देवेंद्र फडणवीस का शिरपुर को तोहफा, 1200 बेड के अस्पताल और 40,000 करोड़ निवेश से विकास को रफ्तार

यह अत्याधुनिक अस्पताल श्री विले पार्ले केलावणी मंडल (SVKM) द्वारा विकसित किया गया है. इसे एक क्षेत्रीय हेल्थकेयर हब के रूप में स्थापित किया जा रहा है, जो महाराष्ट्र के साथ-साथ पड़ोसी राज्यों मध्य प्रदेश और गुजरात के मरीजों को भी सेवाएं देगा.

Last Modified:
Sunday, 26 April, 2026
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महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने शनिवार को धुले जिले के शिरपुर में 1,200 बेड वाले मल्टी-स्पेशियलिटी अस्पताल का उद्घाटन किया. यह पहल उत्तर महाराष्ट्र में स्वास्थ्य ढांचे के बड़े विस्तार के रूप में देखी जा रही है. इस मौके पर राज्य मंत्री जयकुमार रावल और संजय सावकारे सहित कई अन्य गणमान्य व्यक्ति भी उपस्थित रहे.

क्षेत्रीय स्वास्थ्य केंद्र के रूप में विकसित होगा अस्पताल

यह अत्याधुनिक अस्पताल श्री विले पार्ले केलावणी मंडल (SVKM) द्वारा विकसित किया गया है. इसे एक क्षेत्रीय हेल्थकेयर हब के रूप में स्थापित किया जा रहा है, जो महाराष्ट्र के साथ-साथ पड़ोसी राज्यों मध्य प्रदेश और गुजरात के मरीजों को भी सेवाएं देगा.

आधुनिक सुविधाओं से लैस

तपनभाई मुकुशभाई पटेल मेमोरियल हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर नामक यह संस्थान मुंबई और दिल्ली जैसे महानगरों के स्तर की उन्नत चिकित्सा सुविधाएं प्रदान करने का लक्ष्य रखती है. खासतौर पर धुले, नंदुरबार, जलगांव और नाशिक के आदिवासी एवं वंचित क्षेत्रों के लोगों को इससे बड़ा लाभ मिलने की उम्मीद है.

विशेष उपचार के लिए शहरों पर निर्भरता होगी कम

लगभग 1,200 बेड की क्षमता वाला यह अस्पताल क्षेत्र के मरीजों की महानगरों पर निर्भरता कम करेगा. इंदौर और नाशिक जैसे शहरों के मरीज भी यहां इलाज के लिए आ सकेंगे.
अस्पताल “सभी के लिए समान उपचार” की नीति पर कार्य करेगा, जिसमें आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए कैशलेस इलाज की सुविधा भी उपलब्ध होगी, साथ ही अत्याधुनिक जांच और उपचार सेवाएं भी प्रदान की जाएंगी.

40,000 करोड़ रुपये के निवेश से औद्योगिक विकास को बढ़ावा

इस अवसर पर देवेंद्र फडणवीस ने शिरपुर और धुले जिले में लगभग 40,000 करोड़ रुपये के निवेश की घोषणा का भी उल्लेख किया. इस निवेश का उद्देश्य क्षेत्र में औद्योगिक विकास को बढ़ावा देना और रोजगार के अवसर पैदा करना है. उन्होंने कहा कि नंदुरबार के साथ यह क्षेत्र एक संभावित औद्योगिक हब के रूप में उभर रहा है, जहां उद्योग समूहों की रुचि लगातार बढ़ रही है.

समग्र विकास मॉडल पर जोर

मुख्यमंत्री ने शिरपुर के समग्र विकास मॉडल की सराहना की, जहां शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे में निवेश के जरिए कौशल विकास और रोजगार सृजन को बढ़ावा मिल रहा है.
उन्होंने स्थानीय विधायक Amrish Patel की भूमिका की भी प्रशंसा की, जिन्होंने क्षेत्र में शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार में महत्वपूर्ण योगदान दिया है. उन्होंने आश्वासन दिया कि राज्य सरकार इस विकास यात्रा को आगे भी समर्थन देती रहेगी.

 


काइंडनेस प्रैक्टिस फाउंडेशन ने एसोसिएशन फॉर वूमन इन हेल्थकेयर की शुरुआत की

इस एसोसिएशन का उद्देश्य गैर-संचारी रोगों (NCDs) और पर्यावरणीय स्वास्थ्य से निपटना है.

Last Modified:
Tuesday, 17 March, 2026
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मुंबई में प्रख्यात महिला नेताओं, कॉर्पोरेट अधिकारियों और वैश्विक विचारकों की उपस्थिति में एसोसिएशन फॉर वूमन इन हेल्थकेयर (AWH) का औपचारिक शुभारंभ किया गया. यह पहल काइंडनेस प्रैक्टिस फाउंडेशन के अंतर्गत शुरू की गई है और इसका उद्देश्य महिलाओं को पर्यावरणीय गिरावट के कारण बढ़ रहे गैर-संक्रामक रोगों (NCDs) के खिलाफ नेतृत्व करने के लिए सशक्त बनाना है. लॉन्च इवेंट में एक संदेश को बार-बार दोहराया गया: "सस्टेनेबिलिटी अब विकल्प नहीं बल्कि मानव स्वास्थ्य और जीवन के लिए अनिवार्य है."

कार्यक्रम में मानव स्वास्थ्य और ग्रह की भलाई के बीच के महत्वपूर्ण संबंध को उजागर किया गया. डॉ. रचना छाछी, काइंडनेस प्रैक्टिस और AWH™ की संस्थापक, ने बताया कि फाउंडेशन का मिशन सस्टेनेबल न्यूट्रिशन और पर्यावरणीय संरक्षण के माध्यम से NCDs से लड़ना है. डॉ. छाछी ने कहा, "हममें से हर किसी के परिवार या समुदाय में कोई न कोई हृदय रोग, टाइप 2 डायबिटीज, मोटापा, COPD, कैंसर या मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौती से जूझ रहा है. हमारा लक्ष्य मानव स्वास्थ्य और ग्रह दोनों के लिए पीड़ा को कम करना है." प्रोफेसर गणेश चन्ना, वर्ल्ड एनवायरनमेंट काउंसिल के संस्थापक और अध्यक्ष ने भी कहा कि महिलाएं सस्टेनेबिलिटी और पर्यावरणीय बदलाव की मुख्य प्रेरक हैं.

प्रमुख प्रतिभागियों का पैनल

लॉन्च इवेंट में कई बड़े लीडर्ग ने भाग लिया:

1. प्रीति चंद्रशेखर, अध्यक्ष, इंस्टिट्यूट ऑफ एक्चुरियर्स इंडिया
2. डॉ. शिल्पा वोर, चीफ R&D ऑफिसर, Marico
3. डॉ. बानी यादव, भारत की शीर्ष महिला रैली चालक
4. फोरम नागोरी, हेड CSR और सस्टेनेबिलिटी, Tata Power
5. डॉ. अन्नुराग बत्रा, चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ, BW Businessworld
6. डॉ. जवाहर पांजवानी, वरिष्ठ ऑर्थोपेडिक सर्जन
7. विक्रम छाछी, एशिया हेड, DHR Global
8. डॉ. मनीषा गुप्ता, वरिष्ठ वैज्ञानिक, ISRO
9. तन्वी शर्मा, UN यूथ एडवोकेट और इनोवेशन लीडर
10 भावना राव, ग्लोबल ऑफरिंग लीड, Accenture
11. अराधना छाछी, संस्थापक – Unhurry®
12. सविता गायकवाड़, लीडरशिप कोच
13. पारुल गोस्सैन, बॉलीवुड पब्लिसिस्ट
14. सुजल चवटे, संस्थापक – Indoor Greens

वैश्विक लॉन्च में खास संदेश

यून यूथ एडवोकेट तन्वी शर्मा ने कहा, "हमारे रोजमर्रा के कार्य पर्यावरण और आने वाली पीढ़ियों पर असर डालते हैं. विकास और महासागर स्वास्थ्य के बीच की खाई को पाटना जरूरी है ताकि भविष्य सशक्त हो."

भारत में अब गैर-संक्रामक रोग कुल मौतों का 63–65% हैं, जो 1990 में 37.9% थे. मानसिक स्वास्थ्य विकार, ऑटोइम्यून और ऑटिज्म जैसी स्थितियां भी तेजी से बढ़ रही हैं, जो पर्यावरणीय कारकों से जुड़ी हैं. अनुसंधान बताता है कि महिलाएं घर, समुदाय और संगठनों में स्वस्थ आदतों को बढ़ावा देने में अहम भूमिका निभा सकती हैं.

डॉ. जवाहर पांजवानी ने कहा, "सस्टेनेबल न्यूट्रिशन मानव स्वास्थ्य में सुधार और सूजन कम करने का महत्वपूर्ण कारक है. महिलाएं अपने घर और समुदाय में इसे लागू कर, जीवन बदल सकती हैं." इस दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए काइंडनेस प्रैक्टिस ने सस्टेनेबल न्यूट्रिशन सर्टिफिकेशन के साथ एक ई-लर्निंग प्लेटफॉर्म लॉन्च किया, जिससे लोग दुनिया भर में CO2 उत्सर्जन को 3 टन तक कम करने और पृथ्वी की रक्षा करने में सक्षम होंगे.

इस सम्मेलन में सिंगापुर, मुंबई, नई दिल्ली, बैंगलोर, गुरुग्राम, देहरादून और वड़ोदरा सहित विभिन्न शहरों के नेताओं ने अपनी उपस्थिति और भाषणों के माध्यम से इस मिशन के प्रति समर्थन व्यक्त किया. AWH™ एक वैश्विक मंच बनने जा रहा है, जहां महिला नेता स्वास्थ्य देखभाल समाधानों पर सहयोग करेंगी, जो पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी हों और स्वस्थ ग्रह के माध्यम से स्वस्थ समाज सुनिश्चित करें.


डिजिटल हेल्थ में बड़ा कदम: सैमसंग, फार्मईजी और टाटा 1एमजी की रणनीतिक साझेदारी

‘फाइंड केयर’ फीचर का लॉन्च सैमसंग की यूजर-केंद्रित नवाचार रणनीति को और मजबूत करता है और कंपनी को एक संपूर्ण डिजिटल हेल्थ प्लेटफॉर्म के रूप में स्थापित करने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Saturday, 21 February, 2026
Last Modified:
Saturday, 21 February, 2026
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भारत में डिजिटल हेल्थ सेवाओं को नई गति देते हुए सैमसंग ने अपने ग्लोबल वेलनेस प्लेटफॉर्म Samsung Health पर ‘फाइंड केयर’ फीचर लॉन्च करने की घोषणा की है. इस पहल के तहत कंपनी ने हेल्थ-टेक प्लेटफॉर्म PharmEasy और Tata 1mg के साथ साझेदारी की है. 24 फरवरी 2026 से यूजर्स दवाइयाँ मंगाने, लैब टेस्ट बुक करने और ऑनलाइन डॉक्टर परामर्श जैसी सेवाओं का लाभ सीधे ऐप के जरिए उठा सकेंगे.

एक ही ऐप में दवा, टेस्ट और डॉक्टर परामर्श

‘फाइंड केयर’ फीचर के जुड़ने से अब यूजर्स को अलग-अलग हेल्थ ऐप्स के बीच स्विच करने की जरूरत नहीं होगी. सैमसंग हेल्थ के भीतर ही दवाइयों की ऑनलाइन ऑर्डरिंग, डायग्नोस्टिक टेस्ट बुकिंग और डॉक्टर से वर्चुअल कंसल्टेशन जैसी सेवाएं उपलब्ध होंगी. यह फीचर ऐप अपडेट के माध्यम से 24 फरवरी से उपलब्ध होगा और यूजर्स के लिए हेल्थकेयर एक्सेस को अधिक सरल और एकीकृत बनाएगा.

लॉन्च ऑफर: 6 महीने की फ्री मेंबरशिप

साझेदारी के तहत फार्मईजी सैमसंग हेल्थ यूजर्स को विशेष लॉन्च ऑफर दे रही है. ऐप के जरिए पहला ट्रांजैक्शन करने पर ग्राहकों को 6 महीने की ‘फार्मईज़ी प्लस’ मेंबरशिप मुफ्त मिलेगी. इस मेंबरशिप के तहत अतिरिक्त छूट और फ्री डिलीवरी जैसे फायदे मिलेंगे.

सैमसंग का विजन: सुलभ और कनेक्टेड हेल्थकेयर

सैमसंग रिसर्च इंस्टीट्यूट, नोएडा के मैनेजिंग डायरेक्टर क्यूंगयुन रू ने कहा कि कंपनी का उद्देश्य हेल्थकेयर को अधिक सुलभ और सुविधाजनक बनाना है. उनके अनुसार, ‘फाइंड केयर’ फीचर यूजर्स की बदलती जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है और यह डिजिटल हेल्थ इकोसिस्टम को मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम है.

पार्टनर कंपनियों की प्रतिक्रिया

फार्मईजी के चीफ बिजनेस ऑफिसर गौरव वर्मा ने कहा कि यह साझेदारी रोजमर्रा की टेक्नोलॉजी को सुलभ स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है. इससे यूज़र्स को अधिक बचत और सुविधा मिलेगी.

वहीं टाटा 1एमजी के वाइस प्रेसिडेंट (मेडिकल अफेयर्स) डॉ. राजीव शर्मा के अनुसार, यह सहयोग डिजिटल हेल्थ समाधानों को और अधिक प्रभावी और व्यापक बनाएगा. उन्होंने कहा कि इससे यूजर्स पारंपरिक हेल्थकेयर मॉडल से आगे बढ़कर अपनी सेहत का प्रबंधन बेहतर तरीके से कर सकेंगे.

पहले से उपलब्ध वेलनेस फीचर्स

सैमसंग हेल्थ ऐप पहले से ही फिजिकल एक्टिविटी, हार्ट रेट, ब्लड प्रेशर, ईसीजी, नींद के पैटर्न और कैलोरी इनटेक जैसे वेलनेस मापदंडों को ट्रैक करने की सुविधा देता है. इसके अलावा यूजर्स दवा रिमाइंडर सेट कर सकते हैं और अपने हेल्थ रिकॉर्ड भी एक्सेस कर सकते हैं.

 


“टेक्नोलॉजी हमारी रीढ़ रही है” : दीपक सहनी

Healthians के Founder & CEO के रूप में 10 वर्ष बिताने के बाद, नवंबर 2023 में दीपक सहनी ने Executive Chairman की भूमिका संभाली.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Friday, 06 February, 2026
Last Modified:
Friday, 06 February, 2026
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Healthians के एग्जीक्यूटिव चेयरमैन दीपक सहनी ने पिछले एक वर्ष में,कंपनी की पहली वास्तविक पेशेवर प्रबंधन टीम का मार्गदर्शन किया. दीपक सहनी की यात्रा 19 वर्ष की उम्र में शुरू हुई, जब उन्होंने अपना पहला वेंचर खड़ा किया. इसके बाद उन्होंने भारत की शुरुआती डिजिटल हेल्थकेयर एजेंसियों में से एक बनाई और भारत के मेडिकल वैल्यू ट्रैवल सेक्टर का नेतृत्व किया. यही सफर अंततः उन्हें Healthians का संस्थापक बनने तक ले गया, भारत का अग्रणी टेक-एनेबल्ड डायग्नोस्टिक्स ब्रांड, जो लाभदायक है और IPO की दिशा में अग्रसर है.

दीपक साहनी को मिले सम्मान 

1. Serial Entrepreneur of the Year 2025.

2. ET 40 under 40 Inspiring Leader (2023).

3. Times 40 under 40 Achievers.

4. BW 40 under 40 (2020).

5. Top 25 Healthcare CEOs of Asia (2020).

उनकी यात्रा की शुरुआत

जब सहनी ने 2015 में Healthians की स्थापना की, तो मिशन सरल लेकिन साहसिक था: हर भारतीय के जीवन में 10 स्वस्थ वर्ष जोड़ना. जो एक विचार के रूप में शुरू हुआ था, वह आज भारत का अग्रणी घर पर स्वास्थ्य जांच ब्रांड बन चुका है, जिस पर 240 से अधिक शहरों में लाखों लोग भरोसा करते हैं. कंपनी का अपना अत्याधुनिक लैब नेटवर्क है और 1800 से अधिक प्रशिक्षित फलेबोटोमिस्ट्स हैं. यह यात्रा बिल्कुल भी सीधी नहीं रही, शुरुआती दिनों में लगातार 12 फंडिंग अस्वीकृतियों से लेकर फंडिंग विंटर के दबाव तक, और COVID-19 की अभूतपूर्व चुनौतियों तक, जब डायग्नोस्टिक्स एक फ्रंटलाइन सेवा बन गई. हर उतार-चढ़ाव Healthians की नींव का हिस्सा बना.

उन्होंने और उनकी टीम ने Healthians को ईंट-दर-ईंट खड़ा किया: ब्रांड का नाम रखने से लेकर अपनी पहली मार्केटिंग कैंपेन खुद डिजाइन करने तक. उनके लिए Healthians कभी सिर्फ एक कंपनी नहीं रहा, यह एक मिशन रहा है, एक समस्या जिसे हल करना जरूरी था. और इसे 3,000 करोड़ रुपये से अधिक के वैल्यूएशन तक स्केल करने, 300 से अधिक शहरों में विस्तार करने, 22 से अधिक लैब्स बनाने और बिना किसी बाहरी बैंकर के 7 राउंड की पूंजी जुटाने के बाद, उन्होंने साबित कर दिया है कि भारत में डायग्नोस्टिक्स को बड़े पैमाने पर, आत्मा के साथ बनाया जा सकता है. शून्य से शुरुआत करते हुए, सहनी ने Healthians को एक डायग्नोस्टिक पावरहाउस में बदल दिया, जिससे भारतीयों के स्वास्थ्य जांच के दृष्टिकोण में क्रांति आई. हर भारतीय के जीवन में 10 स्वस्थ वर्ष जोड़ने के मिशन के साथ, सहनी ने प्रिवेंटिव हेल्थ टेस्ट को किफायती, सटीक और सुविधाजनक बनाने का लक्ष्य रखा.

बड़ी चुनौतियों पर विजय

लगातार 12 फंडिंग अस्वीकृतियों का सामना करने के बावजूद, सहनी डटे रहे और अंततः एक हेल्थ एक्सेलेरेटर फंड से सीड चेक हासिल किया. इसके बाद युवराज सिंह की YouWeCan Ventures से समर्थन मिला, जिसने Healthians को आगे बढ़ने की गति दी. आज, Healthians भारत की सबसे युवा डायग्नोस्टिक लैब्स में से एक है जिसे CAP जैसे प्रतिष्ठित वैश्विक मान्यताएँ प्राप्त हुई हैं.

सहनी के नेतृत्व में, Healthians ने अपनी सेवाओं का विस्तार किया, टेक्नोलॉजी-ड्रिवन हेल्थकेयर समाधानों का उपयोग किया और शीर्ष लैब्स के साथ साझेदारी कर घर-द्वार पर स्वास्थ्य जांच सेवाएँ प्रदान कीं. कंपनी ने प्रिवेंटिव हेल्थकेयर में महत्वपूर्ण प्रगति की है, 90 लाख से अधिक भारतीयों को रिएक्टिव, हॉस्पिटल-केंद्रित देखभाल से प्रोएक्टिव हेल्थ मैनेजमेंट की ओर स्थानांतरित किया है.

आगे की राह

अब, जब सहनी कंपनियों को स्केल करने से फाउंडर्स को सक्षम बनाने की ओर बढ़ रहे हैं, तो उन्होंने अगले तीन वर्षों में 20-25 स्टार्टअप्स को समर्थन देने के लिए Rs 100 करोड़ की प्रतिबद्धता जताई है. उनकी निवेश दर्शन उन क्षेत्रों पर केंद्रित है जहाँ वे महत्वपूर्ण संरचनात्मक बदलाव देखते हैं, जिनमें कंज्यूमर ब्रांड्स, डीप टेक और Gen Z को लक्षित करने वाले AI-ड्रिवन समाधान शामिल हैं. इस पहल के माध्यम से, सहनी एक ऐसा इकोसिस्टम बनाना चाहते हैं जो उद्यमियों को मजबूत, अर्थपूर्ण व्यवसाय बनाने के लिए सशक्त करे.

फाउंडर्स को समर्थन देने की गहरी प्रतिबद्धता के साथ, सहनी की यात्रा उभरते उद्यमियों के लिए प्रेरणा है और इस बात का प्रमाण है कि एक व्यक्ति हेल्थकेयर इंडस्ट्री पर कितना बड़ा प्रभाव डाल सकता है.
 


नेतृत्व, निवेश और संस्थान निर्माण का प्रतीक: सुनील ठाकुर

BW हिन्दी ओर से हेल्थकेयर इन्वेस्टमेंट लीडर सुनील ठाकुर को जन्मदिन की ढेरों शुभकामनाएं.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Tuesday, 03 February, 2026
Last Modified:
Tuesday, 03 February, 2026
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आज यानी 3 फरवरी को BW टीम भारत के हेल्थकेयर निवेश जगत की एक प्रभावशाली शख्सियत, क्वाडहेल्थ कैपिटल में पार्टनर और साउथ एशिया प्रमुख सुनील ठाकुर का जन्मदिन मना रही है. सुनील ठाकुर न सिर्फ एक दूरदर्शी निवेशक हैं, बल्कि भारत के तेजी से बदलते हेल्थकेयर इन्वेस्टमेंट इकोसिस्टम को दिशा देने वाली प्रमुख आवाजों में भी शामिल हैं.

दो दशकों से ज्यादा का निवेश अनुभव

प्राइवेट इक्विटी, वेंचर कैपिटल और मर्जर एंड एक्विजिशन (M&A) के क्षेत्र में 20 वर्षों से अधिक के अनुभव के साथ सुनील ठाकुर ने हमेशा ऐसे हेल्थकेयर बिजनेस मॉडल्स में निवेश किया है, जो मजबूत बुनियादी ढांचे के साथ दीर्घकालिक प्रभाव पैदा करते हैं. उनका फोकस ऐसे प्लेटफॉर्म्स पर रहा है जो स्केलेबल हों और स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक सुलभ बना सकें.

HealthQuad के सह-संस्थापक के रूप में अहम भूमिका

सुनील ठाकुर, HealthQuad के को-फाउंडर भी हैं, जो भारत की सबसे बड़ी ग्रोथ-स्टेज हेल्थकेयर वेंचर फर्म मानी जाती है. उनकी अगुवाई में HealthQuad ने केयर डिलीवरी, हेल्थटेक और लाइफ साइंसेज जैसे क्षेत्रों में कई नई पीढ़ी की हेल्थकेयर कंपनियों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.

नीति निर्माण और इंडस्ट्री एडवोकेसी में सक्रिय योगदान

निवेश के अलावा सुनील ठाकुर हेल्थकेयर पॉलिसी और एडवोकेसी में भी सक्रिय रूप से जुड़े हुए हैं. वह NATHEALTH बोर्ड में इंडिपेंडेंट डायरेक्टर के तौर पर सेवाएं दे रहे हैं और CII Nathealth फार्मा कमेटी के सदस्य भी हैं. इन भूमिकाओं के जरिए वह इंडस्ट्री और सरकार के बीच संवाद को मजबूत करने में अहम योगदान दे रहे हैं.

दुबई से भारत के हेल्थकेयर सेक्टर को दिशा

दुबई में स्थित रहते हुए भी सुनील ठाकुर भारत के हेल्थकेयर सेक्टर पर केंद्रित मल्टी-बिलियन डॉलर ट्रांजैक्शंस का नेतृत्व कर रहे हैं. उनका वैश्विक अनुभव और भारत-केंद्रित दृष्टिकोण उन्हें अंतरराष्ट्रीय निवेशकों और घरेलू हेल्थकेयर कंपनियों के बीच एक मजबूत सेतु बनाता है.

BW की पूरी टीम सुनील ठाकुर को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं, उत्तम स्वास्थ्य और निरंतर सफलता की कामना करती है. हमें विश्वास है कि आने वाले वर्षों में भी वह एक मजबूत, नवाचार-आधारित और टिकाऊ हेल्थकेयर इकोसिस्टम के निर्माण में अपना अहम योगदान देते रहेंगे.
 


Wockhardt ने एंटीबायोटिक रिसर्च में दर्ज की बड़ी सफलता, FOVISCU का फेज-3 ट्रायल सफल

FOVISCU की सफलता के साथ Wockhardt ने न सिर्फ अपने इनोवेशन पोर्टफोलियो को मजबूत किया है, बल्कि दुनिया भर में एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस के खिलाफ चल रही लड़ाई में भी एक अहम योगदान दिया है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Tuesday, 27 January, 2026
Last Modified:
Tuesday, 27 January, 2026
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भारतीय फार्मा कंपनी Wockhardt ने एंटीबायोटिक रिसर्च के क्षेत्र में बड़ी सफलता हासिल की है. कंपनी की नई दवा FOVISCU (WCK 4282) ने फेज-3 क्लिनिकल ट्रायल सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है. इस दवा ने गंभीर संक्रमणों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली मशहूर एंटीबायोटिक Meropenem के बराबर प्रभाव दिखाया है और 93.23 प्रतिशत का शानदार क्लिनिकल क्योर रेट हासिल किया है.

एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस के खिलाफ बड़ी उम्मीद

Wockhardt की यह नई दवा ऐसे समय में सामने आई है जब पूरी दुनिया Antimicrobial Resistance यानी एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस की गंभीर समस्या से जूझ रही है. कई बैक्टीरिया अब मौजूदा दवाओं पर असर नहीं दिखा रहे हैं, जिससे इलाज मुश्किल होता जा रहा है. FOVISCU को खास तौर पर इसी चुनौती से निपटने के लिए विकसित किया गया है.

क्या है FOVISCU और क्यों है यह खास?

FOVISCU एक फर्स्ट-इन-क्लास कॉम्बिनेशन एंटीबायोटिक है, जिसे गंभीर ग्राम-नेगेटिव बैक्टीरियल इंफेक्शन के इलाज के लिए बनाया गया है. यह उन बैक्टीरिया पर भी असरदार पाई गई है जो Carbapenem-resistant हैं, यानी जिन पर मौजूदा मजबूत दवाएं भी काम नहीं करतीं. ऐसे संक्रमण आमतौर पर ICU में भर्ती मरीजों के लिए जानलेवा साबित होते हैं.

फेज-3 ट्रायल में क्या सामने आया?

फेज-3 क्लिनिकल ट्रायल में FOVISCU की तुलना सीधे Meropenem से की गई. इस अध्ययन में दवा की effectiveness, safety और tolerability की जांच की गई. नतीजों में सामने आया कि FOVISCU ने इलाज में Meropenem के बराबर असर दिखाया और इसका सेफ्टी प्रोफाइल भी बेहतर रहा. कंपनी के मुताबिक, इस ट्रायल में 93.23 प्रतिशत मरीज पूरी तरह ठीक हुए, जो इस दवा की मजबूत चिकित्सीय क्षमता को दिखाता है.

क्यों मानी जा रही है यह बड़ी उपलब्धि?

पिछले दो दशकों में नई एंटीबायोटिक दवाओं का विकास काफी धीमा हो गया है. इसकी वजह वैज्ञानिक, नियामकीय और आर्थिक चुनौतियां रही हैं. ऐसे में FOVISCU का लेट-स्टेज ट्रायल में सफल होना एक दुर्लभ और बेहद अहम उपलब्धि माना जा रहा है. Wockhardt लंबे समय से मल्टी-ड्रग रेजिस्टेंट बैक्टीरिया के खिलाफ रिसर्च कर रही है. यह सफलता कंपनी के वर्षों के रिसर्च और इनोवेशन का नतीजा मानी जा रही है.

जल्द बाजार में आ सकती है नई दवा

कंपनी ने संकेत दिया है कि फेज-3 के सकारात्मक नतीजों के आधार पर अब विभिन्न देशों में रेगुलेटरी अप्रूवल के लिए आवेदन किया जाएगा. अगर मंजूरी मिल जाती है, तो FOVISCU को जल्द ही बाजार में उतारा जा सकता है. अस्पतालों में यह दवा Antibiotic Stewardship Programmes को मजबूत कर सकती है और गंभीर संक्रमणों के इलाज के लिए एक नया विकल्प दे सकती है.

WHO भी मानता है एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस को बड़ा खतरा

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) पहले ही Antimicrobial Resistance को दुनिया के सबसे बड़े स्वास्थ्य खतरों में से एक घोषित कर चुका है. अनुमान है कि अगर इस पर काबू नहीं पाया गया, तो 2050 तक दवा-प्रतिरोधी संक्रमणों से हर साल लाखों लोगों की मौत हो सकती है.


नेशनल क्रेडल कॉन्फ्रेंस 2025: फर्टिलिटी, मातृत्व और शिशु स्वास्थ्य में नई तकनीक और प्रैक्टिस पर मंथन

नेशनल क्रेडल कॉन्फ्रेंस 2025 ने फर्टिलिटी, मातृत्व और बाल स्वास्थ्य के क्षेत्र में भारत की चिकित्सा प्रगति को नई दिशा दी है. अपोलो की यह पहल भारत को विश्वस्तरीय हेल्थकेयर नवाचारों के केंद्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक और ठोस कदम है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Wednesday, 05 November, 2025
Last Modified:
Wednesday, 05 November, 2025
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नई दिल्ली में अपोलो क्रेडल एंड चिल्ड्रेंस हॉस्पिटल और अपोलो फर्टिलिटी की ओर से दो दिवसीय नेशनल क्रेडल कॉन्फ्रेंस 2025 (NCC-2025) का आयोजन किया गया. इस कॉन्फ्रेंस में देशभर के प्रमुख विशेषज्ञों ने फर्टिलिटी, मातृत्व और बाल स्वास्थ्य के क्षेत्र में नई तकनीकों, कानूनी ढांचों और नैतिक मानकों पर विचार साझा किए. इस वर्ष 'यूनाइटिंग एक्सपर्टीज इन प्री-कॉन्सेप्शन, मेटर्निटी एंड चाइल्डकेयर इन इंडिया' की थीम के तहत कॉन्फ्रेंस का उद्देश्य क्लिनिकल एक्सीलेंस, रिसर्च और सहयोग को बढ़ावा देना है. इस मंच पर विशेषज्ञों ने नियोनेटोलॉजी, पीडियाट्रिक्स, ऑब्स्टेट्रिक्स, फीटल मेडिसिन और संबंधित क्षेत्रों में नई वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति पर गहन चर्चा की. सत्रों के दौरान चिकित्सकों को नवीन दिशानिर्देशों और ट्रीटमेंट प्रोटोकॉल से जुड़ी व्यावहारिक जानकारी दी गई ताकि वे आधुनिक चिकित्सा मानकों के अनुरूप अपनी सेवाओं को और बेहतर बना सकें.

 

कॉन्फ्रेंस का उद्घाटन अपोलो हॉस्पिटल्स समूह की संयुक्त प्रबंध निदेशक डॉ. संगीता रेड्डी ने किया. उनके साथ ग्रुप मेडिकल डायरेक्टर डॉ. अनुपम सिब्बल, फीटल मेडिसिन विशेषज्ञ डॉ. अनीता कौल, स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. (प्रो.) चित्रा राममूर्ति और डॉ. (प्रो.) साधना काला सहित कई वरिष्ठ विशेषज्ञ मौजूर रहे. डॉ. रेड्डी ने अपने संबोधन में कहा कि “अपोलो में हमारा प्रयास हमेशा से मातृत्व और नवजात देखभाल की गुणवत्ता को ऊंचा उठाने का रहा है. इस दिशा में हम रोबोटिक तकनीक, एआई आधारित जांच और जीनोमिक मेडिसिन जैसे इनोवेशन को नैतिकता के साथ चिकित्सा प्रणाली में एकीकृत करने के लिए प्रतिबद्ध हैं.”

डॉ. संगीता रेड्डी ने बताया कि पिछले वर्षों में आयोजित कॉन्फ्रेंस में अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों की भागीदारी ने मातृत्व और नवजात देखभाल को नई दिशा दी है. इस वर्ष का सम्मेलन भी महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य के लिए उन्नत तकनीकों और बेहतर चिकित्सा पद्धतियों को सामने लाने का एक बड़ा मंच बना. कॉन्फ्रेंस ने यह संदेश दिया कि चिकित्सा विज्ञान केवल उपचार का नहीं बल्कि सामूहिक शिक्षण, नवाचार और मानकों को ऊंचा उठाने का माध्यम भी है.

प्रमुख चर्चाएं और तकनीकी नवाचार

कॉन्फ्रेंस के दौरान कई उभरती तकनीकों और अवधारणाओं पर विचार-विमर्श हुआ.

1. हेल्थकेयर में रोबोटिक्स : विशेषज्ञों ने बताया कि फर्टिलिटी, गायनेकोलॉजी और नवजात शिशुओं के उपचार में रोबोटिक तकनीक कैसे सटीकता और परिणामों में सुधार ला रही है.
2. जीनोमिक मेडिसिन और NGS : चर्चा हुई कि जीनोमिक मेडिसिन और नेक्स्ट-जेनरेशन सीक्वेंसिंग एम्ब्रियो चयन से लेकर नवजात जांच तक उपचार को मरीज की जरूरतों के अनुसार कैसे अनुकूल बना रहे हैं.
3. कानूनी और नैतिक ढांचा : सत्रों में ART एक्ट, सरोगेसी कानूनों, सहमति, डोनर अधिकारों और नियामकीय अनुपालन पर महत्वपूर्ण अपडेट साझा किए गए.
4. एआई का समावेश : आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की भूमिका एम्ब्रियो ग्रेडिंग, साइकिल प्रेडिक्शन, फीटल मॉनिटरिंग और क्लिनिकल निर्णय लेने में कैसे तेजी से बढ़ रही है, इस पर विशेष चर्चा हुई.
5. नियोनेटल लाइफ सपोर्ट टेक्नोलॉजी : विशेषज्ञों ने नवजात शिशुओं के लिए आधुनिक वेंटिलेशन, रिससिटेशन प्रोटोकॉल और लाइफ-सपोर्ट सिस्टम पर जानकारी दी, जो सबसे कमजोर मरीजों के नतीजों में सुधार लाने में सहायक हैं.### निष्कर्ष


आशा की नई तकनीक: रोबोटिक ऑर्थोपेडिक सर्जरी से बदलते जीवन

रोबोटिक ऑर्थोपेडिक सर्जरी सिर्फ एक तकनीकी विकास नहीं, बल्कि एक मानवीय क्रांति है। यह उन लोगों के लिए एक नई आशा लेकर आई है, जिन्होंने दर्द, असफलताओं और निराशा को झेला है।

रितु राणा by
Published - Tuesday, 21 October, 2025
Last Modified:
Tuesday, 21 October, 2025
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कई बार असफल सर्जरी के बाद 35 साल के राहुल चतुर्वेदी की जिंदगी  बिस्तर तक सीमित हो गई थी, लेकिन आज वह बिना दर्द के लंबी ड्राइव कर रहे हैं, पहाड़ों की सैर कर रहे हैं और अपनी जिंदगी को फिर से जी रहे हैं, जानते हैं कैसे? दरअसल यह एक नई तकनीक यानी रोबोटिक्स की मदद से मुमकिन हो पाया है, इस नवीन ‘ऑर्थोपेडिक सर्जरी’ ने उनके साथ साथ सैकड़ों लोगों की उम्मीदों को फिर से जिंदा किया है. ऑर्थोपेडिक्स सर्जरी की इस नई तकनीक ने पिछले दशक में जबरदस्त क्रांति ला दी है. खासकर जब बात हो जोड़ों की सर्जरी की, तो अब पारंपरिक तरीके पीछे छूटने लगे हैं. 

पिछले 15 वर्षों से अर्थोपेडिक सर्जरी के क्षेत्र में काम कर रहे पटपड़गंज स्थित मैक्स सुपर स्पेशैलिटी अस्पताल के प्रधान सलाहकार डॉ. दीपक कुमार अरोड़ा ने बताया रोबोटिक असिस्टेड सर्जरी अब न केवल अधिक सटीक और सुरक्षित हो गई है, बल्कि इससे मरीजों की रिकवरी भी तेज और प्रभावी हो रही है. आइए, जानते हैं उन प्रेरणादायक कहानियों को, जहां रोबोटिक्स ने असंभव को संभव कर दिखाया और लोगों की जिंदगी में नई उम्मीद जगाई है.

रोबोटिक-असिस्टेड घुटना प्रत्यारोपण: सबसे सफल और लोकप्रिय अनुप्रयोग
ऑर्थोपेडिक्स में रोबोटिक्स का सबसे प्रभावशाली उपयोग Robotic-Assisted Knee Replacement में देखा गया है. यह तकनीक:
1. 3D मैपिंग और कंप्यूटर-नियंत्रण की मदद से सर्जन को हर कट और इम्प्लांट की सटीक स्थिति निर्धारित करने में मदद करती है.
2. सर्जिकल सटीकता में सुधार लाती है.
3. मुलायम ऊतकों को न्यूनतम नुकसान पहुंचाती है, जिससे रिकवरी तेज़ होती है.
4. और घुटने के लंबे समय तक कार्यशील रहने में सहायता करती है.

पारंपरिक बनाम रोबोटिक सर्जरी: क्या फर्क है?
पारंपरिक घुटना प्रत्यारोपण सर्जरी में इम्प्लांट की स्थिति सर्जन के अनुभव और आंखों की सटीकता पर निर्भर करती है. इसके विपरीत, रोबोटिक तकनीक:
1. सटीक नियंत्रण और स्थिरता प्रदान करती है.
2. घुटने को संतुलित करती है जिससे गति अधिक प्राकृतिक लगती है.
3. इम्प्लांट का जीवनकाल बढ़ाती है क्योंकि घिसाव और ढीलेपन की संभावना कम होती है.

भारत में बढ़ती स्वीकार्यता: सुलभता और आत्मनिर्भरता की ओर
अर्थोपेडिक सर्जन डॉ. दीपक अरोड़ा ने कहा भारत में हर साल 5 लाख से अधिक घुटना प्रत्यारोपण सर्जरी होती हैं. रोबोटिक तकनीक की स्वीकार्यता तेजी से बढ़ रही है, और कई अग्रणी अस्पताल अब रोबोटिक प्लेटफ़ॉर्म्स में निवेश कर रहे हैं. खास बात यह है कि MISSO जैसे स्वदेशी रोबोटिक सिस्टम ने इस तकनीक को भारतीय मरीजों के लिए अधिक सुलभ और किफायती बना दिया है, जो ‘मेड इन इंडिया’ पहल की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है.

विशेषकर अमेरिका और यूरोप जैसे विकसित देशों में, रोबोटिक-असिस्टेड ऑर्थोपेडिक सर्जरी अब एक सामान्य प्रैक्टिस बन चुकी है. वैश्विक स्तर पर, इस क्षेत्र का बाज़ार हर साल 25–30% की दर से बढ़ रहा है, जो दर्शाता है कि सर्जन और मरीज दोनों ही इस तकनीक में भरोसा जता रहे हैं.

रोबोटिक्स के निर्विवाद फायदे
रोबोटिक ऑर्थोपेडिक सर्जरी के लाभ स्पष्ट हैं:
1. बेहतर सर्जिकल सटीकता
2. तेज रिकवरी और कम अस्पताल में भर्ती समय
3. कम रीविजन दर (Revision Surgery की जरूरत कम)
4. लंबे समय तक टिकने वाले इम्प्लांट्स
5. मरीज की जीवन गुणवत्ता में सुधार

अन्य ऑर्थोपेडिक प्रक्रियाओं में भी विस्तार
डॉ. अरोड़ ने कहा जैसे-जैसे तकनीक और मशीन लर्निंग में सुधार होता जा रहा है, रोबोटिक्स की पहुंच घुटने की सर्जरी से आगे बढ़कर अन्य जॉइंट रिप्लेसमेंट, रीढ़ की सर्जरी और ट्रॉमा के मामलों तक हो सकती है. तो आइए डॉ. अरोड़ा द्वारा की गई कुछ सफल सर्जरी की केस स्टडी पर एक नजर डालते हैं-

केस स्टडी 1 : रोबोटिक तकनीक और ऑर्थोपेडिक सर्जरी से जुड़ी टूटी हड्डियां
नाम: आंचल वासने
उम्र: 45 वर्ष
निवास: बंदायूं, उत्तर प्रदेश

बदायूं की रहने वाली 45 वर्षीय आँचल वासने की जिंदगी अचानक एक ऐसे मोड़ पर आ गई, जहाँ हर रास्ता बंद सा दिख रहा था. एक दिन, एक हादसे में वह तीन मंजिला इमारत से नीचे गिर गईं. यह गिरावट सिर्फ शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक रूप से भी गहरी थी.

हादसे के बाद आँचल के शरीर की कई हड्डियाँ टूट चुकी थीं दाहिने हाथ और पैर की हड्डियाँ चकनाचूर, फेमर बोन पूरी तरह क्षतिग्रस्त, साथ ही शरीर में भीषण दर्द, सूजन और शॉक की स्थिति थी. स्थिति इतनी गंभीर थी कि डॉक्टरों को उन्हें 22 दिन तक वेंटिलेटर पर रखना पड़ा. उन 22 दिनों में आँचल जिंदगी और मौत के बीच झूलती रहीं.
हादसे के बाद इलाज की तलाश शुरू हुई. एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल, एक डॉक्टर से दूसरे डॉक्टर, परिवार हर संभव प्रयास कर रहा था. लेकिन हर जगह से सिर्फ़ यही जवाब मिला कि हड्डियाँ अब नहीं जुड़ेंगी, चलना अब संभव नहीं है और मरीज को जीवनभर बिस्तर पर रहना पड़ेगा. एक दिन आँचल के पति के मित्र ने सलाह दीएक बार डॉ. दीपक अरोड़ा से मिलिए, शायद वो कुछ कर सकें. यह आखिरी उम्मीद थी. आँचल और उनका परिवार पटपड़गंज स्थित मैक्स अस्तपताल पहुँचे और डॉ. दीपक कुमार अरोड़ा से मुलाकात की.

डॉ. अरोड़ा ने केस का गहन विश्लेषण करते हुए  पुराने एक्स-रे और स्कैन की गहराई से समीक्षा की. चोटों की गंभीरता को समझा और शरीर की मूवमेंट और रिकवरी की संभावनाओं का आकलन किया. फिर उन्होंने कहा "यह असंभव नहीं है. हम कोशिश करेंगे, और आँचल फिर से चल सकेंगी."

इलाज की प्रक्रिया
इसके बाद शुरू हुआ एक लंबा लेकिन सटीक चिकित्सा सफर, जिसमें रोबोटिक तकनीक और ऑर्थोपेडिक सर्जरी ने मिलकर कमाल कर दिखाया.
1. टूटी हड्डियों को जोड़ा गया.
2. अत्याधुनिक इम्प्लांट्स लगाए गए.
3. कई जटिल सर्जरीज को योजनाबद्ध तरीके से अंजाम दिया गया.
4. रोबोटिक सर्जरी ने कट्स और इम्प्लांट पोज़िशनिंग में माइक्रोलेवल की सटीकता सुनिश्चित की.
5. फिजियोथेरेपी और रिहैबिलिटेशन का विस्तृत प्रोग्राम शुरू किया गया.
6. हर प्रक्रिया को मल्टी-डिसिप्लिनरी टीम और नवीनतम तकनीकों के सहयोग से पूरा किया गया.

परिणाम: बिस्तर से उठकर दोबारा जीवन की ओर
कुछ महीनों बाद, आँचल फिर से अपने पैरों पर खड़ी थीं. आज, वह न सिर्फ़ चल सकती हैं, बल्कि अपने घर के सभी काम भी खुद करती हैं. वह मुस्कुराकर कहती हैं "मैंने सोचा था अब कभी नहीं चल पाऊंगी, लेकिन डॉ. अरोड़ा ने मुझे ज़िंदगी दी."

केस स्टडी 2 : सरकारी अधिकारी शरद की घुटना प्रत्यारोपण से नई जिंदगी
नाम: आर. शरद
उम्र: 22 वर्ष
निवास: बरेली, उत्तर प्रदेश
पेशा: सरकारी कर्मचारी, Comptroller and Auditor General of India (CAG)

साल 2023 में, जब शरद महज 20 वर्ष के थे, एक सामान्य दिन उनके जीवन की दिशा हमेशा के लिए बदल गया. ऑफिस से लौटते वक्त उन्हें अचानक सनस्ट्रोक हुआ और वे एक सड़क दुर्घटना का शिकार हो गए. इस हादसे में उनकी फीमर बोन (जांघ की हड्डी) गंभीर रूप से टूट गई. इलाज के शुरुआती दौर में फ्रैक्चर की मरम्मत की गई, लेकिन उसके बाद शुरू हुआ एक लंबा संघर्ष व लगातार दर्द, सूजन, और जोड़ों में जकड़न ने उनकी गतिशीलता लगभग समाप्त कर दी. धीरे-धीरे वे चलने-फिरने में पूरी तरह असमर्थ हो गए. नौकरी छोड़नी पड़ी, सामाजिक जीवन ठहर गया, और वे डिप्रेशन की स्थिति में पहुंच गए.

पारंपरिक उपचार विफल, परिवार की चिंता बढ़ी
परिवार ने देशभर में कई डॉक्टरों और अस्पतालों से संपर्क किया. लेकिन किसी भी उपचार से शरद को स्थायी राहत नहीं मिली. लगातार दर्द और असहायता ने शरद को मानसिक और शारीरिक रूप से तोड़ दिया था. एक गंभीर निर्णय के बाद परिवार ने दिल्ली के प्रसिद्ध ऑर्थोपेडिक विशेषज्ञ डॉ. दीपक कुमार अरोड़ा से संपर्क किया, डॉ. दीपक अरोड़ा ने बताया कि इतनी कम उम्र में टोटल नी रिप्लेसमेंट करना एक बड़ा क्लिनिकल चैलेंज था. शरद के घुटने की हड्डी की स्थिति पारंपरिक सर्जरी के लिए उपयुक्त नहीं थी. हमने केस का विस्तार से अध्ययन किया और यह निर्णय लिया कि रोबोटिक असिस्टेड तकनीक और विशेष इम्प्लांट का उपयोग करके टोटल नी रिप्लेसमेंट किया जाए.

इलाज की प्रक्रिया
शरद के केस को बारीकी से प्लान किया गया. उन्नत रोबोटिक तकनीक और युवा मरीजों के लिए बनाए गए विशेष इम्प्लांट्स की मदद से सर्जरी को अंजाम दिया गया. प्रक्रिया में अत्यधिक सटीकता और संयम की आवश्यकता थी, जिसे अनुभवी टीम ने सफलतापूर्वक पूरा किया. सर्जरी के कुछ ही महीनों बाद शरद ने अपने पैरों पर फिर से खड़ा होना शुरू किया. धीरे-धीरे उन्होंने चलना, बाइक और कार चलाना, और अंततः अपनी नौकरी पर लौटना शुरू कर दिया. आज वे बिना किसी दर्द या असुविधा के सामान्य जीवन जी रहे हैं, जो न केवल उनके लिए, बल्कि चिकित्सा समुदाय के लिए भी एक प्रेरणास्पद उपलब्धि है.

भारत में दुर्लभ मामला: कम उम्र में घुटना प्रत्यारोपण
डॉ अरोड़ा ने बताया कि भारत में इतनी कम उम्र में टोटल नी रिप्लेसमेंट के मामले दुर्लभ होते हैं. यह केस बताता है कि यदि सटीक डायग्नोसिस, आधुनिक तकनीक और विशेषज्ञता मिल जाए, तो असंभव भी संभव हो सकता है. यह रही आपकी दी गई सामग्री को आधारित एक पेशेवर, स्पष्ट और प्रेरणादायक केस स्टडी, जिसमें बीमारी, सर्जरी की असफलताएं, खतरे, इलाज की प्रक्रिया और परिणामों को व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत किया गया है:

केस स्टडी 3 : बार-बार असफल सर्जरी के बाद, जब बचाने की उम्मीद भी टूट चुकी थी – उसी पैर पर फिर से खड़ा हुआ इंसान
रोगी का परिचय
नाम: राहुल चतुर्वेदी
उम्र: 35 वर्ष
निवास: रामप्रसाद कॉलोनी, आनंद विहार (दिल्ली)
पेशा: सीनियर टेक्निकल अकाउंट मैनेजर, हांगकांग बेस्ड कंपनी

साल 2014 की एक रात, ऑफिस की नाइट शिफ्ट के बाद राहुल अपने दोस्त के साथ बाइक पर घर लौट रहे थे. रास्ते में उन्हें नींद लग गई और वे सड़क हादसे का शिकार हो गए. दुर्घटना इतनी गंभीर थी कि उनकी फीमर बोन (जांघ की हड्डी) कई टुकड़ों में टूट गई. पहला इलाज एक निजी अस्पताल में हुआ, लेकिन सर्जरी विफल रही. संक्रमण, सूजन और असहनीय दर्द के चलते राहुल का चलना-फिरना तो दूर, करवट लेना भी मुश्किल हो गया.

इलाज के असफल प्रयास: कई सर्जरी, बढ़ती जटिलताएं
2014 से 2016 के बीच, राहुल ने तीन अलग-अलग जगहों पर सर्जरी करवाईं:
1. पहली सर्जरी (दिसंबर 2014): असफल.
2. दूसरी सर्जरी (निजी अस्पताल): फिर से रॉड डाली गई, लेकिन सूजन और दर्द और बढ़ गया.
3. तीसरी सर्जरी (सरकारी अस्पताल): डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए. कहा गया कि अब हड्डियों में न तो रॉड डाली जा सकती है, न प्लेट लग सकती है. हड्डियाँ इतनी कमजोर थीं कि  मामूली दबाव में टूट सकती थीं.

इन वर्षों में राहुल लगभग बिस्तर पर ही सीमित हो गए. नौकरी छूट गई, आत्मविश्वास टूट गया, और मानसिक स्थिति भी प्रभावित होने लगी. मार्च 2022 में होली के दिन, एक मामूली फिसलन से राहुल फिर गिर पड़े. जिस हड्डी को किसी तरह जोड़ा गया था, वह दोबारा टूट गई. जब उन्होंने फिर से सरकारी अस्पताल में दिखाया, तो डॉक्टरों ने कहा "अब पैर काटना पड़ सकता है." राहुल के मुताबिक "उस दिन लगा कि अब जिंदगी यहीं खत्म हो गई. सब कुछ अंधकार में डूब गया."

एक दोस्त ने राहुल को दिल्ली के प्रसिद्ध ऑर्थोपेडिक सर्जन डॉ. दीपक कुमार अरोड़ा के बारे में बताया. सितंबर 2022 में उन्होंने डॉ. अरोड़ा से परामर्श लिया.
डॉ. दीपक अरोड़ा बताते हैं: राहुल का केस बेहद जटिल था. हड्डियाँ कई बार की सर्जरी के बाद भी नहीं जुड़ी थीं. संक्रमण और संरचनात्मक कमजोरी को देखते हुए हमें एक विस्तृत प्लानिंग करनी पड़ी.

उन्नत तकनीक और सूक्ष्म सर्जरी
1. काउंसलिंग और मानसिक तैयारी: राहुल को विश्वास दिलाना कि उनका इलाज संभव है.
2. एडवांस इमेजिंग: डिजिटल स्कैन और 3D प्लानिंग के माध्यम से सटीक स्थिति का विश्लेषण.
3. विशेष इम्प्लांट का उपयोग: राहुल की कमजोर हड्डियों के अनुसार कस्टमाइज्ड इम्प्लांट.
4. बोन ग्राफ्टिंग तकनीक: जहां हड्डी का प्राकृतिक पुनर्निर्माण नहीं हो सकता था, वहां बोन ग्राफ्ट का सहारा लिया गया.
5. इन्फेक्शन कंट्रोल: पिछली सर्जरियों से उत्पन्न संक्रमण को नियंत्रित करने के लिए विशेष प्रोटोकॉल.सर्जरी सफल रही. डॉक्टर ने छह महीने तक आराम और धीरे-धीरे पुनर्वास की सलाह दी.

परिणाम : पूरी तरह से नई जिंदगी
राहुल ने डॉक्टर की सलाह का पूरी तरह पालन किया. जून 2023 में वे वापस ऑफिस जाने लगे. आज वे बिना सहारे चल सकते हैं लंबी ड्राइव पर जा सकते हैं (यहां तक कि पहाड़ों तक) चाइना तक ट्रैवल कर चुके हैं और सबसे बड़ी बात, अब दर्द मुक्त जीवन जी रहे हैं. 

केस स्टडी 4 : दोनों हिप रिप्लेसमेंट के बाद 'दिव्यांग' कहे जाने वाला मेकअप आर्टिस्ट बना आत्मविश्वास से भरा रनवे मॉडल 
रोगी का परिचय
नाम: गौरव
उम्र: 29 वर्ष
निवास: दिल्ली
पेशा: मेकअप आर्टिस्ट और रनवे मॉडल

गौरव एक प्रोफेशनल मेकअप आर्टिस्ट और रनवे मॉडल हैं. उनके लिए चलना, पोज़ देना और आत्मविश्वास से स्टेज पर उतरना ही पेशे का अहम हिस्सा था, लेकिन कुछ साल पहले उनकी जिंदगी में ऐसा मोड़ आया जिसने उन्हें शारीरिक ही नहीं, मानसिक रूप से भी तोड़ दिया. गौरव बताते हैं लोग मुझे पीछे से 'लंगड़ा' कहकर बुलाते थे. बाइक चलाना तो दूर, चलना भी मुश्किल हो गया था. मुझे लगा, मेरी उम्र में इतनी बड़ी बीमारी मुझे ही क्यों मिली? मैं नौकरी खो चुका था, और ऑफिस तक भी नहीं जा सकता था.

बीमारी का कारण: AVN – जब हड्डियों में खून पहुंचना बंद हो जाए
गौरव के दोनों कूल्हों की हड्डियों (Hip Joints) में Avascular Necrosis (AVN) नामक बीमारी हो गई थी, यह एक ऐसी स्थिति होती है जिसमें हड्डियों को रक्त सप्लाई बंद हो जाती है और हड्डी धीरे-धीरे खराब होने लगती है. इस बीमारी में तेज दर्द होता है. चलना-फिरना असंभव हो जाता है और मरीज का आत्मविश्वास पूरी तरह टूट जाता है.

इलाज की असफल कोशिशें और डर
गौरव ने कई डॉक्टरों से सलाह ली. कई डॉक्टरों ने इलाज से इनकार कर दिया या कहा “सर्जरी के बाद भी शायद आप कभी सामान्य नहीं चल पाएंगे. आप लंगड़ा हो सकते हैं.” इन बातों से गौरव और उनका परिवार पूरी तरह निराश हो गया. वे मानसिक तनाव और सामाजिक उपेक्षा के दौर से गुजरने लगे.
गौरव की मां पहले से ही डॉ. दीपक कुमार अरोड़ा की मरीज रह चुकी थीं, उन्होंने बेटे के बारे में बताया और डॉ. अरोड़ा ने तुरंत मिलने के लिए बुलाया.

सर्जिकल प्रक्रिया: दोनों हिप्स का रिप्लेसमेंट 
सितंबर 2022 को गौरव की Bilateral Total Hip Replacement (दोनों कूल्हों का पूरा प्रत्यारोपण) की सर्जरी की गई.  डॉ. दीपक अरोड़ा बताते हैं गौरव का केस बहुत जटिल था. उनकी उम्र महज़ 29 वर्ष थी और दोनों हिप जॉइंट पूरी तरह नष्ट हो चुके थे. सबसे बड़ी चिंता यही थी कि क्या वे दोबारा मॉडलिंग कर पाएंगे? हमने अत्याधुनिक तकनीक और सटीक योजना से सर्जरी की.

सर्जरी में उपयोग की गई तकनीकें:
1. मिनिमली इनवेसिव अप्रोच (कम कट और कम रक्तस्राव)
2. हाई-ड्यूरेबिलिटी इम्प्लांट्स
3. कंप्यूटर गाइडेड प्लानिंग
4. त्वरित रिकवरी प्रोटोकॉल

सर्जरी के कुछ ही हफ्तों बाद गौरव ने चलना शुरू कर दिया, गौरव ने बताया कि एक महीने बाद उन्होंने अपने आप को परखा और वह अकेले ट्रेन से खाटू श्याम मंदिर गए और उस वक्त एक बार भी नहीं लगा कि उनकी हिप रिप्लेसमेंट सर्जरी हुई है. उन्हें लगा जैसे मैंने नया जन्म लिया है.

गौरव फिर से रनवे पर लौटे
आज गौरव आत्मविश्वास से भरे स्टेज पर उतरते हैं, वॉक करते हैं, पोज देते हैं और अपने काम में पहले से ज्यादा सक्रिय हैं उनकी चाल में सिर्फ रफ्तार नहीं, बल्कि उम्मीद की एक कहानी चलती है.

निष्कर्ष: रोबोटिक ऑर्थोपेडिक सर्जरी, नई जिंदगी का रास्ता
इस केस स्टडी ने यह साबित कर दिया कि रोबोटिक्स और इंसानी विशेषज्ञता का संगम असाधारण चमत्कार कर सकता है. यह तकनीक न सिर्फ मेडिकल परिणामों को बेहतर बनाती है, बल्कि लोगों को दोबारा चलने और जीने की वजह भी देती है.
 


CGHS में बड़ा बदलाव: अब प्राइवेट अस्पताल में कैशलेस इलाज होगा आसान, नए रेट आज से लागू

नए CGHS रेट्स लागू होने से न केवल प्राइवेट अस्पतालों की भागीदारी बढ़ेगी, बल्कि कर्मचारियों और पेंशनर्स को बेहतर और समय पर स्वास्थ्य सेवाएं मिल सकेंगी.

Last Modified:
Monday, 13 October, 2025
BWHindia

केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनर्स के लिए राहत की खबर है. केंद्रीय सरकारी स्वास्थ्य योजना (CGHS) में 15 साल बाद सबसे बड़ा बदलाव लागू हो गया है. अब प्राइवेट अस्पतालों में कैशलेस इलाज पहले की तुलना में ज्यादा सरल और सुचारू होगा. आज से लगभग 2,000 मेडिकल पैकेज के नए रेट प्रभाव में आ गए हैं. 

क्यों जरूरी थे ये बदलाव?

लंबे समय से CGHS से जुड़े प्राइवेट अस्पताल पुराने पैकेज रेट और भुगतान में देरी के चलते कैशलेस इलाज देने से हिचकिचा रहे थे. इसके कारण मरीजों को इलाज का खर्च पहले खुद उठाना पड़ता था और रीइंबर्समेंट में महीनों का इंतजार होता था. अगस्त 2025 में सेंट्रल गवर्नमेंट एम्प्लॉइज यूनियन (GENC) ने सरकार से इस व्यवस्था में सुधार की मांग की थी. इमरजेंसी के समय कई मामलों में मरीजों को समय पर इलाज नहीं मिल पाने की शिकायतें भी सामने आई थीं.

क्या हैं नए CGHS रेट्स?

स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा घोषित नए नियमों के तहत लगभग 2,000 मेडिकल प्रक्रियाओं के रेट शहर की श्रेणी और अस्पताल की स्थिति के आधार पर तय होंगे:

- टियर-II शहरों में रेट बेस रेट से 19% कम होंगे

- टियर-III शहरों में रेट 20% कम होंगे

- NABH-मान्यता प्राप्त अस्पतालों में बेस रेट लागू

- गैर-NABH अस्पतालों में रेट 15% कम

- सुपर-स्पेशलिटी अस्पतालों (200+ बेड) में रेट 15% अधिक होंगे

कर्मचारियों और अस्पतालों को क्या लाभ होगा?

नए रेट लागू होने से प्राइवेट अस्पतालों के लिए कैशलेस इलाज देना आसान और व्यावसायिक रूप से व्यवहारिक होगा. इससे:

- कर्मचारियों को इलाज का खर्च खुद नहीं उठाना पड़ेगा

- रिफंड की प्रक्रिया तेज होगी

- CGHS कार्डधारकों का भरोसा बढ़ेगा

नए लाभार्थी: ट्रांसजेंडर बच्चे और भाई-बहन भी शामिल

16 सितंबर 2025 को जारी नई अधिसूचना के अनुसार अब ट्रांसजेंडर बच्चे और भाई-बहन, यदि आर्थिक रूप से आश्रित हैं और Transgender Persons (Protection of Rights) Act, 2019 के तहत प्रमाणित हैं, तो वे भी CGHS के तहत लाभ ले सकेंगे.

डिजिटल और सुविधाजनक

पिछले एक साल में CGHS को और सुलभ व डिजिटल बनाने की दिशा में कई सुधार किए गए हैं, CGHS पोर्टल और मोबाइल ऐप को अपग्रेड किया गया है. अधिक प्राइवेट अस्पतालों को कैशलेस इलाज के लिए जोड़ा गया. ऑनलाइन रेफरल सिस्टम से मंजूरी प्रक्रिया तेज हुई और दवाइयों की रीयल-टाइम ट्रैकिंग शुरू कर दी गई है. सीनियर सिटीजन के लिए विशेष हेल्पडेस्क की व्यवस्था की गई है.

कौन ले सकता है CGHS का लाभ?

- केंद्रीय सरकार के सभी कर्मचारी (रेलवे और दिल्ली प्रशासन को छोड़कर)

- केंद्रीय पेंशनर्स (रेलवे और सशस्त्र बलों को छोड़कर)

- योजना का लाभ केवल उन्हीं शहरों में मिलेगा, जहां CGHS उपलब्ध है, वर्तमान में यह 80 शहरों में लागू है.

CGHS कार्ड कैसे बनवाएं?

1. कर्मचारी: निर्धारित फॉर्म और परिवार की फोटो विभाग में जमा करें

2. पेंशनर्स: संबंधित शहर के CGHS कार्यालय में आवेदन करें या वेबसाइट से फॉर्म डाउनलोड करें

3.  PPO न होने पर: Last Pay Certificate के आधार पर प्रोविजनल कार्ड जारी किया जा सकता है

नए रेट और पैकेज कोड कहां देखें?

CGHS की आधिकारिक वेबसाइट cghs.gov.in पर जाकर "Notifications" सेक्शन से PDF डाउनलोड करें. इसमें सभी नई प्रक्रियाओं के कोड और पैकेज रेट्स विस्तार से उपलब्ध हैं.

 


BW ऑन्कोलॉजी समिट 2025: सर्वाइवर्स, इनोवेशन और उत्कृष्ट कैंसर केयर को समर्पित एक ऐतिहासिक आयोजन

BW हेल्थकेयर वर्ल्ड के चौथे ऑन्कोलॉजी समिट ने भारत की कैंसर कम्युनिटी के लिए इनोवेशन और होलिस्टिक केयर को आगे बढ़ाने हेतु शीर्ष ऑन्कोलॉजिस्ट, सर्वाइवर्स, एडवोकेट्स और इंडस्ट्री लीडर्स को एक मंच पर जोड़ा.

Last Modified:
Friday, 03 October, 2025
BWHindia

BW हेल्थकेयर वर्ल्ड (BW HealthcareWorld) ने 30 सितंबर को अपना चौथा ऑन्कोलॉजी समिट 2025 सफलतापूर्वक आयोजित किया, जो भारत की कैंसर केयर यात्रा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर रहा. “ऑन्कोलॉजी 360: इनोवेशन, होप, हीलिंग” थीम पर आधारित इस पूरे दिन के कार्यक्रम में अग्रणी शोध, परिवर्तनकारी थैरेपी और होलिस्टिक केयर अप्रोच प्रदर्शित किए गए, जिसमें खास ध्यान कैंसर सर्वाइवर्स और मरीजों पर रहा. विचारशील नेताओं और बदलाव लाने वालों का यह संगम प्रमुख ऑन्कोलॉजिस्ट, रेडियोलॉजिस्ट, सायको-ऑन्कोलॉजिस्ट, हॉस्पिटल लीडर्स, पेशेंट एडवोकेट्स और सपोर्ट संगठनों को एकजुट करने वाला रहा. आकर्षक उद्घाटन क्षणों में सर्वाइवर्स कम्युनिटी के साथ एक आर्ट जैम शामिल था, जिसमें कैंसर से जूझकर आगे बढ़ने वालों की आवाज और हिम्मत का जश्न मनाया गया.

मुख्य सत्र की खास बातें :

रिसर्च, डायग्नोस्टिक्स और डिलीवरी – कैंसर केयर में इनोवेशन: भारत में हर साल 20 से 25 लाख नए कैंसर केस सामने आते हैं. विशेषज्ञ शुरुआती पहचान, जागरूकता और प्रिसिजन मेडिसिन पर जोर देते हैं. बढ़ती लागत, सामाजिक कलंक और देरी से इलाज परिणामों को बिगाड़ते हैं, जबकि AI, डिजिटल पैथोलॉजी और टारगेटेड थैरेपी से सर्वाइवल रेट में सुधार हो रहा है.

क्योरिंग द इनक्युरेबल – हेमेटोलॉजिकल ऑन्कोलॉजी में ट्रांसफॉर्मेटिव थैरेपी: भारत में हेमेटोलॉजिकल ऑन्कोलॉजी लक्षित थैरेपी, जेनेटिक प्रोफाइलिंग और CAR-T ट्रीटमेंट के साथ आगे बढ़ रही है, खासकर बच्चों में सर्वाइवल रेट सुधार रहा है. हालांकि, उच्च लागत, देर से डायग्नोसिस और सिस्टम की खामियां इलाज तक पहुंच को सीमित करती हैं.

ट्रीटमेंट एंड बियॉन्ड – स्ट्रेंथ, सेल्फ-केयर और मेंटल हेल्थ की बहाली: विशेषज्ञों का कहना है कि कैंसर केयर केवल इलाज तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें होम-बेस्ड रिहैबिलिटेशन, मानसिक स्वास्थ्य सहयोग और कम्युनिटी एंगेजमेंट शामिल होना चाहिए. शारीरिक रिकवरी, इमोशनल वेलबीइंग और सर्वाइवर्शिप की चुनौतियों (जैसे मेनोपॉज, न्यूट्रिशन और मोबिलिटी) का समाधान मरीजों को ताकत, आत्मविश्वास और गरिमा लौटाने में मदद करता है.

रेडिएशन ऑन्कोलॉजी इन मल्टिडिसिप्लिनरी कैंसर केयर: विशेषज्ञों ने कैंसर के मल्टिडिसिप्लिनरी इलाज में रेडिएशन ऑन्कोलॉजी की अहम भूमिका बताई, जिससे अंग संरक्षित रहते हैं, शुरुआती पहचान होती है और पर्सनलाइज्ड इलाज संभव बनता है. उन्होंने जागरूकता, ट्यूमर बोर्ड और उन्नत तकनीक की आवश्यकता पर जोर दिया.

कैंसर हॉस्पिटल ऑफ टुमॉरो कैसा होगा?: विशेषज्ञों ने "भविष्य का कैंसर हॉस्पिटल" पर चर्चा की, जिसमें पेशेंट-सेंट्रिक केयर, AI-आधारित ट्रीटमेंट, वर्कफोर्स सस्टेनेबिलिटी, किफायत और कम्युनिटी एंगेजमेंट पर ध्यान दिया गया. टेक्नोलॉजी को संवेदना, इनोवेशन और प्रिवेंशन के साथ जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया गया.

फ्यूचर ऑफ कैंसर केयर – आगे का रास्ता: विशेषज्ञों ने कैंसर केयर के भविष्य पर चर्चा की और प्रिवेंशन, शुरुआती पहचान, पेशेंट-सेंट्रिक केयर, टेक्नोलॉजी इंटीग्रेशन और मल्टिडिसिप्लिनरी सहयोग पर जोर दिया. पैनल ने किफायत, वर्कफोर्स सस्टेनेबिलिटी और सामूहिक सीखने को बेहतर परिणामों और वर्ल्ड-क्लास ऑन्कोलॉजी इकोसिस्टम की कुंजी बताया.

सही मरीज के लिए सही इलाज: विशेषज्ञों ने पर्सनलाइज्ड ऑन्कोलॉजी केयर पर चर्चा की, जिसमें जेनेटिक काउंसलिंग, पेशेंट एम्पावरमेंट और सामाजिक-आर्थिक पहलुओं पर जोर दिया गया. बच्चों और महिलाओं के स्वास्थ्य पर खास ध्यान दिया गया और शिक्षा, इमोशनल सपोर्ट और एडवोकेसी को अहम बताया गया.

दिल से जुड़ी बातचीत: डॉ. अनुपम सचदेवा ने अपने कैंसर सफर को साझा किया, जिसमें उम्मीद, धैर्य और परिवार के सहयोग की अहम भूमिका को रेखांकित किया. डॉक्टर और मरीज दोनों रूपों में उनके अनुभव ने सहानुभूति, होलिस्टिक केयर और मानसिक स्वास्थ्य सपोर्ट की आवश्यकता को उजागर किया.

ब्रिजिंग द गैप – यंग एडल्ट कैंसर की चुनौतियां: विशेषज्ञों ने भारत में युवाओं में कैंसर के बढ़ते संकट को रेखांकित किया. आक्रामक बीमारी, देर से डायग्नोसिस, आर्थिक बोझ और खासकर महिलाओं के लिए सामाजिक कलंक के चलते पैनलिस्टों ने फंड, इंश्योरेंस सुधार, खास स्क्रीनिंग और नीति हस्तक्षेप की आवश्यकता बताई.

ऑन्कोलॉजी में क्वालिटी पर फोकस: डॉ. गिर्धर ग्यानी ने कहा कि भारत में कैंसर परिणाम सुधारने के लिए शुरुआती पहचान, मजबूत स्क्रीनिंग, व्यापक बीमा और प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी जरूरी है. शहरी-ग्रामीण असमानता, आर्थिक खाई और पैलिएटिव केयर को संबोधित करते हुए उन्होंने सामूहिक प्रयास और समान, मरीज-केंद्रित सुधार की आवश्यकता बताई.

सर्कल ऑफ ग्रैटिट्यूड: दिन का समापन केयरगिवर्स, सर्वाइवर्स और कैंसर केयर कम्युनिटी के चैंपियंस को सम्मानित करने वाले सर्कल ऑफ ग्रैटिट्यूड के साथ हुआ. सर्वाइवर्स ने उन डॉक्टरों को नामित किया जिन्होंने उन्हें जीवन का दूसरा मौका दिया. मरीजों ने उम्मीद और धैर्य की भावनात्मक कहानियां साझा कीं, जबकि डॉक्टरों ने उनकी हिम्मत को सच्ची प्रेरणा बताया. यह समारोह केवल एक अवॉर्ड न होकर करुणा, उपचार और डॉक्टर-मरीज साझेदारी का संवेदनशील प्रतीक बन गया.

परिवर्तन के लिए मल्टी-स्टेकहोल्डर प्लेटफॉर्म

इस समिट ने क्लिनिकल एक्सपर्टीज, पेशेंट एडवोकेसी, रिसर्च इनिशिएटिव और इंडस्ट्री इनोवेशन के बीच की खाई को पाट दिया. इसने सर्वाइवर्स की आवाज को बढ़ाया और मानसिक स्वास्थ्य, पोषण व आध्यात्मिकता को सामने लाया. BW ऑन्कोलॉजी समिट 2025 ने इनोवेशन, सहयोग और समावेशिता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दोहराया. इसने भारत में कैंसर केयर के भविष्य को परिभाषित करने वाले प्रिसिजन मेडिसिन, इंटीग्रेटिव थैरेपी और पेशेंट सपोर्ट प्रोग्राम्स को अपनाने की राह खोली.

BW हेल्थकेयर वर्ल्ड के बारे में

BW हेल्थकेयर वर्ल्ड इंडस्ट्री न्यूज़, थॉट लीडरशिप, इनोवेशन स्टोरीज़ और हाई-इम्पैक्ट हेल्थकेयर इवेंट्स का अग्रणी प्लेटफॉर्म है. अपने वार्षिक ऑन्कोलॉजी समिट के माध्यम से यह कैंसर केयर के मानकों को ऊंचा उठाने, सर्वाइवर्स और पेशेंट की आवाज़ को मजबूत करने और स्टेकहोल्डर्स के बीच सहयोग को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध है, ताकि भारत में कैंसर से लड़ाई में प्रगति हो सके.

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कैंसर जागरूकता और मानसिक स्वास्थ्य को समर्पित लीग की शुरुआत, डॉक्टर बने प्रेरणा स्रोत

इंडियन हेल्थकेयर लीग न केवल खेल का उत्सव है, बल्कि यह भारत के डॉक्टरों के लिए एक नई उम्मीद, नई पहचान और एक सशक्त मंच है, जहाँ खेल, सेवा और स्वास्थ्य का संगम होता है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Monday, 08 September, 2025
Last Modified:
Monday, 08 September, 2025
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व्हाइटकोट स्पोर्ट्स ने इंडियन हेल्थकेयर लीग (IHL) का शुभारंभ किया. एक अनोखा और अपनी तरह का पहला स्पोर्ट्स प्लेटफॉर्म जो खासतौर पर डॉक्टरों के लिए तैयार किया गया है. यह पहल खेल को सिर्फ फिटनेस के रूप में नहीं, बल्कि समाजसेवा और मानसिक स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों के साथ जोड़ने का प्रयास है. लीग का उद्देश्य कैंसर के प्रति जागरूकता फैलाना और स्वास्थ्य सेवा पेशेवरों के मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देना है. IHL डॉक्टरों को एक ऐसा मंच देगा जहां वे प्रतिस्पर्धा, सहयोग और जागरूकता के माध्यम से समाज में सकारात्मक बदलाव ला सकें.

"डॉक्टर-फर्स्ट" सोच से प्रेरित

इस मौके पर व्हाइटकोट स्पोर्ट्स के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर, डॉ. राहुल मंगल ने कहा “इंडियन हेल्थकेयर लीग सिर्फ एक खेल टूर्नामेंट नहीं है, यह डॉक्टरों के लिए एक आंदोलन है – जहां उनका स्वास्थ्य, मानसिक संतुलन और सामाजिक प्रभाव समान रूप से महत्व रखते हैं. खेल के माध्यम से हम उन विषयों को सामने लाना चाहते हैं जो देशभर के लाखों लोगों को प्रभावित करते हैं.”

क्रिकेटर चेतेश्वर पुजारा ने की सराहना

लीग के उद्घाटन समारोह में भारतीय क्रिकेटर चेतेश्वर पुजारा मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए. उन्होंने इस पहल को “समाज के लिए एक प्रेरणा” बताते हुए कहा “यह लीग डॉक्टरों की मेहनत और समर्पण को सम्मान देने का एक बेहतरीन तरीका है. इसमें भारत की दूसरी सबसे बड़ी लीग बनने की क्षमता है, जो डॉक्टरों और आम जनता – दोनों को खेल, फिटनेस और स्वास्थ्य के महत्व को अपनाने के लिए प्रेरित करेगी.”

दोहरा मिशन: फिटनेस और जागरूकता

IHL के CEO निशांत मेहता ने कहा "डॉक्टरों का जीवन दूसरों की सेवा में बीतता है, लेकिन खुद की देखभाल के लिए उनके पास समय नहीं होता. इंडियन हेल्थकेयर लीग के माध्यम से हम उन्हें एक मंच देना चाहते हैं, जहां वे अपने स्वास्थ्य को प्राथमिकता दें और साथ ही समाज में कैंसर और मानसिक स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर जागरूकता भी फैला सकें."

एक नई सोच, एक नया सफर

IHL का लक्ष्य है स्वास्थ्य सेवा पेशेवरों को शारीरिक और मानसिक रूप से मजबूत बनाना, और साथ ही ऐसे खेल आयोजनों के ज़रिए समाज को जोड़ना, जहाँ जागरूकता और प्रेरणा दोनों मौजूद हों. यह पहल व्हाइटकोट स्पोर्ट्स के उस विज़न को दर्शाती है जो डॉक्टरों को सिर्फ पेशेवर नहीं, बल्कि समाज के सच्चे नायक के रूप में देखती है.

छह राज्यों की फ्रेंचाइजी टीमें होंगी शामिल

IHL के पहले सीजन में छह राज्य स्तरीय फ्रेंचाइजी टीमें हिस्सा ले रही हैं:

- दिल्ली अवतार्स
- गुजरात लायनहार्ट्स
- राजस्थान लेक-सिटी वॉरियर्स
- महाराष्ट्र मेड टाइटन्स
- हरियाणा जुगर्नॉट्स
- उत्तर प्रदेश सुपर किंग्स

इन टीमों में डॉक्टरों की भागीदारी होगी जो न केवल अपनी फिजिकल फिटनेस दिखाएंगे बल्कि मानसिक संतुलन और टीम भावना का भी प्रदर्शन करेंगे. इस कार्यक्रम में एम्स एनसीआई झज्जर के पूर्व निदेशक डॉ. जी. के. रथ, डॉ. बलराम भार्गव (पूर्व महानिदेशक, ICMR), डॉ. अनिल जैन (लेप्रोस्कोपिक सर्जन, पूर्व राज्यसभा सदस्य),  डॉ. कौशल वर्मा, डीन अकादमिक (एम्स दिल्ली),  डॉ. हरित चतुर्वेदी, चेयरमैन, ऑन्कोलॉजी, मैक्स इंस्टीट्यूट, डॉ. गौरव अग्रवाल (वाइस प्रेसिडेंट मैक्स अस्पताल),  पी. एन. अरोड़ा (चेयरमैन, यशोदा मेडिसिटी),  एडवोकेट अमित शर्मा (चेयरमैन, निवोक सुपरस्पेशलिटी हॉस्पिटल) मौजूद रहे.