क्रिमसन एजुकेशन के संस्थापक की शैक्षणिक महत्वाकांक्षा, उद्यमशीलता में उभार और 2027 की संभावनाओं का ज्योतिषीय विश्लेषण
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
विक्रम चन्दीरमानी
जेमी बीटन ने हार्वर्ड, स्टैनफोर्ड, येल और ऑक्सफोर्ड समेत कई प्रतिष्ठित संस्थानों में पढ़ाई की है और कम से कम 12 उच्च डिग्रियां हासिल की हैं. एक व्यक्ति के लिए कितनी विश्वविद्यालय डिग्रियां पर्याप्त हैं? अधिकांश लोगों के लिए हार्वर्ड, स्टैनफोर्ड, येल या ऑक्सफोर्ड से स्नातक होना जीवनभर की उपलब्धि होगी. जेमी बीटन इन चारों संस्थानों में पढ़ चुके हैं. इसके अलावा उन्होंने कई अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों से भी शिक्षा प्राप्त की है.
उन्होंने यह सब करते हुए क्रिमसन एजुकेशन (Crimson Education) का निर्माण किया, जो एक अंतरराष्ट्रीय शिक्षा व्यवसाय है और जिसका मूल्यांकन लगभग 1 अरब न्यूजीलैंड डॉलर (NZ$) है. 31 वर्ष की उम्र में न्यूजीलैंड के इस उद्यमी ने असाधारण शैक्षणिक योग्यताएं और काफी संपत्ति अर्जित कर ली है. सितंबर 2026 में द न्यूयॉर्क टाइम्स ने उनकी प्रोफाइल प्रकाशित की, जिसमें इस सवाल की पड़ताल की गई कि क्या उन्हें दुनिया का सबसे अधिक शिक्षित व्यक्ति कहा जा सकता है. उनकी जन्मकुंडली उनकी उपलब्धियों के पीछे छिपे व्यक्तित्व और भविष्य की संभावनाओं के बारे में कुछ दिलचस्प संकेत देती है.
2025 की NBR रिच लिस्ट में बीटन की व्यक्तिगत संपत्ति लगभग 220 मिलियन न्यूजीलैंड डॉलर आंकी गई थी. उनकी कंपनी प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में प्रवेश के लिए छात्रों को सलाह देने से आगे बढ़कर ऑनलाइन स्कूली शिक्षा, शैक्षणिक संस्थानों के अधिग्रहण और ऑस्ट्रेलिया में एक बड़े अधिग्रहण के प्रयास तक पहुंच चुकी है.
उन्होंने यह सब अपनी पढ़ाई जारी रखते हुए हासिल किया है. गणित, अर्थशास्त्र, कानून, वित्त, शिक्षा, सार्वजनिक नीति, अंतरराष्ट्रीय मामलों और कई अन्य विषयों में उनकी शैक्षणिक रुचि का दायरा उल्लेखनीय है.
उनकी उपलब्धियां एक दिलचस्प सवाल खड़ा करती हैं: जब कोई व्यक्ति पहले ही काफी संपत्ति और शैक्षणिक प्रतिष्ठा हासिल कर चुका हो, तो उसे लगातार नई योग्यताएं प्राप्त करने और पहले से अधिक महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय करने के लिए क्या प्रेरित करता है?
इस महत्वाकांक्षा के पीछे की जन्मकुंडली
बीटन की जन्मकुंडली उनकी उपलब्धियों की तरह ही असाधारण है. उनकी सिंह लग्न राशि, कुंभ राशि में सूर्य, कन्या राशि में चंद्रमा, कर्क राशि में मंगल, मकर राशि में बुध, वृश्चिक राशि में बृहस्पति और धनु राशि में शुक्र का संयोजन बौद्धिक अनुशासन, महत्वाकांक्षा, जिज्ञासा और गहनता का असामान्य मेल दिखाता है.
उनका सूर्य प्लूटो के साथ वर्ग योग बनाता है, बृहस्पति शनि के साथ वर्ग योग में है, चंद्रमा बुध के साथ त्रिकोण योग बनाता है और शुक्र शनि के साथ षडाष्टक नहीं, बल्कि षष्ठांश (सेक्सटाइल) संबंध बनाता है. उनकी कुंडली में सबसे उल्लेखनीय बात लंबे समय तक बौद्धिक मेहनत करने की क्षमता, सफल होने का दृढ़ संकल्प और ज्ञान प्राप्त करने की लगभग असीमित इच्छा है.
ज्योतिषीय दृष्टि से देखें तो यह आश्चर्यजनक नहीं है कि उन्होंने इतनी डिग्रियां हासिल की हैं. उनकी कुंडली उच्च ज्ञान प्राप्त करने की असाधारण क्षमता का संकेत देती है और उनकी बौद्धिक यात्रा अभी समाप्त नहीं हुई है.
इससे भी अधिक उल्लेखनीय बात यह है कि उन्हें गहरी अंतर्दृष्टि प्राप्त हो सकती है और वे ऐसे सवालों के जवाब खोज सकते हैं, जिनसे कई पीढ़ियों से लोग जूझते रहे हैं. उनका कुछ काम स्थापित विचारों को चुनौती दे सकता है और दुनिया के कुछ विषयों को समझने के तरीके में बुनियादी बदलाव ला सकता है. उनके योगदान का प्रभाव आने वाली पीढ़ियों तक महसूस किया जा सकता है.
जेमी बीटन एक असाधारण ऊर्जा वाले व्यक्ति हैं और उनका सबसे महत्वपूर्ण योगदान अभी भविष्य में हो सकता है. सिंह लग्न होने के कारण बीटन केवल सक्षम होने से संतुष्ट रहने की संभावना नहीं रखते. सिंह लग्न अक्सर मजबूत व्यक्तिगत पहचान, महत्वाकांक्षा और खुद को विशिष्ट साबित करने की इच्छा से जुड़ा होता है. पहचान उनके लिए मायने रखती है, हालांकि जरूरी नहीं कि यह पारंपरिक अर्थों में प्रसिद्धि के रूप में ही हो.
उनके मामले में विशिष्टता उपलब्धियों के जरिए सामने आती है: संस्थानों का निर्माण करना, ज्ञान हासिल करना और अपने लिए लगातार कठिन लक्ष्य निर्धारित करना. कुंभ राशि में सूर्य इस प्रभाव को काफी हद तक बदल देता है. कुंभ राशि बौद्धिक स्वतंत्रता, नवाचार और व्यवस्थाओं व संस्थानों में रुचि से जुड़ी है. यह व्यक्ति को परंपरागत रास्तों से हटकर काम करने में सहज बना सकती है, भले ही दूसरे लोग उसकी प्रेरणा को समझ न पाएं.
सिंह और कुंभ के बीच एक दिलचस्प अंतर है. सिंह व्यक्तिगत पहचान और विशिष्टता चाहता है, जबकि कुंभ सामूहिक प्रगति और व्यापक दृष्टिकोण से जुड़ा है. दोनों का मेल ऐसे व्यक्ति को जन्म दे सकता है, जो बड़ी संख्या में लोगों को प्रभावित करने वाले संस्थानों और व्यवस्थाओं का निर्माण करके अपनी अलग पहचान बनाना चाहता है.
यह बात बीटन के लिए विशेष रूप से प्रासंगिक है. उनकी उद्यमशीलता संबंधी रुचियां छात्रों को विश्वविद्यालयों में प्रवेश दिलाने में मदद करने से बढ़कर शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने और मौजूदा व्यवसायों का अधिग्रहण करने तक पहुंच गई हैं.
कन्या राशि में चंद्रमा, विशेष रूप से मकर राशि में बुध के साथ उसका त्रिकोण योग, उनके शैक्षणिक स्वभाव के सबसे महत्वपूर्ण संकेतों में से एक है. कन्या राशि विश्लेषणात्मक, सूक्ष्मता पर ध्यान देने वाली और चीजों के काम करने के तरीके को समझने में रुचि रखने वाली मानी जाती है. यह सटीकता और सुधार पर जोर देती है तथा सतही व्याख्याओं से शायद ही कभी संतुष्ट होती है.
मकर राशि में बुध इस बौद्धिक जिज्ञासा में संरचना, अनुशासन और व्यावहारिकता जोड़ता है. बीटन एक व्यवस्थित विचारक हो सकते हैं, जो बड़ी मात्रा में जानकारी ग्रहण कर उसे व्यावहारिक परिणामों में बदलने में सक्षम हों.
चंद्रमा और बुध के बीच त्रिकोण योग उनकी सहज प्रवृत्ति और बौद्धिक क्षमता के बीच संबंध को मजबूत करता है. यह पैटर्न पहचानने, जटिल जानकारी व्यवस्थित करने और अवलोकनों को व्यावहारिक रणनीतियों में बदलने की क्षमता का संकेत देता है. इससे उन विवरणों को याद रखने की उत्कृष्ट क्षमता भी मिल सकती है, जिन्हें वे महत्वपूर्ण मानते हैं.
शायद बीटन की सबसे उल्लेखनीय खूबियों में से एक एक साथ कई चुनौतीपूर्ण काम संभालने की उनकी क्षमता है. अधिकांश लोगों के लिए पूर्णकालिक काम करते हुए उनका कोई एक शैक्षणिक कार्यक्रम पूरा करना भी चुनौतीपूर्ण होगा. बीटन ने अंतरराष्ट्रीय कारोबार का निर्माण और प्रबंधन करते हुए कई उच्च डिग्रियां हासिल की हैं.
उनकी जन्मकुंडली असाधारण संगठनात्मक क्षमता, मानसिक सहनशक्ति और अलग-अलग कामों पर एक साथ ध्यान केंद्रित करने की योग्यता का संकेत देती है. उनमें जानकारी को तेजी से ग्रहण करने और याद रखने की असामान्य क्षमता भी हो सकती है, जिससे वे अपेक्षाकृत कम समय में वह हासिल कर सकते हैं, जिसमें दूसरों को काफी अधिक समय लग सकता है.
कन्या राशि में चंद्रमा उन्हें खुद की आलोचनात्मक समीक्षा करने वाला भी बना सकता है. वे लगातार अपने प्रदर्शन का मूल्यांकन कर सकते हैं और उन क्षेत्रों की पहचान कर सकते हैं, जहां वे बेहतर कर सकते हैं. केवल किसी काम को पूरा कर लेना उनके लिए पर्याप्त नहीं होगा. वे उसके हर पहलू को समझना और परिणाम को बेहतर बनाने के तरीके खोजना चाह सकते हैं.
वृश्चिक राशि में बृहस्पति उनकी बौद्धिक रुचियों में गहराई जोड़ता है. वृश्चिक सतह के नीचे जाकर चीजों को समझने की कोशिश करता है, जबकि बृहस्पति ज्ञान और समझ का विस्तार करता है. बीटन उन विषयों में गहराई से डूब सकते हैं, जिनमें उनकी रुचि हो, और उन्हें उस स्तर से भी आगे तक पढ़ सकते हैं, जहां अधिकांश लोग खुद को पर्याप्त जानकार मानने लगते हैं.
बृहस्पति का शनि के साथ वर्ग योग एक और पहलू जोड़ता है. बृहस्पति विस्तार चाहता है, जबकि शनि अनुशासन, धैर्य और विशेषज्ञता की मांग करता है. इन ग्रहों के बीच तनाव ऐसा व्यक्तित्व बना सकता है, जो लगातार अपने लिए लक्ष्य ऊंचे करता जाता है.
उपलब्धि से संतुष्टि मिल सकती है, लेकिन शायद ही लंबे समय तक. जल्द ही कोई नई चुनौती सामने आ जाती है. सूर्य और प्लूटो का वर्ग योग उनके व्यक्तित्व में जबरदस्त गहनता और इच्छाशक्ति पैदा करता है. यह योग बाधाओं को पार करने के असाधारण संकल्प के साथ-साथ परिस्थितियों या दूसरे लोगों द्वारा थोपी गई सीमाओं को स्वीकार न करने की प्रवृत्ति भी पैदा कर सकता है. कर्क राशि में मंगल उनके नियंत्रित बाहरी व्यक्तित्व के नीचे भावनात्मक संवेदनशीलता जोड़ता है.
धनु राशि में शुक्र बुद्धिमान, स्वतंत्र और बौद्धिक रूप से जिज्ञासु लोगों के प्रति आकर्षण का संकेत देता है. बीटन ऐसे रिश्तों को पसंद कर सकते हैं, जो उन्हें विभिन्न संस्कृतियों, विचारों और अनुभवों से परिचित कराएं.
शुक्र का शनि के साथ षष्ठांश योग वफादारी और गंभीरता जोड़ता है. यह संकेत देता है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता की उनकी मजबूत जरूरत के बावजूद वे लंबे समय तक टिकने वाले रिश्ते बना सकते हैं. तुला राशि में राहु साझेदारी, संपर्कों और सहयोग पर जोर देता है, जबकि मेष राशि में केतु स्वतंत्र रूप से काम करने की सहज प्रवृत्ति का संकेत देता है.
हालांकि वे स्वतंत्र रूप से काम करने में सहज हो सकते हैं, लेकिन उनकी कुछ सबसे बड़ी उपलब्धियां रणनीतिक साझेदारियों के जरिए सामने आ सकती हैं. राहु का प्रभाव विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि बीटन ने जून 2011 में अपनी 18 साल की राहु महादशा में प्रवेश किया था और उनकी लगभग सभी प्रमुख शैक्षणिक तथा उद्यमशीलता संबंधी उपलब्धियां इसी अवधि में हुई हैं.
जीवनभर शिक्षा हासिल करने की चाह
बीटन का जन्म 1995 में न्यूजीलैंड के ऑकलैंड में हुआ था और उनका पालन-पोषण मुख्य रूप से उनकी मां पाउला बीटन की देखरेख में हुआ. उनके माता-पिता का अलगाव उस समय हो गया था, जब उनकी मां गर्भवती थीं. उनके नाना-नानी ने भी उनकी परवरिश में भूमिका निभाई. परिवार में शिक्षा को केंद्रीय महत्व दिया जाता था. उनकी मां शैक्षणिक उपलब्धियों को प्रोत्साहित करती थीं और पढ़ाई को किसी बाध्यता के बजाय प्राथमिकता माना जाता था.
बताया जाता है कि उनके नाना ने एक बार ब्रिटेन के एक स्कूल की छात्रवृत्ति लेने से इनकार कर दिया था, क्योंकि उनका परिवार स्कूल की वर्दी का खर्च नहीं उठा सकता था. यह अनुभव परिवार की उस समझ का हिस्सा बन गया कि शिक्षा किस तरह जीवन में बदलाव ला सकती है.
बीटन ने सेंट केंटिगर्न और उसके बाद ऑकलैंड के किंग्स कॉलेज में पढ़ाई की, जहां उन्हें शैक्षणिक छात्रवृत्ति मिली. स्कूल के दिनों में भी चुनौतीपूर्ण पढ़ाई के प्रति उनकी रुचि असाधारण थी. बताया जाता है कि उन्होंने सामान्य तीन के मुकाबले 10 ए-लेवल परीक्षाएं पूरी कीं और कई SAT सब्जेक्ट टेस्ट भी दिए.
उन्होंने पत्रकारिता और मानवाधिकारों को समर्पित छात्र क्लब भी स्थापित किए और यंग मेन्सा से जुड़े. उनका बचपन चंद्रमा की दशा के दौरान बीता, जो जून 2004 तक जारी रही. कन्या राशि में चंद्रमा और बुध के साथ उसके त्रिकोण योग को ज्योतिषीय दृष्टि से ऐसे पालन-पोषण के अनुरूप माना जा सकता है, जिसमें सीखने, बौद्धिक विकास और शैक्षणिक अनुशासन को महत्वपूर्ण स्थान मिला.
जून 2004 में बीटन ने मंगल महादशा में प्रवेश किया, जो जून 2011 तक चली और उनकी स्कूली शिक्षा तथा किशोरावस्था के बड़े हिस्से को समेटती है. मई 2009 से जुलाई 2010 तक चली मंगल-शुक्र भुक्ति के दौरान वे उस उम्र के करीब पहुंच रहे थे, जब विदेश में पढ़ाई करने की संभावना ने उनकी कल्पना को आकर्षित करना शुरू किया. लगभग 14 या 15 वर्ष की उम्र में येल में प्रवेश पाने वाले एक वरिष्ठ छात्र से बातचीत ने उन्हें यह विश्वास दिलाने में मदद की कि दुनिया के अग्रणी विश्वविद्यालयों में पढ़ना एक हासिल किया जा सकने वाला लक्ष्य है.
इसके बाद जुलाई से नवंबर 2010 तक मंगल-सूर्य भुक्ति और नवंबर 2010 से जून 2011 तक मंगल-चंद्रमा भुक्ति रही. ये वे महत्वपूर्ण वर्ष थे, जब उनकी शैक्षणिक महत्वाकांक्षाएं धीरे-धीरे अधिक ठोस लक्ष्यों में बदलने लगीं.
राहु और असामान्य सफलता का सफर
बीटन के जीवन की सबसे महत्वपूर्ण ज्योतिषीय घटनाओं में से एक जून 2011 में हुई, जब उन्होंने राहु महादशा में प्रवेश किया. यह जून 2029 तक जारी रहेगी. उनकी जन्मकुंडली में राहु तुला राशि में स्थित है और इसे परंपरागत रास्तों से हटकर काम करने, विदेशी संपर्कों, महत्वाकांक्षा, साझेदारी तथा स्थापित सीमाओं से आगे बढ़ने की इच्छा से जोड़ा जाता है.
इस समय का महत्व इसलिए भी दिलचस्प है, क्योंकि दुनिया के कुछ सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में बीटन की असाधारण शैक्षणिक यात्रा, क्रिमसन एजुकेशन की स्थापना और उसके बाद उनकी आर्थिक सफलता इसी महादशा के दौरान हुई.
जून 2011 से फरवरी 2014 तक उनकी राहु-राहु भुक्ति चली. इस दौरान उन्हें बड़ी संख्या में अग्रणी विश्वविद्यालयों में प्रवेश मिला, वे न्यूजीलैंड से अमेरिका चले गए और उन्होंने उस कंपनी की सह-स्थापना की, जिसने आगे चलकर उन्हें एक धनी उद्यमी बनाया.
किंग्स कॉलेज में अपने अंतिम वर्ष के दौरान बीटन ने 25 चुनिंदा विश्वविद्यालयों में आवेदन किया और सभी से प्रवेश के प्रस्ताव प्राप्त किए. इनमें हार्वर्ड, स्टैनफोर्ड, येल, प्रिंसटन, कैम्ब्रिज, कोलंबिया, ड्यूक और व्हार्टन स्कूल शामिल थे.
बताया जाता है कि उन्होंने अपने आवेदन तैयार करने में लगभग एक वर्ष लगाया था. इसमें अलग-अलग श्रेणियों के संस्थानों के लिए अपने मुख्य प्रवेश निबंध के अलग-अलग संस्करण तैयार करना भी शामिल था.
दिसंबर 2012 में उन्हें हार्वर्ड से प्रवेश की स्वीकृति मिली. यह घटना राहु-राहु भुक्ति के दौरान हुई. इस उपलब्धि का महत्व किसी प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में प्रवेश मिलने से कहीं अधिक था. इससे अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक संस्थानों, निवेशकों और उद्यमियों के नेटवर्क का रास्ता खुला, जिसने उनके आगे के करियर में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
सितंबर 2013 में, राहु-राहु भुक्ति के दौरान ही बीटन अपनी पढ़ाई शुरू करने के लिए कैम्ब्रिज, मैसाचुसेट्स चले गए. हालांकि, तब तक वे एक ऐसे उद्यम की शुरुआत कर चुके थे, जो आगे चलकर उनके जीवन का केंद्रीय हिस्सा बन गया.
क्रिमसन एजुकेशन का निर्माण
2013 में न्यूजीलैंड छोड़ने की तैयारी करते समय बीटन ने फांगझोउ जियांग और शार्न्ड्रे कुशोर के साथ क्रिमसन एजुकेशन की सह-स्थापना की. इस विचार को उनके विश्वविद्यालय प्रवेश की सफलता से मिली व्यापक दिलचस्पी से प्रेरणा मिली. ऑकलैंड के माता-पिता जानना चाहते थे कि एक स्थानीय छात्र इतने प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में प्रवेश पाने में कैसे सफल हुआ.
बीटन ने अपने अनुभव और ज्ञान को व्यवसाय में बदलने का अवसर पहचाना. सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि उन्होंने ऐसी उपलब्धि में व्यावसायिक अवसर देखा, जिसका जश्न अधिकांश छात्र केवल अपनी व्यक्तिगत सफलता के रूप में मनाते. स्नातक की पढ़ाई शुरू करने की तैयारी करते हुए ही वे विश्वविद्यालयों में प्रवेश से संबंधित अपने ज्ञान को व्यवसाय में बदल रहे थे.
हार्वर्ड में छात्र के रूप में कदम रखने से पहले ही उन्होंने बाजार की पहचान कर ली थी, संभावित ग्राहकों की जरूरतों को समझ लिया था और निवेशकों को आकर्षित कर लिया था. क्रिमसन एजुकेशन को शुरुआती दौर में लगभग 1.4 मिलियन न्यूजीलैंड डॉलर का निवेश मिला. निवेशकों में टाइगर मैनेजमेंट नेटवर्क से जुड़े जूलियन रॉबर्टसन और चेस कोलमैन के साथ जापानी शिक्षा उद्यमी सोइचिरो फुकुताके भी शामिल थे.
राहु-राहु भुक्ति के दौरान क्रिमसन एजुकेशन की स्थापना ज्योतिषीय दृष्टि से उल्लेखनीय है. तुला राशि में राहु साझेदारी और अंतरराष्ट्रीय संपर्कों को रेखांकित करता है, जबकि कुंभ राशि में उनका सूर्य और मकर राशि में बुध स्थापित व्यवस्थाओं के भीतर अवसरों को पहचानने और उनके आधार पर व्यावसायिक रूप से उपयोगी ढांचे विकसित करने की क्षमता का संकेत देते हैं.
बीटन ने उन्हीं शैक्षणिक संस्थानों में व्यावसायिक अवसर खोज लिया था, जहां वे स्वयं पढ़ना चाहते थे. उन्होंने हार्वर्ड के छात्रावास से क्रिमसन का संचालन शुरू किया और अपनी पढ़ाई के साथ-साथ अलग-अलग समय क्षेत्रों में कारोबार का प्रबंधन किया.
इस उद्यम ने ऐसी प्रवृत्ति भी प्रदर्शित की, जो उनके करियर में आगे चलकर और महत्वपूर्ण बन गई: ज्ञान और अनुभव को व्यावसायिक रूप से मूल्यवान सेवाओं में बदलने की क्षमता.
फरवरी 2014 से जुलाई 2016 तक चली राहु-बृहस्पति भुक्ति के दौरान बीटन की शैक्षणिक प्रगति जारी रही. बृहस्पति को परंपरागत रूप से उच्च शिक्षा से जोड़ा जाता है. इस अवधि में उन्होंने केवल तीन वर्षों में हार्वर्ड से स्नातक और मास्टर डिग्री दोनों पूरी कीं और 2016 में मैग्ना कम लॉड (उच्च शैक्षणिक सम्मान) के साथ स्नातक हुए.
स्नातक की पढ़ाई के दौरान उन्होंने टाइगर मैनेजमेंट में विश्लेषक के रूप में भी काम किया. इससे क्रिमसन एजुकेशन का निर्माण जारी रखते हुए उन्हें निवेश उद्योग को करीब से समझने का अवसर मिला.
उनकी जन्मकुंडली में बृहस्पति वृश्चिक राशि में है और शनि के साथ वर्ग योग बनाता है. यह ज्ञान हासिल करने की इच्छा और उसमें विशेषज्ञता प्राप्त करने के लिए जरूरी अनुशासन के बीच तनाव को दर्शाता है. उन्नत शैक्षणिक अध्ययन को व्यावहारिक कारोबारी अनुभव के साथ जोड़ने की उनकी क्षमता स्पष्ट होने लगी थी. हालांकि, हार्वर्ड उनकी असाधारण शैक्षणिक यात्रा की केवल शुरुआत थी.
डिग्रियां, अनुशासन और विस्तार
जुलाई 2016 में बीटन ने राहु-शनि भुक्ति में प्रवेश किया, जो मई 2019 तक जारी रही. शनि को अनुशासन, निरंतर प्रयास, जिम्मेदारी और दीर्घकालिक लक्ष्यों की दिशा में काम करने की क्षमता से जोड़ा जाता है. उनकी जन्मकुंडली में बृहस्पति के साथ इसका वर्ग योग विशेष रूप से दिलचस्प है, क्योंकि इसमें दो विपरीत प्रवृत्तियां एक साथ दिखाई देती हैं: अपने क्षितिज का विस्तार करने की इच्छा और विशेषज्ञता हासिल करने के लिए कठिन मेहनत करने की तत्परता.
हार्वर्ड की डिग्रियां पूरी करने के बाद बीटन ने स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के ग्रेजुएट स्कूल ऑफ बिजनेस में पढ़ाई जारी रखी. वहां उन्होंने शिक्षा में मास्टर डिग्री के साथ एमबीए किया.
2018 में राहु-शनि भुक्ति के दौरान उन्हें रोड्स स्कॉलर के रूप में चुना गया. यह दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित शैक्षणिक सम्मानों में से एक है. इससे ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में उनकी शिक्षा का एक और अध्याय शुरू हुआ, जहां उन्होंने ऑनलाइन शिक्षा में रुचि के साथ सार्वजनिक नीति पर डॉक्टरेट शोध किया.
उनके विषय का चयन महत्वपूर्ण था. बीटन इस बात का अध्ययन कर रहे थे कि बड़े पैमाने पर शिक्षा किस तरह प्रदान की जा सकती है और उसमें सुधार कैसे किया जा सकता है. इसी दौरान वे ऐसी कंपनी भी बना रहे थे, जिसका कारोबार शैक्षणिक संस्थानों और उनके छात्रों की जरूरतों को समझने पर निर्भर था.
जून 2019 में बीटन ने स्टैनफोर्ड से एमबीए और शिक्षा में मास्टर डिग्री पूरी की. उनके उत्कृष्ट शैक्षणिक प्रदर्शन के लिए उन्हें अर्जे मिलर स्कॉलर के रूप में सम्मानित किया गया.
उनका दीक्षांत समारोह राहु-शनि भुक्ति समाप्त होने के कुछ समय बाद हुआ, लेकिन इन योग्यताओं के लिए आवश्यक शैक्षणिक काम का बड़ा हिस्सा इसी अवधि में पूरा हुआ था.
इन्हीं वर्षों में क्रिमसन एजुकेशन का विस्तार भी जारी रहा. बताया जाता है कि 2016 में निवेश के बाद कंपनी का मूल्यांकन लगभग 205 मिलियन अमेरिकी डॉलर था. बीटन अभी 20 वर्ष की उम्र के शुरुआती दौर में थे, लेकिन उन्होंने ऐसा कारोबार खड़ा कर लिया था, जिसका मूल्यांकन अधिकांश उद्यमियों के लिए असाधारण उपलब्धि माना जाएगा.
राहु-शनि का यह दौर उनके व्यक्तित्व की एक महत्वपूर्ण विशेषता को सामने लाता है. वे लंबे समय तक कठिन काम का बोझ उठाने में सक्षम दिखाई देते हैं, बशर्ते उन्हें लगे कि इससे मिलने वाला परिणाम मेहनत के लायक है. बृहस्पति और शनि का वर्ग योग महत्वाकांक्षा, कड़ी मेहनत और उपलब्धि का लगभग निरंतर चक्र बना सकता है. सफलता को संतुष्ट होकर रुक जाने का कारण बनाने के बजाय वे इसे अपने अगले प्रयास की नींव बनाते दिखाई देते हैं.
क्रिमसन एजुकेशन के विस्तार का अगला चरण मई 2019 से दिसंबर 2021 तक चली राहु-बुध भुक्ति के दौरान सामने आया. उनकी जन्मकुंडली में बुध मकर राशि में है और कन्या राशि में चंद्रमा के साथ त्रिकोण योग बनाता है. शिक्षा, संचार, सूचना और ज्ञान के व्यावसायिक इस्तेमाल से जुड़े करियर के लिए यह एक दिलचस्प संयोजन है.
2019 में कंपनी ने लगभग 20 मिलियन अमेरिकी डॉलर की सीरीज सी फंडिंग हासिल की. निवेशकों में चाउ ताई फूक एजुकेशन ग्रुप शामिल था. उसी वर्ष न्यूजीलैंड के पूर्व प्रधानमंत्री जॉन की क्रिमसन एजुकेशन के सलाहकार बोर्ड में शामिल हुए, जिससे संगठन को व्यापक अनुभव और अंतरराष्ट्रीय संपर्क मिले.
2020 में राहु-बुध भुक्ति के दौरान बीटन ने क्रिमसन ग्लोबल एकेडमी की शुरुआत की. यह एक मान्यता प्राप्त ऑनलाइन हाई स्कूल है, जो ए-लेवल और एडवांस्ड प्लेसमेंट पाठ्यक्रमों सहित अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त योग्यताएं प्रदान करता है. यह उनके व्यवसाय के विकास में एक महत्वपूर्ण कदम था. शुरुआत में क्रिमसन एजुकेशन का ध्यान छात्रों को अग्रणी विश्वविद्यालयों में प्रवेश दिलाने में मदद करने पर था. क्रिमसन ग्लोबल एकेडमी ने सीधे शिक्षा प्रदान करने के क्षेत्र में विस्तार का प्रतिनिधित्व किया.
अब बीटन केवल छात्रों को शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश पाने के तरीके नहीं बता रहे थे, बल्कि तकनीक के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा प्रदान करने वाला संस्थान भी बना रहे थे. यह शुरुआत कोविड-19 महामारी के दौरान हुई, जब दुनिया भर के स्कूलों और विश्वविद्यालयों को पढ़ाने के पारंपरिक तरीकों पर दोबारा विचार करना पड़ा.
महामारी से पहले भी ऑनलाइन शिक्षा का विकास हो रहा था, लेकिन इस व्यवधान ने इसके इस्तेमाल को तेज कर दिया और पारंपरिक कक्षाओं की भौगोलिक सीमाओं के बिना शिक्षा प्रदान करने की संभावनाओं को उजागर किया. ज्योतिषीय दृष्टि से देखें तो राहु का संबंध असामान्य तरीकों और बुध का शिक्षा, संचार तथा तकनीक से जुड़ाव इस घटनाक्रम को दिलचस्प बनाता है.
2021 और 2022 के दौरान फंडिंग की अतिरिक्त गतिविधियों से क्रिमसन का मूल्यांकन बढ़कर लगभग 550 मिलियन अमेरिकी डॉलर के करीब पहुंच गया.
प्रवेश संबंधी सलाह से सीधे शिक्षा प्रदान करने तक
राहु-केतु भुक्ति दिसंबर 2021 में शुरू हुई और जनवरी 2023 तक चली. 2022 में बीटन ने वाइली प्रकाशन के माध्यम से Accepted! Secrets To Gaining Admission To The World's Best Universities नामक पुस्तक प्रकाशित की. इसमें विश्वविद्यालयों में प्रवेश से संबंधित उनके व्यापक अनुभव और प्रतिष्ठित संस्थानों में जगह पाने की कोशिश कर रहे छात्रों के साथ किए गए काम की जानकारी दी गई थी. इसका प्रचार USA Today की बेस्टसेलर पुस्तक के रूप में किया गया.
इस समय तक बीटन प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में प्रवेश पाने वाले एक सफल आवेदक से अंतरराष्ट्रीय शिक्षा के क्षेत्र में उद्यमी, सलाहकार और प्रकाशित लेखक बन चुके थे. उनका शैक्षणिक अनुभव एक व्यवसाय की नींव बन गया था और उस अनुभव से अर्जित ज्ञान अब उनकी लेखन सामग्री के माध्यम से व्यापक पाठक वर्ग तक पहुंच रहा था.
ऑक्सफोर्ड में डॉक्टरेट की पढ़ाई सहित उनकी शैक्षणिक गतिविधियां भी जारी रहीं. उनकी जन्मकुंडली में केतु मेष राशि में है और तुला राशि में स्थित राहु के विपरीत है. राहु-केतु का यह अक्ष उनकी सहज स्वतंत्रता और साझेदारी के माध्यम से काम करने की जरूरत के बीच संबंध स्थापित करता है. दोनों ने उनके करियर में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.
जनवरी 2023 में बीटन ने राहु-शुक्र भुक्ति में प्रवेश किया, जो दिसंबर 2025 तक चली. उनकी जन्मकुंडली में शुक्र धनु राशि में है और शनि के साथ षष्ठांश योग बनाता है. धनु राशि में शुक्र बौद्धिक खोज, विदेशी संपर्कों और विभिन्न संस्कृतियों तथा दर्शनों में रुचि से जुड़ा है.
शनि के साथ इसका षष्ठांश योग अनुशासन, प्रतिबद्धता और लंबे समय तक टिकने वाली चीजों के निर्माण की क्षमता जोड़ता है. इस अवधि में बीटन के करियर की कुछ सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियां सामने आईं. 2023 में उन्होंने येल लॉ स्कूल से ज्यूरिस डॉक्टर की डिग्री हासिल की, जिससे उनका पहले से ही असाधारण शैक्षणिक रिकॉर्ड और विस्तृत हो गया.
उनकी शैक्षणिक रुचियां कई विषयों में फैली हुई हैं. इनमें प्रिंसटन में वित्त, सिंघुआ विश्वविद्यालय में वैश्विक मामले, यूनिवर्सिटी ऑफ पेनसिल्वेनिया में शिक्षा उद्यमिता, किंग्स कॉलेज लंदन में युद्ध अध्ययन, कॉर्नेल में स्वास्थ्य नीति और अर्थशास्त्र तथा डार्टमाउथ में इम्प्लीमेंटेशन साइंस शामिल हैं.
यह जरूरी नहीं कि ये सभी योग्यताएं राहु-शुक्र भुक्ति के दौरान पूरी की गई हों, लेकिन इनका व्यापक दायरा उनकी बौद्धिक रुचियों की असामान्य प्रकृति को दर्शाता है. उनकी शिक्षा का एक और दिलचस्प पहलू यह है कि उन्होंने जिन विषयों का अध्ययन किया है, उनमें से कई का व्यवसाय और सार्वजनिक जीवन में व्यावहारिक उपयोग है.
वित्त, कानून, सार्वजनिक नीति, अर्थशास्त्र और अंतरराष्ट्रीय मामले संस्थानों के काम करने के तरीके, पूंजी के प्रवाह और निर्णय लेने की प्रक्रिया को समझने के लिए अलग-अलग दृष्टिकोण प्रदान करते हैं. इस तरह उनकी शैक्षणिक रुचियां दोहरा उद्देश्य पूरा कर सकती हैं. वे उनकी बौद्धिक जिज्ञासा को संतुष्ट करने के साथ-साथ ऐसा ज्ञान भी प्रदान करती हैं, जो उनके उद्यमों में उपयोगी साबित हो सकता है.
संभव है कि बीटन इन विषयों के बीच ऐसे संबंध देखते हों, जो दूसरों को तुरंत दिखाई नहीं देते. उन्होंने अपनी शिक्षा को केवल प्रमाणपत्र इकट्ठा करने के बजाय कौशल और समझ हासिल करने की प्रक्रिया बताया है. उनकी जन्मकुंडली संकेत देती है कि वे अपने ज्ञान का विस्तार जारी रख सकते हैं. उनकी रुचियों का व्यापक दायरा अंततः उन्हें उन विषयों के बीच संबंध स्थापित करने में सक्षम बना सकता है, जिनका दूसरे लोगों ने अलग-अलग अध्ययन किया है.
एक अरब डॉलर का महत्वपूर्ण पड़ाव
राहु-शुक्र अवधि के दौरान क्रिमसन एजुकेशन ने भी एक महत्वपूर्ण वित्तीय उपलब्धि हासिल की. नवंबर 2024 में कंपनी ने लगभग 67 मिलियन न्यूजीलैंड डॉलर की सीरीज डी फंडिंग पूरी की. इसका नेतृत्व मोवैक ने किया, जबकि HEAL पार्टनर्स, आइसहाउस वेंचर्स और अन्य निवेशकों ने भी इसमें भाग लिया.
इस निवेश के बाद क्रिमसन एजुकेशन का मूल्यांकन लगभग 1 अरब न्यूजीलैंड डॉलर हो गया, जिससे वह अंतरराष्ट्रीय शिक्षा उद्योग की एक प्रमुख कंपनी बन गई.
बताया गया कि कंपनी ने 2024 वित्त वर्ष के दौरान 100 मिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक का राजस्व अर्जित किया और वह मुनाफे में थी. 2025 तक NBR रिच लिस्ट में बीटन की व्यक्तिगत संपत्ति लगभग 220 मिलियन न्यूजीलैंड डॉलर आंकी गई.
किशोरावस्था में व्यवसाय शुरू करने वाले व्यक्ति के लिए यह उल्लेखनीय उपलब्धि थी. इस तरह राहु-शुक्र अवधि में शैक्षणिक उपलब्धियां, कारोबार का पर्याप्त विस्तार और उल्लेखनीय वित्तीय सफलता एक साथ देखने को मिलीं.
इस अवधि में सार्वजनिक आलोचना भी हुई. सोशल मीडिया पर उनकी व्यापक शैक्षणिक योग्यताओं की चर्चा बढ़ने के बाद कुछ लोगों ने इतनी अधिक डिग्रियां हासिल करने के महत्व पर सवाल उठाए.
हालांकि, बीटन अपनी शिक्षा को ज्ञान और क्षमताओं में निवेश के रूप में देखते दिखाई देते हैं, जो उनके पूरे जीवन में उपयोगी साबित हो सकती हैं.
राहु-सूर्य का चरण
दिसंबर 2025 में बीटन ने राहु-सूर्य भुक्ति में प्रवेश किया, जो नवंबर 2026 तक जारी रहेगी.
उनकी जन्मकुंडली में सूर्य कुंभ राशि में स्थित है और वृश्चिक राशि में प्लूटो के साथ वर्ग योग बनाता है. सूर्य-प्लूटो का यह योग उनकी कुंडली के अधिक शक्तिशाली योगों में से एक है. इससे अत्यधिक महत्वाकांक्षा, दृढ़ संकल्प और अपनी परिस्थितियों पर अधिक प्रभाव डालने की इच्छा पैदा हो सकती है. कुंभ राशि नवाचार, व्यवस्थाओं और संस्थानों में रुचि जोड़ती है, जबकि प्लूटो गहनता और बड़े बदलाव लाने की क्षमता का संकेत देता है.
राहु-सूर्य का यह दौर अब तक काफी घटनापूर्ण रहा है. फरवरी 2026 में न्यूजीलैंड के पूर्व प्रधानमंत्री जॉन की क्रिमसन एजुकेशन के पहले चेयरमैन बने. पूर्व उबर और गूगल कार्यकारी संदीप जैन भी इसी समय कंपनी के बोर्ड में शामिल हुए.
इन नियुक्तियों से संगठन के नेतृत्व और प्रशासनिक व्यवस्था को महत्वपूर्ण मजबूती मिली. क्रिमसन ने न्यूजीलैंड में AGE स्कूल, ताकापुना सहित कुछ स्कूलों का अधिग्रहण करके भौतिक शिक्षा संस्थानों के क्षेत्र में भी अपने कारोबार का विस्तार किया.
बीटन के निजी जीवन में भी महत्वपूर्ण घटनाएं हुईं. उनकी मुलाकात प्रिसिला पुट्जर से कोलंबिया विश्वविद्यालय में पत्रकारिता की कक्षा के दौरान हुई थी. दोनों ने मई 2026 में साथ स्नातक की पढ़ाई पूरी की और जुलाई 2026 में कैलिफोर्निया के सांता मोनिका में शादी कर ली. समारोह में जॉन की ने विवाह संपन्न कराया. इस तरह उनकी शादी भी राहु-सूर्य अवधि के दौरान हुई.
इस अवधि में उन्हें सार्वजनिक स्तर पर भी काफी पहचान मिली. सितंबर 2026 में द न्यूयॉर्क टाइम्स ने उनकी शैक्षणिक उपलब्धियों और उद्यमशीलता से जुड़े करियर पर विस्तृत प्रोफाइल प्रकाशित की.
इस लेख ने उनकी कहानी को बहुत बड़े पाठक वर्ग तक पहुंचाया और उच्च शिक्षा, शैक्षणिक योग्यताओं तथा ज्ञान और उद्यमशीलता के बीच संबंध को लेकर नई चर्चा शुरू की.
किप मैकग्राथ के अधिग्रहण का प्रयास
राहु-सूर्य अवधि के दौरान कारोबार से जुड़ी शायद सबसे महत्वपूर्ण घटना ऑस्ट्रेलिया की ट्यूशन फ्रेंचाइजी किप मैकग्राथ एजुकेशन सेंटर्स का अधिग्रहण करने का क्रिमसन एजुकेशन का प्रयास रहा है. जुलाई 2026 के अंत में क्रिमसन एजुकेशन की सहायक कंपनी क्रिमसन कंसल्टिंग ऑस्ट्रेलिया ने ऑस्ट्रेलियाई शेयर बाजार ASX में सूचीबद्ध इस कंपनी के लिए बिना पूर्व अनुरोध के अधिग्रहण प्रस्ताव पेश किया. किप मैकग्राथ की स्थापना 1976 में हुई थी.
शुरुआती प्रस्ताव 0.73 ऑस्ट्रेलियाई डॉलर प्रति शेयर का था, लेकिन किप मैकग्राथ के बोर्ड ने शेयरधारकों को इसे अस्वीकार करने की सलाह दी. इसके बाद क्रिमसन ने अक्टूबर में अपना प्रस्ताव बढ़ाकर 0.75 ऑस्ट्रेलियाई डॉलर प्रति शेयर कर दिया और इसे बिना शर्त वाला प्रस्ताव घोषित किया. इसके बाद बोर्ड ने अपनी सिफारिश बदल दी और किसी बेहतर प्रस्ताव के अभाव में शेयरधारकों को संशोधित प्रस्ताव स्वीकार करने की सलाह दी.
13 अक्टूबर तक क्रिमसन की वोटिंग शक्ति 50 फीसदी से अधिक हो गई थी, जिससे उसे नियंत्रण की स्थिति मिल गई. इसके बाद प्रस्ताव की अवधि बढ़ाकर 27 अक्टूबर कर दी गई. सभी शेयरधारकों द्वारा प्रस्ताव स्वीकार किए जाने की स्थिति में कुल सौदे का मूल्य लगभग 51 मिलियन ऑस्ट्रेलियाई डॉलर आंका गया.
इस अधिग्रहण के प्रयास का समय ज्योतिषीय दृष्टि से दिलचस्प है. अधिग्रहण की पेशकश राहु-सूर्य अवधि के दौरान शुरू हुई, जब सूर्य प्लूटो के साथ वर्ग योग बना रहा है. इस योग को अधिक प्रभाव हासिल करने, विरोध को पार करने और मौजूदा व्यवस्थाओं को बदलने की इच्छा से जोड़ा जाता है.
किप मैकग्राथ के बोर्ड की शुरुआती अस्वीकृति, उसके बाद संशोधित प्रस्ताव और फिर सिफारिश में बदलाव इस ग्रह संयोजन से जुड़ी दृढ़ता और संकल्प को दर्शाते हैं. तुला राशि में राहु बातचीत, साझेदारी और व्यावसायिक संबंधों पर भी जोर देता है.
प्रस्तावित अधिग्रहण क्रिमसन के मूल कारोबार से एक महत्वपूर्ण बदलाव का प्रतिनिधित्व करता है. कंपनी शुरुआत में प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में प्रवेश के लिए प्रीमियम परामर्श सेवाएं प्रदान करने पर केंद्रित थी. किप मैकग्राथ व्यापक ट्यूशन बाजार में काम करती है. इस कंपनी का नियंत्रण हासिल करने से क्रिमसन को शिक्षा उद्योग के एक अलग हिस्से तक पहुंच मिल सकती है.
यह अधिग्रहण के माध्यम से कारोबार बढ़ाने की बीटन की इच्छा को भी दर्शाता है. वे केवल अपने मौजूदा व्यवसाय को स्वाभाविक रूप से विस्तार देने पर निर्भर नहीं रहना चाहते. अक्टूबर 2026 में यह लेख लिखे जाने तक क्रिमसन के स्वामित्व की अंतिम सीमा शेष शेयरधारकों की स्वीकृति पर निर्भर थी.
बीटन की उद्यमशीलता की यात्रा में एक व्यापक पैटर्न उभर रहा है. क्रिमसन एजुकेशन की शुरुआत छात्रों को प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में प्रवेश पाने की सलाह देने से हुई थी. इसके बाद कंपनी ने ऑनलाइन स्कूली शिक्षा में विस्तार किया और अब भौतिक शैक्षणिक संस्थानों तथा ट्यूशन कारोबार में प्रवेश कर रही है.
ये घटनाक्रम बताते हैं कि कंपनी केवल विश्वविद्यालय प्रवेश तक सीमित रहने के बजाय छात्रों की शैक्षणिक यात्रा के कई चरणों में अपनी भूमिका स्थापित करना चाहती है. क्या यह आगे चलकर एक अधिक एकीकृत अंतरराष्ट्रीय शिक्षा समूह का रूप लेगी, यह देखना बाकी है, लेकिन विस्तार की दिशा उल्लेखनीय है.
2026 के बाकी महीनों में क्या हो सकता है
2026 के शेष महीनों में और महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आ सकते हैं. नवंबर में बीटन कुछ संपत्तियां बेच सकते हैं. ऐसा वे जोखिम कम करने या अपने उद्यमों के लिए पूंजी जुटाने के उद्देश्य से कर सकते हैं. नवंबर के अंत या दिसंबर के पहले सप्ताह में राजस्व के नए स्रोत खुल सकते हैं.
यह अवधि इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि नवंबर 2026 में वे राहु-चंद्रमा भुक्ति में प्रवेश करेंगे, जो मई 2028 तक जारी रहेगी. उनकी जन्मकुंडली में चंद्रमा कन्या राशि में स्थित है और मकर राशि में बुध के साथ त्रिकोण योग बनाता है. यह संयोजन विश्लेषणात्मक सोच, गहरी बौद्धिक जिज्ञासा और जटिल जानकारी को व्यावहारिक रणनीतियों में बदलने की क्षमता प्रदान करता है.
राहु-चंद्रमा की अवधि में शिक्षा, तकनीक, कारोबारी विस्तार और नए ज्ञान की प्राप्ति से जुड़े महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आ सकते हैं.
2027 में क्या हो सकता है
जेमी बीटन के लिए 2027 कई लिहाज से विशेष रूप से अनुकूल दिखाई देता है. उनकी प्रतिष्ठा बढ़ने, कारोबार का काफी विस्तार होने और संपत्ति में वृद्धि होने की संभावना है.
इसके साथ ही उन्हें काफी खर्च भी करना पड़ सकता है. इनमें से कई खर्च वैकल्पिक हो सकते हैं, क्योंकि वे नए उद्यमों में निवेश करेंगे, संपत्तियां खरीदेंगे और विस्तार की महत्वाकांक्षी योजनाओं पर काम करेंगे. फरवरी, मार्च, जुलाई और अगस्त 2027 बड़े निवेशों तथा अधिग्रहण के लिए विशेष रूप से अनुकूल दिखाई देते हैं.
इस वर्ष उनकी उद्यमशीलता की महत्वाकांक्षाओं में महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिल सकता है. बीटन नए क्षेत्रों में प्रवेश कर सकते हैं और अपने मौजूदा व्यवसायों का दायरा बढ़ा सकते हैं. वर्ष की शुरुआत में उनकी सार्वजनिक और पेशेवर प्रतिष्ठा में वृद्धि हो सकती है.
जनवरी 2027 में लोग उन्हें एक नए नजरिये से देख सकते हैं और उनके प्रभाव तथा उपलब्धियों को अधिक पहचान मिल सकती है. राजस्व के नए स्रोत भी सामने आ सकते हैं. उन्हें कोई बड़ा वैकल्पिक खर्च करना पड़ सकता है, जो उनके निजी या कारोबारी हितों से जुड़ा हो सकता है.
बढ़ती पहचान के साथ उनकी जिम्मेदारियां भी बढ़ सकती हैं और वर्ष के पहले चार महीनों में उनकी पेशेवर भूमिका में और बदलाव आ सकता है. फरवरी 2027 विशेष रूप से घटनापूर्ण महीना साबित हो सकता है.
बीटन कोई बड़ा अधिग्रहण कर सकते हैं, किसी संपत्ति में निवेश कर सकते हैं या अपने कारोबारी हितों का विस्तार करने के लिए पर्याप्त संसाधन लगा सकते हैं. किप मैकग्राथ से जुड़े महत्वपूर्ण घटनाक्रम भी सामने आ सकते हैं. इनमें अतिरिक्त निवेश, पुनर्गठन या क्रिमसन एजुकेशन के तहत उसके कारोबार का एकीकरण और विस्तार शामिल हो सकता है.
फरवरी से मार्च 2027 के मध्य तक की अवधि विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो सकती है. इस दौरान कई बड़े घटनाक्रम तेजी से सामने आ सकते हैं. एक दिलचस्प संभावना यह है कि बीटन शिक्षा और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बीच के क्षेत्र में अधिक सक्रिय हो सकते हैं.
फरवरी से मार्च 2027 के मध्य तक उभरती प्रौद्योगिकियों से जुड़े महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आ सकते हैं. वे एआई और अन्य तकनीकी प्रगति से संबंधित पाठ्यक्रम शुरू कर सकते हैं, शिक्षा प्रदान करने के नए तरीके विकसित कर सकते हैं या अपने मौजूदा व्यवसायों का विस्तार करने के लिए तकनीक का इस्तेमाल कर सकते हैं.
वे शिक्षा और नवाचार से जुड़े अवसरों का लाभ उठाने के लिए तकनीकी कंपनियों या अन्य संगठनों के साथ साझेदारी भी कर सकते हैं. इनमें से कुछ पहल आगे चलकर उनके कारोबारी हितों को बिल्कुल नई दिशाओं में ले जा सकती हैं.
इस अवधि में बीटन नए क्षेत्रों और भौगोलिक बाजारों में भी विविधीकरण कर सकते हैं. यात्रा की भूमिका महत्वपूर्ण रह सकती है. उनकी बढ़ती उद्यमशीलता की महत्वाकांक्षाओं के साथ उनके कारोबार में बड़े बदलाव हो सकते हैं. स्थापित संगठनों के साथ रणनीतिक साझेदारियां और सहयोग उनके महत्वाकांक्षी दृष्टिकोण को वास्तविकता में बदलने में मदद कर सकते हैं.
मार्च 2027 में उन्हें और लाभ मिल सकता है. उनकी कुछ संपत्तियों का मूल्य काफी बढ़ सकता है, जिससे उनकी संपत्ति में वृद्धि होगी. उन्हें अपनी उपलब्धियों के लिए कोई सम्मान या मान्यता मिल सकती है और उनकी प्रतिष्ठा में और इजाफा हो सकता है.
कारोबारी जिम्मेदारियां बढ़ने के बावजूद उच्च शिक्षा और ज्ञान हासिल करने की उनकी कोशिश जारी रहने की संभावना है. यात्रा के अवसर भी मिल सकते हैं और उन्हें प्रभावशाली राजनेताओं, गणमान्य व्यक्तियों तथा अन्य प्रमुख लोगों से मिलने का मौका मिल सकता है. ऐसे संपर्क निजी और पेशेवर, दोनों स्तरों पर उपयोगी साबित हो सकते हैं.
अप्रैल 2027 भी घटनापूर्ण रह सकता है. मार्च में शुरू हुए कुछ घटनाक्रम अगले महीने तक जारी रह सकते हैं. राजस्व के नए स्रोत उभर सकते हैं और बीटन अतिरिक्त निवेश कर सकते हैं या और संपत्तियां खरीद सकते हैं.
इस दौरान काफी यात्रा होने की संभावना है. वर्ष के पहले चार महीने मिलकर उनके पेशेवर जीवन में महत्वपूर्ण बदलाव का दौर साबित हो सकते हैं. इस दौरान वे नई जिम्मेदारियां संभाल सकते हैं और अपनी व्यावसायिक गतिविधियों का दायरा बढ़ा सकते हैं. जून 2027 में अवसरों का एक और दौर सामने आ सकता है.
बीटन की प्रतिष्ठा बढ़ सकती है. वे अपनी कंपनियों का विस्तार करने के साथ अतिरिक्त जिम्मेदारियां भी संभाल सकते हैं. नई साझेदारियां, सहयोग और रणनीतिक समझौते संभव हैं. उन्हें कोई बड़ा वैकल्पिक खर्च भी करना पड़ सकता है, जो किसी निवेश, अधिग्रहण या निजी संपत्ति से जुड़ा हो सकता है.
उनकी कुछ मौजूदा संपत्तियों का मूल्य बढ़ सकता है, जिससे उनकी वित्तीय स्थिति मजबूत होगी. उनकी शैक्षणिक गतिविधियों में कमी आने की संभावना नहीं है. कारोबारी प्रतिबद्धताएं बढ़ने के बावजूद वे ज्ञान हासिल करना जारी रख सकते हैं.
जुलाई और अगस्त 2027 निवेश, अधिग्रहण और कारोबारी विस्तार के लिहाज से विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो सकते हैं. जुलाई में बीटन संपत्तियां खरीदने, अपने कारोबारी हितों का विस्तार करने या मौजूदा उद्यमों में अपनी स्थिति मजबूत करने के अवसर पहचान सकते हैं. ये घटनाक्रम अगस्त में होने वाले महत्वपूर्ण घटनाक्रमों की नींव रख सकते हैं.
राजस्व के नए स्रोत सामने आ सकते हैं. बीटन बड़े अधिग्रहण कर सकते हैं या अपने कारोबार में पर्याप्त निवेश कर सकते हैं. उनके फैसलों से उनकी उद्यमशीलता की महत्वाकांक्षाएं और स्पष्ट हो सकती हैं. इनमें से कुछ कदम उनकी कंपनियों को विकास के अगले चरण के लिए तैयार करने के उद्देश्य से उठाए जा सकते हैं.
वे अपने मौजूदा उद्यमों में से किसी एक की हिस्सेदारी बेचने के साथ अन्य व्यवसायों या संपत्तियों का अधिग्रहण भी कर सकते हैं. कुछ निवेशों के लिए कर्ज के जरिए वित्तपोषण किया जा सकता है, जिससे वे बड़े स्तर पर अवसरों का लाभ उठा सकेंगे.
अधिग्रहण, निवेश, राजस्व के नए स्रोत और स्वामित्व संरचनाओं में संभावित बदलावों का मेल अगस्त को उनकी उद्यमशीलता की यात्रा का एक महत्वपूर्ण महीना बना सकता है. उनकी राहु-चंद्रमा भुक्ति मई 2028 तक जारी रहेगी. इसके बाद वे राहु-मंगल अवधि में प्रवेश करेंगे, जो मई 2028 से जून 2029 तक चलेगी.
यह उनकी 18 साल की राहु महादशा की अंतिम भुक्ति होगी. राहु की महादशा पहले ही हार्वर्ड में प्रवेश, क्रिमसन एजुकेशन की स्थापना और विस्तार, अनेक शैक्षणिक योग्यताओं, संपत्ति में उल्लेखनीय वृद्धि और अंतरराष्ट्रीय पहचान में बढ़ोतरी के साथ जुड़ी रही है.
इस अवधि के शेष वर्षों में और ऐसे घटनाक्रम सामने आ सकते हैं, जो उनकी महत्वाकांक्षाओं का दायरा बदल दें.
शैक्षणिक महत्वाकांक्षा और उद्यमशीलता का विस्तार
जेमी बीटन को विशेष रूप से दिलचस्प बनाने वाली बात शैक्षणिक उपलब्धियों और उद्यमशीलता की सफलता का असाधारण मेल है. कुछ लोग अपना पूरा जीवन अध्ययन और शोध में लगा देते हैं, ज्ञान अर्जित करते हैं और अपने चुने हुए विषयों में योगदान देते हैं.
दूसरी ओर, कुछ लोग सफल उद्यमी बनते हैं, संगठन खड़े करते हैं और पर्याप्त संपत्ति अर्जित करते हैं. बीटन ने दोनों रास्तों पर एक साथ और असाधारण तीव्रता के साथ काम किया है. उनकी जन्मकुंडली संकेत देती है कि उम्र बढ़ने के साथ उनकी बौद्धिक महत्वाकांक्षाएं कम होने की संभावना नहीं है.
वे उच्च ज्ञान हासिल करना जारी रख सकते हैं और अंततः ऐसे निष्कर्षों तक पहुंच सकते हैं, जो स्थापित विचारों को चुनौती दें. उनके कुछ योगदानों का प्रभाव उनके मौजूदा व्यवसायों से कहीं आगे तक जा सकता है. वे संस्थानों और ज्ञान को समझने या प्रसारित करने के तरीकों को आने वाली पीढ़ियों तक प्रभावित कर सकते हैं.
केवल 31 वर्ष की उम्र में बीटन वह हासिल कर चुके हैं, जिसे अधिकांश लोग अपने पूरे जीवन में हासिल नहीं कर पाते. फिर भी उनकी जन्मकुंडली संकेत देती है कि उनका सबसे महत्वपूर्ण काम अभी भविष्य में हो सकता है. वर्ष 2027 विशेष रूप से संभावनाओं से भरा दिखाई देता है. इसमें कारोबार के पर्याप्त विस्तार, अधिग्रहण, संपत्ति में वृद्धि, प्रभावशाली साझेदारियों और अंतरराष्ट्रीय पहचान बढ़ने के अवसर शामिल हैं.
इस वर्ष उनके कुछ फैसले ऐसी उपलब्धियों की नींव रख सकते हैं, जिनका पूरा महत्व बहुत बाद में सामने आए. उनकी महत्वाकांक्षाएं बढ़ने, उनका प्रभाव नए क्षेत्रों तक पहुंचने और उनकी उद्यमशीलता की यात्रा के एक रोमांचक नए चरण में प्रवेश करने की संभावना है. जेमी बीटन के लिए 2027 उल्लेखनीय प्रगति और किसी बहुत बड़ी उपलब्धि की शुरुआत का वर्ष साबित हो सकता है.
(डिस्क्लेमर: इस लेख में ज्योतिषीय व्याख्याएं और भविष्यवाणियां लेखक के निजी विचार हैं और केवल सामान्य रुचि के लिए प्रस्तुत की गई हैं. ये जरूरी नहीं कि BW Businessworld के विचारों को प्रतिबिंबित करती हों. इन्हें वित्तीय, निवेश, कानूनी या पेशेवर सलाह नहीं माना जाना चाहिए.)
अतिथि लेखक: विक्रम चन्दीरमानी
(विक्रम चन्दीरमानी, एक सेलेब्रिटी ज्योतिषाचार्य हैं, जोकि वर्ष 2001 से ज्योतिष का अभ्यास कर रहे हैं. वह वैदिक और पश्चिमी ज्योतिष के सिद्धांतों को अपनी सहज क्षमताओं के साथ जोड़कर भविष्य के बारे में गहरी अंतर्दृष्टि प्रदान करते हैं.)
इस लेख में विभव कांत उपाध्याय बताते हैं कि इस साझेदारी के अगले अध्याय में बाजारों और परियोजनाओं से आगे बढ़कर संस्थानों, प्रणालियों और राष्ट्र निर्माण की दिशा में आगे बढ़ना क्यों जरूरी है.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
विभव कांत उपाध्याय
भारत और जापान के बीच लगभग 2,000 वर्षों से चली आ रही सभ्यतागत साझेदारी है. बौद्ध धर्म, दर्शन, संस्कृति और ज्ञान के आदान-प्रदान ने आधुनिक राजनयिक संबंधों के अस्तित्व में आने से बहुत पहले ही दोनों देशों के बीच गहरा जुड़ाव स्थापित कर दिया था.
हालांकि, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, इन दोनों महान सभ्यताओं का विकास उल्लेखनीय रूप से अलग-अलग रास्तों पर हुआ. जापान ने युद्ध की तबाही के बाद अपनी अर्थव्यवस्था, उद्योग और संस्थानों के पुनर्निर्माण पर ध्यान केंद्रित किया. औपनिवेशिक शासन से बाहर निकलकर भारत अपने राष्ट्र निर्माण के ढांचे की तलाश कर रहा था और राज्य के नेतृत्व वाली योजना तथा समाजवादी प्रभाव वाली नीतियों से होते हुए आर्थिक उदारीकरण की ओर बढ़ रहा था.
दोनों देश एक-दूसरे का सम्मान करते थे. दोनों के पास एक-दूसरे की पूरक क्षमताएं थीं. फिर भी, उनकी सरकारों, संस्थानों, व्यवसायों और लोगों के बीच संवाद आश्चर्यजनक रूप से सीमित रहा.
1998 में भारत के परमाणु परीक्षणों के बाद जापान द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों ने संबंधों को काफी तनावपूर्ण बना दिया. हालांकि, मेरे आकलन में प्रतिबंध मूल समस्या नहीं थे.
वास्तविक चुनौती निरंतर संवाद की कमी और, इससे भी महत्वपूर्ण, एक साझा उद्देश्य का अभाव था. प्रतिबंध हटाए जा सकते हैं और राजनयिक मतभेद सुलझाए जा सकते हैं. लेकिन साझा उद्देश्य के बिना, मित्र देश भी पीढ़ियों तक एक-दूसरे से दूर रह सकते हैं.
इस समझ ने भारत-जापान संबंधों को नए सिरे से परिभाषित करने वाले एक नए आंदोलन की नींव रखी.
एक नई साझेदारी का जन्म
1990 के दशक के आखिरी वर्षों और 2000 के शुरुआती वर्षों के दौरान, मेरे नेतृत्व में इंडिया सेंटर फाउंडेशन ने भारत और जापान के बीच मौलिक रूप से अलग संबंधों की वकालत शुरू की. हमारा प्रस्ताव था कि दोनों देशों को पारंपरिक व्यापार और कूटनीति से आगे बढ़कर राष्ट्र निर्माण और वैश्विक विकास में भागीदार बनना चाहिए.
इस दृष्टिकोण को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का प्रोत्साहन और आशीर्वाद मिला. इसके बाद प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में पर्याप्त समर्थन और निरंतरता बनी रही. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आगे चलकर भारत-जापान वैश्विक साझेदारी को अगले स्तर तक पहुंचाया, रणनीतिक संबंधों को मजबूत किया और हाई-स्पीड रेलवे परियोजना सहित प्रमुख विकास एवं बुनियादी ढांचा पहलों के क्रियान्वयन को आगे बढ़ाया.
जापान की ओर से योशिरो मोरी, जुनिचिरो कोइजुमी और शिंजो आबे सहित नेताओं ने अपनी-अपनी भूमिकाओं और अलग-अलग चरणों में इस साझेदारी के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया.
मैं विशेष रूप से प्रभावशाली जापानी अर्थशास्त्री और नीति सलाहकार कोइची हमादा के योगदान का उल्लेख करना चाहूंगा. उनके मजबूत विचारों, निरंतर समर्थन और भारत-जापान संबंधों की वकालत ने जापान के लिए भारत के रणनीतिक और आर्थिक महत्व की पहचान को मजबूत करने में मदद की.
नीति निर्माताओं, राजनीतिक नेताओं, व्यवसायों और सामाजिक संस्थानों के साथ संवाद के माध्यम से हमने एक साझा उद्देश्य स्थापित करने का प्रयास किया.
जापान के पास उन्नत तकनीक, औद्योगिक अनुशासन, संस्थागत ज्ञान और दीर्घकालिक वित्तीय संसाधन थे. भारत के पास विशाल मानवीय क्षमता, उद्यमशीलता की क्षमताएं, एक बड़ा घरेलू बाजार और राष्ट्रीय बुनियादी ढांचे की नई पीढ़ी विकसित करने का अवसर था.
जापान भारत को केवल अपने उत्पादों के बाजार के रूप में क्यों देखे? भारत जापान को केवल तकनीक और पूंजी के स्रोत के रूप में क्यों देखे?
हमारा प्रस्ताव था कि जापान भारत की उत्पादक आर्थिक नींव को मजबूत करने में भागीदार बने, जबकि भारत जापान और अंततः व्यापक दुनिया के लिए नए अवसर पैदा करने में भागीदार बने.
इस दृष्टिकोण को सहस्राब्दी के आसपास भारत-जापान वैश्विक साझेदारी पहल के माध्यम से आगे बढ़ाया गया और बाद में दोनों देशों के बीच विस्तारित होते राजनयिक एवं रणनीतिक संबंधों में इसे समर्थन मिला.
मूल विचार सहयोग को व्यावसायिक लेन-देन तक सीमित रखने के बजाय दोनों राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं की पूरक क्षमताओं में तालमेल स्थापित करना था.
विकास की शुरुआत विचारधारा और प्रणालियों से होती है
हमारी सोच के केंद्र में यह विश्वास था कि विकास का उद्देश्य शोषण से सशक्तीकरण की ओर बढ़ना होना चाहिए. यही दर्शन विकसित होकर उस अवधारणा में बदला, जिसे हम वैकल्पिक विकास मॉडल यानी अल्टरनेटिव डेवलपमेंट मॉडल (ADM) कहते हैं. ADM का प्रस्ताव है कि राष्ट्र निर्माण तीन परस्पर जुड़ी परतों के माध्यम से होना चाहिए - विचारधारा → प्रणालियां → परियोजनाएं और उत्पाद.
विचारधारा विकास का उद्देश्य निर्धारित करती है. प्रणालियां उस उद्देश्य को हासिल करने के लिए जरूरी संस्थान और क्षमताएं तैयार करती हैं. परियोजनाएं और उत्पाद ठोस परिणाम प्रदान करते हैं.
जब दो देश साझा विकास दर्शन पर सहमत होते हैं, तो उन्हें अगला कदम उठाते हुए ऐसी प्रणालियां बनानी चाहिए, जो उनकी साझा सोच को टिकाऊ आर्थिक गतिविधियों में बदल सकें.
इस मध्यवर्ती स्तर के बिना, सबसे महत्वाकांक्षी द्विपक्षीय साझेदारी भी असंबद्ध परियोजनाओं का एक संग्रह बनकर रह जाने का जोखिम उठाती है. भारत के लिए यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है. हमने उद्यमशीलता, तकनीक और व्यक्तिगत परियोजनाओं में असाधारण क्षमताएं दिखाई हैं. फिर भी, एकीकृत और विश्वस्तरीय प्रणालियां बनाने का हमारा रिकॉर्ड अब भी असमान रहा है.
एक शहर एक प्रणाली है. रेलवे नेटवर्क एक प्रणाली है. औद्योगिक गलियारा एक प्रणाली है. विमानन इकोसिस्टम एक प्रणाली है. इनकी सफलता केवल भौतिक बुनियादी ढांचे पर निर्भर नहीं करती, बल्कि संस्थागत ढांचे, शासन, वित्त, तकनीक, मानव संसाधन और दीर्घकालिक उद्देश्य पर भी निर्भर करती है.
भारत-जापान सहयोग का उद्देश्य इसी चुनौती से निपटने में मदद करना था.
गलियारों को अर्थव्यवस्थाएं बनानी चाहिए
दिल्ली-मुंबई औद्योगिक गलियारे की परिकल्पना सामाजिक-आर्थिक बदलाव के एक बहुत बड़े दृष्टिकोण के हिस्से के रूप में की गई थी. हमारी मूल सोच में औद्योगिक, कृषि, स्वास्थ्य सेवा और अन्य विशिष्ट आर्थिक इकोसिस्टम सहित कई विकास गलियारे शामिल थे.
इनका उद्देश्य बड़े भौगोलिक क्षेत्र में पारंपरिक विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) बनाना नहीं था. उद्देश्य संपूर्ण आर्थिक प्रणालियां तैयार करना था.
कल्पना कीजिए कि हजारों की संख्या में जापानी उद्यमियों, छोटे और मध्यम आकार के उद्यमों तथा प्रौद्योगिकी कंपनियों को व्यवस्थित रूप से उनके भारतीय समकक्षों से जोड़ा जाए. कल्पना कीजिए कि औद्योगिक क्षेत्र विनिर्माण, अनुसंधान, कृषि, शिक्षा, आवास, स्वास्थ्य सेवा, लॉजिस्टिक्स, स्वच्छ ऊर्जा और मानव विकास को एकीकृत करें.
उद्देश्य केवल जमीन हासिल करना, बुनियादी ढांचा बनाना और कंपनियों को कारखाने स्थापित करने के लिए आमंत्रित करना नहीं था. इसका उद्देश्य नई अर्थव्यवस्थाएं, नए रोजगार और नई उत्पादक क्षमताएं तैयार करना था.
इन इकोसिस्टम की परिकल्पना कई विकास संबंधी मानकों के आधार पर की गई थी: आर्थिक उत्पादकता, ऊर्जा दक्षता, पर्यावरणीय स्थिरता, मानवीय कल्याण और विकास का व्यापक सामाजिक उद्देश्य.
प्रधानमंत्री वाजपेयी का प्रोत्साहन, डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में पर्याप्त समर्थन और प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में प्रमुख पहलों को आगे बढ़ाना, लगातार बदलती सरकारों के बावजूद इस साझेदारी की निरंतरता को दर्शाता है.
हालांकि, मेरा मानना है कि अब हमें यह जांचना चाहिए कि क्या औद्योगिक गलियारों ने अपनी मूल सामाजिक-आर्थिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा किया है. क्या उन्होंने परिकल्पित एकीकृत इकोसिस्टम बनाए हैं? क्या उन्होंने जापानी और भारतीय उद्यमियों को आवश्यक पैमाने पर एक साथ लाया है? क्या उन्होंने नई औद्योगिक संस्कृति और आर्थिक अवसर पैदा किए हैं, जो उनके मूल उद्देश्य का हिस्सा थे?
कुछ पहल सफल हुई हैं, कुछ उम्मीदों पर खरी नहीं उतरीं और कुछ अभी अधूरी हैं. हमें इनकी रचनात्मक समीक्षा करनी चाहिए, किसी को दोषी ठहराने के लिए नहीं, बल्कि मूल महत्वाकांक्षा को फिर से स्थापित करने के लिए.
एक औद्योगिक गलियारे को अर्थव्यवस्था बनानी चाहिए, केवल औद्योगिक क्षेत्र नहीं.
हाई-स्पीड रेल के लिए राष्ट्रीय ढांचे की जरूरत
हाई-स्पीड रेलवे की पहल एक और महत्वपूर्ण सबक देती है. जब हमने भारत में जापान की शिंकानसेन तकनीक लाने की वकालत की थी, तो हमारी महत्वाकांक्षा केवल मुंबई और अहमदाबाद को जोड़ने वाली रेलवे लाइन तक सीमित नहीं थी. हमने लगभग 20,000 किलोमीटर लंबे राष्ट्रीय हाई-स्पीड रेलवे नेटवर्क की परिकल्पना की थी, जो प्रमुख शहरों, औद्योगिक क्षेत्रों और आर्थिक केंद्रों को जोड़ने में सक्षम हो.
इसके बाद चीन में हाई-स्पीड रेल के तेजी से विस्तार ने दिखाया कि दीर्घकालिक राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा के माध्यम से क्या हासिल किया जा सकता है. हमारा मानना था कि भारत को भी व्यक्तिगत मार्गों तक सीमित रहने के बजाय इसी तरह बड़े पैमाने पर सोचना चाहिए.
उद्देश्य उपयुक्त मार्गों पर घरेलू विमानन के लिए एक वास्तविक विकल्प तैयार करना था. भारत ऐतिहासिक रूप से वाणिज्यिक विमानन तकनीक के आयात पर काफी निर्भर रहा है. इसके विपरीत, हाई-स्पीड रेल ने सटीक इंजीनियरिंग, उन्नत विनिर्माण, इलेक्ट्रॉनिक्स, सिग्नलिंग, बुनियादी ढांचे और ट्रेन तकनीक से जुड़े व्यापक घरेलू औद्योगिक इकोसिस्टम के निर्माण का अवसर दिया.
आधुनिक हाई-स्पीड ट्रेनें व्यावसायिक रूप से लगभग 350 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से चल सकती हैं. भविष्य की तकनीकें इससे काफी अधिक गति की अनुमति दे सकती हैं, हालांकि इसके लिए उपयुक्त बुनियादी ढांचे, सुरक्षा प्रणालियों और आर्थिक औचित्य की आवश्यकता होगी.
उपयुक्त मार्गों पर हाई-स्पीड रेल ऊर्जा दक्षता और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी के लाभ प्रदान करते हुए शहर से शहर तक की कुल यात्रा अवधि के मामले में विमानन को टक्कर दे सकती है. लेकिन हमारी मूल सोच में एक और बुनियादी तत्व था - इस राष्ट्रीय दृष्टिकोण को सफल बनाने के लिए आवश्यक संस्थागत ढांचा.
जिस तरह दिल्ली-मुंबई औद्योगिक गलियारा विकास निगम की स्थापना एक नया औद्योगिक इकोसिस्टम विकसित करने के लिए की गई थी, उसी तरह हमने एक समर्पित भारत-जापान हाई-स्पीड रेलवे संस्थान की कल्पना की थी, जो पूरी तरह से नई परिवहन प्रणाली विकसित करने में सक्षम हो. इसके पास राष्ट्रीय हाई-स्पीड रेलवे नेटवर्क तैयार करने के लिए आवश्यक स्वायत्तता, तकनीकी विशेषज्ञता, वित्तीय ढांचा और नेतृत्व होना चाहिए.
दिल्ली मेट्रो की सफलता एक महत्वपूर्ण संस्थागत सबक देती है. इसके विकास में एक समर्पित निगम, पेशेवर नेतृत्व और पारंपरिक भारतीय रेलवे से अलग परिचालन संरचना का लाभ मिला. यह भारतीय रेलवे की आलोचना नहीं है, जो एक बहुत बड़ी और आवश्यक राष्ट्रीय जिम्मेदारी निभाता है.
लेकिन एक विशाल पारंपरिक रेलवे नेटवर्क चलाने के लिए बनाई गई संस्था से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह उसी संस्थागत संस्कृति और निर्णय लेने की प्रक्रियाओं का उपयोग करते हुए एक बिल्कुल अलग परिवहन प्रणाली भी तैयार कर लेगी. एक नए विकास मॉडल के लिए उसी के अनुरूप संस्थानों की आवश्यकता होती है. यह केवल पुराने मॉडल का विस्तार नहीं हो सकता.
भारत पहले ही नेशनल हाई-स्पीड रेल कॉरपोरेशन लिमिटेड की स्थापना कर चुका है, लेकिन रेलवे मंत्रालय के साथ इसके संस्थागत संबंध और इसके व्यापक कार्यक्षेत्र पर फिर से विचार करने की जरूरत है.
मेरे विचार में, हाई-स्पीड रेल कार्यक्रम के लिए कहीं अधिक स्वायत्त राष्ट्रीय संस्थान की आवश्यकता है, जिसमें भारत-जापान की स्पष्ट तकनीकी साझेदारी, स्वतंत्र पेशेवर नेतृत्व और मौजूदा मुंबई-अहमदाबाद परियोजना से आगे बढ़कर काम करने का अधिकार हो.
इसका नेतृत्व एक अनुभवी तकनीकी विशेषज्ञ को करना चाहिए, जिसे परिवहन, इंजीनियरिंग, विनिर्माण, वित्त और संस्थागत विकास के विशेषज्ञों का समर्थन प्राप्त हो. ऐसा संस्थान पारदर्शी जवाबदेही और पेशेवर स्वतंत्रता बनाए रखते हुए सरकार के सर्वोच्च स्तर पर सीधे रणनीतिक निगरानी के तहत काम कर सकता है.
यह राष्ट्रीय हाई-स्पीड रेलवे मास्टर प्लान विकसित कर सकता है, घरेलू तकनीकी क्षमताएं स्थापित कर सकता है, टिकाऊ वित्तपोषण तंत्र तैयार कर सकता है और चरणबद्ध नेटवर्क विस्तार का समन्वय कर सकता है. वर्तमान चर्चा अक्सर निर्माण की समयसीमा, लागत में बढ़ोतरी और अलग-अलग खंडों को चालू करने तक सीमित रहती है.
ये महत्वपूर्ण परिचालन संबंधी सवाल हैं, लेकिन बुनियादी रणनीतिक सवाल नहीं हैं. बड़ा मुद्दा यह है कि क्या हम भारत की हाई-स्पीड रेलवे महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए जरूरी संस्थागत प्रणाली बना रहे हैं. अभी भी देर नहीं हुई है.
प्रधानमंत्री और सरकार द्वारा जापान के समर्थन से किया गया निर्णायक संस्थागत सुधार इस कार्यक्रम को नई राष्ट्रीय दिशा दे सकता है. हमें हाई-स्पीड रेल की सफलता का आकलन केवल इस आधार पर नहीं करना चाहिए कि पहली ट्रेन कब चलना शुरू करती है.
हमें यह देखना चाहिए कि क्या भारत अंततः एक आधुनिक, किफायती, तकनीकी रूप से उन्नत और राष्ट्रीय स्तर पर एकीकृत हाई-स्पीड परिवहन प्रणाली तैयार कर पाता है.
द्विपक्षीय व्यापार से आगे
आज 2030 तक भारत-जापान द्विपक्षीय व्यापार को 50 अरब डॉलर तक बढ़ाने को लेकर काफी चर्चा हो रही है. यह एक सराहनीय महत्वाकांक्षा है, लेकिन व्यापार को साझेदारी के अंतिम उद्देश्य के साथ भ्रमित नहीं करना चाहिए.
व्यापार आर्थिक गतिविधियों का परिणाम है. जरूरी नहीं कि यह आर्थिक बदलाव को मापने का सबसे सार्थक पैमाना हो. किसी भारतीय औद्योगिक इकोसिस्टम में जापानी निवेश कई दशकों तक रोजगार, तकनीक हस्तांतरण, घरेलू विनिर्माण, निर्यात और उत्पादकता में सुधार पैदा कर सकता है. इसका आर्थिक योगदान द्विपक्षीय व्यापार के आंकड़ों में दिखाई देने वाले योगदान से कहीं अधिक हो सकता है.
हमने मूल रूप से राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं की पूरक क्षमताओं में तालमेल स्थापित करने का प्रस्ताव दिया था. जापान के पास उन्नत तकनीक, औद्योगिक क्षमताएं, वित्तीय संसाधन और संस्थागत अनुभव है. भारत के पास मानवीय क्षमता, उद्यमशीलता की ऊर्जा, एक बड़ी घरेलू अर्थव्यवस्था और विकास की विशाल आवश्यकताएं हैं.
जापान जनसांख्यिकीय चुनौतियों का सामना कर रहा है और टिकाऊ विकास के नए स्रोत तलाश रहा है. भारत को उत्पादक रोजगार पैदा करने, बुनियादी ढांचे को मजबूत करने और अपनी तकनीकी एवं औद्योगिक क्षमताओं का विस्तार करने की जरूरत है. ये पूरक परिस्थितियां पारंपरिक व्यापार से कहीं आगे सहयोग का अवसर प्रदान करती हैं.
इस साझेदारी को ऐसे संस्थान बनाने चाहिए, जो जापानी उद्यमियों, वित्तीय संस्थानों और तकनीकी विकासकर्ताओं को भारतीय व्यवसायों, विश्वविद्यालयों, उद्योगों और समुदायों के साथ निरंतर सहयोग में लाएं. बाजार आधारित निवेश जारी रहना चाहिए. लेकिन इसके साथ राष्ट्रीय स्तर पर सोच-समझकर प्रणाली निर्माण भी होना चाहिए.
कुछ कंपनियां स्वतंत्र रूप से किसी बाजार में प्रवेश कर सकती हैं. लेकिन पूरी तरह नया आर्थिक इकोसिस्टम बनाने में हजारों उद्यमों की भागीदारी के लिए बुनियादी ढांचे, संस्थानों, समन्वय और साझा विकास ढांचे की जरूरत होती है. बाजार सफल प्रणाली निर्माण का परिणाम होने चाहिए, उसका विकल्प नहीं.
क्वाड के विकास का अवसर
भारत-जापान वैश्विक साझेदारी का हमारा मूल दृष्टिकोण कभी भी भारत की सीमाओं तक सीमित रहने के लिए नहीं था. हमारा मानना था कि दोनों देश अंततः अपनी पूरक क्षमताओं को अफ्रीका, मध्य पूर्व, लैटिन अमेरिका और अन्य ऐसे क्षेत्रों तक ले जा सकते हैं, जिन्हें टिकाऊ सामाजिक-आर्थिक विकास की जरूरत है.
यह व्यापक सोच क्वाड की संभावनाओं के बारे में मेरी समझ को भी दिशा देती है. क्वाड में भारत, जापान, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं. क्वाड का औपचारिक राजनयिक विकास अपना अलग इतिहास रखता है, जिसमें 2004 की हिंद महासागर सुनामी के बाद सहयोग और 2007 में शुरू हुआ चतुर्भुज संवाद शामिल हैं.
लेकिन इसकी भविष्य की संभावनाएं केवल भू-राजनीतिक और समुद्री सुरक्षा संबंधी विचारों तक सीमित नहीं होनी चाहिए. चारों देशों के पास तकनीक, वित्त, प्राकृतिक संसाधन, शिक्षा, विनिर्माण, नवाचार और मानव पूंजी के क्षेत्र में असाधारण पूरक क्षमताएं हैं.
वे मिलकर बुनियादी ढांचे, स्वास्थ्य सेवा, कृषि, ऊर्जा, कनेक्टिविटी और टिकाऊ आर्थिक विकास के लिए नई प्रणालियां विकसित कर सकते हैं. क्वाड पहले से ही रक्षा से आगे बढ़कर सहयोग करता है, लेकिन मेरा मानना है कि इसके सामाजिक-आर्थिक विकास के मिशन का काफी विस्तार किया जाना चाहिए.
वास्तविक सुरक्षा केवल राष्ट्रीय सीमाओं की रक्षा करना नहीं है. इसमें लोगों की शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, ऊर्जा, रोजगार और आर्थिक अवसरों तक पहुंच सुनिश्चित करने की क्षमता भी शामिल है. भारत और जापान इस व्यापक विकास दर्शन को अंतरराष्ट्रीय सहयोग में शामिल करने में मदद कर सकते हैं.
मूल योजना की ओर लौटने का समय
भारत-जापान संबंधों के साथ लगभग तीन दशकों तक काम करने के बाद, मेरा मानना है कि अब ईमानदारी और रचनात्मकता के साथ यह आकलन करने का समय आ गया है कि हमने मूल रूप से क्या परिकल्पना की थी और क्या हासिल किया है. इंडिया सेंटर फाउंडेशन के माध्यम से हमने जो आंदोलन खड़ा किया था, वह केवल निवेश को बढ़ावा देने या राजनयिक संपर्कों तक सीमित नहीं था.
यह विचारों, संवाद और दृढ़ विश्वास का आंदोलन था, जिसका उद्देश्य दो महान देशों के बीच एक नई सामाजिक-आर्थिक साझेदारी स्थापित करना था. भारत और जापान में इस समझ को विकसित करने के लिए काफी प्रयास किए गए कि यह संबंध एक साझा उद्देश्य पर आधारित होना चाहिए: सशक्तीकरण के माध्यम से राष्ट्र निर्माण. इस बौद्धिक और संस्थागत निवेश को अपना उद्देश्य नहीं खोना चाहिए.
इसलिए, मैं भारत और जापान की सरकारों से अपील करता हूं कि वे प्रमुख बुनियादी ढांचा और विकास पहलों के पीछे मौजूद मूल सामाजिक-आर्थिक दृष्टिकोण की व्यापक समीक्षा करें. औद्योगिक गलियारों का मूल्यांकन संपूर्ण आर्थिक इकोसिस्टम तैयार करने की उनकी मूल महत्वाकांक्षा के आधार पर किया जाना चाहिए.
हाई-स्पीड रेलवे कार्यक्रम की समीक्षा केवल निर्माण परियोजना के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्रीय परिवहन और तकनीकी प्रणाली की नींव के रूप में की जानी चाहिए. साझेदारी के संस्थागत ढांचे को मजबूत किया जाना चाहिए, ताकि सरकारों, उद्यमियों, वित्तीय संस्थानों, विश्वविद्यालयों, तकनीकी विकासकर्ताओं और नागरिक समाज को एकीकृत किया जा सके.
हमें आर्थिक उत्पादकता, ऊर्जा दक्षता, पर्यावरणीय स्थिरता, मानव विकास और दीर्घकालिक राष्ट्रीय क्षमताओं के आधार पर सफलता के स्पष्ट मानक भी स्थापित करने चाहिए. यह समीक्षा राजनीतिक आलोचना का अभ्यास नहीं बननी चाहिए. वाजपेयी और मनमोहन सिंह से लेकर नरेंद्र मोदी तक, लगातार बनी रही सरकारों ने भारत-जापान संबंधों को आगे बढ़ाने में योगदान दिया है.
अब काम उन योगदानों को आगे बढ़ाने और उन संस्थागत कमियों को दूर करने का है, जो हमारी महत्वाकांक्षाओं को पूरी तरह साकार करने में अब भी बाधा बन रही हैं. हमारे कुछ प्रयास उल्लेखनीय रूप से सफल रहे हैं. दूसरे प्रयासों से वह परिणाम नहीं मिला, जिसकी हमने मूल रूप से उम्मीद की थी. कई प्रयासों में अभी और काम करने की जरूरत है.
इसे स्वीकार करने में कोई शर्म नहीं है. वास्तविक विफलता सीखना बंद कर देना होगा.
अगली पीढ़ी के लिए संदेश
मैं विशेष रूप से भारत और जापान की युवा पीढ़ियों से कहना चाहता हूं कि वे समझें कि यह साझेदारी दो सरकारों के बीच संबंध या दो अर्थव्यवस्थाओं के बीच व्यावसायिक व्यवस्था से कहीं अधिक है. यह ऐसी नई प्रणालियां, उद्योग, तकनीकें और संस्थान बनाने का अवसर है, जो लाखों लोगों को सशक्त बना सकें.
भारत को केवल विनिर्माण केंद्र बनने की जरूरत नहीं है, हालांकि विनिर्माण आवश्यक बना रहेगा. हमारे भविष्य में विज्ञान, इंजीनियरिंग, कृषि, स्वास्थ्य सेवा, नवाचार और अन्य उत्पादक क्षेत्रों को भी शामिल होना चाहिए. जापान को केवल पूंजी और तकनीक के स्रोत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए और न ही भारत को केवल बाजार या मानव संसाधन के स्रोत के रूप में.
दोनों देशों को खुद को पूरी तरह नया विकास ढांचा बनाने वाले साझेदारों के रूप में देखना चाहिए. यह ढांचा टिकाऊ, आर्थिक रूप से उत्पादक, पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार और मानव सशक्तीकरण पर केंद्रित होना चाहिए.
वैकल्पिक विकास मॉडल एक साझा उद्देश्य के इर्द-गिर्द विचारधारा, प्रणालियों, परियोजनाओं और उत्पादों को एक साथ लाकर इस महत्वाकांक्षा के लिए एक रूपरेखा प्रदान करता है. अगली पीढ़ी को इस सोच को आगे बढ़ाना चाहिए, मौजूदा मान्यताओं को चुनौती देनी चाहिए और ऐसे संस्थान बनाने चाहिए, जो उस पैमाने पर परिणाम दे सकें, जिसे हम अभी तक हासिल नहीं कर पाए हैं.
अधूरा मिशन
पिछली चौथाई सदी में भारत-जापान साझेदारी की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही है कि दोनों देशों के एक-दूसरे को देखने के नजरिए में बदलाव आया है. हम सीमित संवाद और अपर्याप्त जुड़ाव से आगे बढ़कर कहीं व्यापक रणनीतिक और आर्थिक संबंधों तक पहुंचे हैं.
प्रमुख बुनियादी ढांचा पहलों की परिकल्पना की गई, नए संस्थान अस्तित्व में आए और बड़ी साझेदारी की नींव रखी गई. लेकिन यात्रा अभी अधूरी है. द्विपक्षीय व्यापार को 50 अरब डॉलर तक पहुंचाने की महत्वाकांक्षा महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे मंजिल के बजाय एक पड़ाव के रूप में देखा जाना चाहिए. असली सवाल यह है कि क्या भारत और जापान ऐसी प्रणालियां बना रहे हैं, जो उन्हें कहीं बड़े पैमाने पर टिकाऊ आर्थिक और सामाजिक मूल्य पैदा करने में सक्षम बनाएंगी.
हमें मूल योजना की ओर लौटना चाहिए, हासिल की गई उपलब्धियों को खारिज करने के लिए नहीं, बल्कि उस काम को पूरा करने के लिए जिसकी परिकल्पना की गई थी. आइए, हम अपने संस्थानों को मजबूत करें, अपने विकास गलियारों की समीक्षा करें, अपने हाई-स्पीड रेलवे ढांचे पर फिर से विचार करें और उद्यमियों, नीति निर्माताओं, शिक्षाविदों तथा युवाओं को नए सिरे से संवाद में शामिल करें.
हमें याद रखना चाहिए कि भारत-जापान वैश्विक साझेदारी का उद्देश्य कभी भी केवल बाजारों का विस्तार करना नहीं था. इसका उद्देश्य राष्ट्रों को सशक्त बनाना, टिकाऊ समृद्धि पैदा करना और अंततः इस सहयोग के लाभों को व्यापक दुनिया तक पहुंचाना था. मैं एक ऐसी व्यक्तिगत स्मृति के साथ अपनी बात समाप्त करना चाहूंगा, जो आज भी मेरे दिल के बेहद करीब है.
कई साल पहले, मेरे प्रिय मित्र और दिवंगत प्रधानमंत्री शिंजो आबे, जिन्हें मैं अपना भाई मानता था, और मैंने एक बुनियादी सवाल पर चर्चा की थी, जो दोनों देशों के संबंधों में बार-बार उठता था.
भारत में लोग पूछते थे: भारत को जापान के साथ इतने करीब से काम क्यों करना चाहिए? जापान हमारे लिए इतना खास क्यों है?
जापान में भी इसी तरह के सवाल उठाए जाते थे: जापान को भारत के साथ काम क्यों करना चाहिए? भारत जापान के लिए इतना खास क्यों है?
ये जायज सवाल थे और इनके जवाब व्यापार, निवेश, कूटनीति या तत्काल राष्ट्रीय हितों से आगे बढ़कर दिए जाने जरूरी थे. हमारी चर्चाओं के दौरान, मैंने एक सरल मंत्र का प्रस्ताव रखा, जिससे शिंजो आबे सहमत थे.
इसने उस साझेदारी के सार को व्यक्त किया, जिसे बनाने का हम प्रयास कर रहे थे: “एक मजबूत जापान, एक मजबूत भारत है. एक मजबूत भारत, एक मजबूत जापान है.” यह केवल मित्रता का वक्तव्य नहीं था. यह पारस्परिक सशक्तीकरण का दर्शन था.
इसका अर्थ था कि एक देश की समृद्धि, तकनीकी प्रगति, संस्थागत मजबूती और वैश्विक प्रतिष्ठा को दूसरे देश की प्रगति और शक्ति में योगदान देना चाहिए. इसका अर्थ था कि हमारे राष्ट्रीय हितों को एक-दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा करने की जरूरत नहीं है, बल्कि साझा विकास दृष्टिकोण के माध्यम से वे एक-दूसरे को मजबूत कर सकते हैं.
इसका यह भी अर्थ था कि भारत और जापान को अपनी साझेदारी की सफलता का आकलन केवल इस आधार पर नहीं करना चाहिए कि प्रत्येक देश को दूसरे से क्या मिलता है, बल्कि इस आधार पर करना चाहिए कि वे अपने लोगों और पूरी मानवता के लिए मिलकर क्या बना सकते हैं. आज मेरा मानना है कि यह मंत्र पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है.
इसी विश्वास के साथ, मैं भारत और जापान के नागरिकों, युवाओं, उद्यमियों, नीति निर्माताओं और नेताओं से अपील करता हूं. आइए, हम एक बार फिर विश्वास, मित्रता और साझा उद्देश्य की उसी भावना के साथ एक साथ आएं. आइए, भारत-जापान वैश्विक साझेदारी के अधूरे मिशन को पूरा करें. आइए, हम एक-दूसरे की कीमत पर नहीं, बल्कि एक-दूसरे को सशक्त बनाकर मजबूत संस्थान, मजबूत अर्थव्यवस्थाएं और मजबूत समाज बनाएं.
एक मजबूत जापान, एक मजबूत भारत है. एक मजबूत भारत, एक मजबूत जापान है. आने वाली पीढ़ियों के लिए यही हमारी साझा प्रतिबद्धता, हमारा मार्गदर्शक दर्शन और हमारा सामूहिक मिशन होना चाहिए.
(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं और जरूरी नहीं कि वे BW Businessworld के विचारों को भी दर्शाते हों.)
अतिथि लेखक: विभव कांत उपाध्याय
(विभव कांत उपाध्याय इंडिया सेंटर फाउंडेशन और इंडिया जापान फाउंडेशन के अध्यक्ष तथा वैकल्पिक विकास मॉडल के संस्थापक और प्रस्तावक हैं. उन्होंने भारत-जापान संबंधों और सामाजिक-आर्थिक विकास के संस्थागत दृष्टिकोणों पर काम करते हुए लगभग तीन दशक बिताए हैं.)
लेखक विक्रम चन्दीरमानी के अनुसार, बच्चों में जिज्ञासा, कल्पनाशीलता, मुश्किलों से उबरने की क्षमता और खुशी का असाधारण गुण होता है. वयस्क होने के सफर में कहीं न कहीं हम अक्सर इनमें से कुछ खूबियां खो देते हैं. शायद अब समय आ गया है कि हम उन्हें फिर से खोजें.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
विक्रम चन्दीरमानी
बच्चों से वयस्क बहुत कुछ सीख सकते हैं. उनके व्यवहार को थोड़ी देर ध्यान से देखिए, तो शायद आप सोचने लगेंगे कि बड़े होने के अपने तमाम फायदों के बावजूद, इस प्रक्रिया में हमें कुछ बेहद खूबसूरत चीजें भूलनी भी पड़ती हैं.
एक छोटे बच्चे के लिए दुनिया हमेशा आकर्षित करने वाली जगह होती है. उड़ती हुई तितली, बारिश के बाद बना पानी का गड्ढा, गुजरती हुई ट्रेन या फर्श पर रेंगता हुआ कोई कीड़ा उसका पूरा ध्यान अपनी ओर खींच सकता है. वे चीजों को छूना चाहते हैं, उन्हें बारीकी से देखना चाहते हैं, खोलकर समझना चाहते हैं कि वे कैसे काम करती हैं. और वे सवाल पूछते हैं. लगातार सवाल. आसमान नीला क्यों है? हवा कहां से आती है? लोगों को काम क्यों करना पड़ता है? हम नाश्ते में आइसक्रीम क्यों नहीं खा सकते? और लंबी कार यात्रा के दौरान उनका हमेशा पसंदीदा सवाल होता है: हम अभी तक पहुंचे क्यों नहीं?
इनमें से कुछ सवाल मजेदार होते हैं. कुछ आश्चर्यजनक रूप से गहरे होते हैं. कभी-कभी कोई बच्चा ऐसा अप्रत्याशित सवाल पूछ देता है कि दशकों से किसी बात को सहज मानते आ रहे वयस्क को भी उसका जवाब देने में मुश्किल होने लगती है. बच्चों में टालमटोल वाले जवाबों को पहचानने की भी गजब की क्षमता होती है. “क्योंकि मैंने कहा है” जैसा जवाब शायद ही उन्हें संतुष्ट करता है, हालांकि थके हुए माता-पिता के बीच यह अब भी लोकप्रिय है.
इस जिज्ञासा के साथ उनकी कल्पनाशीलता भी जुड़ी होती है, जिसकी कोई खास सीमा नहीं होती. किसी बच्चे को कागज और रंग दे दीजिए, वह खुशी-खुशी घंटों अपनी कलाकृतियां बनाने में बिता सकता है. रंग उसकी उंगलियों, कपड़ों, फर्श और संभव है कि फर्नीचर पर भी लग जाएं. लेकिन कलाकार को इन बातों से खास फर्क नहीं पड़ता. उसकी बनाई तस्वीर का वैसा दिखना भी जरूरी नहीं है, जैसा उसने सोचा था. और अगर आप यह पहचान नहीं पा रहे हैं कि उसने क्या बनाया है, तो अंदाजा लगाने के बजाय उससे पूछना ही बेहतर होता है.
कभी-कभी बच्चों को खिलौनों की भी जरूरत नहीं होती. टेलीविजन खोलने के बाद बचा एक बड़ा गत्ते का डिब्बा उन्हें घंटों व्यस्त रख सकता है. एक पल वह घर बन जाता है, अगले पल सुरंग, फिर किला, कार या किसी दूसरी आकाशगंगा की ओर जाता अंतरिक्ष यान. हो सकता है कि वह उस महंगे खिलौने से कहीं ज्यादा मनोरंजक साबित हो, जो किसी दूसरे डिब्बे में आया था. ऐसे में माता-पिता सोचते रह जाते हैं कि आखिर उन्होंने खिलौने पर इतने पैसे खर्च क्यों किए.
बिना यह चिंता किए कुछ बनाने की आजादी में एक खास खूबसूरती है कि नतीजा अच्छा होगा या नहीं. छोटे बच्चे शब्द जाने बिना गाते हैं, कदम जाने बिना नाचते हैं और उन चीजों को भी पूरे उत्साह से करने की कोशिश करते हैं, जिन्हें उन्होंने पहले कभी नहीं किया. किसी संगीत वाद्ययंत्र पर तीन सुर बजाना सीख चुका बच्चा पूरे परिवार के सामने संगीत कार्यक्रम पेश करने की जिद कर सकता है. उससे उम्मीद की जाती है कि उसका हर श्रोता प्रस्तुति की सराहना करेगा, चाहे प्रदर्शन कैसा भी हो.
बड़े होते-होते हममें से कई लोग यह आजादी खो देते हैं. हम गाना छोड़ देते हैं. हम सोचते हैं कि हमारी आवाज अच्छी नहीं है, हमारे पैर नाचने के लिए सही नहीं हैं या हममें चित्रकारी की प्रतिभा नहीं है. जो गतिविधियां कभी हमें खुशी देती थीं, उन्हें हम उन लोगों के लिए छोड़ देते हैं, जिन्हें हम अपने से बेहतर मानते हैं. हम अपनी सीमाओं को लेकर इतने सचेत हो जाते हैं कि कोशिश करने का आनंद भी खुद से छीन लेते हैं.
और फिर भी, बचपन में हम असफलता को सहजता से स्वीकार कर लेते थे.
चलना सीख रहे किसी छोटे बच्चे को देखिए. वह कुछ झिझकते हुए कदम बढ़ाता है, संतुलन खोता है और गिर जाता है. हो सकता है कि वह रोने लगे. कभी-कभी उसकी आवाज इतनी तेज होती है कि चोट की गंभीरता के मुकाबले प्रतिक्रिया कहीं ज्यादा बड़ी लगती है. थोड़ा दुलार, शायद ध्यान भटकाने के लिए कोई दूसरी चीज और कुछ ही देर में बच्चा फिर अपने पैरों पर खड़ा होकर वही कोशिश करने लगता है. कुछ मिनट पहले मिली असफलता वह पहले ही भूल चुका होता है.
कुछ साल बाद यही बच्चा साइकिल से गिर सकता है, उसके घुटने छिल सकते हैं, वह खूब रो सकता है और फिर दोबारा कोशिश करने की जिद कर सकता है. वह बाकी दोपहर यह सोचते हुए नहीं बिताता कि शायद वह साइकिल चलाने के लिए बना ही नहीं है. न ही वह गिरने को इस बात का सबूत मानता है कि वह कभी सफल नहीं हो पाएगा. उसे निश्चित रूप से इस अनुभव से मिली सीख के बारे में सोशल मीडिया पर लंबी पोस्ट लिखने की जरूरत भी महसूस नहीं होती.
असफलता सीखने की प्रक्रिया का एक हिस्सा भर है. कल्पना कीजिए कि अगर हम जीवन भर इस सोच का थोड़ा-सा हिस्सा भी अपने भीतर बनाए रखें, तो कितना कुछ हासिल कर सकते हैं.
स्नेह जताने के मामले में भी बच्चे उतने ही बेझिझक होते हैं. जब वे किसी से प्यार करते हैं, तो उसे गले लगाते हैं, उससे लिपट जाते हैं और अपने प्यार का इजहार करते हैं. वे यह हिसाब नहीं लगाते कि सामने वाला भी उतना ही स्नेह लौटाएगा या नहीं, अथवा अपनी भावनाएं जाहिर करने से वे कमजोर पड़ सकते हैं. जब वे आपको देखकर खुश होते हैं, तो उनकी भावनाओं को समझने में कोई गलती होने की गुंजाइश बहुत कम होती है. उनका स्नेह ऐसे साथियों तक भी पहुंच सकता है, जिनकी कोई उम्मीद नहीं करता. कोई बच्चा घर के एक्वेरियम में तैरती छोटी-सी मछली से भी गहरा भावनात्मक लगाव विकसित कर सकता है. वह उसका नाम रखता है, हर सुबह उसका अभिवादन करता है और उसके बीमार दिखने पर चिंता करता है. किसी वयस्क के लिए वह टैंक में तैरती कई मछलियों में से एक हो सकती है. लेकिन बच्चे के लिए वह एक दोस्त है.
उनकी ईमानदारी कभी-कभी असुविधाजनक भी हो सकती है. कोई छोटा बच्चा कह सकता है कि आपका बनाया खाना बहुत खराब है, किसी मेहमान से पूछ सकता है कि वह गंजा या मोटा क्यों है, या अपने माता-पिता की निजी बातचीत में कही गई बात को दोहरा सकता है. अक्सर वह ऐसा सबसे अनुचित समय पर करता है. जब ऐसी बातें अनजान लोगों के सामने तेज आवाज में कही जाती हैं, तो माता-पिता को शर्मिंदगी उठानी पड़ सकती है. बच्चों ने अभी तक उन जटिल सामाजिक तौर-तरीकों को नहीं सीखा होता, जिनके जरिए वयस्क कभी-कभी अपनी वास्तविक भावनाओं को छिपाते हैं.
बेशक, विवेक और संवेदनशीलता महत्वपूर्ण हैं. हर विचार को व्यक्त करना जरूरी नहीं है. लेकिन इस तरह के बिना किसी रोक-टोक वाले व्यवहार में कुछ ताजगी जरूर है, भले ही कभी-कभी माता-पिता चाहते हों कि उनके बच्चे बोलने से पहले थोड़ा सोच लिया करें.
दोस्ती को लेकर उनका नजरिया भी उतना ही सरल होता है. दो ऐसे बच्चे, जो पहले कभी नहीं मिले, किसी पार्क में एक-दूसरे से मिल सकते हैं और कुछ ही मिनटों में इस तरह साथ खेलने लगते हैं, मानो वर्षों से दोस्त हों. हो सकता है कि वे एक-दूसरे की भाषा भी न समझते हों. लेकिन इससे खास फर्क नहीं पड़ता. एक गेंद, झूला या साथ खेला जाने वाला खेल ही अक्सर दोस्ती के लिए पर्याप्त होता है.
उन्हें यह जानने की जरूरत नहीं होती कि दूसरे बच्चे के माता-पिता क्या काम करते हैं, वे कहां रहते हैं, कितने अमीर हैं या भविष्य में यह दोस्ती किसी काम आएगी या नहीं. यहां कोई संपर्क बढ़ाने की रणनीति नहीं होती, न ही बिजनेस कार्ड का आदान-प्रदान होता है. इस बात पर भी कोई चर्चा नहीं होती कि वे एक-दूसरे के जीवन में क्या उपयोगिता जोड़ सकते हैं. वे बस एक-दूसरे का साथ पसंद करते हैं.
स्वाभाविक है कि वे झगड़ते भी हैं. कभी-कभी तो बहुत बुरी तरह. किसी खिलौने को लेकर हुआ विवाद आंसुओं, आरोपों और इस गंभीर घोषणा तक पहुंच सकता है कि अब वे एक-दूसरे से कभी बात नहीं करेंगे. आधे घंटे बाद वही दोनों बच्चे खुशी-खुशी साथ खेलते नजर आ सकते हैं और झगड़ा लगभग पूरी तरह भूल चुके होते हैं. न किसी मध्यस्थ की नियुक्ति हुई होती है, न वकील ने माफी का मसौदा तैयार किया होता है और न ही किसी ने सार्वजनिक रूप से बयान वापस लेने की मांग की होती है.
दूसरी ओर, वयस्क कई सालों तक पुरानी शिकायतों को मन में पालकर रख सकते हैं, कभी-कभी तब भी, जब मूल विवाद का कोई महत्व नहीं रह जाता. हम पुराने दुखों को नई परिस्थितियों में भी साथ लेकर चलते हैं और कभी-कभी किसी एक अप्रिय घटना को वर्षों के स्नेह या दोस्ती पर हावी होने देते हैं.
बच्चे मदद मांगने में भी ज्यादा नहीं हिचकिचाते. कोई चीज उनकी पहुंच से बाहर हो, तो वे किसी लंबे व्यक्ति से मदद मांग लेते हैं. कुछ समझ न आए, तो उसका स्पष्टीकरण मांगते हैं. कोई काम न कर पाएं, तो किसी से उसे करके दिखाने के लिए कहते हैं. उन्होंने अभी तक यह मानना नहीं सीखा होता कि मदद मांगना कमजोरी या अयोग्यता की निशानी है.
दिलचस्प बात यह है कि वे उन वयस्कों से भी सवाल करने में सक्षम होते हैं, जिनसे वे मदद मांगते हैं. जिसने भी बच्चे का पालन-पोषण किया है, वह जानता है कि यह कितना थकाने वाला हो सकता है. निर्देशों के जवाब में सवाल आते हैं, स्पष्टीकरण देने पर और सवाल उठते हैं और पूरी तरह उचित नियमों पर भी लंबी बातचीत शुरू हो सकती है. कभी-कभी बच्चे बातचीत की प्रक्रिया को पूरी तरह छोड़कर ठीक वही कर देते हैं, जिसके लिए उन्हें मना किया गया था. माता-पिता को पता चल सकता है कि तीन साल के बच्चे में किसी अनुभवी ट्रेड यूनियन नेता जितनी बातचीत और मोलभाव करने की क्षमता है, लेकिन समझौता करने में उसकी कोई खास दिलचस्पी नहीं है.
फिर भी, उनके भीतर अधिकार को सवालों के घेरे में रखने की जो सहज प्रवृत्ति होती है, उसमें कुछ प्रशंसनीय है. उन्होंने अभी तक यह नहीं सीखा होता कि कोई नियम सिर्फ इसलिए समझदारी भरा होगा, क्योंकि उसे किसी बड़े या अधिक शक्तिशाली व्यक्ति ने बनाया है. दूसरी ओर, वयस्क कभी-कभी उन परंपराओं का पालन करते रहते हैं, जिनके अस्तित्व का कारण वे बहुत पहले भूल चुके होते हैं.
बच्चे अपनी कल्पनाओं में बेहद महत्वाकांक्षी भी होते हैं. किसी छोटे बच्चे से पूछिए कि बड़ा होकर वह क्या बनना चाहता है, तो जवाब अंतरिक्ष यात्री, वैज्ञानिक, फुटबॉलर, जादूगर या सुपरहीरो हो सकता है. कभी-कभी वह एक साथ कई चीजें बनना चाहता है. उसके पास यह मानने का कोई खास कारण नहीं होता कि असाधारण चीजें उसकी पहुंच से बाहर हैं. किसी ने अभी तक उसे यह नहीं बताया होता कि सुपरहीरो के लिए नौकरियों के अवसर काफी सीमित हैं.
धीरे-धीरे वे योग्यता, प्रतिस्पर्धा, आर्थिक सीमाओं और महत्वाकांक्षा तथा उपलब्धि के बीच आने वाली कई बाधाओं के बारे में सीखेंगे. इनमें से कुछ बातें जानना जरूरी है. लेकिन किसी सपने को पूरा करने में आने वाली कठिनाइयों को समझने और कोशिश करने से पहले ही उसे छोड़ देने में फर्क है.
शायद बच्चों की सबसे प्यारी खूबियों में से एक यह है कि उन्हें खुश होने के लिए कभी-कभी बहुत कम चीजों की जरूरत होती है. अचानक मिल जाने वाली आइसक्रीम उनका पूरा दिन बना सकती है. समुद्र तट की सैर, इंद्रधनुष देखना, खेलने के लिए उत्सुक कोई पिल्ला या अपने पसंदीदा दादा-दादी से मिलने की संभावना भी उन्हें खुश कर सकती है. कोई बच्चा पूरी दोपहर रेत के महल बनाने में बिता सकता है, जिन्हें आखिरकार समुद्र की लहरें बहा ले जाएंगी. इस गतिविधि से कोई स्थायी या उपयोगी चीज बनना जरूरी नहीं है. आनंद तो उसे करने में ही है.
वयस्क होने पर हमें अक्सर यह साबित करने की जरूरत महसूस होती है कि हम अपना समय जिस तरह बिता रहे हैं, वह सही है. उम्मीद की जाती है कि शौक किसी उपलब्धि में बदलें, बेहतर हो कि ऐसी उपलब्धि हो जिसे लिंक्डइन पर दिखाया जा सके. रुचियों का उत्पादक होना जरूरी माना जाने लगता है और यहां तक कि खाली समय को भी अधिकतम उपयोगी बनाने की कोशिश की जाती है. कहीं न कहीं हम यह भूल जाते हैं कि किसी काम को सिर्फ इसलिए करना कि उससे हमें खुशी मिलती है, अपने आप में पर्याप्त कारण है. कोई बच्चा दो घंटे तक पानी के गड्ढे में छप-छप कर सकता है, बिना व्यक्तिगत विकास, नए कौशल सीखने या उस अनुभव को पेशेवर तरक्की के लिए इस्तेमाल करने की चिंता किए.
जब बच्चे आनंद ले रहे होते हैं, तो वे अक्सर पूरी तरह उसी पल में डूबे होते हैं. वे इस बात की चिंता नहीं करते कि पिछले सप्ताह क्या हुआ था या अगले महीने क्या हो सकता है. वे कल हुई किसी असहज बातचीत को बार-बार याद नहीं करते और न ही उन मुश्किलों की कल्पना करते हैं, जो शायद कभी आएंगी ही नहीं.
उस तरह पूरी तरह किसी काम में डूब जाने में एक तरह की आजादी है. वयस्क अक्सर उसे फिर से पाने के लिए ध्यान, सजगता और दूसरी गतिविधियों पर काफी समय और पैसा खर्च करते हैं. एक बच्चा बिना किसी सप्ताहांत शिविर में गए, सिर्फ एक बाल्टी, फावड़े और रेत के छोटे से हिस्से की मदद से उस स्थिति को हासिल कर सकता है.
छोटे बच्चे लोगों से भी एक ऐसी सहजता के साथ मिलते हैं, जो वयस्क जीवन में धीरे-धीरे दुर्लभ होती जा रही है. उन्होंने अभी तक वे संदेह, पूर्वाग्रह और निराशाएं जमा नहीं की होतीं, जो वयस्कों के कई रिश्तों को आकार देती हैं. वे अक्सर इस बात में ज्यादा रुचि रखते हैं कि कोई व्यक्ति मिलनसार है या उनके साथ खेलना चाहता है, न कि समाज ने उस व्यक्ति पर कौन-से लेबल लगा रखे हैं.
बेशक, बच्चों को सतर्क रहना सीखना चाहिए. भरोसे के साथ विवेक भी जरूरी है और केवल मासूमियत ऐसी दुनिया से बचाव नहीं कर सकती, जो हमेशा दयालु नहीं होती. लेकिन समझदारी से लोगों को परखने और हर बात को लेकर नकारात्मक हो जाने में फर्क है.
समय बीतने के साथ हम ज्ञान, अनुभव और जिम्मेदारियां हासिल करते हैं. हम संयम बरतना, परिणामों का अनुमान लगाना, निराशा से निपटना और कठिन फैसले लेना सीखते हैं. ये बड़े होने की प्रक्रिया के जरूरी हिस्से हैं. फिर भी, इस प्रक्रिया में कहीं न कहीं हम कभी-कभी उन चीजों को भी छोड़ देते हैं, जिन्हें छोड़ने की हमें जरूरत नहीं थी.
हम खुद को लेकर ज्यादा सचेत हो जाते हैं, स्नेह जताने में अधिक सावधानी बरतते हैं, दूसरों की नजरों में अपनी छवि को लेकर ज्यादा चिंतित रहते हैं और शर्मिंदगी के डर से जोखिम उठाने से कतराने लगते हैं. अनजान या कम जानकारी वाला दिखने के डर से सवाल पूछना कम कर देते हैं. हम अपनी उपलब्धियों की तुलना दूसरों से करने लगते हैं. हमारे पास अधिक सामान हो सकता है, लेकिन हमें खुश करना पहले से ज्यादा मुश्किल हो जाता है.
जो दुनिया कभी आश्चर्यों से भरी लगती थी, वह धीरे-धीरे जानी-पहचानी हो जाती है. हम उन चीजों पर ध्यान देना बंद कर देते हैं, जो कभी हमें आकर्षित करती थीं. इंद्रधनुष खुशी देने वाली चीज के बजाय मौसम विज्ञान की एक घटना बन जाता है. तितली महज एक और कीड़ा रह जाती है. और खाली गत्ते का डिब्बा ऐसी चीज बन जाता है, जिसे समतल करके रीसाइक्लिंग के लिए भेज देना चाहिए.
बेशक, बचपन कोई ऐसी आदर्श अवस्था नहीं है, जिसमें हमें लौटने की कोशिश करनी चाहिए. बच्चे स्वार्थी, अधीर, अनुचित मांग करने वाले और असाधारण रूप से जिद्दी भी हो सकते हैं. जिसने भी किसी छोटे बच्चे के साथ समय बिताया है, वह जानता है कि मासूमियत और अच्छा व्यवहार हमेशा साथ-साथ नहीं चलते. दूसरे बिस्कुट से मना किए जाने पर कोई छोटा बच्चा इस तरह प्रतिक्रिया कर सकता है, मानो उसके किसी मौलिक संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन हो गया हो.
बड़े होने के लिए हमें वे खूबियां भी विकसित करनी होती हैं, जो बच्चों में अभी नहीं आई होतीं. लेकिन परिपक्वता हासिल करने के लिए जिज्ञासा, अपनापन, कल्पनाशीलता या खुशी को खोना जरूरी नहीं है. हम जिम्मेदार होते हुए भी कठोर होने से बच सकते हैं, सावधान रहते हुए भी डरपोक नहीं बनना पड़ता, ज्ञान हासिल करते हुए भी नए विचारों के लिए खुले रह सकते हैं और महत्वाकांक्षी होते हुए भी छोटी-छोटी खुशियों का आनंद लेना नहीं भूलना चाहिए.
शायद उम्र बढ़ने की असली उपलब्धि यह है कि हम बचपन में मौजूद खूबियों को पूरी तरह बदलने के बजाय उनमें समझदारी और अनुभव जोड़ें. कुछ नया करने की हिम्मत बनाए रखें, सवाल पूछने में विनम्रता दिखाएं, दूसरों को माफ करने का उदार भाव रखें और साधारण चीजों में खुशी खोजने की क्षमता बचाकर रखें.
आखिरकार, हम अपने बचपन का एक बड़ा हिस्सा वयस्क बनना सीखने में बिताते हैं. शायद हमें अपने वयस्क जीवन का थोड़ा-सा हिस्सा फिर से बच्चा बनना याद करने में बिताना चाहिए.
और शायद, कभी-कभी, हमें एक खाली गत्ते के डिब्बे को देखकर उसमें अंतरिक्ष यान भी दिखाई देना चाहिए.
अतिथि लेखक: विक्रम चन्दीरमानी,
(विक्रम चन्दीरमानी, एक सेलेब्रिटी ज्योतिषाचार्य हैं, जोकि वर्ष 2001 से ज्योतिष का अभ्यास कर रहे हैं. वह वैदिक और पश्चिमी ज्योतिष के सिद्धांतों को अपनी सहज क्षमताओं के साथ जोड़कर भविष्य के बारे में गहरी अंतर्दृष्टि प्रदान करते हैं.)
अतुल जैन का तर्क है कि टिकाऊ अंतर पैदा करने के लिए मौजूदा उत्पादों को लगातार बेहतर बनाने के बजाय यह समझना जरूरी है कि ग्राहक आगे क्या चाहते हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अतुल जैन
हर उद्योग को अंततः एक ही सवाल का सामना करना पड़ता है. जब ग्राहक आपके उत्पाद को दूसरे उत्पादों के समान और उनके स्थान पर इस्तेमाल किए जा सकने वाले विकल्प के रूप में देखने लगते हैं, तो क्या होता है?
इस स्थिति में आमतौर पर कंपनियां वितरण, ब्रांडिंग या कीमत पर अधिक निवेश करने लगती हैं. ये सभी पहलू महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इनसे शायद ही कभी मूल चुनौती का समाधान होता है. कमोडिटीकरण से विशेषज्ञता की ओर बदलाव तब शुरू होता है, जब कोई कारोबार यह पूछना बंद कर देता है कि उसी उत्पाद को अधिक कैसे बेचा जाए और इसके बजाय यह तलाशने लगता है कि ग्राहकों की ऐसी कौन-सी अधूरी जरूरत है, जिसके बारे में उन्होंने अभी तक बात भी नहीं की है.
सामान रखने वाले बैग और सूटकेस (लगेज) उद्योग पर गौर करें.
दशकों तक लगेज को मुख्य रूप से एक उपयोगी उत्पाद श्रेणी के रूप में देखा गया. लोग अपना सामान एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के लिए सूटकेस खरीदते थे. बिक्री का फैसला टिकाऊपन, कीमत और उपलब्धता के आधार पर होता था. उत्पाद का मूल उद्देश्य कभी बदलने वाला नहीं था. इस वजह से यह श्रेणी कमोडिटीकरण का एक आदर्श उदाहरण लगती थी.
इसके बावजूद, इस श्रेणी ने बार-बार खुद को नए सिरे से विकसित किया. हर बार सूटकेस सूटकेस ही रहा. बदलाव इस बात में आया कि ग्राहक किस चीज के लिए अधिक कीमत चुकाने को तैयार थे.
सामग्री का सवाल
अंतर पैदा करने की शुरुआती लहर सामग्री के जरिए आई. जैसे-जैसे यात्रा अधिक आम और विविध होती गई, उपभोक्ता हल्के लेकिन मजबूत लगेज की मांग करने लगे. इसका पहला जवाब कठोर प्लास्टिक के रूप में सामने आया. 1960 के दशक के आखिरी वर्षों में इंजेक्शन-मोल्डेड पॉलीप्रोपाइलीन के खोल वाले सूटकेस बाजार में आए. बाद में यह तरीका आधुनिक हार्ड लगेज बनाने के सबसे व्यापक रूप से स्वीकार किए जाने वाले तरीकों में शामिल हो गया. इसके बाद भी उद्योग में नवाचार जारी रहा. ध्यान उन्नत पॉलिमर, अधिक मजबूत बाहरी खोल और ऐसे पदार्थों पर केंद्रित हुआ, जो अधिक टूट-फूट सहन कर सकें. ग्राहकों ने इन बदलावों पर ध्यान दिया और इनके लिए अधिक कीमत चुकाई.
पहिए, हैंडल और आवाजाही
आवाजाही को आसान बनाने में सुधार एक और उल्लेखनीय बदलाव था. कंपनियों ने समझा कि यात्री केवल बैग और सूटकेस नहीं ले जा रहे हैं, बल्कि हवाई अड्डों, रेलवे स्टेशनों, फुटपाथों और भीड़भाड़ वाले टर्मिनलों से होकर गुजर रहे हैं. इसके जवाब में उद्योग ने चार पहियों वाले स्पिनर सूटकेस, बेहतर गतिशीलता, टेलीस्कोपिक हैंडल और वजन को बेहतर तरीके से वितरित करने वाली व्यवस्थाओं जैसे नवाचार पेश किए. इनमें से किसी ने भी लगेज के मूल काम को नहीं बदला. बदलाव इस बात में आया कि उपभोक्ताओं के लिए अपनी यात्रा के दौरान सामान ले जाना कितना आसान हो गया.
एक उत्पाद के रूप में मानसिक सुकून
यात्री यह भरोसा चाहते थे कि उनका सामान सुरक्षित रहेगा और सही सलामत पहुंचेगा. इसके जवाब में उद्योग ने एकीकृत लॉक, छेड़छाड़ से सुरक्षित जिपर, मल्टी-पॉइंट लॉकिंग सिस्टम, RFID-ब्लॉकिंग पॉकेट, स्मार्ट ट्रैकिंग सुविधाएं और हाल के वर्षों में बायोमेट्रिक एक्सेस जैसी सुविधाएं पेश कीं. तकनीकें बदलती रहीं, लेकिन उद्देश्य वही रहा- यात्रियों को अधिक मानसिक सुकून देना.
जब स्मार्ट तकनीक का सामना हकीकत से हुआ
2015 से 2020 के बीच कनेक्टेड लगेज के क्षेत्र में उद्योग के प्रयोग इसके विकास का एक महत्वपूर्ण अध्याय रहे. ऐसे सूटकेस बाजार में आए, जिनमें फोन चार्ज करने के लिए इनबिल्ट पावर बैंक, चेक-इन काउंटर पर वजन का अनुमान लगाने की जरूरत खत्म करने वाले सेंसर और ऐप से जुड़ी सुविधाएं थीं. इनका उद्देश्य लगेज को यात्रियों के साथ रहने वाले अन्य उपकरणों जितना स्मार्ट बनाना था. इनमें से कुछ विचार ज्यादा समय तक नहीं टिके, जबकि कुछ ने यह समझने में मदद की कि यात्री वास्तव में किन सुविधाओं को महत्व देते हैं.
उपयोगिता से पहचान तक
लगेज तेजी से आत्म-अभिव्यक्ति का माध्यम बन रहा है. उपभोक्ता अब यात्रा से जुड़े उत्पाद केवल सामान रखने की क्षमता या टिकाऊपन के आधार पर नहीं चुनते. डिजाइन, सुंदरता, शिल्प कौशल, व्यक्तिगत पसंद के अनुसार बदलाव और ब्रांड से जुड़ाव भी खरीदारी के फैसलों को प्रभावित करते हैं. कई श्रेणियों में लगेज की स्थिति घड़ियों या जूतों जैसी हो गई है, जो कार्यात्मक और भावनात्मक, दोनों तरह की जरूरतें पूरी करते हैं. कभी केवल उपयोगिता के लिए की जाने वाली खरीदारी अब व्यक्तिगत पहचान का विस्तार बन गई है.
अगला पड़ाव
स्थिरता अब एक बार फिर मूल्य की परिभाषा का विस्तार कर रही है. वैश्विक ब्रांडों ने रिसाइकिल किए गए प्लास्टिक कचरे, जैसे दही के कप और प्लास्टिक की बोतलों से बने उत्पादों की श्रृंखलाएं पेश करना शुरू कर दिया है. इन उत्पादों को विशेषज्ञ रिसाइक्लिंग भागीदारों के साथ कई वर्षों के विकास के बाद तैयार किया गया है. ग्राहक अब केवल यह नहीं पूछ रहे कि कोई उत्पाद कैसा प्रदर्शन करता है, बल्कि यह भी जानना चाहते हैं कि इस्तेमाल के बाद वह क्या पीछे छोड़ता है. जो ब्रांड इस सवाल का विश्वसनीय जवाब देंगे, वे ग्राहकों की पसंद में एक नई जगह बना सकेंगे.
हर उद्योग के लिए सीख
मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इनमें से किसी भी बदलाव ने लगेज के मूल काम को नहीं बदला. इन बदलावों ने केवल यह बदला कि ग्राहक किस चीज को महत्व देते हैं.
यह अंतर हर उद्योग के लिए एक महत्वपूर्ण सबक है. सबसे सफल उत्पाद श्रेणियां शायद ही कभी वे होती हैं, जो अपने मूल उद्देश्य तक सीमित रहती हैं. उदाहरण के लिए, एथलेटिक परिधान कभी मुख्य रूप से खेल प्रदर्शन को ध्यान में रखकर बनाए जाते थे. आज एथलीजर (Athleisure) के बढ़ते चलन से उपभोक्ताओं की कहीं व्यापक जरूरत का पता चलता है, जिसमें आराम, बहुउपयोगिता और आत्म-अभिव्यक्ति उतने ही महत्वपूर्ण हैं, जितना कि खेल के लिए उपयोगी होना.
गद्दे भी घर की जरूरत के लिए खरीदे जाने वाले उत्पाद से बदलकर वेलनेस श्रेणी का हिस्सा बन गए हैं, जहां नींद की गुणवत्ता, शरीर की रिकवरी और स्वास्थ्य पर ध्यान दिया जाता है. यहां तक कि पैकेज्ड पानी भी केवल प्यास बुझाने तक सीमित नहीं रहा. अब इसकी अलग-अलग श्रेणियां शुद्धता, खनिजों की मात्रा, सुविधा और प्रीमियम अनुभव के आधार पर तय होती हैं.
कमोडिटीकरण से बाहर निकलने वाले संगठन अपने प्रतिस्पर्धियों से पहले इस बदलाव को समझ लेते हैं. वे उत्पाद को लगातार बेहतर बनाने के बजाय उसके इर्द-गिर्द मिलने वाले मूल्य का विस्तार करके अलग पहचान बनाते हैं.
एक बार यह बदलाव हो जाए, तो नए अवसरों को पहचानना आसान हो जाता है. बातचीत का केंद्र उत्पाद की विशेषताओं से हटकर ग्राहक के अनुभव पर आ जाता है. अपने कारोबार को भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार करने की कोशिश कर रहे नेतृत्वकर्ताओं के लिए शायद यही सबसे महत्वपूर्ण सवाल है- ग्राहक को अगली जरूरत क्या है और उसे पूरा करने के लिए हम ही सही विकल्प क्यों हैं?
डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं और जरूरी नहीं कि वे प्रकाशन के विचारों को दर्शाते हों.
अतिथि लेखक: अतुल जैन, प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी (MD & CEO) VIP Industries
टेस्ला की सड़क यात्रा इस बात पर विचार करने का मौका देती है कि कैसे अलग पहचान वाले उत्पाद लोगों को उनका समर्थक बनाते हैं और क्यों दमदार ब्रांडों को भी एक व्यापक मानवीय सोच की जरूरत होती है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
रवि देशपांडे
हाल ही में, अमेरिका में छुट्टियां बिताने के दौरान मेरे चचेरे भाई आनंद ने अपनी टेस्ला कार से हमें न्यूयॉर्क से बोस्टन तक पहुंचाया. आनंद को तकनीक और भविष्य के बारे में जानने की स्वाभाविक जिज्ञासा हमेशा से रही है. वह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से जुड़े समाधान देने वाली एक कंपनी भी चलाते हैं, इसलिए शायद यह कोई आश्चर्य की बात नहीं थी कि उन्हें टेस्ला के फुल सेल्फ-ड्राइविंग सिस्टम पर मुझसे कहीं ज्यादा आसानी से भरोसा हो गया.
जैसे ही हम हाईवे पर पहुंचे, उन्होंने गंतव्य दर्ज किया और कहा, “टेस्ला हमें बोस्टन पहुंचा देगी.” यह सुनकर मुझे पूरी तरह आश्वस्त महसूस नहीं हुआ.
पहले आधे घंटे तक मैं सड़क, स्टीयरिंग व्हील और वहां से गुजरने वाले हर ट्रक को उसी एकाग्रता से देखता रहा, जैसे मैं ड्राइविंग टेस्ट दे रहा हूं. कार ने लेन बदली, घुमावदार रास्तों पर चली और बेहद सटीकता के साथ एग्जिट संभाले. धीरे-धीरे डर जिज्ञासा में बदला और फिर भरोसे जैसी भावना में.
जब तक हम बोस्टन पहुंचे, तब तक मैंने हर कुछ सेकंड में कार के बारे में सोचना बंद कर दिया था. वापसी की यात्रा में भी मैंने लगभग उसी तरह सफर किया. इस बार मैंने कार के बारे में शायद ही कुछ सोचा हो. मैं बस सफर का आनंद ले रहा था.
मेरे लिए टेस्ला का यह सबसे प्रभावी विज्ञापन था
ऑटोनॉमस ड्राइविंग यानी स्वचालित ड्राइविंग के बारे में कोई फिल्म या प्रस्तुति उस अनुभव की बराबरी नहीं कर सकती, जिसमें आप कार में बैठे हों और वह ऐसे फैसले ले रही हो, जो सामान्य तौर पर आप खुद लेते. उत्पाद खुद अपनी क्षमता दिखाता है. और एक बार जब आप इसका अनुभव कर लेते हैं, तो स्वाभाविक रूप से दूसरों से इसके बारे में बात करने लगते हैं.
टेस्ला में किसी ने मुझसे यह लेख लिखने के लिए नहीं कहा. कार ने ऐसा किया. अपना अधिकांश कामकाजी जीवन ब्रांड बनाने में बिताने वाले व्यक्ति के लिए यह एक दिलचस्प विचार है. हम उत्पादों को आकर्षक बनाने के लिए उन्हें दिलचस्प तरीके से पेश करने में बहुत समय और मेहनत लगाते हैं. लेकिन तब क्या होता है, जब उत्पाद खुद इतना दिलचस्प हो कि लोग उसके बारे में बात करने लगें?
इस ड्राइव ने यात्रा के स्वरूप को भी बदल दिया. आनंद का ध्यान लगातार हाईवे पर नहीं था, इसलिए हमने कारोबार, AI, परिवार, भारत और अमेरिका के बारे में ज्यादा बातचीत की. कार के AI सिस्टम ग्रोक ने हमें रास्ते से बहुत दूर जाए बिना एक रेस्तरां खोजने में मदद की और रास्ते में पड़ने वाली जगहों के बारे में जानकारी भी दी. लंबा सफर कम थकाने वाला और कहीं ज्यादा बातचीत से भरा हो गया.
इसने मुझे सोचने पर मजबूर किया कि क्या यह विलासिता का एक नया रूप भी है. सिर्फ चमड़ा, लकड़ी, क्रोम या इंजन की ताकत नहीं, बल्कि समय और ध्यान. ऐसी विलासिता, जिसमें आप कम थककर अपनी मंजिल पर पहुंचें और आपके साथ यात्रा कर रहे लोगों के लिए आपके पास ज्यादा ऊर्जा बची रहे.
टेस्ला की बड़ी उपलब्धि सिर्फ यह नहीं है कि उसने इलेक्ट्रिक कारों या ड्राइवर असिस्टेंस तकनीक का आविष्कार किया. उसने इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, सॉफ्टवेयर और इंटेलिजेंट ड्राइविंग को इस तरह एक साथ जोड़ा कि कार एक बिल्कुल अलग श्रेणी का उत्पाद महसूस होने लगी. उसने लोगों को यह कल्पना करने के लिए प्रेरित किया कि कार का भविष्य कैसा हो सकता है.
इसके लिए सिर्फ नवाचार पर्याप्त नहीं है. इसके लिए दृढ़ विश्वास और लगातार प्रयास की जरूरत होती है. एलन मस्क के बारे में किसी की भी राय कुछ हो सकती है, लेकिन उन विचारों को लगातार आगे बढ़ाने की उनकी इच्छा को स्वीकार किया जाना चाहिए, जो किसी श्रेणी की स्थापित परंपराओं को चुनौती देते हैं. आज लगभग हर बड़ा ऑटोमोबाइल निर्माता इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर बढ़ रहा है. इसमें वे लग्जरी ब्रांड भी शामिल हैं, जिनकी पहचान इंजन, उसकी आवाज और मैकेनिकल प्रदर्शन के इर्द-गिर्द बनी थी. इस पूरी श्रेणी की दिशा बदल गई है और टेस्ला ने निश्चित रूप से इसे बदलने में मदद की है.
फिर भी कुछ ऐसे क्षेत्र हैं, जहां मैं व्यक्तिगत रूप से चाहता हूं कि यह ब्रांड और आगे बढ़े. उदाहरण के लिए, कार के इंटीरियर में थोड़ी ज्यादा गर्माहट और शिल्प कौशल की गुंजाइश हो सकती है. मैं मिनिमलिज्म यानी सादगी और कम से कम चीजों के इस्तेमाल के आकर्षण को समझता हूं, लेकिन मेरी राय में इस कीमत पर कार के केबिन में इंद्रियों को आनंद देने वाले अनुभवों के लिए भी जगह है. सादगी को खोए बिना, उसमें एक और परत जोड़कर ऐसा किया जा सकता है.
तकनीक प्रशंसा पैदा करती है. डिजाइन और भावनाएं चाहत को गहरा करती हैं. सबसे मजबूत ब्रांड आमतौर पर इन दोनों के बीच संतुलन बना लेते हैं.
और फिर भारत है
अमेरिका के हाईवे भारतीय सड़कों से बिल्कुल अलग हैं. भारतीय सड़कों पर बाइक, रिक्शा, पैदल यात्री, बसें, अचानक लेन बदलने वाले वाहन और हर पल बदलती परिस्थितियां होती हैं. यदि टेस्ला की तकनीक अंततः इस माहौल को भी सहजता से संभाल पाती है, तो यह एक उल्लेखनीय उपलब्धि होगी.
लेकिन भारत में टेस्ला के लिए इससे भी बड़ा सवाल शायद ज्यादा दिलचस्प है: एक पहले से ही शक्तिशाली वैश्विक ब्रांड बिल्कुल अलग बाजार में अपनी उतनी ही मजबूत प्रासंगिकता कैसे स्थापित कर सकता है?
यदि टेस्ला के कुछ सबसे प्रभावशाली तकनीकी अनुभव अभी भारतीय उपभोक्ताओं के लिए पूरी तरह उपलब्ध नहीं हैं, तो यहां उसके उत्पाद की कौन-सी खासियत सबसे महत्वपूर्ण होगी? इलेक्ट्रिक प्रदर्शन? सॉफ्टवेयर? सादगी? इंटेलिजेंट ड्राइविंग? कार रखने और इस्तेमाल करने का अनुभव? या फिर सिर्फ ऐसी कार रखने का एहसास, जो भविष्य से जुड़ी हो?
भारत में प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है. वैश्विक लग्जरी ब्रांड, भारतीय निर्माता और एशियाई कंपनियां, सभी तेजी से आगे बढ़ रही हैं.
वैश्विक पहचान आपको लोगों की नजरों में लाती है. स्थानीय प्रासंगिकता आपको चुने जाने का कारण देती है. और यहीं से मैं फिर ब्रांड निर्माण की बात पर लौटता हूं.
कुछ महानतम ब्रांड सिर्फ अपने उत्पादों की श्रेष्ठता के दम पर नहीं बने. नाइकी के पास बेहतर प्रदर्शन देने वाले उत्पाद थे, लेकिन उसके 'जस्ट डू इट' अभियान ने इसे मानवीय संभावनाओं से जोड़ दिया. एप्पल के पास तकनीक थी, लेकिन 'थिंक डिफरेंट' ने उसे दुनिया को देखने का एक नजरिया दिया. BMW के पास इंजीनियरिंग थी, लेकिन 'द अल्टीमेट ड्राइविंग मशीन' ने उस इंजीनियरिंग को एक खास अंदाज दिया. द इकोनॉमिस्ट ने सिर्फ जानकारी नहीं बेची. उसने बौद्धिक क्षमता को आकांक्षा का विषय बना दिया.
इन ब्रांडों के पास मजबूत उत्पाद थे, लेकिन उनके पास अपना एक नजरिया भी था. उन्होंने लोगों को जुड़ने के लिए एक बड़ा विचार दिया.
आज टेस्ला या एप्पल जैसे ब्रांडों के पास ऐसी चीज है, जिससे मार्केटिंग करने वाले ईर्ष्या कर सकते हैं: वास्तव में अलग पहचान वाले उत्पाद, जिनके फायदे सीधे अनुभव किए जा सकते हैं. इस लिहाज से उत्पाद खुद ही विज्ञापन का बड़ा हिस्सा कर रहा है.
लेकिन इससे अगला अवसर भी पैदा हो सकता है. जब कोई उत्पाद लोगों की प्रशंसा हासिल कर लेता है, तो क्या ब्रांड उसके इर्द-गिर्द कोई बड़ा मानवीय विचार भी विकसित कर सकता है?
एक मजबूत उत्पाद लोगों को आपके काम की सराहना करने के लिए प्रेरित करता है. एक मजबूत विचारधारा उन्हें आपसे जुड़ने का एक और कारण देती है. जब ये दोनों साथ आते हैं, तो ब्रांड अपने बेचे जाने वाले उत्पादों से कहीं बड़ा बन सकता है.
टेस्ला के पास पहले से ही तकनीक, साहस और एक बेहद शक्तिशाली ब्रांड है. अब इससे आगे बढ़ने का रास्ता शायद अपनी तमाम तकनीकी उपलब्धियों को एक और स्पष्ट मानवीय सोच से जोड़ने में है.
ऐसा इसलिए नहीं कि विज्ञापन को उत्पाद को बचाने की जरूरत है. बल्कि इसका ठीक उलटा है. जब आपके पास पहले से इतना आकर्षक उत्पाद हो, तो ब्रांड का एक मजबूत विचार उसे और भी बड़ी मंजिल तक पहुंचा सकता है.
मेरे लिए इस यात्रा की बड़ी सीख यही है. ब्रांड निर्माण हमेशा किसी उत्पाद में वास्तव में मूल्यवान चीज खोजने और फिर उसे उसके व्यावहारिक लाभ से आगे एक अर्थ देने के बारे में रहा है. अब जो बदल रहा है, वह शायद इसका क्रम है. पहले विज्ञापन को अक्सर उन उत्पादों के बीच अंतर पैदा करने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ती थी, जो लगातार एक-दूसरे जैसे होते जा रहे थे. आज कुछ सबसे दिलचस्प ब्रांडों की शुरुआत वास्तव में अलग पहचान वाले उत्पादों से होती है.
यह एक बड़ा फायदा है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि विचारधारा, कहानी कहने या अपना नजरिया रखने का महत्व कम हो गया है. संभव है कि अब इनका महत्व और बढ़ गया हो.
क्योंकि उत्पाद प्रमाण देता है, अनुभव लोगों को उसका समर्थक बनाता है और विचारधारा अर्थ पैदा करती है. सबसे मजबूत ब्रांड वे होते हैं, जो इन तीनों को एक साथ लाने में सफल होते हैं.
जब मैंने बोस्टन के लिए यात्रा शुरू की थी, तब मैं कार को लेकर वास्तव में घबराया हुआ था. न्यूयॉर्क लौटते समय मैं उससे बेफिक्र होकर बातचीत कर रहा था, जबकि कार खुद वे तमाम काम कर रही थी, जिन्होंने कुछ दिन पहले मुझे बेचैन कर दिया था.
यह अपने आप में तकनीक के बारे में कुछ कहता है. और शायद ब्रांडों के बारे में इससे भी ज्यादा. सबसे मजबूत ब्रांड सिर्फ यह नहीं बताते कि वे अलग हैं. वे आपको उस अंतर का अनुभव करने देते हैं.
और जब उस अनुभव के साथ ऐसा विचार भी जुड़ जाए, जिस पर लोग विश्वास कर सकें, तो एक बेहतरीन उत्पाद कुछ और बड़ा बन सकता है.
शायद यही वह अतिरिक्त दूरी है, जिसे तय करना सार्थक है.
(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं और जरूरी नहीं कि वे BW Businessworld के विचारों को दर्शाते हों.)
अतिथि लेखक: रवि देशपांडे
(लेखक रवि देशपांडे Whyness के संस्थापक और चेयरमैन हैं. उन्हें विज्ञापन, डिजाइन, ब्रांड निर्माण और क्रिएटिव नेतृत्व के क्षेत्र में कई दशकों का अनुभव है.)
2047 तक विकसित, दिवाली 2026 तक विसर्जित
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
गणपति आए, गणपति चले गए, रिटेल निवेशकों के पोर्टफोलियो भी उनके साथ अरब सागर में चले गए और बप्पा के विपरीत, वे "पुढच्या वर्षी लवकर" वापस नहीं आ रहे हैं.
विसर्जित भारत में आपका स्वागत है: दुनिया की एकमात्र ऐसी अर्थव्यवस्था जहां हर कारोबारी दिन संपत्ति विसर्जन के लिए चली जाती है, जबकि सरकार किनारे पर खड़ी होकर ताली बजाती है और चिल्लाती है, "कोई बात नहीं, रिटेल संभाल लेगा!"
वह स्कोरबोर्ड जिसे नॉर्थ ब्लॉक पढ़ने से इनकार करता है
सेंसेक्स: ~71,900. शिखर: ~86,800. यानी 15,000 अंक, करीब 17%, वाष्पित हो गए. निफ्टी 22,450 से नीचे है, करीब 14% नीचे. हमारे पास लगातार आठ हफ्तों की गिरावट रही है. सितंबर में एफपीआई ने ₹45,500 करोड़ निकाले, फिर अकेले 1 अक्टूबर को 9,500 करोड़ रुपये और बेच दिए. वह भी एक दिन में. दोपहर के भोजन से पहले.
रुपया साल की शुरुआत में करीब 90 पर था. अब यह 97 के आसपास मंडरा रहा है. इसने इस साल बॉलीवुड के उस हीरो से ज्यादा वजन कम किया है, जो बायोपिक की तैयारी कर रहा हो.
लेकिन आराम से रहिए. सरकार में कोई भी इसे रिकॉर्ड पर नहीं कहेगा, लेकिन गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि यह सब वैसे भी सिर्फ सट्टा है.
सट्टा सिद्धांत: कभी कहा नहीं जाता, हमेशा महसूस होता है
आधिकारिक तौर पर, किसी ने कभी बाजार को सट्टा नहीं कहा है. अनौपचारिक रूप से, नीति ऐसे लिखी गई है जैसे किसी ने ऐसा कहा हो. हर टैक्स बढ़ोतरी, एफपीआई की बिकवाली पर हर कंधे उचकाना, हर "रिटेल इसे संभाल लेगा" में एक ही ऑफ-द-रिकॉर्ड मूड है: यह सिर्फ एक कैसीनो है, उन्हें जुआ खेलने दो. ठीक है. अगर यही वह सोच है जिसे कोई स्वीकार नहीं करेगा, तो कुछ सवाल:
अगर यह सट्टा है, तो आप इस पर ब्लू-चिप की तरह टैक्स क्यों लगाते हैं? एसटीसीजी 15% से बढ़कर 20% हो गया. एलटीसीजी 10% से बढ़कर 12.5% हो गया. इसके ऊपर एसटीटी और स्टांप ड्यूटी भी है. यहां तक कि एक कैसीनो भी अपना हिस्सा लेने के साथ मुफ्त ड्रिंक देता है. यह वित्त मंत्री सरकार का हिस्सा लेते हुए भी भाषण देते हैं.
अगर यह सट्टा है, तो आपके अपने इकोसिस्टम ने वर्षों तक नागपुर की हर आंटी को "म्यूचुअल फंड सही है" क्यों बताया? या तो आपने मानव इतिहास में सबसे बड़ा सट्टा भर्ती अभियान चलाया, या बाजार अर्थव्यवस्था का पूंजी इंजन है और आप इसे समझते ही नहीं हैं. एक चुनिए. आप दोनों नहीं कर सकते.
अगर यह सट्टा है, तो आपका अपना ईपीएफओ प्रोविडेंट फंड का पैसा इक्विटी ईटीएफ में क्यों लगा रहा है? पेंशन का पैसा मटका डेन में? कृपया अपने खिलाफ ही एफआईआर दर्ज करें.
सट्टे में कमाई, डिविडेंड, कैपेक्स और ऐसे आईपीओ नहीं होते जो फैक्ट्रियों के लिए फंड जुटाएं. बाजार में ये सभी चीजें होती हैं. बाजार में जो नहीं है, वह ऐसी सरकार है जो बुनियादी गणित कर सके.
रिटर्न का गणित: मंत्रालय के लिए धीरे-धीरे समझाया गया
एक एफपीआई देशभक्त नहीं है. वह ब्लूमबर्ग टर्मिनल वाला एक स्प्रेडशीट है. उसे डॉलर में 12–15% चाहिए. भारत उसे यह देता है:
निफ्टी उदारतापूर्वक 12% कमाता है. यह उदार है क्योंकि फिलहाल वह माइनस साइन कमा रहा है.
एलटीसीजी 12.5% पर मलाई निकाल लेता है, जिससे ~10.5% बचता है.
रुपया ~6.5% कमजोर हो जाता है, जिससे ~4% बचता है.
इस बीच अमेरिकी 10-वर्षीय ट्रेजरी 5.2% से ऊपर भुगतान कर रहा है. यह जोखिम-मुक्त है. कोई एसटीटी नहीं. कोई टैक्स नोटिस नहीं. बजट वाले दिन दिल का दौरा नहीं.
तो भारत उभरते बाजार के जोखिम के साथ 4% देता है, और अंकल सैम बिना किसी जोखिम के 5.2% देता है. फिर नॉर्थ ब्लॉक सोचता है कि पैसा क्यों जा रहा है और दोष "शॉर्ट सेलर्स" को देता है.
यह कोई विदेशी साजिश नहीं है. यह कक्षा 7 का गणित है, एनसीईआरटी संस्करण.
अब इसमें पैसे की लागत जोड़िए. जिन फंडों ने भारत में निवेश करने के लिए सस्ते येन या डॉलर उधार लिए थे, उन्हें उस पैसे पर ब्याज देना पड़ता है और सस्ते-येन का दौर खत्म हो चुका है. कैरी लागत के बाद, भारत का कारोबार रिटर्न नहीं है. यह दान है. जिस पैसे की खुद लागत होती है, वह वहीं जाता है जहां उसका स्वागत होता है, न कि वहां जहां उस पर टैक्स लगाया जाता है, भाषण दिए जाते हैं और उसे जुआरी कहा जाता है.
"हमें एफपीआई की जरूरत नहीं, रिटेल शॉक एब्जॉर्बर है"
यह आधिकारिक दिलासा है: घरेलू निवेशक अब इतने मजबूत हैं कि किसी भी विदेशी बिकवाली को झेल सकते हैं. और हां, उसी दिन डीआईआई ने ₹10,000 करोड़ की खरीदारी की, जिस दिन एफपीआई ने ₹9,500 करोड़ की बिकवाली की.
अनुवाद: विदेशी निवेशक गिरावट के शीर्ष पर बेचकर डॉलर लेकर चला गया. पुणे की एसआईपी आंटी ने वह खरीद लिया जिसे एफपीआई बेच रहा था.
शॉक एब्जॉर्बर कार का एक हिस्सा होता है. इसे सचमुच इस तरह बनाया गया है कि यह दब जाए ताकि यात्रियों का सफर आरामदायक रहे. अंदाजा लगाइए कि यात्री कौन है. (संकेत: यह किसी भी स्थिति में कैपिटल गेन्स टैक्स वसूलता है.)
रिटेल को बाजारों में आमंत्रित नहीं किया गया था. उसे विज्ञापनों, नारों और मंत्रियों के भाषणों के जरिए लुभाया गया था. अब जब उसके हाथ में थैला आ गया है, तो उस थैले को "शॉक-एब्जॉर्बिंग क्षमता" का नया नाम दे दिया गया है. यह बाजार नहीं है. यह पावरपॉइंट डेक के साथ दिनदहाड़े डकैती है.
शॉर्ट सेलर्स के लिए खुला मैदान
जब आठ हफ्तों की गिरावट पर नीतिगत प्रतिक्रिया खामोशी हो, तो बाजार बिना रखवाली के आम के बाग जैसा बन जाता है. कोई टैक्स राहत नहीं. कोई रुपये की रणनीति नहीं. कोई संकेत नहीं. शॉर्ट सेलर्स को किसी साजिश की जरूरत नहीं है. उन्हें बस ऐसी सरकार चाहिए जो सो रही हो, और उन्हें ऐसी सरकार मिल गई है.
"वे एक साल में वापस आ जाएंगे." सबसे बड़ा भ्रम
पूंजी की कोई वफादारी नहीं होती. उसके पास विकल्प होते हैं. हर महीने जब भारत नाराज बैठा रहता है, एफपीआई कोरिया, ताइवान, जापान और अमेरिकी बॉन्ड में अपनी पोजीशन फिर से बनाते हैं. वापस आने के लिए एक वजह चाहिए, प्रेस रिलीज नहीं. दोबारा प्रवेश कोई यू-टर्न नहीं है. यह एक नई निवेश समिति की बैठक है, और फिलहाल भारत उस बैठक में स्प्रेडशीट पर हार जाता है.
2047 तक इंतजार करें? सच में?
इस रफ्तार पर, आज शुरू किया गया 20 साल का एसआईपी एक गहरे आध्यात्मिक अनुभव में बदल जाएगा. विकसित भारत को भूल जाइए. पहले फिक्स-इट भारत आजमाइए:
इंडेक्सेशन बहाल करें, या एलटीसीजी को वापस पुराने स्तर पर लाएं. मलाई को मथने से पहले ही उस पर टैक्स लगाना बंद करें.
एक विश्वसनीय रुपये की कहानी दीजिए, रोजाना "आरबीआई नजर रख रहा है" नहीं.
सट्टे वाला प्रवचन बंद कीजिए. आप सोमवार को बाजार को राष्ट्र निर्माण के रूप में नहीं बेच सकते और मंगलवार को इसे जुआ कह सकते हैं.
गणित स्वीकार कीजिए: टैक्स और मुद्रा प्रभाव के बाद मिलने वाला रिटर्न जोखिम-मुक्त अमेरिकी बॉन्ड से अधिक होना चाहिए, वरना पैसा चला जाएगा.
भारत ने अपनी क्षमता नहीं खोई है. उसने अपनी कीमत खो दी है. निवेशकों की भाषा में इसका मतलब है कि उसने अपना आकर्षण खो दिया है.
विकसित भारत मंजिल है. विसर्जित भारत रास्ता है. . जीपीएस उन लोगों द्वारा चलाया जा रहा है जो सेंसेक्स को कभी लॉटरी टिकट नहीं कहेंगे, लेकिन उस पर उसी तरह टैक्स लगाते रहेंगे.
गणपति बप्पा मोरया, पोर्टफोलियो, अगले बरस तू जल्दी आ.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
जैसे-जैसे बिरला ओपस, जेएसडब्ल्यू ड्यूलक्स और पिडिलाइट की हैशा स्थापित दिग्गजों को चुनौती दे रही हैं, त्योहारी सीजन यह दिखाएगा कि क्या वितरण क्षमता, डीलर अर्थशास्त्र और पेंटर का प्रभाव लंबे समय से चली आ रही उपभोक्ता आदतों को बदल सकता है.
by
डॉ. अनुराग बत्रा
दशकों से भारत का डेकोरेटिव पेंट्स बाजार लगभग पूर्वानुमानित दिखाई देता था. एशियन पेंट्स निर्विवाद रूप से अग्रणी था, बर्जर पेंट्स मुख्य चुनौती देने वाला था, जबकि कंसाई नेरोलैक और ड्यूलक्स ने अपनी स्थापित स्थिति बनाए रखी थी. उपभोक्ता ब्रांडों को जानते थे, डीलर जानते थे कि शेल्फ से क्या तेजी से बिकता है और पेंटर्स के पास अपने पसंदीदा उत्पाद थे.
यह ऐसा बाजार था जहां संबंध और वितरण विज्ञापन जितने ही महत्वपूर्ण थे. अब यह समीकरण तेजी से बदल रहा है.
बिरला ओपस के आक्रामक तरीके से अपनी क्षमता बढ़ाने, जेएसडब्ल्यू के ड्यूलक्स के जरिए अपने पेंट्स कारोबार को मजबूत करने और पिडिलाइट के डेकोरेटिव पेंट्स में प्रवेश करने के साथ भारतीय बाजार अब केवल स्थापित कंपनियों के बीच की लड़ाई नहीं रह गया है. यह भारतीय कंज्यूमर मार्केटिंग में सबसे दिलचस्प प्रतिस्पर्धी मुकाबलों में से एक बनता जा रहा है.
सवाल अब यह नहीं है कि नए खिलाड़ी बाजार में प्रवेश कर सकते हैं या नहीं. वे प्रवेश कर चुके हैं. असली सवाल यह है कि वे मौजूदा कंपनियों से कितनी बाजार हिस्सेदारी छीन सकते हैं.
पुरानी व्यवस्था को मिल रही है चुनौती
इस बदलाव को अलग बनाने वाली बात नए प्रवेश करने वाले खिलाड़ियों की प्रोफाइल है. ये छोटे ब्रांड नहीं हैं जो बाजार में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं. इनके पीछे भारत के कुछ सबसे बड़े कारोबारी समूह हैं, जिनके पास मैन्युफैक्चरिंग, वितरण, डीलर नेटवर्क, तकनीक, मार्केटिंग और उपभोक्ता अधिग्रहण में निवेश करने की वित्तीय ताकत है.
बिरला ओपस ने बड़े पैमाने और वितरण नेटवर्क बनाने के लिए आक्रामक रुख अपनाया है. जेएसडब्ल्यू ने ड्यूलक्स कारोबार के जरिए अपनी स्थिति मजबूत की है. वहीं पिडिलाइट अपने साथ विशाल वितरण अनुभव और कंस्ट्रक्शन तथा होम-इंप्रूवमेंट इकोसिस्टम में लंबे समय से चले आ रहे संबंध लेकर आया है, इसलिए सवाल अब यह नहीं है कि बाजार में प्रवेश की बाधाओं को पार किया जा सकता है या नहीं. बड़ी चुनौती निवेश और उपलब्धता को उपभोक्ता की पसंद में बदलना है.
त्योहारी सीजन ने बढ़ाई चुनौती
समय इससे ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं हो सकता. त्योहारी सीजन पारंपरिक रूप से घरों की मरम्मत और दोबारा पेंट कराने के लिए महत्वपूर्ण अवधि रहा है, जिससे दिवाली के आसपास के महीने पेंट ब्रांडों के लिए स्वाभाविक युद्ध का मैदान बन जाते हैं. जिन उपभोक्ताओं ने अपने घरों की पेंटिंग टाल रखी है, वे फैसले लेना शुरू करते हैं, जबकि डीलर बढ़ती मांग के लिए तैयारी करते हैं.
लेकिन उपभोक्ता खाली स्लेट के साथ शुरुआत नहीं कर रहे हैं. ज्यादातर के पास पहले से ही एक ऐसा ब्रांड है जिसे वे जानते हैं, एक ऐसा पेंटर है जिस पर वे भरोसा करते हैं और एक ऐसा डीलर है जहां वे नियमित रूप से जाते हैं, इसलिए चुनौती देने वाले ब्रांडों के लिए केवल जागरूकता पर्याप्त नहीं है. उन्हें एक पूरे इकोसिस्टम को अपनी आदतें बदलने के लिए राजी करना होगा.
डीलर और पेंटर के स्तर पर जीती जाएगी लड़ाई
यह शायद पेंट्स और कई अन्य कंज्यूमर कैटेगरी के बीच सबसे बड़ा अंतर है. विज्ञापन आकांक्षा पैदा कर सकता है, लेकिन अंतिम खरीद को अक्सर डीलर और पेंटर प्रभावित करते हैं. उपभोक्ता के मन में कोई रंग या फिनिश हो सकता है, लेकिन इस्तेमाल किए जाने वाले उत्पाद को पेंटर प्रभावित कर सकता है और आखिर में क्या खरीदा जाए, इसे डीलर प्रभावित कर सकता है, इसीलिए केवल वितरण के आंकड़े पूरी कहानी नहीं बताते.
किसी डीलर को उत्पाद स्टॉक करने के लिए तैयार करना एक उपलब्धि है. डीलर को उस उत्पाद की सिफारिश करने के लिए तैयार करना दूसरी बात है. किसी पेंटर को एक बार उत्पाद आजमाने के लिए तैयार करना और उसे बार-बार इस्तेमाल करने के लिए उसका पसंदीदा ब्रांड बनाना दो बिल्कुल अलग बातें हैं.
इसलिए पेंट की लड़ाई केवल टेलीविजन, डिजिटल प्लेटफॉर्म या आउटडोर मीडिया पर नहीं लड़ी जा रही है. यह हजारों डीलर काउंटरों पर और पेंटर्स तथा घर के मालिकों के बीच होने वाली बातचीत में लड़ी जा रही है.
एशियन पेंट्स को अलग लड़ाई लड़नी है
एशियन पेंट्स के लिए रणनीति केवल डिस्काउंट के जरिए हर चुनौती देने वाले का जवाब देने की नहीं हो सकती. उसका सबसे बड़ा प्रतिस्पर्धी लाभ दशकों में जमा हुआ भरोसा, पहचान और मजबूत वितरण नेटवर्क है.
घर की पेंटिंग कभी-कभार होने वाली खरीदारी है. इसमें पैसा, मेहनत, समय और काफी असुविधा शामिल होती है. इसलिए उपभोक्ता चुनाव करते समय रूढ़िवादी हो सकते हैं. ऐसे में एशियन पेंट्स के पास भावनात्मक और वितरण का बहुत बड़ा सुरक्षा कवच है. उसकी चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि यह बढ़त आत्मसंतुष्टि में न बदल जाए.
प्रतिस्पर्धियों के ध्यान और वितरण हासिल करने के लिए आक्रामक तरीके से खर्च करने के बीच इनोवेशन, प्रीमियमाइजेशन, सर्विस, कलर एक्सपर्टाइज और युवा घर मालिकों के लिए प्रासंगिक बने रहना तेजी से महत्वपूर्ण होगा. बाजार के नेता को केवल बाजार हिस्सेदारी का बचाव नहीं करना है. उसे उपभोक्ताओं को ब्रांड बदलने से रोकने के लिए लगातार कारण देने होंगे.
बर्जर अब खुद चुनौती झेलने वाला चुनौतीकर्ता
बर्जर खुद को एक दिलचस्प स्थिति में पाता है. वर्षों तक वह बाजार के नेता को चुनौती देने वाला खिलाड़ी रहा. आज उसे कई दिशाओं से चुनौती देने वाले खिलाड़ी मिल रहे हैं. उसकी प्रतिक्रिया में अपने मुख्य बाजारों की रक्षा करने के साथ-साथ उन क्षेत्रों और सेगमेंट में ज्यादा आक्रामकता शामिल करनी होगी, जहां नए खिलाड़ी अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं.
वितरण, डीलर संबंध और पेंटर की वफादारी महत्वपूर्ण होगी. बर्जर की विरासत एक संपत्ति है, लेकिन केवल विरासत पर्याप्त नहीं होगी. उसे अपने मौजूदा संबंधों को ज्यादा प्रभावी बनाना होगा और साथ ही यह सुनिश्चित करना होगा कि नए प्रवेश करने वाले खिलाड़ी उसके ग्राहकों के आसपास धीरे-धीरे अपना इकोसिस्टम न बना लें.
बिरला ओपस ने चुनी है रफ्तार
बिरला ओपस ने शायद सबसे आक्रामक रास्ता अपनाया है. वर्षों तक धीरे-धीरे अपनी मौजूदगी बनाने के बजाय उसने मैन्युफैक्चरिंग क्षमता, वितरण और व्यापक उत्पाद पोर्टफोलियो के जरिए तेजी से बड़े पैमाने पर पहुंच बनाने की कोशिश की है.
यह उस कैटेगरी में तार्किक है, जहां वितरण ऐतिहासिक रूप से प्रवेश की सबसे बड़ी बाधाओं में से एक रहा है. लेकिन किसी डीलर को उत्पाद स्टॉक करने के लिए तैयार करने और उसे उत्पाद की सिफारिश करने के लिए तैयार करने में महत्वपूर्ण अंतर है. पेंटर को उत्पाद आजमाने के लिए तैयार करने और उसे उसका पसंदीदा ब्रांड बनाने के बीच इससे भी बड़ा अंतर है. अब बिरला ओपस को उपलब्धता को ट्रायल में, ट्रायल को पसंद में और पसंद को वफादारी में बदलना होगा.
जेएसडब्ल्यू ड्यूलक्स के पास अलग बढ़त
जेएसडब्ल्यू की स्थिति अलग है क्योंकि ड्यूलक्स उसे एक स्थापित प्रीमियम ब्रांड देता है, बजाय इसके कि उसे सब कुछ शून्य से बनाना पड़े. इससे जेएसडब्ल्यू को अलग-अलग उपभोक्ता सेगमेंट में विस्तार करने का अवसर मिलता है.
ड्यूलक्स अपने साथ काफी ब्रांड इक्विटी और प्रीमियम पोजिशनिंग लेकर आता है, जबकि जेएसडब्ल्यू पूंजी, महत्वाकांक्षा और एक मौजूदा पेंट्स कारोबार लेकर आता है.
रणनीतिक चुनौती यह होगी कि पोर्टफोलियो को इस तरह से एक साथ काम कराया जाए कि उपभोक्ता भ्रमित न हों या कंपनी के भीतर अनावश्यक प्रतिस्पर्धा न पैदा हो. अगर इसे अच्छी तरह संभाला गया, तो यह संयोजन जेएसडब्ल्यू को स्थापित व्यवस्था को चुनौती देने के लिए एक मजबूत मंच देता है.
पिडिलाइट अपना अलग रास्ता अपना सकता है
पिडिलाइट के प्रवेश से बाजार में एक और आयाम जुड़ता है. कंपनी ने एडहेसिव, वॉटरप्रूफिंग, रिपेयर और संबंधित कैटेगरी में दशकों तक ब्रांड बनाने के जरिए भारतीय रिटेल, कॉन्ट्रैक्टर और होम-इंप्रूवमेंट इकोसिस्टम को पहले से समझा है, इसलिए उसका अवसर केवल पारंपरिक पेंट कंपनी के मॉडल की नकल करने में नहीं हो सकता. पिडिलाइट कंस्ट्रक्शन और होम इम्प्रूवमेंट की अपनी समझ का इस्तेमाल घर के आसपास एक व्यापक प्रस्ताव बनाने के लिए कर सकता है.
आखिरकार इससे उसकी पेंट रणनीति केवल पेंट की एक और टिन बेचने के बारे में न होकर घर के बड़े होम-इंप्रूवमेंट सफर में शामिल होने के बारे में हो सकती है.
क्या यह कीमतों की जंग बनेगी?
सबसे स्पष्ट खतरा यह है कि यह मुकाबला कीमतों की जंग बन जाए. नए खिलाड़ियों को बाजार हिस्सेदारी चाहिए. मौजूदा कंपनियों को वॉल्यूम बचाना है. डीलर स्वाभाविक रूप से मार्जिन और इंसेंटिव पर प्रतिक्रिया देते हैं, लेकिन पेंट ऐसी कैटेगरी नहीं है, जिसमें केवल कीमत विजेता तय करती है.
उपभोक्ता केवल पेंट के लिए भुगतान नहीं कर रहा है, बल्कि मजदूरी, सतह की तैयारी और दोबारा पेंट कराने की असुविधा के लिए भी भुगतान कर रहा है. इसलिए क्वालिटी, फिनिश, टिकाऊपन, रंगों की रेंज, वारंटी और सर्विस मूल्य के समीकरण का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं.
समझदार ब्रांड केवल सबसे सस्ता होने के बजाय वैल्यू पर प्रतिस्पर्धा करेंगे. असली सवाल यह है कि कोई ब्रांड उपभोक्ता को स्विच करने के लिए कौन सा अतिरिक्त कारण दे सकता है?
पेंटर बन सकता है सबसे ताकतवर इन्फ्लुएंसर
पेंटर का महत्व और बढ़ने की संभावना है. पेंटर समझते हैं कि कौन से उत्पाद लगाना आसान हैं, कौन बेहतर फिनिश देते हैं और किन उत्पादों से बाद में समस्याएं पैदा होने की संभावना है.
उनकी सिफारिश काफी प्रभावशाली होती है, खासकर प्रीमियम शहरी उपभोक्ता सेगमेंट के बाहर. इसलिए पेंटर एजुकेशन, लॉयल्टी प्रोग्राम, इंसेंटिव और सीधे जुड़ाव रणनीतिक हथियार बन जाते हैं.
कई मामलों में उपभोक्ता के लिए लड़ाई वास्तव में उपभोक्ता के पेंट की दुकान तक पहुंचने से पहले ही जीत ली जाती है. जो ब्रांड पेंटर का भरोसा जीत लेता है, वह घर जीतने की दिशा में एक कदम आगे बढ़ चुका होता है.
असली लड़ाई ब्रांड बदलने की है
यहीं नए खिलाड़ियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती है. बड़े विज्ञापन बजट के साथ जागरूकता पैदा करना अपेक्षाकृत आसान है. व्यवहार बदलना कहीं ज्यादा मुश्किल है.
एक ऐसा घर मालिक जिसने 20 वर्षों से एशियन पेंट्स का इस्तेमाल किया है, अचानक किसी दूसरे ब्रांड को क्यों आजमाएगा? बर्जर का आदी पेंटर अपनी सिफारिश क्यों बदलेगा? कोई डीलर किसी नए प्रवेश करने वाले ब्रांड को अपनी कीमती शेल्फ स्पेस और सिफारिश क्यों देगा?
ये केवल कम्युनिकेशन से जुड़े सवाल नहीं हैं. ये भरोसे, अर्थशास्त्र, प्रदर्शन और आदत से जुड़े सवाल हैं. इसलिए चुनौती देने वाले खिलाड़ियों को इकोसिस्टम में हर भागीदार को स्विच करने के लिए एक मजबूत कारण देना होगा.
भारतीय दीवार पर किसका होगा कब्जा?
भारतीय पेंट बाजार अब पूरी तरह अलग दौर में प्रवेश कर रहा है. एशियन पेंट्स को एक विशाल ब्रांड और वितरण सुरक्षा कवच की रक्षा करनी है. बर्जर को अपनी स्थिति बचाते हुए चुनौती देने वाले खिलाड़ी की तरह व्यवहार जारी रखना है. कंसाई नेरोलैक को डेकोरेटिव पेंट्स में अपनी प्रासंगिकता मजबूत करनी है. बिरला ओपस को अपने पैमाने और निवेश को लगातार उपभोक्ता पसंद में बदलना है. जेएसडब्ल्यू को ड्यूलक्स और अपने व्यापक पेंट्स पोर्टफोलियो को एक साथ प्रभावी ढंग से काम कराना है. पिडिलाइट को यह पता लगाना है कि क्या उसका होम-इंप्रूवमेंट इकोसिस्टम उसे पेंट्स में एक अलग रास्ता दे सकता है.
त्योहारी सीजन यह महत्वपूर्ण संकेत देगा कि ये रणनीतियां उपभोक्ता व्यवहार में कैसे बदल रही हैं. लेकिन यह केवल त्योहारी बिक्री की लड़ाई नहीं है.
यह वितरण, डीलर इकनॉमिक्स, पेंटर के प्रभाव, उपभोक्ता के भरोसे और अंततः ब्रांड पसंद की लड़ाई है. वर्षों तक भारतीय पेंट उद्योग मुख्य रूप से बाजार हिस्सेदारी बचाने के बारे में था.
अब हर प्रमुख खिलाड़ी को इसे हासिल करने के लिए लड़ना होगा. और सबसे बड़ा इनाम पेंट का डिब्बा नहीं है. यह भारतीय घर के अंदर की दीवार है.
डॉ. अनुराग बत्रा, BW रिपोर्टर्स
(डॉ. अनुराग बत्रा BW Businessworld के चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ तथा exchange4media Group के संस्थापक हैं. पहली पीढ़ी के उद्यमी और मीडिया लीडर होने के साथ-साथ वह एंजल इन्वेस्टर, लेखक, टेलीविजन होस्ट और उद्यमियों तथा मीडिया प्रोफेशनल्स के मेंटर भी हैं. वह कई कॉरपोरेट और संस्थागत बोर्डों में काम करते हैं और मैनेजमेंट एजुकेशन से लंबे समय से जुड़े हुए हैं. वह MDI गुरुग्राम के पूर्व छात्र हैं और इसके बोर्ड ऑफ गवर्नर्स में काम कर चुके हैं तथा MDI Alumni Association के अध्यक्ष रह चुके हैं. वह International Academy of Television Arts & Sciences के सदस्य भी हैं. एक उत्साही पाठक डॉ. बत्रा का मानना है कि जब जुनून किसी का पेशा बन जाता है, तो काम को उद्देश्य की गहरी भावना मिलती है.)
लेखक बंशीलाल गुर्जर और नीरज सहरावत के अनुसार, इस बदलाव की सबसे सीधी अभिव्यक्ति प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि में दिखाई देती है. पीएम-किसान पात्र भूमिधारक किसान परिवारों को प्रत्यक्ष लाभ अंतरण के माध्यम से सालाना 6,000 रुपये की आय सहायता प्रदान करता है.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत की आजादी के बाद के अधिकांश समय में कृषि नीति एक प्रमुख राष्ट्रीय लक्ष्य से संचालित रही: बढ़ती आबादी के लिए पर्याप्त खाद्य उत्पादन करना. इस उद्देश्य ने खाद्य सुरक्षा की नींव रखी, लेकिन किसान अक्सर आय में उतार-चढ़ाव, जलवायु जोखिम, बाजार तक अनिश्चित पहुंच और बढ़ती इनपुट लागत के प्रति असुरक्षित बना रहा. 2014 के बाद से नीति का ढांचा धीरे-धीरे किसान सुरक्षा की व्यापक अवधारणा की ओर बढ़ा है. यह बदलाव किसी एक योजना में नहीं, बल्कि इस बात में दिखाई देता है कि आय सहायता, फसल बीमा, खरीद, मृदा स्वास्थ्य, सिंचाई, तकनीक और बाजार तक पहुंच को एक अधिक एकीकृत ढांचे में लाया गया है.
इस बदलाव की सबसे सीधी अभिव्यक्ति प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि में दिखाई देती है. पीएम-किसान पात्र भूमिधारक किसान परिवारों को प्रत्यक्ष लाभ अंतरण के माध्यम से सालाना 6,000 रुपये की आय सहायता प्रदान करता है. इसका पैमाना महत्वपूर्ण है. आधिकारिक पीएम-किसान पोर्टल के मुताबिक अप्रैल से जुलाई 2026 के चक्र में 9.44 करोड़ से अधिक किसानों को लाभ मिला. इस योजना ने एक राष्ट्रीय डिजिटल तंत्र तैयार किया है, जिसके माध्यम से सहायता सीधे, नियमित और बिना किसी मध्यस्थ के लाभार्थियों तक पहुंचती है. ऐसे क्षेत्र में जहां बीज, उर्वरक, श्रम और सिंचाई पर खर्च फसल से होने वाली आय प्राप्त होने से पहले ही हो जाता है, वहां नियमित नकद सहायता किसान परिवारों के लिए व्यावहारिक महत्व रखती है.
जोखिम से सुरक्षा एक अन्य प्रमुख स्तंभ रहा है. 2016 में शुरू की गई प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना भागीदारी के लिहाज से दुनिया की सबसे बड़ी फसल बीमा योजनाओं में से एक बन गई है. अगस्त 2026 में जारी सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, शुरुआत से अब तक 92.46 करोड़ से अधिक किसान आवेदनों का बीमा किया गया है और 26.33 करोड़ से अधिक किसान आवेदनों के लिए 2.06 लाख करोड़ रुपये से अधिक के दावों का भुगतान किया गया है. ऐसी सुरक्षा का महत्व फसल नुकसान के बाद मिलने वाले मुआवजे से कहीं आगे है. यह ऐसे पेशे के लिए औपचारिक जोखिम-साझाकरण तंत्र तैयार करती है, जिसमें बारिश, बाढ़, कीट, बीमारी और चरम मौसम कुछ ही दिनों में महीनों की मेहनत को खत्म कर सकते हैं.
सरकार ने कृषि आय की सुरक्षा के साधन के तौर पर न्यूनतम समर्थन मूल्य और खरीद का भी इस्तेमाल जारी रखा है. आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक 2004 से 2014 के दौरान 698.7 मिलियन टन की कुल खरीद की तुलना में 2014 से 2026 के दौरान यह बढ़कर 1,229.2 मिलियन टन हो गई, जबकि इसी तुलना अवधि में एमएसपी पर खरीद का मूल्य भी काफी बढ़ा है. यह विस्तार इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि खरीद केवल राज्य और किसान के बीच एक लेन-देन नहीं है. प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कीमतों की उम्मीदों, नकदी की उपलब्धता और भरोसे को प्रभावित कर सकती है.
संसाधनों के अधिक कुशल इस्तेमाल की दिशा में इनपुट-आधारित कृषि से बदलाव भी उतना ही स्पष्ट है. मृदा स्वास्थ्य कार्ड कार्यक्रम के तहत 26 करोड़ से अधिक कार्ड जारी किए गए हैं, जिससे किसानों को मिट्टी में पोषक तत्वों की स्थिति और फसल-विशिष्ट उर्वरक संबंधी सिफारिशों की जानकारी मिलती है. सरकारी आंकड़े प्रति बूंद अधिक फसल योजना के तहत सूक्ष्म सिंचाई के विस्तार और राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रणाली के माध्यम से हजारों जलवायु-अनुकूल फसल किस्मों के जारी होने को भी दर्शाते हैं. ये पहल एक महत्वपूर्ण नीतिगत समझ को दर्शाती हैं: भारतीय कृषि का भविष्य केवल इस बात पर निर्भर नहीं करेगा कि कितना उत्पादन होता है, बल्कि इस पर भी निर्भर करेगा कि पानी, मिट्टी, बीज और ऊर्जा का कितनी कुशलता से इस्तेमाल किया जाता है.
बाजार सुधारों ने इसमें एक और परत जोड़ी है. इलेक्ट्रॉनिक राष्ट्रीय कृषि बाजार ने कृषि मंडियों को जोड़ने वाला एक डिजिटल मंच तैयार किया है, जबकि किसान उत्पादक संगठनों की दिशा में नीतिगत जोर का उद्देश्य छोटे किसानों को एकत्रीकरण, इनपुट, प्रसंस्करण और बाजार में बातचीत के लिए अधिक सामूहिक ताकत देना है. कृषि अवसंरचना कोष, भंडारण और खाद्य प्रसंस्करण में निवेश तथा मूल्य श्रृंखलाओं पर जोर, ये सभी किसान को केवल कच्ची कृषि उपज के उत्पादक से आगे बढ़ाकर अधिक मूल्य वाली कृषि अर्थव्यवस्था में भागीदार बनाने के बड़े प्रयास का हिस्सा हैं.
यहीं कृषि नीति का सामाजिक प्रभाव सबसे महत्वपूर्ण हो जाता है. जिस किसान परिवार को समय पर आय सहायता मिलती है, संस्थागत ऋण तक पहुंच होती है, वह अपनी फसल का बीमा करा सकता है, मिट्टी संबंधी सलाह प्राप्त कर सकता है और बड़े बाजार तक पहुंच बना सकता है, वह उस परिवार की तुलना में संकटों का सामना बेहतर तरीके से कर सकता है जो एक ही फसल और अनौपचारिक कर्ज पर निर्भर है. इसका प्रभाव खेती से आगे तक जाता है. अधिक स्थिर ग्रामीण आय से परिवारों की खपत, बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य पर खर्च, स्थानीय व्यापार और कृषि उपकरणों में निवेश को समर्थन मिलता है. इसलिए कृषि केवल एक क्षेत्रीय मुद्दा नहीं, बल्कि भारत के एक बड़े हिस्से के लिए सामाजिक और आर्थिक स्थिरता का आधार बनी हुई है.
2014 के बाद की नीतिगत दिशा तकनीक और कल्याणकारी योजनाओं के बीच संबंधों में व्यापक बदलाव को भी दर्शाती है. प्रत्यक्ष लाभ अंतरण, डिजिटल किए गए भूमि और लाभार्थी रिकॉर्ड, उपग्रह और मौसम आधारित फसल आकलन, ऑनलाइन बाजार मंच और तकनीक-सक्षम बीमा निपटान धीरे-धीरे सरकारी कार्यक्रम और व्यक्तिगत किसान के बीच की दूरी कम कर रहे हैं. राज्यों में व्यवस्था अभी भी विकसित हो रही है, लेकिन संस्थागत दिशा स्पष्ट है: कृषि प्रशासन अधिक डेटा-आधारित, लक्षित और मापने योग्य बन रहा है.
भारत जब विकसित भारत 2047 की ओर देख रहा है, तब कृषि नीति के अगले चरण में अधिक मूल्य वाली फसलों, मजबूत खाद्य प्रसंस्करण, बेहतर भंडारण, निर्यात प्रतिस्पर्धा, जलवायु अनुकूलता और कृषि में महिलाओं तथा युवा उद्यमियों की व्यापक भागीदारी के जरिए इस आधार को मजबूत करना होगा. पिछले बारह वर्षों की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि नीतिगत चर्चा का दायरा खुद विस्तृत हुआ है. किसान को अब केवल उत्पादन के नजरिए से नहीं देखा जाता. आय, जोखिम, मिट्टी, पानी, ऋण, तकनीक और बाजार को तेजी से एक ही नीतिगत समस्या के हिस्सों के तौर पर देखा जा रहा है.
पहली हरित क्रांति ने भारत को खाद्य सुरक्षा प्रदान की. उभरता हुआ नीतिगत ढांचा इससे आगे की व्यापक दिशा तलाश रहा है: ऐसी कृषि अर्थव्यवस्था, जिसमें देश का खाद्य सुरक्षित करने वाला व्यक्ति भी अधिक आर्थिक सुरक्षा, लचीलापन और अवसर हासिल कर सके. यही बदलाव आने वाले दशकों में ग्रामीण भारत की मजबूती तय करेगा.
(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं और जरूरी नहीं कि प्रकाशन के विचारों को दर्शाते हों.)
अतिथि लेखक: बंशीलाल गुर्जर, राज्यसभा सांसद व राष्ट्रीय अध्यक्ष, भाजपा किसान मोर्चा
अतिथि लेखक: पायलट नीरज सहरावत, राष्ट्रीय प्रभारी- अनुसंधान एवं नीति, भाजपा किसान मोर्चा
जैसे-जैसे अनूप बागची 27 अक्टूबर को एचडीएफसी बैंक की कमान संभालने की तैयारी कर रहे हैं, भरोसा बहाल करना, विकास और लाभप्रदता को मजबूत करना, ग्राहक अनुभव में सुधार करना और प्रतिभाओं को एक दिशा में लाना उनके शुरुआती एजेंडे को परिभाषित करेगा.
by
डॉ. अनुराग बत्रा
एचडीएफसी बैंक (HDFC) में इंतजार खत्म हो गया है. सशिधर जगदीशन का उत्तराधिकारी कौन होगा, इसको लेकर कई हफ्तों की अटकलों के बाद देश के सबसे बड़े निजी क्षेत्र के बैंक ने आईसीआईसीआई समूह के अनुभवी अनूप बागची को अपना अगला प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी चुना है.
भारतीय रिजर्व बैंक ने 1 अक्टूबर को 27 अक्टूबर 2026 से शुरू होने वाले तीन साल के कार्यकाल के लिए बागची की नियुक्ति को मंजूरी दे दी. एचडीएफसी बैंक के बोर्ड ने भी 2 अक्टूबर से उन्हें अतिरिक्त निदेशक नियुक्त किया है, जो शेयरधारकों की मंजूरी के अधीन है.
यह नियुक्ति एक और कारण से महत्वपूर्ण है: बागची एचडीएफसी बैंक के शीर्ष पद पर पहुंचने वाले पहले बाहरी व्यक्ति होंगे.
जिस संस्थान का नेतृत्व परंपरागत रूप से आंतरिक प्रतिभाओं से उभरता रहा है, वहां आईसीआईसीआई के माहौल में ढले एक अनुभवी व्यक्ति का चयन पुरानी परंपरा से एक महत्वपूर्ण बदलाव है. यह ऐसे समय में भी हुआ है जब एचडीएफसी बैंक, एचडीएफसी लिमिटेड के साथ विलय के बाद काफी बड़े पैमाने पर संचालन की चुनौतियों से निपट रहा है और विकास, लाभप्रदता तथा निवेशकों के भरोसे से जुड़े सवालों का समाधान कर रहा है.
आईसीआईसीआई का अनुभव
बागची के पास बैंकिंग और वित्तीय सेवाओं के क्षेत्र में तीन दशक से अधिक का अनुभव है. 1992 से आईसीआईसीआई समूह से जुड़े उनके करियर में ट्रेजरी, रिटेल और होलसेल बैंकिंग, निवेश बैंकिंग, पूंजी बाजार, वेल्थ मैनेजमेंट, बीमा और डिजिटल वित्तीय सेवाएं शामिल रही हैं.
उन्होंने 2017 से 2023 के बीच आईसीआईसीआई बैंक के कार्यकारी निदेशक के रूप में काम किया, जहां उन्होंने रिटेल, बिजनेस और ग्रामीण बैंकिंग तथा बाद में होलसेल बैंकिंग की जिम्मेदारी संभाली. वह आईसीआईसीआई सिक्योरिटीज का भी नेतृत्व कर चुके हैं और वर्तमान में आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल लाइफ इंश्योरेंस के प्रबंध निदेशक और सीईओ हैं.
यह व्यापक अनुभव एचडीएफसी बैंक में उपयोगी हो सकता है, जहां चुनौती अब केवल पैमाने की नहीं है. काम यह है कि इस पैमाने को मजबूत विकास, लाभप्रदता और बेहतर ग्राहक परिणामों में बदला जाए.
बागची की नियुक्ति इस बात को भी रेखांकित करती है कि आईसीआईसीआई समूह के माहौल ने वर्षों में कितनी नेतृत्व क्षमता तैयार की है. समूह से जुड़े कई अधिकारी आगे चलकर प्रमुख वित्तीय संस्थानों का नेतृत्व कर चुके हैं. बागची अब इस सूची में शामिल हो गए हैं, लेकिन उनके सामने आईसीआईसीआई बैंक के सबसे बड़े निजी क्षेत्र के प्रतिद्वंद्वी का नेतृत्व करने की विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण जिम्मेदारी है.
पहला, संस्थान को समझना
किसी बाहरी सीईओ की नियुक्ति के साथ तुरंत व्यापक बदलावों की तलाश करने का स्वाभाविक आकर्षण होता है. हालांकि, एचडीएफसी बैंक में यह समझना भी उतना ही महत्वपूर्ण हो सकता है कि पहले से क्या अच्छा काम कर रहा है.
बैंक के पास मजबूत फ्रेंचाइजी, विशाल ग्राहक आधार, व्यापक वितरण नेटवर्क और भारतीय बैंकिंग क्षेत्र के सबसे पहचाने जाने वाले ब्रांडों में से एक है. एचडीएफसी लिमिटेड के साथ विलय ने अभूतपूर्व पैमाने का संस्थान बनाया, लेकिन विकास, लाभप्रदता और ग्राहक भरोसा बनाए रखते हुए दो बड़े संगठनों को एकीकृत करना हमेशा जटिल होने वाला था.
इसलिए बागची को ऐसी संस्था विरासत में मिल रही है, जिसमें काफी मजबूती है, साथ ही कुछ ऐसे स्पष्ट क्षेत्र भी हैं जिन पर ध्यान देने की जरूरत है.
भरोसा बहाल करना
प्राथमिकताओं में निवेशकों, ग्राहकों और कर्मचारियों के बीच भरोसा मजबूत करना शामिल होगा. किसी वित्तीय संस्थान के लिए भरोसा एक परिचालन संपत्ति है. इसे केवल संचार के जरिए मजबूत नहीं किया जा सकता; अंततः यह लगातार प्रदर्शन, कॉरपोरेट गवर्नेंस, पारदर्शिता और क्रियान्वयन पर निर्भर करता है.
नेतृत्व परिवर्तन एचडीएफसी बैंक को अपने अगले चरण के लिए स्पष्ट दिशा तय करने का अवसर देता है. बागची इस दिशा को आंतरिक और बाहरी तौर पर किस तरह स्पष्ट करते हैं, यह महत्वपूर्ण होगा, लेकिन उसके बाद आने वाले आंकड़े कहीं अधिक महत्वपूर्ण होंगे.
जमा और विकास
केंद्रीय चुनौतियों में से एक जमा कारोबार होगा. टिकाऊ ऋण वृद्धि के लिए मजबूत फंडिंग आधार की जरूरत होती है, जिससे जमा जुटाना और देनदारी पक्ष की गुणवत्ता महत्वपूर्ण हो जाती है. एचडीएफसी बैंक का व्यापक शाखा नेटवर्क उसे काफी पहुंच प्रदान करता है. अवसर यह होगा कि भौतिक वितरण को मजबूत डिजिटल जुड़ाव के साथ जोड़ते हुए इस नेटवर्क को अधिक उत्पादक बनाया जाए.
उद्देश्य केवल आकार बढ़ाने के लिए विकास नहीं हो सकता. एचडीएफसी बैंक जैसे पहले से बड़े पैमाने पर काम कर रहे बैंक के लिए विकास की गुणवत्ता और लाभप्रदता लगातार अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है.
लाभप्रदता फिर से केंद्र में
बाजार अंततः प्रदर्शन के आधार पर नेतृत्व परिवर्तन का आकलन करेगा. मार्जिन, रिटर्न अनुपात, परिचालन दक्षता, कर्ज की गुणवत्ता और टिकाऊ विकास यह तय करेंगे कि एचडीएफसी बैंक अपने पैमाने को अधिक मूल्य में बदल पाता है या नहीं. विभिन्न वित्तीय सेवा कारोबारों में बागची का अनुभव उन्हें इस समीकरण को देखने के लिए व्यापक दृष्टिकोण देता है.
उनका काम केवल एचडीएफसी बैंक को बड़ा बनाना नहीं होगा. उनका काम पहले से विशाल संस्थान को अधिक उत्पादक और कुशल बनाना होगा.
तकनीक से ग्राहक अनुभव में सुधार जरूरी
तकनीक और ग्राहक अनुभव भी एजेंडे का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. बड़े पैमाने पर ग्राहकों को सेवाएं देने वाले बैंक के लिए डिजिटल क्षमता तभी मायने रखती है, जब वह बैंकिंग को आसान बनाए. ग्राहकों में बिखरे हुए अनुभव, जटिल प्रक्रियाओं या धीमी सेवा के प्रति धैर्य लगातार कम हो रहा है.
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा और ऑटोमेशन उत्पादकता और व्यक्तिगत सेवाओं में सुधार कर सकते हैं, लेकिन अंतिम कसौटी यह होगी कि ग्राहकों को एचडीएफसी बैंक का अनुभव अधिक सरल, तेज और भरोसेमंद मिलता है या नहीं.
कर्मचारियों की भूमिका महत्वपूर्ण होगी
दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष संगठन के भीतर है. नेतृत्व परिवर्तन से स्वाभाविक रूप से अनिश्चितता और उम्मीदें पैदा होती हैं. बागची को वरिष्ठ नेतृत्व टीम के भीतर भरोसा कायम करना होगा, मजबूत प्रतिभाओं को बनाए रखना होगा और यह स्पष्ट करना होगा कि संस्थान किस दिशा में आगे बढ़ रहा है.
एचडीएफसी बैंक जैसे बड़े संगठन को एक व्यक्ति के जरिए नहीं बदला जा सकता. सीईओ की भूमिका ऐसा माहौल तैयार करने की होगी, जिसमें बैंक के हजारों कर्मचारी उसकी दिशा को समझें और उसके अनुरूप काम कर सकें.
बाहरी व्यक्ति, लेकिन बैंकिंग के लिए बाहरी नहीं
बागची का बाहरी दृष्टिकोण विशेष रूप से उपयोगी साबित हो सकता है. वह एचडीएफसी बैंक के हालिया निर्णय लेने की प्रक्रिया का हिस्सा रहे बिना आ रहे हैं, जबकि भारतीय बैंकिंग, नियमन, ग्राहकों और प्रतिस्पर्धी परिस्थितियों की उन्हें गहरी समझ है.
इससे उन्हें ऐसे सवाल पूछने की क्षमता मिलती है, जो आंतरिक रूप से विकसित नेतृत्व टीम शायद न पूछे. साथ ही, एचडीएफसी बैंक की पहचान भी महत्वपूर्ण है. उद्देश्य आईसीआईसीआई के तरीके को पूरी तरह से यहां लागू करना नहीं हो सकता. बागची के सामने चुनौती उन खूबियों को बनाए रखने की होगी, जिन्होंने एचडीएफसी बैंक को भारत के सबसे सफल बैंकिंग फ्रेंचाइजी में से एक बनाया है, और साथ ही यह पहचानना होगा कि उसके अगले चरण के लिए क्या बदलाव जरूरी हैं.
तत्काल एजेंडे को अंततः पांच प्राथमिकताओं में समेटा जा सकता है: भरोसा मजबूत करना, जमा में तेजी लाना, लाभप्रदता में सुधार करना, ग्राहक अनुभव को सरल बनाना और नए नेतृत्व के पीछे संगठन को एक दिशा में लाना.
बागची अपने साथ अनुभव लेकर आ रहे हैं. एचडीएफसी बैंक अपने साथ मजबूत फ्रेंचाइजी और व्यापक पैमाना लेकर चल रहा है.
उत्तराधिकार का सवाल अब हल हो चुका है. 27 अक्टूबर के बाद क्या होता है, यह तय करेगा कि यह नेतृत्व परिवर्तन एचडीएफसी बैंक के अगले विकास अध्याय की शुरुआत भी बनता है या नहीं.
डॉ. अनुराग बत्रा, BW रिपोर्टर्स
(डॉ. अनुराग बत्रा BW बिजनेसवर्ल्ड के चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ तथा एक्सचेंज4मीडिया समूह के संस्थापक हैं. पहली पीढ़ी के उद्यमी और मीडिया लीडर के रूप में वह एंजेल निवेशक, लेखक, टेलीविजन होस्ट और उद्यमियों तथा मीडिया पेशेवरों के मेंटर भी हैं. वह कई कॉरपोरेट और संस्थागत बोर्डों में काम करते हैं और प्रबंधन शिक्षा से उनका लंबे समय से जुड़ाव रहा है. एमडीआई गुरुग्राम के पूर्व छात्र बत्रा इसके बोर्ड ऑफ गवर्नर्स में रह चुके हैं और एमडीआई एलुमनी एसोसिएशन के अध्यक्ष भी रहे हैं. वह इंटरनेशनल एकेडमी ऑफ टेलीविजन आर्ट्स एंड साइंसेज के सदस्य भी हैं. एक उत्साही पाठक डॉ. बत्रा का मानना है कि जब जुनून किसी व्यक्ति का पेशा बन जाता है, तो काम एक गहरे उद्देश्य से जुड़ जाता है.)
इस लेख में इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स के महानिदेशक डॉ. राजीव सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आर्थिक विजन और भारत को एक मजबूत विनिर्माण, नवाचार और निर्यात अर्थव्यवस्था में बदलने पर विचार रखें हैं.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी को उनके 76वें जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामनाएं. कामना है कि वे इसी ऊर्जा और दृढ़ संकल्प के साथ देश का नेतृत्व करते रहें. इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स में हम भारत के आर्थिक बदलाव के केंद्र में उद्योग और उद्यमिता को रखने पर श्री मोदी द्वारा दिए गए जोर की गहराई से सराहना करते हैं. उनके दृष्टिकोण ने भारत को मुख्य रूप से एक बड़े उपभोक्ता बाजार से अधिक प्रतिस्पर्धी विनिर्माण, नवाचार और निर्यात केंद्र की ओर ले जाने की कोशिश की है, साथ ही निजी निवेश और उद्यमिता की बुनियाद को मजबूत किया है.
मेक इन इंडिया और विनिर्माण को बढ़ावा
एक महत्वपूर्ण पहल 2014 में शुरू किया गया मेक इन इंडिया अभियान रहा है, जिसने विनिर्माण, निवेश, नवाचार और रोजगार सृजन को राष्ट्रीय आर्थिक एजेंडे के केंद्र में रखा.
पिछले वर्षों में इस विजन को निवेश आकर्षित करने, घरेलू विनिर्माण क्षमताओं को मजबूत करने और भारतीय कारोबारों को वैश्विक वैल्यू चेन के साथ अधिक गहराई से जोड़ने के उद्देश्य वाली कई नीतिगत पहलों का समर्थन मिला है.
प्रत्यक्ष विदेशी निवेश इस यात्रा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है. सरकारी आंकड़ों से पता चलता है कि इस अवधि के दौरान भारत में पर्याप्त एफडीआई आया, जो भारतीय अर्थव्यवस्था में वैश्विक निवेशकों की निरंतर रुचि को दर्शाता है. साथ ही, निवेश माहौल को बेहतर बनाने के प्रयासों का उद्देश्य भारत में कारोबार स्थापित करने और परिचालन का विस्तार करने को आसान बनाना रहा है.
पीएलआई और क्षेत्र-विशिष्ट औद्योगिक नीति
प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव कार्यक्रम ने इस विजन को क्षेत्र-विशिष्ट औद्योगिक नीति का ढांचा दिया है.
14 क्षेत्रों में पीएलआई योजनाओं ने मार्च 2026 तक 2.40 लाख करोड़ रुपये से अधिक का वास्तविक निवेश आकर्षित किया और 15.2 लाख करोड़ रुपये से अधिक का निर्यात किया. इन योजनाओं से 14.15 लाख से अधिक प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार भी पैदा हुए हैं.
इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्यूटिकल्स, ऑटोमोबाइल, स्पेशलिटी स्टील, सोलर मॉड्यूल, दूरसंचार और फूड प्रोसेसिंग जैसे क्षेत्रों के लिए यह कार्यक्रम विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहा है. इसका उद्देश्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं है, बल्कि घरेलू विनिर्माण क्षमताओं को मजबूत करना, आयात पर निर्भरता कम करना और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में भारत की स्थिति मजबूत करना भी है.
कारोबारी माहौल में सुधार
समग्र कारोबारी माहौल को बेहतर बनाने के प्रयास भी उतने ही महत्वपूर्ण रहे हैं.
जीएसटी की शुरुआत ने अप्रत्यक्ष करों के लिए एक अधिक एकीकृत ढांचा तैयार किया, जबकि नेशनल सिंगल विंडो सिस्टम, नियामकीय अनुपालनों में कमी, एफडीआई सुधार, नेशनल इंडस्ट्रियल कॉरिडोर कार्यक्रम और प्रोजेक्ट मॉनिटरिंग ग्रुप जैसी पहलों का उद्देश्य कारोबारों और निवेशकों के लिए बाधाओं को कम करना रहा है.
ये सुधार इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि कारोबार करने में आसानी केवल कागजी कार्रवाई कम करने तक सीमित नहीं है. इसका मतलब उन उद्यमियों, निर्माताओं और निवेशकों के लिए अधिक निश्चितता और दक्षता पैदा करना है, जो लंबे समय के फैसले लेते हैं.
वैश्विक एकीकरण के साथ रणनीतिक आत्मनिर्भरता
प्रधानमंत्री मोदी के औद्योगिक विजन में वैश्विक एकीकरण के साथ रणनीतिक आत्मनिर्भरता पर भी लगातार जोर दिया गया है.
भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण के बढ़ते आधार, फार्मास्यूटिकल्स के विस्तार और सेमीकंडक्टर तथा उन्नत-तकनीक क्षमताओं को विकसित करने के प्रयासों से घरेलू क्षमताओं को मजबूत करने के साथ भारतीय कंपनियों को वैश्विक वैल्यू चेन से जोड़ने की कोशिश दिखाई देती है.
यह संतुलन महत्वपूर्ण है. आत्मनिर्भरता का मतलब अलगाव नहीं होना चाहिए. बल्कि इसका मतलब ऐसी क्षमताओं, तकनीकों और आपूर्ति श्रृंखलाओं का निर्माण होना चाहिए, जो भारतीय कंपनियों को वैश्विक बाजारों में अधिक प्रभावी ढंग से प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम बनाएं.
नवाचार और इंफ्रास्ट्रक्चर
आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में बताया गया कि भारत की ग्लोबल इनोवेशन इंडेक्स रैंकिंग 2019 में 66वें स्थान से सुधरकर 2025 में 38वें स्थान पर पहुंच गई. मेरे लिए यह आर्थिक विकास के वाहक के रूप में नवाचार, तकनीक और उद्यमिता को दिए जा रहे बढ़ते महत्व को दर्शाता है.
इंफ्रास्ट्रक्चर इस बदलाव का एक और प्रमुख स्तंभ रहा है. जिसे कभी कमजोरी माना जाता था, वह अब तेजी से मजबूती का क्षेत्र बन रहा है. पीएम गति शक्ति, औद्योगिक कॉरिडोर, लॉजिस्टिक्स सुधार और इंफ्रास्ट्रक्चर में लगातार सार्वजनिक निवेश कनेक्टिविटी को बेहतर बनाने और आर्थिक गतिविधियों की बुनियाद मजबूत करने में मदद कर रहे हैं.
बदलती दुनिया के लिए आर्थिक विजन
प्रधानमंत्री मोदी से हमें एक ऐसा आर्थिक विजन मिलता है, जो कई आयामों तक फैला हुआ है, अधिक किफायती और भरोसेमंद ऊर्जा से लेकर कई मुक्त व्यापार समझौतों में प्रतिबिंबित द्विपक्षीय व्यापार तक, और घरेलू विनिर्माण को मजबूत करने से लेकर भारतीय कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विस्तार के लिए प्रोत्साहित करने तक.
भारत कोविड-19 महामारी और वैश्विक आर्थिक माहौल में महत्वपूर्ण बदलावों सहित सामने आई चुनौतियों के बावजूद आगे बढ़ रहा है. मेरे विचार में, यह मजबूती पिछले एक दशक में तैयार की गई बुनियाद और भारत की विकास गति को बनाए रखने पर निरंतर ध्यान का परिणाम है.
आगे की राह
आगे की चुनौती इस गति को बनाए रखने की है.
भारत के पास एक और महत्वपूर्ण विनिर्माण, तकनीक, नवाचार और निर्यात केंद्र बनने का अवसर है. ऐसा करने के लिए भारतीय उद्योग की ओर से निरंतर निवेश, वैश्विक वैल्यू चेन के साथ मजबूत एकीकरण, रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर अधिक जोर और ऐसा माहौल जरूरी होगा, जो उद्यमिता तथा जोखिम लेने को प्रोत्साहित करे.
सरकार और उद्योग के बीच साझेदारी महत्वपूर्ण बनी रहेगी. नीति ढांचा तैयार कर सकती है, लेकिन अंततः निवेश, नवाचार, रोजगार और निर्यात को आगे बढ़ाने का काम कारोबार करते हैं.
प्रधानमंत्री के लिए जन्मदिन की शुभकामना
उनके 76वें जन्मदिन पर मैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपनी हार्दिक शुभकामनाएं देता हूं और ऐसे समय में आर्थिक दिशा और स्थिरता प्रदान करने के उनके प्रयासों के लिए उनका आभार व्यक्त करता हूं, जब वैश्विक माहौल अनिश्चित बना हुआ है.
उनके नेतृत्व में भारत ने दिखाया है कि वह उत्पादन, तकनीक और व्यापार के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा कर सकता है और विकास कर सकता है. आगे की यात्रा निश्चित रूप से नई चुनौतियां लेकर आएगी, लेकिन यह महत्वपूर्ण अवसर भी पैदा करेगी.
प्रधानमंत्री मोदी को देश की सेवा में निरंतर ऊर्जा और सफलता के लिए मेरी शुभकामनाएं. कामना है कि भारत अपनी विकास यात्रा पर आगे बढ़ता रहे और वैश्विक अर्थव्यवस्था में और अधिक मजबूत शक्ति के रूप में उभरे.
अतिथि लेखक: डॉ. राजीव सिंह, महानिदेशक, इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स (ICC)
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के इस विशेष अवसर पर, पिछले एक दशक में भारत की अर्थव्यवस्था और औद्योगिक परिदृश्य में आए बदलावों को देखना जरूरी है.
by
गौरव भगत
आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के इस विशेष अवसर पर, पिछले एक दशक में भारत की अर्थव्यवस्था और औद्योगिक परिदृश्य में आए बदलावों को देखना जरूरी है. इस बदलाव को केवल नारों या पहलों के संदर्भ में नहीं, बल्कि उन आंकड़ों के आधार पर समझने की आवश्यकता है जो भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर और MSMEs की बदलती भूमिका को दर्शाते हैं.
‘मेक इन इंडिया’ की सफलता का आकलन केवल इस बात से नहीं होना चाहिए कि भारत कितना उत्पादन करता है, बल्कि इससे भी होना चाहिए कि वह वैल्यू चेन में कितनी तेजी से ऊपर बढ़ रहा है, कितने उत्पादक रोजगार पैदा कर रहा है और वैश्विक बाजार में एक प्रतिस्पर्धी सप्लायर के रूप में अपनी जगह कितनी मजबूत कर रहा है.
भारत की अर्थव्यवस्था के विस्तार के बीच यह सवाल और अधिक महत्वपूर्ण हो गया है. वित्त वर्ष 2025-26 में भारत की वास्तविक GDP वृद्धि 7.7% रहने का अनुमान है और स्थिर कीमतों पर यह ₹323.12 लाख करोड़ तक पहुंचने की उम्मीद है. इसी अवधि में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में भी गतिविधियों में मजबूती दिखाई दी है. वित्त वर्ष 2025-26 की पहली तिमाही में मैन्युफैक्चरिंग GVA में 7.72% और दूसरी तिमाही में 9.13% की वृद्धि दर्ज की गई, जबकि दिसंबर 2025 में मैन्युफैक्चरिंग आउटपुट 8.1% बढ़ा.
मेक इन इंडिया अब केवल असेंबली तक सीमित नहीं
सितंबर 2014 में जब ‘मेक इन इंडिया’ की शुरुआत हुई थी, तब लक्ष्य भारत को मैन्युफैक्चरिंग, डिजाइन और इनोवेशन का हब बनाना था. एक दशक बाद अधिक महत्वपूर्ण कहानी अलग-अलग उद्योगों के इर्द-गिर्द विकसित हुए मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम की है. इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल्स, फार्मास्यूटिकल्स, रिन्यूएबल एनर्जी, डिफेंस, टेक्सटाइल्स और फूड प्रोसेसिंग जैसे क्षेत्रों में इसकी स्पष्ट झलक दिखाई देती है.
इस बदलाव का एक महत्वपूर्ण प्रमाण Production Linked Incentive (PLI) योजनाएं हैं. दिसंबर 2025 तक इन योजनाओं ने 14 सेक्टर्स में ₹2.16 लाख करोड़ से अधिक के निवेश को सुगम बनाया और ₹20.41 लाख करोड़ से अधिक के अतिरिक्त उत्पादन एवं बिक्री में योगदान दिया. इन योजनाओं के माध्यम से 14.39 लाख से अधिक प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार भी पैदा हुए हैं.
इलेक्ट्रॉनिक्स में दिखी मैन्युफैक्चरिंग की बढ़ती क्षमता
इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर इस मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम की प्रगति का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है. इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं का उत्पादन 2014-15 में लगभग ₹1.9 लाख करोड़ से बढ़कर 2024-25 में ₹11.3 लाख करोड़ हो गया. इसी अवधि में इनके निर्यात ₹38,000 करोड़ से बढ़कर ₹3.3 लाख करोड़ हो गए. वहीं, मोबाइल फोन का उत्पादन ₹18,000 करोड़ से बढ़कर ₹5.5 लाख करोड़ तक पहुंच गया.
अब अगला लक्ष्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि भारत में कंपोनेंट्स, मशीनरी, इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी और हाई-वैल्यू प्रोडक्ट्स के निर्माण के जरिए वास्तविक वैल्यू क्रिएशन करना होना चाहिए.
असली इंजन: विकास और फॉर्मलाइजेशन के केंद्र में MSMEs
भारत में एक समावेशी मैन्युफैक्चरिंग इकोनॉमी का निर्माण केवल बड़ी कंपनियों के माध्यम से नहीं हो सकता. हर बड़ी कंपनी की सप्लाई चेन के पीछे छोटे और मध्यम व्यवसायों का एक विशाल नेटवर्क काम करता है. Economic Survey 2025-26 के अनुसार, MSMEs भारत की GDP में 31.1%, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में 35.4% और निर्यात में 48.58% का योगदान देते हैं.
ये आंकड़े ‘मेक इन इंडिया’ की हमारी समझ को एक नया आयाम देते हैं. MSMEs मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के हाशिये पर मौजूद केवल एक श्रेणी नहीं हैं; वे इसके संचालन और विकास की बुनियादी परत हैं.
फॉर्मलाइजेशन के साथ बढ़ रहा MSME बेस
MSME सेक्टर का फॉर्मलाइजेशन भी तेजी से आगे बढ़ रहा है. MSME मंत्रालय के डैशबोर्ड के अनुसार, 17 सितंबर 2026 तक 9.6 करोड़ से अधिक Udyam और Udyam Assist Platform रजिस्ट्रेशन हो चुके हैं, जबकि रजिस्टर्ड इकाइयों से जुड़ा रोजगार 42.5 करोड़ से अधिक है. ये आंकड़े MSME बेस की विविधता को भी दर्शाते हैं, जिसमें मैन्युफैक्चरिंग, सर्विस और ट्रेडिंग से जुड़ी इकाइयां शामिल हैं.
अब हमारे सामने अगला बड़ा सवाल यह है कि इनमें से कितने व्यवसाय स्थानीय सप्लायर की भूमिका से आगे बढ़कर वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने वाले उद्यम बन पाएंगे.
क्षमता का विस्तार: लोकल वेंडर्स से ग्लोबल पार्टनर्स तक
भारत के MSMEs के अगले दशक की चुनौती केवल घरेलू बाजार में टिके रहने की नहीं होगी. असली चुनौती एडवांस्ड ग्लोबल सप्लाई चेन का हिस्सा बनने की होगी.
दुनिया की कंपनियां अपने प्रोडक्शन और सोर्सिंग नेटवर्क में विविधता लाने की कोशिश कर रही हैं. लेकिन इस अवसर का लाभ उठाने के लिए केवल उत्पादन क्षमता पर्याप्त नहीं होगी. क्वालिटी, डिलीवरी, टेक्नोलॉजी, सर्टिफिकेशन, फाइनेंसिंग और स्केल, इन सभी मोर्चों पर निरंतरता जरूरी होगी.
यहीं से भारत की MSME पॉलिसी आर्किटेक्चर को केवल फॉर्मलाइजेशन से आगे बढ़ाकर कैपेसिटी बिल्डिंग की ओर ले जाने की आवश्यकता दिखाई देती है.
क्रेडिट के साथ टेक्नोलॉजी और क्वालिटी पर भी जोर जरूरी
क्रेडिट तक पहुंच आज भी महत्वपूर्ण है. MSME डैशबोर्ड के अनुसार, जुलाई 2026 तक Credit Guarantee Fund Trust for Micro and Small Enterprises के तहत कुल ₹15.12 लाख करोड़ की क्रेडिट गारंटी दी जा चुकी है.
पूंजी तक पहुंच किसी व्यवसाय को उपकरण खरीदने में सक्षम बनाती है, लेकिन आज प्रतिस्पर्धा इस बात से तय होगी कि उन उपकरणों से क्या बनाया जाता है, कितनी दक्षता से बनाया जाता है और वह अंतरराष्ट्रीय मानकों पर कितना खरा उतरता है. इसलिए टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल, ऑपरेशनल एफिशिएंसी, डिजिटल पेमेंट्स, सर्टिफिकेशन, एक्सपोर्ट की तैयारी और मैनेजमेंट क्षमता, इन सभी को MSME नीति में क्रेडिट तक पहुंच जितना ही महत्व मिलना चाहिए.
अगला मेक इन इंडिया अधिक टेक्नोलॉजी-इंटेंसिव होना चाहिए
भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की संरचना में टेक्नोलॉजी-आधारित मैन्युफैक्चरिंग की ओर बड़ा बदलाव आया है. आज मीडियम और हाई-टेक्नोलॉजी इंडस्ट्रीज मिलकर मैन्युफैक्चरिंग वैल्यू एडेड का 46.3% हिस्सा बनाती हैं.
भविष्य की नौकरियां अब केवल पारंपरिक असेंबली लाइनों पर निर्भर नहीं रहेंगी. रोबोटिक्स, सेमीकंडक्टर्स, इलेक्ट्रिक व्हीकल मोबिलिटी, एयरोस्पेस और एडवांस्ड मैटेरियल्स जैसे क्षेत्र आने वाले रोजगार और औद्योगिक विकास को आकार देंगे.
₹40,000 करोड़ के बजट आवंटन के साथ विस्तारित Electronics Components Manufacturing Scheme जैसे महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट इसी दिशा में संकेत देते हैं. ऐसे में MSMEs के लिए आगे बढ़ने का रास्ता हाई-टेक सप्लाई चेन में सक्रिय भागीदारी से होकर जाता है.
इस बदलाव को संभव बनाने के लिए केवल क्रेडिट सुविधाओं पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं होगा. रिसर्च एंड डेवलपमेंट के लिए को-फंडिंग, क्वालिटी सर्टिफिकेशन को वैश्विक स्तर तक ले जाने और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर को बढ़ावा देने जैसे कदम भी आवश्यक होंगे.
विकसित भारत@2047: वैश्विक स्तर की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता का निर्माण
अगर पहला चरण भारत की आंतरिक क्षमताओं को विकसित करने का था, तो अगली चुनौती वैश्विक प्रतिस्पर्धा की है. भारत के MSMEs को केवल आयात का विकल्प बनने तक सीमित नहीं रहना चाहिए. उन्हें ऐसे उत्पाद बनाने का लक्ष्य रखना होगा जो दुनिया के सर्वश्रेष्ठ उत्पादों को भी कड़ी प्रतिस्पर्धा दे सकें.
आखिरकार, सफलता का आकलन उत्पादकता, तकनीकी क्षमता और निर्यात क्षमता के आधार पर होगा.
बेहतर स्किल डेवलपमेंट, पूंजी और बाजार तक पहुंच के साथ भारत अपने छोटे व्यवसायों को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के महत्वपूर्ण ग्लोबल पार्टनर्स में बदल सकता है. यही वह बदलाव है जो भारत की मैन्युफैक्चरिंग कहानी के अगले अध्याय को परिभाषित करेगा, ‘भारत में मैन्युफैक्चरिंग’ से आगे बढ़कर ‘भारत का मैन्युफैक्चरिंग’ बनाने की दिशा में.
अतिथि लेखक: गौरव भगत, उद्यमी
(गौरव भगत, कंसोर्टियम गिफ्ट्स और गौरव भगत अकादमी के फाउंडर हैं.)