आज यानी 12 मई को अंतरराष्ट्रीय नर्स दिवस के अवसर पर विशेषज्ञों ने चिंता जताते हुए कहा, AI और आधुनिक प्रशिक्षण के बिना नर्सिंग शिक्षा अधूरी है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
अंतरराष्ट्रीय नर्स दिवस (International Nurses Day) अक्सर नर्सों के योगदान, उनके धैर्य और करुणा को सम्मान देने का अवसर होता है. इस वर्ष की थीम “Our Nurses. Our Future. Empowered Nurses Save Lives,” भारत के संदर्भ में एक गहरी नीतिगत अहमियत रखती है. यह एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय सवाल खड़ा करती है: क्या हम भारत के नर्सिंग वर्कफोर्स को भविष्य की जटिल स्वास्थ्य प्रणालियों के लिए तैयार कर रहे हैं? इसका जवाब केवल इस बात पर निर्भर नहीं करता कि भारत कितने नर्स तैयार करता है, बल्कि इस पर भी कि उन्हें कितनी प्रभावी ढंग से प्रशिक्षित किया जाता है.
भारत की बदलती स्वास्थ्य प्रणाली और बढ़ती चुनौतियां
भारत की स्वास्थ्य प्रणाली तेजी से विस्तार कर रही है. देश में अस्पतालों, डिजिटल हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर, एआई आधारित स्वास्थ्य प्रणालियों, टेलीमेडिसिन और पब्लिक हेल्थ डिलीवरी में निवेश बढ़ रहा है. साथ ही मरीजों की अपेक्षाएं, बीमारियों की जटिलता, आपातकालीन देखभाल की मांग और तकनीक पर निर्भरता भी तेजी से बढ़ रही है. इसके बावजूद, देश के कई हिस्सों में नर्सिंग शिक्षा और क्लिनिकल तैयारी असमान प्रशिक्षण प्रणालियों के भीतर काम कर रही है. यह अंतर अब एक सामान्य मुद्दा नहीं रहा, बल्कि एक स्वास्थ्य प्रणाली की बड़ी चुनौती बन चुका है.
स्वास्थ्यकर्मियों की कमी और बढ़ती जिम्मेदारियां
सरकारी और सेक्टोरल अनुमानों के अनुसार भारत में प्रशिक्षित स्वास्थ्य मानव संसाधनों की कमी बनी हुई है, खासकर ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में. वहीं आज नर्सिंग पेशेवरों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे एआई आधारित डायग्नोस्टिक्स, इलेक्ट्रॉनिक हेल्थ रिकॉर्ड्स, रोबोटिक सपोर्ट सिस्टम और तकनीक-आधारित क्लिनिकल वर्कफ्लो जैसे जटिल वातावरण को संभालें.
आधुनिक स्वास्थ्य प्रणाली के लिए आधुनिक प्रशिक्षण की जरूरत
स्वास्थ्य सेवाओं का स्वरूप बदल चुका है, इसलिए प्रशिक्षण प्रणाली का बदलना भी जरूरी है. इसी वजह से अब भारत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सिमुलेशन-आधारित लर्निंग और वर्चुअल रियलिटी आधारित इमर्सिव ट्रेनिंग को नर्सिंग शिक्षा में शामिल करने पर गंभीर राष्ट्रीय चर्चा की जरूरत है. इसका उद्देश्य तकनीकी दिखावा नहीं, बल्कि क्लिनिकल तैयारी को मजबूत करना है.
वैश्विक मॉडल और भारत की चुनौतियां
वैश्विक स्तर पर अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और सिंगापुर जैसे देश पहले ही सिमुलेशन लैब्स और इमर्सिव ट्रेनिंग मॉडल्स को अपनाकर नर्सिंग और मेडिकल शिक्षा को क्षमता-आधारित प्रणाली में बदल चुके हैं. भारत के लिए यह जरूरी हो जाता है कि वह केवल पारंपरिक अवलोकन आधारित प्रशिक्षण पर निर्भर न रहे, खासकर तब जब क्लिनिकल एक्सपोजर संस्थानों के बीच असमान है.
तकनीक का सही उपयोग: केवल खरीद नहीं, एकीकरण जरूरी
उच्च गुणवत्ता वाली तकनीक अपनाने का मतलब है सिमुलेशन-आधारित लर्निंग को मुख्यधारा की शिक्षा में शामिल करना, सुरक्षित वातावरण में बार-बार प्रैक्टिस की सुविधा देना, आपातकालीन प्रतिक्रिया क्षमता को मजबूत करना और गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा शिक्षा को हर संस्थान तक पहुंचाना.
यह अंतर समझना जरूरी है कि तकनीक खरीदना और उसे शिक्षा प्रणाली में वास्तविक रूप से शामिल करना दो अलग बातें हैं. भारत को उस स्थिति से बचना होगा जहां संस्थान उपकरण तो खरीद लें, लेकिन उन्हें शिक्षण और मूल्यांकन प्रणाली में प्रभावी रूप से शामिल न कर सकें.
नीति समर्थन और मौजूदा प्रयास
इस दिशा में सकारात्मक संकेत यह हैं कि नीति स्तर पर बदलाव हो रहे हैं. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने तकनीक-आधारित और बहु-विषयक शिक्षा के लिए मजबूत आधार तैयार किया है. साथ ही डिजिटल इंडिया और एआई इकोसिस्टम को बढ़ावा देने वाली सरकारी पहलें भी इस दिशा में समर्थन दे रही हैं.
निवेश और मौजूदा अंतर
हालांकि, स्वास्थ्य शिक्षा में अभी भी अधिक लक्षित निवेश की आवश्यकता है. यूनेस्को के अनुसार भारत का R&D खर्च कई विकसित देशों की तुलना में जीडीपी के अनुपात में कम है. स्वास्थ्य शिक्षा के क्षेत्र में सिमुलेशन और एआई आधारित प्रशिक्षण अभी भी सीमित स्तर पर है.
वैश्विक भूमिका और भारत की जिम्मेदारी
यह अंतर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत सिर्फ घरेलू जरूरतों के लिए ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्वास्थ्य सेवाओं के लिए भी नर्सिंग पेशेवर तैयार करता है. ऐसे में प्रशिक्षण की गुणवत्ता का सीधा असर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की प्रतिष्ठा पर पड़ता है.
समान अवसर और तकनीक की भूमिका
इस बदलाव का एक महत्वपूर्ण पहलू समानता भी है. तकनीक आधारित शिक्षा से टियर-2 और टियर-3 शहरों के छात्रों को भी वही सीखने का अवसर मिल सकता है जो बड़े शहरों के संस्थानों में मिलता है.
भविष्य की स्वास्थ्य प्रणाली और मानव-तकनीक संतुलन
भविष्य की स्वास्थ्य प्रणाली में मानव संवेदना और तकनीकी क्षमता दोनों का मेल होगा. नर्स इस प्रणाली का केंद्र बने रहेंगे, क्योंकि स्वास्थ्य सेवा केवल तकनीक से नहीं चलती, बल्कि निर्णय क्षमता, संवेदनशीलता और तत्परता से चलती है. इसलिए तकनीक को प्रतिस्थापन नहीं, बल्कि क्षमता बढ़ाने वाले उपकरण के रूप में देखा जाना चाहिए.
सहयोग और सिस्टम-लेवल बदलाव की जरूरत
भारत को नियामकों, संस्थानों, अस्पतालों, नीति निर्माताओं और हेल्थ टेक इकोसिस्टम के बीच मजबूत सहयोग की जरूरत है ताकि सिमुलेशन आधारित नर्सिंग शिक्षा का ढांचा विकसित किया जा सके.
निष्कर्ष: स्वास्थ्य प्रशिक्षण को राष्ट्रीय इंफ्रास्ट्रक्चर मानना होगा
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि स्वास्थ्य प्रशिक्षण को अब राष्ट्रीय रणनीतिक बुनियादी ढांचे के रूप में देखा जाना चाहिए. अस्पताल इमारतों से बनते हैं, लेकिन मजबूत स्वास्थ्य प्रणाली प्रशिक्षित मानव संसाधनों से बनती है.
अंतरराष्ट्रीय नर्स दिवस पर असली प्राथमिकता सिर्फ नर्सों को सम्मान देना नहीं, बल्कि उन्हें तैयार करने वाली प्रणाली में निवेश बढ़ाना होना चाहिए. क्योंकि सशक्त नर्सें केवल अस्पतालों को मजबूत नहीं बनातीं, बल्कि पूरे देश की स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करती हैं.
अतिथि लेखक: प्रो. एन.के. गांगुली, पूर्व महानिदेशक, ICMR
अतिथि लेखक: डॉ. अधित चिनस्वामी, सीओओ एवं सह-संस्थापक, MediSim VR
डॉ. प्रकाशराव शेंडगे ने BW से भारत के कार्यबल के लिए मोबाइल ऑक्यूपेशनल हेल्थ सर्विसेज की शुरुआत, बीमारियों की शुरुआती पहचान में सुधार और एक अत्यंत नवोन्मेषी व प्रिवेंटिव हेल्थकेयर मॉडल विकसित करने पर विस्तार से बात की.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
रुहैल आमीन
नवी मुंबई स्थित ओम गगनगिरी हॉस्पिटल्स और ऑक्यूपेशनल हेल्थ सर्विसेज एलएलपी के संस्थापक और जाने-माने लैप्रोस्कोपिक सर्जन डॉ. प्रकाशराव शेंडगे ने दो दशकों से अधिक समय क्लिनिकल मेडिसिन और कार्यस्थल स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करते हुए बिताया है. वर्ष 2012 में उन्होंने एक हाई-टेक मोबाइल मेडिकल चेक-अप बस शुरू की, जिसका उद्देश्य डायग्नोस्टिक सुविधाओं को सीधे फैक्ट्रियों, औद्योगिक इकाइयों और कॉरपोरेट परिसरों तक पहुंचाना था. एक वाहन से शुरू हुई यह पहल अब पांच बसों के बेड़े में बदल चुकी है, जो महाराष्ट्र और देशभर में विभिन्न संगठनों को सेवाएं दे रहा है. इस विस्तृत बातचीत में डॉ. शेंडगे इस पहल के पीछे की सोच, बसों में इस्तेमाल की गई तकनीक और सुरक्षा व्यवस्थाओं, इंडस्ट्री के अनुसार होने वाली जांचों की अहमियत और कर्मचारियों की भलाई के लिए प्रिवेंटिव ऑक्यूपेशनल हेल्थकेयर को अनिवार्य बनाने की जरूरत पर बात करते हैं. संपादित अंश:
ऑक्यूपेशनल हेल्थकेयर के इस मॉडल को स्थापित करने की प्रेरणा आपको कहां से मिली?
मोबाइल मेडिकल चेक-अप सर्विस शुरू करने से पहले मैं एक दशक से अधिक समय तक ऑक्यूपेशनल हेल्थ एग्जामिनेशन कर रहा था. इस दौरान फैक्ट्रियों और कॉरपोरेट साइट्स पर मुझे बार-बार कई व्यावहारिक समस्याओं का सामना करना पड़ा. अक्सर उपयुक्त कमरे उपलब्ध नहीं होते थे. ऑडियोमेट्री के लिए पूरी तरह साउंडप्रूफ जगह की जरूरत होती थी, एक्स-रे के लिए एक सुरक्षित और अलग स्थान चाहिए होता था और ECG जांच के लिए प्राइवेसी व स्थिर वातावरण जरूरी था. कई मामलों में जांच शुरू होने से पहले ही क्लाइंट के परिसर में पूरा अस्थायी सेटअप तैयार करना पड़ता था.
मुझे महसूस हुआ कि इसका समाधान एक ऐसी पूरी डायग्नोस्टिक सुविधा तैयार करना है, जो खुद कार्यस्थल तक पहुंच सके. उद्देश्य सरल था—कर्मचारियों और नियोक्ताओं का काफी समय बचाते हुए क्लाइंट की साइट पर सटीक, नियमों के अनुरूप और किफायती स्वास्थ्य जांच उपलब्ध कराना. हमने 2012 में अपनी पहली हाई-टेक मेडिकल चेक-अप बस शुरू की. अच्छी प्रतिक्रिया मिलने पर 2015 में दूसरी, 2018 में तीसरी, 2020 में चौथी और 2025 में और अधिक अपग्रेड की गई पांचवीं बस शुरू की गई.
आपका मॉडल मेडिकल बस की पारंपरिक अवधारणा से किस तरह अलग है?
कई मेडिकल वाहनों का इस्तेमाल मुख्य रूप से मरीजों को अस्पताल तक पहुंचाने या सीमित स्तर की बुनियादी सेवाएं देने के लिए किया जाता है. हमारा कॉन्सेप्ट अलग है. यह बस खुद एक विशेष रूप से डिजाइन किए गए ऑक्यूपेशनल हेल्थ सेंटर की तरह काम करती है. हम टेस्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, प्रशिक्षित कर्मचारियों और रिपोर्टिंग सिस्टम को सीधे फैक्ट्री या कॉरपोरेट परिसर तक लेकर जाते हैं.
नियोक्ता को केवल पार्किंग की जगह और बिजली का कनेक्शन उपलब्ध कराना होता है. जहां बिजली उपलब्ध नहीं होती, वहां हम जनरेटर की व्यवस्था कर सकते हैं. इसके बाद संगठन के हेल्थ और सेफ्टी प्रोग्राम के तहत जरूरी सभी जांच साइट पर ही की जाती हैं. इससे कामकाज में कम बाधा आती है और बड़ी संख्या में कर्मचारी आसानी से अनिवार्य स्वास्थ्य जांच पूरी कर पाते हैं.
मोबाइल मेडिकल चेक-अप बस के अंदर कौन-कौन सी सुविधाएं उपलब्ध हैं?
बस को सात कार्यात्मक क्षेत्रों के साथ एक पूर्ण डायग्नोस्टिक यूनिट के रूप में डिजाइन किया गया है. इनमें रजिस्ट्रेशन, विजन स्क्रीनिंग, साउंडप्रूफ ऑडियोमेट्री केबिन, ब्लड कलेक्शन एरिया, ECG केबिन, डॉक्टर का एग्जामिनेशन केबिन, फेफड़ों की कार्यक्षमता जांचने का क्षेत्र और रेडिएशन से सुरक्षित डिजिटल एक्स-रे रूम शामिल हैं.
हम फिजिकल एग्जामिनेशन, नजदीक और दूर की दृष्टि जांच, कलर विजन स्क्रीनिंग, ऑडियोमेट्री, पल्मोनरी फंक्शन टेस्ट, ECG, डिजिटल चेस्ट एक्स-रे और कई तरह की ब्लड व यूरिन जांच कर सकते हैं. इंडस्ट्री के आधार पर जांच का दायरा कंप्लीट ब्लड काउंट, ब्लड शुगर और ब्लड ग्रुप जैसी बुनियादी जांचों से लेकर किडनी और लिवर फंक्शन, लिपिड प्रोफाइल, HbA1c और ब्लड-लेड टेस्ट जैसी विशेष जांचों तक हो सकता है.
एक दिन में कितने कर्मचारियों की जांच की जा सकती है और प्रत्येक चेक-अप में कितना समय लगता है?
जब कोई कर्मचारी जांच प्रक्रिया में प्रवेश करता है तो पूरा एग्जामिनेशन सामान्य तौर पर 25 से 30 मिनट में पूरा हो जाता है. अलग-अलग स्टेशनों पर योजनाबद्ध क्रम में कई टेस्ट एक साथ किए जा सकते हैं. ऐसे में एक बस आमतौर पर एक दिन में करीब 120 से 150 कर्मचारियों की जांच कर सकती है, हालांकि यह टेस्ट पैकेज और साइट की परिस्थितियों पर निर्भर करता है.
नियोक्ताओं के लिए यह इस मॉडल का सबसे बड़ा फायदा है. सैकड़ों या हजारों कर्मचारियों को जांच के लिए अस्पताल भेजने में एक या दो कार्यदिवस खर्च हो सकते हैं और उत्पादन भी प्रभावित हो सकता है. सुविधा को सीधे कार्यस्थल पर लाने से कर्मचारी कम से कम समय में जांच कराकर दोबारा काम पर लौट सकते हैं.
इस पहल को इंडस्ट्री से कैसी प्रतिक्रिया मिली है?
जब हमने इसकी शुरुआत की थी, तब प्रतिक्रिया को लेकर कुछ अनिश्चितता थी, क्योंकि पारंपरिक हेल्थ चेक-अप पहले से उपलब्ध थे और इस तरह के विशेष वाहन के लिए काफी बड़ा निवेश करना पड़ता है. प्रत्येक बस को तैयार करने और जरूरी उपकरणों से लैस करने में करीब 1 करोड़ रुपये की लागत आती है. शुरुआत में हमारी दरें कुछ अधिक थीं, लेकिन नियोक्ताओं ने जल्द ही समय की बचत के साथ-साथ रिपोर्ट की गुणवत्ता और एकरूपता का महत्व समझा.
कई संगठन अब करीब 13 वर्षों से लगातार हमारे साथ काम कर रहे हैं. हमने लगभग 12 लाख कर्मचारियों की स्वास्थ्य जांच की है, जिनमें अधिकांश महाराष्ट्र में हैं. पिछले कुछ वर्षों में हमने अपनी सेवाओं का विस्तार पूरे भारत में किया है. हम करीब 50 कर्मचारियों वाली छोटी इकाइयों से लेकर सालाना लगभग 10,000 कर्मचारियों की जांच के ऑर्डर देने वाले बड़े संगठनों तक को सेवाएं दे रहे हैं. लगातार मांग के कारण एक बस से शुरू हुआ यह मॉडल अब पांच बसों तक पहुंच गया है.
किन इंडस्ट्रीज में सबसे अधिक बार ऑक्यूपेशनल हेल्थ एग्जामिनेशन की जरूरत होती है?
जांच की आवृत्ति और दायरा लागू कानून, काम की प्रकृति और जोखिम के स्तर पर निर्भर करता है. कई उद्योगों में सालाना स्वास्थ्य जांच अनिवार्य होती है. फार्मास्युटिकल, केमिकल, पेट्रोकेमिकल और फूड प्रोसेसिंग बिजनेस के साथ-साथ होटल और अन्य निर्दिष्ट प्रतिष्ठानों में उनके संबंधित अनुपालन ढांचे के तहत हर छह महीने में जांच की आवश्यकता हो सकती है.
खतरनाक उद्योगों में विशेष सावधानी की जरूरत होती है, क्योंकि कर्मचारी लंबे समय तक धूल, शोर, रसायनों, धातुओं या अन्य पदार्थों के संपर्क में रह सकते हैं. इसलिए जांच कार्यक्रम सभी के लिए एक जैसा रखने के बजाय प्रत्येक विभाग में मौजूद वास्तविक जोखिमों के आधार पर तैयार किया जाना चाहिए.
जब कोई कर्मचारी हेल्थ चेक-अप के लिए बस में प्रवेश करता है तो प्रक्रिया क्या होती है?
प्रक्रिया की शुरुआत रजिस्ट्रेशन से होती है. हम कर्मचारी के विभाग, भूमिका और उसकी विशिष्ट पहचान संबंधी जानकारी दर्ज करते हैं. दौरे से पहले हम प्रबंधन, सेफ्टी टीम या फैक्ट्री मेडिकल ऑफिसर के साथ मिलकर अलग-अलग श्रेणी के कर्मचारियों के लिए जरूरी जांचों की पहचान करते हैं. इसके बाद कर्मचारी को क्रमवार संबंधित स्टेशनों पर भेजा जाता है.
एक सामान्य प्रोग्राम में फिजिकल एग्जामिनेशन, विजन टेस्ट, ऑडियोमेट्री, फेफड़ों की कार्यक्षमता जांच, ECG, एक्स-रे इमेजिंग और ब्लड व यूरिन सैंपल कलेक्शन शामिल हो सकते हैं. शोर वाले क्षेत्रों में काम करने वाले कर्मचारियों की ऑडियोमेट्री की जाती है. धूल के संपर्क में रहने वाले कर्मचारियों को पल्मोनरी फंक्शन टेस्ट और चेस्ट एक्स-रे की जरूरत हो सकती है, जबकि विशेष रसायनों या धातुओं के साथ काम करने वाले कर्मचारियों को विशेष लैब जांच की आवश्यकता पड़ सकती है. यह जोखिम आधारित दृष्टिकोण जांच को अधिक उपयोगी बनाता है.
रिपोर्ट कितनी जल्दी मिलती है, खासकर जब कोई गंभीर असामान्यता पाई जाती है?
गंभीर मामलों को प्राथमिकता दी जाती है. अगर कोई बड़ी असामान्यता सामने आती है तो हम कर्मचारी और कंपनी प्रबंधन को 12 से 24 घंटे के भीतर और कई बार इससे भी पहले जानकारी दे देते हैं. एक मामले में एक कर्मचारी का ब्लड शुगर स्तर 600 mg/dL से अधिक पाया गया था. सैंपल मिलने के कुछ घंटों के भीतर उसी शाम हमारी लैब ने हमें इसकी जानकारी दी और कर्मचारी को तत्काल अस्पताल में भर्ती कर इलाज के लिए भेजा गया.
रूटीन लैब रिपोर्ट आमतौर पर करीब 48 घंटे के भीतर कर्मचारियों को WhatsApp या ईमेल के जरिए भेज दी जाती है. पूरी अनुपालन डॉक्यूमेंटेशन प्रक्रिया, जिसमें डेटा एंट्री, जहां लागू हो वहां वैधानिक फॉर्म, व्यक्तिगत हेल्थ कार्ड, विश्लेषण और मैनेजमेंट इंफॉर्मेशन सिस्टम रिपोर्ट शामिल हैं, आमतौर पर 10 से 15 दिन में पूरी हो जाती है. मेडिकल फॉलो-अप, रिकॉर्ड और ऑडिट के लिए प्रबंधन को जरूरी सॉफ्ट और हार्ड कॉपी उपलब्ध कराई जाती हैं.
जब कोई असामान्य परिणाम सामने आता है तो उसके बाद आप किस तरह की सहायता देते हैं?
स्क्रीनिंग तभी उपयोगी है, जब उसके बाद समय पर कार्रवाई की जाए. किसी गंभीर असामान्यता की स्थिति में हम तुरंत कर्मचारी और नियोक्ता को सूचित करते हैं, ताकि आवश्यक इलाज या अस्पताल में भर्ती कराने की व्यवस्था की जा सके. कई बड़े संगठनों में फैक्ट्री मेडिकल ऑफिसर और कर्मचारी बीमा की सुविधा होती है और हम आगे के इलाज के लिए इन व्यवस्थाओं के साथ समन्वय करते हैं.
अनियंत्रित डायबिटीज या हाइपरटेंशन जैसी स्थितियों में कर्मचारी को काउंसलिंग, दवाओं की समीक्षा और लंबे समय तक निगरानी की जरूरत हो सकती है. जहां किसी छोटे संगठन के पास इन-हाउस मेडिकल टीम नहीं होती, वहां हमारे अस्पताल के डॉक्टर काउंसलिंग और इलाज के लिए साइट पर जा सकते हैं. यदि कर्मचारी किसी दूसरे शहर में है या आसानी से अस्पताल नहीं पहुंच सकता तो हम टेलीकंसल्टेशन की सुविधा भी देते हैं.
डिजिटल एक्स-रे बस का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. रेडिएशन से सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाती है?
एक्स-रे सेक्शन को रेडिएशन से सुरक्षित एक अलग केबिन के रूप में तैयार किया गया है. इस संरचना में दो मिलीमीटर की लेड शील्डिंग वाला कंपोजिट सिस्टम इस्तेमाल किया गया है, जिससे रेडिएशन कमरे के भीतर ही सीमित रहता है. डिजाइन और उपकरणों का निरीक्षण लागू रेडिएशन सेफ्टी मानकों के तहत किया जाता है और आवश्यक मंजूरी ली जाती है. कार्यात्मक रूप से यह जांच अस्पताल स्थित एक्स-रे सुविधा के समान सुरक्षा और डायग्नोस्टिक मानकों को पूरा करने के लिए डिजाइन की गई है.
डिजिटल टेक्नोलॉजी ने पुराने सिस्टम की तुलना में रेडिएशन डोज को काफी कम किया है और पारंपरिक डार्क रूम की जरूरत भी खत्म कर दी है. इमेज लगभग तुरंत समीक्षा के लिए उपलब्ध हो जाती हैं, जिससे टीम किसी स्पष्ट समस्या की तुरंत पहचान कर कर्मचारी को सलाह दे सकती है. हमारी एक बस में धूल वाले वातावरण में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए विशेष चेस्ट इमेजिंग की जरूरत को पूरा करने वाला हाई-फ्रीक्वेंसी, हाई-डेफिनिशन सिस्टम भी मौजूद है.
स्थिर और सटीक जांच सुनिश्चित करने के लिए बस को किस तरह डिजाइन किया गया है?
यह वाहन करीब 40 फीट लंबा है, जिसमें लगभग 34 फीट का उपयोगी क्लिनिकल स्पेस है. साइट पर पहुंचने के बाद हाइड्रोलिक जैक की मदद से इसे ऊपर उठाकर स्थिर किया जाता है, ताकि बस के भीतर होने वाली हलचल ब्लड कलेक्शन, ECG रिकॉर्डिंग या अन्य जांचों को प्रभावित न करे.
सटीकता के लिए वातावरण और उपकरण दोनों महत्वपूर्ण हैं. ऑडियोमेट्री साउंडप्रूफ केबिन में की जाती है. ब्लड सैंपल को 2 से 8 डिग्री सेल्सियस के तापमान नियंत्रित रेफ्रिजरेटर में रखा जाता है, ताकि जांच के पैरामीटर स्थिर रहें. वाहन के भीतर पारंपरिक छह मीटर की विजन टेस्टिंग दूरी तैयार करना मुश्किल होता है, इसलिए हम डिजिटल विजन स्कैनर का उपयोग करते हैं. ECG और पल्मोनरी फंक्शन टेस्ट कंप्यूटर आधारित उपकरणों से किए जाते हैं. रजिस्ट्रेशन, सैंपल लेबलिंग, टेस्टिंग, डेटा हैंडलिंग और रिपोर्टिंग के लिए स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर अपनाई जाती हैं, ताकि तकनीकी और पहचान संबंधी त्रुटियों को कम किया जा सके.
आपकी ऑक्यूपेशनल हेल्थ सर्विसेज को किन मंजूरियों और पेशेवर योग्यताओं का समर्थन प्राप्त है?
हमारा काम उन क्षेत्रों के लिए आवश्यक संबंधित मंजूरियों के तहत किया जाता है, जिन्हें हम सेवाएं प्रदान करते हैं. मुझे महाराष्ट्र सरकार द्वारा औद्योगिक कर्मचारियों की मेडिकल जांच के लिए सर्टिफाइंग सर्जन के रूप में मान्यता प्राप्त है. इसके अलावा, मेरे पास समुद्री कर्मचारियों और ऑफशोर या ऑनशोर कर्मियों की जांच के लिए डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ शिपिंग की मंजूरी है, साथ ही पोर्ट और केंद्रीय श्रम से जुड़े ऑक्यूपेशनल हेल्थ कार्यों के लिए भी संबंधित योग्यताएं हैं.
हम अंतरराष्ट्रीय तेल और गैस तथा समुद्री आवश्यकताओं के अनुरूप जांच भी करते हैं, जिनमें विदेशों और ऑफशोर वातावरण में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले मानक शामिल हैं. हमारी सेवाओं में लागू नियामकीय आवश्यकताओं के तहत फूड और होटल सेक्टर के कर्मचारियों की मेडिकल जांच भी शामिल है. ये मंजूरियां महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि ऑक्यूपेशनल फिटनेस सर्टिफिकेट नियोक्ता, ऑडिटर और संबंधित प्राधिकरण के लिए विश्वसनीय और स्वीकार्य होना चाहिए.
एक इंडस्ट्री से दूसरी इंडस्ट्री में स्वास्थ्य जोखिम किस तरह अलग होते हैं?
हर कर्मचारी के लिए सामान्य फिटनेस का एक बुनियादी आकलन जरूरी होता है, जिसमें भूमिका के अनुसार ऊंचाई, वजन, बॉडी मास इंडेक्स, ब्लड प्रेशर, दृष्टि, हीमोग्लोबिन, ब्लड शुगर, ECG और सुनने की क्षमता की जांच शामिल हो सकती है. इसके अलावा टेस्टिंग कार्यस्थल पर मौजूद जोखिमों के अनुसार होनी चाहिए.
पेट्रोकेमिकल और केमिकल वातावरण में रसायनों का संपर्क लिवर या किडनी को प्रभावित कर सकता है, इसलिए लिवर और रीनल फंक्शन टेस्ट महत्वपूर्ण हो जाते हैं. स्टील और मेटल प्रोसेसिंग यूनिट्स में लेड के संपर्क के कारण ब्लड-लेड टेस्ट की जरूरत हो सकती है. अधिक धूल वाले कार्यस्थलों पर फेफड़ों की कार्यक्षमता जांच और विशेष चेस्ट एक्स-रे जरूरी हो सकते हैं. अत्यधिक जोखिम वाली जगहों पर जांच अधिक बार करनी पड़ सकती है. यदि किसी तरह का ट्रेंड या असामान्यता सामने आती है तो मेडिकल मॉनिटरिंग, कर्मचारी को उस जोखिम वाले स्थान से हटाने और जोखिम को उसके स्रोत पर कम करने के लिए इंजीनियरिंग उपायों की सिफारिश की जा सकती है.
आप किन ऑक्यूपेशनल बीमारियों को लेकर सबसे ज्यादा चिंतित हैं?
सिलिका, एस्बेस्टस और अन्य औद्योगिक धूल के लंबे समय तक संपर्क में रहने से सिलिकोसिस और न्यूमोकोनियोसिस सहित गंभीर और कई बार अपरिवर्तनीय फेफड़ों की बीमारियां हो सकती हैं. खदानों, टाइल निर्माण और अत्यधिक धूल वाले अन्य उद्योगों में काम करने वाले कर्मचारी विशेष रूप से जोखिम में हो सकते हैं, यदि पर्याप्त सुरक्षा उपाय और निगरानी न हो.
अधिक शोर वाले वातावरण में काम करने से नॉइज-इंड्यूस्ड हियरिंग लॉस हो सकता है. रसायनों के संपर्क से लिवर या किडनी को नुकसान पहुंच सकता है, जबकि कुछ पदार्थों के लंबे समय तक संपर्क से ऑक्यूपेशनल कैंसर और त्वचा संबंधी बीमारियों का जोखिम बढ़ सकता है.
चुनौती यह है कि कई ऑक्यूपेशनल बीमारियां धीरे-धीरे विकसित होती हैं और शुरुआती चरण में स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते. नियमित और जोखिम-विशिष्ट स्क्रीनिंग के जरिए समस्या को पहले पहचाना जा सकता है और नुकसान गंभीर होने से पहले सुधारात्मक कदम उठाए जा सकते हैं.
कर्मचारियों में लाइफस्टाइल से जुड़ी कौन-सी बड़ी स्वास्थ्य समस्याएं सामने आ रही हैं?
ऑक्यूपेशनल स्क्रीनिंग में अब कार्यस्थल से जुड़े जोखिमों के साथ-साथ लाइफस्टाइल से जुड़ी बीमारियां भी तेजी से सामने आ रही हैं. हमारे अनुभव में, जांच किए गए करीब 15 फीसदी कर्मचारियों में डायबिटीज हो सकती है, जबकि अन्य 8 से 10 फीसदी कर्मचारियों में इसका जोखिम या बढ़ा हुआ शुगर लेवल देखा जा सकता है. लगभग 15 से 20 फीसदी कर्मचारियों में हाइपरटेंशन और करीब 10 से 15 फीसदी में दृष्टि संबंधी असामान्यताएं देखी जाती हैं, हालांकि ये आंकड़े कार्यबल और इंडस्ट्री के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं. मोटापा, खराब खानपान, तनाव और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी चिंताएं भी बढ़ रही हैं.
इसी वजह से कई संगठन अब विस्तृत वार्षिक हेल्थ पैकेज की मांग कर रहे हैं, जिनमें फास्टिंग और पोस्ट-मील ब्लड शुगर, HbA1c, लिपिड प्रोफाइल और लिवर फंक्शन टेस्ट शामिल होते हैं. कार्यस्थल स्वास्थ्य कार्यक्रम अब सिर्फ वैधानिक अनुपालन तक सीमित नहीं रह सकते. उन्हें कर्मचारियों को पुरानी बीमारियों को समझने और उन्हें मैनेज करने में भी मदद करनी होगी.
भारत में प्रिवेंटिव और ऑक्यूपेशनल हेल्थकेयर को लेकर आपका व्यापक विजन क्या है?
हेल्थकेयर को अधिक सक्रिय और प्रोएक्टिव बनना होगा. किसी कर्मचारी के बीमार पड़ने का इंतजार करना और उसके बाद उसे अस्पताल भेजना एक रिएक्टिव मॉडल है. डायग्नोस्टिक सुविधाओं को कार्यस्थल तक पहुंचाकर हम बड़ी संख्या में लोगों की प्रभावी तरीके से स्क्रीनिंग कर सकते हैं, जोखिमों की शुरुआती पहचान कर सकते हैं और व्यक्ति व संगठन दोनों के लिए उपयोगी स्वास्थ्य डेटा तैयार कर सकते हैं.
मेरा विजन एक्सेसिबिलिटी, टेक्नोलॉजी, क्लिनिकल एक्यूरेसी और फॉलो-अप को एक साथ जोड़ने का है. एक मोबाइल यूनिट का काम सिर्फ टेस्ट करना नहीं होना चाहिए, बल्कि उसे प्रिवेंशन, काउंसलिंग, समय पर रेफरल और लंबे समय तक निगरानी में भी सहयोग देना चाहिए. अगर नियोक्ता ऑक्यूपेशनल हेल्थ को सिर्फ एक कंप्लायंस एक्सरसाइज के बजाय कर्मचारियों में निवेश के रूप में देखें, तो इसका लाभ कर्मचारी कल्याण, उत्पादकता और संगठन की मजबूती के रूप में दिखाई देगा.
रुहैल आमीन, BW रिपोर्टर्स
(रुहैल अमीन, BW Businessworld में सीनियर एडिटर हैं और नई दिल्ली में आधारित एक अनुभवी पत्रकार हैं. वे अपने गहन विश्लेषण और विस्तृत रिपोर्टिंग के लिए जाने जाते हैं. उनका कार्य पत्रकारिता की निष्पक्षता और उत्कृष्ट कहानी कहने की प्रतिबद्धता को दर्शाता है, जिसने उन्हें उद्योग में एक विश्वसनीय आवाज के रूप में स्थापित किया है. उनके योगदान विभिन्न प्लेटफॉर्म्स पर फैले हुए हैं, जहां वे लगातार ऐसी सामग्री प्रस्तुत करते हैं जो पाठकों को जानकारी देने के साथ-साथ उन्हें जोड़कर भी रखती है.)
कंपनी का कहना है कि इस नई थेरेपी से मरीजों और उनके परिजनों को अस्पताल में कम समय बिताना पड़ेगा. साथ ही बार-बार लंबे सफर और उपचार से जुड़े अप्रत्यक्ष खर्चों में भी कमी आएगी.
by
रितु राणा
भारत में फेफड़ों के कैंसर के इलाज को अधिक तेज़, सुविधाजनक और मरीज-केंद्रित बनाने की दिशा में एक बड़ी पहल हुई है. रॉश फार्मा इंडिया ने देश में टिसेंट्रिक® एससी (एटजोलिजुमैब) लॉन्च करने की घोषणा की है. यह दुनिया की पहली सबक्यूटेनियस यानी त्वचा के नीचे दी जाने वाली इम्यूनोथेरेपी है, जिसे मात्र 7 मिनट में दिया जा सकता है. पारंपरिक आईवी इन्फ्यूजन आधारित उपचार में जहां कई घंटे लगते हैं, वहीं यह नई तकनीक इलाज के समय को करीब 80 प्रतिशत तक कम कर देती है.
कंपनी का कहना है कि इस नई थेरेपी से मरीजों और उनके परिजनों को अस्पताल में कम समय बिताना पड़ेगा. साथ ही बार-बार लंबे सफर और उपचार से जुड़े अप्रत्यक्ष खर्चों में भी कमी आएगी.
एक मरीज की जगह अब 5 मरीजों का इलाज संभव
टिसेंट्रिक एससी के लॉन्च को भारत के हेल्थकेयर सिस्टम के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है. वैश्विक आकलनों के मुताबिक, जितने समय में आईवी इन्फ्यूजन के जरिए एक मरीज का इलाज किया जाता है, उतने समय में सबक्यूटेनियस तकनीक से पांच मरीजों तक का उपचार किया जा सकता है. इससे अस्पतालों में बेड और मेडिकल स्टाफ पर दबाव कम होगा और संसाधनों का बेहतर उपयोग संभव हो सकेगा.
मरीजों ने बताया ज्यादा आरामदायक इलाज
वैश्विक अध्ययनों में भी सबक्यूटेनियस इम्यूनोथेरेपी को लेकर सकारात्मक प्रतिक्रिया सामने आई है. यूरोपियन लंग कैंसर कांग्रेस 2024 में पेश किए गए IMSCiN002 अध्ययन के अनुसार, पांच में से चार मरीजों ने आईवी की तुलना में टिसेंट्रिक एससी को अधिक पसंद किया.
मरीजों ने इसके पीछे अस्पताल में कम समय लगने, भावनात्मक तनाव कम होने और ज्यादा आरामदायक अनुभव जैसे कारण बताए. अध्ययनों में यह भी सामने आया कि इस तकनीक से दर्द, जलन और बेचैनी अपेक्षाकृत कम होती है.
वहीं ESMO 2023 में प्रस्तुत IMSCiN001 अध्ययन में 90 प्रतिशत हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स ने माना कि एससी फॉर्मूलेशन देना अधिक आसान है, जबकि 75 प्रतिशत विशेषज्ञों ने कहा कि इससे मेडिकल टीमों का समय बच सकता है.
डॉक्टरों ने बताया कैंसर केयर में गेमचेंजर
मेदांता में मेडिकल ऑन्कोलॉजी के प्रमुख एवं डायरेक्टर डॉ. सज्जन राजपुरोहित ने कहा कि इम्यूनोथेरेपी ने कैंसर उपचार में बड़ा बदलाव लाया है, लेकिन पारंपरिक आईवी उपचार लंबा और कई बार मरीजों के लिए कष्टदायक साबित होता है.
उन्होंने कहा कि बार-बार अस्पताल जाना और लंबा उपचार मरीजों के शारीरिक और मानसिक तनाव को बढ़ाता है. ऐसे में सबक्यूटेनियस तकनीक इलाज को अधिक तेज़ और सुविधाजनक बनाती है, जिससे मरीजों का समग्र अनुभव बेहतर होता है.
भारत में कैंसर केयर को विकेंद्रीकृत करने की दिशा में कदम
भारत जैसे देश में, जहां छोटे शहरों और कस्बों से मरीज बड़े महानगरों में इलाज के लिए पहुंचते हैं, वहां यह तकनीक कैंसर केयर को अधिक सुलभ बना सकती है. कम समय में दवा देने की सुविधा से डे-केयर सेंटरों और छोटे हेल्थकेयर संस्थानों में भी इलाज संभव हो सकेगा.
मणिपाल हॉस्पिटल, बेंगलुरु में मेडिकल ऑन्कोलॉजी विभाग के कंसल्टेंट एवं एचओडी डॉ. अमित रौथन ने कहा कि सबक्यूटेनियस इम्यूनोथेरेपी जैसी तकनीकें अस्पतालों पर बढ़ते दबाव को कम करने और इलाज को विकेंद्रीकृत करने में अहम भूमिका निभा सकती हैं.
85 देशों में मंजूरी, 10 हजार से ज्यादा मरीजों को फायदा
टिसेंट्रिक एससी दुनिया का पहला और एकमात्र पीडी-(एल)1 इनहिबिटर है, जो इंट्रावीनस और सबक्यूटेनियस दोनों रूपों में उपलब्ध है. इसे सबसे पहले 2023 में ब्रिटेन की MHRA और बाद में 2024 में USFDA से मंजूरी मिली थी.
फिलहाल इसे 85 से अधिक देशों में मंजूरी मिल चुकी है और दुनियाभर में 10,000 से ज्यादा मरीज इसका लाभ उठा चुके हैं. भारत में डीसीजीआई ने इसे एडजुवेंट और मेटास्टेटिक नॉन-स्मॉल सेल लंग कैंसर (NSCLC) के इलाज के लिए मंजूरी दी है.
कैसे काम करती है यह नई तकनीक
टिसेंट्रिक एससी में हेलोजाइम थेराप्यूटिक्स की ENHANZE® ड्रग डिलीवरी तकनीक का इस्तेमाल किया गया है. इसमें रिकॉम्बिनेंट ह्यूमन हायलुरोनिडेज PH20 एंजाइम का उपयोग होता है, जो त्वचा के नीचे दवा के तेजी से अवशोषण में मदद करता है. इससे दवा कम समय में शरीर में प्रभावी रूप से पहुंच पाती है. इस ट्रीटमेंट में मरीज को सामान्य तौर पर 6 डोज दी जाती है, जिसमें एक डोज की कीमत 3.7 लाख रुपये का खर्च आता है. वहीं, कंपनी ने जानकारी दी है कि सरकार ने सीजीएचएस पैनल के अंदर भी मरीजों को ट्रीटमेंट निशुल्क मिलेगा.
मरीज-केंद्रित कैंसर केयर पर फोकस
रॉश फार्मा इंडिया के एमडी एवं सीईओ राजविंदर (राज्जी) मेहदवान ने कहा कि कंपनी भारत में ऐसे इनोवेशन लाने के लिए प्रतिबद्ध है, जो केवल क्लीनिकल परिणामों को बेहतर न बनाएं, बल्कि मरीजों के इलाज के अनुभव को भी आसान और सुविधाजनक बनाएं.
वहीं कंपनी के चीफ मेडिकल ऑफिसर डॉ. सिवाबालन सिवानेसन ने कहा कि आधुनिक कैंसर उपचार अब केवल मरीज को जीवित रखने तक सीमित नहीं है, बल्कि बेहतर जीवन गुणवत्ता और मरीजों की सुविधा पर भी उतना ही जोर दिया जा रहा है.
Grant Thornton Bharat की रिपोर्ट के अनुसार, भारत का हेल्थकेयर डील मार्केट स्थिर तो है लेकिन सतर्क मोड में आगे बढ़ रहा है. निवेशक अब बड़े सौदों की बजाय डिजिटल हेल्थ, हेल्थटेक और मिड-मार्केट कंपनियों पर फोकस कर रहे हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत का फार्मा और हेल्थकेयर डील मार्केट वित्त वर्ष 2026 की पहली तिमाही (Q1FY26) में स्थिर बना रहा. इस दौरान कुल 78 डील्स हुईं, जिनकी संयुक्त वैल्यू 1.9 अरब अमेरिकी डॉलर रही. हालांकि डील्स की संख्या स्थिर रही, लेकिन बड़ी डील्स की कमी के कारण कुल वैल्यू में नरमी देखी गई. Grant Thornton Bharat की रिपोर्ट के अनुसार, निवेशकों का फोकस अब बड़े सौदों की बजाय मिड-मार्केट और शुरुआती चरण की कंपनियों पर अधिक रहा.
डील वॉल्यूम स्थिर, लेकिन वैल्यू में गिरावट
Q1FY26 में कुल 78 डील्स दर्ज की गईं, जो पिछले ट्रेंड के अनुरूप स्थिरता दिखाती हैं. लेकिन कुल वैल्यू में गिरावट देखी गई, जिसका मुख्य कारण बड़ी (mega) डील्स का न होना रहा. रिपोर्ट के अनुसार, हेल्थकेयर सेक्टर में निवेश अब छोटे और मिड-साइज़ सौदों की ओर शिफ्ट हो रहा है, जिससे बाजार में “सेलेक्टिव इन्वेस्टमेंट अप्रोच” दिख रही है.
M&A डील्स में गिरावट, घरेलू सौदे हावी
मर्जर और एक्विजिशन (M&A) सेगमेंट में इस तिमाही में 30 डील्स हुईं, जिनकी कुल वैल्यू 915 मिलियन डॉलर रही. इस दौरान वैल्यू में लगभग 40% की तिमाही गिरावट दर्ज हुई, जबकि अधिकतर डील्स 50 मिलियन डॉलर से कम की रेंज में रहीं. अस्पताल और फार्मा-बायोटेक सेक्टर में छोटे सौदे प्रमुख रहे. घरेलू डील्स का दबदबा कायम रहा, जबकि विदेशी निवेश (inbound deals) कमजोर रहा. इस दौरान एक बड़ी डील में इंफोसिस (Infosys Limited) ने ऑपटिमम (Optimum Healthcare IT) का 465 मिलियन डॉलर में अधिग्रहण किया, जिसने कुल डील वैल्यू का बड़ा हिस्सा कवर किया.
प्राइवेट इक्विटी और वेंचर कैपिटल में मजबूती
प्राइवेट इक्विटी और वेंचर कैपिटल गतिविधियां अपेक्षाकृत मजबूत रहीं. इस सेगमेंट में कुल 45 डील्स हुईं, जिनकी वैल्यू 456 मिलियन डॉलर रही. वॉल्यूम में 22% की तिमाही वृद्धि दर्ज हुई, जबकि वैल्यू में 4% की हल्की बढ़ोतरी देखी गई. यह दिखाता है कि निवेशक अभी भी शुरुआती चरण की हेल्थकेयर कंपनियों में सक्रिय हैं. रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 69% PE डील्स प्री-सीड से सीरीज A राउंड के बीच रहीं और करीब 95% ट्रांजैक्शन 50 मिलियन डॉलर से कम वैल्यू के थे. यह ट्रेंड डिजिटल और टेक-इनेबल्ड हेल्थकेयर बिजनेस में लगातार बढ़ते निवेश को दर्शाता है.
हेल्थटेक और वेलनेस बना निवेश का नया केंद्र
हेल्थटेक, डिजिटल हेल्थ और वेलनेस सेगमेंट इस तिमाही के प्रमुख ड्राइवर बने. निवेशकों की दिलचस्पी AI आधारित डायग्नॉस्टिक्स, प्रिवेंटिव हेल्थकेयर और डिजिटल केयर प्लेटफॉर्म्स में लगातार बढ़ रही है. इसके साथ ही फार्मा और हॉस्पिटल सेक्टर भी कुल डील वैल्यू को सपोर्ट करते रहे.
बड़ी प्राइवेट इक्विटी डील्स
तिमाही की सबसे बड़ी PE डील में क्रिसकैपिटल (ChrysCapital) और अन्य निवेशकों ने नोवार्टिस (Novartis India Limited) में 71% हिस्सेदारी 157 मिलियन डॉलर में खरीदी. वहीं एक अन्य महत्वपूर्ण डील में अल्कम लैबोरेट्रीज (Alkem Laboratories) की मेडटेक यूनिट ने ऑक्लूटेक होल्डिंग एजी (Occlutech Holding AG) में 55% हिस्सेदारी 117 मिलियन डॉलर में अधिग्रहित की.
IPO बाजार सुस्त, QIP में हल्की रिकवरी
IPO गतिविधियां इस तिमाही में लगभग ठप रहीं और सिर्फ एक पब्लिक इश्यू के जरिए 18 मिलियन डॉलर जुटाए गए. हालांकि क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल प्लेसमेंट (QIP) में हल्की रिकवरी देखने को मिली, जहां दो इश्यू के जरिए कुल 500 मिलियन डॉलर जुटाए गए. इसमें बड़ा हिस्सा Biocon Limited द्वारा जुटाए गए 461 मिलियन डॉलर से आया.
यह अत्याधुनिक अस्पताल श्री विले पार्ले केलावणी मंडल (SVKM) द्वारा विकसित किया गया है. इसे एक क्षेत्रीय हेल्थकेयर हब के रूप में स्थापित किया जा रहा है, जो महाराष्ट्र के साथ-साथ पड़ोसी राज्यों मध्य प्रदेश और गुजरात के मरीजों को भी सेवाएं देगा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने शनिवार को धुले जिले के शिरपुर में 1,200 बेड वाले मल्टी-स्पेशियलिटी अस्पताल का उद्घाटन किया. यह पहल उत्तर महाराष्ट्र में स्वास्थ्य ढांचे के बड़े विस्तार के रूप में देखी जा रही है. इस मौके पर राज्य मंत्री जयकुमार रावल और संजय सावकारे सहित कई अन्य गणमान्य व्यक्ति भी उपस्थित रहे.
क्षेत्रीय स्वास्थ्य केंद्र के रूप में विकसित होगा अस्पताल
यह अत्याधुनिक अस्पताल श्री विले पार्ले केलावणी मंडल (SVKM) द्वारा विकसित किया गया है. इसे एक क्षेत्रीय हेल्थकेयर हब के रूप में स्थापित किया जा रहा है, जो महाराष्ट्र के साथ-साथ पड़ोसी राज्यों मध्य प्रदेश और गुजरात के मरीजों को भी सेवाएं देगा.
आधुनिक सुविधाओं से लैस
तपनभाई मुकुशभाई पटेल मेमोरियल हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर नामक यह संस्थान मुंबई और दिल्ली जैसे महानगरों के स्तर की उन्नत चिकित्सा सुविधाएं प्रदान करने का लक्ष्य रखती है. खासतौर पर धुले, नंदुरबार, जलगांव और नाशिक के आदिवासी एवं वंचित क्षेत्रों के लोगों को इससे बड़ा लाभ मिलने की उम्मीद है.
विशेष उपचार के लिए शहरों पर निर्भरता होगी कम
लगभग 1,200 बेड की क्षमता वाला यह अस्पताल क्षेत्र के मरीजों की महानगरों पर निर्भरता कम करेगा. इंदौर और नाशिक जैसे शहरों के मरीज भी यहां इलाज के लिए आ सकेंगे.
अस्पताल “सभी के लिए समान उपचार” की नीति पर कार्य करेगा, जिसमें आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए कैशलेस इलाज की सुविधा भी उपलब्ध होगी, साथ ही अत्याधुनिक जांच और उपचार सेवाएं भी प्रदान की जाएंगी.
40,000 करोड़ रुपये के निवेश से औद्योगिक विकास को बढ़ावा
इस अवसर पर देवेंद्र फडणवीस ने शिरपुर और धुले जिले में लगभग 40,000 करोड़ रुपये के निवेश की घोषणा का भी उल्लेख किया. इस निवेश का उद्देश्य क्षेत्र में औद्योगिक विकास को बढ़ावा देना और रोजगार के अवसर पैदा करना है. उन्होंने कहा कि नंदुरबार के साथ यह क्षेत्र एक संभावित औद्योगिक हब के रूप में उभर रहा है, जहां उद्योग समूहों की रुचि लगातार बढ़ रही है.
समग्र विकास मॉडल पर जोर
मुख्यमंत्री ने शिरपुर के समग्र विकास मॉडल की सराहना की, जहां शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे में निवेश के जरिए कौशल विकास और रोजगार सृजन को बढ़ावा मिल रहा है.
उन्होंने स्थानीय विधायक Amrish Patel की भूमिका की भी प्रशंसा की, जिन्होंने क्षेत्र में शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार में महत्वपूर्ण योगदान दिया है. उन्होंने आश्वासन दिया कि राज्य सरकार इस विकास यात्रा को आगे भी समर्थन देती रहेगी.
इस एसोसिएशन का उद्देश्य गैर-संचारी रोगों (NCDs) और पर्यावरणीय स्वास्थ्य से निपटना है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
मुंबई में प्रख्यात महिला नेताओं, कॉर्पोरेट अधिकारियों और वैश्विक विचारकों की उपस्थिति में एसोसिएशन फॉर वूमन इन हेल्थकेयर (AWH) का औपचारिक शुभारंभ किया गया. यह पहल काइंडनेस प्रैक्टिस फाउंडेशन के अंतर्गत शुरू की गई है और इसका उद्देश्य महिलाओं को पर्यावरणीय गिरावट के कारण बढ़ रहे गैर-संक्रामक रोगों (NCDs) के खिलाफ नेतृत्व करने के लिए सशक्त बनाना है. लॉन्च इवेंट में एक संदेश को बार-बार दोहराया गया: "सस्टेनेबिलिटी अब विकल्प नहीं बल्कि मानव स्वास्थ्य और जीवन के लिए अनिवार्य है."
कार्यक्रम में मानव स्वास्थ्य और ग्रह की भलाई के बीच के महत्वपूर्ण संबंध को उजागर किया गया. डॉ. रचना छाछी, काइंडनेस प्रैक्टिस और AWH™ की संस्थापक, ने बताया कि फाउंडेशन का मिशन सस्टेनेबल न्यूट्रिशन और पर्यावरणीय संरक्षण के माध्यम से NCDs से लड़ना है. डॉ. छाछी ने कहा, "हममें से हर किसी के परिवार या समुदाय में कोई न कोई हृदय रोग, टाइप 2 डायबिटीज, मोटापा, COPD, कैंसर या मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौती से जूझ रहा है. हमारा लक्ष्य मानव स्वास्थ्य और ग्रह दोनों के लिए पीड़ा को कम करना है." प्रोफेसर गणेश चन्ना, वर्ल्ड एनवायरनमेंट काउंसिल के संस्थापक और अध्यक्ष ने भी कहा कि महिलाएं सस्टेनेबिलिटी और पर्यावरणीय बदलाव की मुख्य प्रेरक हैं.
प्रमुख प्रतिभागियों का पैनल
लॉन्च इवेंट में कई बड़े लीडर्ग ने भाग लिया:
1. प्रीति चंद्रशेखर, अध्यक्ष, इंस्टिट्यूट ऑफ एक्चुरियर्स इंडिया
2. डॉ. शिल्पा वोर, चीफ R&D ऑफिसर, Marico
3. डॉ. बानी यादव, भारत की शीर्ष महिला रैली चालक
4. फोरम नागोरी, हेड CSR और सस्टेनेबिलिटी, Tata Power
5. डॉ. अन्नुराग बत्रा, चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ, BW Businessworld
6. डॉ. जवाहर पांजवानी, वरिष्ठ ऑर्थोपेडिक सर्जन
7. विक्रम छाछी, एशिया हेड, DHR Global
8. डॉ. मनीषा गुप्ता, वरिष्ठ वैज्ञानिक, ISRO
9. तन्वी शर्मा, UN यूथ एडवोकेट और इनोवेशन लीडर
10 भावना राव, ग्लोबल ऑफरिंग लीड, Accenture
11. अराधना छाछी, संस्थापक – Unhurry®
12. सविता गायकवाड़, लीडरशिप कोच
13. पारुल गोस्सैन, बॉलीवुड पब्लिसिस्ट
14. सुजल चवटे, संस्थापक – Indoor Greens
वैश्विक लॉन्च में खास संदेश
यून यूथ एडवोकेट तन्वी शर्मा ने कहा, "हमारे रोजमर्रा के कार्य पर्यावरण और आने वाली पीढ़ियों पर असर डालते हैं. विकास और महासागर स्वास्थ्य के बीच की खाई को पाटना जरूरी है ताकि भविष्य सशक्त हो."
भारत में अब गैर-संक्रामक रोग कुल मौतों का 63–65% हैं, जो 1990 में 37.9% थे. मानसिक स्वास्थ्य विकार, ऑटोइम्यून और ऑटिज्म जैसी स्थितियां भी तेजी से बढ़ रही हैं, जो पर्यावरणीय कारकों से जुड़ी हैं. अनुसंधान बताता है कि महिलाएं घर, समुदाय और संगठनों में स्वस्थ आदतों को बढ़ावा देने में अहम भूमिका निभा सकती हैं.
डॉ. जवाहर पांजवानी ने कहा, "सस्टेनेबल न्यूट्रिशन मानव स्वास्थ्य में सुधार और सूजन कम करने का महत्वपूर्ण कारक है. महिलाएं अपने घर और समुदाय में इसे लागू कर, जीवन बदल सकती हैं." इस दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए काइंडनेस प्रैक्टिस ने सस्टेनेबल न्यूट्रिशन सर्टिफिकेशन के साथ एक ई-लर्निंग प्लेटफॉर्म लॉन्च किया, जिससे लोग दुनिया भर में CO2 उत्सर्जन को 3 टन तक कम करने और पृथ्वी की रक्षा करने में सक्षम होंगे.
इस सम्मेलन में सिंगापुर, मुंबई, नई दिल्ली, बैंगलोर, गुरुग्राम, देहरादून और वड़ोदरा सहित विभिन्न शहरों के नेताओं ने अपनी उपस्थिति और भाषणों के माध्यम से इस मिशन के प्रति समर्थन व्यक्त किया. AWH™ एक वैश्विक मंच बनने जा रहा है, जहां महिला नेता स्वास्थ्य देखभाल समाधानों पर सहयोग करेंगी, जो पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी हों और स्वस्थ ग्रह के माध्यम से स्वस्थ समाज सुनिश्चित करें.
‘फाइंड केयर’ फीचर का लॉन्च सैमसंग की यूजर-केंद्रित नवाचार रणनीति को और मजबूत करता है और कंपनी को एक संपूर्ण डिजिटल हेल्थ प्लेटफॉर्म के रूप में स्थापित करने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत में डिजिटल हेल्थ सेवाओं को नई गति देते हुए सैमसंग ने अपने ग्लोबल वेलनेस प्लेटफॉर्म Samsung Health पर ‘फाइंड केयर’ फीचर लॉन्च करने की घोषणा की है. इस पहल के तहत कंपनी ने हेल्थ-टेक प्लेटफॉर्म PharmEasy और Tata 1mg के साथ साझेदारी की है. 24 फरवरी 2026 से यूजर्स दवाइयाँ मंगाने, लैब टेस्ट बुक करने और ऑनलाइन डॉक्टर परामर्श जैसी सेवाओं का लाभ सीधे ऐप के जरिए उठा सकेंगे.
एक ही ऐप में दवा, टेस्ट और डॉक्टर परामर्श
‘फाइंड केयर’ फीचर के जुड़ने से अब यूजर्स को अलग-अलग हेल्थ ऐप्स के बीच स्विच करने की जरूरत नहीं होगी. सैमसंग हेल्थ के भीतर ही दवाइयों की ऑनलाइन ऑर्डरिंग, डायग्नोस्टिक टेस्ट बुकिंग और डॉक्टर से वर्चुअल कंसल्टेशन जैसी सेवाएं उपलब्ध होंगी. यह फीचर ऐप अपडेट के माध्यम से 24 फरवरी से उपलब्ध होगा और यूजर्स के लिए हेल्थकेयर एक्सेस को अधिक सरल और एकीकृत बनाएगा.
लॉन्च ऑफर: 6 महीने की फ्री मेंबरशिप
साझेदारी के तहत फार्मईजी सैमसंग हेल्थ यूजर्स को विशेष लॉन्च ऑफर दे रही है. ऐप के जरिए पहला ट्रांजैक्शन करने पर ग्राहकों को 6 महीने की ‘फार्मईज़ी प्लस’ मेंबरशिप मुफ्त मिलेगी. इस मेंबरशिप के तहत अतिरिक्त छूट और फ्री डिलीवरी जैसे फायदे मिलेंगे.
सैमसंग का विजन: सुलभ और कनेक्टेड हेल्थकेयर
सैमसंग रिसर्च इंस्टीट्यूट, नोएडा के मैनेजिंग डायरेक्टर क्यूंगयुन रू ने कहा कि कंपनी का उद्देश्य हेल्थकेयर को अधिक सुलभ और सुविधाजनक बनाना है. उनके अनुसार, ‘फाइंड केयर’ फीचर यूजर्स की बदलती जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है और यह डिजिटल हेल्थ इकोसिस्टम को मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम है.
पार्टनर कंपनियों की प्रतिक्रिया
फार्मईजी के चीफ बिजनेस ऑफिसर गौरव वर्मा ने कहा कि यह साझेदारी रोजमर्रा की टेक्नोलॉजी को सुलभ स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है. इससे यूज़र्स को अधिक बचत और सुविधा मिलेगी.
वहीं टाटा 1एमजी के वाइस प्रेसिडेंट (मेडिकल अफेयर्स) डॉ. राजीव शर्मा के अनुसार, यह सहयोग डिजिटल हेल्थ समाधानों को और अधिक प्रभावी और व्यापक बनाएगा. उन्होंने कहा कि इससे यूजर्स पारंपरिक हेल्थकेयर मॉडल से आगे बढ़कर अपनी सेहत का प्रबंधन बेहतर तरीके से कर सकेंगे.
पहले से उपलब्ध वेलनेस फीचर्स
सैमसंग हेल्थ ऐप पहले से ही फिजिकल एक्टिविटी, हार्ट रेट, ब्लड प्रेशर, ईसीजी, नींद के पैटर्न और कैलोरी इनटेक जैसे वेलनेस मापदंडों को ट्रैक करने की सुविधा देता है. इसके अलावा यूजर्स दवा रिमाइंडर सेट कर सकते हैं और अपने हेल्थ रिकॉर्ड भी एक्सेस कर सकते हैं.
Healthians के Founder & CEO के रूप में 10 वर्ष बिताने के बाद, नवंबर 2023 में दीपक सहनी ने Executive Chairman की भूमिका संभाली.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
Healthians के एग्जीक्यूटिव चेयरमैन दीपक सहनी ने पिछले एक वर्ष में,कंपनी की पहली वास्तविक पेशेवर प्रबंधन टीम का मार्गदर्शन किया. दीपक सहनी की यात्रा 19 वर्ष की उम्र में शुरू हुई, जब उन्होंने अपना पहला वेंचर खड़ा किया. इसके बाद उन्होंने भारत की शुरुआती डिजिटल हेल्थकेयर एजेंसियों में से एक बनाई और भारत के मेडिकल वैल्यू ट्रैवल सेक्टर का नेतृत्व किया. यही सफर अंततः उन्हें Healthians का संस्थापक बनने तक ले गया, भारत का अग्रणी टेक-एनेबल्ड डायग्नोस्टिक्स ब्रांड, जो लाभदायक है और IPO की दिशा में अग्रसर है.
दीपक साहनी को मिले सम्मान
1. Serial Entrepreneur of the Year 2025.
2. ET 40 under 40 Inspiring Leader (2023).
3. Times 40 under 40 Achievers.
4. BW 40 under 40 (2020).
5. Top 25 Healthcare CEOs of Asia (2020).
उनकी यात्रा की शुरुआत
जब सहनी ने 2015 में Healthians की स्थापना की, तो मिशन सरल लेकिन साहसिक था: हर भारतीय के जीवन में 10 स्वस्थ वर्ष जोड़ना. जो एक विचार के रूप में शुरू हुआ था, वह आज भारत का अग्रणी घर पर स्वास्थ्य जांच ब्रांड बन चुका है, जिस पर 240 से अधिक शहरों में लाखों लोग भरोसा करते हैं. कंपनी का अपना अत्याधुनिक लैब नेटवर्क है और 1800 से अधिक प्रशिक्षित फलेबोटोमिस्ट्स हैं. यह यात्रा बिल्कुल भी सीधी नहीं रही, शुरुआती दिनों में लगातार 12 फंडिंग अस्वीकृतियों से लेकर फंडिंग विंटर के दबाव तक, और COVID-19 की अभूतपूर्व चुनौतियों तक, जब डायग्नोस्टिक्स एक फ्रंटलाइन सेवा बन गई. हर उतार-चढ़ाव Healthians की नींव का हिस्सा बना.
उन्होंने और उनकी टीम ने Healthians को ईंट-दर-ईंट खड़ा किया: ब्रांड का नाम रखने से लेकर अपनी पहली मार्केटिंग कैंपेन खुद डिजाइन करने तक. उनके लिए Healthians कभी सिर्फ एक कंपनी नहीं रहा, यह एक मिशन रहा है, एक समस्या जिसे हल करना जरूरी था. और इसे 3,000 करोड़ रुपये से अधिक के वैल्यूएशन तक स्केल करने, 300 से अधिक शहरों में विस्तार करने, 22 से अधिक लैब्स बनाने और बिना किसी बाहरी बैंकर के 7 राउंड की पूंजी जुटाने के बाद, उन्होंने साबित कर दिया है कि भारत में डायग्नोस्टिक्स को बड़े पैमाने पर, आत्मा के साथ बनाया जा सकता है. शून्य से शुरुआत करते हुए, सहनी ने Healthians को एक डायग्नोस्टिक पावरहाउस में बदल दिया, जिससे भारतीयों के स्वास्थ्य जांच के दृष्टिकोण में क्रांति आई. हर भारतीय के जीवन में 10 स्वस्थ वर्ष जोड़ने के मिशन के साथ, सहनी ने प्रिवेंटिव हेल्थ टेस्ट को किफायती, सटीक और सुविधाजनक बनाने का लक्ष्य रखा.
बड़ी चुनौतियों पर विजय
लगातार 12 फंडिंग अस्वीकृतियों का सामना करने के बावजूद, सहनी डटे रहे और अंततः एक हेल्थ एक्सेलेरेटर फंड से सीड चेक हासिल किया. इसके बाद युवराज सिंह की YouWeCan Ventures से समर्थन मिला, जिसने Healthians को आगे बढ़ने की गति दी. आज, Healthians भारत की सबसे युवा डायग्नोस्टिक लैब्स में से एक है जिसे CAP जैसे प्रतिष्ठित वैश्विक मान्यताएँ प्राप्त हुई हैं.
सहनी के नेतृत्व में, Healthians ने अपनी सेवाओं का विस्तार किया, टेक्नोलॉजी-ड्रिवन हेल्थकेयर समाधानों का उपयोग किया और शीर्ष लैब्स के साथ साझेदारी कर घर-द्वार पर स्वास्थ्य जांच सेवाएँ प्रदान कीं. कंपनी ने प्रिवेंटिव हेल्थकेयर में महत्वपूर्ण प्रगति की है, 90 लाख से अधिक भारतीयों को रिएक्टिव, हॉस्पिटल-केंद्रित देखभाल से प्रोएक्टिव हेल्थ मैनेजमेंट की ओर स्थानांतरित किया है.
आगे की राह
अब, जब सहनी कंपनियों को स्केल करने से फाउंडर्स को सक्षम बनाने की ओर बढ़ रहे हैं, तो उन्होंने अगले तीन वर्षों में 20-25 स्टार्टअप्स को समर्थन देने के लिए Rs 100 करोड़ की प्रतिबद्धता जताई है. उनकी निवेश दर्शन उन क्षेत्रों पर केंद्रित है जहाँ वे महत्वपूर्ण संरचनात्मक बदलाव देखते हैं, जिनमें कंज्यूमर ब्रांड्स, डीप टेक और Gen Z को लक्षित करने वाले AI-ड्रिवन समाधान शामिल हैं. इस पहल के माध्यम से, सहनी एक ऐसा इकोसिस्टम बनाना चाहते हैं जो उद्यमियों को मजबूत, अर्थपूर्ण व्यवसाय बनाने के लिए सशक्त करे.
फाउंडर्स को समर्थन देने की गहरी प्रतिबद्धता के साथ, सहनी की यात्रा उभरते उद्यमियों के लिए प्रेरणा है और इस बात का प्रमाण है कि एक व्यक्ति हेल्थकेयर इंडस्ट्री पर कितना बड़ा प्रभाव डाल सकता है.
BW हिन्दी ओर से हेल्थकेयर इन्वेस्टमेंट लीडर सुनील ठाकुर को जन्मदिन की ढेरों शुभकामनाएं.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
आज यानी 3 फरवरी को BW टीम भारत के हेल्थकेयर निवेश जगत की एक प्रभावशाली शख्सियत, क्वाडहेल्थ कैपिटल में पार्टनर और साउथ एशिया प्रमुख सुनील ठाकुर का जन्मदिन मना रही है. सुनील ठाकुर न सिर्फ एक दूरदर्शी निवेशक हैं, बल्कि भारत के तेजी से बदलते हेल्थकेयर इन्वेस्टमेंट इकोसिस्टम को दिशा देने वाली प्रमुख आवाजों में भी शामिल हैं.
दो दशकों से ज्यादा का निवेश अनुभव
प्राइवेट इक्विटी, वेंचर कैपिटल और मर्जर एंड एक्विजिशन (M&A) के क्षेत्र में 20 वर्षों से अधिक के अनुभव के साथ सुनील ठाकुर ने हमेशा ऐसे हेल्थकेयर बिजनेस मॉडल्स में निवेश किया है, जो मजबूत बुनियादी ढांचे के साथ दीर्घकालिक प्रभाव पैदा करते हैं. उनका फोकस ऐसे प्लेटफॉर्म्स पर रहा है जो स्केलेबल हों और स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक सुलभ बना सकें.
HealthQuad के सह-संस्थापक के रूप में अहम भूमिका
सुनील ठाकुर, HealthQuad के को-फाउंडर भी हैं, जो भारत की सबसे बड़ी ग्रोथ-स्टेज हेल्थकेयर वेंचर फर्म मानी जाती है. उनकी अगुवाई में HealthQuad ने केयर डिलीवरी, हेल्थटेक और लाइफ साइंसेज जैसे क्षेत्रों में कई नई पीढ़ी की हेल्थकेयर कंपनियों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.
नीति निर्माण और इंडस्ट्री एडवोकेसी में सक्रिय योगदान
निवेश के अलावा सुनील ठाकुर हेल्थकेयर पॉलिसी और एडवोकेसी में भी सक्रिय रूप से जुड़े हुए हैं. वह NATHEALTH बोर्ड में इंडिपेंडेंट डायरेक्टर के तौर पर सेवाएं दे रहे हैं और CII Nathealth फार्मा कमेटी के सदस्य भी हैं. इन भूमिकाओं के जरिए वह इंडस्ट्री और सरकार के बीच संवाद को मजबूत करने में अहम योगदान दे रहे हैं.
दुबई से भारत के हेल्थकेयर सेक्टर को दिशा
दुबई में स्थित रहते हुए भी सुनील ठाकुर भारत के हेल्थकेयर सेक्टर पर केंद्रित मल्टी-बिलियन डॉलर ट्रांजैक्शंस का नेतृत्व कर रहे हैं. उनका वैश्विक अनुभव और भारत-केंद्रित दृष्टिकोण उन्हें अंतरराष्ट्रीय निवेशकों और घरेलू हेल्थकेयर कंपनियों के बीच एक मजबूत सेतु बनाता है.
BW की पूरी टीम सुनील ठाकुर को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं, उत्तम स्वास्थ्य और निरंतर सफलता की कामना करती है. हमें विश्वास है कि आने वाले वर्षों में भी वह एक मजबूत, नवाचार-आधारित और टिकाऊ हेल्थकेयर इकोसिस्टम के निर्माण में अपना अहम योगदान देते रहेंगे.
FOVISCU की सफलता के साथ Wockhardt ने न सिर्फ अपने इनोवेशन पोर्टफोलियो को मजबूत किया है, बल्कि दुनिया भर में एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस के खिलाफ चल रही लड़ाई में भी एक अहम योगदान दिया है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय फार्मा कंपनी Wockhardt ने एंटीबायोटिक रिसर्च के क्षेत्र में बड़ी सफलता हासिल की है. कंपनी की नई दवा FOVISCU (WCK 4282) ने फेज-3 क्लिनिकल ट्रायल सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है. इस दवा ने गंभीर संक्रमणों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली मशहूर एंटीबायोटिक Meropenem के बराबर प्रभाव दिखाया है और 93.23 प्रतिशत का शानदार क्लिनिकल क्योर रेट हासिल किया है.
एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस के खिलाफ बड़ी उम्मीद
Wockhardt की यह नई दवा ऐसे समय में सामने आई है जब पूरी दुनिया Antimicrobial Resistance यानी एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस की गंभीर समस्या से जूझ रही है. कई बैक्टीरिया अब मौजूदा दवाओं पर असर नहीं दिखा रहे हैं, जिससे इलाज मुश्किल होता जा रहा है. FOVISCU को खास तौर पर इसी चुनौती से निपटने के लिए विकसित किया गया है.
क्या है FOVISCU और क्यों है यह खास?
FOVISCU एक फर्स्ट-इन-क्लास कॉम्बिनेशन एंटीबायोटिक है, जिसे गंभीर ग्राम-नेगेटिव बैक्टीरियल इंफेक्शन के इलाज के लिए बनाया गया है. यह उन बैक्टीरिया पर भी असरदार पाई गई है जो Carbapenem-resistant हैं, यानी जिन पर मौजूदा मजबूत दवाएं भी काम नहीं करतीं. ऐसे संक्रमण आमतौर पर ICU में भर्ती मरीजों के लिए जानलेवा साबित होते हैं.
फेज-3 ट्रायल में क्या सामने आया?
फेज-3 क्लिनिकल ट्रायल में FOVISCU की तुलना सीधे Meropenem से की गई. इस अध्ययन में दवा की effectiveness, safety और tolerability की जांच की गई. नतीजों में सामने आया कि FOVISCU ने इलाज में Meropenem के बराबर असर दिखाया और इसका सेफ्टी प्रोफाइल भी बेहतर रहा. कंपनी के मुताबिक, इस ट्रायल में 93.23 प्रतिशत मरीज पूरी तरह ठीक हुए, जो इस दवा की मजबूत चिकित्सीय क्षमता को दिखाता है.
क्यों मानी जा रही है यह बड़ी उपलब्धि?
पिछले दो दशकों में नई एंटीबायोटिक दवाओं का विकास काफी धीमा हो गया है. इसकी वजह वैज्ञानिक, नियामकीय और आर्थिक चुनौतियां रही हैं. ऐसे में FOVISCU का लेट-स्टेज ट्रायल में सफल होना एक दुर्लभ और बेहद अहम उपलब्धि माना जा रहा है. Wockhardt लंबे समय से मल्टी-ड्रग रेजिस्टेंट बैक्टीरिया के खिलाफ रिसर्च कर रही है. यह सफलता कंपनी के वर्षों के रिसर्च और इनोवेशन का नतीजा मानी जा रही है.
जल्द बाजार में आ सकती है नई दवा
कंपनी ने संकेत दिया है कि फेज-3 के सकारात्मक नतीजों के आधार पर अब विभिन्न देशों में रेगुलेटरी अप्रूवल के लिए आवेदन किया जाएगा. अगर मंजूरी मिल जाती है, तो FOVISCU को जल्द ही बाजार में उतारा जा सकता है. अस्पतालों में यह दवा Antibiotic Stewardship Programmes को मजबूत कर सकती है और गंभीर संक्रमणों के इलाज के लिए एक नया विकल्प दे सकती है.
WHO भी मानता है एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस को बड़ा खतरा
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) पहले ही Antimicrobial Resistance को दुनिया के सबसे बड़े स्वास्थ्य खतरों में से एक घोषित कर चुका है. अनुमान है कि अगर इस पर काबू नहीं पाया गया, तो 2050 तक दवा-प्रतिरोधी संक्रमणों से हर साल लाखों लोगों की मौत हो सकती है.
नेशनल क्रेडल कॉन्फ्रेंस 2025 ने फर्टिलिटी, मातृत्व और बाल स्वास्थ्य के क्षेत्र में भारत की चिकित्सा प्रगति को नई दिशा दी है. अपोलो की यह पहल भारत को विश्वस्तरीय हेल्थकेयर नवाचारों के केंद्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक और ठोस कदम है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
नई दिल्ली में अपोलो क्रेडल एंड चिल्ड्रेंस हॉस्पिटल और अपोलो फर्टिलिटी की ओर से दो दिवसीय नेशनल क्रेडल कॉन्फ्रेंस 2025 (NCC-2025) का आयोजन किया गया. इस कॉन्फ्रेंस में देशभर के प्रमुख विशेषज्ञों ने फर्टिलिटी, मातृत्व और बाल स्वास्थ्य के क्षेत्र में नई तकनीकों, कानूनी ढांचों और नैतिक मानकों पर विचार साझा किए. इस वर्ष 'यूनाइटिंग एक्सपर्टीज इन प्री-कॉन्सेप्शन, मेटर्निटी एंड चाइल्डकेयर इन इंडिया' की थीम के तहत कॉन्फ्रेंस का उद्देश्य क्लिनिकल एक्सीलेंस, रिसर्च और सहयोग को बढ़ावा देना है. इस मंच पर विशेषज्ञों ने नियोनेटोलॉजी, पीडियाट्रिक्स, ऑब्स्टेट्रिक्स, फीटल मेडिसिन और संबंधित क्षेत्रों में नई वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति पर गहन चर्चा की. सत्रों के दौरान चिकित्सकों को नवीन दिशानिर्देशों और ट्रीटमेंट प्रोटोकॉल से जुड़ी व्यावहारिक जानकारी दी गई ताकि वे आधुनिक चिकित्सा मानकों के अनुरूप अपनी सेवाओं को और बेहतर बना सकें.
कॉन्फ्रेंस का उद्घाटन अपोलो हॉस्पिटल्स समूह की संयुक्त प्रबंध निदेशक डॉ. संगीता रेड्डी ने किया. उनके साथ ग्रुप मेडिकल डायरेक्टर डॉ. अनुपम सिब्बल, फीटल मेडिसिन विशेषज्ञ डॉ. अनीता कौल, स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. (प्रो.) चित्रा राममूर्ति और डॉ. (प्रो.) साधना काला सहित कई वरिष्ठ विशेषज्ञ मौजूर रहे. डॉ. रेड्डी ने अपने संबोधन में कहा कि “अपोलो में हमारा प्रयास हमेशा से मातृत्व और नवजात देखभाल की गुणवत्ता को ऊंचा उठाने का रहा है. इस दिशा में हम रोबोटिक तकनीक, एआई आधारित जांच और जीनोमिक मेडिसिन जैसे इनोवेशन को नैतिकता के साथ चिकित्सा प्रणाली में एकीकृत करने के लिए प्रतिबद्ध हैं.”
डॉ. संगीता रेड्डी ने बताया कि पिछले वर्षों में आयोजित कॉन्फ्रेंस में अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों की भागीदारी ने मातृत्व और नवजात देखभाल को नई दिशा दी है. इस वर्ष का सम्मेलन भी महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य के लिए उन्नत तकनीकों और बेहतर चिकित्सा पद्धतियों को सामने लाने का एक बड़ा मंच बना. कॉन्फ्रेंस ने यह संदेश दिया कि चिकित्सा विज्ञान केवल उपचार का नहीं बल्कि सामूहिक शिक्षण, नवाचार और मानकों को ऊंचा उठाने का माध्यम भी है.
प्रमुख चर्चाएं और तकनीकी नवाचार
कॉन्फ्रेंस के दौरान कई उभरती तकनीकों और अवधारणाओं पर विचार-विमर्श हुआ.
1. हेल्थकेयर में रोबोटिक्स : विशेषज्ञों ने बताया कि फर्टिलिटी, गायनेकोलॉजी और नवजात शिशुओं के उपचार में रोबोटिक तकनीक कैसे सटीकता और परिणामों में सुधार ला रही है.
2. जीनोमिक मेडिसिन और NGS : चर्चा हुई कि जीनोमिक मेडिसिन और नेक्स्ट-जेनरेशन सीक्वेंसिंग एम्ब्रियो चयन से लेकर नवजात जांच तक उपचार को मरीज की जरूरतों के अनुसार कैसे अनुकूल बना रहे हैं.
3. कानूनी और नैतिक ढांचा : सत्रों में ART एक्ट, सरोगेसी कानूनों, सहमति, डोनर अधिकारों और नियामकीय अनुपालन पर महत्वपूर्ण अपडेट साझा किए गए.
4. एआई का समावेश : आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की भूमिका एम्ब्रियो ग्रेडिंग, साइकिल प्रेडिक्शन, फीटल मॉनिटरिंग और क्लिनिकल निर्णय लेने में कैसे तेजी से बढ़ रही है, इस पर विशेष चर्चा हुई.
5. नियोनेटल लाइफ सपोर्ट टेक्नोलॉजी : विशेषज्ञों ने नवजात शिशुओं के लिए आधुनिक वेंटिलेशन, रिससिटेशन प्रोटोकॉल और लाइफ-सपोर्ट सिस्टम पर जानकारी दी, जो सबसे कमजोर मरीजों के नतीजों में सुधार लाने में सहायक हैं.### निष्कर्ष