कौन हैं Karpoori Thakur, जिन्हें मिलेगा भारत रत्न? जानें उनके बारे में सबकुछ

सत्ता में रहते हुए कर्पूरी ठाकुर ने गरीबों, पिछड़ों और अति पिछड़ों के हक के लिए इतने कार्य किए कि उनका राजनीतिक कद बढ़ता चला गया.

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Wednesday, 24 January, 2024
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कर्पूरी ठाकुर (Karpoori Thakur) को देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न दिया जाएगा. बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर की पहचान स्वतंत्रता सेनानी और शिक्षक के रूप में भी होती है. वह इतने ज्यादा लोकप्रियता थे कि उन्हें जन-नायक भी कहा जाता था. ठाकुर बिहार के दूसरे उपमुख्यमंत्री और 2 बार मुख्यमंत्री रहे हैं. साधारण नाई परिवार में जन्मे कर्पूरी ठाकुर ने राज्य की सियासत में सामाजिक न्याय की अलख जगाई थी. 

स्वतंत्रता आंदोलन में थे शामिल
कर्पूरी ठाकुर पटना से 1940 में मैट्रिक परीक्षा पास करने के बाद स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े थे. 1942 में उन्होंने महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में हिस्सा लिया और इसके चलते उन्हें जेल भी जाना पड़ा. 1945 में जेल से बाहर आने के बाद ठाकुर धीरे-धीरे समाजवादी आंदोलन का चेहरा बन गए. कर्पूरी ठाकुर 1970 में पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने. 22 दिसंबर 1970 को उन्होंने राज्य की कमान संभाली. हालांकि, उनका पहला कार्यकाल केवल 163 दिन का रहा. लेकिन इसके बावजूद उनके हौसले बुलंद रहे.

पूरा नहीं कर पाए कार्यकाल
1977 में कर्पूरी ठाकुर दूसरी बार बिहार के मुख्यमंत्री बने. लेकिन अपना यह कार्यकाल भी वह पूरा नहीं कर पाए. हालांकि, महज दो साल से भी कम समय के कार्यकाल में उन्होंने समाज के दबे-पिछड़ों तबके के हितों के लिए उल्लेखनीय काम किया. बिहार में मैट्रिक तक पढ़ाई मुफ्त करवा दी. इसके अलावा, उन्होंने राज्य के सभी विभागों में हिंदी में काम करने को अनिवार्य बना दिया. सत्ता में रहते हुए कर्पूरी ठाकुर ने गरीबों, पिछड़ों और अति पिछड़ों के हक के लिए इतने कार्य किए कि उनका राजनीतिक कद बढ़ता चला गया. और वह बिहार की सियासत में समाजवाद का बड़ा चेहरा बन गए.

लालू-नीतीश रहे हैं शागिर्द
लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार कर्पूरी ठाकुर के ही शागिर्द हैं. लिहाजा जब लालू यादव बिहार की सत्ता में आए तो उन्होंने कर्पूरी ठाकुर के कामों को आगे बढ़ाया. इसी तरह, नीतीश कुमार ने भी अति पिछड़े समुदाय के लिए कई कार्य किए. 1988 में कर्पूरी ठाकुर दुनिया से रुखसत हो गए. लेकिन इतने साल बाद भी वह बिहार के पिछड़े और अति पिछड़े मतदाताओं के बीच काफी लोकप्रिय बने हुए हैं. ठाकुर लोकनायक जयप्रकाश नारायण और राम मनोहर लोहिया को अपना राजनीतिक गुरु मानते थे. भारत रत्न मिलने की घोषणा पर कर्पूरी ठाकुर के बेटे रामनाथ ठाकुर ने कहा कि हमें 36 साल की तपस्या का फल मिला है.  


Vedanta वाले अनिल अग्रवाल क्यों बेच रहे हैं अपना स्टील कारोबार, कौन हैं दौड़ में?

वेदांता के मालिक अनिल अग्रवाल कंपनी पर कर्ज का बोझ कम करना चाहते हैं, इसके लिए उन्होंने कई योजनाएं बनाई हैं.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Tuesday, 20 February, 2024
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Tuesday, 20 February, 2024
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माइनिंग और मेटल सेक्टर की दिग्गज कंपनी वेदांता (Vedanta) के मालिक अनिल अग्रवाल (Anil Agarwal) अपना स्टील कारोबार बेच रहे हैं. वेदांता लिमिटेड के स्वामित्व वाली ESL स्टील बिकने जा रही है. ESL की वर्तमान क्षमता 1.5 मिलियन टन है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अग्रवाल के स्टील कारोबार को खरीदने वालों की दौड़ में आर्सेलर मित्तल के लक्ष्मी मित्तल (Lakshmi Mittal) और जय सराफ की कंपनी निथिया कैपिटल शामिल हैं. जय सराफ आर्सेलर मित्तल के पूर्व एग्जीक्यूटिव हैं और वह ESL स्टील पर बोली लगाने के लिए एक कंसोर्टियम बना रहे हैं, जिसमें निथिया कैपिटल सहित कुछ अन्य इन्वेस्टर्स शामिल हो सकते हैं. 

वैल्यूएशन से मिलेगा कम
आर्सेलर मित्तल से अलग होकर जय सराफ ने 2010 में निथिया कैपिटल की स्थापना की थी. जय सराफ को कई देशों में फंसे स्टील संयंत्रों को सफलतापूर्वक चालू करने का अनुभव है. इसलिए उनकी दावेदारी ज्यादा मजबूत मानी जा रही है. हालांकि, इस संबंध में तीनों की तरफ से अभी तक कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है. वहीं, बताया जा रहा है कि ESL स्टील का वैल्यूएशन 10,000 करोड़ रुपए है, लेकिन वेदांता को इससे कम पर समझौता करना पड़ सकता है.

कर्ज कम करने की कोशिश
वेदांता लिमिटेड के मालिकाना हक वाली ईएसएल स्टील की वर्तमान क्षमता 1.5 मिलियन टन है, जिसे कंपनी ने दोगुना करने का लक्ष्य रखा है. हालांकि, अब कंपनी अपनी इस यूनिट को बेच रही है. दरअसल, अनिल अग्रवाल वेदांता के कर्ज को जल्द से जल्द कम करना चाहते हैं. इसी क्रम में वह अपने नॉन-कोर एसेट्स को बेच रहे हैं. ईएसएल स्टील की बिक्री अग्रवाल की इसी योजना का हिस्सा है. बता दें कि वेदांता लिमिटेड ने कुछ वक्त पहले विभिन्न व्यवसायों को अलग करने के लिए छह लिस्टेड यूनिट्स बनाने की घोषणा की थी. कंपनी पर करीब 20,000 करोड़ रुपए का कर्ज है. 

पहले भी बनाई थी योजना
वेदांता ने 2022 के आखिरी में भी ईएसएल स्टील को बेचने की बात कही थी, मगर बाद में इस योजना को रोक दिया गया. अब कंपनी फिर से स्टील कारोबार को बेचने की दिशा में आगे बढ़ रही है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, स्टील कारोबार को कुछ खरीदने में घरेलू और अंतरराष्ट्रीय कंपनियों ने दिलचस्पी दिखाई है. अगले कुछ महीनों में डील पूरी हो सकती है. वेदांता ने 2018 में 5,320 करोड़ में ईएसएल स्टील का अधिग्रहण किया था. गौरतलब है कि अडानी समूह को लेकर पिछले साल आई हिंडनबर्ग की रिपोर्ट के बाद से वेदांता जैसी कंपनियां अपना कर्ज कम करने पर ज्यादा फोकस कर रही हैं.


क्या से क्या हो गया...कभी मुट्ठी में था आसमान, आज जेल में गुजर रहीं Goyal की रातें 

जेट एयरवेज के फाउंडर नरेश गोयल को कैंसर ने जकड़ लिया है. उन्होंने अदालत से इलाज के लिए जमानत मांगी है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Saturday, 17 February, 2024
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Saturday, 17 February, 2024
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किसी जमाने में आसमान पर राज करने वाले नरेश गोयल आज जेल में दिन गुजर रहे हैं. उनकी हालिया तस्वीरों को देखकर समझा जा सकता है कि वक्त जब बुरा हो तो व्यक्ति किस कदर टूट जाता है. जेट एयरवेज के संस्थापक नरेश गोयल को मुसीबतों के साथ अब कैंसर ने भी जकड़ लिया है. गोयल इलाज के लिए अंतरिम जमानत की गुहार लगा रहे हैं. उनकी इस गुहार पर अदालत का रुख क्या रहता है, यह 20 फरवरी को स्पष्ट होगा. पिछले साल सितंबर से जेल में बंद गोयल की मानसिक स्थिति का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वह छह जनवरी को अदालत में रो पड़े थे. गोयल ने कहा था कि उन्होंने जीने की उम्मीद खो दी है और वह जेल में ही मर जाना पसंद करेंगे.

आगाह करती है बर्बादी
नरेश गोयल की कामयाबी जहां लोगों को प्रेरित करती थी. वहीं, उनकी बर्बादी लोगों को आगाह करती है कि सफलता के शिखर पर पहुंचने के बाद उन्हें क्या नहीं करना चाहिए. गोयल की गलतियों ने जेट एयरवेज को आसमान से जमीन पर ला दिया और वह खुद भी अंतहीन परेशानियों में घिर गए. चलिए जानते हैं कि जब सबकुछ अच्छा चल रहा था, तो गोयल ऐसा क्या कर बैठे कि जेट एयरवेज बर्बाद हो गई. अब वह खुद कैंसर की चपेट में आ चुके हैं और इलाज के लिए अंतरिम जमानत की राह तक रहे हैं. 

बनाई थी एक अलग पहचान
नरेश गोयल किसी जमाने में ट्रैवल एजेंसी चलाया करते थे. उन्होंने केवल दो बोइंग 737 के साथ जेट एयरवेज की शुरुआत की थी. बताया जाता है कि जेट एयरवेज देश की पहली प्राइवेट एयरलाइन रही, जिसका उद्घाटन JRD टाटा ने किया था. महज थोड़े से समय में इस एयरलाइन ने भारतीय आसमान में अपनी एक अलग जगह बना ली. सस्ते दर पर हवाई यात्रा ऑफर करके जेट इतनी फेमस हो गई कि बाकी एयरलाइन को खतरा महसूस होने लगा, लेकिन फिर वक्त ने करवट ली और हवा से बातें करने वाली जेट एयरलाइन जमीन पर आ गई.

किसी न सुनना पड़ा भारी  
गोयल ने बड़ी मेहनत से जेट एयरवेज को खड़ा किया, उसे हवाई यात्रियों की पहली पसंद बनाया, लेकिन उसके क्रैश होने की कहानी भी उन्होंने खुद ही लिख डाली. आर्थिक संकट के चलते जेट एयरवेज का कामकाज 17 अप्रैल 2019 को बंद हो गया था. इससे पहले नरेश गोयल ने कंपनी को बचाने के लिए खूब हाथ-पैर मारे, लेकिन सफलता नहीं मिली. उन्होंने अपने फाइनेंशियल एडवाइजर्स से लेकर तमाम एक्सपर्ट्स से राय मांगी, ताकि संकट से कंपनी को बचाया जा सके. उस वक्त, कुछ एडवाइजर्स ने उन्हें पीछे हटकर नए निवेशकों को मौका देने की सलाह दी. उस दौर में टाटा ग्रुप ने जेट में इन्वेस्ट करने में दिलचस्पी दिखाई थी, मगर गोयल ने किसी सलाह पर ध्यान नहीं दिया. गोयल अपने मन की करते रहे और कंपनी बंद होने की दहलीज पर पहुंच गई. हर दिन बढ़ते कर्ज के साथ आखिरकार एक दिन ऐसा आया, जब जेट एयरवेज के विमान केवल शो-पीस बनकर रह गए.

'अपनों' पर भरोसा न करना भूल
जानकार मानते हैं कि गोयल ने एक नहीं, कई गलतियां की. उनकी एक गलती यह भी थी कि जिन लोगों को उन्होंने हायर किया, उन पर भरोसा नहीं दिखाया. उन्हें 'मैं' से ज्यादा प्यार हो गया था. नरेश गोयल मानने लगे थे कि उनके मुंह से निकली हर बात सही होती है और उसे काटा नहीं जा सकता. गोयल को लगता था कि वो ही जेट एयरवेज हैं. सीधे शब्दों में कहें तो अहंकार उनमें तेजी से पनपने लगा था. हालांकि, वह बातचीत में माहिर थे और इस वजह से कई छोटे-मोटे संकट से जेट को आसानी से निकालकर ले गए.    

सौदेबाजी पड़ गई भारी
एक रिपोर्ट की मानें, तो कारोबार बंद करने से कुछ दिन पहले तक जेट एयरवेज को हर दिन 21 करोड़ का नुकसान हो रहा था. 2017 में डेल्टा एयरलाइन ने भी जेट में कुछ स्टेक खरीदने में दिलचस्पी दिखाई थी. अबू धाबी की सरकारी एयरलाइन कंपनी एतिहाद पहले से ही जेट की पार्टनर थी, मगर नरेश गोयल सौदेबाजी में उलझे रहे. डेल्टा ने गोयल को स्टेक लेने के लिए 300 रुपए प्रति शेयर का ऑफर दिया, लेकिन गोयल 400 रुपए प्रति शेयर से नीचे आने को तैयार नहीं थे. जबकि कंपनी के शेयर 400 रुपए से नीचे ही ट्रेड कर रहे थे. एक्सपर्ट्स मानते हैं कि अगर उस वक्त गोयल ने सही फैसला लिया होता, तो शायद जेट के सिर से कर्ज का बोझ कुछ कम हो जाता.

सहारा ने बिगाड़ा गणित
2004 में बाजार के 40% हिस्से पर जेट का ही कब्जा था, लेकिन जब नए प्लेयर मार्केट में आए तो नरेश गोयल एक अलग ही रणनीति पर काम करने लगे. इंडिगो और स्पाइस जेट को टक्कर देने के लिए वह पहले सस्ते की जंग में फंसे, फिर उन्होंने 2007 में 1450 करोड़ रुपए में एयर सहारा को खरीदा. इस डील के साथ ही कंपनी फाइनेंशियल और लीगल सहित तमाम तरह की मुश्किलों में फंस गई. इतना ही नहीं, गोयल ने IPO का पैसा कर्ज का बोझ कम करने के बजाए नए प्लेन ऑर्डर करने में खर्च कर दिया.

कमाई पर खुद चलाई कैंची
2012 में जब किंगफिशर बंद हुई, तो नरेश गोयल के पास एक मौका था किंगफिशर के गलत फैसलों से सीख लेने का पर उन्होंने यह मौका भी गंवा दिया. कंपनी के कर्ज में दबे होने के बावजूद उन्होंने 10 एयरबस A330 और बोइंग 777 प्लेन का ऑर्डर दे दिया. गोयल के इस कदम से केवल जेट का खर्चा ही बढ़ा. बात यहीं खत्म नहीं होती. गोयल ने इन जहाजों में सीट भी कम रखीं. एक रिपोर्ट बताती है कि ग्लोबल प्रैक्टिस में जहां 400 सीटें होती हैं, वहीं इसमें सिर्फ 308 सीटें थीं. यानी एक तरह से उन्होंने कमाई पर खुद कैंची चला दी.

सलाह पर नहीं किया अमल
जेट के विमानों में फर्स्टक्लास की 8 सीटें थीं, जिनसे कमाई न के बराबर हो रही थी. ऐसे में अधिकारियों ने उन्हें इन सीट्स को सामान्य सीट्स में बदलने की सलाह दी थी, लेकिन गोयल ने इसे अनसुना कर दिया. यही एक गलती जेट एयरवेज के चेयरमैन और फाउंडर के रूप में गोयल बार-बार करते रहे - अधिकारियों पर भरोसा नहीं करना. कहा जाता है कि गोयल को एयर सहारा से डील नहीं करने की सलाह दी गई थी, इसके बावजूद उन्होंने करोड़ों खर्च का सौदा कर डाला. इस तरह 1992 में जिस कंपनी को उन्होंने उम्मीदों के साथ शुरू किया, उसे नंबर वन की पोजीशन दिलवाई, उसे खुद ही बर्बाद कर दिया.

इसलिए ED ने कसा है शिकंजा 
जेट एयरवेज एक बार फिर से उड़ान भरने की कोशिश कर रही है. यूएई के बिजनसमैन मुरारी लाल जालान और लंदन की कंपनी कालरॉक कैपिटल (Kalrock Capital) के कंसोर्टियम ने जून 2021 में दिवालिया प्रक्रिया के तहत इस एयरलाइन को खरीदा था. हालांकि, अब तक इसका ऑपरेशन शुरू नहीं हो सकता है. इधर, जेट एयरवेज से जुड़े मामलों की जांच कई एजेंसियां कर रही हैं. इनमें ED, सीबीआई और इनकम टैक्स शामिल हैं. CBI ने अपनी जांच में नरेश गोयल, उनकी पत्नी अनीता गोयल और जेट एयरवेज एयरलाइन के डायरेक्टर रहे गौरंग आनंद शेट्टी को आरोपी बनाया है. सीबीआई द्वारा दर्ज एफआईआर के आधार पर ने ED मनी लॉन्ड्रिंग के एक मामले में पिछले साल नरेश गोयल को गिरफ्तार किया था. सीबीआई ने ये मामला केनरा बैंक की शिकायत के बाद दायर किया था, जिसमें कथित धोखाधड़ी के आरोप नरेश गोयल पर लगे हैं.
 


वित्त मंत्री ने जिस 'Drone Didi' का रखा ख्याल, उस योजना के बारे में क्या जानते हैं आप?

सरकार कृषि क्षेत्र में ड्रोन टेक्‍नोलॉजी को बढ़ावा देने पर काम कर रही है और यह योजना उसी का एक हिस्सा है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Saturday, 03 February, 2024
Last Modified:
Saturday, 03 February, 2024
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बजट 2024 में कई बड़ी घोषणाएं हुईं, इनमें से एक है 'नमो ड्रोन दीदी योजना' (Namo Drone Didi Scheme) के लिए 500 करोड़ रुपए का आवंटन. पिछले साल इसके लिए 200 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया था. इस लिहाज से देखें, तो इस बार 'नमो ड्रोन दीदी योजना' को 2.5 गुना ज्‍यादा बजट दिया गया है. दरअसल, सरकार कृषि क्षेत्र में ड्रोन टेक्‍नोलॉजी को बढ़ावा देने पर काम कर रही है और यह योजना उसी का एक हिस्सा है. सरकार ने इस योजना की शुरुआत महिलाओं को सशक्त बनाने और कृषि क्षेत्र में उत्पादकता बढ़ाने के लिए की है. चलिए इस स्कीम के बारे में विस्तार से जानते हैं.

क्या होगा ट्रेनिंग में?
'नमो ड्रोन दीदी योजना' की शुरुआत 2022 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Modi) ने की थी. इस योजना के तहत 1 लाख महिलाओं को अगले 5 सालों में प्रशिक्षित किया जाएगा. स्कीम को देशभर के कृषि विज्ञान केंद्रों (KVK) के जरिए लागू किया जा रहा है. नमो ड्रोन दीदी योजना में महिलाओं को ड्रोन उड़ाने से लेकर डेटा विश्लेषण और ड्रोन के रखरखाव के संबंध में ट्रेनिंग दी जाती है. चयनित महिलाओं को ड्रोन का इस्‍तेमाल करके अलग-अलग कृषि कार्यों के लिए भी प्रशिक्षित किया जाता है. इनमें फसलों की निगरानी, कीटनाशकों-उर्वरकों का छिड़काव और बीज बुआई आदि शामिल हैं.

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क्या है योजना का फायदा?
सरकार का मानना है कि ड्रोन दीदी योजना महिलाओं को सशक्त और आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनाएगी. साथ ही इससे कृषि क्षेत्र में उत्पादकता और दक्षता में बढ़ोतरी देखने को मिलेगी. इस योजना से कृषि से जुड़ी लागत में भी कमी आ सकती है. इससे रोजगार के मौके भी मिलेंगे. 1 फरवरी को पेश किए गए अंतरिम बजट में ड्रोन दीदी स्‍कीम के लिए पहले से ज्यादा फंड का प्रावधान किया गया है. ऐसा इसलिए कि ज्‍यादा महिलाओं को प्रशिक्षित किया जा सके. इस बीच, अयोध्या में स्वयं सहायता समूह से जुड़ीं छह महिलाओं का इस योजना के लिए किया गया है. सभी ने डॉ. राजेंद्र प्रसाद कृषि विश्वविद्यालय, पूसा में 15 दिवसीय प्रशिक्षण पूरा किया है. अब इन्हें 10 लाख रुपए की लागत से ड्रोन उपलब्ध कराया जाएगा, जिसका इस्तेमाल खेतों में कीटनाशक व खाद के छिड़काव के लिए किया जाएगा.


Noorings: जानिये Zee के पास अब क्या हैं विकल्प, कैसी होगी आगे की यात्रा?

200 मिलियन डॉलर्स की क्रिकेट फीस भरने की अंतिम डेडलाइन इसी महीने थी और Zee इस डेडलाइन से काफी आगे आ चुका है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Tuesday, 23 January, 2024
Last Modified:
Tuesday, 23 January, 2024
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Noor Fathima Warsia, Group Editorial Director, BW Businessworld.

बहुत सी चीजें ऐसी हैं जिन्हें भारत में पहली बार किये जाने का श्रेय जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज (Zee) को दिया जाता है. फिर चाहे भारत के अग्रणी सैटेलाईट टेलीविजन की बात हो, डिजिटाईजेशन की तरफ बढ़ने वाली पहली कंपनी की बात हो, डायरेक्ट-टू-होम की बात हो या फिर वैसी ही अन्य उपलब्धियों की बात क्यों न हो. Zee की अभी तक की यात्रा आसान नहीं रही है, फिर चाहे बात कम्पटीशन की हो या फिर सोनी के साथ मर्जर की ही क्यों न हो. दोनों ही कंपनियों के लिए इस मर्जर की बदौलत 10 बिलियन डॉलर्स की कीमत वाली एक ऐसी इकाई सामने आती जिससे जनता को विविध विकल्प मिलते हैं और भविष्य में बेहतर वृद्धि के विकल्प भी मिलेंगे. दुर्भाग्यवश (या फिर पुनीत गोयनका की अयोध्या मंदिर वाली पोस्ट को एक इशारा मानें तो भाग्यशाली रूप से) 22 दिसंबर 2021 में शुरू हुई यह डील 22 जनवरी 2024 को पूरी तरह से खत्म हो गई. 

Zee को क्यों चाहिए पार्टनर?
अगर यह मर्जर पूरा हो जाता तो इससे जी एंटरटेनमेंट (Zee) को अपनी स्थिति को मजबूत करने का मौका मिलता और साथ ही कंपनी 1.4 बिलियन डॉलर्स का भुगतान करके डिज्नी (Disney+ Hotstar) से क्रिकेट के राइट्स भी खरीद पाती. मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो 200 मिलियन डॉलर्स की क्रिकेट फीस भरने की अंतिम डेडलाइन इसी महीने थी और Zee इस डेडलाइन से काफी आगे आ चुका है. माना जा रहा है कि कैश में कमी होने की वजह से कंपनी, तय की गई डेडलाइन पर भुगतान नहीं कर पाई. 
पिछली बार जब Zee ने सोनी मर्जर को लेकर अपने वादे के प्रति विश्वास जताया था तो कंपनी के शेयरों में थोड़ा सुधार देखने को मिला था लेकिन जब से यह डील पूरी तरह से खत्म हुई है तब से ऐसा अंदेशा लगाया जा रहा है कि कंपनी के स्टॉक प्राइस पर प्रमुख रूप से प्रभाव पड़ सकता है और एलारा कैपिटल के एनालिस्ट करन तौरानी की मानें तो स्पोर्ट्स के नुक्सान के साथ यह 130 रुपए प्रति शेयर या फिर बिना स्पोर्ट्स के नुक्सान के 170 रुपए प्रति शेयर की कीमत तक गिर सकता है. 

Zee के पास क्या है विकल्प?
हालांकि यह निकट भविष्य में संभावित बहुत से परिणामों में शामिल हो सकते हैं लेकिन पिछले दो सालों में भारतीय मीडिया के परिदृश्य में कुछ प्रमुख परिवर्तन हुए हैं और इन परिवर्तनों में से सबसे महत्त्वपूर्ण है डिज्नी द्वारा एक बार फिर भारतीय मार्केट में मौजूद अपनी हिस्सेदारी को बेचने की कोशिश करना और इस बार डिज्नी, मुकेश अंबानी की अध्यक्षता वाली रिलायंस इंडस्ट्रीज के साथ मर्जर करना चाहती है और भारतीय मीडिया के कारोबारों को मिलाकर एंटरटेनमेंट के क्षेत्र में एक बहुत विशालकाय कंपनी खड़ी करना चाहती है. 
भारत में मीडिया और एंटरटेनमेंट के क्षेत्र में डिजिटल सबसे अग्रणी है. OTT प्लेटफॉर्म्स को काफी प्रसिद्धि मिल रही है और ये उन चुनौतियों में मौजूद है, जिनका सामना Zee के द्वारा इस वक्त किया जा रहा है और मीडिया कंपनी को अपना प्लान B तुरंत खोज लेना चाहिए. कंपनी के लिए एक बेहतर विकल्प डिज्नी से सीख लेकर भारत में मौजूद कंपनियों को ही ऑफर देना चाहिए. 

संभावित कंपनियां
मीडिया एक ऐसा क्षेत्र है जो वास्तविकता में डायरेक्ट-टू-कंज्यूमर है और इसीलिए यह बहुत से ब्रैंड्स के लिए एक नली का काम करता है और बहुत से ब्रैंड्स को कंज्यूमर्स के साथ संबंध बनाने का मौका देता है. भारतीय कारोबारी, भारत में मौजूद मीडिया के क्षेत्र को काफी गंभीरता से देखने लगे हैं और इसके लिए रिलायंस इंडस्ट्रीज को श्रेय दिया जाना चाहिए क्योंकि रिलायंस ने अपने बड़े फैसलों और इन्वेस्टमेंट की बदौलत मडिया क्षेत्र के माहौल को काफी संतुलित किया है. 
स्वतंत्र मीडिया की बहस को अगर एक तरफ कर दें तो अडानी द्वारा NDTV में प्रमुख हिस्सेदारी प्राप्त करने का फैसला एक ऐसा फैसला है जिसकी वजह से दोनों ही कंपनियों को फायदा हुआ है. 2023 में अडानी ग्रुप की उतार-चढ़ाव भरी यात्रा को देखें तो कहा जा सकता है कि मीडिया भी उन विकल्पों में से एक है जो अडानी ग्रुप के लिए भी काफी आकर्षक विविधता के रूप में सामने आता है, आखिरकार एंटरटेनमेंट भी तो स्टॉक्स का संशयवाद ही है. इसकी वजह से अडानी, Zee के लिए संभावित तौर पर सबसे बेहतर विकल्प के रूप में भी सामने आ सकते हैं. 
चेयरमैन कुमार मंगलम बिरला की अध्यक्षता वाला आदित्य बिरला ग्रुप भी उन कंपनियों में से एक है जो Zee के लिए एक संभावित विकल्प हो सकती हैं. 2012 में आदित्य बिरला ग्रुप ने इंडिया टुडे ग्रुप में हिस्सेदारी प्राप्त की थी और मीडिया में जगह बनाने के लिए तीव्र इच्छा प्रकट की थी. आपको बता दें कि अप्लौज एंटरटेनमेंट (Applause Entertainment) भी आदित्य बिरला ग्रुप ऑफ कम्पनीज की कंपनियों में से एक है और यह एक मीडिया, कंटेंट और IP क्रिएशन स्टूडियो है जिसकी अध्यक्षता समीर नायर करते हैं. अप्रैल 2023 में वोडाफोन आईडिया के बोर्ड में भी कुमार मंगलम बिरला की वापसी हुई और उनका कहना है कि उन्हें इस कारोबार में उम्मीद नजर आती है. आने वाले समय में दुनिया भर में टेलिकॉम कंपनियों के विकास में कंटेंट प्रमुख भूमिका निभाएगा और इसीलिए Zee एक ऐसा विकल्प है जिस पर विचार जरूर किया जाना चाहिए. 
ठीक इसी तरह, इस पूरे परिदृश्य में सुनील भारती मित्तल को भी एक भागीदार के रूप में देखा जा सकता है. एयरटेल खुद को ठीक करने के लिए लगातार कई महत्त्वपूर्ण कदम उठा रही है और एयरटेल TV के माध्यम से कंटेंट भी उपलब्ध करवाया जा रहा है. अगर अंबानी परिवार के प्रभुत्व वाले इस क्षेत्र में एयरटेल अपनी स्थिति को बेहतर करना चाहता है तो क्रेडिबिलिटी और विविध विकल्पों के साथ Zee एक मजबूत विकल्प के रूप में मौजूद है. 
हमें यहां अरबपति उद्यमी संजीव गोयनका के RPSG ग्रुप को नहीं भूलना चाहिए. RP संजीव गोयनका समूह की रूचि विभिन्न क्षेत्रों में है जिनमें स्पोर्ट्स, रिटेल और मीडिया एवं एंटरटेनमेंट भी शामिल हैं. Zee की वर्तमान संपत्ति और उसकी ताकत के साथ दोनों कंपनियों के बीच एक मजबूत सहयोग बनाया जा सकता है. 

एक लंबा रास्ता तय किया है, एक लंबा सफर बाकी है
भारत में एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री को बदलने वाले सुभाष चंद्र और आगे चलकर पुनीत गोयनका और उनकी टीम की अध्यक्षता में जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज (Zee) भारत में एक मीडिया कंपनी से कहीं ज्यादा बड़े रूप में सामने आई है. आपको बता दें कि शेयरहोल्डर्स की बेहतरी के लिए पुनीत गोयनका सोनी के साथ होने वाली मर्जर डील के दौरान CEO का पद त्यागने तक को तैयार हो गए थे. वैश्विक स्तर पर एक फाइटर और सर्वाइवर के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त करने वाले डॉक्टर चंद्र के साथ Zee ग्रुप विश्व के विभिन्न खिलाड़ियों के साथ लड़ते हुए अपनी स्थिति बरकरार रख कर काफी आगे आ गया है. आगे आने वाली यात्रा में एक बार फिर चुनौतियां नजर आ रही हैं. स्पष्ट तौर पर देखें तो Zee के पास बहुत सारे विकल्प नहीं हैं लेकिन ग्रुप ने अपने स्टेकहोल्डर्स से वादा किया है कि इस क्षेत्र में बहुत जल्द बहुत ज्यादा कुछ खोजा जाएगा.
 

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AI के आने से बढ़ गया Cyber Crime? जानिये क्या है एक्सपर्ट्स की राय?

साइबर सिक्योरिटी एक्सपर्ट्स होने के नाते हम लगातार AI के क्षेत्र में होती क्रांति और वृद्धि पर नजर रखे हुए हैं.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Saturday, 20 January, 2024
Last Modified:
Saturday, 20 January, 2024
BW Security World Event

आज देश की राजधानी दिल्ली में सिक्योरिटी के क्षेत्र के प्रतिष्ठित चहरों को सम्मानित करने के लिए BW सिक्योरिटी वर्ल्ड 40 अंडर 40 अवॉर्ड्स समारोह (BW Security World 40 Under 40 Awards) के पहले एडिशन का आयोजन किया गया. साइबर सिक्योरिटी भी सिक्योरिटी का ही एक हिस्सा है और ऐसे में इस कार्यक्रम के आयोजन के दौरान यह जानने की कोशिश भी की गई कि क्या AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) की बदौलत आई क्रांति की वजह से साइबर क्राइम और साइबर अटैक्स में वृद्धि हुई है?

AI पर टिकी हैं सबकी निगाहें
इस पैनल की शुरुआत करते हुए सुभाष दत्ता ने कहा कि साइबर सिक्योरिटी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस स्वर्ग से बनकर आई जोड़ी के जैसा है. साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि साइबर सिक्योरिटी एक्सपर्ट्स होने के नाते हम लगातार AI के क्षेत्र में होती क्रांति और वृद्धि पर नजर रखे हुए हैं और हमारे साथ-साथ साइबर अटैक करने वाले लोग भी बहुत ही करीब से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की क्रान्ति और वृद्धि पर नजर रखे हुए हैं ताकि वह अपनी गतिविधियों को ज्यादा बेहतर तरीके से अंजाम दे सकें. 

AI से बढ़ेगा साइबर अटैक का खतरा?
साइबर सिक्योरिटी एक्सपर्ट वरुण सोनी ने अपने विचार रखते हुए कहा कि AI का इस्तेमाल अब हर जगह होने लगा है और यह काफी तेज रफ्तार से विकसित होती एक इंडस्ट्री बन रही है. अभी तक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जितनी भी विकसित हुई है उससे साइबर अटैक में वृद्धि देखने को मिली है और माना जा रहा है कि AI के विकसित होने की वजह से साइबर अटैक में 63% जितनी वृद्धि हो सकती है. वरुण ने बताया कि वर्ल्ड इकॉनमी रिपोर्ट की मानें तो अगर साइबर अटैक को एक इंडस्ट्री के रूप में देखा जाए तो 2025 तक यह 10 ट्रिलियन डॉलर्स के स्तर को छू लेगी और तब यह अमेरिका और चीन के बाद दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी इकॉनमी भी हो सकती है. 

बढ़ रहे हैं AI वाले साइबर अटैक
साइबरपीस फाउंडेशन के फाउंडर और ग्लोबल प्रेसिडेंट मेजर विनीत कुमार ने इस विषय पर अपनी राय रखते हुए कहा कि AI संबंधित साइबर अटैक में लगातार इजाफा हो रहा है और पहले जहां फिशिंग वाले मेल या फिर प्रत्यक्ष गलतियों की वजह से साइबर अटैक या फ्रॉड का पता चल भी जाता था, वहीं अब AI के इस्तेमाल से ऐसे साइबर अटैक का या फिर फ्रॉड पता लगाना लगभग नामुमकिन हो चुका है.
 

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BW Security World: एक्सपर्ट्स से समझें भविष्य के लिए कैसे तैयार होंगे लीडर्स?

मेजर गौरव आर्या ने अपने संबोधन की शुरुआत करते हुए कहा कि मुझे लीडरशिप के बारे में बहुत ज्यादा नहीं पता है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Saturday, 20 January, 2024
Last Modified:
Saturday, 20 January, 2024
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आज देश की राजधानी दिल्ली में सिक्योरिटी के क्षेत्र के प्रतिष्ठित चहरों को सम्मानित करने के लिए BW सिक्योरिटी वर्ल्ड 40 अंडर 40 अवॉर्ड्स समारोह (BW Security World 40 Under 40 Awards) के पहले एडिशन का आयोजन किया गया. अवॉर्ड्स समारोह के साथ-साथ इस कार्यक्रम के दौरान एक्सपर्ट्स के साथ बहुत सी चार्चाओं का आयोजन भी किया गया. 

क्या है भविष्य के लीडर्स का मतलब?
इसी दौरान भारतीय सेना से रिटायर्ड मेजर और चाणक्य फोरम के एडिटर इन चीफ गौरव आर्या ने भविष्य में मौजूद चुनौतियों और उनसे निपटने के लिए लीडर्स को तैयार करने के विषय पर अपनी राय रखी. मेजर गौरव आर्या ने अपने संबोधन की शुरुआत करते हुए कहा कि मुझे लीडरशिप के बारे में बहुत ज्यादा नहीं पता है और भविष्य में क्या होगा ये किसी को भी नहीं पता है. लेकिन 2-3 चीजें हैं जो मैं आपके साथ साझा करना चाहता हूं. जब भी बात भविष्य के लीडर्स की होती है तो दरअसल हम भविष्य में मौजूद चुनौतियों और उन चुनौतियों निपटने के लिए जिस तरह की लीडरशिप की आवश्यकता होती है, हम उसके बारे में बात कर रहे होते हैं.

फॉग ऑफ वॉर
अपने संबोधन के दौरान मेजर गौरव आर्या ने कहा कि ये चुनौतियां आज से 500 साल पहले भी मौजूद थीं, ये आज भी मौजूद हैं और ये आज से कई सालों के बाद भविष्य में मौजूद रहेंगी. मेजर गौरव आर्या ने कहा कि टेक्नोलॉजी के संबंध में इन चुनौतियों में बदलाव हो सकते हैं लेकिन इन चुनौतियों का सामना हमें मानव क्षमता में ही करना होगा. संबोधन के दौरान मेजर गौरव आर्या ने आगे कहा कि किसी भी लीडर के लिए सबसे पहली जरूरी चीज है एंट्रोपी. एंट्रोपी के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा कि इसका अर्थ अस्पष्टता की स्थिति से होता है और फौज में इसे ही ‘फॉग ऑफ वॉर’ कहा जाता है. इसके साथ ही उन्होंने बताया कि जंग में कभी भी आपका पहला बैटल प्लान दुश्मन से भिड़ने के बाद बच नहीं पाता है. ठीक इसी तरह आप मानकर चलिए कि किसी भी कारोबार द्वारा तैयार किया गया प्लान मार्केट में जाने के बाद बच नहीं पाएगा. 

ये समझना है बेहद जरूरी
इसके साथ ही मेजर गौरव आर्या ने यह भी कहा कि एक लीडर होने के नाते आपको अपना इकोसिस्टम या फिर वातावरण भी नियंत्रित करना होता है. फौज में हम इसे सप्लाई चेन रिजिलिएंस की संज्ञा से जानते हैं. अगर आप अपना इकोसिस्टम नियंत्रित नहीं करेंगे तो कोई और उसे नियंत्रित करेगा और आप हार जायेंगे. लीडरशिप के ये सभी मूल्य हमेशा ऐसे ही एक समान बने रहते हैं. आने वाले समय में चुनौतियां होंगी ही लेकिन उनसे निपटने के लिए लीडरशिप अवेयरनेस की आवश्यकता होगी.
 

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BW Marketing World: एक्सपर्ट्स से समझिये PR के लिए कितनी जरूरी है स्टोरीटेलिंग!

शाजिया इल्मी ने कहा कि आपकी कहानी या कथा कितनी ही अच्छी क्यों न हो, अगर आपका उत्पाद ही खराब है तो आप उसे नहीं बेच सकते.

Last Modified:
Friday, 19 January, 2024
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पब्लिक रिलेशन यानी PR कितना प्रभावशाली है, इसके प्रभाव को किस तरह से मापा जाता है और आखिर किस तरह से PR के प्रभाव को बढ़ाया जा सकता है? इन्हीं सवालों के जवाब जानने के लिए आज देश की राजधानी दिल्ली में बढ़ती ठंड के बीच गर्मजोशी से BW मार्केटिंगवर्ल्ड एक्सीलेंस इन कम्युनिकेशन एंड एंगेजमेंट (BW Marketing world Excellence In Communication and Engagement Summit) नामक कार्यक्रम का आयोजन किया गया. 

क्यों अच्छा कथावाचक होना जरूरी है?
कार्यक्रम के आयोजन के दौरान यह जानने की कोशिश भी की गई कि आज के जमाने में स्टोरीटेलिंग क्यों बहुत जरूरी है और PR के लिए एक अच्छा कथावाचक होने बहुत जरूरी क्यों है? इस विषय पर अपनी राय रखते हुए भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय प्रवक्ता शाजिया इल्मी ने कहा कि आपकी कहानी या कथा कितनी ही अच्छी क्यों न हो, अगर आपका उत्पाद ही खराब है तो आप उसे नहीं बेच सकते. आप विभिन्न तरीकों से अपनी बात कह सकते हैं लेकिन आप अपनी बात को किस तरह कह रहे हैं यह बहुत ही जरूरी है.

भावनाएं हैं बेहद जरूरी 
इसके साथ ही शाजिया इल्मी ने कहा कि जिस तरह से एक कंपनी के लिए उसका कंज्यूमर होता है, ठीक उसी तरह से एक राजनीतिक पार्टी के लिए उसका वोटर होता है. अब कोई भी राजनीतिक पार्टी या फिर कंपनी जो कह रही है वह कितना प्रभावशाली है, क्या उस कहानी का आप से संबंध है भी या नहीं, यह आपको किस तरह से प्रभावित करता है और क्या यह आपके भीतर आपकी भावनाओं को भी प्रभावित करता है या नहीं? ये सभी सवाल बेहद जरूरी हैं और मेरे लिए भावनाएं ज्यादा जरूरी हैं. कोई भी राजनीतिक पार्टी जो कह रही है, जिस तरह से कह रही है उससे आपके भीतर क्या भावनाएं आती हैं और वह आपकी भावनाओं को किस तरह से प्रभावित करता है यह बेहद जरूरी है. जो भी कहा जा रहा है वह इतना प्रभावशाली होना चाहिए कि आपकी भावनाओं को और आपको प्रभावित कर सके. 

कैसे नकारात्मक्ता को सकारात्मकता में बदलें?
एक क्राइसिस को सकारात्मकता में कैसे बदला जा सकता है ये जान लेना भी अत्यंत जरूरी है और इस मुद्दे पर अपनी राय रखते हुए PR प्रोफेशनल के फाउंडर और मैनेजिंग डायरेक्टर सर्वेश तिवारी कहते हैं कि जब भी जनता से डील किये जाने की बात आती है तो क्राइसिस होना अटलनीय है और जब भी ऐसा कुछ होता है तो आपको अपनी बात इतने प्रभावशाली तरीके से कहनी चाहिए कि वह बात उनके दिमाग में छप जाए.
 

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BW Marketing World: एक्सपर्ट्स से समझिये कितना प्रभावशाली है पब्लिक रिलेशन!

हिमांक त्रिपाठी ने कहा कि PR इंडस्ट्री हमारे सोचने के तरीके को बदलने पर प्रमुख रूप से काम करती है.

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Friday, 19 January, 2024
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पब्लिक रिलेशन यानी PR कितना प्रभावशाली है, इसके प्रभाव को किस तरह से मापा जाता है और आखिर किस तरह से PR के प्रभाव को बढ़ाया जा सकता है? इन्हीं सवालों के जवाब जानने के लिए आज देश की राजधानी दिल्ली में बढ़ती ठंड के बीच गर्मजोशी से BW मार्केटिंगवर्ल्ड एक्सीलेंस इन कम्युनिकेशन एंड एंगेजमेंट (BW Marketing world Excellence In Communication and Engagement Summit) नामक कार्यक्रम का आयोजन किया गया था.

क्या है PR का प्रभाव?
कार्यक्रम के आयोजन के दौरान बहुत से एक्सपर्ट्स से PR संबंधित विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई जिससे दिल्ली की बढ़ती हुई ठंड में भी माहौल काफी गर्म नजर आया. इसी दौरान PR के प्रभाव को मापने के लिए सही पैमानों के विषय पर एक चर्चा का आयोजन हुआ. लेकिन इससे पहले कि हम ये समझें कि आखिर PR के प्रभाव को किस तरह से मापा जा सकता है, हमें ये समझ लेना चाहिए कि आखिर PR क्षेत्र कितना प्रभावशाली है और क्या यह सच में काम करता है? इस विषय पर अपने विचार प्रकट करते हुए बाजी गेम्स के चीफ कम्युनिकेशन ऑफिसर और प्रवक्ता हिमांक त्रिपाठी ने कहा कि PR इंडस्ट्री हमारे सोचने के तरीके को बदलने पर प्रमुख रूप से काम करती है. और PR बिलकुल काम करता है, बस इसे सही तरीके से सही दिशा में किया जाना ज्यादा जरूरी है. 

तेजी से बदल रही PR इंडस्ट्री
साथ ही अपने विचार प्रस्तुत करते हुए PRHUB की डायरेक्टर और वरिष्ठ पार्टनर सुमति एम चारी कहती हैं कि पिछले एक दशक के दौरान PR का पूरा परिदृश्य ही बदल गया है और यह अभी भी बदल रहा है. आज से एक दशक पहले कंपनी के CXO या फिर मार्केटिंग करने वाले लोगों द्वारा जिस तरह से PR को देखा जाता था, वह अब बदल रहा है और PR अब ज्यादा प्रासंगिक इंडस्ट्री के रूप में सामने आ रही है. बदलते हुए परिदृश्य की वजह से PR का क्षेत्र और भी प्रासंगिक होता जा रहा है. 

कैसे मापें PR का प्रभाव?
PR के काम करने और इसके प्रभाव को समझने के बाद यह जान लेना भी बेहद जरूरी है कि आखिर इस प्रभाव को मापा कैसे जा सकता है? इस विषय पर अपनी राय रखते हुए भारतपे में PR और कॉर्पोरेट कम्युनिकेशन क्षेत्र की प्रमुख अकांक्षा जैन कहती हैं कि किसी भी ब्रैंड की लॉयल्टी या फिर कस्टमर की लॉयल्टी को मापने के लिए आपको विस्तृत रूप से की गई रिसर्च का सहारा लेना पड़ेगा. जबकि अगर आप अपने PR कैम्पेन को मापना चाहते हैं तो उसके लिए विभिन्न प्रकार के टूल उपलब्ध हैं जो तकनीक और AI यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से भरपूर हैं.
 

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Ayodhya Ram Mandir के निर्माण पर सरकार ने कितना किया खर्चा? Yogi ने दिया जवाब

अयोध्या स्थित राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठता 22 जनवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करेंगे. इस समारोह में केवल वही शामिल हो सकेंगे, जिन्हें आमंत्रण मिला है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Thursday, 18 January, 2024
Last Modified:
Thursday, 18 January, 2024
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अयोध्या में भव्य राम मंदिर (Ayodhya Ram Mandir) के निर्माण में केंद्र और राज्य सरकार ने कितना खर्चा किया, इस सवाल का जवाब मिल गया है. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) ने इस बारे में पूरी जानकारी दी है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, CM योगी का कहना है कि राम मंदिर के निर्माण के लिए सरकार ने एक पाई भी नहीं दी है. मंदिर के लिए पैसा न केंद्र सरकार ने दिया और न ही राज्य सरकार ने. ये सारा पैसा देश और दुनियाभर में मौजूद रामभक्तों ने दिया है.  

इन पर सरकार कर रही काम
योगी आदित्यनाथ ने बताया कि राम मंदिर के बाहर के इंफ्रास्टेक्चर, जैसे कि रेलवे स्टेशन का कामकाज, एयरपोर्ट, गेस्ट हाउस का निर्माण, क्रूज सर्विस, सड़क चौड़ीकरण, पार्किंग सुविधा आदि कार्यों पर सरकार काम कर रही है. ये काम सरकार की पॉलिसी के तहत हो रहा है. योगी ने कहा कि मंदिर परिसर के बाहर किए जा रहे कार्य सरकारी नीति के तहत हो रहे हैं. मंदिर के निर्माण में सरकार ने कोई राशि खर्च नहीं की है, यह सबकुछ रामभक्तों के आर्थिक सहयोग से हो रहा है. 

दिल खोलकर आ रहा डोनेशन
वहीं, एक रिपोर्ट के मुताबिक, राम मंदिर में श्रद्धालु दिल खोल कर दान कर रहे हैं. यहां रोजाना तीन से चार लाख रुपए दान स्वरूप आ रहे हैं. जबकि महीने में यह आंकड़ा डेढ़ से दो करोड़ रुपए तक पहुंच रहा है. माना जा रहा है कि 22 जनवरी को मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के बाद अयोध्या में लाखों भक्त पहुंचेंगे. ऐसे में दान के आंकड़े में भी इजाफा होगा. गौरतलब है कि अस्थाई मंदिर में रामलला के दर्शन-पूजन के लिए आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या पिछले कुछ वक्त में काफी बढ़ी है. लिहाजा, संभावना जताई जा रही है कि मंदिर बनने के बाद श्रद्धालुओं की ओर से दान-चढ़ावे का आंकड़ा कई गुना तक बढ़ जाएगा.

समारोह में यह रहेंगे मौजूद
अयोध्या स्थित राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठता 22 जनवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करेंगे. इस समारोह में केवल वही शामिल हो सकेंगे, जिन्हें आमंत्रण मिला है. इस कार्यक्रम में गौतम अडानी (Gautam Adani) और मुकेश अंबानी (Mukesh Ambani) के साथ-साथ अजय पीरामल, कुमार मंगलम बिड़ला, टाटा के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन और गौतम सिंघानिया जैसे कारोबारी दुनिया के दिग्गज मौजूद रहेंगे. इनके अलावा, वेदांता के चेयरमैन अनिल अग्रवाल, TVS के मुखिया वेणु श्रीनिवासन, L&T के CMD एसएन सुब्रमण्यम भी अयोध्या के ऐतिहासिक पल का हिस्सा बनेंगे. दरअसल, अयोध्या में जिस तरह इन्फ्रास्ट्रक्चर पर काम चल रहा है, उसे देखते हुए नामी कंपनियां यहां अपने लिए अवसर तलाश रही हैं. पहले मंदिर ट्रस्ट ने 6000 VVIP को बुलाने की योजना बनाई थी, जिसे अब बढ़ाकर 10 हजार कर दिया गया है.


डेढ़ लाख का 1 शेयर, इतिहास रचने वाली MRF के बारे में कितना जानते हैं आप?

MRF का असली मुकाबला जेके टायर एंड इंडस्ट्रीज लिमिटेड और सिएट टायर्स से है. कंपनी के देश में 2500 से ज्यादा डिस्ट्रीब्यूटर्स हैं.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Thursday, 18 January, 2024
Last Modified:
Thursday, 18 January, 2024
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टायर बनाने वाली कंपनी MRF के बारे में तो आपने जरूर सुना होगा. यदि आप शेयर बाजार में निवेश करते हैं, तो यह भी जानते होंगे कि MRF का शेयर देश का सबसे महंगा शेयर है. इस शेयर ने बुधवार को एक नया रिकॉर्ड बनाते हुए 1.5 लाख के आंकड़े को छू लिया. यानी MRF के एक शेयर की कीमत डेढ़ लाख पहुंच गई. हालांकि, बाद में इसमें गिरावट आई और यह 134969.45 रुपए पर बंद हुआ. आज खबर लिखे जाने तक कंपनी का स्टॉक 1.47% की बढ़त के साथ कारोबार कर रहा था.  

पिछले साल 1 लाख हुई थी कीमत
पिछले साल जून में MRF के Stock की कीमत एक लाख रुपए पहुंची थी और यह मुकाम हासिल करने वाला यह देश का पहला शेयर था. MRF दुनिया की टॉप-20 टायर कंपनियों में शामिल है. यह दोपहिया वाहनों से लेकर फाइटर विमानों के लिए भी टायर बनाती है. MRF का पूरा नाम मद्रास रबर फैक्ट्री है और इसका मार्केट कैप 57,242.47 करोड़ रुपए पहुंच गया है. अब जब MRF की बात निकली है, तो इसकी सक्सेस स्टोरी के बारे में जान लेते हैं. लेकिन पहले ये समझते हैं कि कंपनी का शेयर देश का सबसे महंगा शेयर कैसे बन गया. 

ये है इतना महंगा होने की वजह
कंपनी के शेयर के इतना महंगा होने की प्रमुख वजह ये है कि उसने कभी भी शेयर्स को स्प्लिट नहीं किया. रिपोर्ट्स की मानें, तो 1975 के बाद से MRF ने अभी तक अपने शेयरों को कभी स्प्लिट नहीं किया. स्टॉक स्प्लिट का फैसला कंपनी तब लेती हैं, जब शेयर की कीमत काफी ज्यादा हो जाती है. ऐसा करके वह छोटे खरीदारों की पहुंच में अपने शेयर ले आती हैं, लेकिन MRF ने ऐसा नहीं किया. कंपनी की मजबूत वित्तीय स्थिति के चलते उसके शेयर भी मजबूत होते गए और आज एक शेयर की कीमत एक लाख से भी ज्यादा है. पिछले एक साल में यह शेयर 51.74% ऊपर चढ़ा है. साल 2000 में इस शेयर की कीमत महज 1000 रुपए थी.  

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इस तरह अस्तित्व में आई MRF
MRF के फाउंडर केरल के एक ईसाई परिवार में जन्मे केएम मैमन मापिल्लई (K. M. Mammen Mappillai) हैं. उन्होंने 1946 में चेन्नई में गुब्बारे बनाने की एक छोटी यूनिट लगाई थी. सबकुछ बढ़िया चल रहा था, फिर मापिल्लई ने देखा कि एक विदेशी कंपनी टायर रीट्रेडिंग प्लांट को ट्रेड रबर की सप्लाई कर रही है. तब उनके दिमाग में भी ऐसा कुछ करने का आईडिया आया. बता दें कि रीट्रेडिंग पुराने टायरों को दोबारा इस्तेमाल करने लायक बनाने को कहा जाता है. जबकि ट्रेड रबर टायर का ऊपरी हिस्सा होती है. इसके बाद मापिल्लई ने अपनी सारी पूंजी ट्रेड रबर बनाने के बिजनेस में लगा दी और इस तरह मद्रास रबर फैक्ट्री (MRF) का जन्म हुआ.

इनसे है MRF का मुकाबला 
MRF ट्रेड रबर बनाने वाली भारत की पहली कंपनी थी. केएम मैमन मापिल्लई ने हाई क्वालिटी टायर बनाये और विदेशी कंपनियों की बादशाहत खत्म कर दी. 1960 के बाद से कंपनी ने टायर बनाना शुरू कर किया और आज भारत में टायर की सबसे बड़ी टायर मैन्युफैक्चरर है. एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में टायर इंडस्ट्री का मार्केट करीब 60,000 करोड़ रुपए का है. MRF का असली मुकाबला जेके टायर एंड इंडस्ट्रीज लिमिटेड और सिएट टायर्स से है. कंपनी के देश में 2500 से ज्यादा डिस्ट्रीब्यूटर्स हैं. कंपनी दुनिया के 75 से ज्यादा देशों में एक्सपोर्ट भी करती है.

मापिल्लई ने सड़क पर बेचे थे गुब्बारे
केएम मैमन मापिल्लई का बचपन अभावों में गुजरा था. मापिल्लई के पिता स्वतंत्रता सेनानी थे और आजादी की लड़ाई के दौरान उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था. इसके बाद परिवार की पूरी जिम्मेदारी मापिल्लई के कन्धों पर आ गई. परिवार का पेट भरने के लिए उन्होंने सड़कों पर गुब्बारे बेचने का काम शुरू किया. 6 साल तक यह करने के बाद 1946 में उन्होंने बच्चों के लिए खिलौने और गुब्बारे बनाने की एक छोटी यूनिट लगाई, जो आगे चलकर MRF बन गई. उन्होंने कंपनी को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया. साल 2003 में 80 साल की उम्र में मापिल्लई का निधन हो गया. मापिल्लई के दुनिया से जाने के बाद उनके बेटों ने बिजनेस संभाला और जल्द ही उनकी कंपनी नंबर-1 की पोजीशन पर आ गई.