एक भारतीय के रूप में यह गर्व का क्षण है कि पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में भारत स्वेच्छा से कार्बन उत्सर्जन को कम करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
- सुधीर मिश्रा और सिमरन गुप्ता
(सुधीर मिश्रा Trust Legal Advocates & Consultants के फाउंडर और मैनेजिंग पार्टनर हैं. वहीं सिमरन गुप्ता Trust Legal Advocates & Consultants में अधिवक्ता और सहयोगी हैं.)
शर्म अल-शेख, जिसे 'शांति का शहर' कहा जाता है, वह दुनिया के लिए जलवायु न्याय और जलवायु इक्विटी के लिए आशा की किरण वाला शहर बन गया. दुनिया ने जलवायु मुआवजा कोष पर आम सहमति के लिए बहुत लंबा इंतजार किया है और कई गहन वार्ताओं और चर्चाओं के बाद, रविवार को मिस्र में लाल सागर रिसॉर्ट शहर में COP27 (पार्टियों का 27वां सम्मेलन) के परिणामस्वरूप एक हानि और क्षति निधि (L&D) के निर्माण के साथ एक ऐतिहासिक समझौते को सील कर दिया गया.
इस मिशन के लिए पिछले 30 सालों से लगातार प्रयास किया जा रहा था, लेकिन कुछ अमीर और विकसित देशों द्वारा लंबे समय तक इसमें बाधा उत्पन्न की गई, पर आखिरकार तमाम बाधाओं को पार करते हुए मिस्र में इस मिशन को COP27 में सफलतापूर्वक पूरा कर लिया गया.
मिस्र की वार्ताओं में 'पर्यावरण मुआवजा' की जो अवधारणा चर्चा का विषय बनी थी, वह दुनिया भर के कई देशों में पहले से ही एक बहुत ही स्थापित तंत्र है. भारत की ही बात कर लें तो पर्यावरण की रक्षा के लिए 1996 में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया गया था. सर्वोच्च न्यायालय ने पहली बार 'Polluter Pays Principle' को लागू किया, जिसमें कहा गया कि प्रदूषण के कारण पर्यावरण को होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए प्रदूषक ही पूरी तरह उत्तरदायी होगा.
सुप्रीम कोर्ट द्वारा लागू सिद्धांत में कहा गया कि प्रदूषक को न केवल प्रदूषण के शिकार लोगों को हुए नुकसान की भरपाई करनी होगी, बल्कि इससे होने वाले पर्यावरणीय नुकसान की बहाली के लिए भी क्षतिपूर्ति करनी होगी. इसके बाद, जलवायु मुआवजे की अवधारणा को वेल्लोर नागरिक कल्याण फोरम बनाम भारत संघ [(1996) 5 एससीसी 647] के फैसले में आगे परिभाषित और पुष्टि की गई कि भारत के पर्यावरण कानून के अंतर्गत प्रदूषक सिद्धांत के अनुसार भुगतान करने के लिए बाध्य है.
जलवायु मुआवजे की इसी अवधारणा के विस्तार के रूप में, पहली बार, वैश्विक स्तर पर एक समर्पित कोष के रूप में हानि और क्षति कोष बनाया जा रहा है, जिससे भविष्य में जलवायु संबंधी नुकसान और नुकसान से निपटने के लिए विकासशील देशों की मदद हो सके.
सामान्य लेकिन विभेदित जिम्मेदारियों (CBDR) की अवधारणा के आधार पर, 2015 के पेरिस समझौते में भी एक मौलिक सिद्धांत पर सहमति हुई थी कि अमीर देशों को जलवायु परिवर्तन से निपटने का बड़ा बोझ उठाना चाहिए, क्योंकि उन्होंने दशकों से अधिक ग्रीन-हाउस गैसों का उत्सर्जन किया है. इसका परिणाम विकासशील या अल्प विकसित देशों को भुगतना पड़ता है.
वास्तव में, रविवार को जलवायु न्याय के लिए मिस्र की घोषणा एक बड़ी उपलब्धि है, क्योंकि संयुक्त राज्य अमेरिका और कई अन्य अमीर देश मूल रूप से विकसित देशों द्वारा उच्च उत्सर्जन के कारण कमजोर देशों को मुआवजा देने के खिलाफ थे.
विकसित देश पर्यावरण के नुकसान के लिए अपनी जिम्मेदारी से दूर भागना चाहते थे, इसलिए COP27 में शामिल विकसित देश उच्च आय वाले देशों और चीन-भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं को शामिल करने पर जोर दे रहे थे. साथ ही वे लाभार्थियों में केवल सबसे कमजोर देशों तक ही सीमित करना चाहते थे.
इसी क्रम में विकासशील और विकसित देशों के बीच भेदभाव भी देखने को मिला. संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोपीय संघ चीन को इस तरह के किसी भी कोष में बड़े योगदानकर्ता बनने पर जोर दे रहे थे. उनका मानना है कि चीन दुनिया में सबसे बड़े मौजूदा उत्सर्जक और ग्रीन-हाउस गैस का दूसरे सबसे बड़ा उत्सर्जक है.
23 सदस्यों वाली एक समिति (विकसित देशों से 10 और विकासशील देशों से 13) अब इसके तौर-तरीकों पर फैसला करेगी और फंड और उसका भुगतान कैसे किया जाएगा, उसके सोर्स क्या रहेंगे, इस बारे में सवालों का जवाब देगी, जिसे नवंबर, 2023 में UAE में होने वाले COP28 में आगे माना जाएगा.
इसके अलावा, भारत के व्यावहारिक सुझावों द्वारा निर्देशित, COP27 ने सभी जीवाश्म ईंधनों को परिवर्तित करने पर भी सहमति व्यक्त की, न कि सिर्फ कोयले की. COP26 में इस सुझाव की कमी थी. इसे अमेरिका और यूरोपीय संघ सहित लगभग 80 देशों का समर्थन प्राप्त था, लेकिन कुछ विकसित देशों के तेल और गैस को शामिल करने के विरोध का भी सामना करना पड़ा. हालांकि यह समझौता विफल हो गया और इसमें सभी जीवाश्म ईंधन पर एक एक राय नहीं बन पाई, जैसा कि भारत और कई अन्य देशों द्वारा इसे प्रस्तावित किया गया था.
COP27 का टैगलाइन - कार्यान्वयन के लिए एक साथ (Together for implementation) शुरू में इस बात पर ध्यान केंद्रित करना था कि प्रतिबद्धताएं वास्तविकता में कैसे परिवर्तित होंगी. कई लोग COP27 पर विचार कर रहे हैं और इसे भारत के दृष्टिकोण से 'एक चूका हुआ अवसर' कह रहे हैं. आपको बता दें कि इस जीत में COP27 का स्थायी जीवन शैली मिशन का समर्थन और ऊर्जा संक्रमण के संबंध में एक खंड शामिल है, जो विशेष जीवाश्म ईंधन को अलग नहीं करता है.
एक भारतीय के रूप में यह गर्व का क्षण है कि पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में भारत स्वेच्छा से कार्बन उत्सर्जन को कम करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, सभी जीवाश्म ईंधन का त्याग कर रहा है, गैर-पारंपरिक ऊर्जा को नहीं अपना रहा है और मिस्र में इस बात पर जोर दे रहा है कि हमारे ग्रह के पास अब और धैर्य नहीं है.
Disclaimer: ऊपर दिए गए लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखकों के हैं और जरूरी नहीं कि वे इस पब्लिशिंग हाउस के विचारों का प्रतिनिधित्व करते हों. लेखक ने यह लेख अपनी व्यक्तिगत क्षमता के अनुसार लिखा है. उनका बिल्कुल ऐसा इरादा नहीं है कि वे किसी एजेंसी या संस्था के आधिकारिक विचारों, दृष्टिकोणों या नीतियों का प्रतिनिधित्व कर रहे हों.
जैसे-जैसे भारत विकास के अगले चरण में प्रवेश कर रहा है, टाटा यह दिखाने का एक शक्तिशाली मॉडल प्रस्तुत करता है कि भरोसा, ज्ञान और जिम्मेदारी पीढ़ियों के बीच कैसे बढ़ सकते हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
एक विकसित भारत को ऐसी संस्थाओं की जरूरत होगी, जिनका दृष्टिकोण चुनावी चक्र, कमाई के चक्र और उनके संस्थापकों के जीवनकाल से भी आगे तक हो. टाटा ऐसी संस्था बनाने का एक अनूठा भारतीय प्रयास है, जो आज भी कायम है.
बहुत से लोग टाटा की विरासत का जश्न मनाते हैं, लेकिन भविष्य में इसकी भूमिका को नजरअंदाज कर देते हैं. एक संस्था के रूप में इसकी विशिष्टता ही इसे भारत के लिए महत्वपूर्ण बनाती है, जिसे केवल परोपकारी सोच रखने वाली सफल कंपनियों से अधिक की जरूरत है. भारत को मजबूत निजी संस्थानों की जरूरत है.
जैसे-जैसे हमारा देश समृद्ध होता जा रहा है, यह अंतर और स्पष्ट होता जा रहा है. विकास की परिचित कहानी है- कारखाने बनाना, पूंजी आकर्षित करना, श्रमिकों को शिक्षित करना, अर्थव्यवस्था को डिजिटल बनाना, उत्पादकता बढ़ाना आदि. हालांकि, किसी मूल्य सृजक की वास्तविक संस्थागत प्रतिष्ठा कुछ सवालों के जवाबों से सामने आती है.
-कौन अगली तिमाही, साल या दशक से आगे सोचने के लिए भरोसेमंद है?
-जब कोई देख नहीं रहा हो, तब मानकों को कौन बनाए रखता है?
-कौन पीढ़ियों के बीच ज्ञान को संचित करता है?
-कौन सत्ता अपने पास रखता है, लेकिन सत्ता को साधन मानता है, लक्ष्य नहीं?
टाटा इसी आधार पर अपना महत्व अर्जित करता है. जहां पारंपरिक विवरण समूह को परोपकार के नजरिए से देखते हैं और यह वास्तव में एक उल्लेखनीय कहानी है, वहीं टाटा को केवल परोपकार तक सीमित कर देना उसकी बड़ी विरासत को नजरअंदाज करना है, जो वास्तव में संस्थागत प्रकृति की है.
जमशेदजी टाटा ने एक सदी से भी अधिक समय पहले यही बात कही थी. उन्होंने जिसे “पैबंद लगाने वाला परोपकार” कहा, उसे राष्ट्र निर्माण के गहरे कार्य से अलग करते हुए तर्क दिया था कि “जो किसी राष्ट्र या समुदाय को आगे बढ़ाता है.. वह सर्वश्रेष्ठ और सबसे प्रतिभाशाली लोगों को ऊपर उठाना है, ताकि वे देश की सबसे बड़ी सेवा कर सकें.”
जिस अर्थ में उन्होंने इसे कहा था, उस रूप में देखें तो यह लीवरेज का एक सिद्धांत बताता है. एक छात्रवृत्ति एक जीवन बदलती है, जबकि एक महान संस्था यह बदल देती है कि कोई देश क्या कर सकता है.
आधुनिक आर्थिक इतिहास का केंद्रीय सबक भी इसी तर्क से मेल खाता है. समृद्ध समाज केवल पूंजी से नहीं, बल्कि उन संस्थाओं से उभरते हैं जो पूंजी को उत्पादक बनाती हैं, जैसे विश्वविद्यालय, कानून और संपत्ति के अधिकार, जो ज्ञान और भरोसे को किसी एक जीवनकाल से आगे बढ़ने देते हैं. जब 2024 का अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार डैरोन एसमोग्लू, साइमन जॉनसन और जेम्स रॉबिन्सन को दिया गया, तो इसने इसी खोज को सम्मानित किया- कि समृद्धि उन संस्थाओं के बाद आती है, जिन्हें कोई समाज बनाता है.
टाटा संस्थागत पूंजी का एक अनूठा भारतीय उदाहरण है. जमशेदजी केवल संपत्ति से अधिक चाहते थे, क्योंकि औद्योगीकरण के लिए उन क्षमताओं की जरूरत थी जिनकी भारत में कमी थी और उनकी महत्वाकांक्षाएं इस्पात और बिजली से लेकर विज्ञान और शिक्षा तक फैली हुई थीं. अनुसंधान के लिए उनके दृष्टिकोण ने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया, जबकि बाद की पीढ़ियों में ट्रस्टों ने TISS, TIFR और टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल के निर्माण में मदद की. संपत्ति ऐसी संस्थाओं में बदल गई, जो ज्ञान और सार्वजनिक क्षमता का निर्माण करती हैं.
यह केवल संचय से अलग पूंजीवाद की एक अलग अवधारणा है. एक अस्पताल मरीजों का इलाज करता है, जबकि एक शोध संस्थान यह बदल देता है कि पूरा देश क्या खोज सकता है. टाटा की कहानी क्षमता के लगातार बढ़ने की कहानी है.
टाटा का विशिष्ट कदम संस्थागत चरित्र को ही एक आर्थिक संपत्ति बनाना रहा है. टाटा कंपनियां टाटा नाम का उपयोग करने के लिए रॉयल्टी देती हैं. दूसरे शब्दों में, भरोसा इनवॉइस पर दर्ज है. संस्थापक ने इसी विचार को सरल शब्दों में रखा था. “एक मुक्त उद्यम में, समुदाय व्यवसाय में केवल एक अन्य हितधारक नहीं है, बल्कि वास्तव में उसके अस्तित्व का मूल उद्देश्य है.”
इन शब्दों को कॉरपोरेट दीवार पर लिखे किसी संदेश की तरह देखना आसान है. असली परीक्षा तब होती है, जब ऐसे सिद्धांत महंगे साबित होते हैं. किसी संस्था का उद्देश्य यही है कि उसे चलाने वाले व्यक्ति के स्वभाव से वह आगे तक कायम रहे, चाहे कुर्सी पर कोई भी बैठा हो और मेज के आसपास कोई भी मौजूद हो.
ट्रस्ट की संरचना इस जिम्मेदारी को सोच-समझकर निभाने के लिए मौजूद है. स्थायी सिद्धांत तभी कायम रहते हैं, जब हर पीढ़ी उन्हें संहिताबद्ध करने, उनकी रक्षा करने और उनकी कीमत वहन करने का विकल्प चुनती है. यह अनुशासन महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत विकास के ऐसे चरण में प्रवेश कर रहा है, जहां संस्थाओं का महत्व और बढ़ जाता है.
एक गरीब राष्ट्र कभी-कभी असाधारण रूप से सदाचारी व्यक्तियों के जरिए कमजोर संस्थाओं की कमी को पूरा कर सकता है. 1.4 अरब लोगों वाला देश, जहां अनगिनत महत्वपूर्ण फैसले लिए जाते हैं, उसे मजबूत संस्थाओं पर निर्भर रहना होगा.
भारत को ऐसी कंपनियों की जरूरत होगी जो दशकों और सदियों के बारे में सोचें, ऐसे विश्वविद्यालयों की जरूरत होगी जो पीढ़ियों के बारे में सोचें और ऐसे सार्वजनिक निकायों की जरूरत होगी जो मौजूदा सरकार से आगे की सोच रखें.
कोई समाज तब महान बनता है जब उसके बुजुर्ग ऐसे पेड़ लगाते हैं, जिनकी छाया में बाद की पीढ़ियां आराम कर सकें. टाटा अकेले इसका एक हिस्सा उपलब्ध करा सकता है, लेकिन वह एक कंपनी है, राज्य का विकल्प नहीं. वह जो कर सकता है, वह यह दिखाना है कि भारतीय पूंजीवाद क्या बन सकता है- ऐसा उद्यम जो धन के साथ-साथ पीढ़ियों के बीच भरोसा, ज्ञान, मानक और जिम्मेदारी भी संचित करता है.
एडमंड बर्क ने समाज को उन लोगों के बीच साझेदारी के रूप में परिभाषित किया था जो जीवित हैं, जो मर चुके हैं और जो पैदा होने वाले हैं. यही विकसित देशों की वास्तविक विरासत है. उनकी संस्थाओं का उपयोगी जीवन उन लोगों के जीवनकाल से अधिक होता है, जिन्होंने उन्हें बनाया.
भारत का अगला परिवर्तन संस्थागत मजबूती के आधार पर निर्मित होगा. टाटा का सबसे गहरा मूल्य भारत द्वारा संस्थाओं के निर्माण के एक उदाहरण के रूप में है. इनमें टाटा सबसे पुराना, सबसे अधिक निगरानी में रहने वाला और सबसे अधिक प्रशंसित संस्थान है.
अतिथि लेखक: शुभ्रांशु सिंह
(शुभ्रांशु सिंह एक बिजनेस लीडर, सांस्कृतिक रणनीतिकार और स्तंभकार हैं. उन्हें फोर्ब्स द्वारा 2025 के लिए दुनिया के 50 सबसे प्रभावशाली ग्लोबल CMO में से एक के रूप में सम्मानित किया गया है. वह Effie LIONS Foundation के बोर्ड में APAC प्रतिनिधि के रूप में कार्य करते हैं.)
लेखक डॉ. एसएस मंथा लिखते हैं, भारत को परीक्षा सुरक्षा की व्यवस्था को व्यक्तिगत ईमानदारी की धारणाओं के बजाय मजबूत प्रणालियों के आधार पर फिर से डिजाइन करने की जरूरत है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
परीक्षा केवल सवालों का एक प्रश्नपत्र नहीं होती, बल्कि यह लाखों छात्रों के भविष्य से जुड़ी होती है. छात्र इस भरोसे के साथ परीक्षा देते हैं कि उनकी मेहनत, तैयारी और क्षमता के आधार पर ही उनका भविष्य तय होगा. इसी परीक्षा के जरिए उन्हें कॉलेज में दाखिला, नौकरी या करियर में आगे बढ़ने का मौका मिलता है. ऐसे में जब किसी परीक्षा का पेपर लीक होता है, तो छात्रों का भरोसा टूटता है और उनकी मेहनत पर सवाल खड़े हो जाते हैं.
लेकिन पेपर लीक होने के बाद अक्सर हर बार लगभग एक जैसी कार्रवाई होती है. जांच शुरू होती है, कुछ गिरफ्तारियां होती हैं, परीक्षा रद्द या स्थगित कर दी जाती है और छात्र विरोध करते हैं. कुछ समय बाद मामला शांत हो जाता है, लेकिन फिर किसी दूसरी परीक्षा में पेपर लीक की खबर सामने आ जाती है. असली समस्या यह है कि हम सिर्फ यह पता लगाने पर ध्यान देते हैं कि पेपर किसने लीक किया. हमें यह भी समझना होगा कि परीक्षा व्यवस्था में ऐसी कौन सी कमियां हैं, जिनकी वजह से पेपर लीक होना संभव हो रहा है. इसलिए सवाल सिर्फ ‘पेपर किसने लीक किया?’ नहीं, बल्कि ‘पेपर लीक होने से रोकने के लिए व्यवस्था में क्या बदलाव किए जाने चाहिए?’ भी होना चाहिए.
यही सवाल सब कुछ बदल देता है.
दशकों से परीक्षा प्रणालियां काफी हद तक भौतिक प्रश्नपत्रों, सीलबंद लिफाफों, परिवहन नेटवर्क और कई स्तरों पर मानवीय हस्तक्षेप पर निर्भर रही हैं. वहीं, संगठित नकल और गड़बड़ी के तरीके लगातार अधिक उन्नत और तकनीक-सक्षम होते गए हैं. इसका जवाब केवल मैनुअल जांच की एक और परत जोड़ना नहीं हो सकता. भारत को परीक्षा इकोसिस्टम को ‘सिक्योरिटी बाय डिजाइन’ के सिद्धांत पर फिर से तैयार करने की जरूरत है.
एक अलग मॉडल की कल्पना कीजिए. अंतिम प्रश्नपत्र परीक्षा शुरू होने से काफी पहले तैयार होकर मौजूद रहने की जरूरत नहीं है. इसके बजाय, एक अत्यंत सुरक्षित रिपॉजिटरी में एन्क्रिप्टेड प्रश्नों का एक बड़ा पूल रखा जा सकता है. एक सुरक्षित प्रणाली पूर्व निर्धारित ब्लूप्रिंट के आधार पर परीक्षा शुरू होने से कुछ समय पहले प्रश्नपत्र तैयार कर सकती है, जिसमें लर्निंग आउटकम, कठिनाई स्तर और संज्ञानात्मक कौशल शामिल हों. अलग-अलग केंद्रों या सत्रों के लिए समान स्तर के कई प्रश्नपत्र भी तैयार किए जा सकते हैं.
यह दिशा पूरी तरह नई नहीं है. नेशनल टेस्टिंग एजेंसी यानी NTA पहले बड़े और इंडेक्स्ड प्रश्न बैंक बनाने की योजना बता चुकी है, जिनसे वैज्ञानिक रूप से तैयार ब्लूप्रिंट और एल्गोरिद्म के जरिए प्रश्नपत्र तैयार किए जा सकें. अगला कदम ऐसे मॉडलों को और मजबूत सुरक्षा नियंत्रणों तथा जहां उपयुक्त हो, सावधानीपूर्वक नियंत्रित AI-सहायता प्राप्त प्रश्न निर्माण और सत्यापन के साथ विकसित करना होगा.
ऐसी प्रणाली पेपर लीक की पूरी अर्थव्यवस्था बदल सकती है. यदि अंतिम प्रश्नपत्र परीक्षा से ठीक पहले तैयार किया जाए, तो कई दिन या हफ्ते पहले प्रश्नपत्र हासिल करने का महत्व काफी कम हो जाएगा. यदि कोई एक प्रश्न समझौता किए जाने की स्थिति में हो, तो उसे समान कठिनाई और क्षमता वाले दूसरे प्रश्न से बदला जा सकता है. उद्देश्य केवल लीक को कठिन बनाना नहीं, बल्कि उसे काफी हद तक बेकार बना देना होना चाहिए.
यही सिद्धांत प्रश्नपत्रों के वितरण को भी बदल सकता है. देशभर में भौतिक प्रश्नपत्र भेजने के बजाय, एन्क्रिप्टेड परीक्षा पैकेज सुरक्षित तरीके से अधिकृत केंद्रों तक पहुंचाए जा सकते हैं और परीक्षा से कुछ समय पहले ही खोले जा सकते हैं. इन तक पहुंच केवल निर्धारित डिवाइस और स्थानों तक सीमित की जा सकती है तथा उपयोग के बाद इसे स्वतः निष्क्रिय किया जा सकता है. डिजिटल वॉटरमार्क और फॉरेंसिक पहचानकर्ता प्रिंट की गई प्रतियों को भी उनके स्रोत तक ट्रेस करने में मदद कर सकते हैं.
सुरक्षा परीक्षा केंद्र तक भी विस्तारित होनी चाहिए. जहां कानूनी और नैतिक रूप से उचित हो, वहां उम्मीदवारों की पहचान के लिए सुरक्षित डिजिटल क्रेडेंशियल्स और बायोमेट्रिक्स का संयोजन किया जा सकता है. कंप्यूटर विजन और अन्य मॉनिटरिंग तकनीक असामान्य गतिविधियों, अनधिकृत संचार या संदिग्ध वस्तुओं की पहचान कर उन्हें मानव समीक्षा के लिए चिह्नित कर सकती हैं. इसका उद्देश्य मानवीय निगरानी को मशीनों से बदलना नहीं होना चाहिए. तकनीक को निगरानी की एक अतिरिक्त परत के रूप में काम करना चाहिए, जिससे निरीक्षक उन स्थितियों पर ध्यान केंद्रित कर सकें जहां वास्तव में हस्तक्षेप की जरूरत हो.
रेडियो-फ्रीक्वेंसी डिटेक्शन और सिग्नल मॉनिटरिंग जैसी अन्य तकनीकें भी छिपे हुए इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के खिलाफ अतिरिक्त सुरक्षा प्रदान कर सकती हैं, हालांकि इनका उपयोग गोपनीयता, अनुपातिकता और कानूनी आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए किया जाना चाहिए.
यहां तक कि सीटिंग और निरीक्षकों की नियुक्ति जैसी सामान्य प्रक्रियाओं को भी नए सिरे से डिजाइन किया जा सकता है. सुरक्षित प्रणालियां उम्मीदवारों और निरीक्षकों का रैंडम आवंटन कर सकती हैं, डायनेमिक सीटिंग प्लान तैयार कर सकती हैं और उन पूर्वानुमानित पैटर्न को कम कर सकती हैं जो संगठित गड़बड़ी को बढ़ावा देते हैं. डिजिटल उपस्थिति और उपयुक्त पहचान सत्यापन जवाबदेही को और मजबूत कर सकते हैं.
हालांकि, सुरक्षा की यह श्रृंखला परीक्षा समाप्त होने के साथ खत्म नहीं होनी चाहिए. उत्तर पुस्तिकाओं की भी एक ऑडिट योग्य पहचान होनी चाहिए. बारकोड या QR कोड के जरिए परीक्षा केंद्र से मूल्यांकन स्थल तक उत्तर पुस्तिकाओं को ट्रैक किया जा सकता है. छेड़छाड़ के प्रमाण देने वाले कंटेनर, सुरक्षित लॉजिस्टिक्स और डिजिटल चेन-ऑफ-कस्टडी रिकॉर्ड यह स्थापित कर सकते हैं कि उत्तर पुस्तिका को किसने और कब संभाला.
मूल्यांकन भी सुधार का एक बड़ा अवसर प्रदान करता है. डिजिटाइज्ड उत्तर पुस्तिकाओं का गुमनाम तरीके से मूल्यांकन किया जा सकता है, जबकि सांख्यिकीय प्रणालियां असामान्य अंक देने के पैटर्न, परीक्षकों के बीच अंतर और अन्य विसंगतियों की पहचान कर सकती हैं, जिनकी मानव स्तर पर जांच की जरूरत हो. इसका मतलब मशीनों को छात्रों का भविष्य तय करने की अनुमति देना नहीं है. इसका अर्थ है ऐसी तकनीक का उपयोग करना जो उन पैटर्न की पहचान कर सके जिन्हें पारंपरिक जांच नजरअंदाज कर सकती है और इससे निष्पक्षता तथा एकरूपता को मजबूत किया जा सके.
एक छेड़छाड़-रोधी डिजिटल लेजर में प्रश्न तैयार करने और प्रश्नपत्र जनरेट करने से लेकर उपस्थिति, मूल्यांकन और परिणाम घोषित करने तक की महत्वपूर्ण घटनाओं को दर्ज किया जा सकता है. ब्लॉकचेन ऐसी व्यवस्था के लिए एक संभावित तकनीक हो सकती है, लेकिन इसे अपने आप में समाधान नहीं माना जाना चाहिए. प्राथमिकता ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जो ऑडिट योग्य, एक्सेस-कंट्रोल्ड और महत्वपूर्ण परीक्षा गतिविधियों के लिए स्वतंत्र रूप से सत्यापन योग्य रिकॉर्ड प्रदान करे.
इसके बाद AI का उपयोग परीक्षा डेटा में संदिग्ध समानताओं, नकल के समूहों, असामान्य अंकों और अन्य पैटर्न की पहचान के लिए किया जा सकता है. लेकिन इन प्रणालियों को भी परीक्षण, मानवीय निगरानी, गोपनीयता सुरक्षा और स्पष्ट जवाबदेही के दायरे में रखना होगा. जिम्मेदार AI ढांचे इस बात पर जोर देते हैं कि AI सिस्टम को स्वाभाविक रूप से भरोसेमंद मानने के बजाय उसके पूरे जीवनचक्र के दौरान नियंत्रित, मापा और प्रबंधित किया जाना चाहिए.
हालांकि, केवल तकनीक ही परीक्षाओं को सुरक्षित नहीं बना सकती. कमजोर प्रशासन के साथ कोई भी उन्नत प्रणाली विफल हो सकती है. परीक्षा प्राधिकरणों को ‘जीरो ट्रस्ट’ सिद्धांत, मल्टी-फैक्टर ऑथेंटिकेशन, विशेषाधिकारों का कड़ा प्रबंधन, लगातार सुरक्षा परीक्षण और समर्पित सुरक्षा संचालन क्षमताओं की जरूरत है. महत्वपूर्ण कार्यों के लिए दोहरी मंजूरी अनिवार्य होनी चाहिए, जबकि विशेषाधिकार प्राप्त और अंदरूनी गतिविधियों की लगातार निगरानी और ऑडिट किया जाना चाहिए.
इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि प्रत्येक परीक्षा प्राधिकरण के पास एक विश्वसनीय इंसिडेंट-रिस्पॉन्स सिस्टम होना चाहिए. यदि किसी तरह की सुरक्षा चूक का पता चलता है, तो वैकल्पिक प्रश्नपत्र को तुरंत सक्रिय किया जा सके. जरूरत पड़ने पर प्रभावित केंद्र को अलग किया जाए, डिजिटल फॉरेंसिक जांच शुरू हो और उम्मीदवारों को पारदर्शी तरीके से जानकारी दी जाए. किसी सुरक्षा प्रणाली का आकलन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि वह हमले को रोकने में कितनी सक्षम है, बल्कि इस आधार पर भी कि वह पूरे परीक्षा तंत्र को ठप किए बिना ऐसी घटना को नियंत्रित करने में कितनी सक्षम है.
भविष्य की परीक्षा सुरक्षा इससे भी आगे जा सकती है. कॉन्फिडेंशियल कंप्यूटिंग प्रोसेसिंग के दौरान संवेदनशील जानकारी की सुरक्षा में मदद कर सकती है, जबकि नई क्रिप्टोग्राफिक तकनीकें दीर्घकालिक सुरक्षा को मजबूत कर सकती हैं. बिहेवियरल बायोमेट्रिक्स, कंप्यूटर विजन, डिजिटल वॉटरमार्किंग और सिमुलेशन तकनीकें सुरक्षा की अतिरिक्त परत प्रदान कर सकती हैं, लेकिन प्रत्येक तकनीक को उसकी सुरक्षा, सटीकता, गोपनीयता और अनुपातिकता का आकलन करने के बाद ही लागू किया जाना चाहिए.
इसलिए भारत को किसी एक अलग-थलग तकनीकी परियोजना की नहीं, बल्कि साझा मानकों, स्वतंत्र सुरक्षा ऑडिट, साइबर सुरक्षा प्रमाणन, स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर और निरंतर प्रशिक्षण से समर्थित एक राष्ट्रीय डिजिटल परीक्षा सुरक्षा आर्किटेक्चर की जरूरत है.
वास्तविक बदलाव तब आएगा जब परीक्षा सुरक्षा मुख्य रूप से व्यक्तियों की ईमानदारी पर निर्भर रहने के बजाय प्रणालियों की विश्वसनीयता पर आधारित होगी.
भारत असाधारण स्तर पर परीक्षाएं आयोजित करता है, जिनमें देशभर के लाखों उम्मीदवार और हजारों परीक्षा केंद्र शामिल होते हैं. उदाहरण के तौर पर, NTA ने हजारों केंद्रों और कई शहरों में परीक्षाएं आयोजित की हैं, जो इस व्यवस्था के विशाल परिचालन स्तर को दर्शाता है. इतने बड़े इकोसिस्टम में मुख्य रूप से मैनुअल सुरक्षा मॉडल की सीमाएं स्पष्ट हैं.
बदलाव के लिए जरूरी तकनीकें अलग-अलग रूपों में पहले से मौजूद हैं. अब जरूरत इन्हें एक समन्वित और स्वतंत्र रूप से ऑडिट की जाने वाली सुरक्षा व्यवस्था में शामिल करने के लिए संस्थागत साहस की है.
अब सवाल यह नहीं है कि पेपर लीक को कम किया जा सकता है या नहीं. सवाल यह है कि क्या हम ऐसी परीक्षा प्रणाली बनाने के लिए तैयार हैं, जिसमें पेपर लीक करना तकनीकी रूप से कठिन, संचालन के लिहाज से निरर्थक और तुरंत ट्रेस किए जाने योग्य हो.
Gen Z इससे कम की हकदार नहीं है. उसे ऐसी परीक्षा व्यवस्था मिलनी चाहिए जिसमें योग्यता अवसरों का निर्धारण करे, संदेह की जगह भरोसा ले और प्रक्रिया के हर चरण में ईमानदारी को व्यवस्था का हिस्सा बनाया जाए.
भविष्य की परीक्षा केवल पेपरलेस नहीं होनी चाहिए. वह पेपर लीक के प्रति प्रतिरोधी, पारदर्शी और उस भरोसे के योग्य होनी चाहिए जो लाखों छात्र उस पर करते हैं.
अतिथि लेखक: डॉ. एसएस मंथा
(लेखक AICTE के पूर्व अध्यक्ष और आरबी यूनिवर्सिटी, नागपुर के चांसलर हैं.)
ज्योतिषाचार्य विक्रम चन्दीरमानी कहते हैं कि मेष राशि में शनि का प्रवेश नई शुरुआत का संकेत देता है. उनके अनुसार, उतार-चढ़ाव और उथल-पुथल के दौर के बाद नए राजनीतिक समीकरण उभर सकते हैं, जो धीरे-धीरे मजबूत होते जाएंगे.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
हम इतिहास के एक निर्णायक मोड़ से गुजर रहे हैं. कुछ ही साल पहले जो राजनीतिक निश्चितताएं मजबूती से स्थापित नजर आती थीं, वे अब कमजोर पड़ने लगी हैं, जबकि नए आंदोलन, नेता और राजनीतिक प्रभाव के नए स्रोत उल्लेखनीय तेजी से उभर रहे हैं. एक युवा पीढ़ी अधिक मुखर हो रही है, पारंपरिक संस्थाओं को चुनौती दी जा रही है और सोशल मीडिया ने यह पूरी तरह बदल दिया है कि किस तेजी से जनता का गुस्सा गति पकड़ सकता है और राजनीतिक दबाव में बदल सकता है. इस तरह के बदलाव आमतौर पर किसी एक चुनाव, विरोध प्रदर्शन या नेतृत्व परिवर्तन के जरिए नहीं होते. वे घटनाओं की एक श्रृंखला के माध्यम से सामने आते हैं, जो अलग-अलग देखने पर भले ही असंबंधित लगें, लेकिन सामूहिक रूप से यह संकेत देते हैं कि पुरानी राजनीतिक व्यवस्था किसी नई व्यवस्था के लिए जगह बनाना शुरू कर रही है. मेरा मानना है कि भारत अब ऐसे ही एक दौर में प्रवेश कर रहा है.
बिजनेस वर्ल्ड के लिए अपने दिसंबर 2025 के पूर्वानुमान में मैंने जेन जेड विरोध प्रदर्शनों के उभार की भविष्यवाणी की थी और जुलाई तथा अगस्त 2026 को विशेष रूप से महत्वपूर्ण अवधि बताया था. जून 2026 में मैंने X पर यह भी अनुमान लगाया था कि कुछ विरोध प्रदर्शन हिंसक हो सकते हैं. मैंने यह भी लिखा था कि कुछ राजनीतिक नेता पद छोड़ सकते हैं या उनका प्रभाव कम हो सकता है, जबकि नए नेता और राजनीतिक ताकतें उभरेंगी और कुछ मौजूदा नेताओं का प्रभाव और बढ़ेगा.
कॉकरोच जनता पार्टी का अप्रत्याशित उभार इसी व्यापक पैटर्न में फिट बैठता है. जंतर-मंतर पर उसके विरोध प्रदर्शनों के बाद धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हुआ - NDA सरकार के 12 वर्षों के दौरान मंत्रिस्तरीय इस्तीफे का एक दुर्लभ मामला. यह कोई अलग-थलग घटना नहीं है. यह एक बड़े राजनीतिक चक्र का हिस्सा है. आने वाले समय में इस तरह के और विरोध प्रदर्शन होने की संभावना है. इनके कारण जरूरी नहीं कि एक जैसे हों. नए मुद्दे, शिकायतें और टकराव के बिंदु सामने आएंगे, जो अधिक लोगों को सड़कों पर लाएंगे और नई राजनीतिक ताकतों तथा नेताओं को जन्म देंगे. सोशल मीडिया इन आंदोलनों को बढ़ावा देने, लोगों को तेजी से संगठित करने और स्थानीय या किसी खास मुद्दे से जुड़े विरोध प्रदर्शनों को असाधारण तेजी से राष्ट्रीय पहचान दिलाने में निर्णायक भूमिका निभाएगा. सामूहिक रूप से, ये धाराएं आने वाले वर्षों में भारतीय राजनीति की दिशा बदल सकती हैं.
ज्योतिषीय दृष्टि से यह समय शनि के चक्र में एक महत्वपूर्ण बदलाव के साथ मेल खाता है. शनि पूरे 2026 में मीन राशि में रहेगा और जून 2027 में पहली बार मेष राशि में प्रवेश करेगा. उस वर्ष बाद में संक्षिप्त अवधि के लिए वक्री होकर वापस मीन राशि में जाने के बाद, फरवरी 2028 में यह फिर से मेष राशि में लौटेगा और उस गोचर के मुख्य चरण की शुरुआत करेगा, जो 2029 तक जारी रहेगा. मेष राशि में शनि नई शुरुआत का संकेत देता है - उतार-चढ़ाव और विघटन के दौर के बाद नए राजनीतिक संतुलन का उभरना और धीरे-धीरे मजबूत होना.
भारत ने यह पैटर्न पहले भी देखा है. 1998 में शनि ने मेष राशि में प्रवेश किया था. इसके अगले वर्ष, अस्थिर गठबंधन सरकारों के लंबे दौर के बाद, अटल बिहारी वाजपेयी ने 1999 के आम चुनाव में एक स्थिर जनादेश हासिल किया. आजादी के बाद पहली बार किसी गैर-कांग्रेस सरकार ने अपना पूरा पांच साल का कार्यकाल पूरा किया. किसी का भी राजनीतिक दृष्टिकोण कुछ भी हो, लेकिन वह दौर केवल एक पार्टी की सफलता से कहीं अधिक था. मेष राशि में शनि के दौरान, इसने वर्षों की अनिश्चितता के बाद एक अलग राजनीतिक संतुलन के उभरने का संकेत दिया.
इससे भी पीछे जाएं तो 1960 के दशक के अंत और 1970 के दशक की शुरुआत में ऐसा ही बदलाव देखने को मिला, जब शनि फिर से मेष राशि में था. 1969 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का विभाजन आजादी के बाद भारत की प्रमुख सत्तारूढ़ पार्टी का पहला बड़ा औपचारिक विभाजन था. यह प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और पार्टी के पुराने नेतृत्व, जिसे सिंडिकेट के नाम से जाना जाता था, के बीच लंबे समय से चल रहे सत्ता संघर्ष का परिणाम था. 1966 में लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु के बाद प्रधानमंत्री बनने वाली इंदिरा गांधी को के. कामराज, एस. निजलिंगप्पा, मोरारजी देसाई और एस.के. पाटिल सहित संगठन के वरिष्ठ नेताओं के साथ बढ़ते मतभेदों का सामना करना पड़ा. 1967 के चुनावों के बाद तनाव और बढ़ गया. निर्णायक मोड़ 1969 के राष्ट्रपति चुनाव के दौरान आया. सिंडिकेट ने नीलम संजीव रेड्डी का समर्थन किया, जबकि इंदिरा ने वी.वी. गिरि का समर्थन किया और अंतरात्मा की आवाज पर मतदान करने की अपील की. गिरि की जीत, इसके बाद बैंकों के राष्ट्रीयकरण और प्रिवी पर्स समाप्त करने की पहल ने मतभेदों को और गहरा कर दिया. 12 नवंबर 1969 को इंदिरा को पार्टी से निष्कासित कर दिया गया. उनके समर्थकों ने इस निष्कासन को स्वीकार करने से इनकार कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप दो प्रतिद्वंद्वी संगठन बने - इंदिरा के नेतृत्व में कांग्रेस (R) और पुराने नेतृत्व के अधीन कांग्रेस (O). इंदिरा के गुट ने बाद में 1 से 10 मार्च 1971 के बीच हुए आम चुनावों में 'गरीबी हटाओ' के नारे के साथ भारी जीत हासिल की. इस निर्णायक चुनावी जीत के समय शनि मेष राशि में था. इस विभाजन ने कांग्रेस को क्षेत्रीय नेताओं के प्रभुत्व वाली एक व्यापक संगठनात्मक पार्टी से बदलकर एक अधिक केंद्रीकृत और व्यक्तित्व आधारित राजनीतिक ताकत में बदल दिया.
इससे भी पहले, 1937-1942 का दौर एक और महत्वपूर्ण समानांतर प्रस्तुत करता है. भारत सरकार अधिनियम 1935 के तहत हुए 1936-37 के प्रांतीय चुनावों ने प्रांतीय स्वायत्तता की शुरुआत की और मतदाताओं के दायरे का नाटकीय रूप से विस्तार किया. कांग्रेस ने 11 में से आठ प्रांतों में सरकारें बनाईं और शासन का अपना पहला महत्वपूर्ण अनुभव हासिल किया. इन सरकारों ने सुधार लागू किए और प्रशासनिक क्षमता का प्रदर्शन किया, लेकिन साथ ही सांप्रदायिक तनाव भी बढ़े. मई 1939 में शनि ने मेष राशि में प्रवेश किया. जब ब्रिटेन ने भारत से बिना परामर्श किए उसे द्वितीय विश्व युद्ध में शामिल घोषित कर दिया, तो कांग्रेस ने अक्टूबर और नवंबर 1939 के बीच विरोध में अपनी सरकारों से इस्तीफा दे दिया - यह एक ऐसा राजनीतिक रुख था जिसमें सत्ता बनाए रखने के बजाय आजादी की मांग को प्राथमिकता दी गई और यह फैसला उस समय लिया गया जब शनि मेष राशि में था. इसके बाद के वर्षों में व्यक्तिगत सत्याग्रह, क्रिप्स मिशन की विफलता और 8 अगस्त 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत हुई. इस दौर ने कांग्रेस की दोहरी क्षमता को सामने रखा - अवसर मिलने पर शासन करने की क्षमता और मूल सिद्धांतों के दांव पर होने पर सत्ता छोड़कर जन प्रतिरोध को संगठित करने की तत्परता.
इन सभी पुराने बदलावों में - 1999 के बाद वाजपेयी द्वारा शासन को स्थिरता देना, इंदिरा गांधी की 1971 की निर्णायक जीत और 1939 के अंत में कांग्रेस सरकारों का इस्तीफा - मेष राशि में शनि की उपस्थिति एक राजनीतिक व्यवस्था के अंत और एक नई व्यवस्था के उभरने के साथ मेल खाती है. मौजूदा समय में भी ऐसी ही संरचनात्मक विशेषता दिखाई देती है. मीन राशि में शनि एक पुराने राजनीतिक चक्र को उसके अंत की ओर ले जा रहा है, वहीं नई ताकतें और राजनीतिक अभिव्यक्ति के नए रूप उभरने लगे हैं. यह प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी है. शनि का मेष राशि में प्रवेश नई शुरुआत के एक दौर का मार्ग प्रशस्त करेगा. नए नेता, राजनीतिक ताकतें, आंदोलन और गठजोड़ उभरेंगे, जबकि सत्ता के कुछ स्थापित केंद्र अपनी पकड़ खो देंगे. पुराना नई व्यवस्था के लिए रास्ता बनाएगा. मेष राशि में शनि का आने वाला चक्र भारतीय राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत का संकेत देगा.
(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं और अनिवार्य रूप से प्रकाशन के विचारों को प्रतिबिंबित नहीं करते.)
अतिथि लेखक: विक्रम चन्दीरमानी
(विक्रम चन्दीरमानी, 2001 से ज्योतिषाचार्य, वेदिक और पश्चिमी ज्योतिष के सिद्धांतों को अपनी सहज अंतर्दृष्टि के साथ मिलाकर भविष्य के गहन विश्लेषण प्रदान करते हैं.)
लेखक एस रवि के अनुसार, भारत की वित्तीय यात्रा बुनियादी बैंकिंग से धन सृजन की ओर बढ़ रही है, जहां Gen Z, डिजिटल निवेश और उत्तराधिकार योजना अगले चरण को आकार दे रहे हैं.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
जैसे-जैसे भारत अपनी आजादी के 80 वर्ष पूरे करने के करीब पहुंच रहा है, हमारी राष्ट्रीय आर्थिक कहानी एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है. अब हमारा ध्यान केवल अर्थव्यवस्था को स्थिर करने तक सीमित नहीं है; हम सक्रिय रूप से वैश्विक नेतृत्व और 7 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहे हैं. इस महत्वाकांक्षी लक्ष्य को एक शक्तिशाली ताकत आगे बढ़ा रही है: पूंजी का लोकतंत्रीकरण, जो 1.4 अरब लोगों को वास्तविक वित्तीय स्वतंत्रता की ओर ले जा रहा है.
इस आर्थिक स्वतंत्रता को वास्तव में हासिल करने के लिए हमें लोगों को केवल बैंक खातों तक पहुंच देने से आगे बढ़ना होगा. भविष्य धन सृजन, निवेश के तरीकों के आधुनिकीकरण, Gen Z को इस प्रक्रिया में शामिल करने और यह सुनिश्चित करने का है कि संपत्ति अगली पीढ़ी तक सुचारू रूप से पहुंच सके.
बुनियादी बैंकिंग से धन सृजन की ओर बदलाव
भारत में वित्तीय समावेशन की शुरुआती पहल का मुख्य उद्देश्य लोगों को एक पहचान, बैंक खाता और डिजिटल लेनदेन करने का माध्यम उपलब्ध कराना था. जन धन-आधार-मोबाइल (JAM) पहल इस दिशा में गेम-चेंजर साबित हुई, जिसने 54 करोड़ से अधिक लोगों को औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ा और UPI लेनदेन को हर महीने 20 लाख करोड़ रुपये से आगे पहुंचाने में मदद की. हालांकि, केवल लेनदेन करने की क्षमता से स्थायी संपत्ति का निर्माण अपने आप नहीं हो जाता. हम वर्तमान में अपने आर्थिक विकास के तीन प्रमुख चरणों से गुजर रहे हैं:
चरण 1 - बुनियादी ढांचा: जन धन और (Aadhaar Redacted) जैसी व्यवस्थाओं के जरिए सभी को औपचारिक बैंक खातों और बुनियादी बचत साधनों से जोड़ना.
चरण 2 - तेज लेनदेन: ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में मुफ्त और निर्बाध डिजिटल भुगतान, जैसे UPI, और प्रत्यक्ष लाभ अंतरण का विस्तार करना.
चरण 3 - पूंजी वृद्धि: बुनियादी बचत से आगे बढ़कर परिवारों को बाजार से जुड़े निवेश विकल्पों, जैसे सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIPs), म्यूचुअल फंड और कॉरपोरेट बॉन्ड में निवेश करने में मदद करना.
GDP को 7 प्रतिशत से अधिक की दर से बढ़ाने के लिए हमें घरेलू बचत को सक्रिय निवेश में बदलना होगा. क्रेडिट स्कोर के लिए वैकल्पिक डिजिटल डेटा का उपयोग करके वित्तीय क्षेत्र अनौपचारिक श्रमिकों और छोटे व्यवसायों (MSMEs) को आवश्यक ऋण उपलब्ध कराने में भी मदद कर रहा है, जिससे सूक्ष्म उद्यमी प्रभावी रूप से राष्ट्रीय विकास के प्रमुख इंजन बन रहे हैं. इसके अलावा, माइक्रोफाइनेंस संस्थान और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां शिकारी ऋण व्यवस्था की जगह ले रही हैं, जिससे कम आय वाले परिवारों को कर्ज के जाल से बचने और औपचारिक अर्थव्यवस्था से जुड़ने में मदद मिल रही है.
Gen Z कैसे बदल रही है "वित्तीय स्वतंत्रता" की परिभाषा
भारत की Gen Z (1997 से 2012 के बीच जन्मे लोग) अब कार्यबल में सबसे तेजी से बढ़ने वाला समूह है और उनका पैसे को देखने का नजरिया अपने माता-पिता से काफी अलग है. जहां पुरानी पीढ़ियों को रियल एस्टेट, भौतिक सोने और फिक्स्ड डिपॉजिट में सुरक्षा नजर आती थी, वहीं Gen Z खेल के नियम बदल रही है.
माइक्रो-इन्वेस्टिंग ऐप्स और कम लागत वाली ब्रोकरेज सेवाओं की बदौलत युवा निवेशक बहुत कम उम्र में ही इक्विटी बाजार में उतर रहे हैं और SIP को एक सामान्य मासिक आदत बना रहे हैं. वे FIRE (Financial Independence, Retire Early) आंदोलन से काफी प्रभावित हैं और जीवनभर एक ही नौकरी में बने रहने के बजाय व्यक्तिगत लचीलापन, करियर में गतिशीलता और नकदी की उपलब्धता को प्राथमिकता दे रहे हैं. हालांकि, एल्गोरिदम और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स पर उनकी निर्भरता उन्हें बाजार की अस्थिरता के प्रति भी संवेदनशील बनाती है.
पीढ़ियों के बीच धन प्रबंधन की आदतों में बदलाव
पुराने दौर का वेल्थ मैनेजमेंट इस डिजिटल-फर्स्ट पीढ़ी के लिए अब कारगर नहीं है. वित्तीय संस्थानों को अत्यधिक व्यक्तिगत जरूरतों के अनुरूप टूल्स, स्वचालित जोखिम प्रबंधन और बेहतर वित्तीय शिक्षा के साथ आगे आना होगा, ताकि Gen Z की अल्पकालिक ट्रेडिंग आदतों को दीर्घकालिक धन सृजन की रणनीतियों में बदला जा सके.
बाजारों का विस्तार और विरासत का हस्तांतरण
भारत के वित्तीय बाजार तेजी से बढ़ रहे हैं और हैरानी की बात यह है कि इस वृद्धि का एक बड़ा हिस्सा—नए डीमैट खातों का 40 प्रतिशत से अधिक—केवल बड़े शहरों से नहीं, बल्कि टियर-2 और टियर-3 शहरों से आ रहा है. SIP के जरिए निवेश करने वाले स्थानीय और आम निवेशकों की इस बढ़ती संख्या ने एक मजबूत सुरक्षा कवच तैयार किया है, जो घरेलू बाजारों को विदेशी निवेश के अप्रत्याशित उतार-चढ़ाव से बचा रहा है.
हालांकि, इस स्थिरता को बनाए रखने के लिए निवेशकों को केवल शेयरों से अधिक विकल्प देने होंगे. लोगों को सुरक्षित और संतुलित निवेश विकल्प उपलब्ध कराने के लिए कॉरपोरेट डेट, ग्रीन बॉन्ड और रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट्स (REITs) तक पहुंच का विस्तार करना जरूरी है.
आने वाला विशाल धन हस्तांतरण
हम तेजी से एक बड़े वित्तीय पड़ाव की ओर बढ़ रहे हैं: अगले एक दशक में 1 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक की निजी संपत्तियां और पारिवारिक व्यवसायों की इक्विटी Gen Z और मिलेनियल्स को हस्तांतरित की जाएगी. ऐतिहासिक रूप से भारत में औपचारिक एस्टेट प्लानिंग की कमी के कारण जटिल कानूनी विवाद और संपत्तियों का बंटवारा देखने को मिला है.
इससे बचने के लिए परिवारों को आधुनिक उत्तराधिकार योजना की जरूरत है. इसका मतलब है कानूनी ट्रस्ट बनाना, वैश्विक कर रणनीतियों में तालमेल स्थापित करना और पुरानी पीढ़ी के संस्थापकों की पारंपरिक सोच तथा उनके तकनीक-प्रेमी, ESG-केंद्रित Gen Z उत्तराधिकारियों की मानसिकता के बीच संतुलन बनाना. हमें डिजिटल संपत्तियों और बौद्धिक संपदा के हस्तांतरण के लिए भी स्पष्ट नियमों की जरूरत है.
2027 का रोडमैप
2027 में आजादी के 80 वर्ष पूरे होने के करीब पहुंचते समय यह सुनिश्चित करने के लिए कि हमारी आर्थिक वृद्धि मजबूत और समावेशी बनी रहे, वित्तीय क्षेत्र को तीन मुख्य बातों पर ध्यान देना होगा:
1. बेहतर ग्रामीण ऋण: हमें केवल ग्रामीण जमाओं को रखने से आगे बढ़कर अनौपचारिक व्यवसायों और किसानों को नकदी प्रवाह के आधार पर बिना संपार्श्विक ऋण देना शुरू करना होगा.
2. मजबूत साइबर सुरक्षा: लाखों लोग डिजिटल भुगतान का इस्तेमाल कर रहे हैं, ऐसे में धोखाधड़ी का पता लगाने के लिए AI का उपयोग करना होगा और संस्थागत भरोसा बनाए रखने के लिए मजबूत उपभोक्ता संरक्षण कोष स्थापित करने होंगे.
3. बाजारों को परिपक्व बनाना: दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए घरेलू बीमा और पेंशन पूल को मजबूत करना होगा तथा युवा निवेशकों को शिक्षित करना होगा ताकि बाजार में गिरावट के दौरान वे घबराकर फैसले न लें.
अंततः, भारत की सफलता को केवल शेयर बाजार के रिकॉर्ड स्तर या GDP के आंकड़ों से नहीं मापा जाएगा. वास्तविक स्वतंत्रता तब हासिल होगी, जब ग्रामीण इलाके के एक सड़क विक्रेता से लेकर बड़े शहर के Gen Z उद्यमी तक, हर नागरिक के पास अपने वित्तीय भविष्य पर पूरी तरह नियंत्रण रखने के लिए आवश्यक साधन और ज्ञान होगा.
(अस्वीकरण: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं और जरूरी नहीं कि वे प्रकाशन के विचारों को प्रतिबिंबित करें.)
एस रवि, स्तंभकार
(लेखक एक प्रैक्टिसिंग चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं. इसके अलावा वह रवि राजन एंड कंपनी एलएलपी के संस्थापक और मैनेजिंग पार्टनर, टूरिज्म फाइनेंस कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया के चेयरमैन और बीएसई के पूर्व चेयरमैन रह चुके हैं. उनके विचारों और सुझावों ने नीति निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.)
भारत जब अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है, तो आत्मविश्वास के लिए एक मजबूत आधार मौजूद है. यह न तो आत्मसंतुष्टि है और न ही अति-उत्साह, बल्कि तथ्यों और साक्ष्यों पर आधारित आत्मविश्वास है.
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डॉ. अनुराग बत्रा
बारह वर्षों में भारत ने अपनी आर्थिक बुनियाद को मजबूत किया है. अब अगली परीक्षा इस पैमाने और स्थिरता को उत्पादक रोजगार और साझा समृद्धि में बदलने की है. स्वतंत्रता दिवस पर दो समान रूप से आसान प्रतिक्रियाएं देखने को मिलती हैं: बिना किसी आलोचना के जश्न मनाना और हर बात को नकारात्मक नजरिए से देखना. एक परिपक्व गणराज्य को इससे कहीं अधिक कठिन काम करना चाहिए. उसे यह पहचानना चाहिए कि क्या बदला है, क्या काम किया है और बिना किसी रक्षात्मक रवैये के यह पूछना चाहिए कि अब क्या बेहतर किया जाना चाहिए.
भारत जब अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है, तो आत्मविश्वास के लिए एक मजबूत आधार मौजूद है. यह न तो आत्मसंतुष्टि है और न ही अति-उत्साह, बल्कि तथ्यों और साक्ष्यों पर आधारित आत्मविश्वास है. भारत आज 4 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक की अर्थव्यवस्था है. भू-राजनीतिक झटकों और वैश्विक मांग में असमानता के बीच वित्त वर्ष 2025-26 में वास्तविक GDP 7.7 प्रतिशत बढ़ी. लेकिन GDP से भी अधिक महत्वपूर्ण बदलाव इसके नीचे की संरचना में हुआ है: अब सरकार जनसंख्या के स्तर पर सेवाएं पहुंचा सकती है, डिजिटल माध्यम से धन का लेन-देन कर सकती है, तेजी से बुनियादी ढांचा तैयार कर सकती है और उद्यमों को अधिक व्यापक औपचारिक मंच उपलब्ध करा सकती है.
यह किसी एक योजना, संस्थान या एक वर्ष का काम नहीं है. आधार की जड़ें 2014 से पहले की हैं. GST के लिए संघीय सहमति की जरूरत थी. UPI को NPCI ने बैंकों, फिनटेक कंपनियों और नियामकों के साथ मिलकर विकसित किया. अच्छी सार्वजनिक नीति संचयी होती है. फिर भी सरकारों का आकलन इस आधार पर किया जाना चाहिए कि वे इन बुनियादी ढांचों को किस तरह आपस में जोड़ती हैं और उन्हें किस पैमाने तक ले जाती हैं. इस पैमाने पर नरेंद्र मोदी सरकार का रिकॉर्ड महत्वपूर्ण श्रेय का हकदार है.
पैमाने की संरचना
GST शायद इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है. इसकी शुरुआत बाधित करने वाली थी, इसका ढांचा जरूरत से ज्यादा जटिल था और छोटे व्यवसायों पर अनुपालन का बोझ अनुपातहीन रूप से अधिक पड़ा. फिर भी इसने बिखरी हुई अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था की जगह एक साझा राष्ट्रीय बाजार तैयार किया. करदाता आधार 2017 में 66.5 लाख से बढ़कर मई 2026 तक 1.65 करोड़ हो गया, जबकि वित्त वर्ष 2025-26 में सकल GST संग्रह 22.27 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया. औपचारिकीकरण अपने आप में समृद्धि नहीं है, लेकिन अधिक व्यापक और दिखाई देने वाली अर्थव्यवस्था राजकोषीय क्षमता को बढ़ाती है और नियमों का पालन करने वाले व्यवसायों को अधिक समान अवसर प्रदान करती है.
दिवाला और दिवालियापन संहिता, बैंकों का पुनर्पूंजीकरण और दबावग्रस्त बैलेंस शीट की सफाई भी उतनी ही महत्वपूर्ण रही. अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों की सकल गैर-निष्पादित परिसंपत्तियां सितंबर 2025 तक घटकर 2.2 प्रतिशत रह गईं. IBC अभी भी मुकदमों और न्यायाधिकरणों की क्षमता के कारण धीमी है, लेकिन भारत के पास अब एक ऐसी निकास व्यवस्था है, जो एक दशक पहले मौजूद नहीं थी. यह संस्थागत बदलाव किसी भी रिकवरी के आंकड़े जितना ही महत्वपूर्ण है.
व्यवहार बदलने वाला बुनियादी ढांचा
सबसे दिखाई देने वाला बदलाव सार्वजनिक निवेश की वापसी रहा है. केंद्र का पूंजीगत व्यय वित्त वर्ष 2014-15 में लगभग 2 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर वित्त वर्ष 2026-27 में बजटीय 12.2 लाख करोड़ रुपये हो गया है. राष्ट्रीय राजमार्गों की लंबाई 2014 के 91,287 किलोमीटर से बढ़कर मार्च 2026 तक 1,46,572 किलोमीटर हो गई, जबकि हवाईअड्डों का नेटवर्क 74 से बढ़कर 164 हो गया. बेहतर कनेक्टिविटी दूरी को कम करती है, श्रम बाजारों का विस्तार करती है और उन जगहों पर निवेश को व्यवहार्य बनाती है, जहां कभी उद्यम करने में हिचकिचाहट होती थी.
भारत के डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे ने अपेक्षाकृत शांत लेकिन संभवतः कहीं गहरा बदलाव किया है. लगभग 59 करोड़ जन धन खाते खोले जा चुके हैं. अकेले जुलाई 2026 में UPI ने करीब 23.7 अरब लेन-देन संसाधित किए, जिनकी कुल राशि लगभग 29.9 लाख करोड़ रुपये रही. आधार और प्रत्यक्ष लाभ अंतरण से कल्याणकारी लाभ लंबी प्रशासनिक श्रृंखला से गुजरने के बजाय सीधे लाभार्थियों तक पहुंच सकते हैं. सरकार का अनुमान है कि DBT और इससे जुड़े सुधारों से मार्च 2025 तक कुल बचत और लाभ 5.14 लाख करोड़ रुपये से अधिक रहे.
उपलब्धि केवल एक ऐप नहीं है. यह रोजमर्रा के आर्थिक जीवन में बाधाओं को कम करना है. एक छोटा व्यापारी तुरंत भुगतान प्राप्त कर सकता है, गांव में रहने वाली एक महिला अपने बैंक खाते पर नियंत्रण रख सकती है और कल्याणकारी लाभ किसी स्थानीय बिचौलिए के बिना पहुंच सकता है. साइबर धोखाधड़ी, बहिष्करण और शिकायत निवारण अभी भी चिंता के विषय हैं, लेकिन बहुत कम देशों ने इतनी कम लागत पर इस पैमाने का सार्वजनिक डिजिटल ढांचा तैयार किया है.
घरेलू बुनियादी ढांचे को भी इसी नजरिए से देखना चाहिए. शौचालय, बिजली, रसोई गैस और पाइप से पानी की आपूर्ति केवल कल्याणकारी सुविधाएं नहीं, बल्कि उत्पादक संपत्तियां भी हैं. नल से पानी की सुविधा वाले ग्रामीण परिवारों की संख्या 2019 में 3.23 करोड़ से बढ़कर अगस्त 2026 में 15.9 करोड़ से अधिक हो गई. पानी लाने में बचने वाला समय, स्वच्छता से टलने वाली बीमारियां और स्वच्छ ईंधन से कम होने वाला प्रदूषण, इन सभी का आर्थिक लाभ है, खासकर महिलाओं के लिए.
वंचना में कमी महत्वपूर्ण रही है. विश्व बैंक की संशोधित अंतरराष्ट्रीय गरीबी रेखा के अनुसार, अत्यधिक गरीबी 2011-12 में 27.1 प्रतिशत से घटकर 2022-23 में 5.3 प्रतिशत रह गई. इसमें आर्थिक वृद्धि, सरकारी कार्यक्रमों, निजी उद्यम और संस्थागत निरंतरता, सभी की भूमिका रही है. इसलिए कोई भी ईमानदार आकलन इसका पूरा श्रेय किसी एक सरकार को नहीं दे सकता. फिर भी बेहतर लक्षित कल्याणकारी योजनाओं और बुनियादी सेवाओं के तेज विस्तार ने इस प्रक्रिया को मजबूत किया है.
उत्पादन और रणनीतिक क्षमता
मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्र में रिकॉर्ड अधिक मिश्रित है, लेकिन इसमें महत्वपूर्ण सफलताएं शामिल हैं. इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन वित्त वर्ष 2014-15 के 1.90 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर वित्त वर्ष 2025-26 में अनुमानित 13.11 लाख करोड़ रुपये हो गया है, जबकि निर्यात 38,263 करोड़ रुपये से बढ़कर 4.24 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया है. उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजनाओं ने रणनीतिक क्षेत्रों में निवेश आकर्षित किया है, जबकि सेमीकंडक्टर मिशन उस तकनीक में क्षमता विकसित करने का प्रयास कर रहा है, जिस पर हर आधुनिक अर्थव्यवस्था निर्भर करती है.
भारत ने स्वच्छ ऊर्जा को भी औद्योगिक और रणनीतिक नीति का हिस्सा बनाया है. नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता 2014 के 76.38 GW से बढ़कर जून 2026 तक 288.58 GW हो गई. भारत ने जून 2025 में गैर-जीवाश्म स्रोतों से स्थापित बिजली क्षमता का 50 प्रतिशत आंकड़ा हासिल कर लिया, जो लक्ष्य से पांच वर्ष पहले है. क्षमता और वास्तविक उत्पादन एक ही चीज नहीं हैं. भंडारण, ट्रांसमिशन, वितरण सुधार और महत्वपूर्ण खनिज अब अगली बड़ी बाधाएं हैं. इसके बावजूद, बदलाव की गति एक महत्वपूर्ण परिवर्तन को दर्शाती है.
इन उपलब्धियों को बढ़ा-चढ़ाकर नहीं पेश किया जाना चाहिए. भारत ने विशेष रूप से मोबाइल फोन के क्षेत्र में असेंबली में मजबूत क्षमता विकसित की है, लेकिन उसे कंपोनेंट्स, डिजाइन, बौद्धिक संपदा और अनुसंधान के जरिए कहीं अधिक मूल्य हासिल करना होगा. अर्थव्यवस्था में मैन्युफैक्चरिंग की हिस्सेदारी अभी भी उसके लिए निर्धारित महत्वाकांक्षी लक्ष्य से नीचे है और छोटे उद्यम अब भी ऋण, तकनीक, भुगतान में देरी और अनुपालन लागत जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं. औद्योगिक विकास के अगले चरण को भारत में केवल निर्माण से आगे बढ़कर भारत से आविष्कार करने, डिजाइन तैयार करने और स्वामित्व विकसित करने की दिशा में जाना होगा.
अगले स्वतंत्रता दिवस की परीक्षा
पिछले बारह वर्षों का सकारात्मक आकलन तभी विश्वसनीय बन सकता है, जब उसके साथ अधूरे कामों का ईमानदार लेखा-जोखा भी हो.
पहला, रोजगार की गुणवत्ता को नीति का केंद्रीय पैमाना बनाना होगा. आधिकारिक आंकड़े समय के साथ श्रम भागीदारी में वृद्धि और बेरोजगारी में कमी दिखाते हैं, लेकिन कुल रोजगार के आंकड़े आय, रोजगार सुरक्षा, उत्पादकता या इस बात के बारे में बहुत कम बताते हैं कि शिक्षित युवाओं को उनकी आकांक्षाओं के अनुरूप काम मिल रहा है या नहीं. आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, 14 से 18 वर्ष की आयु के केवल 0.97 प्रतिशत युवाओं को संस्थागत कौशल प्रशिक्षण मिला, जबकि लगभग 92 प्रतिशत को ऐसा कोई प्रशिक्षण नहीं मिला. अगले स्वतंत्रता दिवस तक भारत के पास एक पारदर्शी रोजगार और आय डैशबोर्ड, कहीं अधिक व्यापक अप्रेंटिसशिप व्यवस्था और नियोक्ताओं से जुड़ा ऐसा कौशल प्रशिक्षण होना चाहिए, जिसका आकलन प्रमाणपत्रों के बजाय नियुक्तियों और वेतन के आधार पर किया जाए.
दूसरा, सुधारों को कारोबार करने के रोजमर्रा के अनुभव को बेहतर बनाना होगा. केंद्र ने राष्ट्रीय स्तर का ढांचा तैयार किया है, लेकिन राज्य, शहर और स्थानीय प्रशासन तय करते हैं कि उद्यमी इनका इस्तेमाल कितनी आसानी से कर सकते हैं. समयबद्ध मंजूरियां, नियमित चूक के लिए कम आपराधिक प्रावधान, स्थिर कर और टैरिफ नियम, तेज वाणिज्यिक अदालतें और समयबद्ध दिवाला प्रक्रिया, एक और सौ योजनाओं की तुलना में कहीं अधिक ऊर्जा मुक्त कर सकती हैं. MSMEs, जिनके पास अनिश्चितताओं को झेलने की क्षमता सबसे कम होती है, हर अनुपालन सुधार की असली परीक्षा होने चाहिए.
तीसरा, समावेशन को केवल पहुंच से आगे बढ़ाकर गुणवत्ता तक ले जाना होगा. बैंक खाते से किफायती और उत्पादक ऋण तक पहुंच मिलनी चाहिए. नल का कनेक्शन भरोसेमंद और सुरक्षित पानी उपलब्ध कराना चाहिए. स्कूल में नामांकन को वास्तविक सीखने में बदलना होगा. स्वास्थ्य कार्ड के पीछे पर्याप्त स्टाफ वाला अस्पताल होना चाहिए. महिलाओं की बढ़ती श्रम भागीदारी को सुरक्षित और अच्छी आय वाले रोजगार में बदलना होगा, जिसके लिए बाल देखभाल, परिवहन और ऋण की सुविधाओं का समर्थन जरूरी है. भारत ने साबित किया है कि वह बड़े पैमाने पर समाधान तैयार कर सकता है. अब उसे गुणवत्ता और विश्वसनीयता की समस्या का समाधान करना होगा.
चौथा, सार्वजनिक पूंजी को कहीं अधिक निजी निवेश आकर्षित करना होगा. भारत केवल सरकारी खर्च के जरिए अपनी 2047 की आकांक्षा को वित्तपोषित नहीं कर सकता. व्यवसायों को नीतिगत स्थिरता, प्रतिस्पर्धी बिजली और लॉजिस्टिक्स लागत, लागू किए जा सकने वाले अनुबंध और वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं तक खुली पहुंच की जरूरत है. उत्पादन प्रोत्साहन योजनाएं पारदर्शी और समयबद्ध होनी चाहिए तथा उन्हें घरेलू मूल्यवर्धन, निर्यात और नवाचार में वृद्धि से जोड़ा जाना चाहिए, न कि प्रतिस्पर्धा से स्थायी सुरक्षा का माध्यम बनना चाहिए.
विश्व बैंक का अनुमान है कि भारत को 2047 तक उच्च आय वाले देश का दर्जा हासिल करने के लिए दो दशकों से अधिक समय तक औसतन लगभग 7.8 प्रतिशत की वास्तविक आर्थिक वृद्धि की आवश्यकता होगी. यह संभव है, लेकिन अपने आप नहीं होगा. इसके लिए अधिक सक्षम सरकार, गहरा सहकारी संघवाद, मजबूत मानव पूंजी और दीर्घकालिक निवेश के लिए तैयार निजी क्षेत्र की जरूरत होगी.
आर्थिक नीति में देशभक्ति का अर्थ यह दिखावा करना नहीं है कि कोई समस्या बाकी नहीं है. इसका अर्थ है यह विश्वास रखना कि समस्याओं का समाधान किया जा सकता है और राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा के अनुरूप सरकारी क्षमता की मांग करना. पिछले बारह वर्षों ने भारत को अधिक औपचारिक, जुड़ा हुआ, बैंकिंग से जुड़ा, डिजिटल, बुनियादी ढांचे के लिए तैयार और आत्मविश्वासी बनाया है. अगले चरण को इसे अधिक उत्पादक, नवोन्मेषी, समानतापूर्ण और निर्माण के लिए अधिक आसान बनाना होगा.
राजनीतिक स्वतंत्रता ने भारतीयों को अपने देश का भविष्य चुनने की शक्ति दी. आर्थिक स्वतंत्रता तब पूर्ण होगी, जब प्रत्येक भारतीय के पास अपना भविष्य गढ़ने की वास्तविक क्षमता होगी. यही वह लक्ष्य है, जो तिरंगे के योग्य है और एक ऐसा वादा है, जिसकी प्रगति को 15 अगस्त 2027 को फिर से मापा जाना चाहिए.
जय हिंद.
लेखक डॉ. ब्रजेश कुमार तिवारी कहते हैं, अब भारत के सामने सवाल बदल चुका है. सवाल केवल यह नहीं रह गया है कि देश विकास कर सकता है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या विकास संतुलित, उत्पादक, समावेशी और मानवीय बन सकता है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
जब भारत 1947 में आजाद हुआ था, तब उसके सामने गरीबी, अशिक्षा, कमजोर औद्योगिक क्षमता, खराब स्वास्थ्य संकेतक और अपर्याप्त बुनियादी ढांचे जैसी गंभीर चुनौतियां थीं. आठ दशक बाद देश ने एक असाधारण सफर तय किया है. भारत ने लोकतंत्र को मजबूत बनाए रखा, खाद्य सुरक्षा हासिल की, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार किया, तकनीकी क्षमताएं विकसित कीं और दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में अपनी जगह बनाई.
अब भारत के सामने सवाल बदल चुका है. सवाल केवल यह नहीं रह गया है कि देश विकास कर सकता है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या विकास संतुलित, उत्पादक, समावेशी और मानवीय बन सकता है. विकसित भारत 2047 को केवल सकल घरेलू उत्पाद से परिभाषित नहीं किया जा सकता. एक विकसित भारत में समृद्धि के साथ अवसर, तकनीक के साथ रोजगार, शिक्षा के साथ मूल्य, बुनियादी ढांचे के साथ जीवन की गुणवत्ता और अधिकारों के साथ जिम्मेदारी का संतुलन होना चाहिए.
आठवें दशक की आजादी की यात्रा में भारत के सामने आठ प्रमुख चुनौतियां विशेष ध्यान देने योग्य हैं.
1. विकास और संतुलन: हर क्षेत्र तक पहुंचना चाहिए विकास
1947 में भारत मुख्य रूप से कृषि प्रधान, गरीब और औद्योगिक रूप से कमजोर देश था. आज यह दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और 2025-26 में वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि 7.6 प्रतिशत रही. बहुआयामी गरीबी भी 2013-14 के 29.17 प्रतिशत से घटकर 2022-23 में 11.28 प्रतिशत रह गई.
हालांकि, राष्ट्रीय औसत राज्यों, जिलों, शहरों और गांवों के बीच मौजूद बड़े अंतर को छिपा देते हैं. इसलिए भारत की अगली चुनौती केवल तेज विकास नहीं, बल्कि अधिक संतुलित विकास है. किसी नागरिक की शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, डिजिटल कनेक्टिविटी, बाजार और रोजगार तक पहुंच उसके जन्मस्थान पर अत्यधिक निर्भर नहीं होनी चाहिए.
पिछड़े जिलों में मानव संसाधन, स्थानीय बुनियादी ढांचे, कृषि और छोटे उद्यमों में अधिक निवेश की जरूरत है. राज्यों को मापने योग्य परिणामों के आधार पर प्रोत्साहन मिलना चाहिए, शहरी स्थानीय निकायों की वित्तीय स्थिति मजबूत होनी चाहिए और ग्रामीण क्षेत्रों को बाजारों से बेहतर तरीके से जोड़ा जाना चाहिए. वर्ष 2047 तक समृद्धि कुछ महानगरों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए. विकास पूरे देश का अनुभव बनना चाहिए.
2. रोजगार और कौशल: जनसंख्या को उत्पादक पूंजी में बदलना
भारत की युवा आबादी उसकी सबसे बड़ी आर्थिक ताकत बन सकती है, लेकिन इसके लिए शिक्षा को रोजगार से सार्थक रूप से जोड़ना होगा. महिलाओं की श्रम बल भागीदारी 2017-18 में करीब 21 प्रतिशत से बढ़कर 2023-24 में 35 प्रतिशत से अधिक हो गई है, लेकिन अभी भी बड़े अंतर मौजूद हैं.
एक गहरी चिंता औपचारिक कौशल प्रशिक्षण की सीमित पहुंच है. भारत को धीरे-धीरे डिग्री केंद्रित रोजगार संस्कृति से क्षमता केंद्रित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ना होगा. व्यावसायिक शिक्षा की शुरुआत स्कूलों से होनी चाहिए, अप्रेंटिसशिप को उद्योगों से मजबूती से जोड़ना होगा और जिलों को स्थानीय स्तर पर आवश्यक कौशल की पहचान करनी चाहिए.
सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों को रोजगार सृजन का प्रमुख केंद्र बनना चाहिए. वहीं, उद्यमिता को अंतिम विकल्प के बजाय मुख्यधारा के करियर विकल्प के रूप में देखा जाना चाहिए. भारत को रोजगार की गुणवत्ता पर भी ध्यान देना होगा. वर्ष 2047 तक रोजगार का आकलन केवल संख्या के आधार पर नहीं, बल्कि उत्पादकता, आय, सम्मान और सामाजिक सुरक्षा के आधार पर होना चाहिए.
3. निवेश और तकनीक: भारत को बनना होगा सृजनकर्ता
स्वतंत्र भारत ने शुरुआत में सार्वजनिक निवेश के जरिए अपना औद्योगिक आधार तैयार किया. बाद में आर्थिक सुधारों ने निजी पूंजी, विदेशी निवेश और उद्यमिता को विस्तार दिया. आज भारत को डिजिटल भुगतान, फार्मास्युटिकल्स, सॉफ्टवेयर, अंतरिक्ष और स्टार्टअप के क्षेत्र में वैश्विक पहचान मिली है.
वैश्विक नवाचार सूचकांक में भारत की रैंकिंग 2019 में 66वीं थी, जो 2025 में सुधरकर 38वीं हो गई. लेकिन अगला चरण अधिक कठिन होगा. सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, उन्नत विनिर्माण, जैव प्रौद्योगिकी, स्वच्छ ऊर्जा और ऊर्जा भंडारण के क्षेत्रों में भारत की तकनीकी क्षमता की असली परीक्षा होगी.
भारत केवल नई तकनीकों का बड़ा उपभोक्ता बनकर नहीं रह सकता. उसे एक प्रमुख सृजनकर्ता बनना होगा. इसके लिए अनुसंधान और विकास में निजी निवेश बढ़ाना होगा, विश्वविद्यालयों और उद्योगों के बीच सहयोग मजबूत करना होगा, पेटेंट को उत्पादों में बदलने की क्षमता विकसित करनी होगी और घरेलू जोखिम पूंजी को बढ़ाना होगा.
विदेशी निवेश का आकलन केवल पूंजी के आधार पर नहीं, बल्कि तकनीक हस्तांतरण, स्थानीय आपूर्ति श्रृंखला और रोजगार सृजन के आधार पर भी किया जाना चाहिए. वर्ष 2047 तक निवेश नीति का उद्देश्य केवल पूंजी आकर्षित करना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय क्षमताओं का निर्माण होना चाहिए.
4. शिक्षा और मूल्य: साक्षरता से क्षमता तक
भारत ने 1951 में केवल 18.3 प्रतिशत की साक्षरता दर के साथ अपनी यात्रा शुरू की थी. इसके बाद देश ने दुनिया की सबसे बड़ी शिक्षा व्यवस्थाओं में से एक का निर्माण किया. शिक्षा तक पहुंच में भारी विस्तार हुआ है, लेकिन अब सबसे बड़ी चुनौती गुणवत्ता है.
हाल के आंकड़ों के अनुसार, माध्यमिक स्तर पर सकल नामांकन अनुपात करीब 78.7 प्रतिशत और उच्च माध्यमिक स्तर पर 58.4 प्रतिशत है. बड़ी संख्या में छात्र स्कूल शिक्षा के अंतिम वर्षों तक नहीं पहुंच पाते. इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि केवल नामांकन सीखने का विकल्प नहीं हो सकता.
एक विकसित भारत को ऐसी शिक्षा की जरूरत है, जो भाषा, गणित, विज्ञान, तकनीक, आलोचनात्मक सोच और रोजगार क्षमता को विकसित करे. साथ ही ईमानदारी, संवैधानिक मूल्य, सहानुभूति और नागरिक जिम्मेदारी को भी बढ़ावा दे.
शिक्षकों का प्रशिक्षण बेहतर होना चाहिए, बुनियादी स्तर की शिक्षा पर अधिक ध्यान देना होगा, शोध संस्कृति को मजबूत करना होगा और डिजिटल संसाधनों तक समान पहुंच सुनिश्चित करनी होगी. विश्वविद्यालयों को भी अधिक अकादमिक स्वतंत्रता की आवश्यकता है. वर्ष 2047 तक भारत का लक्ष्य केवल डिग्रीधारी तैयार करना नहीं, बल्कि सक्षम और जिम्मेदार नागरिक तैयार करना होना चाहिए.
5. स्वास्थ्य सेवा: इलाज से स्वास्थ्य सुरक्षा तक
आजादी के समय भारत में औसत जीवन प्रत्याशा केवल 32 से 33 वर्ष के आसपास थी. टीकाकरण, स्वच्छता, पोषण, चिकित्सा और सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार से लोगों की औसत आयु में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है.
चिकित्सा ढांचे का भी विस्तार हुआ है. 2014 में देश में मेडिकल कॉलेजों की संख्या 387 थी, जो 2026 में बढ़कर 800 से अधिक हो गई है.
इसके बावजूद स्वास्थ्य सेवाओं की लागत और पहुंच बड़ी चुनौती बनी हुई है. वर्ष 2022-23 के राष्ट्रीय स्वास्थ्य लेखा के आंकड़ों के अनुसार, सरकारी स्वास्थ्य खर्च सकल घरेलू उत्पाद का करीब 1.43 प्रतिशत था, जबकि अपनी जेब से किया जाने वाला खर्च कुल स्वास्थ्य व्यय का 43.4 प्रतिशत रहा.
भारत को केवल अस्पताल केंद्रित व्यवस्था से आगे बढ़कर प्राथमिक और निवारक स्वास्थ्य सेवाओं में अधिक निवेश करना होगा. जिलों को विशेषज्ञ डॉक्टर, नर्स, जांच सुविधाएं, सस्ती दवाएं और भरोसेमंद सरकारी अस्पतालों की जरूरत है. मानसिक स्वास्थ्य, बुजुर्गों की देखभाल और गैर-संचारी बीमारियों पर भी अधिक ध्यान देना होगा.
वर्ष 2047 तक बीमारी किसी परिवार को आर्थिक संकट में नहीं धकेलनी चाहिए. स्वास्थ्य सेवा को मानव क्षमता में निवेश के रूप में देखा जाना चाहिए.
6. बुनियादी ढांचा और सार्वजनिक सेवाएं: मात्रा से गुणवत्ता तक
भारत कभी सड़कों, बिजली, रेलवे, सिंचाई, आवास और संचार सुविधाओं की भारी कमी से जूझता था. आज इसमें व्यापक बदलाव आया है. मार्च 2026 तक राष्ट्रीय राजमार्ग नेटवर्क 2014 के 91,287 किलोमीटर से बढ़कर करीब 1,46,572 किलोमीटर हो गया.
ब्रॉड गेज रेलवे नेटवर्क का 99 प्रतिशत से अधिक हिस्सा विद्युतीकृत हो चुका है. हवाई अड्डों और डिजिटल कनेक्टिविटी का भी तेजी से विस्तार हुआ है. हालांकि, अगली चुनौती केवल और अधिक निर्माण करने की नहीं है. बुनियादी ढांचे का आकलन उसकी विश्वसनीयता, सुरक्षा, रखरखाव, सामर्थ्य और नागरिकों के समय की बचत के आधार पर होना चाहिए.
शहरों को बेहतर सार्वजनिक परिवहन, जल निकासी, स्वच्छ हवा, जल व्यवस्था और किफायती आवास चाहिए. ग्रामीण भारत को अंतिम छोर तक मजबूत कनेक्टिविटी, भरोसेमंद बिजली, भंडारण सुविधाएं और उच्च गुणवत्ता वाले इंटरनेट की जरूरत है.
नए निर्माण जितना ही ध्यान रखरखाव पर भी दिया जाना चाहिए. वर्ष 2047 तक बुनियादी ढांचा कारोबार की लागत कम करने, आम जीवन को बेहतर बनाने और पर्यावरणीय नुकसान को न्यूनतम करने वाला होना चाहिए.
7. समाज और जिम्मेदारी: अधिकारों के साथ कर्तव्य भी जरूरी
भारत की लोकतांत्रिक उपलब्धि उल्लेखनीय है. संविधान विशाल सामाजिक, भाषाई और धार्मिक विविधता के बीच समान नागरिकता, मौलिक अधिकार और राजनीतिक भागीदारी की गारंटी देता है. लेकिन विकसित समाज केवल सरकारों से नहीं बनते. उनकी मजबूती नागरिकों पर भी निर्भर करती है. कर अनुपालन, यातायात अनुशासन, स्वच्छता, जल संरक्षण, सार्वजनिक संपत्ति का सम्मान, महिलाओं के प्रति सम्मान और कमजोर वर्गों की देखभाल, ये सभी विकास का हिस्सा हैं.
भारत के अगले चरण में अधिकारों और जिम्मेदारियों के बीच संतुलन स्थापित करना होगा. स्कूलों और विश्वविद्यालयों में नागरिक शिक्षा को सार्थक बनाना चाहिए, समुदायों को सार्वजनिक संपत्तियों के रखरखाव में भागीदार बनाना चाहिए और स्वैच्छिक सेवा को अधिक मान्यता मिलनी चाहिए.
डिजिटल युग में बिना सत्यापन के गलत सूचना को आगे न बढ़ाना भी नागरिक जिम्मेदारी है. वर्ष 2047 तक भारतीयों को केवल यह नहीं पूछना चाहिए कि राज्य उनके लिए क्या करेगा, बल्कि यह भी सोचना चाहिए कि वे समाज के लिए क्या कर सकते हैं.
8. न्याय और सहिष्णुता: विकास की अंतिम परीक्षा
भारत ने न्यायिक स्वतंत्रता, मौलिक अधिकारों और कानून के शासन पर आधारित एक मजबूत संवैधानिक ढांचा तैयार किया है. लेकिन मामलों में देरी आज भी न्याय तक पहुंच को कमजोर करती है.
वर्ष 2026 की शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट और जिला अदालतों में करीब 5.46 करोड़ मामले लंबित थे. न्याय केवल सही फैसला नहीं है, बल्कि उचित समय के भीतर दिया गया फैसला भी है.
भारत को तेज न्यायिक नियुक्तियों, बेहतर अदालत प्रशासन, तकनीक के व्यापक उपयोग और मध्यस्थता तथा वैकल्पिक विवाद समाधान पर अधिक भरोसा करने की जरूरत है.
सहिष्णुता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है. जिस समाज में असहमति धीरे-धीरे दुश्मनी में बदल जाती है, वह तर्कसंगत तरीके से समस्याओं को सुलझाने की अपनी क्षमता खो देता है.
भारत की विविधता के लिए ऐसी संस्कृति जरूरी है, जहां लोग अलग विचार रख सकें, बिना एक-दूसरे का दुश्मन बने. वर्ष 2047 तक एक विकसित भारत को कानून के समक्ष समानता, सस्ता और समय पर न्याय तथा यह भरोसा सुनिश्चित करना होगा कि अलग-अलग विचार एक साझा संवैधानिक ढांचे के भीतर साथ रह सकते हैं.
वर्ष 2047 की राह
आजादी के बाद से भारत की प्रगति असाधारण रही है, लेकिन अगले दो दशकों का आकलन विस्तार से अधिक गुणवत्ता के आधार पर किया जाएगा.
सड़कें सुरक्षित होनी चाहिए, स्कूलों में वास्तविक सीख सुनिश्चित होनी चाहिए, अस्पताल किफायती बने रहने चाहिए, आर्थिक विकास से उत्पादक रोजगार पैदा होने चाहिए और तकनीक का केवल भारत में उपभोग नहीं, बल्कि तेजी से भारत में निर्माण भी होना चाहिए.
नागरिकों को अधिकारों का उपयोग करते हुए अपनी जिम्मेदारियों को भी स्वीकार करना होगा और अदालतों को उचित समय के भीतर न्याय देना होगा.
इसलिए विकसित भारत 2047 की सबसे सार्थक परिभाषा शायद बहुत सरल है. ऐसा भारत, जहां किसी व्यक्ति के अवसर उसके जन्मस्थान, लिंग, आय या सामाजिक पृष्ठभूमि से तय न हों, बल्कि उसकी क्षमता, प्रयास और आकांक्षाओं से अधिक निर्धारित हों.
यही आजादी का अधूरा एजेंडा है. भारत के आठवें दशक को केवल उस दौर के रूप में याद नहीं किया जाना चाहिए, जब देश अधिक समृद्ध हुआ. इसे उस दौर के रूप में याद किया जाना चाहिए, जब आर्थिक प्रगति को मानव क्षमता, संस्थागत गुणवत्ता और समान अवसरों में बदला गया.
(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं और जरूरी नहीं कि वे प्रकाशन के विचारों को प्रतिबिंबित करते हों.)
अतिथि लेखक: डॉ. ब्रजेश कुमार तिवारी, एसोसिएट प्रोफेसर, अटल स्कूल ऑफ मैनेजमेंट (ABVSME), जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली
पहली नौकरी के विरोधाभास से लेकर AI साक्षरता और लोकतांत्रिक असहमति की सेहत तक, Gen Z को भारत के भविष्य में भागीदार के रूप में देखने का तर्क, न कि एक ऐसी समस्या के रूप में जिसे संभालने की जरूरत है
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
जिस तरह से हमने जेनरेशन Z के बारे में बात करना शुरू किया है, उसमें कुछ बेहद परेशान करने वाली बात है. जिस पीढ़ी को कल की उम्मीद के रूप में देखा जाना चाहिए, उस पर आज एक ऐसी समस्या के रूप में चर्चा की जा रही है, जिसे संभालने की जरूरत है. हम उन्हें अधीर, बेचैन, मांग करने वाला और उन नियमों को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं मानते, जिन्हें पिछली पीढ़ियों ने बिना सवाल किए स्वीकार कर लिया था. लेकिन शायद हम गलत सवाल पूछ रहे हैं. सवाल यह नहीं है कि Gen Z में क्या गलत है, बल्कि यह है कि जिस दुनिया में उसने कदम रखा है, उसके साथ क्या हुआ है. यह समाज, प्रौद्योगिकी, अर्थव्यवस्था और मानवीय अपेक्षाओं के स्तर पर सामने आ रहा एक वैश्विक बदलाव है.
Gen Z एक ऐसी दुनिया में बड़ा हुआ है, जहां पुराना वादा, कड़ी मेहनत से पढ़ाई करो, डिग्री हासिल करो और एक सुरक्षित जीवन बनाओ, अब पहले की तरह निश्चित नहीं रह गया है. AI काम की प्रकृति को बदल रहा है, ऑटोमेशन उद्योगों को बदल रहा है और सोशल मीडिया ने पूरी दुनिया को एक स्क्रीन पर ला दिया है. एक छोटे शहर में रहने वाला युवा कुछ ही सेकंड में देख सकता है कि उससे दूर कोई अन्य व्यक्ति कैसे पढ़ाई कर रहा है या कमाई कर रहा है और यह भी देख सकता है कि समाज जो वादा करता है और वास्तव में जो देता है, उसके बीच कितना अंतर है. जो अधीरता दिखती है, वह शायद जागरूकता हो सकती है. जो विद्रोह नजर आता है, वह शायद उन व्यवस्थाओं से निराशा हो सकती है, जो समय के साथ कदम नहीं मिला पाई हैं. Gen Z ने ये परिस्थितियां पैदा नहीं कीं. उन्हें ये विरासत में मिली हैं. इससे पहले कि हम पूछें कि Gen Z को कैसे संभाला जाए, हमें यह पूछना चाहिए कि क्या हमारी सरकारें, व्यवसाय, संस्थान और परिवार उन्हें उस दुनिया के लिए तैयार करने को तैयार हैं, जो उन्हें विरासत में मिलने वाली है.
भारत और जनसांख्यिकीय सवाल
भारत इस बदलाव के सबसे महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है. हम अपने जनसांख्यिकीय लाभांश पर गर्व से बात करते हैं, लेकिन बड़ी युवा आबादी अपने आप में जनसांख्यिकीय लाभांश नहीं बन जाती. युवा तभी संपत्ति बनते हैं, जब उनके पास शिक्षा, कौशल, स्वास्थ्य, रोजगार और भागीदारी का आत्मविश्वास हो अन्यथा यही ताकत निराशा में बदल सकती है. शिक्षा को डिग्रियों से क्षमताओं की ओर, रटने से व्यावहारिक उपयोग की ओर और एक बार की पढ़ाई से आजीवन सीखने की ओर बढ़ना चाहिए. कौशल विकास का आकलन बांटे गए प्रमाणपत्रों के आधार पर नहीं, बल्कि उसके बाद होने वाले परिणामों से किया जाना चाहिए, क्या युवा को रोजगार मिला, क्या उसकी आय बढ़ी. इसके लिए प्रशिक्षण की संख्या से वास्तविक रोजगार परिणामों की ओर बदलाव जरूरी है.
पहली नौकरी के विरोधाभास का भी समाधान किया जाना चाहिए: नियोक्ता ऐसे अनुभव की मांग करते हैं, जिसे युवा बिना अवसर पाए हासिल ही नहीं कर सकते. सरकार और उद्योग एक मजबूत अप्रेंटिसशिप इकोनॉमी के जरिए इस समस्या का समाधान कर सकते हैं. AI साक्षरता को डिजिटल साक्षरता की तरह ही बुनियादी बनाया जाना चाहिए, ताकि यह केवल प्रतिष्ठित संस्थानों तक सीमित विशेषाधिकार न रह जाए. भारत की मैन्युफैक्चरिंग महत्वाकांक्षाओं को उसकी शिक्षा रणनीति से जोड़ा जाना चाहिए. देश को सिर्फ कारखाने ही नहीं बनाने हैं, बल्कि उन्हें चलाने के लिए मानव क्षमताएं भी विकसित करनी हैं. अवसरों को बड़े महानगरों से आगे भी बढ़ना चाहिए, ताकि छोटे शहर का कोई युवा यह न माने कि घर छोड़ना ही सफलता का एकमात्र रास्ता है.
अगली पीढ़ी के प्रति संस्थानों की जिम्मेदारी
सरकार यह जिम्मेदारी अकेले नहीं निभा सकती. व्यवसायों को कुशल कर्मचारियों की कमी की शिकायत करना बंद करना चाहिए, जबकि वे विश्वविद्यालयों या सरकार के उन्हें तैयार करने का इंतजार कर रहे हों. कंपनियों को प्रतिभा विकसित करने में भागीदार बनना चाहिए, जो कंपनी अपने लोगों की क्षमता में निवेश करती है, वह अपनी भविष्य की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता का निर्माण कर रही होती है. एक युवा व्यक्ति नियोक्ता से जो सबसे महत्वपूर्ण सवाल तेजी से पूछ सकता है, वह शायद यह नहीं होगा कि "आप मुझे कितना वेतन देंगे?", बल्कि यह होगा कि "अगर मैं आपके साथ काम करूं तो मैं क्या बन सकता हूं?"
विश्वविद्यालयों को द्वीपों के बजाय पुल बनना चाहिए. व्यावहारिक क्षमता के बिना डिग्री तेजी से अपर्याप्त होती जाएगी. सफलता का आकलन केवल परीक्षा परिणामों से नहीं, बल्कि रोजगार क्षमता से किया जाना चाहिए. परिवारों की भी भूमिका है. कई माता-पिता इस सोच के साथ बड़े हुए कि सुरक्षा का मतलब एक स्थिर पेशा है. उनके बच्चे ऐसी दुनिया में प्रवेश कर रहे हैं, जहां करियर कई बार बदल सकता है और अनुकूलन क्षमता ही सुरक्षा का सबसे बड़ा रूप हो सकती है. एक युवा को घर में यह कहने के लिए सुरक्षित जगह मिलनी चाहिए कि "मैं असफल हो गया" या "मैं उलझन में हूं." समाज को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि युवा महिलाओं को केवल शिक्षित करने के बाद उन्हें अवसरों से बाहर न कर दिया जाए. एक राष्ट्रीय Gen Z ह्यूमन कैपिटल मिशन सरकार, उद्योग और नागरिक समाज को मापने योग्य लक्ष्यों के साथ एकजुट कर सकता है, जहां डेटा नीति और वास्तविकता के बीच पुल का काम करे.
इस समझौते का दूसरा पक्ष
हालांकि, इस सामाजिक समझौते का एक दूसरा पक्ष भी है और वह स्वयं Gen Z से जुड़ा है: कोई समाज संस्थानों से अवसर पैदा करने की उम्मीद करते हुए उस पीढ़ी से कुछ भी अपेक्षा नहीं कर सकता, जिसे वे अवसर मिल रहे हैं. कोई युवा जो सरकार से सवाल करता है या शांतिपूर्ण विरोध करता है, वह अपने आप लोकतंत्र के लिए खतरा नहीं बन जाता, सवाल करने की क्षमता इस बात का संकेत हो सकती है कि लोकतंत्र जीवित है. लेकिन इसकी सेहत इस बात पर निर्भर करती है कि सवाल के बाद क्या होता है. एक हैशटैग ध्यान आकर्षित कर सकता है, लेकिन स्थायी बदलाव के लिए ज्ञान, साक्ष्य, नीति और धैर्य की जरूरत होती है. Gen Z को आवाज से जिम्मेदारी की ओर, दर्शक से नागरिक की ओर और आखिरकार संरक्षक की भूमिका की ओर बढ़ना होगा. सरकारों को वैध और शांतिपूर्ण माध्यम बनाने चाहिए, जिनके जरिए युवाओं की असंतुष्टि भागीदारी और सुधार में बदल सके. राजनीतिक दलों को भी उस निराशा का ध्रुवीकरण के लिए इस्तेमाल करने से बचना चाहिए, एक निराश युवा किसी की राजनीतिक संपत्ति नहीं है. यह समझौता पारस्परिक होना चाहिए: समाज Gen Z को अवसर और आवाज देने का ऋणी है. वहीं, Gen Z समाज के प्रति भागीदारी और निर्माण की इच्छा का जिम्मेदार है.
सीखो, काम करो, कमाओ, बनाओ, नेतृत्व करो
इसलिए शायद सबसे बड़ा खतरा एक गुस्सैल पीढ़ी नहीं है. असली खतरा वह पीढ़ी है, जो विश्वास करना बंद कर देती है. जो युवा विरोध करता है, वह अब भी मानता है कि बदलाव संभव है. लेकिन जो चुपचाप कहता है कि "कुछ भी कभी नहीं बदलेगा", वह पहले ही पीछे हटना शुरू कर चुका है, निराशा निंदकता में बदलती है, निंदकता उदासीनता में और उदासीनता संस्थानों से पूरी तरह विश्वास खत्म होने में बदल सकती है. यही कारण है कि असली चुनौती Gen Z को नियंत्रित करना नहीं, बल्कि प्रयास और अवसर के बीच संबंध को फिर से स्थापित करना है. इसका जवाब शायद पांच शब्दों में दिया जा सकता है: सीखो, काम करो, कमाओ, बनाओ, नेतृत्व करो.
Gen Z कोई ऐसी जिम्मेदारी नहीं है, जिसे संभाले जाने का इंतजार हो. असली जिम्मेदारी वह समाज है, जो अपने युवाओं को विकसित करने में विफल रहता है. Gen Z को कैसे संभालना है, यह पूछने के बजाय हमें पूछना चाहिए कि उन्हें कैसे तैयार किया जाए. युवाओं को लाभार्थी मानने के बजाय हमें उन्हें भागीदार के रूप में देखना चाहिए. शांति का मतलब विरोध का अभाव नहीं है. शांति का मतलब यह भरोसा है कि आने वाला कल एक निष्पक्ष अवसर देगा. अगर सरकारें वह अवसर उपलब्ध कराती हैं और Gen Z स्वतंत्रता के साथ आने वाली जिम्मेदारी को स्वीकार करता है, तो यह पीढ़ी दुनिया के लिए समस्या नहीं बनेगी बल्कि यह दुनिया को मिली सबसे बड़ी संपत्तियों में से एक बन सकती है. हम केवल Gen Z के लिए भविष्य तैयार नहीं कर रहे हैं. हम Gen Z को हम सभी के लिए भविष्य संभालने के लिए तैयार कर रहे हैं.
(StartupUI की ग्रोथ एंड बिजनेस डेवलपमेंट टीम के सिद्धांत बंसल द्वारा शोध)
अतिथि लेखक: शशि भूषण दुबे, फाउंडर चेयरमैन, द इंडियन स्कूल ऑफ नेचुरल एंड स्पिरिचुअल साइंसेज
बेहतर नींद और पर्याप्त पानी से लेकर संतुलित आहार और नियमित व्यायाम तक, जीवनशैली की नौ आदतें सूजन (इन्फ्लेमेशन) को कम कर सकती हैं, बुढ़ापे की रफ्तार धीमी कर सकती हैं और बीमारियों के खतरे को घटा सकती हैं.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
कल सुबह मेरी नींद द इकोनॉमिस्ट के एक लेख से खुली, जिसमें पूछा गया था कि क्या चीन ने दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण मशीन हासिल कर ली है और इसे लेकर अमेरिका क्यों चिंतित है. मेरे मन में सबसे पहला विचार आया कि क्या उन्होंने मानव मस्तिष्क और शरीर को बिना बूढ़ा हुए काम करने लायक बनाने में कोई बड़ी सफलता हासिल कर ली है? क्या अमेरिका इसलिए चिंतित है कि अगर लोगों को तेजी से बढ़ती उम्र के कारण बीमारियां नहीं होंगी तो फार्मा उद्योग का कारोबार प्रभावित हो जाएगा? बेशक, खबर वास्तव में एक EUV मशीन के बारे में थी (जिसके विवरण में मैं नहीं जाऊंगी, क्योंकि आप में से अधिकांश इसके बारे में पहले ही पढ़ चुके होंगे).
मेटाबॉलिक बीमारियां, जिनसे आज अधिकांश लोग जूझ रहे हैं, पहले उम्र से जुड़ी बीमारियां मानी जाती थीं. जैसे-जैसे हमारी उम्र बढ़ती है, टाइप-2 डायबिटीज, हृदय रोग और कैंसर का खतरा भी बढ़ जाता है. वास्तव में, कैंसर के प्रमुख जोखिम कारकों में से एक उम्र भी है.
लेकिन पिछले 40 वर्षों में इन बीमारियों के साथ-साथ अवचेतन और पर्यावरणीय प्रतिक्रियाओं से जुड़ी बीमारियां जैसे ऑटोइम्यून रोग, सीओपीडी (COPD), अवसाद, चिंता, बिना कारण होने वाला दर्द, कम उम्र में जोड़ों का कमजोर होना और कई अन्य समस्याओं के मामले तेजी से बढ़े हैं. हम 40 या 50 की उम्र में इतिहास नहीं बनना चाहते. यही तो हमारे जीवन के सबसे सुनहरे साल होते हैं, जब हम काम करते हैं, अपने प्रभाव के लिए पहचाने जाते हैं और संपत्ति भी बनाते हैं. दुर्भाग्य से, हम सभी ने अपने ही उम्र के लोगों के अचानक गिरकर जान गंवाने की खबरें सुनी हैं. यह केवल जेनेटिक्स नहीं है, बल्कि एपिजेनेटिक्स का असर है.
एपिजेनेटिक्स हमारे डीएनए के ऊपर मौजूद उन "निर्देशों" की तरह है, जो यह तय करते हैं कि हमारे जीन कैसे काम करेंगे. एपिजेनेटिक बदलाव किसी जीन को "ऑन" या "ऑफ" कर सकते हैं, जिससे हमारी कोशिकाओं में प्रोटीन बनने की प्रक्रिया प्रभावित होती है. हमारी बीमारी के जोखिम का केवल 10-30 प्रतिशत हिस्सा विरासत में मिले जीन से आता है, जबकि 70-90 प्रतिशत जोखिम एपिजेनेटिक्स यानी हमारी जीवनशैली पर निर्भर करता है. सही जीवनशैली अपनाकर आप आनुवंशिक और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों का जोखिम कम कर सकते हैं और यदि बीमारी हो भी जाए तो उससे जल्दी उबर सकते हैं. दशकों से एपिजेनेटिक्स पर हुए शोध यह बताते आए हैं कि उम्र बढ़ने की गति, सूजन और बीमारियों के जोखिम को कम या ज्यादा किया जा सकता है. सही आदतें सूजन को कम करती हैं, जबकि तनाव, पर्यावरणीय कारण, अस्वास्थ्यकर खानपान और खराब नींद सूजन को बढ़ाते हैं. दुर्भाग्य से, गलत आदतें खराब जीन को भी सक्रिय कर देती हैं, जिससे पुरानी बीमारियों और कैंसर का खतरा बढ़ जाता है.
बेशक, आप यह सब जानते हैं. लेकिन रोजमर्रा की व्यस्त जिंदगी में इन बातों का पालन करना मुश्किल हो जाता है. तो इसे आसान कैसे बनाया जाए ताकि हमारे स्वस्थ रहने की संभावना सबसे अधिक हो?
'द एज पॉज़' के माध्यम से नीचे कुछ आसान और व्यावहारिक कदम दिए गए हैं, जो हमारे मस्तिष्क और शरीर को सूजन का संदेश शरीर की कोशिकाओं तक पहुंचाने से रोकने में मदद करते हैं. ये नियम उसी तरह काम करते हैं जैसे किसी कंप्यूटर या एआई इंजन में सही इनपुट देने पर सही परिणाम मिलता है. इन्हें जीवन में अपनाने से आप अधिक स्वस्थ बन सकते हैं, वजन घटा सकते हैं और अधिक युवा भी दिख सकते हैं.
1. मस्तिष्क को आराम दें.
यह आपका सुपरकंप्यूटर है, जो शरीर की कोशिकाओं तक निर्देश पहुंचाता है. यदि आपको 7-8 घंटे की नींद और पर्याप्त पानी (हर दो घंटे में लगभग 350 एमएल) नहीं मिलता, तो मस्तिष्क की कोशिकाएं डिहाइड्रेट और थक जाती हैं. इससे मस्तिष्क गलत संकेत भेज सकता है और भूख, दर्द या थकान का एहसास करा सकता है, जबकि वास्तव में शरीर को केवल पानी और आराम की जरूरत होती है. नींद प्रकृति का वह तरीका है, जिससे मस्तिष्क आराम करता है, कोशिकाएं तरोताजा होती हैं और शरीर के अंगों तथा आंतों को आराम मिलता है. इससे हृदय गति कम होती है और मेटाबॉलिक व पुरानी बीमारियों का खतरा घटता है. अच्छी नींद तनाव और चिंता को भी कम करती है, जिससे मस्तिष्क सही निर्देश भेज पाता है. दिनभर पर्याप्त पानी पीना भी यही काम करता है. हमारा शरीर 70 प्रतिशत पानी से बना है. पानी मस्तिष्क की कोशिकाओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण पोषक तत्व है. यह उन्हें शांत और हाइड्रेट रखता है तथा झूठी भूख और थकान के संकेतों को कम करता है. पर्याप्त पानी शरीर से अतिरिक्त शर्करा, वसा, लिपिड और रोगजनकों जैसे विषैले तत्वों को बाहर निकालने में भी मदद करता है.
2. 360 डिग्री पोषण अपनाएं.
मस्तिष्क और शरीर के संदेश एक-दूसरे से जुड़े होते हैं. मस्तिष्क के लिए पानी, कार्बोहाइड्रेट, सब्जियां, फल, प्रोटीन और अच्छे वसा जरूरी हैं. वहीं मन के लिए व्यायाम भी उतना ही आवश्यक है, जिसमें मध्यम स्तर का कार्डियो (चलना, तैरना, गोल्फ खेलना, साइकिल चलाना), स्ट्रेंथ ट्रेनिंग (सुबह या शाम 15 मिनट का योग स्ट्रेच) और गहरी सांस लेने की तकनीकें (जैसे अनुलोम-विलोम और बॉक्स ब्रीदिंग) शामिल हैं. ये सभी मिलकर सूजन कम करते हैं और मस्तिष्क से शरीर की कोशिकाओं तक जाने वाले संदेशों को बेहतर बनाते हैं.
3. प्रोटीन बनने के लिए कार्बोहाइड्रेट सोने के समान हैं.
जब प्रोटीन (अमीनो एसिड) रक्त में पहुंचते हैं, तो उन्हें मांसपेशियों तक पहुंचाने के लिए कार्बोहाइड्रेट की जरूरत होती है. कार्बोहाइड्रेट इंसुलिन रेजिस्टेंस कम करने और मांसपेशियां बनाने में मदद करते हैं. खेल पोषण विज्ञान में व्यायाम के बाद प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट का यह संयोजन सबसे प्रभावी माना जाता है, क्योंकि यह केवल प्रोटीन लेने की तुलना में मांसपेशियों के टूटने को रोकता है. कार्बोहाइड्रेट भोजन में प्रोटीन को भी पूरा करते हैं, क्योंकि सभी खाद्य पदार्थों में सभी अमीनो एसिड नहीं होते. यही कारण है कि खिचड़ी, हम्मस और पीटा, बादाम मक्खन के साथ होल व्हीट टोस्ट या दूध के साथ ओट्स जैसी चीजें शरीर को अच्छी तरह पोषण देती हैं. लेकिन यदि आप लंबे समय तक कीटो डाइट पर रहते हैं, तो कुछ समय बाद थकान, तेजी से उम्र बढ़ना और किडनी की कार्यक्षमता में कमी महसूस होने लगती है.
4. सभी खाद्य समूह महत्वपूर्ण हैं.
जैसे हमारा शरीर संपूर्ण है, वैसे ही हमारा भोजन भी संपूर्ण होना चाहिए. जीवनशैली चिकित्सा में हर खाद्य समूह की अपनी भूमिका होती है. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आप कब और कितना खाते हैं. सुबह थोड़ा गर्म कार्बोहाइड्रेट और अच्छे वसा वाला नाश्ता, जैसे एवोकाडो टोस्ट, पोहा या चटनी के साथ चीला, आंतों को शांत रखता है और दिन की शुरुआत के लिए मस्तिष्क को तैयार करता है. दोपहर का प्रोटीनयुक्त भोजन, जैसे अंडे, दालें, सब्जियां और अधिक फाइबर वाले अनाज (ब्राउन राइस, साबुत गेहूं, ज्वार), दोपहर की सुस्ती और शाम की तली-भुनी चीजें खाने की इच्छा को कम करता है. रात के भोजन में सब्जियों का सूप, थोड़ी मात्रा में पीली मूंग दाल, चावल या एक रोटी के साथ घर की बनी सब्जी (ज्यादा पकी हुई नहीं) या सलाद के साथ मैश किए हुए आलू, टोस्ट, चावल या क्विनोआ तथा हल्के प्रोटीन जैसे मेवे या दालें अच्छे विकल्प हैं.
5. अपनी थाली में रंगों का ध्यान रखें.
आपकी मां सही कहती थीं. दोपहर और रात के भोजन में तरह-तरह के रंगों वाली सब्जियां होनी चाहिए. इनमें एंटीऑक्सीडेंट गुण होते हैं, ये उम्र बढ़ने की प्रक्रिया धीमी करती हैं, आंतों की मरम्मत करती हैं और सूजन कम करती हैं. हर सब्जी में अलग प्रकार के लाभकारी बैक्टीरिया होते हैं, इसलिए भोजन में विविधता रखना आंतों के स्वास्थ्य के लिए बेहद जरूरी है. हम जानते हैं कि ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस उम्र बढ़ने और सूजन दोनों को बढ़ाता है. इसलिए सूजन कम करने के लिए ज्यादा और विभिन्न प्रकार की सब्जियां खाएं.
6. बिना संतृप्त (अनसैचुरेटेड) कच्चे वसा का सेवन करें.
वसा से डरिए नहीं. खाना पकाने के लिए तेल केवल स्वाद (तड़का) देने के लिए जरूरी होता है. यदि आपको साबुत मसाले पसंद हैं, तो उन्हें भूनकर स्वाद और खुशबू लें. अलसी का तेल, एक्स्ट्रा वर्जिन ऑलिव ऑयल और बीजों के तेल जैसे अनसैचुरेटेड कच्चे वसा का कुछ सप्ताह तक नियमित और सीमित मात्रा में सेवन हार्मोन संतुलित करता है, खराब वसा कम करता है और मस्तिष्क के स्वास्थ्य को बेहतर बनाता है. इसे सूप, सलाद, उबले आलू या किसी भी भोजन में शामिल करें और देखें कि आपकी त्वचा अधिक युवा, आंखें अधिक स्वस्थ और शरीर अधिक पतला दिखने लगता है.
7. जब 80 प्रतिशत पेट भर जाए, तब खाना बंद कर दें.
मैं कई ऐसे बेहद स्वस्थ लोगों को जानती हूं, जो अपनी थाली में सभी खाद्य समूह रखते हैं, लेकिन मात्रा पर नियंत्रण रखते हैं. वे तब खाना बंद कर देते हैं, जब उनका पेट लगभग 80 प्रतिशत भर जाता है. हर चिकित्सा अध्ययन में पाया गया है कि भूख से लगभग 20 प्रतिशत कम खाना हमारे एंटी-एजिंग जीन SIRT1 को सक्रिय करता है. ऐसा करने के लिए दिनभर पर्याप्त पानी पिएं, क्योंकि कई बार प्यास को भूख समझ लिया जाता है, और दोपहर व रात के भोजन में प्रोटीन लें, ताकि बीच-बीच में ज्यादा खाने की इच्छा न हो. प्रोटीन लंबे समय तक पेट भरा रखता है और लालसा कम करता है. सब्जियों की मात्रा बढ़ाएं, क्योंकि उनमें कैलोरी कम होती है. कार्बोहाइड्रेट की मात्रा आधी करें, लेकिन उन्हें पूरी तरह न छोड़ें.
8. आराम की स्थिति में BMR बढ़ाएं.
अधिकांश मेटाबॉलिक बीमारियां तब शुरू होती हैं, जब आराम की स्थिति में शरीर की कैलोरी जलाने की क्षमता (Resting BMR) कम हो जाती है. इससे रक्त शर्करा बढ़ती है, BMR घटता है और बैठे-बैठे रहने की आदत के कारण शरीर वसा जमा करने लगता है. यदि आप मांसपेशियां बढ़ाने वाले व्यायाम करें, जैसे जगह पर धीरे-धीरे चलना और जॉगिंग करना, सही जूते पहनकर या स्क्वैश खेलना (यदि हृदय और जोड़ स्वस्थ हों), और सप्ताह में दो बार स्ट्रेंथ ट्रेनिंग करें, तो शरीर आराम की स्थिति में भी अधिक कैलोरी जलाता है. बहुत अधिक व्यायाम ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ाता है, जिससे सूजन बढ़ती है. वहीं बिल्कुल व्यायाम न करना भी नुकसानदायक है. इसलिए संतुलित व्यायाम ही सबसे बेहतर है.
9. सप्ताह में एक बार मनपसंद खाना खाएं.
यह सबसे महत्वपूर्ण नियम है. पूरे सप्ताह स्वस्थ भोजन करें, कम खाएं और नियमित व्यायाम करें. फिर रविवार के दोपहर के भोजन में जो मन करे, वह खाएं. ऐसा करने से मस्तिष्क में सकारात्मक बदलाव आता है और सप्ताहभर अनुशासन बनाए रखना आसान हो जाता है. आपको यह महसूस नहीं होता कि आप किसी चीज से वंचित हैं, क्योंकि रविवार का भोजन आपका इंतजार कर रहा होता है. रात के खाने में ऐसा न करें, क्योंकि इससे आपकी स्वस्थ दिनचर्या बिगड़ सकती है. और क्या परिवार या प्रियजनों के साथ रविवार का दोपहर का भोजन सबसे सुखद नहीं होता?
अगली बार तक, ऊपर बताए गए इन नौ उपायों से अपनी उम्र बढ़ने की प्रक्रिया और बीमारियों की रफ्तार को धीमा करें और मुझे बताएं कि आपको इससे कितना लाभ हुआ.
अस्वीकरण: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं और जरूरी नहीं कि वे प्रकाशन के विचारों का प्रतिनिधित्व करते हों.
अतिथि लेखक: डॉ. रचना छाछी
(एपिजेनेटिक्स विशेषज्ञ, कैंसर, पोषण और मानसिक स्वास्थ्य चिकित्सक. वह Epigenetix™, RachnaRestores® और अपने गैर-लाभकारी संगठन Kindness Practice Foundation का संचालन करती हैं. वर्ष 2009 से वह 28 देशों में वरिष्ठ नेतृत्वकर्ताओं का लाइफस्टाइल मेडिसिन के माध्यम से उपचार कर रही हैं. उन्हें Twitter, Instagram, YouTube और LinkedIn पर @rachnarestores के माध्यम से फॉलो किया जा सकता है.)
डॉ. प्रो. सुधा चंद्रशेखर के अनुसार, जैसे-जैसे केरल भारत के सबसे अधिक दीर्घायु समाजों में से एक बनता गया, वैसे-वैसे यह उन शुरुआती राज्यों में भी शामिल हो गया, जिन्हें उस सवाल का सामना करना पड़ा जिसका सामना आने वाले वर्षों में कई अन्य राज्यों को भी करना होगा: जब हर 5 में से 1 व्यक्ति की उम्र 60 वर्ष से अधिक हो, तो ऐसा समाज कैसा होना चाहिए?
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
दशकों तक केरल ने विकास को जीवन प्रत्याशा, साक्षरता और सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार के आधार पर मापा. इन निवेशों का उल्लेखनीय लाभ मिला है. लोग पहले से कहीं अधिक लंबा जीवन जी रहे हैं. लेकिन केवल लंबी उम्र ही अंतिम लक्ष्य नहीं है. वास्तविक प्रगति का पैमाना यह है कि क्या जीवन के ये अतिरिक्त वर्ष अच्छे स्वास्थ्य, आत्मनिर्भरता, वित्तीय सुरक्षा और उद्देश्यपूर्ण जीवन के साथ बिताए जा रहे हैं.
केरल ने कभी भारत को दिखाया था कि स्वास्थ्य और शिक्षा में निवेश किस तरह मानव विकास को बदल सकता है. अब उसके पास देश के अगले विकास मॉडल को परिभाषित करने का अवसर है, एक ऐसा मॉडल, जिसका केंद्र स्वस्थ वृद्धावस्था और दीर्घायु हो. अब जनसंख्या की बढ़ती उम्र को केवल कल्याण के मुद्दे के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. यह केरल के सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक और सामाजिक बदलावों में से एक बनती जा रही है.
बढ़ती उम्र पर होने वाली चर्चा अक्सर पेंशन, अस्पतालों और वृद्धाश्रमों तक सीमित रहती है. हालांकि ये सभी महत्वपूर्ण हैं, लेकिन ये पूरी तस्वीर का केवल एक हिस्सा हैं. आज के वरिष्ठ नागरिक पिछली पीढ़ियों की तुलना में अधिक स्वस्थ, अधिक शिक्षित और अधिक सक्रिय हैं. उनमें से कई काम जारी रखना, मार्गदर्शन देना, स्वयंसेवा करना, यात्रा करना और अपने समुदायों में योगदान देना चाहते हैं. वहीं, बढ़ती जीवन प्रत्याशा का मतलब यह भी है कि अधिक लोगों को अंततः दीर्घकालिक बीमारियों, डिमेंशिया, दिव्यांगता और लंबे समय तक देखभाल की आवश्यकता होगी. इसलिए सार्वजनिक नीति को एक जैसी सभी पर लागू होने वाली सोच से आगे बढ़कर वृद्धावस्था की विविध वास्तविकताओं के अनुरूप होना होगा.
केरल का जनसांख्यिकीय बदलाव राज्य की विशिष्ट चुनौतियों से भी प्रभावित है. प्रवासन ने परिवारों की आय तो बढ़ाई है, लेकिन इसके कारण कई बुजुर्ग अकेले रह गए हैं, जबकि उनके बच्चे भारत के अन्य हिस्सों या विदेशों में अपना करियर बना रहे हैं. छोटे होते परिवार और बदलती सामाजिक संरचनाएं यह संकेत देती हैं कि अनौपचारिक देखभाल व्यवस्था अब बढ़ती जरूरतों को पूरा नहीं कर सकती.
महिलाएं अब भी इस बिना वेतन वाले देखभाल कार्य का बड़ा हिस्सा निभाती हैं, लेकिन उन्हें अक्सर न तो पर्याप्त पहचान मिलती है और न ही राहत. अकेलापन, सामाजिक अलगाव और देखभाल करने वालों पर बढ़ता मानसिक दबाव अब मधुमेह, उच्च रक्तचाप और डिमेंशिया जैसी बीमारियों के साथ सार्वजनिक स्वास्थ्य की चिंता बनते जा रहे हैं. ये केवल सामाजिक कल्याण के अलग-अलग मुद्दे नहीं हैं, बल्कि इस बात के संकेत हैं कि बदलती जनसंख्या के साथ केरल की देखभाल व्यवस्था को भी विकसित होना होगा.
इस बदलाव को पहचानते हुए केरल ने वरिष्ठ नागरिकों के लिए एक समर्पित कल्याण विभाग का गठन कर पहले ही एक महत्वपूर्ण संस्थागत कदम उठाया है. यह इस बात की स्वीकारोक्ति है कि जनसंख्या की बढ़ती उम्र अब केवल सामाजिक कल्याण का विषय नहीं रही, बल्कि पूरे शासन तंत्र की विकास प्राथमिकता बन चुकी है. बढ़ती उम्र का असर स्वास्थ्य और आवास से लेकर स्थानीय शासन, प्रौद्योगिकी, रोजगार और आर्थिक विकास तक हर क्षेत्र पर पड़ता है. इसलिए अलग-अलग योजनाओं के बजाय समन्वित कार्रवाई की आवश्यकता है.
बढ़ती उम्र को केवल बढ़ते बोझ के रूप में देखना भी एक भूल होगी. दुनिया भर में वृद्ध होती आबादी वाले समाज दीर्घायु या सिल्वर इकोनॉमी के माध्यम से नए अवसर पैदा कर रहे हैं. घर आधारित देखभाल, पुनर्वास, सहायक प्रौद्योगिकी, वरिष्ठ नागरिकों के अनुकूल आवास, डिजिटल स्वास्थ्य, वित्तीय सेवाएं और आजीवन शिक्षा तेजी से बढ़ते क्षेत्र बन रहे हैं. ये उद्योग केवल स्वास्थ्य पर होने वाले खर्च से संचालित नहीं हैं, बल्कि रोजगार सृजित कर रहे हैं, निवेश आकर्षित कर रहे हैं, नवाचार को बढ़ावा दे रहे हैं और लोगों के जीवन की गुणवत्ता भी बेहतर बना रहे हैं. भारत की सिल्वर इकोनॉमी का अनुमानित आकार पहले ही लगभग 73,000 करोड़ रुपये है और जनसंख्या के वृद्ध होने के साथ इसके तेजी से बढ़ने की संभावना है. इसलिए वृद्ध होती आबादी की तैयारी केवल सामाजिक निवेश नहीं, बल्कि एक आर्थिक रणनीति भी है.
इस परिवर्तन का नेतृत्व करने के लिए केरल विशिष्ट स्थिति में है. राज्य के पास पहले से ही वे कई आधार मौजूद हैं, जिन्हें दूसरे राज्य अभी विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं—एक मजबूत सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली, सशक्त स्थानीय स्वशासन संस्थाएं, कुदुम्बश्री नेटवर्क, सामुदायिक स्तर पर अग्रणी उपशामक देखभाल व्यवस्था, उच्च साक्षरता और अनुभवी स्वास्थ्यकर्मी. भारत के पहले WHO आयु-अनुकूल शहर के रूप में कोच्चि की मान्यता यह भी दर्शाती है कि वरिष्ठ नागरिकों के अनुकूल शहरी नियोजन अब केवल एक आकांक्षा नहीं, बल्कि एक व्यावहारिक वास्तविकता है.
अब चुनौती पूरी तरह नई व्यवस्थाएं खड़ी करने की नहीं, बल्कि केरल की मौजूदा ताकतों को जोड़कर एक समग्र आयु-तैयार पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करने की है. इसका अर्थ है सामुदायिक स्तर की देखभाल को मजबूत करना, निवारक स्वास्थ्य सेवाओं में निवेश बढ़ाना, पारिवारिक देखभाल करने वालों को सहयोग देना और ऐसे मोहल्ले, परिवहन व्यवस्था तथा डिजिटल सेवाएं विकसित करना, जिनसे वरिष्ठ नागरिक सक्रिय और आत्मनिर्भर बने रह सकें. इसका अर्थ यह भी है कि बुजुर्गों के लिए आर्थिक और सामाजिक योगदान जारी रखने के अवसर उपलब्ध कराए जाएं, जब तक वे स्वयं ऐसा करना चाहें. इसे हासिल करने के लिए स्वास्थ्य, आवास, परिवहन, वित्त, प्रौद्योगिकी, श्रम और स्थानीय शासन सहित विभिन्न क्षेत्रों के बीच सहयोग आवश्यक होगा, केवल सामाजिक कल्याण विभागों के भरोसे नहीं.
शायद सबसे महत्वपूर्ण बदलाव सांस्कृतिक सोच में होना चाहिए. वरिष्ठ नागरिकों को केवल निर्भरता के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए. वे अनुभवी पेशेवर, उद्यमी, शिक्षक, देखभालकर्ता, कुशल कारीगर और सामुदायिक नेता हैं, जिनका ज्ञान और योगदान आज भी अमूल्य है. उत्पादक वृद्धावस्था को बढ़ावा देने से केवल वरिष्ठ नागरिकों को ही नहीं, बल्कि युवाओं, समुदायों और पूरी अर्थव्यवस्था को भी लाभ मिलता है.
केरल जनसांख्यिकीय बदलाव को पलट नहीं सकता और न ही उसे ऐसा करने की इच्छा रखनी चाहिए. लंबा जीवन राज्य की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है. अब चुनौती यह सुनिश्चित करने की है कि दीर्घायु के साथ जीवन की गुणवत्ता भी बनी रहे. यदि केरल ऐसे समुदाय बनाने में सफल होता है, जहां लोग गरिमा के साथ वृद्ध हो सकें, समाज से जुड़े रहें और जीवन के अंतिम वर्षों तक योगदान देते रहें, तो वह एक बार फिर भारत के सामने अनुकरणीय मॉडल प्रस्तुत करेगा. अगला केरल मॉडल इस बात से नहीं आंका जाएगा कि लोग कितने लंबे समय तक जीवित रहते हैं, बल्कि इस बात से कि वे अपने अतिरिक्त वर्षों को कितनी अच्छी तरह जीते हैं.
अतिथि लेखक: डॉ. प्रो. सुधा चंद्रशेखर, सीईओ, स्वास्ति – द हेल्थ कैटेलिस्ट
लेखक बृज बख्शी के अनुसार, इतिहास और हमारे आसपास की दुनिया हमें बताती है कि समाज कुछ चुनिंदा प्रसिद्ध लोगों के सहारे नहीं, बल्कि उन लाखों साधारण लोगों के कारण टिके रहते हैं, जो अपने दायित्वों को निरंतरता और समर्पण के साथ निभाते हैं.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
हमारी अत्यधिक जुड़ी हुई और उपलब्धियों के प्रति जुनूनी दुनिया में, सादगी से जीवन जीने का साधारण-सा कार्य भी अब एक तरह से क्रांतिकारी बन गया है.
हम जहां भी देखते हैं, संदेश एक ही मिलता है, बड़े सपने देखो, और अधिक मेहनत करो, असाधारण बनो. सोशल मीडिया, कॉर्पोरेट सीढ़ियां और सामाजिक सोच हमें लगातार उत्कृष्टता की ओर धकेलते हैं. लेकिन इस निरंतर दौड़ ने एक खामोश महामारी को जन्म दिया है, प्रदर्शन की चिंता. ऐसा महसूस होता है कि हम सभी बहुत तेज दौड़ रहे हैं, लेकिन किसी सार्थक मंजिल तक नहीं पहुंच पा रहे. संतुष्टि हमेशा भविष्य के लिए टलती रहती है और वर्तमान का हर पल एक काल्पनिक, त्रुटिहीन भविष्य की छाया में खो जाता है.
इसकी कीमत बहुत बड़ी है. परिवार अनकही अपेक्षाओं के बोझ तले दब जाते हैं. युवा पेशेवर पहचान और दिखावे की दौड़ में मानसिक और शारीरिक रूप से थक जाते हैं. माता-पिता इस चिंता में रहते हैं कि कहीं उनका "बस ठीक-ठाक" होना उनके बच्चों के लिए नाकाफी तो नहीं. ऐसे माहौल में एक सरल जीवन हार जैसा प्रतीत होता है. लेकिन क्या सच इसके बिल्कुल उलट हो सकता है?
इतिहास और हमारे आसपास की दुनिया हमें बताती है कि समाज कुछ चुनिंदा प्रसिद्ध लोगों के सहारे नहीं, बल्कि उन लाखों साधारण लोगों के कारण टिके रहते हैं, जो अपने दायित्वों को निरंतरता और समर्पण के साथ निभाते हैं. शिक्षक नई पीढ़ी का मार्गदर्शन करते हैं, देखभाल करने वाले दूसरों को सहारा देते हैं, कर्मचारी व्यवस्था को चलाए रखते हैं और माता-पिता प्रेम व जिम्मेदारी के साथ परिवार का पालन-पोषण करते हैं. यही निरंतर योगदान सभ्यता की अदृश्य रीढ़ बनते हैं. एक सरल जीवन हमें उस असाधारण संघर्ष से भी बचाता है, जो लगातार आगे बढ़ने की अंधी दौड़ के साथ आता है, प्रसिद्धि की नाजुकता, अंतहीन तुलना से पैदा होने वाली थकान, शिखर पर पहुंचकर मिलने वाला अकेलापन और सार्वजनिक स्वीकृति की अनिश्चितता. चमक-दमक के बजाय गहराई और प्रदर्शन के बजाय उपस्थिति को चुनने में गहरा संरक्षण छिपा है.
इसी के केंद्र में न्यूनतावाद (मिनिमलिज्म) का शांत दर्शन है. इसका अर्थ केवल कम वस्तुएं रखना नहीं, बल्कि कम भटकाव, कम महत्वाकांक्षाएं और कम भ्रम चुनना भी है. न्यूनतावाद हमें केवल अपने घरों को ही नहीं, बल्कि अपने मन और अपने समय को भी अनावश्यक बोझ से मुक्त करने की सीख देता है. यह हमें इस मिथक पर सवाल उठाने के लिए प्रेरित करता है कि अधिक उपलब्धियां ही अधिक मूल्य देती हैं. इसके बजाय यह हमें उद्देश्यपूर्ण जीवन जीने की आजादी देता है, वास्तव में महत्वपूर्ण बातों पर ध्यान केंद्रित करने, दूसरों को प्रभावित करने के दबाव से मुक्त होने और सच्चे रिश्तों, विश्राम तथा आत्मचिंतन के लिए जगह बनाने की प्रेरणा देता है. अनगिनत विकल्पों से भरी इस शोरगुल वाली दुनिया में न्यूनतावाद याद दिलाता है कि कई बार कम ही वास्तव में बहुत अधिक होता है.
यह सादगी केवल बाहरी स्तर पर सीमित नहीं है, बल्कि भीतर की यात्रा का द्वार भी है. जीवन का वास्तविक अर्थ शायद ही कभी अगली पदोन्नति, एक आदर्श छवि या उपलब्धियों के ढेर में मिलता है. वह तो भीतर झांकने की शांत प्रक्रिया में प्रकट होता है, बेचैन मन को देखना, परिणामों से अपने लगाव को कम करना और ऐसी स्थिरता को पाना जिसे कोई बाहरी सफलता न दे सकती है और न ही छीन सकती है. यह आंतरिक यात्रा किसी नाटकीय त्याग की मांग नहीं करती. यह केवल इतना चाहती है कि हम जीवन के साधारण क्षणों को सजगता के साथ जिएं साझा भोजन, ईमानदारी से किया गया दिनभर का काम, सच्ची मित्रता और अगले दिन फिर उसी गरिमा के साथ उपस्थित होने का संकल्प.
वेदों की प्राचीन ज्ञान परंपरा इस विषय पर कालातीत दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है. ईशावास्य उपनिषद हमें सौम्यता से यह स्मरण कराता है कि हमें सौ वर्षों तक अपने कर्तव्यों का निस्वार्थ भाव से पालन करते हुए पूर्ण जीवन जीना चाहिए, बिना परिणामों से अत्यधिक आसक्ति के. गृहस्थ जीवन काम, परिवार और समाज के प्रति हमारी सामान्य जिम्मेदारियां को किसी निम्न मार्ग के रूप में नहीं, बल्कि ऐसे पवित्र क्षेत्र के रूप में देखा गया है जहां संतुलन, उदारता और आंतरिक विकास को विकसित किया जा सकता है. ऋषियों के अनुसार वास्तविक संतोष जीवन की लय से भागने में नहीं, बल्कि सजगता और अनासक्ति के साथ उसे अपनाने में है. इस दृष्टि से एक सरल जीवन ही वह भूमि बन जाता है, जहां हमारी आंतरिक यात्रा विकसित होती है.
ऐसी दुनिया में, जो अधिक सफलता, अधिक अनुयायियों और अधिक उपलब्धियों की आदी हो चुकी है, सादगी और आत्मचिंतन के साथ जीवन जीने का शांत साहस शायद सबसे मुक्तिदायक विकल्प है. यह हमें गहरी सांस लेने, पूरे मन से प्रेम करने और छोटी-सी दिखने वाली बातों में भी समृद्धि खोजने का निमंत्रण देता है. भविष्य हमसे छोटे सपने देखने के लिए नहीं कहता. वह केवल इतना याद दिलाता है कि उपस्थिति, ईमानदारी और संवेदनशीलता के साथ जिया गया एक सरल जीवन अपने आप में असाधारण होता है. यही वह गरिमा है, जो हम सभी के लिए उपलब्ध है, यदि हमारे पास उसे अपनाने की बुद्धिमत्ता हो.
अतिथि लेखक: बृज बख्शी, पूर्व निदेशक, दूरदर्शन