स्कूली शिक्षा में बदलाव की जरूरत, इसको कैसे किया जाए ठीक, इस रिपोर्ट में जानिए

भारत के लगभग 15 लाख स्कूलों में स्कूली शिक्षा के हर स्तर पर व्यवस्थित तरीके से सुधार करने की जरूरत है.

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Friday, 07 June, 2024
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हाल ही में जारी एनुअल स्टेटस ऑफ एजूकेशन रिपोर्ट (ASER) 2023 में कहा गया है कि स्कूलों में हमारे छात्र सीख नहीं रहे हैं. इस रिपोर्ट से पता चलता है कि एक चौथाई विद्यार्थी वह भी नहीं कर पाते जो कक्षा 2 के बच्चे को करने में सक्षम होना चाहिए. इन आंकड़ों में पिछले एक दशक में नामात्र का सुधार हुआ है. यह रिपोर्ट शिक्षा के उस संकट की ओर इशारा करती है जिसने आज़ादी के बाद से हमारी शिक्षा प्रणाली को जकड़ रखा है.

रातोंरात नहीं बदल सकता है शिक्षा का स्तर

विशेषज्ञों का कहना है कि ASER जैसे अनौपचारिक सर्वेक्षणों से सामने आया खराब शिक्षा स्तर देश में छात्रों की वर्षों की उपेक्षा और बुनियादी दक्षताओं पर ध्यान देने की कमी का नतीजा है. यह कमी स्कूली शिक्षा के शुरुआती दौर में ही शुरू हो जाती है और समय के साथ बढ़ती ही जाती है. अंततः छात्रों में ये कमी तब स्पष्ट होती है जब वे ऊपरी कक्षाओं में पहुंचते हैं या अपनी आजीविका शुरू करते हैं. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत को पिछली शिक्षा नीति को अपग्रेड करने में 37 साल और पाठ्यक्रम की रूपरेखा बनाने में 17 साल लगे हैं. इसका मतलब है कि हम यहां कई दशकों से चल रही गड़बड़ी की बात कर रहे हैं. इस नुकसान की भरपाई कुछ सालों में नहीं की जा सकती. भारत के लगभग 15 लाख स्कूलों में स्कूली शिक्षा के हर स्तर पर व्यवस्थित तरीके से सुधार करने की जरूरत है.

शैक्षिक प्राथमिकताओं की ऐतिहासिक उपेक्षा    

भारत की शिक्षा नीतियां और प्राथमिकताएं, वास्तविक शिक्षा के बजाय साक्षरता के प्रसार, नामांकन और स्कूल भवन के बुनियादी ढांचे जैसे मुद्दों पर ज़्यादा  केंद्रित रही हैं. पिछली शताब्दी की शिक्षा नीतियां हों या 2009 में शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE), दोनों ही छात्रों को स्कूलों में दाखिला दिलाने के उद्देश्य पर केंद्रित हैं. शिक्षा की गुणवत्ता और सीखने के तरीकों में सुधारों पर वास्तव में कोई बड़ा काम नहीं हुआ है. भाषा, विज्ञान और गणित जैसे विषयों को विशाल पाठ्यक्रम से बोझिल बना दिया गया है. पाठ्यक्रम और परीक्षाएं रोट लर्निंग को प्राथमिकता देती हैं, जबकि वास्तविक जीवन में आवश्यक 21वीं सदी के कौशलों के विकास को ध्यान में नहीं रखतीं. परीक्षाओं में वास्तविक समझ की बजाय रटने की क्षमता की परीक्षा ली जाती रही है. ऐसे में विशाल पाठ्यक्रम को कवर करने की होड़ में सार्थक शिक्षा का वास्तविक लक्ष्य पीछे छूट गया.

NEP 2020 के साथ बदलाव की बयार

लेकिन हाल के दिनों में शिक्षा से जुड़ी बहस स्कूली शिक्षा में सीखने के परिणामों पर केंद्रित हो गई है. राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 की रिलीज ने गुणवत्तापूर्ण स्कूली शिक्षा, आलोचनात्मक सोच और छात्रों के बहुमुखी विकास पर जोर देने के साथ-साथ सीखने पर फिर से ज़ोर  दिया गया है. 'पाठ्यक्रम और पाठ्येतर के बीच कोई कठोर अलगाव नहीं', 'वैचारिक समझ पर जोर', 'रचनात्मक और आलोचनात्मक सोच' जैसे शब्द NEP 2020 में एक अपेक्षित और आवश्यक दार्शनिक बदलाव की ओर इशारा करते हैं.

इस पॉलिसी कार्यान्वयन ने पहले से ही निपुण लक्ष्य जैसे प्रारंभिक साक्षरता और गणितीय ज्ञान और ग्रेड 3 में फाउंडेशनल लर्निंग स्टडी (FLS) जैसे मजबूत मानकों के जरिए कुछ आशाजनक लक्ष्य तय कर दिए हैं. 2022-23 में हाल ही में संशोधित राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा (NCF) पूरी तरह से चरित्र निर्माण पर केंद्रित है. यह करिकुलम कड़े मानकों के आधार पर विषयों और अलग-अलग ग्रेड में अपेक्षित सीखने के परिणामों के लक्ष्य तय करता है. CBSE ने अपने नए SEAS मूल्यांकन पद्धति के जरिए स्ट्रक्चर्ड असेसमेंट फॉर एनालाइजिंग लर्निंग (SAFAL) और एनसीईआरटी/परख (NCERT/PARAKH) जैसी पहल के माध्यम से दक्षता-आधारित प्रश्नों के आधार पर प्रारंभिक वर्षों में वास्तविक अवधारणा की समझ का परीक्षण करने के लिए अपने मूल्यांकन पैटर्न को फिर से तैयार किया है. इसमें 6000 से ज्यादा ब्लॉक के लिए 80 लाख से ज्यादा छात्रों का मूल्यांकन किया गया है. NEP के निर्देशों के मुताबित इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए, स्टेट असेसमेंट सर्वे (SAS) पर भी इन शैक्षणिक लक्ष्यों के लिए विचार किया जा सकता है.

आगे की राह सुधारों को आगे बढ़ाना

शिक्षा विशेषज्ञ उन स्पष्ट साक्ष्य-आधारित सुधारों से खुश हैं जो पिछले साढ़े तीन सालों में भविष्य के दृष्टिकोन से नेशनल एजुकेशन पॉलिसी (NEP) 2020 द्वारा लागू किए गए हैं. हालांकि, काम अभी शुरू हुआ है और इसका सबसे कठिन हिस्सा आगे है. संचालन में सुधार, शिक्षकों के कौशल का विकास और छात्रों के लिए उनकी व्यक्तिगत रुचि के मुताबिक सीखने का माहौल बनाने के लिए ज़रूरी  नीतियों को लागू करने के लिए सभी राज्यों में सुधार की गति बनाए रखने की ज़रूरत होगी.

शिक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, अधिगम के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा जा रहा है कि NEP 2020 की बयानबाजी अभी तक साक्षरता और संख्यात्मक योग्यता में कोई ठोस सुधार नहीं कर पाई है. हालांकि, हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि शिक्षा के परिणाम (अधिगम का आउटकम) प्रदर्शित होने में विलम्ब होता है, जिसका प्रभाव पूरी तरह से प्रणाली और स्कूलों में परिवर्तन के बाद ही दिखने लगता है. इसमें छात्रों की क्षमताओं में सुधार, शिक्षकों के कौशल में वृद्धि, पाठ्यक्रम का संतुलन, और स्कूलों की गुणवत्ता में समय लगता है. इस प्रक्रिया के पूरा होने के बाद ही हमें छात्रों के बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद करनी चाहिए. पिछली शिक्षा नीतियों के विपरीत, NEP 2020 ने अपने निर्धारित व्यापक रोडमैप के अंतर्गत 3.5 सालों में एनसीएफ 2022 के साथ-साथ दक्षता-आधारित मूल्यांकन जैसे सुधारों का प्रभाव दिखाया है.

इसके विपरीत, 1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति को 2005 में संशोधित NCF के रूप में सामने आने में 17 साल लग गए थे. आरटीई अधिनियम (RTE Act) को 1986 की शिक्षा नीति आने के बाद लागू होने में कई दशक लग गए. विशेषज्ञों का तर्क है कि नई एनईपी कार्यान्वयन की यह तेज गति दीर्घकालिक लक्ष्यों को हसिल करने के लिए आत्मविश्वास उत्पन्न करती है. हालांकि, सबसे बड़ी चुनौती कई शैक्षणिक चक्रों में इस नीति को लगातार जारी रखने की है.

आगे होने वाले रेग्युलेटरी सुधार

आगे स्कूली शिक्षा प्रणाली में गुणवत्ता और जवाबदेही लाने के लिए और अधिक प्रशासनिक और रेग्युलेटरी सुधारों पर विचार किया जाएगा. राज्यों में मौजूदा प्रणाली में, स्कूल शिक्षा विभाग अपने स्कूल (पब्लिक/सरकारी स्कूल) स्वयं संचालित भी करता है और राज्य भर के सभी स्कूलों को नियंत्रित भी करता है, जिससे वह खिलाड़ी और अंपायर दोनों बन जाता है. NEP 2020 ने एक स्वतंत्र, वैधानिक राज्य स्कूल मानक प्राधिकरण की स्थापना की सिफारिश की है जो सार्वजनिक और सरकारी स्कूलों के लिए 'हल्के लेकिन सख्त' नियम तैयार करेगा, शिक्षा की उपलब्धियों का मूल्यांकन करेगा, स्कूलों को मान्यता प्रदान करेगा, स्कूल-वाइज शिक्षा के परिणामों की सार्वजनिक रिपोर्टिंग करेगा, और गुणवत्ता की मांग को ध्यान में रखते हुए शिक्षण के सर्वोत्तम तरीकों को साझा करेगा. स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए ऐसे स्टेट स्कूल स्टैंडर्ड अथॉरिटी को संवैधानिक? जामा पहनाना जरूरी है. राज्यों को अपने स्कूली शिक्षा परिवेश में सुधार के लिए वर्तमान में लागू प्रतिबंधात्मक अधिनियमों, नियमों और विनियमों की सावधानीपूर्वक समीक्षा करनी चाहिए.

एक नियामक संस्था के रूप में स्टेट स्कूल स्टैंडर्ड अथॉरिटी को शिक्षा प्रणाली में स्कूलों के प्रवेश और निकास की निगरानी करने की जरूरत होगी. शिक्षा प्रणाली में स्कूलों के प्रवेश और निकासी उनके सीखने के प्रतिफल की उपलब्धियों पर आधारित करना होगा. इससे इस प्रक्रिया की कार्यकुशलता और पारदर्शिता को बढ़ावा मिलेगा. जिससे यह प्रक्रिया K-12 स्कूलों के लिए अनुमोदन की वर्तमान प्रणाली की तुलना में ज्यादा तेजी और बेहतर तरीके से काम करेगी.

स्कूल मानकों के लिए ऐसे प्राधिकरण की स्थापना देश में शैक्षिक गुणवत्ता तय करने की दिशा में एक महत्वाकांक्षी लेकिन जरूरी कदम है. हालांकि NEP एक मजबूत ढांचा प्रदान करता है. लेकिन SSSA की सफलता इन चुनौतियों से निपटने और पारदर्शी, कुशल और जवाबदेह स्कूल प्रशासन के लिए लगातार प्रयास करने की ऐसी क्षमता पर निर्भर करती है जो अन्य मापदंडों से ऊपर बच्चों के लिए सीखने को प्राथमिकता देती है. इसके अलावा, सिस्टम में इसकी भूमिका मुख्य रूप से नागरिकों द्वारा तय की जाएगी. विशेष रूप से माता-पिता अब सक्रिय भागीदार के रूप में काम कर सकते हैं. बच्चों के माता-पिता फीडबैक प्रदान करने और स्कूलों को अपने बच्चों की शिक्षा के लिए जवाबदेह बनाने के लिए काम कर सकते हैं. शिक्षा प्राणाली के रेग्युलेशन के लिए इस नए तरीके को अपनाने के साथ हम इनपुट से आउटपुट की ओर बढ़ रहे हैं. ऐसे में शिक्षा के अधिकार को सुनिश्चित करने से लेकर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के अधिकार को हासिल करने की ओर कदम बढ़ाना अनिवार्य हो जाता है. इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए कुछ पुराने कानूनों में संशोधन की जरूरत होगी. इससे वर्तमान जरूरतों के मुताबिक एक ऐसी न्यायसंगत शिक्षा प्रणाली स्थापित करने में सहायता मिलेगी जिसका लक्ष्य छात्रों को गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा देना है.

एक समान रेग्युलेटरी प्रक्रिया अपनाने का उद्देश्य सरकारी शिक्षा विभाग पर प्रशासनिक भार को कम करना, शिक्षा के व्यावसायीकरण जैसे मुद्दों का समाधान करना और साथ ही माता-पिता और छात्र हितों की रक्षा करना है. स्टेट स्कूल स्टैंडर्ड अथॉरिटी को कानून बना कर लागू करने में कुछ प्रगतिशील राज्यों की बढ़ती रुचि के साथ, एक केंद्रीकृत नियामक और स्कूल मानकों के लिए एक फ्रेमवर्क जल्द ही पेश होने की संभावना है.

अमृत काल में शिक्षा को प्राथमिकता

राष्ट्रीय शिक्षा नीति और स्कूलों के पाठ्यक्रम, शिक्षकों के प्रशिक्षण और सीखने के आकलन पर पड़ने वाले इसके प्रभाव एक नए युग की शुरुआत का प्रतिनिधित्व करते हैं जो हमारे देश के युवा दिमागों के लिए मूलभूत कौशल को प्राथमिकता देते हैं. इसमें सफलता का प्रमाण छात्र शिक्षण मेट्रिक्स पर लक्षित सुधार हासिल करना होगा जिन्हें NIPUN भारत मिशन और इसी तरह के दूसरे कार्यक्रमों में परिभाषित किया गया है.

हमारे बच्चों में इस शिक्षा के परिणाम दिखाई देने से पहले कई शैक्षणिक चक्रों में सुधार की गति को बनाए रखना जरूरी है. यह हमारा कर्तव्य है कि हम अपने बच्चों को पढ़ने, लिखने, सोचने, सवाल करने, सहयोग करने और समाज के संवेदनशील नागरिक बनने के जरूरी कौशल से लैस करें. जैसा कि प्रधानमंत्री मोदी ने कहा है कि अमृत काल एक बेहतर शैक्षणिक महौल को पोषित करने के लिए सही रनवे प्रदान करता है जो अंततः गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को एक यथार्थवादी महत्वाकांक्षा बनाता है. अंततः, सुधारवादी नीतियों का महत्व तभी होता है जब वे बेहतर शिक्षा व्यवस्था को आकार देती हैं. इससे हमारे स्कूलों के लगभग 26 करोड़ शिक्षार्थियों का जीवन और भविष्य बनता है.

(लेखक- डॉ. किरीट प्रेमजीभाई सोलंकी, पूर्व लोकसभा सांसद, अहमदाबाद पश्चिम)
 


आपको परेशान करने वाली महंगाई, RBI और सरकार का भी छीन लेगी सुकून, समझें क्या है गणित

पिछले कुछ दिनों से महंगाई का मीटर तेजी से घूम रहा है, जो सबके लिए परेशानी वाली बात है.

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Tuesday, 18 June, 2024
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चुनावी मौसम बीतने के बाद महंगाई (Inflation) का मीटर चालू हो गया है. आलू-प्याज से लेकर दाल-आटा और चावल तक सबकुछ महंगा हो गया है. बीते दो हफ्तों में ही आटा, चावल, दाल, सरसों तेल, गुड़ और यहां तक कि नमक के दामों में इजाफा देखने को मिला है. परेशानी वाली बात यह है कि महंगाई का ये मीटर आने वाले दिनों में और तेजी से दौड़ सकता है. महंगाई की रफ्तार न थमने की मार आम जनता पर कई तरह से पड़ेगी. उदाहरण के तौर पर उसका रसोई का बजट बढ़ जाएगा. इसके साथ ही कर्ज सस्ता होने की आस भी टूट जाएगी. 

EMI कम तो नहीं बढ़ जाएगी?  
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) पिछले 8 बार से नीतिगत ब्याज दरों को यथावत रखता आ रहा है. हाल ही में हुई RBI की मौद्रिक नीति समिति की बैठक में रेपो रेट को 6.5 प्रतिशत पर बरकरार रखने का फैसला लिया गया. हालांकि, यह माना जा रहा है कि MPC की अगली बैठक में रेपो रेट में कटौती का ऐलान किया जा सकता है. यानी कर्ज कुछ सस्ता हो सकता है. लेकिन महंगाई इस राह में फिर बाधा बनती नजर आ रही है. यदि महंगाई का पहिया इसी रफ्तार से घूमता रहा, तो रिजर्व बैंक कटौती की आस को तोड़ते हुए नीतिगत ब्याज दरों में इजाफे को मजबूर हो सकता है. यदि ऐसा हुआ, तो फिर आपकी EMI बढ़ने की आशंका भी जन्म ले लेगी.

FMCG उत्पाद भी हुए महंगे
महंगाई हर तरफ से बढ़ रही है. फल-सब्जी के साथ-साथ FMCG कंपनियों के उत्पाद भी महंगे हो गए हैं. बीते दो-तीन महीनों में इन कंपनियों ने फूड और पर्सनल केयर से जुड़े उत्पादों की कीमतों में 2 से 17% तक का इजाफा किया है. कंपनियां इसके पीछे कच्चे माल की कीमतों में बढ़ोतरी का तर्क दे रही हैं. एक रिपोर्ट की मानें तो FMCG कंपनियों ने साबुन-बॉडी वॉश जैसे प्रोडक्ट्स 2-9% महंगे कर दिए हैं. इसी तरह, हेयर ऑयल 8-11% और चुनिंदा फूड आइटम्स 3 से 17% तक महंगे मिल रहे हैं. इतना ही नहीं, ये कंपनियां चालू वित्त वर्ष 2024-25 में अपने उत्पादों के दाम औसतन 1% से 3% तक बढ़ा सकती हैं. यानी आने वाले दिन और भी मुश्किल भरे हो सकते हैं.

RBI को देना पड़ा था स्पष्टीकरण
बढ़ती महंगाई RBI के लिए भी मुश्किल पैदा कर सकती है. चढ़ते दामों के चलते ही उसे 2022-23 में शर्मसार होना पड़ा था. अब तक के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ था कि RBI को महंगाई नियंत्रित न करने पाने के लिए सरकार को स्पष्टीकरण देना पड़ा. दरअसल, रिजर्व बैंक अधिनियम के तहत अगर महंगाई के लिए तय लक्ष्य को लगातार तीन तिमाहियों तक हासिल नहीं किया जाता, तो RBI को केंद्र सरकार के समक्ष स्पष्टीकरण देना होता है. उसे बताना होता है कि महंगाई नीचे नहीं आने के क्या कारण है और उसने अब तक क्या कदम उठाए हैं. मौद्रिक नीति रूपरेखा के 2016 में प्रभाव में आने के बाद से यह पहली बार था जब RBI को इस संबंध में केंद्र को रिपोर्ट भेजनी पड़ी.

क्या है RBI की जिम्मेदारी?
आरबीआई को केंद्र की तरफ से खुदरा महंगाई दो प्रतिशत घट-बढ़ के साथ चार प्रतिशत पर बनाए रखने की जिम्मेदारी मिली हुई है. इसी साल मई में खुदरा महंगाई दर 4.75 प्रतिशत दर्ज की गई. मार्च में यह 4.80% थी. जबकि पिछले साल अगस्त में यह 6.83 प्रतिशत थी. सितंबर 2023 के बाद से रिटेल इन्फ्लेशन में नरमी देखने को मिली है, लेकिन अब जिस तरह से लगभग सभी वस्तुओं के दाम बढ़ रहे हैं ये आंकड़ा भी तेजी से बढ़ सकता है. उस स्थिति में RBI महंगाई नियंत्रित करने के नाम पर नीतिगत ब्याज दर यानी रेपो रेट में इजाफा कर सकती है और बैंक इसक भार आम ग्राहकों पर डाल सकते हैं. यानी आपकी किचन के बजट के साथ-साथ EMI का गणित भी गड़बड़ा सकता है. वहीं, सरकार को भी इस मुद्दे पर तीखे सवालों का सामना करना होगा. मोदी सरकार सहयोगियों के कंधों पर सवार है और विपक्ष भी इस बार पहले से ज्यादा मजबूत है. ऐसे में सरकार पहले की तरह महंगाई से पल्ला नहीं झाड़ पाएगी. 

कर्ज और महंगाई का रिश्ता
महंगाई सीधे तौर पर डिमांड और सप्लाई के अंतर की वजह से चढ़ती है और इस अंतर की एक वजह है पर्चेजिंग पावर बढ़ना. यानी आपके हाथ में यदि ज्यादा पैसा होगा, तो आप खुलकर खर्च करेंगे. इस खर्च के चलते डिमांड बढ़ेगी और यदि सप्लाई पूरी नहीं हो पाई तो महंगाई बढ़ेगी. यहीं से RBI की जिम्मेदारी शुरू होती है. ऐसी स्थिति में RBI रेपो रेट बढ़ाकर यह कोशिश करता है कि आपके हाथ में अतिरिक्त पैसा न पहुंचे. जब ज्यादा पैसा नहीं होगा, तो आप ज्यादा खर्च नहीं करेंगे. न डिमांड बढ़ेगी और न मांग और आपूर्ति के बीच अंतर बढ़ेगा. इसे दूसरी तरह से भी समझते हैं. ब्याज दरें कम होने से बाजार में अतिरिक्त लिक्विडिटी बढ़ जाती है. कहने का मतलब है कि लोग बिना ज़रूरत के सामान खरीदने के लिए लोन आदि लेने लगते हैं. इससे डिमांड में एकदम से इजाफा होता है, सप्लाई सीमित होने की वजह यह महंगाई का रूप ले लेता है. रिजर्व बैंक के रेपो रेट बढ़ाने से बैंक कर्ज महंगा करेंगे, जिससे लिक्विडिटी या अतिरिक्त पैसा घटने लगेगा. ऐसे में लोग जो बिना जरूरत के सामान खरीदने लगते हैं, उनकी खरीदारी कम हो जाएगी और महंगाई पर लगाम लग जाएगी.

कारगर नहीं है रणनीति
RBI का मानना है कि बाजार से लिक्विडिटी कम करने से Artificial Demand को कंट्रोल करने में मदद मिलती है. इससे मांग घटती है, जो महंगाई को नियंत्रित करने का काम करती है. वैसे ये फ़ॉर्मूला केवल भारत ही नहीं अमेरिका जैसे देशों में भी अपनाया जाता है. हालांकि, ये बात अलग है कि कई एक्सपर्ट्स इसे ज्यादा कारगर नहीं मानते. उनका कहना है कि पैसे और महंगाई के बीच का ये रिश्ता ऐसा नहीं है, जिसे रेपो रेट में बदलाव से नियंत्रित किया जा सकता है. रिजर्व बैंक के इस तरह के फैसलों से महंगाई रोकने में खास सफलता नहीं मिली है. 

क्या होती है रेपो रेट?
रेपो रेट वह दर होती है जिस पर RBI बैंकों को कर्ज देता है. बैंक इस पैसे से कस्टमर्स को LOAN देते हैं. रेपो रेट बढ़ने का सीधा सा मतलब है कि बैंकों को मिलने वाला कर्ज महंगा हो जाएगा और इसकी भरपाई वो ग्राहकों से करेंगे. इसीलिए कहा जाता है कि Repo Rate बढ़ने से होम लोन, वाहन लोन आदि की EMI ज्यादा हो सकती है. इसके उलट जब यह दर कम होती है तो बैंक से मिलने वाले कई तरह के कर्ज सस्ते होने की संभावना बढ़ जाती है.

क्या होती है रिवर्स रेपो रेट?
अब बात करते हैं रिवर्स रेपो रेट की. जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, यह रेपो रेट से उलट है. रिवर्स रेपो रेट वो दर होती है जिस पर बैंकों को उनकी ओर से RBI में जमा धन पर ब्याज मिलता है. रिवर्स रेपो रेट मार्केट में कैश-फ्लो को नियंत्रित करने में काम आती है. दूसरे शब्दों में कहें तो बाजार में जब भी बहुत ज्यादा कैश दिखाई देता है, रिजर्व बैंक रिवर्स रेपो रेट बढ़ा देता है, ताकि बैंक ज्यादा ब्याज की चाह में अपना पैसा उसके पास जमा करें. बिल्कुल, वैसे ही जैसे आप अपना पैसा बैंक में रखते हैं.

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GST के दायरे में आएगा पेट्रोल-डीजल! यदि ऐसा हुआ तो आपको कितना होगा फायदा? 

पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी का कहना है कि केंद्र पेट्रोल -डीजल को GST के दायरे में लाने का प्रयास करेगी. यदि ऐसा होता है तो तेल के दाम काफी कम हो जाएंगे.

Last Modified:
Wednesday, 12 June, 2024
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सहयोगियों के दम पर सत्ता में आई मोदी सरकार (Modi Govt) को शायद अहसास हो गया है कि महंगाई को नजरंदाज करने के चलते लोकसभा चुनाव में मनमाफिक परिणाम नहीं मिले. इसलिए सरकार ने आसमान पर पहुंच चुके पेट्रोल-डीजल के दामों (Petrol-Diesel Price) में कमी के लिए बड़ा कदम उठाने के संकेत दिए हैं. पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय की जिम्मेदारी संभालने वाले हरदीप सिंह पुरी का कहना है कि केंद्र सरकार का प्रयास होगा कि पेट्रोल-डीजल और नेचुरल गैस जैसे ईंधन को वस्तु एवं सेवा कर (GST) के दायरे में लाया जाए. 

पहले बताई थी मजबूरी
हरदीप पुरी ने कहा कि हम पेट्रोल-डीजल और प्राकृतिक गैस को वस्तु एवं सेवा कर (GST) के दायरे में लाने का प्रयास करेंगे. वैसे यह पहली बार नहीं है जब पुरी ने पेट्रोल और डीजल को जीएसटी के दायरे में लाने की बात कही है. उन्होंने पहले भी इस पर जोर दिया था और यह भी कहा था कि पेट्रोल और डीजल को GST के तहत लाने के लिए राज्यों को सहमत होना होगा. क्योंकि ईंधन और शराब उनके राजस्व का प्रमुख सोर्स हैं. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी पिछले साल नवंबर में कहा था कि पेट्रोल-डीजल को GST के दायरे में लाने से लोगों को फायदा होगा.  

केंद्र-राज्य ऐसे भरते हैं जेब
यदि पेट्रोल-डीजल को GST के दायरे में लाने को लेकर मोदी सरकार इस बार गंभीरता दिखाती है, तो इससे तेल की कीमतों से परेशान जनता को राहत मिल सकती है. पेट्रोल-डीजल के महंगा होने के पीछे उस पर लगने वाला भारी-भरकम टैक्स है. केंद्र और राज्य सरकार दोनों इससे अपनी जेब भरती हैं. आंध्र प्रदेश में सबसे पेट्रोल पर ज्यादा 31% टैक्स लगाया जाता है. जबकि कर्नाटक 25.92%, महाराष्ट्र 25% और झारखंड सरकार पेट्रोल पर 22% वैट वसूलती है. इसी तरह, डीजल पर आंध्र प्रदेश में 22%, छत्तीसगढ़ में 23%, झारखंड में 22% और महाराष्ट्र में 21% वैट लगता है. हर राज्य अपने हिसाब से टैक्स वसूलता है, इसलिए पेट्रोल-डीजल के दाम वहां अलग-अलग होते हैं. इसके साथ ही केंद्र सरकार एक्साइज ड्यूटी लगाती है. 

60% तो केवल टैक्स है
मोटे तौर पर पेट्रोल-डीजल पर सरकारें 60% से भी ज्यादा टैक्स वसूलती हैं. ऐसे में अगर इसे जीएसटी के दायरे में लाया जाता है, तो इस भारी-भरकम टैक्स की छुट्टी हो जाएगी. पेट्रोल-डीजल पर केवल जीएसटी के हिसाब से टैक्स लगेगा और GST की अधिकतम दर 28% है. इससे पेट्रोल-डीजल के दामों में काफी कमी देखने को मिलेगी. इस राह में समस्या ये है कि सभी राज्यों को इसके लिए तैयार होना होगा. राज्यों की कमाई में सबसे बड़ा योगदान शराब और ईंधन पर टैक्स का है. यदि उन्हें अपनी मनमर्जी के हिसाब से इन पर टैक्स लगाने की छूट नहीं मिलेगी, तो उनकी कमाई कम होगी. GST के दायरे में आने पर जो पैसा राज्यों को पेट्रोलियम पदार्थों पर टैक्स से सीधे मिल जाता था, वो केंद्र के पास जाएगा और वहां से राज्यों मिलेगा. यानी इसमें केंद्र की भूमिका मजबूत हो जाएगी.

निकल सकता है बीच का रास्ता 
राज्यों का इस विषय पर सहमत होना मुश्किल ज़रूर है, लेकिन आम जनता का हवाला देकर उन्हें तैयार किया जा सकता है. इसके लिए कोई बीच का रास्ता भी निकाला जा सकता है. जीएसटी के तहत अधिकतम टैक्स स्लैब 28% का है. ऐसे में सरकार पेट्रोल-डीजल के लिए जीएसटी के स्लैब में कुछ संशोधन करके एक अलग स्लैब बना सकती है, जो 28 प्रतिशत से ज्यादा का हो. इस तरह से केंद्र और राज्य दोनों के नुकसान को कुछ कम किया जा सकता है. एक रिपोर्ट बताती है कि यदि पेट्रोल को अधिकतम 28 प्रतिशत जीएसटी स्लैब में शामिल किया जाता है, तो एक लीटर पेट्रोल की कीमत 70 रुपए के आसपास हो सकती है. 


कितना पावरफुल होता है विपक्ष के नेता का पद, जिस पर राहुल को बैठाने की उठ रही मांग?

कांग्रेस नेता राहुल गांधी को लोकसभा में विपक्ष का नेता बनाए जाने की मांग हो रही है. यह पद पिछले दो बार से खाली पड़ा है.

Last Modified:
Friday, 07 June, 2024
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लोकसभा चुनाव में कांग्रेस काफी मजबूत बनकर सामने आई है. पार्टी ने पिछले दो चुनावों से बेहतर प्रदर्शन इस बार किया है. राहुल गांधी (Rahul Gandhi) की अगुवाई में कांग्रेस को अपने दम पर 99 सीटें मिली हैं. जबकि इंडिया गठबंधन के खाते में 234 सीटें आई हैं. भले ही इंडिया गठबंधन सरकार बनाने के लिए बहुमत के आंकड़े से दूर रह गया है, लेकिन विपक्ष के तौर पर उसकी स्थिति मजबूत हुई है. चूंकि इस गठबंधन में कांग्रेस सबसे ज्यादा सीटें जीतने वाली पार्टी बनी है, इसलिए माना जा रहा है कि लोकसभा में विपक्ष का नेता राहुल गांधी को चुना जा सकता है. लीडर ऑफ अपोजिशन का यह पद बेहद महत्वपूर्ण होता है और इस पर काबिज सांसद को कई सुविधाएं भी मिलती हैं. 

कैबिनेट मंत्री का होगा रुतबा
लोकसभा में विपक्ष के नेता का पद पिछली 2 बार से खाली पड़ा है. क्योंकि विपक्षी दल के पास इसे भरने के लिए जरूरी सीटें नहीं थीं. अब स्थिति पूरी तरह से बदल गई है, इसलिए इस पद पर राहुल गांधी को बैठाने की मांग जोर पकड़ रही है. लीडर ऑफ अपोजिशन कैबिनेट स्तर का पद है. शुरुआत में यह कोई औपचारिक पद नहीं था. 1969 में विपक्ष के नेता पर आधिकारिक सहमति बनी और उसके अधिकार तय हुए. इस पद पर बैठे व्यक्ति का रुतबा कैबिनेट मंत्री से कम नहीं होता. उसे कैबिनेट मंत्री के बराबर ही वेतन, भत्ते और बाकी सुविधाएं मिलती हैं. यानी राहुल गांधी यदि विपक्ष के नेता चुने जाते हैं, तो उन्हें मोदी सरकार के मंत्री जैसी ही सुविधाएं मिलेंगी.

अब नियम नहीं आएगा आड़े
लीडर ऑफ अपोजिशन सदन में केवल विपक्ष का चेहरा ही नहीं होता, बल्कि कई अहम समितियों का सदस्य भी होता है. ये समितियां कई केंद्रीय एजेंसियों, जैसे कि ED, CBI, सेंट्रल इंफॉर्मेशन कमीशन और सेंट्रल विजिलेंस कमीशन के प्रमुखों को चुनने का काम करती हैं. इसका मतलब ये हुआ कि विपक्ष के नेता के रूप में राहुल इन एजेंसियों के चीफ के चुनाव में भी भूमिका निभाएंगे. 2014 के बाद से यह महत्वपूर्ण पद खाली पड़ा है. उस समय हुए चुनाव में कांग्रेस को महज 44 सीटें मिली थीं. जबकि पिछले चुनाव में कांग्रेस के पास 52 सीटें आई थीं. नियम के अनुसार, विपक्ष का नेता बनने के लिए किसी पार्टी के पास लोकसभा में 10% सीटें यानी 54 सीटें होनी ही चाहिए. इस बार कांग्रेस की सीटों का आंकड़ा बढ़कर 99 हो गया है. इसलिए विपक्ष के नेता का पद हासिल करने में नियम आड़े नहीं आएगा.

सीधे PM से कर पाएंगे सवाल
राहुल गांधी ने 2004 में राजनीति में एंट्री ली थी. उन्होंने अब तक किसी भी संवैधानिक पद पर काम नहीं किया है. जब उनकी पार्टी सत्ता में थी, तब भी उन्होंने कोई संवैधानिक पद ग्रहण नहीं किया. 2019 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की हार के बाद राहुल ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था. पिछले साल उन्हें मानहानि के मामले में संसद से निष्कासित कर दिया गया था. प्रधानमंत्री के उपनाम का मजाक उड़ाने को लेकर उन्हें सजा सुनाई गई थी, लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट से उन्हें राहत मिली और उनकी सांसदी भी वापस मिल गई. इस लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के प्रदर्शन ने राहुल गांधी की क्षमता पर उठते सवालों पर विराम लगा दिया है. यदि विपक्ष के नेता के रूप में राहुल के नाम सहमति बनती है, तो सीधे पीएम मोदी से सवाल करने की भूमिका में आ जाएंगे. 


बड़ा सवाल: क्यों सूख रहा दिल्ली का गला, आखिर कैसे पैदा हुए बेंगलुरु जैसे हालात?

राजधानी दिल्ली जल संकट का सामना कर रही है. पानी की बर्बादी रोकने के लिए कड़े नियम बनाए गए हैं.

Last Modified:
Friday, 31 May, 2024
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धधकती आग का अहसास दिलाने वाली गर्मी के बीच दिल्ली का गला सूख रहा है. राजधानी में पानी की किल्लत (Delhi Water Crisis) विकराल रूप धारण करती जा रही है. दिल्ली सरकार ने पानी की बर्बादी रोकने के लिए कड़ी नियम लागू कर दिए हैं. साथ ही सुप्रीम कोर्ट का भी दरवाजा खटखटाया है. दिल्ली के कई इलाकों में पारा पहले ही 50 डिग्री सेल्सियस को पार कर गया. ऐसे में पानी की किल्लत ने लोगों की परेशानियों में इजाफा कर दिया है. चलिए समझने की कोशिश करते हैं कि आखिर दिल्ली की बेंगलुरु वाली स्थिति हुई कैसे?

टैंकर देखते ही लगती है दौड़
इसी साल मार्च में कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु से भीषण जल संकट की खबर सामने आई थी. शहर के कई इलाके पूरी तरह से वॉटर टैंकर्स पर निर्भर हो गए थे और टैंकर ऑपरेटरों ने इस आपदा को अवसर मान लिया था. 1000 लीटर पानी के टैंकर की कीमत पहले 600-800 रुपए के बीच थी, लेकिन मार्च में बढ़कर 2000 रुपए से ज्‍यादा हो गई थी. अब करीब दो महीने बाद देश की राजधानी दिल्ली से ऐसी खबरें आ रही हैं. पानी के टैंकर देखते ही लोग उसके पीछे दौड़ पड़ते है. लगातार बिगड़ते हालात देखकर केजरीवाल सरकार के भी हाथ-पांव फूल गए हैं.

इस वजह से बिगड़े हालात
दिल्ली में जल संकट कोई नई समस्या नहीं है, लेकिन इस बार स्थिति ज्यादा खराब दिखाई दे रही है. क्योंकि गर्मी इस बार सभी रिकॉर्ड तोड़ने पर अमादा है. गर्मी के चलते पानी की डिमांड बढ़ गई है. दिल्ली में जलापूर्ति पहले से ही कम है, ऐसे में बढ़ती डिमांड ने संकट बढ़ा दिया है. दिल्ली का अपना कोई जल स्रोत नहीं है. इसका मतलब है कि राजधानी पानी के लिए पूरी तरह से पड़ोसी राज्यों पर निर्भर है. गर्मी केवल दिल्ली ही नहीं देश के अधिकांश हिस्से की परेशानी का कारण बनी हुई है. पानी के खपत सभी प्रभावित हिस्सों में बढ़ी है, इसलिए दिल्ली को ज्यादा पानी नहीं मिल रहा है. दिल्ली जल बोर्ड के अनुसार, 2024 में दिल्ली प्रतिदिन करीब 32.1 करोड़ गैलन पानी का सामना कर रही है.

कहां से होती है सप्लाई?
दिल्ली को हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश से पानी मिलता है. हरियाणा सरकार यमुना नदी से, यूपी सरकार गंगा नदी से और पंजाब सरकार भाखरा नांगल से दिल्ली को पानी सप्लाई करती है. सभी जगह से दिल्ली को प्रतिदिन 96.9 करोड़ गैलन पानी मिलता है, जबकि हर दिन 129 करोड़ गैलन पानी की आवश्यकता. यानी दिल्ली को आवश्यकता से कम पानी मिल रहा है. सरकारी स्तर पर जल संकट से निपटने के पूर्व में भी कई दावे किए गए हैं, लेकिन मौजूदा स्थिति उन दावों की असलियत बयां करने के लिए काफी है. अब केजरीवाल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई है कि वो पड़ोसी राज्यों से दिल्ली को ज्यादा पानी देने का निर्देश दे. सरकार का कहना है कि हरियाणा द्वारा यमुना में कम पानी छोड़ने के चलते हालात बिगड़े हैं. 

देने पड़ सकते हैं ज्यादा दाम 
पानी की किल्लत जहां आम जनता के लिए मुसीबत है. वहीं, कुछ लोगों के लिए मुनाफा कमाने का अवसर बन गई है. जल संकट के चलते प्राइवेट टैंकरों की डिमांड बढ़ जाती है. इसके अलावा, RO का पानी भी महंगा हो जाता है. दिल्ली में बड़े पैमाने पर पानी की बोतलें सप्लाई होती हैं, ऐसे में आने वाले दिनों उनकी कीमतों में उछाल आ सकता है. 2021 में जब पूर्वी और उत्तर-पूर्वी दिल्ली के बड़े हिस्से में जल संकट हुआ था, तब ऐसा ही देखने को मिला था. पानी की 20 लीटर वाली बोतल के दाम दोगुने हो गए थे. 40-50 रुपए में मिलने वाली ये बोतल 80 से 100 रुपए में बिक रही थी. 


4 जून के बाद कितना बदल सकता है बाजार? ये पॉइंट्स दूर कर देंगे आपके मन में उठ रहे हर सवाल

चार जून को आने वाले लोकसभा चुनाव के नतीजे बाजार की चाल निर्धारित करेंगे. यदि नतीजे बाजार की उम्मीद के अनुरूप आते हैं, तो सबकुछ अच्छा रहेगा. अन्यथा मार्केट बड़ी गिरावट से गुजर सकता है.

Last Modified:
Thursday, 30 May, 2024
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लोकसभा चुनाव के नतीजों (Lok Sabha Election Results 2024) की घड़ी नजदीक आ गई है. एक जून को आखिरी चरण का मतदान होना है और 4 जून को पता चल जाएगा कि जनता के मन में क्या है. वैसे तो यह लगभग तय मानकर चला जा रहा है कि मोदी सरकार की वापसी होगी. लेकिन चुनाव भी क्रिकेट की तरह है, जहां आखिरी वक्त पर भी पासा पलट सकता है. इसलिए निवेशक शेयर बाजार में पैसा लगाने के बजाए तस्वीर स्पष्ट होने इंतजार कर रहे हैं. दरअसल, तमाम ब्रोकरेज फर्म और एक्सपर्ट्स यह अनुमान जाता चुके हैं कि अगर चुनावी नतीजे भाजपा के पक्ष में नहीं आते, तो बाजार पूरी तरह बिखर सकता है. इस कारण से निवेशक कोई जोखिम मोल लेने के मूड में नहीं हैं.

लौट सकती है पुरानी स्थिति 
ग्लोबल ब्रोकरेज फर्म यूबीएस (UBS) का कहना है कि अगर लोकसभा चुनाव के नतीजे में BJP की अगुवाई वाले NDA के पक्ष में नहीं रहते, तो इक्विटी बाजार का वैल्यूएशन 2014 से पहले के स्तर तक जा सकता है. राजनीतिक अस्थितरता और नीतियों से प्रभावित होने की आशंका के कारण निवेशकों का भरोसा डगमगा सकता है, जिससे बाजार NDA कल के पहले वाली स्थिति में जा सकता है. UBS का कहना है कि ऐतिहासिक रूप से जब भी चुनाव रिजल्ट के कारण स्टॉक मार्केट में गिरावट आई है, तो उसकी भरपाई के लिए मीडियम से लॉन्ग टर्म तक इंतजार करना पड़ा है. क्योंकि बाजार और कंपनियों को नई सरकार की नीतियों के अनुरूप ढलने में समय लगता है. 

पूरी होगी 400 पार की आशा? 
वहीं, कुछ अन्य ब्रोकरेज फर्म का मानना है कि यदि लोकसभा चुनाव में भाजपा 272 सीटों का आंकड़ा पार नहीं कर पाती, तो बाजार में बड़ी बिकवाली को बढ़ावा मिल सकता है. कहने का मतलब है कि रिकॉर्ड हाई पर पहुंच चुका बाजार धड़ाम से नीचे आ सकता है. बीजेपी ने इस बार 400 पार का नारा दिया है. PM मोदी से लेकर पार्टी के तमाम नेता यह विश्वास जाहिर कर चुके हैं कि उन्हें 400 से ज्यादा सीटें मिलेंगी. हालांकि, राजनीति के अधिकांश जानकारों का मत है कि मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा को 300 से ज्यादा और राजग को 330-340 सीटें मिल सकती हैं.  

इन 3 पॉइंट में समझें क्या हो सकता है

1. यदि चुनाव परिणाम भाजपा की उम्मीद के अनुरूप रहता है और वो सिंगल-पार्टी मैज्योरिटी बरकरार रखती है, तो बाजार में उछाल देखने को मिलेगा. दरअसल, इससे निवेशकों को यह भरोसा रहेगा कि सरकार की सुधार संबंधी नीतियां जारी रहेंगी. खासकर विनिवेश, लैंड बिल और यूनिफॉर्म सिविल कोड जैसे मुद्दों पर बात आगे बढ़ सकती है. इससे फाइनेंशियल मार्केट का सेंटीमेंट पॉजिटिव बना रहेगा.


2. यदि भाजपा बहुमत हासिल नहीं कर पाती, लेकिन नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में NDA की सरकार बनती है, तो बाजार में अस्थिरता का माहौल निर्मित हो सकता है. ब्रोकरेज फर्म फिलिप कैपिटल का मानना है कि ऐसी स्थिति में इक्विटी मार्केट में बड़ी बिकवाली हो सकती है. वहीं, अगर एनडीए बहुमत के आंकड़े तक नहीं पहुंच पाता और किसी भी दल को बहुमत नहीं मिलता तो बाजार में अनिश्चितता काफी ज्यादा बढ़ सकती है. इस स्थिति में मार्केट लगातार बड़ा गोता लगा सकता है.


3. यदि INDIA गठबंधन की सरकार बनती है, तो इससे बाजार में अनिश्चितता की स्थिति उत्पन्न हो सकती है. क्योंकि ऐसा होने पर नीतियों में बदलाव की संभावना बनी रहेगी. निवेशकों को हमेशा यह डर लगा रहेगा कि नई सरकार पुरानी नीतियों को बदल सकती है. बाजार को नई सरकार के अनुरूप ढलने में समय लगता है, लिहाजा सत्ता परिवर्तन की स्थित में कुछ समय तक मार्केट में नरमी का रुख देखने को मिल सकता है. 

गठबंधन सरकार के फायदे और नुकसान

गठबंधन की सरकार बनने पर महंगाई जैसे मुद्दों पर आम जनता को कुछ राहत मिल सकती है. क्योंकि दाम बढ़ाने के लिए सभी सहयोगियों की सहमति आवश्यक हो जाती है. गठबंधन में शामिल पार्टियों को व्यक्तिगत तौर पर भी अपने वोट बैंक की चिंता होती है, ऐसे में महंगाई पर मूक सहमति देकर वह उसके दरकने के जोखिम नहीं उठा सकतीं. 2014 से पहले ऐसा अक्सर देखने को मिलता था. हालांकि, गठबंधन की सरकार का एक नुकसान भी है. सरकार को दबाव में काम करना पड़ता है. आर्थिक सुधारों पर कठोर निर्णय नहीं लेने के चलते राजकोषीय और राजस्व घाटा बढ़ता जाता है, जो लॉन्ग टर्म में बड़ी मुश्किल बन सकता है.
 


गंदा है पर धंधा है, भारत में कितना बड़ा है फ़िक्र को धुएं में उड़ाने का कारोबार?

हाल ही में आई टोबैको कंट्रोल रिपोर्ट बताती है कि टीनेजर गर्ल्स में सिगरेट पीने की लत काफी बढ़ गई है.

Last Modified:
Tuesday, 28 May, 2024
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भारत में 'हर फ़िक्र को धुएं में उड़ाने' वालों की संख्या तेजी से बढ़ रही है. सिगरेट (Cigarette) के कश लगाने वालों में अब लड़कियां भी पीछे नहीं हैं. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की टोबैको कंट्रोल रिपोर्ट बताती है कि टीनेजर गर्ल्स में सिगरेट पीने की लत काफी बढ़ गई है. पिछले 10 साल में इसमें दोगुना वृद्धि हुई है. साल 2009 में सिगरेट पीने वालीं टीनेजर लड़कियों की संख्या 3.8% थी, जो 2019 में बढ़कर 6.2% हो गई. हालांकि, अब भी इस मामले में लड़के लड़कियों से आगे हैं. 

घट रहा है जेंडर गैप  
रिपोर्ट के अनुसार, 10 साल में टीनेजर लड़कों में सिगरेट पीने ललक तेजी से बढ़ी है. इसमें 2.3% का इजाफा देखने को मिला है. यहां गौर करने वाली बात ये है कि सिगरेट पीने वाले एडल्ट पुरुष और महिलाओं की संख्या में कमी आई है. टोबैको के मामले में जेंडर गैप बहुत कम रह गया है. 2019 में 7.4 फीसदी गर्ल्स टोबैको यूजर्स थीं, जबकि इसका सेवन करने वाले लड़कों की 9.4 फीसदी थी. सिगरेट से कई तरह की बीमारियों का खतरा रहता है. इसके बावजूद इसका नशा बढ़ता जा रहा है. 

सबसे ज्यादा लगता है GST
भारत में सिगरेट का कारोबार काफी बड़ा है और इसके आने वाले समय में और बड़ा होने की संभावना है. एक रिपोर्ट बताती है कि देश में सिगरेट का मार्केट साइज 2 लाख करोड़ रुपए से अधिक का है. इसके 2024 से 2028 के बीच 4.49% की एनुअल ग्रोथ रेट से बढ़ने का अनुमान है. देश में सिगरेट के साथ-साथ बीड़ी का भी बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है. खासकर ग्रामीण इलाकों में बीड़ी की खपत अधिक है. बीड़ी का मार्केट साइज करीब 50,000 करोड़ रुपए का है. सिगरेट जैसे तंबाकू उत्पादों पर देश में सबसे ज्यादा टैक्स लगता है. उन्हें 28% GSTके स्लैब में रखा गया है. GST के अलावा, इन पर कंपनसेशन सेस, बेसिक एक्साइज ड्यूटी और NCCD भी लगता है. इस तरह सिगरेट पर कुल 52.7% टैक्स लगता है. इसलिए सिगरेट काफी महंगी पड़ती है. सिगरेट को महंगा बनाने के पीछे उद्देश्य ये है कि लोग इसे कम खरीदेंगे, लेकिन ऐसा होता दिखाई नहीं दे रहा है. 

बैन के बावजूद बढ़ रहा चलन
बीते कुछ समय से देश में ई-सिगरेट का चलन भी जोर पकड़ रहा है. वैसे तो सरकार ने कुछ साल पहले इस पर बैन लगा दिया था, लेकिन इसके बावजूद कुछ ऑनलाइन स्टोर्स और लोकल वेंडर्स के माध्यम से यह उपलब्ध हो जाती है. 2019 में जब इस पर बैन लगाया गया था, तब देश में ई-सिगरेट के 460 ब्रांड मौजूद थे, जो 7,700 से भी ज्यादा फ्लेवर की ई-सिगरेट ऑफर कर रहे थे. हाल ही में UGC ने सभी यूनिवर्सिटी और कॉलेजों के समक्ष यह सवाल उठाते हुए पत्र लिखा था कि बैन के बावजूद ई-सिगरेट और ऐसे अन्य प्रोडक्ट्स छात्रों को आसानी से कैसे मिल जाते हैं? UGC ने उच्च शिक्षा संस्थानों को स्पेशल ड्राइव चलाकर औचक निरीक्षण करने को भी कहा था.  

कौनसी कंपनी है नंबर 1? 
भारत में कई कंपनियां सिगरेट बनाती हैं, लेकिन इस मामले में नंबर 1 है ITC. कंपनी को अपने सिगरेट कारोबार से तकरीबन हर साल बड़ा मुनाफा होता है. ITC के कई सिगरेट ब्रैंड हैं, जिनमें Wills Navy Cut, Gold Flake, Insignia, India Kings, Classic, American Club, Players, Scissors, Capstan, Berkel, Flake, Silk Cut और Duke & Royal प्रमुख हैं. देश की दूसरी बड़ी सिगरेट कंपनी VST Industrie है. वहीं, Godfrey Phillips ने 1936 में भारत में कदम रखा था. 1968 में इस कंपनी को Modi Enterprises ने खरीद लिया. इस कंपनी के Marlboro, Four Square, Cavanders, Red & White, Stellar, North Pole & Tipper जैसे मशहूर सिगरेट ब्रैंड हैं. इसी तरह, Dalmia Group और NTC industries भी सिगरेट के कारोबार में हैं. 


Iran के राष्ट्रपति की मौत ने क्यों बढ़ाई दुनिया की टेंशन, कितने बिगड़ सकते हैं हालात? 

ईरान और इजरायल कुछ वक्त पहले युद्ध की दहलीज पर पहुंच गए थे. अब वो आशंका फिर से उत्पन्न हो गई है.

Last Modified:
Monday, 20 May, 2024
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ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी (Ebrahim Raisi) की तलाश आखिरकार खत्म हो गई है. हालांकि, तलाश जिस मोड़ पर आकर खत्म हुई है, वैसी उम्मीद किसी ने नहीं की थी. सरकारी न्यूज एजेंसी IRNA ने 63 वर्षीय रईसी के निधन की पुष्टि कर दी है. इब्राहिम रईसी का हेलिकॉप्टर रविवार शाम दुर्घटनाग्रस्त हो गया था, तभी से उनकी तलाश की जा रही थी. इस हादसे में ईरान विदेश मंत्री होसैन अमीराब्दुल्लाहियन सहित हेलिकॉप्टर में सवार सभी 9 लोगों की मौत हो गई है. इस घटना ने पूरी दुनिया को टेंशन में डाल दिया है, जो कुछ वक्त पहले ही ईरान-इजरायल के बीच युद्ध (Iran-Israel War) की आशंका से बाहर निकली है. 

ईरान के दुख से इजरायल खुश
इब्राहिम रईसी का हेलिकॉप्टर कैसे क्रैश हुआ, यह जांच में स्पष्ट हो जाएगा. लेकिन जिस तरह से इजरायल के धर्मगुरुओं ने रईसी के निधन पर खुशी जाहिर की है, उससे दोनों मुल्कों के बीच विवाद गहराने की आशंका है. इजरायल के धर्मगुरुओं ने दुर्घटना को ईश्वर का न्याय बताया है. रब्बी मीर अबुतबुल ने एक फेसबुक पोस्ट में रईसी को 'तेहरान का जल्लाद' बताते लिखा है - यह यहूदियों को फांसी देना चाहता था, इसलिए ईश्वर ने उन्हें और उनके पूरे इजरायल विरोधी दल को हेलीकॉप्टर दुर्घटना में नष्ट कर दिया. ये हादसा ईश्वर की सजा का एक रूप है. इसी तरह एक अन्य रब्बी यित्जचक बत्जरी ने लिखा है - दुष्ट हेलिकॉप्टर हादसे का शिकार हो गया.

ट्रेंड कर रहा है #Mossad 
इजरायल और ईरान हाल ही में युद्ध की दहलीज पर पहुंच गए थे. हालांकि, किसी तरह बार संभली और दुनिया इस खौफ से बाहर आई. दोनों मुल्क एक -दूसरे के कट्टर दुश्मन रहे हैं. इब्राहिम रईसी की मौत के बाद ट्विटर पर #Mossad ट्रेंड कर रहा है. मोसाद इजरायल की एजेंसी है, जिसके बारे में मशहूर है कि वो अपने दुश्मनों को खोज-खोजकर मारती है. चूंकि दोनों देश एक-दूसरे के खून के प्यासे रहे हैं, इसलिए रईसी की मौत में इजरायल वाले एंगल से फिलहाल तो इनकार नहीं किया जा सकता. यदि ईरान की जांच में ऐसा कुछ भी सामने आता है, जो इजरायल या उसके सहयोगियों की तरफ इशारा करता है, तो फिर हालात नियंत्रण से बाहर हो सकते हैं. 

इतिहास में दर्ज हैं घटनाएं
ईरान के राष्ट्रपति जिस हेलिकॉप्टर में सवार थे, वो अमेरिका में बना बेल 212 है. दो ब्लेड वाले इस मीडियम साइज हेलिकॉप्टर में पायलट सहित 15 लोग बैठ सकते हैं. अमेरिका का झुकाव इजरायल की तरफ रहा है, इसलिए ईरान के लिए वो भी एक दुश्मन की तरह है. ईरान ने अपना सर्वोच्च लीडर खोया है, जाहिर है ऐसे में वह हर एंगल की बारीकी से जांच करेगा. वैसे भी इतिहास में कई ऐसी घटनाएं दर्ज हैं, जब अपने दुश्मनों को ठिकाने लगाने के लिए बड़ी साजिशें रची गई हैं. रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के दुश्मन येवगेनी प्रिगोझिन की विमान दुर्घटना में मौत को भी इसी नजरिये से देखे जाता है. 

इस तरह बिगड़ सकते हैं हालात 
अब सवाल यह है कि अगर ईरान और इजरायल फिर से आमने-सामने आते हैं, तो क्या ये केवल दो देशों का युद्ध रहेगा? इसका जवाब है 'नहीं'. ईरान और इजरायल में युद्ध का मतलब होगा दुनिया का दो हिस्सों में बंट जाना. इराक, सीरिया, लेबनान, तुर्किए, कतर, जॉर्डन आदि मुस्लिम ईरान का साथ दे सकते हैं. जबकि अमेरिका-ब्रिटेन और उनके सहयोगी देश इजरायल के साथ हैं. इस युद्ध में रूस की भी एंट्री हो सकती है. रूस पहले से ही ईरान का सैन्य सहयोगी रहा है. यूक्रेन युद्ध के चलते अमेरिका सहित अन्य यूरोपीय एवं पश्चिमी देशों से रूस की ठनी हुई है. इसलिए उसके ईरान के पाले में जाने की संभावना काफी ज्यादा है. यह भी संभव है कि रूस अपने मित्र देश चीन और उत्तर कोरिया को भी ईरान के पक्ष में लामबंद कर ले. वैसे, पाकिस्तान और सऊदी अरब ईरान को पसंद नहीं करते, लेकिन इनके बारे में कुछ साफ-साफ नहीं कहा जा सकता. भारत हमेशा की तरह इस मामले में तटस्थ भूमिका निभा सकता है.

भारत पर ऐसे पड़ सकता है असर
अगर हालत बिगड़ते हैं, तो पूरी दुनिया में तेल की कीमतों पर गंभीर असर पड़ सकता है. जैसे-जैसे संघर्ष का दायरा बढ़ेगा, दुनिया के कई देशों की अर्थव्यवस्थाएं प्रभावित होना शुरू हो जाएंगी. तेल की कीमतों में आग से महंगाई भड़क जाएगी. दुनिया को ऊर्जा और खाद्य संकट का सामना करना पड़ सकता है. भारत की बात करें, तो उसके ईरान और इजरायल देशों के साथ व्यापारिक संबंध हैं, संघर्ष की स्थिति में उनका प्रभावित होना लाजमी है. ईरान के साथ हमारे व्यापार में भले ही पहले के मुकाबले कुछ कमी आई है, लेकिन व्यापारिक रिश्ते कायम हैं और उनके प्रभावित होने से आर्थिक नुकसान उठाना पड़ेगा. जबकि एशिया में इजरायल के लिए भारत तीसरा सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर है. भारत के कुल व्यापारिक निर्यात में इजरायल की हिस्सेदारी 1.8% है.


Explainer: सोने का निखार तो समझ आता है, लेकिन चांदी क्यों दिखा रही है भाव?

चांदी की कीमत में आज तेजी देखने को मिली है. इसी के साथ यह अपने ऑल टाइम हाई पर पहुंच गई है.

Last Modified:
Friday, 17 May, 2024
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सोना (Gold) जहां आज कुछ सस्ता हुआ है. वहीं, चांदी (Silver) में उछाल देखने को मिला है. इंडिया बुलियन एंड ज्वेलर्स एसोसिएशन (IBJA) के मुताबिक, आज कारोबार के दौरान सोना 51 रुपए सस्ता होकर 73,387 रुपए प्रति 10 ग्राम पहुंच गया है. जबकि चांदी ने अपना ऑल टाइम हाई रिकॉर्ड बनाया है. चांदी 41 रुपए महंगी होकर 86,271 रुपए प्रति किलो ग्राम पर पहुंच गई है. सोने के ऑल टाइम हाई की बात करें, तो यह 73,596 रुपए का है, जो उसने 19 अप्रैल को बनाया था. 

एक लाख के पार जाएगी कीमत!
सोना जब महंगा होता है, तो लोगों को ज्यादा आश्चर्य नहीं होता. क्योंकि सब जानते हैं कि इसे सबसे सुरक्षित और अच्छा निवेश विकल्प माना जाता है. दुनिया में जब भी कोई हलचल होती है, सोना खरीदने वालों की संख्या बढ़ जाती है. लेकिन चांदी की कीमतें जितनी तेजी से भागी हैं, वो किसी को समझ नहीं आ रहा है. इसी साल 1 जनवरी को चांदी 73,339 रुपए प्रति किलोग्राम के मूल्य पर मिल रही था और 17 मई को इसका भाव 86,271 रुपए है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि आने वाले दिनों में चांदी के भाव बढ़ सकते हैं और अगले साल तक यह 1 लाख रुपए प्रति किलोग्राम तक पहुंच सकती है.

सोने से कैसे अलग है चांदी?
चलिए जानने की कोशिश करते हैं कि आखिर चांदी की कीमतों में आग क्यों लगी है. निवेश और ज्वैलरी के अलावा सोने का इसका दूसरा कोई इस्तेमाल नहीं है, लेकिन चांदी का काफी जगह इस्तेमाल होता है. चांदी के अपने कुछ यूनिक इंडस्ट्रियल गुण हैं, जो उसे सोने से अलग बनाते हैं. इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन में चांदी बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होती है. जब इस प्रोडक्शन में तेजी आती है, तो चांदी की डिमांड अपने आप बढ़ जाती है और डिमांड के साथ उसकी कीमतें भी. आमतौर पर सिल्वर के चढ़ते भाव को बेहतर होती अर्थव्यवस्था के संकेत के तौर पर भी देखा जाता है. क्योंकि जब इकोनॉमी मजबूत होगी तभी आर्थिक गतिविधियां चरम पर होंगी और चांदी का इस्तेमाल बढ़ेगा. 

यहां होता है इस्तेमाल
चांदी का इस्तेमाल आभूषण के अलावा दवाएं, मोबाइल, लैपटॉप, TV सहित अन्य घरेलू उपकरण में होता है. इसके अलावा इलेक्ट्रिक स्विच, वाहनों में लगने वाली चिप, खाद्य पदार्थों के लिए वर्क, सौर ऊर्जा पैनल, बर्तन और कलाकृति बनाने में भी इसका उपयोग किया जाता है. विशेषज्ञों का कहना है कि चांदी की ज्यादातर मांग औद्योगिक क्षेत्र से जुड़ी होती है. ऐसे में इसकी मांग में तेजी का सीधा मतलब है कि कारोबारी गतिविधियों में तेजी आई है. जाहिर है जब डिमांड बढ़ेगी तो कीमतों में भी इजाफा होगा. एक्सपर्ट्स का कहना है कि सोलर पैनल और इलेक्ट्रिक वाहन के निर्माण में चांदी का काफी इस्तेमाल होता है. यहां से चांदी की अच्छी मांग देखने को मिल रही है. चांदी की औद्योगिक मांग भी बढ़ रही है. यह बढ़ी हुई मांग ही कीमतों को ऊपर ले जा रही है. 

मोबाइल में कितनी चांदी?
मोबाइल इंडस्ट्री में भी चांदी का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है. एक रिपोर्ट बताती है कि सामान्य आईफोन में 0.34 ग्राम चांदी होती है. जबकि एंड्रॉयड मोबाइल में इसकी मात्रा 0.50 से 0.90 ग्राम तक होती है. दरअसल, मोबाइल फोन में इलेक्ट्रिसिटी कनेक्शंस के लिए एक सर्किट बोर्ड होता है, जिसे चांदी से तैयार किया जाता है. इसके अलावा, टॉर्च, ओवन, माइक्रोवव जैसे दूसरे इले​क्ट्रिक आइटम्स में भी चांदी का इस्तेमाल किया जाता है. बता दें कि भारत में मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग में लगातार इजाफा हो रहा है. खासकर Apple के आने से मैन्युफैक्चरिंग में तेजी से बढ़ोतरी हुई है. 


यूपी के बंटवारे की माया की इच्छा यदि पूरी हुई, तो कितना बदल जाएगा उत्तर प्रदेश?

मायावती ने लोकसभा चुनाव के बीच एक बार फिर से अवध और पश्चिम उत्तर प्रदेश को अलग राज्य बनाने का मुद्दा छेड़ा है.

Last Modified:
Tuesday, 14 May, 2024
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बहुजन समाजवादी पार्टी (BSP) प्रमुख मायावती (Mayawati) ने लोकसभा चुनाव के बीच अवध और पश्चिम उत्तर प्रदेश को अलग प्रदेश बनाने का मुद्दा फिर से छेड़ दिया है. मायावती का कहना है कि यदि केंद्र में उनकी सरकार आती है, तो उत्तर प्रदेश का बंटवारा करके अवध को अलग प्रदेश बनाएंगे. हाल ही में बसपा प्रत्याशियों के समर्थन में जनसभा को संबोधित करते हुए माया ने कहा था कि अवध को अलग राज्य बनाने की मांग लंबे समय से की जा रही है. जब केंद्र में हमारी पार्टी सत्ता में आएगी तो अवध क्षेत्र को अलग से राज्य बनाया जाएगा. 

क्या था मायवती के प्रस्ताव में?  
ऐसा नहीं है कि मायावती को लोकसभा चुनाव के बीच अचानक यह मुद्दा याद आ गया. जब वह उत्तर प्रदेश की सत्ता में थीं, तब भी उन्होंने यह कोशिश की थी. नवंबर 2011 में मायावती की तत्कालीन सरकार ने उत्तर प्रदेश को चार राज्यों - पूर्वांचल, पश्चिम प्रदेश, अवध प्रदेश और बुन्देलखंड में बांटने का विधेयक पारित किया था. हालांकि, केंद्र की तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने उनकी यह हसरत पूरी नहीं होने दी. केंद्र सरकार ने कई स्पष्टीकरण मांगते हुए प्रस्ताव को राज्य सरकार के पास वापस भेज दिया था. मायावती ने अपने कार्यकाल में यूपी में बड़े स्तर पर जगह, संस्थानों के नाम बदले थे. उदाहरण के तौर पर हाथरस को महामाया नगर बनाया गया और आगरा स्टेडियम को एकलव्य स्पोर्ट्स स्टेडियम.  

कौनसे जिले हैं अवध का हिस्सा?
इस मुद्दे पर आगे बढ़ने से पहले यह जान लेते हैं कि अवध क्या है और इसमें कौनसे जिले आते हैं. अवध उत्तर प्रदेश का एक भाग है, जिसे पूर्व में कौशल कहा जाता था. पहले इसकी राजधानी अयोध्या हुआ करती थी, लेकिन बाद में अवध की राजधानी लखनऊ को बनाया गया. अवध उर्दू कविता का भी प्रमुख केंद्र रहा है. अवध में 25 जिले आते हैं. उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के साथ-साथ सुल्तानपुर, रायबरेली, उन्नाव, कानपुर, भदोही, प्रयागराज, बाराबंकी, अयोध्या, अंबेडकर नगर, प्रतापगढ़, बहराईच, बलरामपुर, गोंडा, हरदोई, लखीमपुर खीरी, कौशांबी, सीतापुर, श्रावस्ती, फतेहपुर, जौनपुर(पश्चिमी हिस्सा), मिर्जापुर(पश्चिमी हिस्सा), कन्नौज, पीलीभीत, शाहजहांपुर इसी का हिस्सा हैं.

समर्थन में दिया था ये तर्क 
यूपी को बांटने की मायावती की मांग का दूसरे दल विरोध करते रहे हैं, लेकिन कुछ समय पहले BJP लीडर डॉ. संजीव बालियान ने पश्चिम उत्तर प्रदेश को अलग प्रदेश बनाने के माया के प्रस्ताव को उचित बताया था. उन्होंने तर्क दिया था कि छोटे प्रदेश विकास की सीढ़ियां तेजी से चढ़ते हैं, इसलिए यूपी का बंटवारा करके पश्चिम यूपी को अलग प्रदेश बनाया जाना चाहिए. उन्होंने मेरठ को पश्च‍िमी यूपी की राजधानी बनाने की वकालत की थी. मायावती के अलावा राष्ट्रीय लोकदल (RLD) भी पश्चिमी यूपी को अलग राज्य बनाने की मांग कर चुकी है. इसी तरह, राजा बुंदेला भी बुंदेलखंड को अलग करने की मांगे भी उठाते रहे हैं. इस बार के लोकसभा चुनाव में मायावती ने यूपी के बंटवारे की अपनी मांगों को दोहराया है. 

कितना बड़ा है पश्चिम यूपी?
माया जिस पश्चिम यूपी को अलग प्रदेश बनाना चाहती हैं, उसमें 18 जिले शामिल हैं. मेरठ, मुजफ्फरनगर, बागपत, शामली, बिजनौर, गाजियाबाद, हापुड, बुलंदशहर, अलीगढ़, हाथरस, मथुरा, आगरा और मुरादाबाद पश्चिम उत्तर प्रदेश में आते हैं. राज्य की कुल 403 विधानसभा सीटों में से 95 पश्चिम यूपी में हैं. उत्तर प्रदेश को पहले दो भागों में विभाजित किया गया था, जिससे उतराखंड का जन्म हुआ. उसके बाद से इसे कुछ और टुकड़ों में बांटने की मांग उठती रही है. मायावती ने इस लोकसभा चुनाव में फिर से उन मांगों को हवा दे दी है. हालांकि, इसकी संभावना लगभग न के बराबर है कि मायावती को चुनाव में इसका कोई फायदा मिलेगा. क्योंकि लोगों को भी अच्छे से समझ आ गया है कि इन मांगों का जिक्र केवल चुनावी मौसम में ही होता है.

क्या बंटवारे से मिलेगा कोई लाभ? 
अब सवाल ये उठता है कि आखिर मायावती या दूसरे नेता उत्तर प्रदेश के बंटवारे की मांग क्यों करते रहे हैं? इसका पहला जवाब यह है कि इससे यूपी पर शासन करना आसान हो जाएगा और बसपा जैसी सियासी पार्टियों के सत्ता में आने की संभावना बढ़ जाएगी. हालांकि, कई जानकार यह भी मानते हैं कि छोटे राज्यों को बेहतर ढंग से चलाया जा सकता है. उनके अनुसार, उत्तर प्रदेश पर आबादी का बोझ काफी ज्यादा है. 2011 में उत्तर प्रदेश की जनसंख्या 19 करोड़ से अधिक थी. जबकि साल 2021 में जनसंख्या का आंकड़ा 23,15,0278 पहुंच गया. यदि प्रदेश को कुछ भागों में बांटा जाता है, तो आबादी का भी विभाजन हो जाएगा और ऐसे में व्यवस्थाओं को ज्यादा बेहतर ढंग से लागू किया जा सकेगा.  

किताब में है इस बात का जिक्र 
एक रिपोर्ट के अनुसार, भीम राव आंबेडकर ने अपनी एक किताब में छोटे राज्यों के गठन का जिक्र किया था. यह किताब एक तरह से देश भर में भाषायी आधार पर राज्यों के बंटवारे की मांग के जवाब में लिखी गई थी. इसमें उन्होंने लिखा था कि एक राज्य की आबादी 2 करोड़ हो सकती है. जबकि यूपी की आबादी 23 करोड़ से ज्यादा पहुंच गई है. कुछ एक्सपर्ट्स मानते हैं कि सीमित जनसंख्या की बेहतरी के प्रयास ज्यादा अच्छे से हो सकते हैं. उनकी शिक्षा, बुनियादी सुविधाओं पर सरकार ज्यादा ध्यान दे सकती है. हालांकि, इसका विरोध करने वालों की भी कमी नहीं है. उनका तर्क है कि यदि इसी आधार पर राज्यों को बांटते चले गए, तो भारत की स्थिति भी कुछ यूरोपीय देशों जैसी हो जाएगी जो छोटे-छोटे हिस्सों में विभाजित हैं. 

क्या है बंटवारे की प्रक्रिया?
आइए अब यह भी जान लेते हैं कि राज्य के बंटवारे की प्रक्रिया क्या होती है. इसके लिए सबसे पहले, संबंधित राज्य के विधानमंडल को एक प्रस्ताव पारित करना होता है. इसके बाद प्रस्ताव केंद्र सरकार के पास भेजा जाता है. हालांकि, संसद राष्ट्रपति के निर्देश पर स्वत: संज्ञान लेकर भी इस मुद्दे को उठा सकती है. केंद्र सरकार के पास पहुंचने के बाद गृह मंत्रालय प्रस्ताव की जांच करता है. इसके बाद प्रस्ताव को कानून मंत्रालय को भेजा जाता है. कानून मंत्रालय इस पर विचार करके इसे कैबिनेट के पास भेज देता है. संसद के दोनों सदन - राज्य सभा और लोकसभा में रखने से पहले केंद्रीय कैबिनेट को इसे मंजूरी देनी होती है. राज्यसभा और लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत के साथ प्रस्ताव का पारित होना ज़रूरी है. यह प्रक्रिया पूरी होने के बाद नए राज्य के भौतिक गठन की प्रक्रिया पर काम किया जाता है.


HNG Insolvency: जस्टिस नरीमन ने कहा कानून के विपरित है AGI रिज्युलेशन प्लान

COC ने CCI की मंजूरी से पहले AGI ग्रीनपैक की समाधान योजना को मंजूरी दे दी, जो दिवाला दिवालियापन संहिता के अनुसार अनिवार्य है.

Last Modified:
Saturday, 11 May, 2024
BWHindia

पलक शाह
 

भारत के सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश व वाणिज्यिक विवादों, दिवालियापन और मध्यस्थता से संबंधित मामलों के एक विशेषज्ञ जस्टिस रोहिंटन फली नरीमन ने कहा है कि हिंदुस्तान नेशनल ग्लास (HNG) के अधिग्रहण के लिए AGI ग्रीनपैक की समाधान योजना कानून के विपरीत है. नरीमन सर्वोच्च न्यायालय के तीसरे न्यायाधीश हैं जिन्होंने अपनी राय में दिवालियापन कार्यवाही के दुरुपयोग को उजागर किया है. उनसे पहले, न्यायमूर्ति ए.के. सीकरी और न्यायमूर्ति एन.वी. रमना, दो सेवानिवृत्त सर्वोच्च न्यायालय न्यायाधीशों ने भी मामले में कदाचार (Malpractice) को उजागर किया था.

कानून के विपरित दी गई मंजूरी

जस्टिस नरीमन ने इस मामले पर अपनी राय देते हुए कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि COC और न्यायाधिकरण द्वारा AGI की समाधान योजना को मंजूरी देना कानून के विपरीत होगा, क्योंकि यह स्पष्ट है कि AGI को 28 अक्टूबर, 2022 को सफल समाधान आवेदक (Successful Resolution Applicant) घोषित किया गया था, जबकि आयोग (Competition Commission of India) से सशर्त मंजूरी 15 मार्च, 2023 को ही प्राप्त हुई थी.

COC ने CCI की मंजूरी के बिना दी मंजूरी

HNG CIRP में सबसे बड़ा विवाद यह है कि Edelweiss ARC के साथ बैंकों के एक संघ के नेतृत्व में COC ने आरपी जुनेजा द्वारा मतदान के लिए रखी गई एजीआई ग्रीनपैक (AGI Greenpac) की समाधान योजना को मंजूरी दे दी, भले ही इसमें भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) से पूर्व अप्रूवल नहीं था, चूंकि HNG और एजीआई ग्रीनपैक (AGI Greenpac) दोनों भारत में कंटेनर ग्लास निर्माण के एक ही व्यवसाय में हैं, इसलिए उनके संयोजन के लिए पूरी तरह से जांच और CCI की पूर्व स्वीकृति की आवश्यकता है. लेकिन RO और COC पर आरोप है कि उन्होंने CCI की मंजूरी मिलने से पहले ही AGI की योजना को मंजूरी दे दी थी.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ दी मंजूरी

सबसे दिलचस्प बात यह है कि COC द्वारा AGI की योजना को मंजूरी दिए जाने के बाद, CCI ने केवल सशर्त मंजूरी दी, जो फिर से सुप्रीम कोर्ट की स्थापित मिसालों और भारत के वर्तमान मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ के फैसलों के खिलाफ है. Ebix Singapore Private Limited और अन्य Educomp Solutions Limited के लेनदारों की समिति में न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति एमआर शाह के फैसले के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने देखा था कि राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (NCLT) द्वारा समाधान योजना को मंजूरी देने के संबंध में शर्तें पेश करने की अनुमति देने से बातचीत का एक अतिरिक्त स्तर शुरू हो जाएगा, जिसकी भारतीय दिवालियापन संहिता (IBC) की योजना के तहत अनुमति नहीं है.

CCI की पूर्व स्वीकृति लेना आवश्यक

न्यायमूर्ति नरीमन के अनुसार, 2018 में IBC के नए प्रावधान से यह स्पष्ट होता है कि जहां समाधान योजना में संयोजन का प्रावधान है, वहां आवेदक को COC द्वारा ऐसे समाधान को मंजूरी देने से पहले CCI की पूर्व स्वीकृति लेनी होगी. न्यायमूर्ति नरीमन ने इसके साथ ही कहा कि यह स्थापित कानून है कि किसी प्रावधान को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए, यदि कानून में ऐसे प्रावधान के उल्लंघन का परिणाम हो. इस प्रावधान के उल्लंघन का स्पष्ट परिणाम यह है कि कानून में कोई समाधान योजना नहीं है क्योंकि समाधान योजना कानून के विपरीत होगी और इसलिए IBC की धाराओं का उल्लंघन करेगी. सीधे शब्दों में कहें तो, उनका कहना है कि अगर CCI की पूर्व स्वीकृति नहीं ली गई, जो इस मामले में अनिवार्य थी, तो AGI के समाधान का उल्लंघन होगा. 

Edelweiss को छोड़कर सभी ने मतदान किया

बोली की शर्तों के अनुसार आरपी जुनेजा ने बोलीदाताओं को ईमेल भेजा था जिसमें कहा गया था कि CCI की पूर्व स्वीकृति आवश्यक होगी. लेकिन जब AGI Greenpac की CCI से पूर्व स्वीकृति के लिए पहली बार की गई अपील खारिज कर दी गई, तो आरपी ने मानदंडों में ढील दी और CCI की मंजूरी न होने के बावजूद COC के समक्ष मतदान की अपनी योजना रखी. Edelweiss को छोड़कर COC के सभी अन्य सदस्यों ने दो बोलीदाताओं के पक्ष में समान रूप से मतदान किया, जिनमें से एक के पास पहले से CCI की मंजूरी थी. बाद में यह पता चला कि Edelweiss Alternative Asset Advisors, जो Edelweiss ARC के समान समूह से संबंधित एक कंपनी है उसने AGI को 1100 करोड़ रुपये के फंडिंग का वादा किया था.

RP के पास कोड के तहत कोई न्यायिक शक्तियां नहीं

जस्टिस नरीमन की राय में 25 अगस्त 2022 को आरपी जुनेजा द्वारा भेजा गया ईमेल स्पष्ट रूप से आईबीसी की धारा 31 (4) के अनिवार्य प्रावधानों के विरुद्ध है. यह आरपी का वही ईमेल है जिसमें उन्होंने बोली लगाने वालों से कहा था कि वे सौदे के लिए सीसीआई से पूर्व स्वीकृति लें. जस्टिस नरीमन ने कहा कि आरपी द्वारा इस बारे में कुछ भी नहीं कहा गया है कि ऐसा प्रावधान निर्देशात्मक क्यों होगा - और किसी भी मामले में यह घोषित करना कि कानून क्या है और छूट प्रदान करना आरपी के अधिकार क्षेत्र से पूरी तरह बाहर है. यह अच्छी तरह से स्थापित है कि आरपी के पास कोड के तहत कोई न्यायिक शक्तियां नहीं हैं.

RP के पास कानून का कोई अधिकार नहीं

क्या RP और COC, CIRP कार्यवाही को निष्पक्ष रूप से तथा IBC की योजना और उद्देश्य और उसके अंतर्गत विनियमों के अनुसार संचालित करने में विफल रहे? इस सवाल के जवाब में जस्टिस नरीमन ने कहा कि हां, आर.पी. के पास कानून के किसी भी अनिवार्य प्रावधान को माफ करने का कोई अधिकार नहीं है. कानून नहीं, बल्कि ऋणदाताओं की व्यावसायिक समझदारी के प्रश्न पर न्यायमूर्ति नरीमन ने कहा कि यह पूरी तरह से COC के विवेक पर निर्भर करता है कि वह किस समाधान योजना को प्राथमिकता देना चाहती है.

क्या है मामला?

HNG भारत की सबसे पुरानी और सबसे बड़ी कंटेनर ग्लास निर्माण कंपनी है जो अब कॉर्पोरेट दिवालियापन समाधान कार्यवाही (CIRP) से गुजर रही है. HNG के लिए AGI की समाधान योजना को ऋणदाताओं की समिति (COC) द्वारा अनुमोदित किया गया था, जब इसे समाधान पेशेवर (RP) गिरीश जुनेजा द्वारा निर्धारित शर्तों के उल्लंघन में वोट के लिए रखा गया था. HNG CIRP कदाचार (Malpractice) के आरोपों से घिरी हुई है और इसके आसपास के विभिन्न विवादों के कारण यह भारत में सबसे लंबे समय तक चलने वाले ऋण समाधानों में से एक है.