PepperTap एक हाइपर लोकल डिलिवरी प्लेटफॉर्म थी, जिसे साल 2014 में दो दोस्तों नवनीत सिंह और मिलिंद शर्मा ने शुरू किया था.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
आजकल राशन ऑर्डर करने के लिए जैसे Blinkit, Dunzo, Zepto जैसे स्टार्टअप हैं, साल 2014 के दौरान एक और कंपनी भी थी, जिसका नाम था PepperTap. 100 मिलियन डॉलर की फंडिंग हासिल करने वाली ये कंपनी सिर्फ दो साल बाद ही बंद हो गई. आखिर PepperTap में ऐसा क्या हुआ जो अपने लॉन्च के सिर्फ 6 महीने में बैठ गई, इसकी गहराई में जाने से पहले जरा कंपनी के बारे में थोड़ा जान लेते हैं.
कैसे आया PepperTap का आइडिया
PepperTap एक हाइपर लोकल डिलिवरी प्लेटफॉर्म थी, जिसे साल 2014 में दो दोस्तों नवनीत सिंह और मिलिंद शर्मा ने शुरू किया था. एक रविवार की बात है जब नवनीत सिंह घर पर बैठे आराम कर रहे थे, तभी उनकी पत्नी ने कहा कि वो उनके साथ घर का राशन लेने के लिए साथ चले. नवनीत शायद मूड में नहीं थे, उन्हें लगा कि क्यों न राशन अपने आप ही घर पर आ जाए और कहीं जाने की जरूरत ही न पड़े. बस यहीं से नवनीत को बिजनेस आइडिया आया. उन्होंने सोचा कि एक ऑनलाइन ग्रोसरी सिस्टम होना चाहिए जहां लोग अपने घर पर बैठकर राशन ऑर्डर कर सकें और राशन उनके घर पर डिलिवर हो जाए.
ये आइडिया उन्होंने अपने दोस्त मिलिंद शर्मा को बताया, दोनों ने एक हाइपर लोकल फूड डिलिवरी प्लेटफॉर्म तैयार किया. जहां पर लोग घर का राशन ऑनलाइन ऑर्डर कर सकते थे, 4 घंटे के अंदर राशन उनके दरवाजे पर होता. इस बिजनेस मॉडल में PepperTap ने ग्रोसरी स्टोर्स के लिये एक एग्रीगेटर का काम किया.
जोरदार मिली फंडिंग
ये आइडिया इतना शानदार था कि PepperTap को फंडिंग भी जमकर मिली. दोनों ने साल 2015 के दौरान फंडिंग के चार राउंड चलाये. इन चार राउंड्स में कंपनी को 51.2 मिलियन डॉलर की फंडिंग मिली. निवेशकों में Sequoia Capital, SAIF Partners, JAFCO Japan, Snapdeal जैसे बड़े नाम थे. इतनी धमाकेदार फंडिंग मिलने के बाद PepperTap को अब खुद को साबित करना था.
2015 के आखिर तक PepperTap 25 शहरों में पहुंच चुकी थी. ये देश की तीसरी सबसे बड़ी ग्रोसरी डिलिवरी सर्विस देने वाली बन चुकी थी, हर रोज करीब 20,000 ऑर्डर डिलिवर कर रही थी. करीब 30-40 परसेंट ऑर्डर उसके ऐप से आ रहे थे. अबतक कंपनी में 2500 लोग काम करने लगे थे. कंपनी ने दिसंबर 2015 में
Jiffstore का भी अधिग्रहण कर लिया, जो कि बैंगलुरू बेस्ड ग्रोसरी डिलिवरी प्लेटफॉर्म थी.
कैसे फेल हुई PepperTap
अबतक सबकुछ ठीक चल रहा था, लेकिन अचानक अप्रैल 2016 में PepperTap ने ऐलान किया कि वो अपना कारोबार बंद कर रहे हैं. उनके इस ऐलान से सभी लोग हैरान थे. कंपनी ने लोगों को निकालना शुरू कर दिया, लेकिन कंपनी रिकवर नहीं हो पाई और अंत में बंद हो गई. कंपनी अचानक से कैसे बंद हो गई ये सवाल सभी के दिमाग में कौंध रहा था. तो चलिए उन कारणों पर नजर डालते हैं जिसकी वजह से PepperTap को अचानक ही अपनी शटर गिराना पड़ा.
फंडिंग के पैसे का इस्तेमाल
PepperTap ने ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए कई तरह के ऑफर्स दिये, फ्री डिलिवरी दी, जो कस्टमर बेस बनाने के लिए जरूरी भी था. उन्होंने अपनी वेबसाइट और ऐप को पॉपुलर बनाने के लिए काफी खर्च किया, लेकिन ये तबतक ही ठीक था जबतक उनके पास फंडिंग का सपोर्ट था. लंबी अवधि में ये मॉडल ज्यादा टिकाऊ नहीं था, ऐसा ही हुआ PepperTap के साथ हुआ, फंडिंग जब कम हुई तो PepperTap की बिजनेस बैठने लगा. कंपनी का डिस्काउंट और ऑफर मॉडल कंपनी की माली हालत पर भारी पड़ने लगा. कंपनी ने ये सोचकर अपने डिस्काउंट और ऑफर भी वापस लिये कि वो अपनी सर्विस के दम पर ग्राहकों को बनाये रखेंगे, लेकिन वो ऐसा करने में सफल नहीं रहे
अपनी इनवेंट्री का नहीं होना
PepperTap की अपनी कोई इनवेंट्री नहीं थी, वो दूसरे ग्रोसरी स्टोर्स की इनवेंट्री पर ही निर्भर थे, और ये उनके नियंत्रण में नहीं था. हालांकि देखने में ये मॉडल काफी किफायती लगता है, लेकिन लंबी अवधि में ज्यादा टिकाऊ नहीं है. PepperTap को दूसरे ग्रोसरी स्टोर्स की इनवेंट्री का जानकारी पर नजर रखनी होती थी.
ये एक बहुत जटिल प्रक्रिया थी, जिसकी वजह से कई ऑर्डर्स कैंसिल होने लगे.
फंडिंग की दिक्कत
साल 2016 स्टार्टअप के लिए बेहद खराब साल रहा, कंपनी की सेल्स गिर रही थी, फंडिंग की दिक्कत से दबाव और बढ़ गया था, जिसे PepperTap झेल नहीं पाया और उसने 2016 में कंपनी को बंद करने का ऐलान कर दिया.
एक्सपर्ट कहते हैं कि हालांकि PepperTap एक बढ़िया आइडिया था, लेकिन उसका बिजनेस मॉडल खराब था, जिसकी वजह से वो टिक नहीं पाया. उसने फंडिंग के पैसे का इस्तेमाल ऑफर्स देने में किया न कि विस्तार में. जिसके चलते कंपनी लंबी अवधि की चुनौतियों को झेल नहीं पाई.
भारत ने कहा है कि पाकिस्तान के साथ 1960 से चले आ रहे जल समझौते का बोझ आगे नहीं ढोएगा, जब तक पाकिस्तान सीमा पार से आतंकवाद को प्रभावी रूप से बंद नहीं कर देता है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में पर्यटकों पर हुए आतंकी हमलों के बाद केंद्र सरकार ने पड़ोसी देश पाकिस्तान के खिलाफ बहुत ही सख्त कदम उठाते हुए सिंधु जल समझौता रोकने का फैसला किया है. प्रधानमंत्री निवास पर बुलाई गई कैबिनेट मामलों की सुरक्षा समिति (CCS) की बैठक में यह फैसला लिया गया. इसके अलावा सरकार ने भारत स्थित पाकिस्तानी दूतावास को भी बंद करने और किसी भी पाकिस्तानी को भारतीय वीजा नहीं देने का फैसला किया है. CCS की बैठक में अटारी बॉर्डर को भी तत्काल प्रभाव से बंद करने का फैसला किया गया है.
क्या है सिंधु जल समझौता?
भारत और पाकिस्तान के बीच बहने वाली नदी सिंधु और उसकी सहायक नदियों के जल बंटवारे के लिए भारत और पाकिस्तान के बीच 19 सितंबर 1960 को एक समझौता हुआ था. इसे ही सिंधु जल समझौता कहा जाता है. यह समझौता विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुआ था और इसका उद्देश्य सिंधु नदी और उसकी सहायक नदियों के जल का दोनों देशों के बीच बंटवारा करना था.
भारत और पाकिस्तान के बीच 9 साल की लंबी बातचीत के बाद 1960 में दोनों पक्षों ने सिंधु जल संधि पर दस्तखत किए थे. 19 सितंबर 1960 को तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति अयूब खान ने कराची में इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. सिंधु नदी प्रणाली में कुल छह नदियाँ शामिल हैं. इनमें सिंधु, सतलज झेलम, चिनाब, रावी और ब्यास शामिल हैं. इस समझौते के तहत भारत सिंधु नदी प्रणाली के पानी का केवल 20% ही इस्तेमाल कर सकता है. बाकी 80% पानी पाकिस्तान को देता है. सिंधु पाकिस्तान की लाइफलाइन कही जाती है.
क्या होगा इसका प्रभाव?
इस समझौते के रोकने से भारत सिंधु नदी का जल प्रवाह पाकिस्तान को रोक देगा, जिससे पाकिस्तान बूंद-बूंद को तरस सकता है. पाकिस्तान के पंजाब सूबे को इससे सबसे ज्यादा लाभ मिलता रहा है. सिंधु नदी अरब सागर तक पाकिस्तान के कई राज्यों से होकर बहती है. इस समझौते के रुकने से सबसे ज्यादा असर पाकिस्तान की खेतीबारी पर पड़ेगा. वहां के खेत सूखे पड़ जाएंगे और फसल उत्पादन ठप हो जाएगा. करीब 21 करोड़ से ज्यादा की पाकिस्तानी आबादी की जल जरूरतें भी इसी सिंधु जल प्रणाली पर निर्भर है. यानी इसके रुकने से पीने के पानी का भी संकट हो जाएगा.
भूख और प्यास दोनों से तड़पेंगे पाकिस्तानी?
करीब 17 लाख एकड़ जमीन, जो पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में है, पानी की कमी से वीरान हो जा सकती है. इससे पाकिस्तान में भयंकर भुखमरी की नौबत आ सकती है. पाकिस्तान पहले से ही आर्थिक संकट झेल रहा है और अन्न संकट की वजह से भुखमरी की मार झेल रहा है. अब भारत के ऐक्शन से उसकी कमर टूट सकती है. यानी मोदी सरकार के इस एक्शन से पाकिस्तान की बड़ी आबादी भूख और प्यास दोनों से तड़प सकती है.
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दुनिया को बड़ा झटका दिया है. ट्रंप ने भारत समेत कई देशों पर टैरिफ लगाने का ऐलान कर दिया है. जिससे भारत के निर्यात पर गहरा असर देखने को मिल सकता है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दुनियाभर के कई देशों पर 49% तक के जवाबी टैरिफ का ऐलान कर दिया है. 'Make America Wealthy Again' इवेंट में उन्होंने Reciprocal Tariffs का ऐलान किया, जिसमें उन्होंने कई बड़ी बातें कहीं. उन्होंने कहा कि 'अब समृद्ध होने की बारी हमारी है. सालों तक, मेहनती अमेरिकी नागरिकों को किनारे बैठने के लिए मजबूर किया गया. अब हम जवाबी टैरिफ लगाएंगे. उन्होंने भारत पर 26% का टैरिफ लगाया है.
हालांकि, इस लिस्ट में ये देखने वाली बात है कि उन्होंने हर देश पर इस लिहाज से टैरिफ नहीं लगाया है, कि वो जितना टैरिफ अमेरिका से वसूल रहे हैं, उतना ही अमेरिका भी लगाएगा. टैरिफ रेट में वैरिएशन है. कई देशों पर जैसे कि भारत, जितना टैरिफ है, उसका आधा ही रेसिप्रोकल टैरिफ लगा है. आइए जानते हैं किन पर दिख सकता है सबसे अधिक असर...
इलेक्ट्रॉनिक्स: खतरे में भारत का अमेरिका को सबसे बड़ा निर्यात
वित्त वर्ष 2024 में अमेरिका को भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात कुल 11.1 बिलियन डॉलर रहा, जो अमेरिका को देश के कुल निर्यात का 14% है. बदले में, अमेरिका भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात का चौंका देने वाला 32 फीसदी हिस्सा है. विश्लेषकों का कहना है कि 9 फीसदी का क्षेत्रीय टैरिफ अंतर इस उद्योग को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है.
रत्न और आभूषण का सेक्टर
रत्न और आभूषण, एक ऐसा क्षेत्र जिसमें भारत ग्लोबली सबसे ऊपर है, जिस पर काफी रिस्क बना हुआ है. इस श्रेणी में भारत के कुल 33 बिलियन डॉलर के निर्यात में अमेरिका का हिस्सा 30 फीसदी (9.9 बिलियन डॉलर) है, जिसमें कटे और पॉलिश किए गए हीरे, जड़े हुए सोने के आभूषण और प्रयोगशाला में तैयार किए गए हीरे शामिल हैं.
फार्मास्यूटिकल्स इंडस्ट्री
भारत अमेरिका के जेनेरिक दवा इंपोर्ट कर 47 फीसदी हिस्सा सप्लाई करता है, जो इसे अमेरिका की स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में एक महत्वपूर्ण भागीदार बनाता है. विश्लेषकों ने कहा कि भारत के जेनेरिक दवा निर्यात का लो वैल्यू-हाई वॉल्यूम नेचर भारतीय फार्मा उत्पादों की लो कॉस्ट को दिखाता है, जो इसे अमेरिका के लिए आकर्षक बनाता है, और इसलिए इसे बदलना मुश्किल है.
ऑटोमोबाइल और ऑटो कंपोनेंट
चूंकि भारत के ऑटो एक्सपोर्ट के लिए अमेरिका एक महत्वपूर्ण निर्यात गंतव्य नहीं है, इसलिए ओईएम पर सीधा प्रभाव सीमित हो सकता है, लेकिन ऑटो कंपोनेंट मेकर्स को जोखिम का सामना करना पड़ सकता है. वित्त वर्ष 24 में भारत के ऑटो कंपोनेंट एक्सपोर्ट में अमेरिका को कुल निर्यात का 27 फीसदी हिस्सा था. सोना कॉमस्टार (उत्तरी अमेरिका से राजस्व का 43 फीसदी) और संवर्धन मदरसन (अमेरिका से 18% राजस्व) जैसे लोकल प्लेयर्स को काफी बड़ा रिस्क है.
टेक्स्टाइल और अपैरल सेक्टर
वित्त वर्ष 2024 में अमेरिका को भारत का टेक्स्टाइल और अपैरल एक्सपोर्ट कुल 9.6 बिलियन डॉलर रहा, जो इंडस्ट्री के कुल एक्सपोर्ट का 28 फीसदी है. इस सेक्टर को बांग्लादेश और वियतनाम जैसे देशों से प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है, जो टैरिफ के कारण भारतीय सामान के महंगे होने पर कॉस्ट बेनिफिट प्राप्त कर सकते हैं.
सेक्टर टैरिफ अंतर सालाना कारोबार
• इलेक्ट्रॉनिक्स और टेलीकॉम 7.24% 14.39 अरब डॉलर
• फार्मा उत्पाद 10.90% 12.72 अरब डॉलर
• सोना, चांदी और आभूषण 3.32% 1.88 अरब डॉलर
• मशीनरी और कंप्यूटर 5.29% 7.10 अरब डॉलर
• रसायन (फार्मा को छोड़कर) 6.05% 5.71 अरब डॉलर
• वस्त्र, यार्न और कालीन 6.59% 2.76 अरब डॉलर
• मछली, मांस और समुद्री भोजन 27.83% 2.58 अरब डॉलर
• अनाज, सब्जियां और मसाले 5.72% 1.91 अरब डॉलर
• सिरेमिक और कांच 8.27% 1.71 अरब डॉलर
• रबर उत्पाद 7.76% 1.06 अरब डॉलर
• प्रोसेस्ड फूड, चीनी और कोको 24.99% 1.03 अरब डॉलर
• डेयरी प्रोडक्ट 38.23% 181.49 मिलियन डॉलर
भारत झटकों को सहने में सक्षम
विशेषज्ञों का आकलन है कि भारत उन्नत और उभरते जी-20 देशों में सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बना रहेगाय एक नई रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी बाजार पर निर्यात को लेकर कम निर्भरता (जीडीपी का मात्र 2 प्रतिशत) भारत को संभावित दुष्प्रभावों से मुकाबला करने में सक्षम बनाती हैं. रेटिंग एजेंसियों ने भी वित्त वर्ष 2025-26 के लिए 6.5 प्रतिशत की वृद्धि का अनुमान लगाया है, जो अन्य देशों के मुकाबले सबसे अधिक है.
3,000 से अधिक महिला उद्यमियों के सर्वेक्षण पर आधारित इस रिपोर्ट में महिलाओं की व्यापारिक सफलता और उनके सामने आने वाली चुनौतियों दोनों को दिखाया गया है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
सरकार वर्कफोर्स में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए लगातार कोशिश कर रही है. वह चाहती है कि जब विकसित भारत 2047 का सपना साकार हो, तो महिलाओं की कार्यबल में अच्छी-खासी हिस्सेदारी हो. इसी चरण में NeoGrowth की NeoInsights स्टडी के 8वें एडिशन में बताया गया कि महिला बिजनेस ओनर्स का असर सिर्फ उनके बिजनेस तक सीमित नहीं है. उनके प्रयासों से निजी आत्मनिर्भरता, परिवार की आर्थिक मजबूती और समाज में प्रेरणा का माहौल बन रहा है.
इस स्टडी में 3,000 से ज्यादा महिला बिजनेस ओनर्स से बातचीत की गई, जो इस तरह का सबसे बड़ा सर्वेक्षण है. रिपोर्ट में उनकी प्रेरणाएं, चुनौतियां और लक्ष्य समझने के साथ-साथ यह भी बताया गया कि वे कई स्तरों पर किस तरह बदलाव ला रही हैं. लगभग 98% उत्तरदाताओं ने कहा कि उनके व्यवसायों के कारण वे खुद और उनके परिवार आर्थिक विकास को बढ़ावा दे रहे हैं. इसके अलावा, 61% ने बताया कि उनके परिवारों का जीवन स्तर बेहतर हुआ है, जबकि 54% ने अपनी आत्म-विश्वास और वित्तीय आत्मनिर्भरता में वृद्धि की बात की.
महिला उद्यमियों ने अपने समुदायों पर भी प्रभाव डाला. 67% महिलाओं ने अन्य महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने में मदद की, 50% ने अपने कर्मचारियों को खुद का व्यवसाय शुरू करने के लिए प्रेरित किया और 47% युवा लड़कियों के लिए शिक्षा जारी रखने की रोल मॉडल बनीं.
NeoGrowth के प्रबंध निदेशक और सीईओ, अरुण नैय्यर ने कहा, "यह देखकर खुशी होती है कि भारत में महिलाएं व्यापार की दुनिया में कदम रख रही हैं और पहले से कहीं ज्यादा समावेशी विकास को बढ़ावा दे रही हैं. महिला संचालित व्यवसाय न केवल आर्थिक मूल्य बना रहे हैं, बल्कि नेतृत्व की परिभाषा भी बदल रहे हैं. वे व्यवस्थित व्यापार प्रबंधन, कार्यस्थल पर सहानुभूति और सकारात्मक कार्य संस्कृति को बढ़ावा दे रही हैं."
70% महिला उद्यमियों ने खुद की प्रेरणा और महत्वाकांक्षा से व्यवसाय शुरू किए
भारत में महिला व्यापार मालिकों की उद्यमीय यात्रा ज्यादातर खुद की प्रेरणा से शुरू हुई. 70% महिलाओं ने अपने व्यवसाय खुद की इच्छाशक्ति और सपनों के कारण शुरू किए, जबकि बाकी महिलाओं को उनके पति या परिवार के सदस्यों ने प्रोत्साहित किया. यह दिखाता है कि महिलाएं अब ज्यादा अवसरों की तलाश में व्यापार कर रही हैं और अपने पेशेवर लक्ष्यों को पूरा कर रही हैं.
भारत में महिलाएं उद्यमिता को आत्मनिर्भरता और आर्थिक स्वतंत्रता का रास्ता मानने लगी हैं. 66% महिलाओं ने अपने करियर के अनुभव, महत्वाकांक्षा और वित्तीय स्वतंत्रता पाने के मकसद से व्यापार शुरू किया. इसके विपरीत, सिर्फ 22% महिलाओं ने आर्थिक मजबूरी में व्यापार शुरू किया 12% ने अपने पारिवारिक व्यवसाय को संभाला.
90% महिलाओं को व्यवसाय से ज्यादा सम्मान और स्वीकार्यता मिली
महिला उद्यमियों को अब पहले से ज्यादा पहचान और सम्मान मिल रहा है. करीब 83% महिलाओं ने कहा कि उनके व्यापार प्रयासों को सराहा और महत्व दिया जा रहा है. खासतौर पर कोलकाता (96%), हैदराबाद (94%) और अहमदाबाद (90%) में महिला उद्यमियों के लिए अनुकूल माहौल देखा गया.
81% महिला उद्यमी स्वतंत्र रूप से चलाती हैं अपना व्यवसाय
81% महिला व्यापार मालिक अपने व्यवसाय को पूरी तरह से खुद चलाती हैं, जबकि बाकी को परिवार और पति का सहयोग भी मिलता है. 40 साल से अधिक उम्र की अनुभवी महिलाएं ज्यादा आत्मनिर्भर हैं, जबकि 21-30 साल की युवा महिला उद्यमी व्यवसाय बढ़ाने के लिए साथियों और परिवार की मदद लेती हैं. इसके अलावा, 72% महिला उद्यमी अपने व्यापार से जुड़े अहम फैसले खुद लेती हैं, जबकि कुछ अन्य परिवार और सहयोगियों के साथ मिलकर निर्णय लेना पसंद करती हैं.
93% महिला उद्यमी दिखाती हैं वित्तीय समझदारी और अनुशासन
महिला उद्यमियों का मानना है कि वित्तीय अनुशासन सफलता की अहम कुंजी है. 93% महिलाएं अपने वित्त को सक्रिय रूप से संभालती हैं. वे समय पर EMI चुकाने, एक साथ कई कर्ज न लेने, सही रिकॉर्ड रखने, सोच-समझकर फैसले लेने और अपने क्रेडिट स्कोर पर नजर रखने जैसी आदतों को अपनाती हैं.
महिला उद्यमी चुनौतियों को पार कर बढ़ रही हैं आगे
भारत में महिला उद्यमियों को लिंग भेदभाव (27%), बाजार में उतार-चढ़ाव (34%), और संसाधनों की कमी (32%) जैसी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. फिर भी, वे नई सोच, दृढ़ संकल्प और मेहनत से अपने व्यवसाय को आगे बढ़ा रही हैं. कई महिला उद्यमी खुद की महत्वाकांक्षा से व्यापार शुरू करती हैं, और आर्थिक व संचालन से जुड़ी कठिनाइयों के बावजूद सफलता पाने और अपने व्यवसाय को बढ़ाने के लिए सक्रिय कदम उठाती हैं.
90% महिला उद्यमी अपने व्यवसाय के विकास के लिए अपना रही हैं टेक्नोलॉजी
महिला उद्यमियों के लिए तकनीक एक बड़ी मदद बन रही है, जिससे वे तमाम चुनौतियों के बावजूद अपने व्यवसाय को आगे बढ़ा रही हैं. लगभग सभी महिलाओं ने बताया कि वे भविष्य में अपने व्यापार को बढ़ाने के लिए नई तकनीकों को अपना रही हैं. वे डिजिटल समाधान अपना रही हैं, जिससे व्यवसाय की पहचान बढ़ रही है, ग्राहकों से जुड़ना आसान हो रहा है, ऑर्डर पूरा करना, उत्पादकता बढ़ाना, लागत कम करना और भुगतान प्रबंधन आसान हो रहा है.
NeoGrowth, जो सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSME) को ऋण देने वाली एक नई पीढ़ी की वित्तीय संस्था है, महिलाओं को आर्थिक सहयोग देकर उनके उद्यमिता सफर को मजबूत कर रहा है. इससे न केवल व्यवसायों को लाभ मिल रहा है, बल्कि पूरे समुदाय को भी इसका फायदा हो रहा है.
यह शादी सिर्फ एक उत्सव नहीं, बल्कि अडानी परिवार की समाज सेवा के प्रति प्रतिबद्धता का प्रमाण है, जिसमें हर पहलू में कला, परंपरा और सशक्तिकरण जुड़ा हुआ है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
यह शादी सिर्फ एक उत्सव नहीं, बल्कि समाज के उत्थान के लिए अडानी परिवार की प्रतिबद्धता का प्रतीक है, जिसमें कला, परंपरा और सशक्तिकरण झलकता है. अडानी परिवार में बहुप्रतीक्षित शादी शुक्रवार (7 फरवरी) को संपन्न हुई. यह शादी सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बनी हुई थी. लोग इसे एक और शानदार पारिवारिक समारोह मान रहे थे, जिसमें दुनियाभर की मशहूर हस्तियां मेहमान बनने के कयास लगाए जा रहे थे. क्योंकि जीत अडानी, जो अडानी परिवार के उत्तराधिकारी हैं, दीवा शाह से शादी करने वाले थे.
लेकिन, गौतम अडानी ने साफ कर दिया था कि यह शादी दो दिलों और दो परिवारों का मिलन है और इसे केवल नजदीकी दोस्तों और शुभचिंतकों के साथ पारंपरिक तरीके से मनाया जाएगा और ऐसा ही हुआ जीत अडानी, जो दिव्यांग व्यक्तियों (PwDs) के समर्थन में काम करते हैं, इस शादी के माध्यम से समावेशिता (Inclusivity) का संदेश दिया. यह शादी सिर्फ प्रेम का उत्सव नहीं, बल्कि उन लोगों की ताकत, प्रतिभा और क्षमता को पहचानने की पहल है, जिन्हें अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है. इससे समाज को जोड़ने वाली और सार्थक शादियों का एक नया उदाहरण स्थापित होगा.
ग्रीनएक्स टॉक्स (GreenX Talks), जो अडानी फाउंडेशन की एक पहल है, समाज के लिए लाभदायक समाधान तलाशती है. यह ऐसे सामाजिक उद्यमियों को पहचान देती है, जो लाभ से ज्यादा समाज पर प्रभाव डालने को प्राथमिकता देते हैं. यह मंच संयुक्त राष्ट्र के 17 सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) के तहत बदलाव लाने वालों को प्रोत्साहित करता है ताकि एक समानता से भरी दुनिया बनाई जा सके. ग्रीनएक्स टॉक्स 2022 में कई ऐसे लोगों ने अपनी कहानियां साझा कीं, जिन्होंने शारीरिक चुनौतियों को पार करते हुए दृढ़ संकल्प, लक्ष्य निर्धारण और आत्म-निर्भरता का उदाहरण पेश किया.
अडानी फाउंडेशन पूरे भारत में बदलाव लाने का काम कर रहा है. इसका प्रभाव 6,769 गांवों में 91 लाख लोगों तक पहुंचा है. यह फाउंडेशन शिक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका और सामुदायिक विकास पर ध्यान देकर, गरीब और वंचित समुदायों को आगे बढ़ने के अवसर दे रहा है. अडानी ग्रुप में 30 से अधिक दिव्यांगजन कार्यरत हैं, जो यह दिखाता है कि ग्रीनएक्स टॉक्स एक समावेशी (Inclusive) कार्यस्थल को बढ़ावा दे रहा है, जहां हर व्यक्ति की क्षमता को महत्व दिया जाता है.
इसी संदर्भ में, शार्क टैंक के एक हालिया एपिसोड में जीत अडानी ने कहा कि दिव्यांग व्यक्तियों (PwDs) और सामाजिक उत्थान से जुड़े कार्य उनके काम का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. उन्होंने बताया कि अडानी फाउंडेशन का मूल सिद्धांत यह है कि हर इंसान सिर्फ उसकी शारीरिक या मानसिक सीमाओं से नहीं पहचाना जाना चाहिए, बल्कि उसे सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार है. जीत अडानी ने अपने संसाधनों और प्रभाव का उपयोग वंचित लोगों के उत्थान के लिए किया है.
जीत अडानी ने साझा किया कि उनके अंदर बचपन से ही संवेदनशीलता और सामाजिक जिम्मेदारी की भावना थी, जो उनके दादा-दादी से मिली. उनकी दादी ने उन्हें सेवा (निःस्वार्थ सेवा) का महत्व सिखाया, जिससे उन्हें समाज में सबको साथ लेकर चलने की प्रेरणा मिली. जीत के जनकल्याण कार्यों का मुख्य आधार मिट्टी कैफे (Mitti Café) और FOD (Family for Disabled) जैसे NGO के साथ उनकी भागीदारी है. इन संगठनों के माध्यम से वह दिव्यांग व्यक्तियों को रोजगार देने और उन्हें सशक्त बनाने के लिए काम कर रहे हैं. मिट्टी कैफे जैसी पहल के जरिए जीत यह संदेश देना चाहते हैं कि रोजगार सिर्फ जीने का साधन नहीं, बल्कि सम्मान लौटाने का जरिया भी है.
इसी सोच के तहत अडानी ग्रुप ने यह फैसला किया है कि उसकी कुल कार्यबल (वर्कफोर्स) का कम से कम 5% हिस्सा PwDs (दिव्यांगजन) होंगे. यह दिखाता है कि समावेशिता (Inclusion) को ग्रुप की विकास नीति का अहम हिस्सा बनाया गया है. उद्यमिता (Entrepreneurship) और समाज सेवा साथ-साथ चल सकते हैं. सही सोच के साथ, दिव्यांगजन और समावेशिता भी सफलता की ओर ले जा सकते हैं. जरूरत सिर्फ धैर्यपूर्वक निवेश (Patient Capital) की है—सिर्फ दान नहीं, बल्कि असली निवेश जो इन लोगों को लाभार्थी नहीं, बल्कि सशक्त उद्यमी बनाए.
अडानी ग्रुप इस दिशा में निवेश करने और उन्हें सशक्त बनाने के लिए प्रतिबद्ध है. अब समय आ गया है कि हम नई पीढ़ी के ऐसे उद्यमियों को पहचाने, समर्थन दें और प्रेरित करें जो समाज पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकें. "हम करके दिखाते हैं" अडानी ग्रुप का मिशन है, और इसे पूरा करने के लिए जीत अडानी को "शार्क टैंक" में मेंटर बनकर समावेशी (Inclusive) बिजनेस का मार्गदर्शन और निवेश करना चाहिए. यह सिर्फ जागरूकता नहीं, बल्कि एक्शन लेने का समय है. एक पूरा एपिसोड दिव्यांग उद्यमियों और उनके लिए काम कर रहे लोगों पर केंद्रित होना चाहिए.
जीत अडानी और उनकी मंगेतर दीवा शाह हाल ही में "मिट्टी कैफे" पहुंचे, जो दिव्यांग व्यक्तियों को रोजगार देने में मदद करता है. वहां उन्होंने समर्पित टीम से मुलाकात की और इस मिशन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई. दिव्यांगों की मदद करना जीत अडानी के दिल के बहुत करीब है. मिट्टी कैफे की संस्थापक अलीना से प्रेरित होकर, जीत ने मुंबई एयरपोर्ट पर एक कैफे खोलने में उनकी मदद की. उद्घाटन के दौरान वहां मौजूद दिव्यांग कर्मचारियों का उत्साह और संघर्ष देखकर जीत भावुक हो गए. इसी अनुभव से प्रेरित होकर, उन्होंने अडानी ग्रुप में 5% दिव्यांग कर्मचारियों को काम देने का संकल्प लिया. समावेशिता (Inclusion) और जागरूकता बढ़ाने के लिए अडानी ग्रुप ने "ग्रीन एक्स टॉक्स" लॉन्च किया. यह कदम अडानी परिवार की सामाजिक जिम्मेदारी और समुदाय के प्रति उनके समर्पण को दर्शाता है.
एशिया के मशहूर डिज़ाइनर मनीष मल्होत्रा, जो अपने शानदार और आइकॉनिक फैशन डिज़ाइनों के लिए जाने जाते हैं, अब एक अनोखी साझेदारी का हिस्सा बने हैं. वह "फैमिली ऑफ डिसेबल्ड" (FOD) नामक NGO के साथ मिलकर फैशन को एक सामाजिक उद्देश्य से जोड़ रहे हैं. इस साझेदारी के तहत मनीष मल्होत्रा जीत अडानी और दीवा शाह की शादी के लिए खास शॉल डिजाइन करेंगे. यह सिर्फ खूबसूरत कपड़े बनाने का काम नहीं है, बल्कि दिव्यांग कलाकारों को अपनी प्रतिभा दिखाने और बेहतरीन डिजाइनरों के साथ काम करने का मौका देने की पहल है. धीरे-धीरे, हर डिज़ाइन के साथ, मनीष मल्होत्रा सशक्तिकरण की कहानी बुन रहे हैं, जिससे यह साझेदारी फैशन जगत में एक ऐतिहासिक क्षण बन रही है, जहां फैशन एक बड़े सामाजिक उद्देश्य से जुड़ रहा है.
अडानी परिवार यह सुनिश्चित किया कि शादी में कला और शिल्प का योगदान हो. वे FOD, दिल्ली और काई रासी, चेन्नई जैसे NGOs के साथ मिलकर दिव्यांग व्यक्तियों (PWDs) को सशक्त बना रहे हैं. FOD मनीष मल्होत्रा के साथ मिलकर हाथ से पेंट किए गए शॉल बनाएंगे, जबकि काई रासी कलात्मक प्लेट्स और डिजिटल प्रिंटेड प्लेकार्ड्स बनाएंगे.
इसके अलावा, अहमदाबाद की निकिता जी कस्टम बीडेड हार्स और क़मरबंद बनाएंगी, जबकि प्रकाश जी, जो एक नैल आर्टिस्ट हैं, अपनी नाखूनों से बुकमार्क्स बनाएंगे, जिससे हर टुकड़ा एक अनोखा कला का नमूना बनेगा. मुन्ना जी और नजमीन, जो फिरोजाबाद से एक पिता-पुत्री की जोड़ी हैं, कांच की कला बनाएंगे, जिसे शादी के सजावट के लिए इस्तेमाल किया जाएगा. जोधपुर के बिबाजी चूड़ी वाला तीन प्रकार की चूड़ियां देंगे, जिसमें लैक चूड़ियां भी शामिल हैं, जो पारंपरिक शिल्प को दर्शाती हैं. यवला, नासिक के जगदीश जी पैठानी साड़ियों का योगदान देंगे, जिन्हें 400 कारीगरों द्वारा बुनकर तैयार किया गया है, और ये साड़ियाँ मेहमानों को तोहफे के रूप में दी जाएंगी, जो भारतीय पारंपरिक बुनाई का समर्थन करती हैं. मुंद्रा की निताबेन और उनकी सेल्फ-हेल्प ग्रुप "मेघधनुष सहेली" भी अपने सुंदर मिट्टी कला से योगदान देंगी, जिनका अडानी फाउंडेशन के साथ जुड़ाव 2016 से है.
यह शादी सिर्फ एक उत्सव नहीं, बल्कि अडानी परिवार की समाज सेवा के प्रति प्रतिबद्धता का प्रतीक है, जिसमें हर पहलू में कला, परंपरा और सशक्तिकरण को जोड़ा गया. गौतम अडानी के छोटे बेटे जीत अडानी की शादी से पहले, अडानी परिवार ने एक नई पहल शुरू की है, जिसका उद्देश्य दिव्यांग नवविवाहित महिलाओं की मदद करना है. हर साल 500 ऐसी महिलाओं को 10 लाख रुपये दिए जाएंगे, ताकि वे आत्मनिर्भर होकर अपनी नई जिंदगी सम्मान और आत्मविश्वास के साथ शुरू कर सकें. इस पहल की शुरुआत में, जीत अडानी ने 25 दिव्यांग नवविवाहित महिलाओं और उनके पतियों से मुलाकात की और उन्हें आर्थिक सहायता दी, जिससे वे एक सुरक्षित भविष्य बना सकें.
जीत अडानी और दीवा शाह की शादी, जो 7 फरवरी 2025 को अहमदाबाद, गुजरात में संपन्न हुई, सिर्फ एक निजी खुशी नहीं बल्कि समाज सेवा से जुड़ा एक खास अवसर भी था. "मंगल सेवा" पहल के माध्यम से, अडानी परिवार समाज में जागरूकता बढ़ाना चाहता है और सभी को प्रेरित करना चाहता है कि वे एक समावेशी (Inclusive) दुनिया बनाने में योगदान दें, जहां हर व्यक्ति, चाहे किसी भी क्षमता का हो, खुशी और सम्मान से जीवन के खास लम्हों को मना सके.
मंगल सेवा सिर्फ आर्थिक सहायता नहीं है, बल्कि यह उन चुनौतियों के बारे में जागरूकता फैलाने का एक प्रयास है, जिनका सामना विशेष रूप से दृष्टिहीन (Visually Impaired) लोग करते हैं. यह पहल एक ऐसा मंच बना रही है जो समावेशिता (Inclusion) और सकारात्मक बदलाव को बढ़ावा देता है, यह दिखाते हुए कि प्यार और सशक्तिकरण समाज में स्थायी बदलाव ला सकते हैं.
जीत अडानी के पिता, गौतम अडानी ने "मंगल सेवा" पहल पर गर्व जताते हुए ट्विटर पर अपनी खुशी जाहिर की. उन्होंने ट्वीट किया, "मुझे विश्वास है कि यह प्रयास कई दिव्यांग महिलाओं और उनके परिवारों के जीवन में खुशी, शांति और सम्मान लाएगा. इस नेक कार्य में पूरी श्रद्धा के साथ, मैं प्रार्थना करता हूं कि जीत और दीवा को इस मिशन को आगे बढ़ाने की शक्ति और आशीर्वाद मिलता रहे, जिससे वे प्यार और सेवा का संदेश फैला सकें."
यह शादी सिर्फ एक निजी समारोह नहीं, बल्कि समाज सेवा और सशक्तिकरण का संदेश देने वाला आयोजन था. अडानी परिवार ने इस शादी को खास बनाने के लिए NGO और कलाकारों के साथ मिलकर दिव्यांग व्यक्तियों को सशक्त बनाने और पारंपरिक कारीगरी को बढ़ावा देने की पहल की.
इस जोड़े की समावेशिता (Inclusivity) के प्रति प्रतिबद्धता ने पारंपरिक शादी को एक सकारात्मक सामाजिक बदलाव का संदेश बना दिया है. इन साझेदारियों के माध्यम से, अडानी परिवार यह दिखाना चाहता है कि शादी केवल उत्सव तक सीमित नहीं होती, बल्कि यह समाज में बदलाव लाने और एक बड़ी सामाजिक जिम्मेदारी निभाने का अवसर भी हो सकती है.
BJP ने दिल्ली में AAP के 10 साल के शासन को खत्म किया, मजबूत रणनीति और दिल्ली BJP नेताओं की मेहनत से 48 सीटें जीत कर सफलता हासिल की है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने 2025 के दिल्ली विधानसभा चुनावों में बड़ी जीत हासिल की, 70 में से 48 सीटें जीत लीं. इससे आम आदमी पार्टी (AAP) के 10 साल के शासन का अंत हो गया. इस दौरान लोगों की नाराजगी और विवाद बढ़ते गए. BJP की मजबूत रणनीति और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रभाव ने चुनाव का रुख बदल दिया.
विरोध की लहर और AAP की गिरावट
दिल्ली में 10 साल तक सरकार चलाने के बाद, आम आदमी पार्टी (AAP) को जनता की नाराजगी का सामना करना पड़ा. इसकी बड़ी वजह थी अधूरे वादे, जैसे बुनियादी ढांचे, सरकारी सेवाओं और शहर के विकास में सुधार न होना. पार्टी पर ठहराव (काम में कमी) और बड़े घोटालों के आरोप लगे, जैसे मुख्यमंत्री के घर पर ज़रूरत से ज़्यादा खर्च (शीश महल विवाद) और शराब नीति घोटाला.
दिल्ली के मध्यम वर्ग, जो चुनाव में अहम भूमिका निभाता है, ने बढ़ते प्रदूषण, ट्रैफिक जाम और खराब होती सड़कों पर गुस्सा जताया। इसका फायदा BJP को मिला, जिसने खुद को सुधार और स्थिर शासन की पार्टी के रूप में पेश किया.
BJP की मजबूत चुनावी रणनीति
जनता के बदलते मूड को समझते हुए, BJP ने एक ज़ोरदार और संगठित चुनाव प्रचार किया. पार्टी ने AAP की सरकार की कमजोरियों को दिखाते हुए, अपने विकास और स्थिरता के वादों पर जोर दिया. BJP ने भरोसा दिलाया कि मुफ्त पानी और बिजली जैसी योजनाएं बंद नहीं होंगी. साथ ही, महिलाओं को आर्थिक मदद और झुग्गीवासियों को घर देने जैसी योजनाएं पेश कीं.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली में रैलियां कीं और BJP के विकास के एजेंडे पर जोर दिया. उनकी अपील उन वोटरों को पसंद आई, जो एक मजबूत और अनुभवी सरकार चाहते थे. BJP नेताओं ने झुग्गीवासियों और गरीब वर्ग के बीच समर्थन बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई, जो पहले AAP के मजबूत वोटर माने जाते थे. पार्टी ने सोशल मीडिया और स्थानीय स्तर पर प्रचार करके AAP की नाकामियों और भ्रष्टाचार के मामलों को उजागर किया, जिससे जनता BJP के पक्ष में झुकी.
जीत के पीछे अहम नेता
BJP की ऐतिहासिक जीत में कई नेताओं ने बड़ी भूमिका निभाई. दिल्ली BJP अध्यक्ष वीरेंद्र सचदेवा, प्रभारी बैजयंत पांडा और महासचिव विष्णु मित्तल ने चुनावी रणनीति बनाई, जिससे BJP ने 27 साल बाद दिल्ली की सत्ता में वापसी की. सचदेवा और पांडा ने मजबूत बूथ-स्तर की टीमें तैयार कीं और एक खास अभियान चलाया, जिसमें फर्जी वोटरों की पहचान कर उन्हें मतदाता सूची से हटाया गया.
दिल्ली BJP के महासचिव विष्णु मित्तल ने जमीनी स्तर पर मजबूत संगठन खड़ा किया, खासकर झुग्गीवासियों के बीच. उनके नेतृत्व में चलाए गए अभियान ने AAP के मुख्य वोटरों को BJP के पक्ष में करने में बड़ी सफलता हासिल की. BJP के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और दिल्ली चुनाव प्रभारी बैजयंत ‘जय’ पांडा ने चुनावी रणनीतियों को कुशलता से संभाला. उन्होंने पार्टी के विकास और बिना विवाद वाले शासन के वादे को मज़बूती से प्रचारित किया.
RSS ने छोटे-छोटे बैठकें करने की रणनीति बनाई और ज़मीनी स्तर पर चुनाव अभियान को बारीकी से संभाला. चुनाव के आखिरी दो दिनों में, BJP नेताओं ने सीधे 30 लाख ऐसे वोटरों से संपर्क किया, जो पिछले चुनावों में वोट डालने नहीं आए थे. इस अभियान के जरिए BJP कार्यकर्ता करीब 19 लाख लोगों को मतदान केंद्र तक लाने में सफल रहे.
दिल्ली BJP के महासचिव पवन राणा ने पार्टी की चुनावी रणनीति में बड़ी भूमिका निभाई. उन्होंने केंद्रीय नेतृत्व और ज़मीनी कार्यकर्ताओं के बीच बेहतर तालमेल बनाया. उनकी संगठन क्षमता से BJP का बूथ-स्तर मजबूत हुआ और चुनाव प्रचार को सुचारू रूप से पूरे विधानसभा क्षेत्रों में फैलाया गया. उनकी योजनाओं और प्रचार अभियान ने कार्यकर्ताओं में जोश भर दिया, जिससे पारंपरिक रूप से AAP के प्रभाव वाले इलाकों में BJP की पकड़ मजबूत हुई.
चुनाव में बड़ी जीत और BJP की मज़बूती
प्रवेश वर्मा ने नई दिल्ली विधानसभा सीट से AAP नेता और पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को 4,089 वोटों के अंतर से हराकर बड़ा उलटफेर किया, जिससे राजधानी में BJP की ताकत और बढ़ी. वरिष्ठ नेता विजेंद्र गुप्ता ने रोहिणी सीट से 37,000 से ज्यादा वोटों के अंतर से जीत दर्ज की, जो BJP उम्मीदवारों में सबसे बड़ी जीत थी. अरविंदर सिंह लवली, जो पहले कांग्रेस में थे, 2024 में BJP में शामिल हुए. उन्होंने गांधी नगर सीट से AAP के नवीन चौधरी को 12,748 वोटों से हराकर BJP की दिल्ली में स्थिति और मज़बूत कर दी.
BJP की आगे की चुनौतियां
2025 के दिल्ली चुनाव में BJP की सफलता उसकी मजबूत रणनीति, सही प्रचार और मज़बूत नेतृत्व का नतीजा है. AAP के खिलाफ जनता की नाराजगी का BJP ने पूरा फायदा उठाया और स्थिरता, बेहतर सरकार और शहरी विकास का वादा किया. अब सबकी नज़र इस पर है कि 19 फरवरी को जब सभी चुने हुए विधायक मिलेंगे, तो BJP किसे मुख्यमंत्री बनाएगी. पार्टी के सामने बड़ी चुनौती है, अपने वादों को पूरा करना और ‘डबल इंजन सरकार’ के जरिए दिल्ली की शासन व्यवस्था में सुधार लाना.
चीनी स्टार्टअप डीपसीक अपने लेटेस्ट एआई मॉडल्स को लॉन्च किया. कंपनी का कहना है कि यह अमेरिका में मॉडलों के बराबर या उनसे बेहतर है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
चीन ने अमेरिका को टक्कर देने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बाजार में अपना नया मॉडल (R1) उतार दिया है. इसका नाम है 'DeepSeek', जिसने लॉन्च होते ही तकनीक जगत में हलचल मचा दी है. इसे चैटजीपीटी (Chatgpt), जेमिनी (Gemini) और अन्य AI मॉडलों (Al models) का मजबूत प्रतिस्पर्धी माना जा रहा है. DeepSeek की सबसे बड़ी खासियत इसकी लागत-कुशलता और फ्री उपयोग की पेशकश है, जो इसे ग्लोबल AI मार्केट में सबसे अलग बनाती है. आइए विस्तार से समझें क्या है डीपसीक, कैसे है खास?
क्या है DeepSeek ?
DeepSeek एक एडवांस्ड AI मॉडल है जिसे हांग्जो स्थित इसी नाम की एक रिसर्च लैब ने डेवलप किया है. इसकी स्थापना 2023 में लियांग वेनफेंग ने की थी, जो AI और क्वांटिटेटिव फाइनेंस में बैकग्राउंड वाले एक इंजीनियर हैं. DeepSeek-V3 मॉडल एक एडवांस्ड ओपन-सोर्स AI सिस्टम है. ये OpenAI के ChatGPT को पीछे छोड़ते हुए एपल के ऐप स्टोर पर टॉप-रेटेड फ्री ऐप बन गया है. इस ऐप की सफलता कई देशों में देखी गई, जिसमें यूएस, यूके और चीन शामिल हैं.
DeepSeek की अचानक हुई इस ग्रोथ ने सिलिकॉन वैली का ध्यान अपनी ओर खींचा है और इसने इस धारणा को चुनौती दी कि AI स्पेस में यूएस का दबदबा है. DeepSeek का लेटेस्ट रिलीज R1 है. ये इंडस्ट्री लीडर्स जैसे OpenAI और Anthropic को टक्कर दे रहा है. R1 इसलिए अलग दिखता है क्योंकि ये कॉस्ट-एफिशिएंट और ओपन-सोर्स है. ये अनलिमिटेड फ्री यूसेज भी ऑफर करता है. साथ ही ये हाई-परफॉर्मेंस AI को हाई कॉस्ट के बिना एक्सेसिबल भी बनाता है.
DeepSeek, OpenAI और मेटा से कैसे अलग है?
डीपसीक अफोर्डेबिलिटी और एफिशिएंसी पर ध्यान केंद्रित करके खुद को OpenAI और मेटा जैसे कंपीटीटर्स से अलग बनाता है. जहां OpenAI और मेटा जैसी कंपनियां ज्यादा एडवांस्ड मॉडल डेवलप करती हैं, जिनके लिए महत्वपूर्ण संसाधनों और महंगे AI चिप्स (जैसे Nvidia के H100 GPU) की जरूरत होती है. वहीं, डीपसीक ने ऐसे मॉडल बनाए हैं जो समान रूप से परफॉर्म करते हैं लेकिन इनकी कॉस्ट काफी कम है.
डीपसीक का ज्यादा किफायती AI हार्डवेयर का यूज और मॉडल ट्रेनिंग के लिए इनोवेटिव अप्रोच, इसे बड़े प्लेयर्स के साथ कंपीट करने के लिए लायक बनाता है और इसकी लागत भी कम बनी रहती है. ये चैटबॉट ऐप रिस्पॉन्स देने से पहले अपने तर्क को स्पष्ट करने जैसे यूनिक फीचर्स भी ऑफर करता है. ये यूनिक फीचर इसे ChatGPT जैसे OpenAI के मॉडल से अलग करता है. इसका ओपन-सोर्स अप्रोच डेवलपर्स को डीपसीक की टेक्नोलॉजी पर नए बिल्ड की भी इजाजत देता है.
DeepSeek को क्यों मिल रही है इतनी अटेंशन?
DeepSeek को लेकर इनती चर्चा इसलिए है क्योंकि ये चीनी AI असिस्टेंट फ्री, अनलिमिटेड और ओपन सोर्स है. इसे लोग इसकी ट्रांसपेरेंसी, एफिशिएंसी और AI को सभी के लिए एक्सेसिबल बनाने के लिए पसंद कर रहे हैं. DeepSeek की सफलता ऐसे समय में आई है जब US ने चीन को एडवांस्ड सेमीकंडक्टर एक्सपोर्ट पर बैन लगाया है. इसका उद्देश्य AI में चीन की आगे बढ़ने की क्षमता को सीमित करना है.
लेकिन, डीपसीक ने ऐसे मॉडल डेवलप किए हैं, जिन्हें कम रिसोर्सेज की जरूरत होती है. ऐसे में कंपनी इन रेसट्रिक्शन के साथ काम करने में कामयाब रही है. लेकिन, इसने US में चिंता पैदा कर दी है, जहां टेक दिग्गज Nvidia, Metaऔर Microsoft ने AI इन्फ्रास्ट्रक्चर में भारी निवेश किया है. इन्हें जल्द ही DeepSeek जैसे कम लागत वाले ऑप्शन्स से बढ़ती प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ सकता है.
राष्ट्रपति ट्रंप की नई पारी को लेकर भारत समेत दुनिया भर में उत्सुकता है. ट्रंप अपनी नीतियां 'अमेरिका फर्स्ट' की पॉलिसी से प्रेरित बताते हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
डोनाल्ड ट्रंप के दोबारा अमेरिकी राष्ट्रपति बनने के बाद उनके लिए गए फैसलों और ट्रंप के कई मामलों पर ऐलान से वैश्विक अर्थव्यवस्था और कूटनीतिक संबंधों पर गहरा प्रभाव देखने को मिल रहा है. ट्रंप की अमेरिका फर्स्ट नीति ने कई देशों के साथ अमेरिका के संबंधों को रातों-रात बदल दिया. भारत पर भी ट्रंप के आने का मिलाजुला असर देखने को मिल सकता है. चलिए जानते हैं क्या पड़ेगा भारत पर ट्रंप 2.0 का असर...
डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति रहते हुए भारत-अमेरिका संबंधों को लेकर कई चिंताएं और सवाल उठ रहे हैं. ट्रंप की “अमेरिका फर्स्ट” नीति और उनके द्वारा उठाए गए कुछ शुरुआती कदम भारत के लिए संभावित चुनौतियों का संकेत देते हैं. BRICS देशों को ट्रंप की चेतावनी, नागरिकता कानूनों में बदलाव, और सख्त इमिग्रेशन नीतियां उन मुद्दों में से हैं जो भारत के लिए तनावपूर्ण साबित हो सकते हैं.
1. अमेरिका फर्स्ट नीति
ट्रंप की “अमेरिका फर्स्ट” नीति का मुख्य उद्देश्य अमेरिका की आर्थिक गतिविधियों को देश के भीतर केंद्रित करना है. भारत और अमेरिका के बीच 2022 में व्यापार 191.8 अरब डॉलर का था, जिसमें अमेरिका ने भारत को 73 अरब डॉलर का निर्यात किया और 118.8 अरब डॉलर का आयात किया. इस व्यापारिक असंतुलन को ट्रंप मुद्दा बना सकते हैं, जिससे भारत के विदेशी व्यापार पर असर पड़ सकता है.
2. टैरिफ और व्यापार बाधाएं
ट्रंप ने पहले ही भारत पर अधिक टैरिफ लगाने की संभावना जताई है, जैसे उन्होंने कनाडा और मेक्सिको पर किया. अगर भारत पर भी टैरिफ बढ़ाया जाता है, तो यह भारतीय निर्यात के लिए प्रतिकूल हो सकता है. उनके पहले कार्यकाल में जनरलाइज्ड सिस्टम ऑफ प्रेफरेंसेज (GSP) वापस लेने से भी भारत को आर्थिक नुकसान हुआ था.
3. रुपया बनाम डॉलर
ट्रंप की नीतियों के कारण डॉलर की मजबूती से भारतीय रुपये की कमजोरी संभव है, जिससे भारत में आयात महंगा होगा और महंगाई बढ़ेगी. डॉलर आधारित बाजारों में निवेश भी महंगा हो जाएगा, जिससे भारत के निवेशकों को नुकसान होगा.
4. BRICS पर तनाव
ट्रंप ने BRICS देशों पर सख्त रुख अपनाया है, खासकर उनके डॉलर से हटकर वैकल्पिक करेंसी की दिशा में बढ़ने पर. भारत BRICS का संस्थापक सदस्य है और इस समूह में ट्रंप की धमकियों से भारत के लिए आर्थिक और कूटनीतिक समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं.
5. रूस और ईरान से तेल खरीद
अमेरिका का रूस और ईरान पर लंबे समय से कूटनीतिक तनाव है, लेकिन भारत इन देशों से सस्ती दरों पर कच्चा तेल खरीदता है. ट्रंप अगर भारत पर इनसे तेल न खरीदने का दबाव डालते हैं, तो यह भारत की अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदायक हो सकता है.
6. H-1B वीजा और इमिग्रेशन
ट्रंप ने H-1B वीजा को सख्त बनाने के संकेत दिए हैं, जिससे भारतीय आईटी पेशेवरों को अमेरिका में काम करने में कठिनाई हो सकती है. H-1B वीजा की न्यूनतम वेतन सीमा बढ़ाने का प्रस्ताव भी कई भारतीयों के लिए चुनौतीपूर्ण होगा. इसके अलावा, अमेरिकी नागरिकता के नियमों में बदलाव भी भारतीय समुदाय को प्रभावित कर सकते हैं.
7. शिक्षा और रोजगार
अमेरिका में पढ़ने वाले भारतीय छात्रों के लिए भी संभावित समस्याएं हैं. वैकल्पिक व्यावहारिक प्रशिक्षण (OPT) कार्यक्रम पर प्रतिबंध लगने से छात्रों के लिए नौकरी के अवसर सीमित हो सकते हैं. ट्रंप की नीतियों के कारण भारत के लिए कई मोर्चों पर चुनौतियां उत्पन्न हो सकती हैं, जो आर्थिक, कूटनीतिक और सामाजिक स्तर पर प्रभाव डाल सकती हैं. भारत को इन नीतियों के संभावित प्रभावों का सामना करने के लिए तैयार रहना होगा.
भारत सरकार विजय माल्या और नीरव मोदी को भारत वापस लाने की कोशिश कर रही है. PM मोदी ने इस संबंध में ब्रिटिश प्रधानमंत्री से भी बात की है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
विजय माल्या भारत को लूटकर ब्रिटेन में बड़े आराम से जिंदगी गुजार रहा है, लेकिन अब माना जा रहा है कि उसके आराम में खलल पड़ने वाली है. दरअसल, प्रधानमंत्री मोदी ने G20 समिट के दौरान ब्रिटेन के प्रधानमंत्री किएर स्टार्मर से इस मुद्दे पर बात की है बताया जा रहा है कि PM मोदी ने किएर स्टार्मर से कहा है कि माल्या और नीरव को अब भारत को सौंप दिया जाना चाहिए. बता दें कि दोनों के प्रत्यर्पण की पहले भी कई बार कोशिश हो चुकी है, मगर कोई सफलता नहीं मिली.
रिश्ते सुधरे हैं, लेकिन...
भले ही PM मोदी की ब्रिटिश PM से विजय माल्या और नीरव मोदी के प्रत्यर्पण पर बातचीत को भारतीय मीडिया 'दबाव' करार दे रहा हो, लेकिन जानकारों का मानना है यह इतना भी आसान नहीं है. पूर्व में कोशिशें हुई हैं और माल्या कानूनी दांवपेंच के चलते बचता रहा है. ब्रिटेन भारत के वांटेड अपराधियों के प्रत्यर्पण को लेकर खास गंभीर नहीं रहा है. उसने रेमंड वर्ले, रवि शंकरन, वेलू बूपालन, अजय प्रसाद खेतान, वीरेंद्र कुमार रस्तोगी और आनंद कुमार जैन के प्रत्यर्पण की अर्जी पूर्व में ठुकराई थी. हालांकि, ये बात अलग है कि पहले के मुकाबले ब्रिटेन और भारत के रिश्ते अब ज्यादा मजबूत हुए हैं. लेकिन प्रत्यर्पण जैसे मामलों पर ब्रिटेन से तत्परता के उम्मीद जल्दबाजी होगी.
इसलिए बंधी है उम्मीद
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री किएर स्टार्मर के कार्यकाल में भारत के वांटेड अपराधियों के प्रत्यर्पण की उम्मीद इसलिए ज्यादा है, क्योंकि स्टारमर ने भारत के पहले वांछित अपराधी के प्रत्यर्पण प्राप्त के लिए अदालत में बहस की थी. उन्होंने इतनी मजबूती से भारत का पक्ष रखा था कि अदालत को उनकी बात सुननी पड़ी. वह 2008 से 2013 के बीच पब्लिक प्रॉसिक्यूशन रहे थे. मोहम्मद हनीफ उमरजी पटेल उर्फ टाइगर हनीफ अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम का कथित सहयोगी था. हनीफ सूरत में 1993 के हुए बम विस्फोटों में वांछित था, मार्च 2010 में ग्रेटर मैनचेस्टर के बोल्टन में एक किराने की दुकान से उसे गिरफ्तार किया गया था. वेस्टमिंस्टर मजिस्ट्रेट कोर्ट में किएर स्टार्मर ने भारत के ओर दमदार बहस की थी. इसलिए भारत को उम्मीद कि उनके ब्रिटिश PM की कुर्सी पर बैठने से प्रत्यर्पण की अर्जियों पर जल्द फैसला हो सकता है.
कितना लूटकर भागे?
लिकर किंग रहे विजय माल्या किंगफिशर एयरलाइंस से जुड़े 9,000 करोड़ रुपए से अधिक का कर्ज नहीं चुकाने के मामले में वांछित है. वह 2016 से ब्रिटेन में रह रहा है. जबकि नीरव मोदी पंजाब नेशनल बैंक (PNB) घोटाले में 13,000 करोड़ की धोखाधड़ी का आरोपी है. वह पिछले पांच साल से लंदन की जेल में बंद है. भारत की तरफ से माल्या और नीरव मोदी को वापस लाने के कई प्रयास हुए हैं. इस साल जनवरी में CBI, प्रवर्तन निदेशालय (ED), राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA ) और विदेश मंत्रालय के अधिकारियों सहित एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल इस संबंध में ब्रिटेन गया था.
GlobalData की नई रिपोर्ट, “Global Risk Report Quarterly Update – Q3 2024”, के अनुसार यूरोप, एशिया-प्रशांत और अमेरिका में रिस्क स्कोर थोड़ा कम हुआ है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
वैश्विक आर्थिक संभावनाओं को भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं (Geopolitical uncertainties) ने चुनौती दी है. चल रहे संघर्षों के कारण सप्लाई चेन प्रभावित हो रही है और कमजोर अर्थव्यवस्थाओं पर असर पड़ रहा है. हालांकि, घटती महंगाई और ब्याज दरों में कटौती से सकारात्मक माहौल बना है. Q3 2024 में ग्लोबल रिस्क लेवल 55.6 (100 में से) स्थिर रहा, जो पिछली तिमाही जैसा ही था. लेकिन यह Q1 2024 (57.2) और Q4 2023 (57.3) के मुकाबले कम है. यह जानकारी डेटा और एनालिटिक्स कंपनी GlobalData ने दी है.
GlobalData की नई रिपोर्ट, “Global Risk Report Quarterly Update – Q3 2024”, के अनुसार यूरोप, एशिया-प्रशांत और अमेरिका में रिस्क स्कोर थोड़ा कम हुआ है. यूरोप में रिस्क स्कोर सबसे कम रहा, जबकि मध्य पूर्व और अफ्रीका में यह बढ़ा है. GlobalData की आर्थिक रिसर्च विश्लेषक, गायत्री गणपूले ने कहा कि 2024 में वैश्विक आर्थिक वृद्धि 3.1% रहने का अनुमान है, जो 2023 के 3.2% से थोड़ी कम है. यह दर्शाता है कि चुनौतियां बनी हुई हैं, लेकिन अर्थव्यवस्था में मजबूती भी है. घटती महंगाई और ब्याज दरों में कटौती से सुधार को बल मिल रहा है, लेकिन भू-राजनीतिक तनाव और बढ़ते मालभाड़े ने सप्लाई चेन पर दबाव बना रखा है, जिससे प्रगति की गति धीमी हो रही है. GCRI Q3 2024 में शामिल 153 देशों में से 24.2% देश कम जोखिम वाले हैं. 32% देश मध्यम जोखिम वाले हैं. 37.9% देश उच्च जोखिम वाले हैं वही 5.9% देश बहुत उच्च जोखिम वाले हैं.
यूरोप– सुधार जारी, लेकिन भू-राजनीतिक तनाव बरकरार
यूरोप दुनिया का सबसे कम जोखिम वाला क्षेत्र है. इसका जोखिम स्कोर Q2 2024 में 41.8 से Q3 2024 में 41.4 तक थोड़ा बेहतर हुआ है. यूरोप में सुधार के कारण अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे बढ़ रही है, महंगाई कम हो रही है. ब्याज दरों में कटौती (ECB द्वारा भी), जिससे निवेश बढ़ा है. अगर चुनौतियों को बात करें तो भू-राजनीतिक तनाव, श्रमिकों की कमी, जलवायु से जुड़ी समस्याएं है. वहीं Q3 2024 GCRI अपडेट के अनुसार सबसे कम जोखिम वाले देश स्विट्जरलैंड, डेनमार्क, लक्ज़मबर्ग और सबसे ज्यादा जोखिम वाले देश यूक्रेन, तुर्किये, बेलारूस है.
एशिया-पैसिफिक- जोखिम कम, लेकिन धीमी वृद्धि चिंता का कारण
एशिया-प्रशांत क्षेत्र का जोखिम स्कोर Q2 2024 में 54.1 से घटकर Q3 2024 में 54.0 हो गया है. यह उभरती अर्थव्यवस्थाओं में सकारात्मक आर्थिक रुझानों और चीन से मिलने वाले नीति समर्थन को दिखाता है. यह क्षेत्र 2024 में दुनिया का सबसे तेजी से बढ़ने वाला क्षेत्र रहने की उम्मीद है, खासकर उभरती अर्थव्यवस्थाओं के मजबूत योगदान के कारण. हालांकि, चीन और भारत में धीमी वृद्धि के कारण जोखिम बने हुए हैं. चीन की वृद्धि Q3 2024 में 4.6% तक घट गई, जो Q1 2023 के बाद सबसे कम है, इसके पीछे संपत्ति क्षेत्र की समस्याएं और मँहगाई कम होने का खतरा है. इसी तरह, भारत की वृद्धि Q2 2024 में 6.7% तक घट गई, जो Q2 2023 के बाद सबसे कम है, और इसके संकेत मिल रहे हैं कि अर्थव्यवस्था कमजोर हो रही है. Q3 2024 GCRI अपडेट के अनुसार सबसे ज्यादा जोखिम वाले देश पाकिस्तान, म्यांमार, बांग्लादेश है और सबसे कम जोखिम वाले देश ताइवान (चीन प्रांत), सिंगापुर, हांगकांग (चीन SAR) है.
अमेरिका–जोखिम में हल्की गिरावट
अमेरिका का जोखिम स्कोर Q2 2024 में 57.1 से घटकर Q3 2024 में 57.0 हो गया है, जो महंगाई कम होने और नीति दरों में कटौती के कारण हुआ है. हालांकि, अमेरिका का बढ़ा हुआ कर्ज, लैटिन अमेरिका में चल रहे वित्तीय समस्याएं, क्षेत्र भर में राजनीतिक अशांति, जैसे लैटिन अमेरिका में प्रदर्शन और वेनेजुएला चुनाव पर विवाद जैसी समस्याएं चुनौतियां बनी हुई हैं. डोनाल्ड ट्रम्प के राष्ट्रपति पद पर लौटने से राजनीतिक माहौल अस्थिर बना हुआ है, जिससे आर्थिक रणनीतियों और स्थिरता पर असर पड़ सकता है. वहीं इस क्षेत्र में कम जोखिम वाले देश कनाडा, अमेरिका, कोस्टा रिका है और उच्च जोखिम वाले देश, हैती, वेनेजुएला, अर्जेंटीना है.
मध्य पूर्व और अफ्रीका– संघर्ष के कारण जोखिम बढ़ना
मध्य पूर्व और अफ्रीका का जोखिम स्कोर Q2 2024 में 65.9 से बढ़कर Q3 2024 में 66.3 हो गया है, जो मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव, तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, और शिपिंग में रुकावट के कारण है. अफ्रीका में भी कई समस्याएँ हैं जैसे- पश्चिमी और मध्य अफ्रीका में बाढ़ के कारण लाखों लोग विस्थापित हो गए हैं और खाद्य सुरक्षा की स्थिति और खराब हो गई है. ग्रेटर हॉर्न ऑफ अफ्रीका में गंभीर कुपोषण से लाखों लोग प्रभावित हो रहे हैं, खासकर बच्चे. इन संकटों के साथ-साथ, उच्च कर्ज और चल रहे संघर्षों ने क्षेत्रीय अस्थिरता और जोखिम को बढ़ा दिया है. Q3 2024 GCRI अपडेट के अनुसार, दुनिया के 10 सबसे उच्च जोखिम वाले देशों में से 7 देशों का संबंध मध्य पूर्व और अफ्रीका क्षेत्र से है: यमन, सीरिया, बुरुंडी, ईरान, जिम्बाब्वे, नाइजीरिया, और मलावी.
गायत्री गणपूले का निष्कर्ष:
GlobalData की आर्थिक रिसर्च विश्लेषक, गायत्री गणपूले के अनुसार वैश्विक जोखिम स्तर स्थिर हैं, लेकिन विभिन्न क्षेत्रों में चुनौतियां अलग-अलग हैं. कुछ क्षेत्र मजबूती और प्रगति दिखाते हैं, जबकि अन्य क्षेत्र भू-राजनीतिक तनाव, प्राकृतिक आपदाओं, और अस्थिरता के कारण बढ़ते जोखिम का सामना कर रहे हैं. इन चुनौतियों का समाधान करने के लिए ध्यानपूर्वक समायोजन और दीर्घकालिक स्थिरता पर ध्यान केंद्रित करना होगा.
क्या बिज़नेस और सरकार के नेता इस बदलाव की क्रांति को सही दिशा दे सकते हैं? Ipsos Understanding Asia रिपोर्ट में यही सवाल उठाया गया है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
एशिया-पैसिफिक क्षेत्र (जिसमें भारत समेत 11 देश शामिल हैं) के लोग, नई तकनीक और AI को अपनाने के बावजूद, भविष्य को लेकर काफी चिंतित हैं. यह जानकारी इप्सॉस (Ipsos) की एक नई रिपोर्ट में सामने आई है. इप्सॉस, जो मार्केट रिसर्च में ग्लोबल लीडर है, ने Global Trends: Understanding Asia रिपोर्ट जारी की. यह रिपोर्ट एशिया-पैसिफिक क्षेत्र को प्रभावित करने वाले खास मुद्दों पर गहराई से नजर डालती है.
यह रिपोर्ट Ipsos Global Trends के 8वें एडिशन के डेटा पर आधारित है. इस सर्वे में 50 देशों के 50,000 लोगों से बातचीत की गई, जो इप्सॉस के इतिहास का सबसे बड़ा पब्लिक सर्वे है. 2025 तक एशिया-पैसिफिक के उपभोक्ताओं के लिए तीन प्रमुख रुझान (Trends):
Technowonder (तकनीक की अद्भुत दुनिया)
दुनिया के कई हिस्सों में लोग AI के फायदों और नुकसानों पर बंटे हुए हैं, लेकिन एशिया में लोग तकनीकी प्रगति को लेकर उत्साहित हैं. एशिया-पैसिफिक में 68% लोग मानते हैं कि AI दुनिया पर सकारात्मक असर डाल रहा है, जबकि ग्लोबली यह आंकड़ा सिर्फ 57% है. वहीं चीन नए टेक्नोलॉजी को अपनाने में सबसे आगे है और सर्वे में शामिल 50 देशों में पहले स्थान पर है.
हालांकि, इसके बावजूद, कई APAC देशों ने AI को लेकर चिंताएं जाहिर की हैं. भारत में 2013 से अब तक, 19% ज्यादा लोग मानते हैं कि तकनीकी प्रगति उनके जीवन को नुकसान पहुंचा रही है. जापान में यह आंकड़ा 18% बढ़ा है. वहीं AI और डेटा सुरक्षा को लेकर चिंताएं काफी ज्यादा हैं. एशिया-पैसिफिक में 70% लोग इस बात से परेशान हैं कि कंपनियां उनकी जानकारी कैसे इकट्ठा कर रही हैं. यह डर फिलीपींस (86%), थाईलैंड और सिंगापुर (दोनों 81%) में सबसे अधिक है.
पुराने तरीकों की ओर वापसी (Retreat to old systems)
दिलचस्प बात यह है कि एशिया के युवा (खासतौर पर Gen Z) भविष्य को लेकर चिंतित हैं. एशिया-पैसिफिक के 57% Gen Z ने कहा कि वे चाहते कि वे अपने माता-पिता के बचपन के समय में बड़े हुए होते यह आंकड़ा वैश्विक स्तर (51%) से अधिक है. ब्रांड्स इस नॉस्टेल्जिया ट्रेंड (पुरानी यादों) का फ़ायदा उठा सकते हैं, जहां वे पुराने समय की परंपराओं को आधुनिक इनोवेशन के साथ जोड़कर पेश करें.
जलवायु परिवर्तन पर सहमति (Climate convergence)
जलवायु परिवर्तन (climate change) को लेकर सहमति है कि यह सच है और तुरंत कार्रवाई की ज़रूरत है. 10 में से 8 (84%) लोग मानते हैं कि अगर एशिया-पैसिफिक के देशों ने अपनी आदतें नहीं बदलीं, तो पर्यावरणीय आपदा होगी. वहीं ऑस्ट्रेलिया में यह चिंता 2013 के बाद से 15% बढ़ गई है.
एशिया-पैसिफिक के 73% लोग कहते हैं कि वे पहले से ही पर्यावरण बचाने के लिए जितना कर सकते हैं, कर रहे हैं. यह भावना खासतौर पर इंडोनेशिया (91%), थाईलैंड (89%), और फिलीपींस (87%) में सबसे अधिक है. वहीं 75% लोग मानते हैं कि कंपनियां पर्यावरण पर पर्याप्त ध्यान नहीं दे रही हैं. भारत, ताइवान, इंडोनेशिया और थाईलैंड के अधिकांश लोगों को लगता है कि जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए अब बहुत देर हो चुकी है.
Ipsos के अधिकारियों का क्या कहना है?
Ipsos APEC के CEO हैमिश मुनरो ने कहा कि जैसे-जैसे एशिया-पैसिफिक का आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक प्रभाव एक जटिल और आपस में जुड़े हुए विश्व में बढ़ रहा है, इस क्षेत्र को समझने का महत्व पहले से कहीं ज्यादा हो गया है. यह रिपोर्ट दिखाती है कि उपभोक्ता और नागरिक तेज़ी से बदलती दुनिया में, खासतौर पर तकनीकी विकास, सामाजिक बदलाव और जलवायु परिवर्तन को लेकर क्या सोचते और महसूस करते हैं. यह एक ऐसा क्षेत्र है जो बदलाव को अपनाने के लिए तैयार है, लेकिन चाहता है कि बिज़नेस आगे बढ़कर नेतृत्व करें और बदलाव के इस सफर का मार्गदर्शन करें.
जहां तक जलवायु परिवर्तन की बात है, उपभोक्ता मानते हैं कि ब्रांड्स का महत्वपूर्ण रोल है पर्यावरण पर हानिकारक प्रभावों को कम करने में ब्रांड्स के लिए यह एक बड़ा मौका है कि वे पर्यावरणीय नेतृत्व दिखाएं और जलवायु परिवर्तन की कोशिशों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता साबित करें.
वहीं Ipsos इंडिया के CEO अमित अडारकर ने कहा कि भारत की कहानी मुख्य रूप से दो प्रमुख समूहों पर आधारित है – शहरी जनता और डिजिटल भारतीय. शहरी जनता इंटरनेट के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकती. वहीं डिजिटल भारतीय, डिजिटल थकान (fatigue) महसूस कर रहे हैं और अपनी ज़िंदगी को आसान बनाना चाहते हैं.
भारत में स्वतंत्रता (individualism) के ट्रेंड को अपनाना दिलचस्प रहा. लोग तकनीक को अपनी स्थिति सुधारने और सीखने के लिए एक सहायक और साथी के रूप में देख रहे हैं. यह ट्रेंड खासतौर पर मिलेनियल्स और जेन Z में दिखा और इसे सकारात्मक माना गया. हालांकि, चिंता की बात यह है कि भारतीयों में जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशीलता घट रही है, जबकि यह समस्या सबको प्रभावित कर रही है. भारतीय ‘शुतुरमुर्ग नीति’ (Ostrich Policy) अपना रहे हैं, यानी तत्काल खतरे को नजरअंदाज करना और इसे भविष्य की समस्या मानना, यह एक गंभीर चिंता का विषय है.