है.

पिछले तीन वर्षों में 4 से 20 मटेरियल तक का विस्तार हमारे लिए एक विशाल यात्रा रही है. इससे नई इंडस्ट्रीज, तकनीकी अंतराल और नीतिगत बाधाओं को समझने का अवसर मिला. आज बड़ी विनिर्माण कंपनियाँ स्वयं रीसायक्लिंग में शामिल हो रही हैं। यह मुख्यधारा में सर्कुलैरिटी को अपनाने का संकेत है. रीसाइक्लिंग प्रोजेक्ट की आर्थिक व्यवहार्यता मटेरियल और लोकेशन पर निर्भर करती है. उदाहरण के लिए, कंस्ट्रक्शन मलबा और इलेक्ट्रॉनिक वेस्ट दोनों की अर्थव्यवस्था अलग होती है. फीडस्टॉक की निकटता और उसके मूल्य का प्रभाव परियोजना की सफलता पर बड़ा है. सरकार द्वारा सब्सिडी और नए प्रोत्साहन योजनाओं के कारण अब पूंजीगत लागत को कम करना संभव हो गया है. आज रीसाइक्लिंग सिर्फ अर्थव्यवस्था और पर्यावरण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश की संसाधन सुरक्षा और रणनीतिक हितों से भी जुड़ा हुआ है. बाजार आधारित उपकरण जैसे EPR (Extended Producer Responsibility) के माध्यम से ऑपरेशनल खर्च को कम करना और अतिरिक्त राजस्व अर्जित करना संभव हो गया है.

प्रश्न : अंत में, आप इस क्षेत्र के भविष्य को कैसे देखते हैं?
उत्तर : मेरा मानना है कि आने वाले वर्षों में waste-to-worth तकनीकें भारत की सतत अर्थव्यवस्था की रीढ़ बनेंगी. जब तक हम संसाधनों का सर्वोत्तम उपयोग नहीं करेंगे और कचरे को संपत्ति के रूप में नहीं देखेंगे, तब तक सच्ची प्रगति संभव नहीं है. भारत जैसे देश के लिए यह केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता और आर्थिक सुरक्षा का भी प्रश्न है. इसलिए waste-to-worth केवल एक तकनीक नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा है.