विसर्जित भारत

2047 तक विकसित, दिवाली 2026 तक विसर्जित

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Thursday, 08 October, 2026
BWHindi

पलक शाह

गणपति आए, गणपति चले गए, रिटेल निवेशकों के पोर्टफोलियो भी उनके साथ अरब सागर में चले गए और बप्पा के विपरीत, वे "पुढच्या वर्षी लवकर" वापस नहीं आ रहे हैं.

विसर्जित भारत में आपका स्वागत है: दुनिया की एकमात्र ऐसी अर्थव्यवस्था जहां हर कारोबारी दिन संपत्ति विसर्जन के लिए चली जाती है, जबकि सरकार किनारे पर खड़ी होकर ताली बजाती है और चिल्लाती है, "कोई बात नहीं, रिटेल संभाल लेगा!"

वह स्कोरबोर्ड जिसे नॉर्थ ब्लॉक पढ़ने से इनकार करता है

सेंसेक्स: ~71,900. शिखर: ~86,800. यानी 15,000 अंक, करीब 17%, वाष्पित हो गए. निफ्टी 22,450 से नीचे है, करीब 14% नीचे. हमारे पास लगातार आठ हफ्तों की गिरावट रही है. सितंबर में एफपीआई ने ₹45,500 करोड़ निकाले, फिर अकेले 1 अक्टूबर को 9,500 करोड़ रुपये और बेच दिए. वह भी एक दिन में. दोपहर के भोजन से पहले.

रुपया साल की शुरुआत में करीब 90 पर था. अब यह 97 के आसपास मंडरा रहा है. इसने इस साल बॉलीवुड के उस हीरो से ज्यादा वजन कम किया है, जो बायोपिक की तैयारी कर रहा हो.

लेकिन आराम से रहिए. सरकार में कोई भी इसे रिकॉर्ड पर नहीं कहेगा, लेकिन गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि यह सब वैसे भी सिर्फ सट्टा है.

सट्टा सिद्धांत: कभी कहा नहीं जाता, हमेशा महसूस होता है

आधिकारिक तौर पर, किसी ने कभी बाजार को सट्टा नहीं कहा है. अनौपचारिक रूप से, नीति ऐसे लिखी गई है जैसे किसी ने ऐसा कहा हो. हर टैक्स बढ़ोतरी, एफपीआई की बिकवाली पर हर कंधे उचकाना, हर "रिटेल इसे संभाल लेगा" में एक ही ऑफ-द-रिकॉर्ड मूड है: यह सिर्फ एक कैसीनो है, उन्हें जुआ खेलने दो. ठीक है. अगर यही वह सोच है जिसे कोई स्वीकार नहीं करेगा, तो कुछ सवाल:

अगर यह सट्टा है, तो आप इस पर ब्लू-चिप की तरह टैक्स क्यों लगाते हैं? एसटीसीजी 15% से बढ़कर 20% हो गया. एलटीसीजी 10% से बढ़कर 12.5% हो गया. इसके ऊपर एसटीटी और स्टांप ड्यूटी भी है. यहां तक कि एक कैसीनो भी अपना हिस्सा लेने के साथ मुफ्त ड्रिंक देता है. यह वित्त मंत्री सरकार का हिस्सा लेते हुए भी भाषण देते हैं.

अगर यह सट्टा है, तो आपके अपने इकोसिस्टम ने वर्षों तक नागपुर की हर आंटी को "म्यूचुअल फंड सही है" क्यों बताया? या तो आपने मानव इतिहास में सबसे बड़ा सट्टा भर्ती अभियान चलाया, या बाजार अर्थव्यवस्था का पूंजी इंजन है और आप इसे समझते ही नहीं हैं. एक चुनिए. आप दोनों नहीं कर सकते.

अगर यह सट्टा है, तो आपका अपना ईपीएफओ प्रोविडेंट फंड का पैसा इक्विटी ईटीएफ में क्यों लगा रहा है? पेंशन का पैसा मटका डेन में? कृपया अपने खिलाफ ही एफआईआर दर्ज करें.

सट्टे में कमाई, डिविडेंड, कैपेक्स और ऐसे आईपीओ नहीं होते जो फैक्ट्रियों के लिए फंड जुटाएं. बाजार में ये सभी चीजें होती हैं. बाजार में जो नहीं है, वह ऐसी सरकार है जो बुनियादी गणित कर सके.

रिटर्न का गणित: मंत्रालय के लिए धीरे-धीरे समझाया गया

एक एफपीआई देशभक्त नहीं है. वह ब्लूमबर्ग टर्मिनल वाला एक स्प्रेडशीट है. उसे डॉलर में 12–15% चाहिए. भारत उसे यह देता है:

निफ्टी उदारतापूर्वक 12% कमाता है. यह उदार है क्योंकि फिलहाल वह माइनस साइन कमा रहा है.

एलटीसीजी 12.5% पर मलाई निकाल लेता है, जिससे ~10.5% बचता है.

रुपया ~6.5% कमजोर हो जाता है, जिससे ~4% बचता है.

इस बीच अमेरिकी 10-वर्षीय ट्रेजरी 5.2% से ऊपर भुगतान कर रहा है. यह जोखिम-मुक्त है. कोई एसटीटी नहीं. कोई टैक्स नोटिस नहीं. बजट वाले दिन दिल का दौरा नहीं.

तो भारत उभरते बाजार के जोखिम के साथ 4% देता है, और अंकल सैम बिना किसी जोखिम के 5.2% देता है. फिर नॉर्थ ब्लॉक सोचता है कि पैसा क्यों जा रहा है और दोष "शॉर्ट सेलर्स" को देता है.

यह कोई विदेशी साजिश नहीं है. यह कक्षा 7 का गणित है, एनसीईआरटी संस्करण.

अब इसमें पैसे की लागत जोड़िए. जिन फंडों ने भारत में निवेश करने के लिए सस्ते येन या डॉलर उधार लिए थे, उन्हें उस पैसे पर ब्याज देना पड़ता है और सस्ते-येन का दौर खत्म हो चुका है. कैरी लागत के बाद, भारत का कारोबार रिटर्न नहीं है. यह दान है. जिस पैसे की खुद लागत होती है, वह वहीं जाता है जहां उसका स्वागत होता है, न कि वहां जहां उस पर टैक्स लगाया जाता है, भाषण दिए जाते हैं और उसे जुआरी कहा जाता है.

"हमें एफपीआई की जरूरत नहीं, रिटेल शॉक एब्जॉर्बर है"

यह आधिकारिक दिलासा है: घरेलू निवेशक अब इतने मजबूत हैं कि किसी भी विदेशी बिकवाली को झेल सकते हैं. और हां, उसी दिन डीआईआई ने ₹10,000 करोड़ की खरीदारी की, जिस दिन एफपीआई ने ₹9,500 करोड़ की बिकवाली की.

अनुवाद: विदेशी निवेशक गिरावट के शीर्ष पर बेचकर डॉलर लेकर चला गया. पुणे की एसआईपी आंटी ने वह खरीद लिया जिसे एफपीआई बेच रहा था.

शॉक एब्जॉर्बर कार का एक हिस्सा होता है. इसे सचमुच इस तरह बनाया गया है कि यह दब जाए ताकि यात्रियों का सफर आरामदायक रहे. अंदाजा लगाइए कि यात्री कौन है. (संकेत: यह किसी भी स्थिति में कैपिटल गेन्स टैक्स वसूलता है.)

रिटेल को बाजारों में आमंत्रित नहीं किया गया था. उसे विज्ञापनों, नारों और मंत्रियों के भाषणों के जरिए लुभाया गया था. अब जब उसके हाथ में थैला आ गया है, तो उस थैले को "शॉक-एब्जॉर्बिंग क्षमता" का नया नाम दे दिया गया है. यह बाजार नहीं है. यह पावरपॉइंट डेक के साथ दिनदहाड़े डकैती है.

शॉर्ट सेलर्स के लिए खुला मैदान

जब आठ हफ्तों की गिरावट पर नीतिगत प्रतिक्रिया खामोशी हो, तो बाजार बिना रखवाली के आम के बाग जैसा बन जाता है. कोई टैक्स राहत नहीं. कोई रुपये की रणनीति नहीं. कोई संकेत नहीं. शॉर्ट सेलर्स को किसी साजिश की जरूरत नहीं है. उन्हें बस ऐसी सरकार चाहिए जो सो रही हो, और उन्हें ऐसी सरकार मिल गई है.

"वे एक साल में वापस आ जाएंगे." सबसे बड़ा भ्रम

पूंजी की कोई वफादारी नहीं होती. उसके पास विकल्प होते हैं. हर महीने जब भारत नाराज बैठा रहता है, एफपीआई कोरिया, ताइवान, जापान और अमेरिकी बॉन्ड में अपनी पोजीशन फिर से बनाते हैं. वापस आने के लिए एक वजह चाहिए, प्रेस रिलीज नहीं. दोबारा प्रवेश कोई यू-टर्न नहीं है. यह एक नई निवेश समिति की बैठक है, और फिलहाल भारत उस बैठक में स्प्रेडशीट पर हार जाता है.

2047 तक इंतजार करें? सच में?

इस रफ्तार पर, आज शुरू किया गया 20 साल का एसआईपी एक गहरे आध्यात्मिक अनुभव में बदल जाएगा. विकसित भारत को भूल जाइए. पहले फिक्स-इट भारत आजमाइए:

इंडेक्सेशन बहाल करें, या एलटीसीजी को वापस पुराने स्तर पर लाएं. मलाई को मथने से पहले ही उस पर टैक्स लगाना बंद करें.

एक विश्वसनीय रुपये की कहानी दीजिए, रोजाना "आरबीआई नजर रख रहा है" नहीं.

सट्टे वाला प्रवचन बंद कीजिए. आप सोमवार को बाजार को राष्ट्र निर्माण के रूप में नहीं बेच सकते और मंगलवार को इसे जुआ कह सकते हैं.

गणित स्वीकार कीजिए: टैक्स और मुद्रा प्रभाव के बाद मिलने वाला रिटर्न जोखिम-मुक्त अमेरिकी बॉन्ड से अधिक होना चाहिए, वरना पैसा चला जाएगा.

भारत ने अपनी क्षमता नहीं खोई है. उसने अपनी कीमत खो दी है. निवेशकों की भाषा में इसका मतलब है कि उसने अपना आकर्षण खो दिया है.

विकसित भारत मंजिल है. विसर्जित भारत रास्ता है. . जीपीएस उन लोगों द्वारा चलाया जा रहा है जो सेंसेक्स को कभी लॉटरी टिकट नहीं कहेंगे, लेकिन उस पर उसी तरह टैक्स लगाते रहेंगे.

गणपति बप्पा मोरया, पोर्टफोलियो, अगले बरस तू जल्दी आ.

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
 


भारतीय दीवार पर किसका होगा कब्जा?

जैसे-जैसे बिरला ओपस, जेएसडब्ल्यू ड्यूलक्स और पिडिलाइट की हैशा स्थापित दिग्गजों को चुनौती दे रही हैं, त्योहारी सीजन यह दिखाएगा कि क्या वितरण क्षमता, डीलर अर्थशास्त्र और पेंटर का प्रभाव लंबे समय से चली आ रही उपभोक्ता आदतों को बदल सकता है.

डॉ. अनुराग बत्रा by
Published - Thursday, 08 October, 2026
Last Modified:
Thursday, 08 October, 2026
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दशकों से भारत का डेकोरेटिव पेंट्स बाजार लगभग पूर्वानुमानित दिखाई देता था. एशियन पेंट्स निर्विवाद रूप से अग्रणी था, बर्जर पेंट्स मुख्य चुनौती देने वाला था, जबकि कंसाई नेरोलैक और ड्यूलक्स ने अपनी स्थापित स्थिति बनाए रखी थी. उपभोक्ता ब्रांडों को जानते थे, डीलर जानते थे कि शेल्फ से क्या तेजी से बिकता है और पेंटर्स के पास अपने पसंदीदा उत्पाद थे.

यह ऐसा बाजार था जहां संबंध और वितरण विज्ञापन जितने ही महत्वपूर्ण थे. अब यह समीकरण तेजी से बदल रहा है.

बिरला ओपस के आक्रामक तरीके से अपनी क्षमता बढ़ाने, जेएसडब्ल्यू के ड्यूलक्स के जरिए अपने पेंट्स कारोबार को मजबूत करने और पिडिलाइट के डेकोरेटिव पेंट्स में प्रवेश करने के साथ भारतीय बाजार अब केवल स्थापित कंपनियों के बीच की लड़ाई नहीं रह गया है. यह भारतीय कंज्यूमर मार्केटिंग में सबसे दिलचस्प प्रतिस्पर्धी मुकाबलों में से एक बनता जा रहा है.

सवाल अब यह नहीं है कि नए खिलाड़ी बाजार में प्रवेश कर सकते हैं या नहीं. वे प्रवेश कर चुके हैं. असली सवाल यह है कि वे मौजूदा कंपनियों से कितनी बाजार हिस्सेदारी छीन सकते हैं.

पुरानी व्यवस्था को मिल रही है चुनौती

इस बदलाव को अलग बनाने वाली बात नए प्रवेश करने वाले खिलाड़ियों की प्रोफाइल है. ये छोटे ब्रांड नहीं हैं जो बाजार में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं. इनके पीछे भारत के कुछ सबसे बड़े कारोबारी समूह हैं, जिनके पास मैन्युफैक्चरिंग, वितरण, डीलर नेटवर्क, तकनीक, मार्केटिंग और उपभोक्ता अधिग्रहण में निवेश करने की वित्तीय ताकत है.

बिरला ओपस ने बड़े पैमाने और वितरण नेटवर्क बनाने के लिए आक्रामक रुख अपनाया है. जेएसडब्ल्यू ने ड्यूलक्स कारोबार के जरिए अपनी स्थिति मजबूत की है. वहीं पिडिलाइट अपने साथ विशाल वितरण अनुभव और कंस्ट्रक्शन तथा होम-इंप्रूवमेंट इकोसिस्टम में लंबे समय से चले आ रहे संबंध लेकर आया है, इसलिए सवाल अब यह नहीं है कि बाजार में प्रवेश की बाधाओं को पार किया जा सकता है या नहीं. बड़ी चुनौती निवेश और उपलब्धता को उपभोक्ता की पसंद में बदलना है.

त्योहारी सीजन ने बढ़ाई चुनौती

समय इससे ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं हो सकता. त्योहारी सीजन पारंपरिक रूप से घरों की मरम्मत और दोबारा पेंट कराने के लिए महत्वपूर्ण अवधि रहा है, जिससे दिवाली के आसपास के महीने पेंट ब्रांडों के लिए स्वाभाविक युद्ध का मैदान बन जाते हैं. जिन उपभोक्ताओं ने अपने घरों की पेंटिंग टाल रखी है, वे फैसले लेना शुरू करते हैं, जबकि डीलर बढ़ती मांग के लिए तैयारी करते हैं.

लेकिन उपभोक्ता खाली स्लेट के साथ शुरुआत नहीं कर रहे हैं. ज्यादातर के पास पहले से ही एक ऐसा ब्रांड है जिसे वे जानते हैं, एक ऐसा पेंटर है जिस पर वे भरोसा करते हैं और एक ऐसा डीलर है जहां वे नियमित रूप से जाते हैं, इसलिए चुनौती देने वाले ब्रांडों के लिए केवल जागरूकता पर्याप्त नहीं है. उन्हें एक पूरे इकोसिस्टम को अपनी आदतें बदलने के लिए राजी करना होगा.

डीलर और पेंटर के स्तर पर जीती जाएगी लड़ाई

यह शायद पेंट्स और कई अन्य कंज्यूमर कैटेगरी के बीच सबसे बड़ा अंतर है. विज्ञापन आकांक्षा पैदा कर सकता है, लेकिन अंतिम खरीद को अक्सर डीलर और पेंटर प्रभावित करते हैं. उपभोक्ता के मन में कोई रंग या फिनिश हो सकता है, लेकिन इस्तेमाल किए जाने वाले उत्पाद को पेंटर प्रभावित कर सकता है और आखिर में क्या खरीदा जाए, इसे डीलर प्रभावित कर सकता है, इसीलिए केवल वितरण के आंकड़े पूरी कहानी नहीं बताते.

किसी डीलर को उत्पाद स्टॉक करने के लिए तैयार करना एक उपलब्धि है. डीलर को उस उत्पाद की सिफारिश करने के लिए तैयार करना दूसरी बात है. किसी पेंटर को एक बार उत्पाद आजमाने के लिए तैयार करना और उसे बार-बार इस्तेमाल करने के लिए उसका पसंदीदा ब्रांड बनाना दो बिल्कुल अलग बातें हैं.

इसलिए पेंट की लड़ाई केवल टेलीविजन, डिजिटल प्लेटफॉर्म या आउटडोर मीडिया पर नहीं लड़ी जा रही है. यह हजारों डीलर काउंटरों पर और पेंटर्स तथा घर के मालिकों के बीच होने वाली बातचीत में लड़ी जा रही है.

एशियन पेंट्स को अलग लड़ाई लड़नी है

एशियन पेंट्स के लिए रणनीति केवल डिस्काउंट के जरिए हर चुनौती देने वाले का जवाब देने की नहीं हो सकती. उसका सबसे बड़ा प्रतिस्पर्धी लाभ दशकों में जमा हुआ भरोसा, पहचान और मजबूत वितरण नेटवर्क है.

घर की पेंटिंग कभी-कभार होने वाली खरीदारी है. इसमें पैसा, मेहनत, समय और काफी असुविधा शामिल होती है. इसलिए उपभोक्ता चुनाव करते समय रूढ़िवादी हो सकते हैं. ऐसे में एशियन पेंट्स के पास भावनात्मक और वितरण का बहुत बड़ा सुरक्षा कवच है. उसकी चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि यह बढ़त आत्मसंतुष्टि में न बदल जाए.

प्रतिस्पर्धियों के ध्यान और वितरण हासिल करने के लिए आक्रामक तरीके से खर्च करने के बीच इनोवेशन, प्रीमियमाइजेशन, सर्विस, कलर एक्सपर्टाइज और युवा घर मालिकों के लिए प्रासंगिक बने रहना तेजी से महत्वपूर्ण होगा. बाजार के नेता को केवल बाजार हिस्सेदारी का बचाव नहीं करना है. उसे उपभोक्ताओं को ब्रांड बदलने से रोकने के लिए लगातार कारण देने होंगे.

बर्जर अब खुद चुनौती झेलने वाला चुनौतीकर्ता

बर्जर खुद को एक दिलचस्प स्थिति में पाता है. वर्षों तक वह बाजार के नेता को चुनौती देने वाला खिलाड़ी रहा. आज उसे कई दिशाओं से चुनौती देने वाले खिलाड़ी मिल रहे हैं. उसकी प्रतिक्रिया में अपने मुख्य बाजारों की रक्षा करने के साथ-साथ उन क्षेत्रों और सेगमेंट में ज्यादा आक्रामकता शामिल करनी होगी, जहां नए खिलाड़ी अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं.

वितरण, डीलर संबंध और पेंटर की वफादारी महत्वपूर्ण होगी. बर्जर की विरासत एक संपत्ति है, लेकिन केवल विरासत पर्याप्त नहीं होगी. उसे अपने मौजूदा संबंधों को ज्यादा प्रभावी बनाना होगा और साथ ही यह सुनिश्चित करना होगा कि नए प्रवेश करने वाले खिलाड़ी उसके ग्राहकों के आसपास धीरे-धीरे अपना इकोसिस्टम न बना लें.

बिरला ओपस ने चुनी है रफ्तार

बिरला ओपस ने शायद सबसे आक्रामक रास्ता अपनाया है. वर्षों तक धीरे-धीरे अपनी मौजूदगी बनाने के बजाय उसने मैन्युफैक्चरिंग क्षमता, वितरण और व्यापक उत्पाद पोर्टफोलियो के जरिए तेजी से बड़े पैमाने पर पहुंच बनाने की कोशिश की है.

यह उस कैटेगरी में तार्किक है, जहां वितरण ऐतिहासिक रूप से प्रवेश की सबसे बड़ी बाधाओं में से एक रहा है. लेकिन किसी डीलर को उत्पाद स्टॉक करने के लिए तैयार करने और उसे उत्पाद की सिफारिश करने के लिए तैयार करने में महत्वपूर्ण अंतर है. पेंटर को उत्पाद आजमाने के लिए तैयार करने और उसे उसका पसंदीदा ब्रांड बनाने के बीच इससे भी बड़ा अंतर है. अब बिरला ओपस को उपलब्धता को ट्रायल में, ट्रायल को पसंद में और पसंद को वफादारी में बदलना होगा.

जेएसडब्ल्यू ड्यूलक्स के पास अलग बढ़त

जेएसडब्ल्यू की स्थिति अलग है क्योंकि ड्यूलक्स उसे एक स्थापित प्रीमियम ब्रांड देता है, बजाय इसके कि उसे सब कुछ शून्य से बनाना पड़े. इससे जेएसडब्ल्यू को अलग-अलग उपभोक्ता सेगमेंट में विस्तार करने का अवसर मिलता है.

ड्यूलक्स अपने साथ काफी ब्रांड इक्विटी और प्रीमियम पोजिशनिंग लेकर आता है, जबकि जेएसडब्ल्यू पूंजी, महत्वाकांक्षा और एक मौजूदा पेंट्स कारोबार लेकर आता है.

रणनीतिक चुनौती यह होगी कि पोर्टफोलियो को इस तरह से एक साथ काम कराया जाए कि उपभोक्ता भ्रमित न हों या कंपनी के भीतर अनावश्यक प्रतिस्पर्धा न पैदा हो. अगर इसे अच्छी तरह संभाला गया, तो यह संयोजन जेएसडब्ल्यू को स्थापित व्यवस्था को चुनौती देने के लिए एक मजबूत मंच देता है.

पिडिलाइट अपना अलग रास्ता अपना सकता है

पिडिलाइट के प्रवेश से बाजार में एक और आयाम जुड़ता है. कंपनी ने एडहेसिव, वॉटरप्रूफिंग, रिपेयर और संबंधित कैटेगरी में दशकों तक ब्रांड बनाने के जरिए भारतीय रिटेल, कॉन्ट्रैक्टर और होम-इंप्रूवमेंट इकोसिस्टम को पहले से समझा है, इसलिए उसका अवसर केवल पारंपरिक पेंट कंपनी के मॉडल की नकल करने में नहीं हो सकता. पिडिलाइट कंस्ट्रक्शन और होम इम्प्रूवमेंट की अपनी समझ का इस्तेमाल घर के आसपास एक व्यापक प्रस्ताव बनाने के लिए कर सकता है.

आखिरकार इससे उसकी पेंट रणनीति केवल पेंट की एक और टिन बेचने के बारे में न होकर घर के बड़े होम-इंप्रूवमेंट सफर में शामिल होने के बारे में हो सकती है.

क्या यह कीमतों की जंग बनेगी?

सबसे स्पष्ट खतरा यह है कि यह मुकाबला कीमतों की जंग बन जाए. नए खिलाड़ियों को बाजार हिस्सेदारी चाहिए. मौजूदा कंपनियों को वॉल्यूम बचाना है. डीलर स्वाभाविक रूप से मार्जिन और इंसेंटिव पर प्रतिक्रिया देते हैं, लेकिन पेंट ऐसी कैटेगरी नहीं है, जिसमें केवल कीमत विजेता तय करती है.

उपभोक्ता केवल पेंट के लिए भुगतान नहीं कर रहा है, बल्कि मजदूरी, सतह की तैयारी और दोबारा पेंट कराने की असुविधा के लिए भी भुगतान कर रहा है. इसलिए क्वालिटी, फिनिश, टिकाऊपन, रंगों की रेंज, वारंटी और सर्विस मूल्य के समीकरण का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं.

समझदार ब्रांड केवल सबसे सस्ता होने के बजाय वैल्यू पर प्रतिस्पर्धा करेंगे. असली सवाल यह है कि कोई ब्रांड उपभोक्ता को स्विच करने के लिए कौन सा अतिरिक्त कारण दे सकता है?

पेंटर बन सकता है सबसे ताकतवर इन्फ्लुएंसर

पेंटर का महत्व और बढ़ने की संभावना है. पेंटर समझते हैं कि कौन से उत्पाद लगाना आसान हैं, कौन बेहतर फिनिश देते हैं और किन उत्पादों से बाद में समस्याएं पैदा होने की संभावना है.

उनकी सिफारिश काफी प्रभावशाली होती है, खासकर प्रीमियम शहरी उपभोक्ता सेगमेंट के बाहर. इसलिए पेंटर एजुकेशन, लॉयल्टी प्रोग्राम, इंसेंटिव और सीधे जुड़ाव रणनीतिक हथियार बन जाते हैं.

कई मामलों में उपभोक्ता के लिए लड़ाई वास्तव में उपभोक्ता के पेंट की दुकान तक पहुंचने से पहले ही जीत ली जाती है. जो ब्रांड पेंटर का भरोसा जीत लेता है, वह घर जीतने की दिशा में एक कदम आगे बढ़ चुका होता है.

असली लड़ाई ब्रांड बदलने की है

यहीं नए खिलाड़ियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती है. बड़े विज्ञापन बजट के साथ जागरूकता पैदा करना अपेक्षाकृत आसान है. व्यवहार बदलना कहीं ज्यादा मुश्किल है.

एक ऐसा घर मालिक जिसने 20 वर्षों से एशियन पेंट्स का इस्तेमाल किया है, अचानक किसी दूसरे ब्रांड को क्यों आजमाएगा? बर्जर का आदी पेंटर अपनी सिफारिश क्यों बदलेगा? कोई डीलर किसी नए प्रवेश करने वाले ब्रांड को अपनी कीमती शेल्फ स्पेस और सिफारिश क्यों देगा?

ये केवल कम्युनिकेशन से जुड़े सवाल नहीं हैं. ये भरोसे, अर्थशास्त्र, प्रदर्शन और आदत से जुड़े सवाल हैं. इसलिए चुनौती देने वाले खिलाड़ियों को इकोसिस्टम में हर भागीदार को स्विच करने के लिए एक मजबूत कारण देना होगा.

भारतीय दीवार पर किसका होगा कब्जा?

भारतीय पेंट बाजार अब पूरी तरह अलग दौर में प्रवेश कर रहा है. एशियन पेंट्स को एक विशाल ब्रांड और वितरण सुरक्षा कवच की रक्षा करनी है. बर्जर को अपनी स्थिति बचाते हुए चुनौती देने वाले खिलाड़ी की तरह व्यवहार जारी रखना है. कंसाई नेरोलैक को डेकोरेटिव पेंट्स में अपनी प्रासंगिकता मजबूत करनी है. बिरला ओपस को अपने पैमाने और निवेश को लगातार उपभोक्ता पसंद में बदलना है. जेएसडब्ल्यू को ड्यूलक्स और अपने व्यापक पेंट्स पोर्टफोलियो को एक साथ प्रभावी ढंग से काम कराना है. पिडिलाइट को यह पता लगाना है कि क्या उसका होम-इंप्रूवमेंट इकोसिस्टम उसे पेंट्स में एक अलग रास्ता दे सकता है.

त्योहारी सीजन यह महत्वपूर्ण संकेत देगा कि ये रणनीतियां उपभोक्ता व्यवहार में कैसे बदल रही हैं. लेकिन यह केवल त्योहारी बिक्री की लड़ाई नहीं है.

यह वितरण, डीलर इकनॉमिक्स, पेंटर के प्रभाव, उपभोक्ता के भरोसे और अंततः ब्रांड पसंद की लड़ाई है. वर्षों तक भारतीय पेंट उद्योग मुख्य रूप से बाजार हिस्सेदारी बचाने के बारे में था.

अब हर प्रमुख खिलाड़ी को इसे हासिल करने के लिए लड़ना होगा. और सबसे बड़ा इनाम पेंट का डिब्बा नहीं है. यह भारतीय घर के अंदर की दीवार है.

डॉ. अनुराग बत्रा, BW रिपोर्टर्स

(डॉ. अनुराग बत्रा BW Businessworld के चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ तथा exchange4media Group के संस्थापक हैं. पहली पीढ़ी के उद्यमी और मीडिया लीडर होने के साथ-साथ वह एंजल इन्वेस्टर, लेखक, टेलीविजन होस्ट और उद्यमियों तथा मीडिया प्रोफेशनल्स के मेंटर भी हैं. वह कई कॉरपोरेट और संस्थागत बोर्डों में काम करते हैं और मैनेजमेंट एजुकेशन से लंबे समय से जुड़े हुए हैं. वह MDI गुरुग्राम के पूर्व छात्र हैं और इसके बोर्ड ऑफ गवर्नर्स में काम कर चुके हैं तथा MDI Alumni Association के अध्यक्ष रह चुके हैं. वह International Academy of Television Arts & Sciences के सदस्य भी हैं. एक उत्साही पाठक डॉ. बत्रा का मानना है कि जब जुनून किसी का पेशा बन जाता है, तो काम को उद्देश्य की गहरी भावना मिलती है.)

 


खाद्य सुरक्षा से किसान सुरक्षा तक: 2014 के बाद भारत की कृषि नीति के ढांचे में कैसे आया बदलाव

लेखक बंशीलाल गुर्जर और नीरज सहरावत के अनुसार, इस बदलाव की सबसे सीधी अभिव्यक्ति प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि में दिखाई देती है. पीएम-किसान पात्र भूमिधारक किसान परिवारों को प्रत्यक्ष लाभ अंतरण के माध्यम से सालाना 6,000 रुपये की आय सहायता प्रदान करता है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Wednesday, 07 October, 2026
Last Modified:
Wednesday, 07 October, 2026
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भारत की आजादी के बाद के अधिकांश समय में कृषि नीति एक प्रमुख राष्ट्रीय लक्ष्य से संचालित रही: बढ़ती आबादी के लिए पर्याप्त खाद्य उत्पादन करना. इस उद्देश्य ने खाद्य सुरक्षा की नींव रखी, लेकिन किसान अक्सर आय में उतार-चढ़ाव, जलवायु जोखिम, बाजार तक अनिश्चित पहुंच और बढ़ती इनपुट लागत के प्रति असुरक्षित बना रहा. 2014 के बाद से नीति का ढांचा धीरे-धीरे किसान सुरक्षा की व्यापक अवधारणा की ओर बढ़ा है. यह बदलाव किसी एक योजना में नहीं, बल्कि इस बात में दिखाई देता है कि आय सहायता, फसल बीमा, खरीद, मृदा स्वास्थ्य, सिंचाई, तकनीक और बाजार तक पहुंच को एक अधिक एकीकृत ढांचे में लाया गया है.

इस बदलाव की सबसे सीधी अभिव्यक्ति प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि में दिखाई देती है. पीएम-किसान पात्र भूमिधारक किसान परिवारों को प्रत्यक्ष लाभ अंतरण के माध्यम से सालाना 6,000 रुपये की आय सहायता प्रदान करता है. इसका पैमाना महत्वपूर्ण है. आधिकारिक पीएम-किसान पोर्टल के मुताबिक अप्रैल से जुलाई 2026 के चक्र में 9.44 करोड़ से अधिक किसानों को लाभ मिला. इस योजना ने एक राष्ट्रीय डिजिटल तंत्र तैयार किया है, जिसके माध्यम से सहायता सीधे, नियमित और बिना किसी मध्यस्थ के लाभार्थियों तक पहुंचती है. ऐसे क्षेत्र में जहां बीज, उर्वरक, श्रम और सिंचाई पर खर्च फसल से होने वाली आय प्राप्त होने से पहले ही हो जाता है, वहां नियमित नकद सहायता किसान परिवारों के लिए व्यावहारिक महत्व रखती है.

जोखिम से सुरक्षा एक अन्य प्रमुख स्तंभ रहा है. 2016 में शुरू की गई प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना भागीदारी के लिहाज से दुनिया की सबसे बड़ी फसल बीमा योजनाओं में से एक बन गई है. अगस्त 2026 में जारी सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, शुरुआत से अब तक 92.46 करोड़ से अधिक किसान आवेदनों का बीमा किया गया है और 26.33 करोड़ से अधिक किसान आवेदनों के लिए 2.06 लाख करोड़ रुपये से अधिक के दावों का भुगतान किया गया है. ऐसी सुरक्षा का महत्व फसल नुकसान के बाद मिलने वाले मुआवजे से कहीं आगे है. यह ऐसे पेशे के लिए औपचारिक जोखिम-साझाकरण तंत्र तैयार करती है, जिसमें बारिश, बाढ़, कीट, बीमारी और चरम मौसम कुछ ही दिनों में महीनों की मेहनत को खत्म कर सकते हैं.

सरकार ने कृषि आय की सुरक्षा के साधन के तौर पर न्यूनतम समर्थन मूल्य और खरीद का भी इस्तेमाल जारी रखा है. आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक 2004 से 2014 के दौरान 698.7 मिलियन टन की कुल खरीद की तुलना में 2014 से 2026 के दौरान यह बढ़कर 1,229.2 मिलियन टन हो गई, जबकि इसी तुलना अवधि में एमएसपी पर खरीद का मूल्य भी काफी बढ़ा है. यह विस्तार इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि खरीद केवल राज्य और किसान के बीच एक लेन-देन नहीं है. प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कीमतों की उम्मीदों, नकदी की उपलब्धता और भरोसे को प्रभावित कर सकती है.

संसाधनों के अधिक कुशल इस्तेमाल की दिशा में इनपुट-आधारित कृषि से बदलाव भी उतना ही स्पष्ट है. मृदा स्वास्थ्य कार्ड कार्यक्रम के तहत 26 करोड़ से अधिक कार्ड जारी किए गए हैं, जिससे किसानों को मिट्टी में पोषक तत्वों की स्थिति और फसल-विशिष्ट उर्वरक संबंधी सिफारिशों की जानकारी मिलती है. सरकारी आंकड़े प्रति बूंद अधिक फसल योजना के तहत सूक्ष्म सिंचाई के विस्तार और राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रणाली के माध्यम से हजारों जलवायु-अनुकूल फसल किस्मों के जारी होने को भी दर्शाते हैं. ये पहल एक महत्वपूर्ण नीतिगत समझ को दर्शाती हैं: भारतीय कृषि का भविष्य केवल इस बात पर निर्भर नहीं करेगा कि कितना उत्पादन होता है, बल्कि इस पर भी निर्भर करेगा कि पानी, मिट्टी, बीज और ऊर्जा का कितनी कुशलता से इस्तेमाल किया जाता है.

बाजार सुधारों ने इसमें एक और परत जोड़ी है. इलेक्ट्रॉनिक राष्ट्रीय कृषि बाजार ने कृषि मंडियों को जोड़ने वाला एक डिजिटल मंच तैयार किया है, जबकि किसान उत्पादक संगठनों की दिशा में नीतिगत जोर का उद्देश्य छोटे किसानों को एकत्रीकरण, इनपुट, प्रसंस्करण और बाजार में बातचीत के लिए अधिक सामूहिक ताकत देना है. कृषि अवसंरचना कोष, भंडारण और खाद्य प्रसंस्करण में निवेश तथा मूल्य श्रृंखलाओं पर जोर, ये सभी किसान को केवल कच्ची कृषि उपज के उत्पादक से आगे बढ़ाकर अधिक मूल्य वाली कृषि अर्थव्यवस्था में भागीदार बनाने के बड़े प्रयास का हिस्सा हैं.

यहीं कृषि नीति का सामाजिक प्रभाव सबसे महत्वपूर्ण हो जाता है. जिस किसान परिवार को समय पर आय सहायता मिलती है, संस्थागत ऋण तक पहुंच होती है, वह अपनी फसल का बीमा करा सकता है, मिट्टी संबंधी सलाह प्राप्त कर सकता है और बड़े बाजार तक पहुंच बना सकता है, वह उस परिवार की तुलना में संकटों का सामना बेहतर तरीके से कर सकता है जो एक ही फसल और अनौपचारिक कर्ज पर निर्भर है. इसका प्रभाव खेती से आगे तक जाता है. अधिक स्थिर ग्रामीण आय से परिवारों की खपत, बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य पर खर्च, स्थानीय व्यापार और कृषि उपकरणों में निवेश को समर्थन मिलता है. इसलिए कृषि केवल एक क्षेत्रीय मुद्दा नहीं, बल्कि भारत के एक बड़े हिस्से के लिए सामाजिक और आर्थिक स्थिरता का आधार बनी हुई है.

2014 के बाद की नीतिगत दिशा तकनीक और कल्याणकारी योजनाओं के बीच संबंधों में व्यापक बदलाव को भी दर्शाती है. प्रत्यक्ष लाभ अंतरण, डिजिटल किए गए भूमि और लाभार्थी रिकॉर्ड, उपग्रह और मौसम आधारित फसल आकलन, ऑनलाइन बाजार मंच और तकनीक-सक्षम बीमा निपटान धीरे-धीरे सरकारी कार्यक्रम और व्यक्तिगत किसान के बीच की दूरी कम कर रहे हैं. राज्यों में व्यवस्था अभी भी विकसित हो रही है, लेकिन संस्थागत दिशा स्पष्ट है: कृषि प्रशासन अधिक डेटा-आधारित, लक्षित और मापने योग्य बन रहा है.

भारत जब विकसित भारत 2047 की ओर देख रहा है, तब कृषि नीति के अगले चरण में अधिक मूल्य वाली फसलों, मजबूत खाद्य प्रसंस्करण, बेहतर भंडारण, निर्यात प्रतिस्पर्धा, जलवायु अनुकूलता और कृषि में महिलाओं तथा युवा उद्यमियों की व्यापक भागीदारी के जरिए इस आधार को मजबूत करना होगा. पिछले बारह वर्षों की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि नीतिगत चर्चा का दायरा खुद विस्तृत हुआ है. किसान को अब केवल उत्पादन के नजरिए से नहीं देखा जाता. आय, जोखिम, मिट्टी, पानी, ऋण, तकनीक और बाजार को तेजी से एक ही नीतिगत समस्या के हिस्सों के तौर पर देखा जा रहा है.

पहली हरित क्रांति ने भारत को खाद्य सुरक्षा प्रदान की. उभरता हुआ नीतिगत ढांचा इससे आगे की व्यापक दिशा तलाश रहा है: ऐसी कृषि अर्थव्यवस्था, जिसमें देश का खाद्य सुरक्षित करने वाला व्यक्ति भी अधिक आर्थिक सुरक्षा, लचीलापन और अवसर हासिल कर सके. यही बदलाव आने वाले दशकों में ग्रामीण भारत की मजबूती तय करेगा.

(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं और जरूरी नहीं कि प्रकाशन के विचारों को दर्शाते हों.)

अतिथि लेखक: बंशीलाल गुर्जर, राज्यसभा सांसद व राष्ट्रीय अध्यक्ष, भाजपा किसान मोर्चा

अतिथि लेखक: पायलट नीरज सहरावत,  राष्ट्रीय प्रभारी- अनुसंधान एवं नीति, भाजपा किसान मोर्चा 


HDFC बैंक के पहले बाहरी CEO होंगे अनूप बागची, सामने होंगी ये 6 बड़ी प्राथमिकताएं

जैसे-जैसे अनूप बागची 27 अक्टूबर को एचडीएफसी बैंक की कमान संभालने की तैयारी कर रहे हैं, भरोसा बहाल करना, विकास और लाभप्रदता को मजबूत करना, ग्राहक अनुभव में सुधार करना और प्रतिभाओं को एक दिशा में लाना उनके शुरुआती एजेंडे को परिभाषित करेगा.

डॉ. अनुराग बत्रा by
Published - Friday, 02 October, 2026
Last Modified:
Friday, 02 October, 2026
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एचडीएफसी बैंक (HDFC) में इंतजार खत्म हो गया है. सशिधर जगदीशन का उत्तराधिकारी कौन होगा, इसको लेकर कई हफ्तों की अटकलों के बाद देश के सबसे बड़े निजी क्षेत्र के बैंक ने आईसीआईसीआई समूह के अनुभवी अनूप बागची को अपना अगला प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी चुना है.

भारतीय रिजर्व बैंक ने 1 अक्टूबर को 27 अक्टूबर 2026 से शुरू होने वाले तीन साल के कार्यकाल के लिए बागची की नियुक्ति को मंजूरी दे दी. एचडीएफसी बैंक के बोर्ड ने भी 2 अक्टूबर से उन्हें अतिरिक्त निदेशक नियुक्त किया है, जो शेयरधारकों की मंजूरी के अधीन है.

यह नियुक्ति एक और कारण से महत्वपूर्ण है: बागची एचडीएफसी बैंक के शीर्ष पद पर पहुंचने वाले पहले बाहरी व्यक्ति होंगे.

जिस संस्थान का नेतृत्व परंपरागत रूप से आंतरिक प्रतिभाओं से उभरता रहा है, वहां आईसीआईसीआई के माहौल में ढले एक अनुभवी व्यक्ति का चयन पुरानी परंपरा से एक महत्वपूर्ण बदलाव है. यह ऐसे समय में भी हुआ है जब एचडीएफसी बैंक, एचडीएफसी लिमिटेड के साथ विलय के बाद काफी बड़े पैमाने पर संचालन की चुनौतियों से निपट रहा है और विकास, लाभप्रदता तथा निवेशकों के भरोसे से जुड़े सवालों का समाधान कर रहा है.

आईसीआईसीआई का अनुभव

बागची के पास बैंकिंग और वित्तीय सेवाओं के क्षेत्र में तीन दशक से अधिक का अनुभव है. 1992 से आईसीआईसीआई समूह से जुड़े उनके करियर में ट्रेजरी, रिटेल और होलसेल बैंकिंग, निवेश बैंकिंग, पूंजी बाजार, वेल्थ मैनेजमेंट, बीमा और डिजिटल वित्तीय सेवाएं शामिल रही हैं.

उन्होंने 2017 से 2023 के बीच आईसीआईसीआई बैंक के कार्यकारी निदेशक के रूप में काम किया, जहां उन्होंने रिटेल, बिजनेस और ग्रामीण बैंकिंग तथा बाद में होलसेल बैंकिंग की जिम्मेदारी संभाली. वह आईसीआईसीआई सिक्योरिटीज का भी नेतृत्व कर चुके हैं और वर्तमान में आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल लाइफ इंश्योरेंस के प्रबंध निदेशक और सीईओ हैं.

यह व्यापक अनुभव एचडीएफसी बैंक में उपयोगी हो सकता है, जहां चुनौती अब केवल पैमाने की नहीं है. काम यह है कि इस पैमाने को मजबूत विकास, लाभप्रदता और बेहतर ग्राहक परिणामों में बदला जाए.

बागची की नियुक्ति इस बात को भी रेखांकित करती है कि आईसीआईसीआई समूह के माहौल ने वर्षों में कितनी नेतृत्व क्षमता तैयार की है. समूह से जुड़े कई अधिकारी आगे चलकर प्रमुख वित्तीय संस्थानों का नेतृत्व कर चुके हैं. बागची अब इस सूची में शामिल हो गए हैं, लेकिन उनके सामने आईसीआईसीआई बैंक के सबसे बड़े निजी क्षेत्र के प्रतिद्वंद्वी का नेतृत्व करने की विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण जिम्मेदारी है.

पहला, संस्थान को समझना

किसी बाहरी सीईओ की नियुक्ति के साथ तुरंत व्यापक बदलावों की तलाश करने का स्वाभाविक आकर्षण होता है. हालांकि, एचडीएफसी बैंक में यह समझना भी उतना ही महत्वपूर्ण हो सकता है कि पहले से क्या अच्छा काम कर रहा है.

बैंक के पास मजबूत फ्रेंचाइजी, विशाल ग्राहक आधार, व्यापक वितरण नेटवर्क और भारतीय बैंकिंग क्षेत्र के सबसे पहचाने जाने वाले ब्रांडों में से एक है. एचडीएफसी लिमिटेड के साथ विलय ने अभूतपूर्व पैमाने का संस्थान बनाया, लेकिन विकास, लाभप्रदता और ग्राहक भरोसा बनाए रखते हुए दो बड़े संगठनों को एकीकृत करना हमेशा जटिल होने वाला था.

इसलिए बागची को ऐसी संस्था विरासत में मिल रही है, जिसमें काफी मजबूती है, साथ ही कुछ ऐसे स्पष्ट क्षेत्र भी हैं जिन पर ध्यान देने की जरूरत है.

भरोसा बहाल करना

प्राथमिकताओं में निवेशकों, ग्राहकों और कर्मचारियों के बीच भरोसा मजबूत करना शामिल होगा. किसी वित्तीय संस्थान के लिए भरोसा एक परिचालन संपत्ति है. इसे केवल संचार के जरिए मजबूत नहीं किया जा सकता; अंततः यह लगातार प्रदर्शन, कॉरपोरेट गवर्नेंस, पारदर्शिता और क्रियान्वयन पर निर्भर करता है.

नेतृत्व परिवर्तन एचडीएफसी बैंक को अपने अगले चरण के लिए स्पष्ट दिशा तय करने का अवसर देता है. बागची इस दिशा को आंतरिक और बाहरी तौर पर किस तरह स्पष्ट करते हैं, यह महत्वपूर्ण होगा, लेकिन उसके बाद आने वाले आंकड़े कहीं अधिक महत्वपूर्ण होंगे.

जमा और विकास

केंद्रीय चुनौतियों में से एक जमा कारोबार होगा. टिकाऊ ऋण वृद्धि के लिए मजबूत फंडिंग आधार की जरूरत होती है, जिससे जमा जुटाना और देनदारी पक्ष की गुणवत्ता महत्वपूर्ण हो जाती है. एचडीएफसी बैंक का व्यापक शाखा नेटवर्क उसे काफी पहुंच प्रदान करता है. अवसर यह होगा कि भौतिक वितरण को मजबूत डिजिटल जुड़ाव के साथ जोड़ते हुए इस नेटवर्क को अधिक उत्पादक बनाया जाए.

उद्देश्य केवल आकार बढ़ाने के लिए विकास नहीं हो सकता. एचडीएफसी बैंक जैसे पहले से बड़े पैमाने पर काम कर रहे बैंक के लिए विकास की गुणवत्ता और लाभप्रदता लगातार अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है.

लाभप्रदता फिर से केंद्र में

बाजार अंततः प्रदर्शन के आधार पर नेतृत्व परिवर्तन का आकलन करेगा. मार्जिन, रिटर्न अनुपात, परिचालन दक्षता, कर्ज की गुणवत्ता और टिकाऊ विकास यह तय करेंगे कि एचडीएफसी बैंक अपने पैमाने को अधिक मूल्य में बदल पाता है या नहीं. विभिन्न वित्तीय सेवा कारोबारों में बागची का अनुभव उन्हें इस समीकरण को देखने के लिए व्यापक दृष्टिकोण देता है.

उनका काम केवल एचडीएफसी बैंक को बड़ा बनाना नहीं होगा. उनका काम पहले से विशाल संस्थान को अधिक उत्पादक और कुशल बनाना होगा.

तकनीक से ग्राहक अनुभव में सुधार जरूरी

तकनीक और ग्राहक अनुभव भी एजेंडे का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. बड़े पैमाने पर ग्राहकों को सेवाएं देने वाले बैंक के लिए डिजिटल क्षमता तभी मायने रखती है, जब वह बैंकिंग को आसान बनाए. ग्राहकों में बिखरे हुए अनुभव, जटिल प्रक्रियाओं या धीमी सेवा के प्रति धैर्य लगातार कम हो रहा है.

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा और ऑटोमेशन उत्पादकता और व्यक्तिगत सेवाओं में सुधार कर सकते हैं, लेकिन अंतिम कसौटी यह होगी कि ग्राहकों को एचडीएफसी बैंक का अनुभव अधिक सरल, तेज और भरोसेमंद मिलता है या नहीं.

कर्मचारियों की भूमिका महत्वपूर्ण होगी

दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष संगठन के भीतर है. नेतृत्व परिवर्तन से स्वाभाविक रूप से अनिश्चितता और उम्मीदें पैदा होती हैं. बागची को वरिष्ठ नेतृत्व टीम के भीतर भरोसा कायम करना होगा, मजबूत प्रतिभाओं को बनाए रखना होगा और यह स्पष्ट करना होगा कि संस्थान किस दिशा में आगे बढ़ रहा है.

एचडीएफसी बैंक जैसे बड़े संगठन को एक व्यक्ति के जरिए नहीं बदला जा सकता. सीईओ की भूमिका ऐसा माहौल तैयार करने की होगी, जिसमें बैंक के हजारों कर्मचारी उसकी दिशा को समझें और उसके अनुरूप काम कर सकें.

बाहरी व्यक्ति, लेकिन बैंकिंग के लिए बाहरी नहीं

बागची का बाहरी दृष्टिकोण विशेष रूप से उपयोगी साबित हो सकता है. वह एचडीएफसी बैंक के हालिया निर्णय लेने की प्रक्रिया का हिस्सा रहे बिना आ रहे हैं, जबकि भारतीय बैंकिंग, नियमन, ग्राहकों और प्रतिस्पर्धी परिस्थितियों की उन्हें गहरी समझ है.

इससे उन्हें ऐसे सवाल पूछने की क्षमता मिलती है, जो आंतरिक रूप से विकसित नेतृत्व टीम शायद न पूछे. साथ ही, एचडीएफसी बैंक की पहचान भी महत्वपूर्ण है. उद्देश्य आईसीआईसीआई के तरीके को पूरी तरह से यहां लागू करना नहीं हो सकता. बागची के सामने चुनौती उन खूबियों को बनाए रखने की होगी, जिन्होंने एचडीएफसी बैंक को भारत के सबसे सफल बैंकिंग फ्रेंचाइजी में से एक बनाया है, और साथ ही यह पहचानना होगा कि उसके अगले चरण के लिए क्या बदलाव जरूरी हैं.

तत्काल एजेंडे को अंततः पांच प्राथमिकताओं में समेटा जा सकता है: भरोसा मजबूत करना, जमा में तेजी लाना, लाभप्रदता में सुधार करना, ग्राहक अनुभव को सरल बनाना और नए नेतृत्व के पीछे संगठन को एक दिशा में लाना.

बागची अपने साथ अनुभव लेकर आ रहे हैं. एचडीएफसी बैंक अपने साथ मजबूत फ्रेंचाइजी और व्यापक पैमाना लेकर चल रहा है.

उत्तराधिकार का सवाल अब हल हो चुका है. 27 अक्टूबर के बाद क्या होता है, यह तय करेगा कि यह नेतृत्व परिवर्तन एचडीएफसी बैंक के अगले विकास अध्याय की शुरुआत भी बनता है या नहीं.

डॉ. अनुराग बत्रा, BW रिपोर्टर्स

(डॉ. अनुराग बत्रा BW बिजनेसवर्ल्ड के चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ तथा एक्सचेंज4मीडिया समूह के संस्थापक हैं. पहली पीढ़ी के उद्यमी और मीडिया लीडर के रूप में वह एंजेल निवेशक, लेखक, टेलीविजन होस्ट और उद्यमियों तथा मीडिया पेशेवरों के मेंटर भी हैं. वह कई कॉरपोरेट और संस्थागत बोर्डों में काम करते हैं और प्रबंधन शिक्षा से उनका लंबे समय से जुड़ाव रहा है. एमडीआई गुरुग्राम के पूर्व छात्र बत्रा इसके बोर्ड ऑफ गवर्नर्स में रह चुके हैं और एमडीआई एलुमनी एसोसिएशन के अध्यक्ष भी रहे हैं. वह इंटरनेशनल एकेडमी ऑफ टेलीविजन आर्ट्स एंड साइंसेज के सदस्य भी हैं. एक उत्साही पाठक डॉ. बत्रा का मानना है कि जब जुनून किसी व्यक्ति का पेशा बन जाता है, तो काम एक गहरे उद्देश्य से जुड़ जाता है.)
 


मोदी @76: भारत की विकास गाथा के केंद्र में उद्योग और उद्यमिता

इस लेख में इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स के महानिदेशक डॉ. राजीव सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आर्थिक विजन और भारत को एक मजबूत विनिर्माण, नवाचार और निर्यात अर्थव्यवस्था में बदलने पर विचार रखें हैं.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Thursday, 17 September, 2026
Last Modified:
Thursday, 17 September, 2026
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हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी को उनके 76वें जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामनाएं. कामना है कि वे इसी ऊर्जा और दृढ़ संकल्प के साथ देश का नेतृत्व करते रहें. इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स में हम भारत के आर्थिक बदलाव के केंद्र में उद्योग और उद्यमिता को रखने पर श्री मोदी द्वारा दिए गए जोर की गहराई से सराहना करते हैं. उनके दृष्टिकोण ने भारत को मुख्य रूप से एक बड़े उपभोक्ता बाजार से अधिक प्रतिस्पर्धी विनिर्माण, नवाचार और निर्यात केंद्र की ओर ले जाने की कोशिश की है, साथ ही निजी निवेश और उद्यमिता की बुनियाद को मजबूत किया है.

मेक इन इंडिया और विनिर्माण को बढ़ावा

एक महत्वपूर्ण पहल 2014 में शुरू किया गया मेक इन इंडिया अभियान रहा है, जिसने विनिर्माण, निवेश, नवाचार और रोजगार सृजन को राष्ट्रीय आर्थिक एजेंडे के केंद्र में रखा.

पिछले वर्षों में इस विजन को निवेश आकर्षित करने, घरेलू विनिर्माण क्षमताओं को मजबूत करने और भारतीय कारोबारों को वैश्विक वैल्यू चेन के साथ अधिक गहराई से जोड़ने के उद्देश्य वाली कई नीतिगत पहलों का समर्थन मिला है.

प्रत्यक्ष विदेशी निवेश इस यात्रा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है. सरकारी आंकड़ों से पता चलता है कि इस अवधि के दौरान भारत में पर्याप्त एफडीआई आया, जो भारतीय अर्थव्यवस्था में वैश्विक निवेशकों की निरंतर रुचि को दर्शाता है. साथ ही, निवेश माहौल को बेहतर बनाने के प्रयासों का उद्देश्य भारत में कारोबार स्थापित करने और परिचालन का विस्तार करने को आसान बनाना रहा है.

पीएलआई और क्षेत्र-विशिष्ट औद्योगिक नीति

प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव कार्यक्रम ने इस विजन को क्षेत्र-विशिष्ट औद्योगिक नीति का ढांचा दिया है.

14 क्षेत्रों में पीएलआई योजनाओं ने मार्च 2026 तक 2.40 लाख करोड़ रुपये से अधिक का वास्तविक निवेश आकर्षित किया और 15.2 लाख करोड़ रुपये से अधिक का निर्यात किया. इन योजनाओं से 14.15 लाख से अधिक प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार भी पैदा हुए हैं.

इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्यूटिकल्स, ऑटोमोबाइल, स्पेशलिटी स्टील, सोलर मॉड्यूल, दूरसंचार और फूड प्रोसेसिंग जैसे क्षेत्रों के लिए यह कार्यक्रम विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहा है. इसका उद्देश्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं है, बल्कि घरेलू विनिर्माण क्षमताओं को मजबूत करना, आयात पर निर्भरता कम करना और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में भारत की स्थिति मजबूत करना भी है.

कारोबारी माहौल में सुधार

समग्र कारोबारी माहौल को बेहतर बनाने के प्रयास भी उतने ही महत्वपूर्ण रहे हैं.

जीएसटी की शुरुआत ने अप्रत्यक्ष करों के लिए एक अधिक एकीकृत ढांचा तैयार किया, जबकि नेशनल सिंगल विंडो सिस्टम, नियामकीय अनुपालनों में कमी, एफडीआई सुधार, नेशनल इंडस्ट्रियल कॉरिडोर कार्यक्रम और प्रोजेक्ट मॉनिटरिंग ग्रुप जैसी पहलों का उद्देश्य कारोबारों और निवेशकों के लिए बाधाओं को कम करना रहा है.

ये सुधार इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि कारोबार करने में आसानी केवल कागजी कार्रवाई कम करने तक सीमित नहीं है. इसका मतलब उन उद्यमियों, निर्माताओं और निवेशकों के लिए अधिक निश्चितता और दक्षता पैदा करना है, जो लंबे समय के फैसले लेते हैं.

वैश्विक एकीकरण के साथ रणनीतिक आत्मनिर्भरता

प्रधानमंत्री मोदी के औद्योगिक विजन में वैश्विक एकीकरण के साथ रणनीतिक आत्मनिर्भरता पर भी लगातार जोर दिया गया है.

भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण के बढ़ते आधार, फार्मास्यूटिकल्स के विस्तार और सेमीकंडक्टर तथा उन्नत-तकनीक क्षमताओं को विकसित करने के प्रयासों से घरेलू क्षमताओं को मजबूत करने के साथ भारतीय कंपनियों को वैश्विक वैल्यू चेन से जोड़ने की कोशिश दिखाई देती है.

यह संतुलन महत्वपूर्ण है. आत्मनिर्भरता का मतलब अलगाव नहीं होना चाहिए. बल्कि इसका मतलब ऐसी क्षमताओं, तकनीकों और आपूर्ति श्रृंखलाओं का निर्माण होना चाहिए, जो भारतीय कंपनियों को वैश्विक बाजारों में अधिक प्रभावी ढंग से प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम बनाएं.

नवाचार और इंफ्रास्ट्रक्चर

आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में बताया गया कि भारत की ग्लोबल इनोवेशन इंडेक्स रैंकिंग 2019 में 66वें स्थान से सुधरकर 2025 में 38वें स्थान पर पहुंच गई. मेरे लिए यह आर्थिक विकास के वाहक के रूप में नवाचार, तकनीक और उद्यमिता को दिए जा रहे बढ़ते महत्व को दर्शाता है.

इंफ्रास्ट्रक्चर इस बदलाव का एक और प्रमुख स्तंभ रहा है. जिसे कभी कमजोरी माना जाता था, वह अब तेजी से मजबूती का क्षेत्र बन रहा है. पीएम गति शक्ति, औद्योगिक कॉरिडोर, लॉजिस्टिक्स सुधार और इंफ्रास्ट्रक्चर में लगातार सार्वजनिक निवेश कनेक्टिविटी को बेहतर बनाने और आर्थिक गतिविधियों की बुनियाद मजबूत करने में मदद कर रहे हैं.

बदलती दुनिया के लिए आर्थिक विजन

प्रधानमंत्री मोदी से हमें एक ऐसा आर्थिक विजन मिलता है, जो कई आयामों तक फैला हुआ है, अधिक किफायती और भरोसेमंद ऊर्जा से लेकर कई मुक्त व्यापार समझौतों में प्रतिबिंबित द्विपक्षीय व्यापार तक, और घरेलू विनिर्माण को मजबूत करने से लेकर भारतीय कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विस्तार के लिए प्रोत्साहित करने तक.

भारत कोविड-19 महामारी और वैश्विक आर्थिक माहौल में महत्वपूर्ण बदलावों सहित सामने आई चुनौतियों के बावजूद आगे बढ़ रहा है. मेरे विचार में, यह मजबूती पिछले एक दशक में तैयार की गई बुनियाद और भारत की विकास गति को बनाए रखने पर निरंतर ध्यान का परिणाम है.

आगे की राह

आगे की चुनौती इस गति को बनाए रखने की है.

भारत के पास एक और महत्वपूर्ण विनिर्माण, तकनीक, नवाचार और निर्यात केंद्र बनने का अवसर है. ऐसा करने के लिए भारतीय उद्योग की ओर से निरंतर निवेश, वैश्विक वैल्यू चेन के साथ मजबूत एकीकरण, रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर अधिक जोर और ऐसा माहौल जरूरी होगा, जो उद्यमिता तथा जोखिम लेने को प्रोत्साहित करे.

सरकार और उद्योग के बीच साझेदारी महत्वपूर्ण बनी रहेगी. नीति ढांचा तैयार कर सकती है, लेकिन अंततः निवेश, नवाचार, रोजगार और निर्यात को आगे बढ़ाने का काम कारोबार करते हैं.

प्रधानमंत्री के लिए जन्मदिन की शुभकामना

उनके 76वें जन्मदिन पर मैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपनी हार्दिक शुभकामनाएं देता हूं और ऐसे समय में आर्थिक दिशा और स्थिरता प्रदान करने के उनके प्रयासों के लिए उनका आभार व्यक्त करता हूं, जब वैश्विक माहौल अनिश्चित बना हुआ है.

उनके नेतृत्व में भारत ने दिखाया है कि वह उत्पादन, तकनीक और व्यापार के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा कर सकता है और विकास कर सकता है. आगे की यात्रा निश्चित रूप से नई चुनौतियां लेकर आएगी, लेकिन यह महत्वपूर्ण अवसर भी पैदा करेगी.

प्रधानमंत्री मोदी को देश की सेवा में निरंतर ऊर्जा और सफलता के लिए मेरी शुभकामनाएं. कामना है कि भारत अपनी विकास यात्रा पर आगे बढ़ता रहे और वैश्विक अर्थव्यवस्था में और अधिक मजबूत शक्ति के रूप में उभरे.

अतिथि लेखक: डॉ. राजीव सिंह, महानिदेशक, इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स (ICC) 


Modi@76: मेक इन इंडिया से ‘मेड फॉर द वर्ल्ड’ तक, भारत के मैन्युफैक्चरिंग के अगले अध्याय की कमान संभालेंगे MSMEs

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के इस विशेष अवसर पर, पिछले एक दशक में भारत की अर्थव्यवस्था और औद्योगिक परिदृश्य में आए बदलावों को देखना जरूरी है.

गौरव भगत by
Published - Thursday, 17 September, 2026
Last Modified:
Thursday, 17 September, 2026
BWHindia

आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के इस विशेष अवसर पर, पिछले एक दशक में भारत की अर्थव्यवस्था और औद्योगिक परिदृश्य में आए बदलावों को देखना जरूरी है. इस बदलाव को केवल नारों या पहलों के संदर्भ में नहीं, बल्कि उन आंकड़ों के आधार पर समझने की आवश्यकता है जो भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर और MSMEs की बदलती भूमिका को दर्शाते हैं.

‘मेक इन इंडिया’ की सफलता का आकलन केवल इस बात से नहीं होना चाहिए कि भारत कितना उत्पादन करता है, बल्कि इससे भी होना चाहिए कि वह वैल्यू चेन में कितनी तेजी से ऊपर बढ़ रहा है, कितने उत्पादक रोजगार पैदा कर रहा है और वैश्विक बाजार में एक प्रतिस्पर्धी सप्लायर के रूप में अपनी जगह कितनी मजबूत कर रहा है.

भारत की अर्थव्यवस्था के विस्तार के बीच यह सवाल और अधिक महत्वपूर्ण हो गया है. वित्त वर्ष 2025-26 में भारत की वास्तविक GDP वृद्धि 7.7% रहने का अनुमान है और स्थिर कीमतों पर यह ₹323.12 लाख करोड़ तक पहुंचने की उम्मीद है. इसी अवधि में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में भी गतिविधियों में मजबूती दिखाई दी है. वित्त वर्ष 2025-26 की पहली तिमाही में मैन्युफैक्चरिंग GVA में 7.72% और दूसरी तिमाही में 9.13% की वृद्धि दर्ज की गई, जबकि दिसंबर 2025 में मैन्युफैक्चरिंग आउटपुट 8.1% बढ़ा.

मेक इन इंडिया अब केवल असेंबली तक सीमित नहीं

सितंबर 2014 में जब ‘मेक इन इंडिया’ की शुरुआत हुई थी, तब लक्ष्य भारत को मैन्युफैक्चरिंग, डिजाइन और इनोवेशन का हब बनाना था. एक दशक बाद अधिक महत्वपूर्ण कहानी अलग-अलग उद्योगों के इर्द-गिर्द विकसित हुए मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम की है. इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल्स, फार्मास्यूटिकल्स, रिन्यूएबल एनर्जी, डिफेंस, टेक्सटाइल्स और फूड प्रोसेसिंग जैसे क्षेत्रों में इसकी स्पष्ट झलक दिखाई देती है.

इस बदलाव का एक महत्वपूर्ण प्रमाण Production Linked Incentive (PLI) योजनाएं हैं. दिसंबर 2025 तक इन योजनाओं ने 14 सेक्टर्स में ₹2.16 लाख करोड़ से अधिक के निवेश को सुगम बनाया और ₹20.41 लाख करोड़ से अधिक के अतिरिक्त उत्पादन एवं बिक्री में योगदान दिया. इन योजनाओं के माध्यम से 14.39 लाख से अधिक प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार भी पैदा हुए हैं.

इलेक्ट्रॉनिक्स में दिखी मैन्युफैक्चरिंग की बढ़ती क्षमता

इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर इस मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम की प्रगति का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है. इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं का उत्पादन 2014-15 में लगभग ₹1.9 लाख करोड़ से बढ़कर 2024-25 में ₹11.3 लाख करोड़ हो गया. इसी अवधि में इनके निर्यात ₹38,000 करोड़ से बढ़कर ₹3.3 लाख करोड़ हो गए. वहीं, मोबाइल फोन का उत्पादन ₹18,000 करोड़ से बढ़कर ₹5.5 लाख करोड़ तक पहुंच गया.

अब अगला लक्ष्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि भारत में कंपोनेंट्स, मशीनरी, इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी और हाई-वैल्यू प्रोडक्ट्स के निर्माण के जरिए वास्तविक वैल्यू क्रिएशन करना होना चाहिए.

असली इंजन: विकास और फॉर्मलाइजेशन के केंद्र में MSMEs

भारत में एक समावेशी मैन्युफैक्चरिंग इकोनॉमी का निर्माण केवल बड़ी कंपनियों के माध्यम से नहीं हो सकता. हर बड़ी कंपनी की सप्लाई चेन के पीछे छोटे और मध्यम व्यवसायों का एक विशाल नेटवर्क काम करता है. Economic Survey 2025-26 के अनुसार, MSMEs भारत की GDP में 31.1%, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में 35.4% और निर्यात में 48.58% का योगदान देते हैं.

ये आंकड़े ‘मेक इन इंडिया’ की हमारी समझ को एक नया आयाम देते हैं. MSMEs मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के हाशिये पर मौजूद केवल एक श्रेणी नहीं हैं; वे इसके संचालन और विकास की बुनियादी परत हैं.

फॉर्मलाइजेशन के साथ बढ़ रहा MSME बेस

MSME सेक्टर का फॉर्मलाइजेशन भी तेजी से आगे बढ़ रहा है. MSME मंत्रालय के डैशबोर्ड के अनुसार, 17 सितंबर 2026 तक 9.6 करोड़ से अधिक Udyam और Udyam Assist Platform रजिस्ट्रेशन हो चुके हैं, जबकि रजिस्टर्ड इकाइयों से जुड़ा रोजगार 42.5 करोड़ से अधिक है. ये आंकड़े MSME बेस की विविधता को भी दर्शाते हैं, जिसमें मैन्युफैक्चरिंग, सर्विस और ट्रेडिंग से जुड़ी इकाइयां शामिल हैं.

अब हमारे सामने अगला बड़ा सवाल यह है कि इनमें से कितने व्यवसाय स्थानीय सप्लायर की भूमिका से आगे बढ़कर वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने वाले उद्यम बन पाएंगे.

क्षमता का विस्तार: लोकल वेंडर्स से ग्लोबल पार्टनर्स तक

भारत के MSMEs के अगले दशक की चुनौती केवल घरेलू बाजार में टिके रहने की नहीं होगी. असली चुनौती एडवांस्ड ग्लोबल सप्लाई चेन का हिस्सा बनने की होगी.

दुनिया की कंपनियां अपने प्रोडक्शन और सोर्सिंग नेटवर्क में विविधता लाने की कोशिश कर रही हैं. लेकिन इस अवसर का लाभ उठाने के लिए केवल उत्पादन क्षमता पर्याप्त नहीं होगी. क्वालिटी, डिलीवरी, टेक्नोलॉजी, सर्टिफिकेशन, फाइनेंसिंग और स्केल, इन सभी मोर्चों पर निरंतरता जरूरी होगी.

यहीं से भारत की MSME पॉलिसी आर्किटेक्चर को केवल फॉर्मलाइजेशन से आगे बढ़ाकर कैपेसिटी बिल्डिंग की ओर ले जाने की आवश्यकता दिखाई देती है.

क्रेडिट के साथ टेक्नोलॉजी और क्वालिटी पर भी जोर जरूरी

क्रेडिट तक पहुंच आज भी महत्वपूर्ण है. MSME डैशबोर्ड के अनुसार, जुलाई 2026 तक Credit Guarantee Fund Trust for Micro and Small Enterprises के तहत कुल ₹15.12 लाख करोड़ की क्रेडिट गारंटी दी जा चुकी है.

पूंजी तक पहुंच किसी व्यवसाय को उपकरण खरीदने में सक्षम बनाती है, लेकिन आज प्रतिस्पर्धा इस बात से तय होगी कि उन उपकरणों से क्या बनाया जाता है, कितनी दक्षता से बनाया जाता है और वह अंतरराष्ट्रीय मानकों पर कितना खरा उतरता है. इसलिए टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल, ऑपरेशनल एफिशिएंसी, डिजिटल पेमेंट्स, सर्टिफिकेशन, एक्सपोर्ट की तैयारी और मैनेजमेंट क्षमता, इन सभी को MSME नीति में क्रेडिट तक पहुंच जितना ही महत्व मिलना चाहिए.

अगला मेक इन इंडिया अधिक टेक्नोलॉजी-इंटेंसिव होना चाहिए

भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की संरचना में टेक्नोलॉजी-आधारित मैन्युफैक्चरिंग की ओर बड़ा बदलाव आया है. आज मीडियम और हाई-टेक्नोलॉजी इंडस्ट्रीज मिलकर मैन्युफैक्चरिंग वैल्यू एडेड का 46.3% हिस्सा बनाती हैं.

भविष्य की नौकरियां अब केवल पारंपरिक असेंबली लाइनों पर निर्भर नहीं रहेंगी. रोबोटिक्स, सेमीकंडक्टर्स, इलेक्ट्रिक व्हीकल मोबिलिटी, एयरोस्पेस और एडवांस्ड मैटेरियल्स जैसे क्षेत्र आने वाले रोजगार और औद्योगिक विकास को आकार देंगे.

₹40,000 करोड़ के बजट आवंटन के साथ विस्तारित Electronics Components Manufacturing Scheme जैसे महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट इसी दिशा में संकेत देते हैं. ऐसे में MSMEs के लिए आगे बढ़ने का रास्ता हाई-टेक सप्लाई चेन में सक्रिय भागीदारी से होकर जाता है.

इस बदलाव को संभव बनाने के लिए केवल क्रेडिट सुविधाओं पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं होगा. रिसर्च एंड डेवलपमेंट के लिए को-फंडिंग, क्वालिटी सर्टिफिकेशन को वैश्विक स्तर तक ले जाने और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर को बढ़ावा देने जैसे कदम भी आवश्यक होंगे.

विकसित भारत@2047: वैश्विक स्तर की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता का निर्माण

अगर पहला चरण भारत की आंतरिक क्षमताओं को विकसित करने का था, तो अगली चुनौती वैश्विक प्रतिस्पर्धा की है. भारत के MSMEs को केवल आयात का विकल्प बनने तक सीमित नहीं रहना चाहिए. उन्हें ऐसे उत्पाद बनाने का लक्ष्य रखना होगा जो दुनिया के सर्वश्रेष्ठ उत्पादों को भी कड़ी प्रतिस्पर्धा दे सकें.

आखिरकार, सफलता का आकलन उत्पादकता, तकनीकी क्षमता और निर्यात क्षमता के आधार पर होगा.

बेहतर स्किल डेवलपमेंट, पूंजी और बाजार तक पहुंच के साथ भारत अपने छोटे व्यवसायों को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के महत्वपूर्ण ग्लोबल पार्टनर्स में बदल सकता है. यही वह बदलाव है जो भारत की मैन्युफैक्चरिंग कहानी के अगले अध्याय को परिभाषित करेगा, ‘भारत में मैन्युफैक्चरिंग’ से आगे बढ़कर ‘भारत का मैन्युफैक्चरिंग’ बनाने की दिशा में.

अतिथि लेखक: गौरव भगत, उद्यमी

(गौरव भगत, कंसोर्टियम गिफ्ट्स और गौरव भगत अकादमी के फाउंडर हैं.)


मोदी @76: शिक्षा के क्षेत्र में कैसे बदला फोकस, यूनिवर्सिटी विस्तार से डिजिटल अकादमिक आईडी तक

नई शिक्षा नीति से स्किल इंडिया और APAAR तक, नरेंद्र मोदी सरकार के दौर में शिक्षा व्यवस्था में कई स्तरों पर बदलाव की कोशिश

किरण हजारिका by
Published - Thursday, 17 September, 2026
Last Modified:
Thursday, 17 September, 2026
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17 सितंबर 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 76 वर्ष के हो गए हैं. उनके जन्मदिन के मौके पर देशभर में अलग-अलग कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं. प्रधानमंत्री के सार्वजनिक जीवन और उनके नेतृत्व में सरकार के कामकाज को देखने के कई आयाम हैं, लेकिन शिक्षा ऐसा क्षेत्र है जहां पिछले एक दशक से अधिक समय में नीति, संस्थानों, कौशल विकास और तकनीक के स्तर पर कई पहल सामने आई हैं.

उच्च शिक्षा के विस्तार से लेकर राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020, स्किल इंडिया, समग्र शिक्षा और APAAR जैसी डिजिटल पहलों तक शिक्षा व्यवस्था में बदलाव का एक बड़ा हिस्सा दिखाई देता है. आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक 2013-14 में देश में 723 विश्वविद्यालय थे, जबकि 2021-22 तक विश्वविद्यालय स्तर के संस्थानों की संख्या बढ़कर 1,168 हो गई. इसी अवधि में उच्च शिक्षा में कुल नामांकन भी बढ़ा. 2021-22 में यह 4.33 करोड़ था, जो 2014-15 के मुकाबले 91 लाख अधिक है. 

NEP 2020: शिक्षा को नए ढांचे में ढालने की कोशिश

मोदी सरकार के शिक्षा एजेंडे में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 एक महत्वपूर्ण पड़ाव रहा. इसका जोर केवल डिग्री हासिल करने तक सीमित शिक्षा के बजाय बहुविषयक अध्ययन, कौशल, व्यावहारिक सीख, तकनीक और भारतीय ज्ञान परंपरा को शिक्षा व्यवस्था से जोड़ने पर रहा है.

NEP के तहत उच्च शिक्षा में Multiple Entry-Exit और Academic Bank of Credits जैसी व्यवस्थाओं को आगे बढ़ाया गया. इससे विद्यार्थियों को अलग-अलग संस्थानों और पाठ्यक्रमों के बीच क्रेडिट ट्रांसफर तथा अपनी पढ़ाई को अधिक लचीले तरीके से आगे बढ़ाने का विकल्प मिलता है. 

प्रधानमंत्री ने NEP के क्रियान्वयन पर जोर देते हुए शिक्षा को 21वीं सदी की जरूरतों और कौशल से जोड़ने की बात भी कही है. सरकार की विभिन्न पहलों में भारतीय ज्ञान प्रणालियों को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने की दिशा भी शामिल है.

डिग्री के साथ कौशल पर जोर

मोदी सरकार के शिक्षा और रोजगार एजेंडे में स्किल डेवलपमेंट को लगातार महत्व दिया गया है. Skill India Mission के जरिए व्यावसायिक शिक्षा, प्रशिक्षण, अप्रेंटिसशिप और उद्योग की जरूरतों के अनुरूप कौशल विकसित करने पर जोर दिया गया.

2025 में केंद्र सरकार ने Skill India Programme को 2026 तक जारी रखने और पुनर्गठित करने को मंजूरी दी. इसमें प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना 4.0, प्रधानमंत्री नेशनल अप्रेंटिसशिप प्रमोशन स्कीम और जन शिक्षण संस्थान को एक संयुक्त कार्यक्रम के तहत रखा गया. सरकार ने Skill Hubs को IIT, NIT, केंद्रीय विद्यालय, नवोदय विद्यालय, PM SHRI स्कूलों समेत विभिन्न संस्थानों से जोड़ने की भी व्यवस्था की है. यानी शिक्षा को केवल कक्षा और परीक्षा तक सीमित रखने के बजाय उसे रोजगार और बदलती अर्थव्यवस्था की जरूरतों से जोड़ने की कोशिश भी इस दौर की नीतियों में दिखाई देती है.

समग्र शिक्षा: स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं से डिजिटल क्लासरूम तक

स्कूल शिक्षा के स्तर पर समग्र शिक्षा योजना को NEP 2020 के उद्देश्यों के साथ जोड़ा गया. योजना में बुनियादी ढांचे, डिजिटल शिक्षा, ICT, स्मार्ट क्लासरूम, शिक्षक प्रशिक्षण, व्यावसायिक शिक्षा और समावेशी शिक्षा जैसे क्षेत्रों को शामिल किया गया है. 

समग्र शिक्षा के तहत डिजिटल बोर्ड, स्मार्ट क्लासरूम और ICT इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ावा देने के साथ स्कूलों में पुस्तकालय, परिवहन और स्वच्छता जैसी सुविधाओं को भी मजबूत करने का प्रावधान है. 

बेटियों और दिव्यांग विद्यार्थियों के लिए लक्षित योजनाएं

शिक्षा व्यवस्था में सामाजिक और लैंगिक समावेशन पर भी सरकार की योजनाओं में जोर रहा है. बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ के साथ तकनीकी शिक्षा में छात्राओं को प्रोत्साहित करने के लिए PRAGATI और दिव्यांग विद्यार्थियों के लिए SAKSHAM जैसी छात्रवृत्ति योजनाएं लागू की गईं.

इसका उद्देश्य उच्च और तकनीकी शिक्षा में उन वर्गों की भागीदारी बढ़ाना है जिनके लिए आर्थिक या सामाजिक कारणों से शिक्षा तक पहुंच चुनौतीपूर्ण हो सकती है.

APAAR ID: विद्यार्थी की डिजिटल अकादमिक पहचान

शिक्षा के डिजिटलीकरण में APAAR ID एक महत्वपूर्ण पहल है. APAAR यानी Automated Permanent Academic Account Registry को 'One Nation, One Student ID' के उद्देश्य से विकसित किया गया है.

इस व्यवस्था में विद्यार्थी को एक स्थायी 12 अंकों की अकादमिक पहचान मिलती है, जिसमें उसके शैक्षणिक रिकॉर्ड, क्रेडिट, डिग्री, डिप्लोमा और अन्य उपलब्धियों को डिजिटल रूप से जोड़ा जा सकता है. APAAR को Academic Bank of Credits और DigiLocker से भी जोड़ा गया है.

इसका मकसद यह है कि विद्यार्थी के शैक्षणिक रिकॉर्ड अलग-अलग कागजी दस्तावेजों में बिखरे रहने के बजाय डिजिटल रूप से उपलब्ध रहें और जरूरत पड़ने पर संस्थानों के बीच क्रेडिट ट्रांसफर आसान हो.

नए IIT और IIM: उच्च शिक्षा संस्थानों का विस्तार

उच्च शिक्षा के विस्तार का एक पहलू नए उच्च शिक्षण संस्थानों की स्थापना भी रहा. IIT सिस्टम के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार IIT पालक्काड और IIT तिरुपति 2015 में शुरू हुए, जबकि 2016 में IIT भिलाई, IIT गोवा, IIT जम्मू और IIT धारवाड़ समेत नए IIT अस्तित्व में आए. 

IIM के क्षेत्र में भी नए संस्थानों का विस्तार हुआ. नोट्स में शामिल IIM गुवाहाटी को 2025 के IIM संशोधन कानून के जरिए IIM अधिनियम की अनुसूची में शामिल किया गया.

शिक्षा में तकनीक का बढ़ता इस्तेमाल

मोदी सरकार के शिक्षा विजन में तकनीक का इस्तेमाल लगातार महत्वपूर्ण रहा है. DigiLocker, APAAR, Academic Bank of Credits, डिजिटल लर्निंग प्लेटफॉर्म और स्मार्ट क्लासरूम जैसी पहलों ने शिक्षा के प्रशासन और विद्यार्थियों के अकादमिक रिकॉर्ड को डिजिटल बनाने की दिशा में काम किया है.

समग्र शिक्षा के तहत भी डिजिटल लाइब्रेरी, स्मार्ट क्लासरूम, डिजिटल कंटेंट और ICT आधारित शिक्षा को बढ़ावा दिया गया है. 

मोदी @76: शिक्षा में नीति से लेकर तकनीक तक का सफर

नरेंद्र मोदी के 76वें जन्मदिन के मौके पर उनके शासनकाल के शिक्षा क्षेत्र से जुड़े कामों को देखें तो तस्वीर कई स्तरों पर बनती है. एक तरफ विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षा संस्थानों के विस्तार की दिशा में काम हुआ, दूसरी तरफ NEP 2020 के जरिए शिक्षा के ढांचे में बदलाव का प्रयास किया गया. इसके साथ Skill India ने कौशल और रोजगार की कड़ी को मजबूत करने पर जोर दिया, जबकि APAAR जैसी पहल ने विद्यार्थी के अकादमिक रिकॉर्ड को डिजिटल पहचान से जोड़ने की दिशा खोली.

इस पूरी प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि शिक्षा को अब केवल स्कूल-कॉलेज की चारदीवारी में होने वाली गतिविधि के रूप में नहीं, बल्कि *कौशल, तकनीक, रोजगार, डिजिटल रिकॉर्ड, भारतीय ज्ञान और आजीवन सीखने* से जुड़े व्यापक इकोसिस्टम के रूप में विकसित करने की कोशिश की जा रही है. यही पिछले एक दशक से अधिक समय में शिक्षा नीति के स्तर पर सामने आए प्रमुख बदलावों का एक अहम हिस्सा है.

अतिथि लेखक: प्रो. किरण हजारिका

(प्रो. किरण हजारिका वर्तममान में केंद्रीय पंजाब विश्वविद्यालय के प्रो-वाइस चांसलर हैं. वह इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (IGNOU) के पूर्व प्रो-वाइस चांसलर और पूर्व UGC सदस्य भी रह चुके हैं.)


जन्मदिन विशेष: गुजरात से राष्ट्रीय मंच तक मोदी की 25 साल की यात्रा पर एक नजर

7 अक्टूबर 2001 को मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बने और इस अक्टूबर में वह सरकार के प्रमुख के रूप में 25 साल पूरे करेंगे, पहले गुजरात में और उसके बाद राष्ट्रीय स्तर पर, यह एक ऐसी उपलब्धि है, जिसे समकालीन भारत में बहुत कम राजनेता हासिल कर सकते हैं.

डॉ. अनुराग बत्रा by
Published - Thursday, 17 September, 2026
Last Modified:
Thursday, 17 September, 2026
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17 सितंबर, नरेंद्र मोदी का जन्मदिन, एक ऐसी राजनीतिक यात्रा पर नजर डालने का उपयुक्त अवसर है, जो जितनी असामान्य रही है, उतनी ही महत्वपूर्ण भी रही है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में एक जमीनी कार्यकर्ता के शुरुआती वर्षों से लेकर गुजरात के मुख्यमंत्री और अंततः भारत के प्रधानमंत्री बनने तक, मोदी ने सार्वजनिक जीवन में एक लंबा सफर तय किया है.

इस यात्रा को खास तौर पर उल्लेखनीय बनाने वाली बात यह है कि इसकी शुरुआत कहां से हुई. मोदी किसी स्थापित राजनीतिक परिवार के जरिए राजनीति में नहीं आए और न ही उन्हें सत्ता का कोई पद विरासत में मिला. उनके शुरुआती वर्ष संगठन के अनुशासन को सीखने और जमीनी स्तर पर काम करने में बीते. उन्होंने धीरे-धीरे RSS और बाद में भारतीय जनता पार्टी के भीतर अधिक जिम्मेदारियां संभालीं और संगठनात्मक सीढ़ी पर आगे बढ़ते गए, जिसके बाद 2001 में उन्हें गुजरात का नेतृत्व करने का अवसर मिला.

7 अक्टूबर 2001 को मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बने. इस अक्टूबर में वह सरकार के प्रमुख के रूप में 25 साल पूरे करेंगे, पहले गुजरात में और उसके बाद राष्ट्रीय स्तर पर. यह एक ऐसी उपलब्धि है, जिसे समकालीन भारत में बहुत कम राजनेता हासिल कर सकते हैं.

गुजरात रहा निर्णायक अध्याय

गुजरात के वर्षों ने मोदी की उस राजनीतिक शैली को काफी हद तक स्थापित किया, जिसे बाद में उनके साथ जोड़ा गया. उनके कार्यकाल के दौरान बुनियादी ढांचे, निवेश, औद्योगिक विकास और प्रशासनिक डिलीवरी पर काफी जोर दिया गया.

इसके बाद "गुजरात मॉडल" उनके राजनीतिक आख्यान का एक प्रमुख हिस्सा बन गया. इसे एक ऐसे दृष्टिकोण के रूप में प्रस्तुत किया गया, जिसका उद्देश्य आर्थिक विकास, बुनियादी ढांचे के विकास और निवेश को बढ़ावा देने को साथ लेकर चलना था. गुजरात के अनुभव ने राष्ट्रीय स्तर पर मोदी को विकास-केंद्रित एजेंडे वाले नेता के रूप में स्थापित करने में भी मदद की.

इसलिए 2014 में गांधीनगर से नई दिल्ली का उनका बदलाव दिशा में पूरी तरह बदलाव का प्रतिनिधित्व नहीं करता था. गुजरात के वर्षों को परिभाषित करने वाले कई विषय उनके साथ राष्ट्रीय मंच पर भी आए.

विकास लगातार बना रहा प्रमुख विषय

प्रधानमंत्री बनने के बाद से मोदी ने लगातार विकास और भारत के आर्थिक परिवर्तन को अपने राजनीतिक संदेश के केंद्र में रखा है. भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने की महत्वाकांक्षा उनके मौजूदा कार्यकाल के प्रमुख विषयों में से एक बन गई है.

उनके दृष्टिकोण में एक निरंतरता भी दिखाई देती है: बड़े राष्ट्रीय लक्ष्य तय करना, उन्हें सीधे नागरिकों तक पहुंचाना और क्रियान्वयन तथा डिलीवरी पर काफी जोर देना.

कोई व्यक्ति उनकी राजनीति के हर पहलू से सहमत हो या नहीं, इस बात से इनकार करना मुश्किल है कि मोदी ने भारत में राजनीतिक संवाद के पैमाने और शैली को बदला है. तकनीक, सोशल मीडिया और नागरिकों से सीधे संवाद के उनके इस्तेमाल ने संचार को उनके राजनीतिक नेतृत्व का अभिन्न हिस्सा बना दिया है.

गुजरात से दुनिया तक

एक अन्य महत्वपूर्ण बदलाव अंतरराष्ट्रीय मंच पर मोदी का उभरना रहा है.

हाल ही में नई दिल्ली में संपन्न BRICS शिखर सम्मेलन इसका एक और उदाहरण रहा. मेजबान के तौर पर भारत ने ग्लोबल साउथ के साथ भारत के जुड़ाव को मजबूत करने और वैश्विक शासन तथा बहुपक्षीय संस्थानों से जुड़ी चर्चाओं में देश को बड़ी आवाज देने पर काफी जोर दिया. दुनिया भर के नेताओं के साथ मोदी की बातचीत ने यह भी दिखाया कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति उनके राजनीतिक नेतृत्व का कितना महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है.

जिस व्यक्ति के राजनीतिक करियर की शुरुआत जमीनी स्तर पर संगठनात्मक कार्य से हुई थी, उसका प्रमुख देशों के राष्ट्रपतियों और प्रधानमंत्रियों के साथ एक मेज पर बैठकर बातचीत करने तक का सफर उल्लेखनीय है.

मोदी की संवाद शैली

मोदी ने बदलते संचार परिवेश की एक असामान्य समझ भी दिखाई है. उन्होंने यह पहचाना है कि आज राजनीतिक नेतृत्व केवल संसद, प्रेस कॉन्फ्रेंस या पारंपरिक मीडिया तक सीमित नहीं है.

'मन की बात' से लेकर सोशल मीडिया, सार्वजनिक कार्यक्रमों और अत्यधिक व्यवस्थित अंतरराष्ट्रीय आयोजनों तक, उन्होंने कई ऐसे माध्यम बनाए हैं, जिनके जरिए वह आबादी के विभिन्न वर्गों के साथ सीधे संवाद करते हैं.

यह संवाद क्षमता उनकी राजनीतिक अपील का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रही है और इसने उन्हें मतदाताओं के बड़े वर्गों के साथ सीधा संबंध बनाने में मदद की है.

बड़ी तस्वीर

मोदी के जन्मदिन के अवसर पर शायद अधिक दिलचस्प कहानी स्वयं जन्मदिन नहीं, बल्कि संगठनात्मक कार्य के शुरुआती दिनों से अब तक तय की गई असाधारण दूरी है.

अक्टूबर में, जब वह सरकार के प्रमुख के रूप में 25 साल पूरे करेंगे, तो यह लगातार 25 वर्षों के कार्यकारी नेतृत्व का प्रतीक होगा, पहले गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में और फिर भारत के प्रधानमंत्री के रूप में.

बहुत कम राजनीतिक करियर ने ऐसी यात्रा तय की है.

शाखा से गुजरात तक, गुजरात से नई दिल्ली तक और नई दिल्ली से वैश्विक मंच तक, नरेंद्र मोदी की यात्रा समकालीन भारत की महत्वपूर्ण राजनीतिक कहानियों में से एक है.

और शायद इस यात्रा में सबसे महत्वपूर्ण धागा उनका यह घोषित विश्वास रहा है कि भारत को लगातार आगे बढ़ना, प्रतिस्पर्धा करना और दुनिया में बड़ी जगह तलाशना चाहिए.

उनके जन्मदिन पर, स्वयं जन्मदिन के बजाय, यह यात्रा विचार करने योग्य है.

डॉ. अनुराग बत्रा, BW रिपोर्टर्स

(डॉ. अनुराग बत्रा BW Businessworld के चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ तथा exchange4media Group के संस्थापक हैं. पहली पीढ़ी के उद्यमी और मीडिया लीडर होने के साथ-साथ वह एंजल निवेशक, लेखक, टेलीविजन होस्ट और उद्यमियों तथा मीडिया पेशेवरों के मेंटर भी हैं. वह कई कॉरपोरेट और संस्थागत बोर्ड में सेवाएं देते हैं और प्रबंधन शिक्षा के साथ उनका लंबे समय से जुड़ाव रहा है. MDI गुड़गांव के पूर्व छात्र, वह इसके बोर्ड ऑफ गवर्नर्स में सेवाएं दे चुके हैं और MDI Alumni Association के अध्यक्ष भी रह चुके हैं. वह International Academy of Television Arts & Sciences के सदस्य भी हैं. एक उत्साही पाठक, डॉ. बत्रा का मानना है कि जब जुनून किसी का पेशा बन जाता है, तो काम उद्देश्य की गहरी भावना हासिल कर लेता है.)

 


मोदी @76: शिक्षा और कौशल से विकसित भारत की ओर

डॉ. विनोद बछेती लिखते हैं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में शिक्षा, डिजिटल लर्निंग और कौशल विकास पर बढ़ा फोकस

डॉ. विनोद बछेती by
Published - Thursday, 17 September, 2026
Last Modified:
Thursday, 17 September, 2026
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी का आज जन्मदिन है. मेरे लिए यह दिन केवल देश के प्रधानमंत्री के जन्मदिन का अवसर नहीं है, बल्कि पिछले एक दशक से अधिक समय में देश में हुए बदलावों को देखने और यह समझने का अवसर भी है कि इन बदलावों का आने वाली पीढ़ियों पर क्या प्रभाव पड़ सकता है.

करीब 30 वर्षों से भारतीय जनता पार्टी से जुड़े होने के नाते मैंने संगठन और सरकार के स्तर पर कई बदलावों को करीब से देखा है. इन बदलावों में शिक्षा का क्षेत्र मेरे लिए विशेष महत्व रखता है, क्योंकि मेरा मानना है कि किसी भी देश के भविष्य की नींव उसकी शिक्षा व्यवस्था और युवा शक्ति से तैयार होती है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में 2014 के बाद शिक्षा को लेकर जिस तरह नई नीतियों, तकनीक, कौशल और रोजगार से जोड़ने पर जोर दिया गया, उसे मैं भारत के भविष्य के लिहाज से महत्वपूर्ण मानता हूं.

नई शिक्षा नीति से शिक्षा व्यवस्था में बदलाव की कोशिश

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के कार्यकाल में शिक्षा क्षेत्र का सबसे महत्वपूर्ण नीतिगत बदलाव राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के रूप में सामने आया. इस नीति में शिक्षा को केवल रटने और परीक्षा तक सीमित रखने के बजाय समग्र विकास, रचनात्मकता, कौशल और व्यावहारिक सीखने पर जोर दिया गया.

मेरे विचार में यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आज के दौर में बच्चों को केवल जानकारी देने से काम नहीं चलेगा. उन्हें यह भी सिखाना होगा कि उस जानकारी का इस्तेमाल कैसे किया जाए, समस्याओं का समाधान कैसे किया जाए और बदलती दुनिया के साथ खुद को कैसे तैयार किया जाए.

NEP 2020 के तहत शिक्षा में लचीलापन, कौशल आधारित सीखने और अलग-अलग विषयों के बीच बेहतर तालमेल पर जोर दिया गया है. 

पीएम श्री स्कूलों से आधुनिक शिक्षा पर जोर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में PM SHRI यानी Prime Minister's Schools for Rising India योजना शुरू की गई. इसका उद्देश्य 14,500 से अधिक स्कूलों को ऐसे मॉडल स्कूलों के रूप में विकसित करना है, जहां आधुनिक बुनियादी ढांचे के साथ बेहतर और समग्र सीखने का वातावरण तैयार किया जा सके.

मेरे लिए PM SHRI योजना की अहमियत इस बात में है कि स्कूल शिक्षा में केवल भवन और सुविधाओं की बात नहीं की गई, बल्कि तकनीक, सीखने के नए तरीकों और विद्यार्थियों के समग्र विकास को भी महत्व दिया गया है.

स्मार्ट क्लासरूम, डिजिटल संसाधन, कंप्यूटर लैब और बेहतर शैक्षणिक वातावरण आज की शिक्षा व्यवस्था की जरूरत हैं. सरकारी स्कूलों में इन सुविधाओं का विस्तार उन विद्यार्थियों के लिए भी अवसर बढ़ा सकता है, जिनके पास निजी संस्थानों की सभी सुविधाएं उपलब्ध नहीं होतीं.

डिजिटल शिक्षा को मिला नया विस्तार

पिछले वर्षों में शिक्षा और तकनीक का संबंध और मजबूत हुआ है. PM e-VIDYA जैसे कार्यक्रमों के जरिए ऑनलाइन, डिजिटल और ऑन-एयर माध्यमों से शिक्षा उपलब्ध कराने का प्रयास किया गया. आधिकारिक जानकारी के अनुसार PM e-VIDYA का उद्देश्य डिजिटल और ऑनलाइन शिक्षा से जुड़े विभिन्न प्रयासों को एक साथ लाकर बहु-माध्यमीय शिक्षा की पहुंच बढ़ाना है. 

मेरा मानना है कि डिजिटल शिक्षा का सबसे बड़ा लाभ यह हो सकता है कि विद्यार्थी अपने स्थान की सीमाओं से आगे बढ़कर ज्ञान के नए स्रोतों तक पहुंच बना सकें. विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों और छोटे शहरों के विद्यार्थियों के लिए तकनीक शिक्षा के नए अवसर खोल सकती है. हालांकि इसके साथ डिजिटल पहुंच और गुणवत्ता की चुनौती पर भी लगातार काम करना जरूरी है.

समग्र शिक्षा से स्कूल शिक्षा को एक साथ देखने की कोशिश

समग्र शिक्षा योजना के जरिए प्री-प्राइमरी से लेकर कक्षा 12 तक स्कूली शिक्षा को एक व्यापक ढांचे में देखने का प्रयास किया गया है. सरकार के अनुसार यह योजना NEP 2020 के अनुरूप शिक्षा की गुणवत्ता, बुनियादी ढांचे, शिक्षक प्रशिक्षण और सीखने के परिणामों को मजबूत करने पर केंद्रित है. 

मेरे विचार में शिक्षा व्यवस्था को अलग-अलग हिस्सों में देखने के बजाय बच्चे की पूरी शैक्षणिक यात्रा को एक साथ देखना जरूरी है. शुरुआती कक्षाओं में मजबूत आधार से लेकर उच्च कक्षाओं में कौशल और करियर की तैयारी तक हर स्तर महत्वपूर्ण है.

स्किल इंडिया से युवाओं के कौशल पर फोकस

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में स्किल इंडिया मिशन के जरिए युवाओं को रोजगार से जुड़े कौशल उपलब्ध कराने पर विशेष जोर दिया गया.

सरकारी आंकड़ों के अनुसार PMKVY के तहत अक्टूबर 2025 तक 1.64 करोड़ से अधिक उम्मीदवारों को प्रशिक्षण और प्रमाणन दिया गया था. इसी अवधि तक नेशनल अप्रेंटिसशिप प्रमोशन स्कीम के तहत 49 लाख से अधिक अप्रेंटिस जुड़े थे. 

मैं मानता हूं कि यह बदलाव बहुत जरूरी है. आज केवल डिग्री हासिल करना पर्याप्त नहीं है. उद्योग की जरूरतें बदल रही हैं और नई तकनीक के साथ रोजगार के नए क्षेत्र सामने आ रहे हैं. ऐसे में युवाओं को अपने कौशल को लगातार अपडेट करने की जरूरत है.

वोकेशनल शिक्षा को मुख्यधारा से जोड़ना जरूरी

मेरे लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में शिक्षा क्षेत्र में एक और महत्वपूर्ण पहल यह है कि वोकेशनल और कौशल आधारित शिक्षा को मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ने पर जोर दिया गया है.

हमारे यहां लंबे समय तक शिक्षा को मुख्य रूप से डिग्री हासिल करने के नजरिए से देखा जाता रहा. लेकिन हर विद्यार्थी की रुचि और क्षमता अलग होती है. किसी की रुचि अकादमिक क्षेत्र में हो सकती है, तो कोई तकनीकी या व्यावहारिक क्षेत्र में बेहतर कर सकता है.

इसलिए शिक्षा व्यवस्था में अलग-अलग विकल्प उपलब्ध होना जरूरी है. युवाओं को तकनीकी शिक्षा, व्यावसायिक प्रशिक्षण और अप्रेंटिसशिप जैसे अवसरों से जोड़ना रोजगार के लिए उनकी तैयारी को मजबूत कर सकता है.

शिक्षा से रोजगार तक की कड़ी मजबूत करने की जरूरत

मैं शिक्षा और रोजगार को एक-दूसरे से अलग करके नहीं देखता. शिक्षा व्यक्ति को ज्ञान और दृष्टि देती है, जबकि कौशल उसे उस ज्ञान को व्यवहार में इस्तेमाल करने की क्षमता देता है.

आज जरूरत इस बात की है कि स्कूल और कॉलेज से निकलने वाला युवा केवल प्रमाणपत्र लेकर न निकले, बल्कि उसके पास ऐसी क्षमता भी हो, जिससे वह रोजगार के बदलते अवसरों के अनुसार खुद को तैयार कर सके.

स्किल इंडिया और डिजिटल स्किलिंग जैसे प्रयास इसी दिशा में महत्वपूर्ण हो सकते हैं. Skill India Digital Hub जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अलग-अलग क्षेत्रों में अपस्किलिंग और री-स्किलिंग के अवसर उपलब्ध कराए जा रहे हैं. 

विकसित भारत की नींव शिक्षा से

मेरे विचार में विकसित भारत की नींव केवल बड़े उद्योगों और इंफ्रास्ट्रक्चर से नहीं रखी जाएगी. इसकी असली नींव हमारे स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों और कौशल प्रशिक्षण संस्थानों में तैयार होगी.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में पिछले वर्षों में शिक्षा को नई शिक्षा नीति, PM SHRI, समग्र शिक्षा, डिजिटल शिक्षा और स्किल इंडिया जैसे अलग-अलग माध्यमों से व्यापक बनाने का प्रयास हुआ है. इन पहलों का लक्ष्य शिक्षा को बदलती अर्थव्यवस्था और नई तकनीक की जरूरतों के अनुरूप तैयार करना है. 

आगे की राह भी उतनी ही महत्वपूर्ण

मैं मानता हूं कि शिक्षा के क्षेत्र में बदलाव एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया है. आने वाले समय में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स, डिजिटल तकनीक और नई अर्थव्यवस्था के दूसरे क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ेंगे. इसलिए युवाओं को इन क्षेत्रों के लिए तैयार करना जरूरी होगा. हमें शिक्षा को कौशल से, कौशल को रोजगार से और रोजगार को उद्यमिता से जोड़ने की दिशा में आगे बढ़ना होगा.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के जन्मदिन पर मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि भारत की युवा शक्ति को ऐसा अवसर मिले, जहां वह अपनी क्षमता को पहचान सके और उसे देश के विकास में इस्तेमाल कर सके.

मेरा मानना है कि यदि हमारे बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और युवाओं को समय के अनुरूप कौशल मिलता है, तो यही मानव संसाधन भारत की सबसे बड़ी ताकत बन सकता है. विकसित भारत की दिशा में आगे बढ़ने के लिए शिक्षा और युवा शक्ति को मजबूत करना इसलिए सबसे महत्वपूर्ण निवेशों में से एक है.

अतिथि लेखक: डॉ. विनोद बछेती

(डॉ. विनोद बछेती वर्तमान में दिल्ली प्रदेश भाजपा के उपाध्यक्ष हैं. वह दिल्ली पैरामेडिकल व मैनेजमेंट संस्थान, (DPMI) के चेयरमैन भी हैं. प्रदेश में उपाध्यक्ष बनने से पहले 
वह भजपा के मंत्री और मयूर विहा जिलाध्य़क्ष भी रह चुके हैं. वह करीब 30 साल से भाजपा से जुड़े हुए हैं.)


टाटा संस: क्या चंद्रा की विदाई अब यू-टर्न ले रही है?

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया द्वारा टाटा संस के NBFC पंजीकरण रद्द करने के आवेदन को खारिज किए जाने से उत्तराधिकार का समीकरण बदल गया है. जानिए क्यों चंद्रशेखरन की निरंतरता पर फिर से विचार किया जा सकता है:

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Thursday, 17 September, 2026
Last Modified:
Thursday, 17 September, 2026
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कभी-कभी सबसे दिलचस्प कॉरपोरेट कहानियां इस बारे में नहीं होतीं कि क्या हुआ है, बल्कि इस बारे में होती हैं कि किस पर दोबारा विचार किया जा सकता है. एन चंद्रशेखरन का टाटा संस के चेयरमैन के रूप में एक और कार्यकाल नहीं लेने का फैसला उत्तराधिकार के सवाल को खत्म करता हुआ दिखाई दिया था. उनका मौजूदा कार्यकाल फरवरी 2027 में समाप्त हो रहा है और उनके उत्तराधिकारी को खोजने की प्रक्रिया शुरू हो गई थी. लेकिन एक महीने से भी कम समय में इस फैसले से जुड़े हालात नाटकीय रूप से बदल गए हैं.

भारतीय रिजर्व बैंक ने टाटा संस के NBFC के रूप में अपना पंजीकरण सरेंडर करने के आवेदन को खारिज कर दिया है, जिससे होल्डिंग कंपनी अनिवार्य लिस्टिंग के और करीब आ गई है. टाटा संस का बोर्ड अब 17 सितंबर को बैठक करने वाला है, जिसमें लिस्टिंग का सवाल, उत्तराधिकार और टाटा ट्रस्ट्स के भीतर जारी शासन संबंधी जटिलताएं एक ही मेज पर आ रही हैं. रिपोर्टों के अनुसार, नॉमिनेशन एंड रेम्यूनरेशन कमेटी चंद्रा से अपने फैसले पर दोबारा विचार करने के लिए कह सकती है.

और इससे एक दिलचस्प सवाल उठता है: क्या टाटा संस वास्तव में चंद्रा पर इसलिए दोबारा विचार कर रहा है क्योंकि उसे सही उत्तराधिकारी नहीं मिला है? या फिर यह पद अचानक इतना महत्वपूर्ण और जटिल हो गया है कि इस समय इसे किसी और को सौंपना मुश्किल है?

परिस्थितियां बदल गई हैं

जब चंद्रा ने घोषणा की थी कि वह तीसरे कार्यकाल की मांग नहीं करेंगे, तब परिस्थितियां अलग थीं. नेतृत्व का सवाल मुख्य रूप से उत्तराधिकार को लेकर था. टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स समूह का नेतृत्व करने के लिए अगले व्यक्ति की पहचान करने पर ध्यान केंद्रित कर सकते थे.

लेकिन RBI के फैसले ने समीकरण बदल दिया है.

टाटा संस ने Core Investment Company के रूप में अपना पंजीकरण सरेंडर करने की मांग की थी. इस कदम से उसे उस नियामकीय ढांचे से बाहर रहने में मदद मिलती, जिसके तहत उसे लिस्टिंग के लिए मजबूर किया जा सकता था. RBI ने इस आवेदन को खारिज कर दिया है. रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, मार्च 2025 तक करीब 1.75 लाख करोड़ रुपये की स्टैंडअलोन परिसंपत्तियों वाली टाटा संस बड़े Upper Layer NBFCs पर लागू नियामकीय ढांचे के दायरे में आती है. RBI ने बॉम्बे हाई कोर्ट में एक कैविएट भी दायर की है, जिसमें संभावित कानूनी कार्यवाही की आशंका जताई गई है. अचानक, अगला चेयरमैन सिर्फ टाटा समूह की जिम्मेदारी नहीं संभाल सकता.

वह टाटा संस के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण कॉरपोरेट बदलावों में से एक की जिम्मेदारी संभाल सकता है.

क्या समस्या उत्तराधिकारी को लेकर है?

एक और संभावना है. शायद टाटा संस अभी तक उत्तराधिकार की प्रक्रिया पूरी नहीं कर पाया है.

लेकिन यहां भी कुछ बातों को स्पष्ट करना जरूरी है.

ऐसा जरूरी नहीं है कि समूह के पास संभावित उम्मीदवार ही नहीं हैं. वरिष्ठ टाटा अधिकारियों और बाहरी उम्मीदवारों के नाम पहले ही मीडिया में चर्चा में आ चुके हैं. बड़ी मुश्किल यह है कि औपचारिक उत्तराधिकार तंत्र खुद जटिलताओं में फंस गया है.

टाटा संस के आर्टिकल्स में एक चयन समिति का प्रावधान है, जिसमें टाटा ट्रस्ट्स की महत्वपूर्ण भूमिका है. लेकिन महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर के समक्ष चल रही कार्यवाही के बीच सर रतन टाटा ट्रस्ट ट्रस्टी बैठकों का आयोजन नहीं कर पाया है. इससे चयन पैनल में अपने प्रतिनिधि को नामित करने की उसकी क्षमता प्रभावित हुई है.

इसलिए, उम्मीदवार नहीं मिल पाने और उसे चुनने की संस्थागत प्रक्रिया पूरी नहीं कर पाने के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर है.

यह अंतर महत्वपूर्ण हो सकता है, क्योंकि जब उत्तराधिकार की प्रक्रिया पर काम चल रहा है, उसी समय एक और मुद्दे पर समय बीत रहा है: टाटा संस का नियामकीय भविष्य.

उत्तराधिकारी की जिम्मेदारी अचानक बड़ी हो गई है

चंद्रा को लेकर बहस दोबारा शुरू होने का यह सबसे मजबूत कारण हो सकता है.

कल्पना कीजिए कि इस समय टाटा संस की जिम्मेदारी संभालने वाला व्यक्ति कौन होगा.

वह केवल एक स्थापित निजी होल्डिंग कंपनी की कमान नहीं संभाल रहा होगा. वह ऐसी टाटा संस की जिम्मेदारी संभाल सकता है जो सार्वजनिक बाजारों में जाने की तैयारी कर रही हो, जिसे ज्यादा नियामकीय निगरानी, अधिक खुलासे की जरूरतों और भारत के संभावित सबसे बड़े IPOs में से एक का सामना करना हो.

वह ऐसे समूह की जिम्मेदारी भी संभालेगा, जिसके टेक्नोलॉजी, ऑटोमोबाइल, स्टील, एयरलाइंस, कंज्यूमर बिजनेस और न्यू-एज इंडस्ट्रीज में बड़े कारोबार और निवेश हैं.

इस बदलाव के लिए संस्थागत जानकारी और अनुभव की गहरी जरूरत होगी, इसलिए यह समझा जा सकता है कि संगठन के भीतर कुछ लोग यह सवाल क्यों उठा सकते हैं कि क्या निरंतरता की अब नई अहमियत हो गई है.

PTI से बातचीत में एक निवेश बैंकर ने इस मुद्दे को संक्षेप में रखा: अगर टाटा संस IPO की दिशा में आगे बढ़ती है, तो चेयरमैन समेत मैनेजमेंट टीम की निरंतरता पर विचार करना होगा, क्योंकि संभावित निवेशक नेतृत्व की स्थिरता को लेकर भरोसा चाहते होंगे.

इसका मतलब यह नहीं है कि चंद्रा अपरिहार्य हैं. न ही इसका मतलब है कि कोई उत्तराधिकारी इस बदलाव को संभाल नहीं सकता. यह सिर्फ उत्तराधिकार के समीकरण को बदलता है.

RBI ने बातचीत का रुख बदल दिया है

महत्वपूर्ण बात यह है कि इस बात का कोई सबूत नहीं है कि RBI या SEBI ने टाटा संस से कहा है कि चंद्रा को चेयरमैन बने रहना चाहिए.

नियामकीय मुद्दा अलग है.

RBI ने उस रास्ते को प्रभावी रूप से बंद कर दिया है, जिस पर टाटा संस लिस्टिंग के ढांचे से बचने के लिए आगे बढ़ रही थी. अब टाटा संस को उस फैसले के परिणामों से निपटना होगा. जब और जैसे ही कंपनी सिक्योरिटीज मार्केट और लिस्टिंग प्रक्रिया में प्रवेश करेगी, SEBI की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण हो जाएगी.

इसलिए यह ऐसा मामला नहीं है जिसमें नियामक चेयरमैन का चुनाव कर रहा है.

यह ऐसा मामला है जिसमें नियमन उस माहौल को बदल रहा है, जिसमें चेयरमैन को काम करना होगा.

और यह एक सूक्ष्म लेकिन महत्वपूर्ण अंतर है.

निरंतरता बनाम बदलाव

यहां एक बड़ा मैनेजमेंट सवाल भी है.

कॉरपोरेट उत्तराधिकार को आम तौर पर संस्थागत मजबूती का संकेत माना जाता है. एक पेशेवर तरीके से संचालित संगठन को दिशा खोए बिना नेतृत्व बदलने में सक्षम होना चाहिए.

लेकिन कुछ ऐसे मौके भी होते हैं जब निरंतरता खुद रणनीतिक बन जाती है.

किसी बड़े अधिग्रहण से गुजर रही कंपनी निरंतरता चाह सकती है. संकट से गुजर रही कंपनी भी निरंतरता चाह सकती है. और निजी स्वामित्व से सार्वजनिक बाजारों में जाने वाली कंपनी भी निरंतरता को महत्व दे सकती है.

टाटा संस एक साथ इन तीनों स्थितियों का सामना कर सकती है.

यही वजह है कि चंद्रा का सवाल अचानक ज्यादा जटिल हो गया है.

शायद टाटा संस चंद्रा पर इसलिए दोबारा विचार नहीं कर रही कि उसे उनका उत्तराधिकारी नहीं मिल पाया.

शायद वह इसलिए दोबारा विचार कर रही है क्योंकि उनके उत्तराधिकारी को जो जिम्मेदारी संभालनी होगी, वह अचानक उस जिम्मेदारी से कहीं बड़ी और जटिल हो गई है, जिसे टाटा संस ने शुरू में भरने के बारे में सोचा था.

टाटा का बड़ा सवाल

टाटा समूह के लिए यहां एक दार्शनिक सवाल भी है.

टाटा को हमेशा सिर्फ कंपनियों के समूह के बजाय एक संस्था के रूप में देखा गया है. इससे नेतृत्व में बदलाव विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है. टाटा संस के चेयरमैन सिर्फ एक और कॉरपोरेट CEO नहीं हैं. यह पद ऑपरेटिंग कंपनियों, ट्रस्ट्स, शेयरधारकों, कर्मचारियों और अन्य हितधारकों के एक जटिल तंत्र के केंद्र में है.

यही वजह है कि चंद्रा का उत्तराधिकारी कौन होगा, इस सवाल को पूरी तरह इस सवाल से अलग नहीं किया जा सकता कि टाटा संस किस रूप में बदल रही है.

क्या वह मूल रूप से एक निजी होल्डिंग कंपनी बनी रहेगी, जिसकी स्वामित्व संरचना विशिष्ट है? या फिर वह एक ऐसे नए दौर में प्रवेश कर रही है, जहां होल्डिंग कंपनी को खुद सार्वजनिक बाजारों की कहीं अधिक पारदर्शिता और निगरानी के तहत काम करना होगा?

अगर ऐसा हो रहा है, तो शायद बोर्ड को एक अलग सवाल पूछना होगा.

सिर्फ यह नहीं: अगला चेयरमैन कौन होना चाहिए?

बल्कि: टाटा संस को उसके अगले संस्थागत बदलाव के दौर में कौन नेतृत्व दे?

17 सितंबर पहला जवाब दे सकता है

इसलिए 17 सितंबर की बोर्ड बैठक का महत्व उत्तराधिकार पर नियमित चर्चा से कहीं अधिक है.

तीन मुद्दे एक साथ सामने आ रहे हैं: चंद्रा का भविष्य, टाटा संस की नियामकीय और लिस्टिंग संबंधी जिम्मेदारियां और टाटा ट्रस्ट्स के भीतर अनसुलझे शासन संबंधी मुद्दे.

चंद्रा आखिरकार बने रहते हैं या नया चेयरमैन चुना जाता है, यह टाटा संस बोर्ड, संबंधित शेयरधारकों और औपचारिक शासन प्रक्रिया के फैसलों पर निर्भर करेगा.

लेकिन चंद्रा की निरंतरता का सवाल कथित तौर पर फिर से चर्चा में आना हमें एक महत्वपूर्ण बात बताता है.

कॉरपोरेट इंडिया में, कभी-कभी उत्तराधिकार किसी नेता को बदलने के बारे में नहीं होता. यह तय करने के बारे में होता है कि किसी नेता को बदलने का सही समय है या नहीं.

और टाटा संस को शायद यह महसूस हुआ है कि समय बदल गया है.

डॉ. अनुराग बत्रा,  BW Reporters

(डॉ. अनुराग बत्रा BW Businessworld के चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ तथा exchange4media Group के संस्थापक हैं. पहली पीढ़ी के उद्यमी और मीडिया लीडर के रूप में वह एंजेल इन्वेस्टर, लेखक, टेलीविजन होस्ट और उद्यमियों तथा मीडिया प्रोफेशनल्स के मेंटर भी हैं. वह कई कॉरपोरेट और संस्थागत बोर्डों में काम करते हैं और मैनेजमेंट शिक्षा से लंबे समय से जुड़े हुए हैं. MDI Gurgaon के पूर्व छात्र के रूप में उन्होंने इसके बोर्ड ऑफ गवर्नर्स में काम किया है और MDI Alumni Association के अध्यक्ष भी रहे हैं. वह International Academy of Television Arts & Sciences के सदस्य भी हैं. पढ़ने के शौकीन डॉ. बत्रा का मानना है कि जब जुनून व्यक्ति का पेशा बन जाता है, तो काम को उद्देश्य की गहरी भावना मिलती है.)


हीराबेन के हीरा पुत्र नरेंद्र मोदी: नारी शक्ति को सम्मान, अधिकार और नेतृत्व देने की पहल

प्रोफेसर पायल मागो कहती हैं, नरेंद्र मोदी के भाषणों और जमीनी कार्यों में शिक्षा और महिला सशक्तीकरण को राष्ट्र के विकास की केंद्रीय शर्त के रूप में प्रस्तुत किया गया है.

प्रोफेसर पायल मागो by
Published - Thursday, 17 September, 2026
Last Modified:
Thursday, 17 September, 2026
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माननीय नरेंद्र मोदी के भारत के प्रधानमंत्री बनने के साथ ही मातृ शक्ति को महत्व मिलने का नया दौर आरंभ हुआ. भारतीय स्त्रियों को समर्पित ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ और ‘सुकन्या समृद्धि’ जैसी योजनाएं हों या ‘Women-Led Development’, ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ जैसे देश को आंदोलित कर देने वाले विचार हों, लगभग प्रत्येक नीति में मातृ शक्ति के लिए चिंता और चिंतन की अनुगूंज सुनाई देती है.

ये विचार अनायास नहीं आते. कोई भी विचार हवा में पैदा नहीं होता. संघर्षशील मां हीराबेन के सुपुत्र नरेंद्र मोदी के युवावस्था के दौर में स्त्रियों के प्रति उनके विचार कैसे थे, इसका पता उनकी एक पुस्तक से चलता है.

‘प्रेमतीर्थ’ में दिखाई देती युवा नरेंद्र मोदी की संवेदना

भारत का प्रधानमंत्री बनने से पहले नरेंद्र मोदी की कहानियों की एक पुस्तक प्रकाशित हुई थी, जिसका नाम था ‘प्रेमतीर्थ’. इन कहानियों के बारे में उपलब्ध विवरण के अनुसार, आपातकाल के दौर में भूमिगत रहते हुए युवा नरेंद्र मोदी ने इन्हें लिखा था.

इस पुस्तक के समर्पण में उन्होंने लिखा था: “दिव्य पुंज रूप समस्त मातृशक्ति के श्री चरणों में”

इस संग्रह की कहानियां मातृत्व प्रेम के विभिन्न पहलुओं पर लिखी गई हैं. इसकी काव्यमय भूमिका में नरेंद्र मोदी ने लिखा कि “मातृशक्ति की निर्मल प्रेमधारा, लुप्त सरस्वती की तरह अविरत बह रही है. इसका दर्शन नहीं सिर्फ अनुभूति ही होगी.”

बाद में जब उन्हें देश का नेतृत्व करने का अवसर मिला तो उस स्वप्न और अनुभूति को जमीन पर उतारने के लिए उन्होंने अथक प्रयास किए.

महिला सशक्तीकरण को विकास की केंद्रीय शर्त मानने की सोच

नरेंद्र मोदी के भाषणों और जमीनी कार्यों में शिक्षा और महिला सशक्तीकरण को राष्ट्र के विकास की केंद्रीय शर्त के रूप में प्रस्तुत किया गया है. महिलाओं के संदर्भ में उनका विमर्श केवल कल्याणकारी योजनाओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि राष्ट्र के विकास में स्त्रियों की सक्रिय सहभागिता और उनकी नेतृत्वकारी भूमिका पर भी जोर देता है. इस दृष्टिकोण के अनेक उदाहरण मिलते हैं.

नारी शक्ति वंदन अधिनियम से राजनीतिक भागीदारी पर जोर

106वां संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 2023, जिसे लोकप्रिय रूप से नारी शक्ति वंदन अधिनियम या महिला आरक्षण अधिनियम कहा जाता है, लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और दिल्ली की विधानसभा में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटों के आरक्षण का प्रावधान करता है. इसमें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों में भी महिलाओं के लिए आरक्षण का प्रावधान शामिल है. 

यह कानून राजनीति और नीति निर्माण में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रावधान के रूप में सामने आया.

‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ से शिक्षा को सशक्तीकरण से जोड़ने की कोशिश

महिलाओं को जागरूक और आत्मनिर्भर बनाने के लिए उनका शिक्षित होना जरूरी है. इसी सोच के तहत नरेंद्र मोदी ने ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ को केवल एक नारे के रूप में नहीं, बल्कि बेटी के जीवन और शिक्षा को एक साझा सामाजिक लक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया.

नरेंद्र मोदी महिला सशक्तीकरण का एक ऐसा रोडमैप सामने रखते हैं, जिसमें व्यक्ति की क्षमता विकसित करने का सबसे बड़ा माध्यम शिक्षा है. अर्थात बालिकाओं की शिक्षा महिला सशक्तीकरण की बुनियादी शर्त है.

आर्थिक और कानूनी अधिकार महिलाओं को संसाधनों और अवसरों तक पहुंच प्रदान करने के माध्यम हैं, जबकि राजनीतिक आरक्षण संस्थागत निर्णय-निर्माण में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने का संवैधानिक उपाय है.

प्रयागराज सम्मेलन में ‘नारी शक्ति’ पर जोर

21 दिसंबर 2021 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रयागराज में एक महिला सशक्तीकरण सम्मेलन को संबोधित किया. अपने भाषण में उन्होंने महिलाओं की सुरक्षा, सम्मान और विकास से जुड़े प्रयासों का उल्लेख किया और ‘नारी शक्ति’ के विकास को लेकर विभिन्न घोषणाएं कीं.

इस कार्यक्रम में उन्होंने ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ अभियान को सामाजिक चेतना से जोड़ते हुए कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ जागरूकता और बेटियों की शिक्षा सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर जोर दिया. उन्होंने बालिकाओं के लिए विद्यालयों में शौचालय, छात्राओं की शिक्षा जारी रखने और सुकन्या समृद्धि योजना जैसी पहलों का भी उल्लेख किया.

राष्ट्रीय शिक्षा नीति में बालिका शिक्षा को प्राथमिकता

स्त्री शिक्षा और नारी सशक्तीकरण के प्रति नरेंद्र मोदी की दृष्टि का एक महत्वपूर्ण उदाहरण राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 के प्रावधानों में भी देखा जा सकता है. नीति में लैंगिक समानता, मानवाधिकार, सम्मान, विविधता और समावेशन को शिक्षा व्यवस्था का हिस्सा बनाने पर जोर दिया गया है.

राष्ट्रीय शिक्षा नीति में महिलाओं और बालिकाओं की शिक्षा को विशेष महत्व दिया गया है. महिलाओं को सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित समूहों यानी Socio-Economically Disadvantaged Groups (SEDGs) के महत्वपूर्ण घटक के रूप में देखा गया है. साथ ही लैंगिक समानता को शिक्षा व्यवस्था की प्राथमिकता के रूप में रेखांकित किया गया है.

Gender Inclusion Fund से समान शैक्षणिक अवसर का लक्ष्य

राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत लड़कियों और अन्य वंचित समूहों के लिए Gender Inclusion Fund का प्रावधान किया गया है. इसका उद्देश्य बालिकाओं और ट्रांसजेंडर विद्यार्थियों के लिए गुणवत्तापूर्ण और समान शिक्षा तक पहुंच को बढ़ावा देना है. 

नीति में सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित पृष्ठभूमि की बालिकाओं की शिक्षा के लिए Kasturba Gandhi Balika Vidyalayas (KGBVs) को मजबूत करने और लड़कियों की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा में भागीदारी बढ़ाने पर भी जोर दिया गया है. 

बालिका शिक्षा को केवल नामांकन तक सीमित नहीं मानना

हम जानते हैं कि गरीबी, अशिक्षा और भौगोलिक बाधाओं की सबसे बड़ी कीमत लड़कियों को चुकानी पड़ती है. राष्ट्रीय शिक्षा नीति में इस चुनौती पर विशेष बल दिया गया है. इसका उद्देश्य विद्यालय तक लड़कियों की पहुंच में मौजूद भौगोलिक, आर्थिक और सामाजिक बाधाओं को कम करना है.

दूरस्थ क्षेत्रों में विद्यालय, सुरक्षित परिवहन और छात्रावास जैसी सुविधाओं को विशेष महत्व दिया गया है. लड़कियों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए आवासीय सुविधाओं के विकास का भी उल्लेख है.

राष्ट्रीय शिक्षा नीति बालिका शिक्षा की समस्या को केवल ‘नामांकन’ की समस्या नहीं मानती, बल्कि access, participation, retention और quality जैसे सभी आयामों से जोड़ती है. इसी सोच के तहत KGBVs को मजबूत करने, उनका विस्तार करने और digital gender divide को कम करने जैसी पहलों पर जोर दिया गया है.

G20 में ‘Women-Led Development’ को वैश्विक विमर्श बनाना

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की G20 अध्यक्षता के दौरान ‘Women-Led Development’ को वैश्विक विमर्श में प्रमुखता मिली. इस दृष्टिकोण में महिलाओं के केवल विकास की बात नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण और निर्णय लेने की प्रक्रिया में उनकी अग्रणी भूमिका पर जोर दिया गया.

इस दौरान महिलाओं को अर्थव्यवस्था, कारोबार और नेतृत्व के पदों पर अवसर देने तथा राजनीति और प्रशासन के शीर्ष स्तर पर महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की आवश्यकता पर चर्चा हुई. सरकार ने भी महिला विकास से आगे बढ़कर ‘Women-Led Development’ की अवधारणा को अपनी नीतिगत भाषा का हिस्सा बनाया है. 

तीन तलाक के खिलाफ कानून और मुस्लिम महिलाओं के अधिकार

महिला अधिकारों के संदर्भ में नरेंद्र मोदी सरकार के कार्यकाल में तीन तलाक से संबंधित कानून भी एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में सामने आया. सरकार ने इसे मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों और कानूनी संरक्षण से जोड़कर प्रस्तुत किया.

इस कानून को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर अलग-अलग मत रहे हैं, लेकिन महिला अधिकारों से जुड़े विमर्श में तीन तलाक का मुद्दा नरेंद्र मोदी सरकार के प्रमुख विधायी कदमों में शामिल रहा है.

शिक्षा, अधिकार और प्रतिनिधित्व का आपस में संबंध

इस प्रकार हम पाते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शिक्षा, भाषा, महिला अधिकार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को आपस में अंतर्संबंधित माना है. उनके महिला सशक्तीकरण संबंधी विमर्श में शिक्षा को आधार, आर्थिक और कानूनी अधिकारों को अवसर का माध्यम तथा राजनीतिक प्रतिनिधित्व को निर्णय लेने की प्रक्रिया में भागीदारी के साधन के रूप में देखा जा सकता है. इन सभी मोर्चों पर एक साथ काम करने की आवश्यकता को उनकी नीतिगत सोच में प्रमुखता मिलती है.

एक मां की सीख से राष्ट्र निर्माण की सोच तक

एक स्त्री के रूप में मुझे ऐसा लगता है कि हमारी जो आवाज दशकों तक नहीं सुनी गई थी, उसे नरेंद्र मोदी के रूप में एक मंच मिला है.

हीराबेन के संस्कारों से निकली मातृ शक्ति की वह अनुभूति, जिसे युवा नरेंद्र मोदी ने ‘प्रेमतीर्थ’ की कहानियों में शब्द दिए थे, आज महिला शिक्षा, अधिकार, सुरक्षा, आर्थिक भागीदारी और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के विमर्श तक पहुंचती दिखाई देती है. यही यात्रा ‘हीराबेन के हीरा पुत्र नरेंद्र मोदी’ की उस सोच को रेखांकित करती है, जिसमें मातृ शक्ति केवल सम्मान की पात्र नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की सक्रिय भागीदार भी है.

अतिथि लेखिका: प्रोफेसर पायल मागो

(प्रोफेसर पायल मागो दिल्ली विश्वविद्यालय के कैंपस ऑफ ओपन लर्निंग (COL) की निदेशक और वह शहीद राजगुरु कॉलेज ऑफ एप्लाइड साइंसेज फॉर विमेन, दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रिंसिपल हैं. वे फैकल्टी ऑफ ओपन लर्निंग की डीन और डिपार्टमेंट ऑफ डिस्टेंस एंड कंटिन्यूइंग एजुकेशन की प्रमुख भी हैं. उनकी विशेषज्ञता वनस्पति विज्ञान (Botany) के क्षेत्र में है, जिसमें माइकोराइजा (Mycorrhizae), जैव-उपचार (Bioremediation) और विदेशी पौधों का आक्रमण (Exotic Plant Invasion) जैसे विषय शामिल हैं. उन्होंने बीएससी (ऑनर्स), एमएससी, एमफिल और पीएचडी  की पढ़ाई दिल्ली विश्वविद्यालय से की है. उनके नाम से कई शोध पत्र प्रकाशित हुए हैं, जिनमें पर्यावरण संरक्षण, फाइटोरेमेडिएशन (Phytoremediation), मशरूम और जैव विविधता (Biodiversity) जैसे विषय शामिल हैं.)