अब इस पोस्‍ट के लिए दिल्‍ली हाईकोर्ट ने अश्‍नीर ग्रोवर पर लगाया इतने लाख का जुर्माना

अश्‍नीर ग्रोवर को लेकर कोर्ट ने कहा था कि वो उनके व्‍यवहार से स्‍तब्‍ध हैं. सबसे गौरतलब बात ये है कि कोर्ट इस बात से ज्‍यादा स्‍तब्‍ध था कि मना करने के बाद भी उन्‍होंने ऐसा किया. 

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Tuesday, 28 November, 2023
Ashneer Grover

सोशल मीडिया पर अक्‍सर चर्चा में रहने वाले भारत पे के पूर्व एमडी अश्‍नीर ग्रोवर पर दिल्‍ली हाईकोर्ट ने एक असंसदीय पोस्‍ट के लिए 2 लाख रुपये का फाइन लगाया है. सबसे दिलचस्‍प बात ये है कि अश्‍नीर ने कोर्ट को भरोसा दिलाया था कि वो ऐसा नहीं करेंगे. बावजूद उसके उन्‍होंने भारत पे के खिलाफ सोशल मीडिया पर पोस्‍ट किया. इसके लिए उन्‍होंने कोर्ट से माफी मांगी है. कोर्ट ने उन पर 2 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है. 

कोर्ट ने अश्‍नीर को लेकर क्‍या कहा? 
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, कोर्ट ने कहा कि वो अश्‍नीर ग्रोवर के व्‍यवहार से स्‍तब्‍ध हैं. कोर्ट ने ये भी कहा कि वो उसके आदेश का उल्‍लंघन करने के आरोप में उन पर 2 लाख रुपये का जुर्माना भी लगा रहे हैं. गौरतलब है कि अश्‍नीर ग्रोवर ने हाल ही में भारत पे की सीरिज ई फंडिंग राउंड में शामिल इक्विटी आवंटन और दूसरी जानकारियों को सोशल मीडिया पर साझा कर दिया था. इसके बाद भारत पे की मूल कंपनी रेजिलिएंट इनोवेशन ने दिल्‍ली हाईकोर्ट में एक मामला दायर करते हुए कोर्ट से उनके खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की गई थी. 

भारत ने जुटाए थे इस फंडिंग से इतने करोड़ रुपये 
टाइगर ग्‍लोबल की लीडरशिप में और ड्रैगनियर इंवेस्‍टर ग्रुप और दूसरे प्रतिभागियों की मौजूदगी में भारत पे इस राउंड में 370 मिलियन डॉलर की रकम जुटाने में कामयाब रही थी. इतनी बड़ी फंडिंग को जुटाए जाने के कारण भारत पे का वैल्‍यूएशन 2.86 बिलियन डॉलर हो गया था. हालांकि ट्वीट करने के कुछ देर बाद अश्‍नीर ने इसे हटा दिया था. 

दिल्‍ली पुलिस के सामने भी पेश हुए थे अश्‍नीर 
अश्‍नीर ग्रोवर इन दिनों कई तरह की परेशानियों में घिरे हुए हैं. दिल्‍ली हाईकोर्ट की इस इकोनॉमिक विंग के सामने भी पेश हो चुके हैं. ये फिनटेक यूनिकॉर्न के साथ 81 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी के संबंध में था. उन पर ईओब्‍डल्‍यू ने इस मामले में पिछली तारीखों के चालान का इस्‍तेमाल करके पैसा निकालने के मामले की जांच कर रहा था. 

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ज्वेलर झूठों का बड़ा सरताज निकला...300 रुपए के नकली गहने 6 करोड़ में बेच डाले!

अमेरिकी महिला के साथ राजस्थान के एक ज्वेलर ने बड़ी धोखाधड़ी कर डाली. नकली गहने बेचने वाले आरोपियों पर केस दर्ज हो गया है.

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Wednesday, 12 June, 2024
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'पधारो म्हारे देश' के साथ सैलानियों का स्वागत करने वाले राजस्थान में एक अमेरिकी महिला के साथ बड़ी धोखाधड़ी हुई है. धोखेबाज पिता-पुत्र की जोड़ी ने अमेरिकी महिला को 300 रुपए की आर्टिफिशियल ज्वेलरी 6 करोड़ रुपए में बेच दी. जब ज्वेलरी की असलियत का पता चला तो महिला के पैरों तले जमीन खिसक गई. उसने अमेरिकी दूतावास को इस बारे में सूचित किया, इसके बाद आरोपियों के खिलाफ केस दर्ज कर लिया गया है. चलिए जानते हैं कि आखिर धोखेबाजों के सरताज बने पिता-पुत्र की जोड़ी ने कैसे इस पूरे मामले को अंजाम दिया.

ऐसे सामने आई धोखाधड़ी
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, राजस्थान की राजधानी जयपुर (Jaipur) के गोपालजी का रास्ता स्थित एक दुकान से अमेरिकी नागरिक चेरिश (Cherish) ने करीब दो साल पहले 6 करोड़ रुपए के ज्वेलरी खरीदी थी. विक्रेता विक्रेता ने महिला को हॉलमार्क सर्टिफिकेट भी दिया था, जिससे आभूषण की शुद्धता का पता चलता था. हालांकि, जब चेरिश वापस अमेरिका गईं और एक प्रदर्शनी में ज्वेलरी को प्रदर्शित किया, तो उन्हें पता चला कि जिसके लिए उन्होंने 6 करोड़ रुपए खर्च किए हैं वो नकली ज्वेलरी है. 

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कई धाराओं में केस दर्ज
अपने साथ हुई धोखाधड़ी के चलते चेरिश जयपुर लौटीं और ज्वेलर गौरव सोनी से नकली आभूषणों की शिकायत की. उन्होंने अन्य दुकानों से भी आभूषण की शुद्धता की जांच करवाई, जहां इसकी पुष्टि हुई कि गहने नकली हैं और उसकी कीमत मात्र 300 रुपए है. इसके बाद चेरिश ने अमेरिकी दूतावास को घटना की जानकारी दी. ज्वेलर राजेंद्र सोनी और उनके बेटे गौरव सोनी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की कई धाराओं के तहत FIR दर्ज की गई है. जयपुर पुलिस के डीसीपी बजरंग सिंह शेखावत ने बताया कि पुलिस ने आभूषणों को जांच के लिए भेजा था, इसमें पता चला कि गहने में लगे हीरे चंद्रमणि थे. आभूषणों में सोने की मात्रा 14 कैरेट होनी चाहिए थी, लेकिन वह महज दो कैरेट थी. 

फरार हैं दोनों आरोपी
उधर, आरोपी ज्वेलर्स ने भी शिकायत दर्ज कराई थी कि अमेरिकी महिला उसकी दुकान से आभूषण लेकर भाग गई हैं लेकिन जब पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज की जांच की, तो यह बात झूठ निकली. आरोपी ज्वेलर्स अभी फरार हैं. पुलिस ने नकली हॉलमार्क सर्टिफिकेट जारी करने वाले नंदकिशोर नाकाम व्यक्ति को गिरफ्तार कर लिया है. मुख्य आरोपी गौरव सोनी के खिलाफ लुकआउट नोटिस भी जारी किया गया है. अमेरिकी महिला की शिकायत के बाद पुलिस को कई अन्य शिकायतें भी मिलीं हैं, जिनमें गौरव सोनी और राजेंद्र सोनी पर करोड़ों रुपये की धोखाधड़ी का आरोप लगाया गया है. 


कंगना को थप्पड़ मारने वाली कुलविंदर को मिलेगी Gold Ring, इस पार्टी ने किया ऐलान 

कंगना को थप्पड़ मारने वाली CISF कर्मी को सस्पेंड कर दिया गया है और उनके खिलाफ FIR भी दर्ज कराई गई है.

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Tuesday, 11 June, 2024
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भाजपा सांसद और बॉलीवुड एक्ट्रेस कंगना रनौत को चंडीगढ़ एयरपोर्ट पर थप्पड़ मारने वाली CISF की जवान कुलविंदर कौर को भारी समर्थन मिल रहा है. किसान संगठन से लेकर म्यूजिक कंपोजर विशाल ददलानी तक ने कुलविंदर का बचाव किया है. पंजाब में कुलविंदर को लेकर गाने भी बन रहे हैं. इस बीच, थानथाई पेरियार द्रविड़ कड़गम (TPDK) पार्टी ने कुलविंदर कौर को सोने की अंगूठी देने का ऐलान किया है. 

8 ग्राम की रिंग भेजेंगे
दक्षिण भारत की इस पार्टी की तरफ से कुलविंदर को भेजी जाने वाली गोल्ड रिंग में पेरियार की तस्वीर भी लगी होगी. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, TPDK महासचिव केयू रामाकृष्णन ने कहा कि हम कुलविंदर को 8 ग्राम सोने की रिंग भेजने की योजना बना रहे हैं. हम चाहते हैं कि किसानों के लिए निर्भीक तरीके से खड़ी होने वाली इस महिला को सम्मानित किया जाए. गौरतलब है कि थप्पड़ मारने के बाद कुलविंदर कौर ने खुद कहा था कि वो कंगना द्वारा धरने पर बैठे किसानों के लिए अपमानजनक शब्दों का प्रयोग करने से नाराज है. उस धरने में कुलविंदर की मां भी शामिल थीं.

...नहीं तो घर जाएंगे 
रामाकृष्णन ने बताया कि पार्टी कुलविंदर कौर के घर के पते पर गोल्ड रिंग भेजेगी. यदि वह कुरियर को स्वीकार नहीं करेंगी तो हम अपने किसी सदस्य को उनके घर भेजेंगे. हमारा कोई साथी ट्रेन या फ्लाइट से उनके घर जाएगा और रिंग के साथ पेरियार की कुछ पुस्तकें भी गिफ्ट करेगा. हिमाचल प्रदेश के मंडी से नवनिर्वाचित सांसद कंगना रनौत को थप्पड़ मारने के बाद कुलविंदर को म्यूजिक कंपोजर विशाल ददलानी ने नौकरी भी ऑफर की है. हाल ही में उन्होंने कहा था कि अगर कुलविंदर कौर चाहें तो वह उन्हें अच्छी नौकरी दिलवा सकते हैं. 

SIT करेगी जांच
बीते रविवार को मोहाली में कुलविंदर के समर्थन में भी रैली निकाली गई थी. लोगों का कहना है कि इस मामले की जांच की जाए और कौर के खिलाफ एफआईआर रद्द की जाए. मोहाली पुलिस ने तीन सदस्यीय SIT बनाई है. एसपी सिटी हरबीर सिंह अटवाल की अगुआई में यह विशेष जांच दल पूरे मामले की जांच करेगा. पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने सोमवार को इस मुद्दे पर कहा था कि CISF जवान कुलविंदर कौर ने गुस्से के चलते कंगना को थप्पड़ मारा होगा. उन्होंने कहा था कि जो कुछ भी हुआ उस पर उन्हें खेद है. 7 जून को कंगना रनौत को चंडीगढ़ एयरपोर्ट पर CISF कॉन्स्टेबल कुलविंदर कौर ने थप्पड़ मारा था. इसके बाद उन्हें सस्पेंड कर दिया गया और उनके खिलाफ FIR दर्ज की गई.


कितनी अमीर हैं 'यूपी-बिहार में का बा' गाने वालीं नेहा? HC से लगा है करारा झटका

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने नेहा सिंह राठौर के खिलाफ पिछले साल दर्ज FIR को रद्द करने से इनकार कर दिया है.

Last Modified:
Saturday, 08 June, 2024
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लोक गायिका नेहा सिंह राठौर (Neha Singh Rathore) मुश्किल में पड़ती नजर आ रही हैं. मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने उनके खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को रद्द करने से इनकार कर दिया है. नेहा ने प्रदेश के सीधी में एक व्यक्ति द्वारा आदिवासी मजदूर पर पेशाब से जुड़े मामले में विवादित कार्टून शेयर किया था. जिसके बाद उनके विरुद्ध FIR दर्ज कराई गई थी. अदालत ने कहा कि अभिव्यक्ति की आजादी का मौलिक अधिकार पूर्ण अधिकार नहीं है, बल्कि इस पर उचित प्रतिबंध हैं. बता दें कि नेहा 'यूपी बिहार में का बा' वाले गाने से चर्चा में आईं थीं.

क्या है पूरा मामला?
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जस्टिस गुरपाल सिंह अहलूवालिया ने सवाल किया कि नेहा सिंह राठौर ने सोशल मीडिया पर पोस्ट किए गए कार्टून में आरएसएस की खाकी निक्कर का जिक्र करते हुए एक विशेष विचारधारा की पोशाक क्यों जोड़ी, जबकि आदिवासी पर पेशाब के आरोपी व्यक्ति ने वह पोशाक नहीं पहनी थी? हाई कोर्ट ने कहा कि चूंकि याचिकाकर्ता (नेहा) द्वारा अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर अपलोड किया गया कार्टून उस घटना के अनुरूप नहीं था. आवेदक द्वारा अपनी मर्जी से कुछ अतिरिक्त चीजें जोड़ी गई थीं. इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि आवेदक ने अभिव्यक्ति की आजादी के अपने मौलिक अधिकार का प्रयोग करते हुए कार्टून अपलोड किया.

पिछले साल हुई थी FIR
जस्टिस गुरपाल सिंह अहलूवालिया ने कहा कि कलाकार को व्यंग्य के माध्यम से आलोचना करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए, लेकिन कार्टून में किसी विशेष पोशाक को जोड़ना व्यंग्य नहीं कहा जा सकता है. याचिकाकर्ता का प्रयास बिना किसी आधार के किसी विशेष विचारधारा के समूह को शामिल करना था. इसलिए, यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के दायरे में नहीं आता है. यहां तक ​​कि व्यंग्यात्मक अभिव्यक्ति भी भारत के संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत प्रतिबंधित हो सकती है. गौरतलब है कि नेहा सिंह पर पिछले साल आईपीसी की धारा 153 A (जाति, धर्म  जन्म स्थान, निवास के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देना) के तहत केस दर्ज किया गया था.

यहां से होती है कमाई
नेहा ने जो कार्टून पोस्ट किया था उसमें एक व्यक्ति को फर्श पर बैठे दूसरे व्यक्ति पर पेशाब करते हुए दिखाया गया था. कार्टून में खाकी रंग की निक्कर भी जमीन पर पड़ी हुई थी, जो आरोपी प्रवेश शुक्ला के राजनीतिक झुकाव को दर्शा रही थी. लोक गायिका नेहा ने पिछले कुछ वक्त में काफी सुर्खियां बंटोरी हैं. खासकर, नेहा 'यूपी बिहार में का बा' गाने ने उन्हें एकदम से फेमस कर दिया था. वह सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर अपने अंदाज में व्यंग करती हैं. इसकी वजह से उन्हें काफी परेशानियों का भी सामना करना पड़ा है. नेहा ने शौहरत के साथ दौलत भी कमाई है. लोक गायिका के पास करीब 1 से 2 करोड़ रुपए की संपत्ति है. उनकी इनकम का मुख्य सोर्स YouTube और सोशल मीडिया है.


सांसद कंगना को एयरपोर्ट पर थप्पड़ मारने वालीं कुलविंदर कौर को कितना जानते हैं आप?

कंगना को थप्पड़ मारने वालीं CISF कर्मी कुलविंदर कौर को हिरासत में लेकर सस्पेंड कर दिया गया है.

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Friday, 07 June, 2024
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नई-नई सांसद बनीं बॉलीवुड 'क्वीन' कंगना रनौत थप्पड़ कांड को लेकर सुर्खियों में हैं. चंडीगढ़ एयरपोर्ट पर उनके साथ हुई बदसलूकी के वीडियो और तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं. दरअसल, मंडी सांसद कंगना रनौत गुरुवार को दिल्ली जाने के लिए चंडीगढ़ एयरपोर्ट पहुंची थीं. यहां सिक्योरिटी चेक के बाद CISF की एक महिला जवान ने उन्हें थप्पड़ मार दिया. CISF की महिला कर्मी को पूछताछ के बाद सस्पेंड कर दिया गया है. CISF ने उनके खिलाफ FIR भी दर्ज कर ली है.  

15 सालों से CISF में
कंगना ने जिस CISF कर्मी पर थप्पड़ मारने का आरोप लगाया है उनका नाम कुलविंदर कौर है. 35 वर्षीय कुलविंदर को CISF में 15 वर्षों से अधिक हो गए हैं. उनका अब तक का रिकॉर्ड बेदाग रहा है. कुलविंदर के पति भी CISF कर्मी है. कुलविंदर कौर मूल रूप से पंजाब के कपूरथला की रहने वाली हैं और  वर्तमान में वो मोहाली के सेक्टर 64 में रह रही हैं. 2 बच्चों की मां कुलविंदर के भाई शेर सिंह किसान लीडर और किसान मजदूर संघर्ष कमेटी में संगठन सचिव हैं.

किसान आंदोलन से नाता
कुलविंदर पिछले दो साल से चंडीगढ़ एयरपोर्ट पर तैनात हैं. उनका परिवार किसान आंदोलन से जुड़ा रहा है. फिलहाल वह चंडीगढ़ इंटरनेशनल एयरपोर्ट की इंटरनल सिक्योरिटी में ड्यूटी कर रही थीं. थप्पड़ कांड के बाद उन्हें लेकर सोशल मीडिया पर अलग-अलग प्रतिक्रिया आ रही है. उनका एक वीडियो भी सामने आ गया है, जिसमें वह किसान आंदोलन को लेकर दिए गए कंगना रनौत के बयान से नाराजगी जता रही हैं. कंगना ने अपनी शिकायत में कहा है कि उन्हें फ्लाइट से दिल्ली आना था. चंडीगढ़ एयरपोर्ट पर सिक्योरिटी चेक के बाद जब वह बोर्डिंग के लिए जा रही थीं, इसी दौरान कुलविंदर कौर ने उन्हें थप्पड़ मारा. उसके बाद कंगना के साथ यात्रा कर रहे शख्स मयंक मधुर ने भी कुलविंदर कौर को थप्पड़ मारने की कोशिश की.

कुलविंदर के भाई का बयान 
अब इस मामले पर कुलविंदर कौर के भाई शेर सिंह महिवाल की प्रतिक्रिया भी सामने आई है. महिवाल ने कहा कि कंगना ने किसान आंदोलन के दौरान कहा था कि वहां 100 रुपए में महिलाएं आई हैं. कंगना से कहासुनी के बाद मेरी बहन भावनात्मक रूप से गुस्से में आ गई होगी, जिसके कारण ऐसी घटना घटी. उन्होंने कहा कि जवान और किसान दोनों महत्वपूर्ण हैं और हर मायने में अपना कर्तव्य निभा रहे हैं. हम इस मामले में उनका पूरा समर्थन करते हैं.


बायजू की मुश्किलों में इजाफा, अब इन 3 सहायक कंपनियों पर लटकी तलवार

एडटेक कंपनी बायजू लगातार मुश्किलों के भंवर में फंसती जा रही है. सब उसके लिए अमेरिका से बुरी खबर आई है.

Last Modified:
Thursday, 06 June, 2024
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किसी जमाने में अपनी सक्सेस स्टोरी के लिए पहचानी जाने वाली एडटेक कंपनी बायजू (Byju) आज अपनी मुश्किलों को लेकर चर्चा में है. बायजू के लिए मुश्किलें चेरापूंजी की बारिश की तरह हो गई हैं. अब कंपनी के लिए अमेरिका से मुश्किलें बढ़ाने वाली खबर सामने आई है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, बायजू की अमेरिकी सब्सिडियरी कंपनियों को दिवालिया घोषित करने की तैयारी चल रही है. दरअसल, ये कंपनियां अपना कर्जा नहीं चुका पा रही हैं. इन पर करीब 1.2 अरब डॉलर का भारी-भरकम कर्जा है. इसलिए उन्हें दिवालिया घोषित किया जा सकता है.

इन कंपनियों पर गिरेगी गाज
अमेरिका में सब्सिडियरी कंपनियों को लोन देने वाले वित्तीय संस्थानों ने उन्हें दिवालिया घोषित करने के लिए याचिका दायर की है. यह आरोप भी लगाए जा रहे हैं कि पैरेंट कंपनी बायजू इन कंपनियों से करोड़ों रुपए निकाल रही है. एचपीएस इन्वेंस्टमेंट पार्टनर्स के नेतृत्व में कर्जदाताओं ने न्यूरॉन फ्यूल इंक (Neuron Fuel Inc), एपिक क्रिएशंस इंक (Epic Creations Inc) और टैंजिबल प्ले इंक (Tangible Play Inc) के खिलाफ डेलावेयर की अदालत में याचिका दायर की है. यदि इन कंपनियों को दिवालिया घोषित किया जाता है, तो यह बायजू की साख के लिए बड़े झटके समान होगा.

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बायजू रवींद्रन पर लगे आरोप
कर्जदाताओं ने बायजू के संस्थापक बायजू रवींद्रन पर भी कई आरोप लगाए हैं. उनका कहना है कि बायजू अपनी तीन सहायक कंपनियों के बारे में वित्तीय विवरण मुहैया नहीं करा रहे हैं, जो सीधे तौर पर ऋण अनुबंधों का उल्लंघन है. उन्होंने कोर्ट से अपील की है कि इन कंपनियों के खर्च पर तुरंत प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए और उन्हें चलाने के लिए एक ट्रस्टी की नियुक्ति की जानी चाहिए. बता दें कि इस साल की शुरुआत में बायजू अल्फा को भी कर्ज न चुकाने के चलते दिवालिया घोषित कर दिया गया था. गौरतलब है कि बायजू की आर्थिक स्थिति लगातार खराब होती जा रही है. कंपनी के पास अपने कर्मचारियों को समय पर सैलरी देने के भी पैसे नहीं हैं.  


Jaypee Group को झटका, कर्ज में डूबी इस कंपनी के बारे में आई ये बड़ी खबर

नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल ने जयप्रकाश एसोसिएट्स के खिलाफ दिवालिया प्रक्रिया शुरू करने को मंजूरी दे दी है.

Last Modified:
Tuesday, 04 June, 2024
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जेपी समूह (Jaypee Group) की प्रमुख कंपनी जयप्रकाश एसोसिएट्स (Jaiprakash Associates) को बड़ा झटका लगा है. नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) ने कंपनी के खिलाफ दिवालिया प्रक्रिया शुरू करने की मंजूरी दे दी है. आईसीआईसीआई बैंक की ओर से करीब 6 साल पहले इस संबंध में एक याचिका दायर की गई थी, जिस पर अब मंजूरी मिल गई है. जयप्रकाश एसोसिएट्स कंस्ट्रक्शन, सीमेंट और हॉस्पिटेलिटी सेक्टर से जुड़ी है. कंपनी कर्ज के बोझ तले दबी है और करीब 3 हजार करोड़ रुपए चुकाने में नाकाम रही है.  

कर्ज घटाने की कोशिश
जेपी ग्रुप की प्रमुख कंपनी जयप्रकाश एसोसिएट्स ने अपना कर्ज घटाने की कई कोशिशें की हैं. इसके तहत पिछले कुछ वर्षों में कंपनी अपने कई सीमेंट प्लांट्स बेच चुकी है. आईसीआईसीआई बैंक ने बकाया का भुगतान नहीं होने पर NCLT में कंपनी के खिलाफ याचिका दायर की थी. करीब छह सालों के बाद अब जाकर जयप्रकाश एसोसिएट्स के विरुद्ध दिवालिया प्रक्रिया शुरू करने को मंजूरी मिली है. NCLT का यह फैसला जेपी समूह की इस कंपनी के लिए बड़े झटके की तरह है, क्योंकि इससे डालमिया भारत ग्रुप के साथ उसकी एक डील लटक सकती है.

विलय को भी किया खारिज   
एक रिपोर्ट के अनुसार, डालमिया भारत समूह द्वारा जयप्रकाश एसोसिएट्स की सीमेंट, क्लिंकर और बिजली यूनिट्स को 5,666 करोड़ रुपए के मूल्य पर अधिग्रहित किया जाना था. लेकिन दिवालिया प्रक्रिया की मंजूरी मिलने से अब इस डील पर संशय के बादल मंडरा रहे हैं. NCLT ने जेपी इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट लिमिटेड (Jaypee Infrastructure) के साथ जयप्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड के विलय को भी खारिज कर दिया है. बता दें कि सितंबर, 2018 में ICICI बैंक ने जयप्रकाश एसोसिएट्स के खिलाफ दिवालिया प्रक्रिया शुरू करने की अर्जी लगाई थी. इसी तरह, SBI ने भी 15 सितंबर, 2022 तक 6,893.15 करोड़ रुपए के भुगतान में चूक का दावा करते हुए कंपनी के खिलाफ NCLT का दरवाजा खटखटाया था.

शेयर में आई बड़ी गिरावट
जेपी ग्रुप की कई कंपनियां इस समय दिवालिया कार्यवाही का सामना कर रही हैं, जिनमें सीमेंट कॉरपोरेशन और जेपी इंफ्राटेक भी शामिल हैं. ट्रिब्यूनल ने इससे पहले मुंबई के सुरक्षा ग्रुप को नोएडा स्थित जेपी ग्रुप के 9 प्रोजेक्ट को खरीदने की मंजूरी दे दी थी. वहीं, Jaiprakash Associates Limited के शेयर की बात करें, तो आज इनमें बड़ी गिरावट देखने को मिल रही है. खबर लिखे जाने तक यह करीब 10 प्रतिशत के नुकसान के साथ 13.35 रुपए पर कारोबार कर रहे थे. 


बड़े हमले की साजिश नाकाम, आखिर सलमान के पीछे क्यों पड़ा है लॉरेंस बिश्नोई गैंग?

मुंबई पुलिस ने चार लोगों को गिरफ्तार किया है, जो सलमान की कार पर हमले की योजना बना रहे थे.

Last Modified:
Saturday, 01 June, 2024
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बॉलीवुड एक्टर सलमान खान (Salman Khan) लंबे समय से लॉरेंस बिश्नोई गैंग (Lawrence Bishnoi Gang) के निशाने पर हैं. मुंबई पुलिस ने इस गैंग के चार और लोगों को गिरफ्तार किया है, जो पनवेल में सलमान की कार पर अटैक करने की योजना बना रहे थे. गिरफ्त में आए गुर्गों की पहचान पहचान धनंजय उर्फ अजय कश्यप, गौरव भाटिया उर्फ न्हाई, वासपी खान उर्फ ​​वसीम चिकना और जीशान खान उर्फ जावेद खान के रूप में हुई है. पुलिस अब तक लॉरेंस बिश्नोई, अनमोल बिश्नोई, गोल्डी बराड़ सहित कुल 18 लोगों के खिलाफ FIR दर्ज कर चुकी है.

PAK से आने थे हथियार 
सलमान खान पर काफी खतरनाक अटैक की योजना बनाई गई थी. इसके लिए खासतौर पर पाकिस्तान से AK-47, M-16 और AK-92 मंगवाए जाने थे. पकडे गए आरोपियों ने सलमान के घर, फार्म हाउस और कई शूटिंग स्पॉट्स की रेकी भी की थी. पुलिस को उनके मोबाइल से ऐसे कई वीडियो मिले हैं. पुलिस को खबर मिली थी कि लॉरेंस बिश्नोई और संपत नेहरा गैंग के करीब 60 से 70 गुर्गे सलमान खान पर नजर रखे हुए हैं. बिश्नोई गैंग नाबालिगों के जरिए सलमान पर अटैक करने का प्लान बना रहा है. वारदात को अंजाम देने के बाद हमलावरों को बोट के जरिए कन्याकुमारी से श्रीलंका भगाने की भी योजना थी. 

14 अप्रैल को हुई थी फायरिंग 
इससे पहले, 14 अप्रैल को सलमान खान के बांद्रा स्थित गैलेक्सी अपार्टमेंट के सामने सुबह 5 बजे फायरिंग हुई थी. दो बाइकसवार हमलावरों ने 5 राउंड गोली चलाई थी. फायरिंग के समय सलमान अपने घर में ही थे. लॉरेंस के भाई अनमोल बिश्नोई ने सोशल मीडिया पर इस वारदात की जिम्मेदारी ली थी. हमले के दो दिन बाद हमलावरों को गुजरात से गिरफ्तार किया गया था. उन्होंने पूछताछ में लॉरेंस गैंग से फायरिंग के लिए सुपारी मिलने की बात कबूल की थी. इसके बाद मुंबई क्राइम ब्रांच ने बिश्नोई भाइयों को इस केस में आरोपी बनाया. पुलिस लॉरेंस से पूछताछ की तैयारी कर रही है, जो फिलहाल गुजरात की साबरमती जेल में बंद है.

ऐसे शुरू हुई दुश्मनी
चलिए जानते हैं कि आखिर लॉरेंस बिश्नोई गैंग की सलमान से ऐसी क्या दुश्मनी है कि वो लगातार उन्हें धमका रहा है, हमले की साजिश रच रहा है.पूरे मामले को समझने के लिए कुछ साल पीछे जाना होगा. बात 1998 की है, जब सलमान खान फिल्म 'हम साथ-साथ हैं' की शूटिंग के लिए राजस्थान गए थे. इस दौरान, जोधपुर से सटे कांकाणी गांव के पास उन्होंने दो काले हिरणों का शिकार किया था. उनके साथ फिल्म के कुछ अन्य कलाकार भी मौजूद थे. जैसे ही यह खबर सामने आई बवाल मच गया. राजस्थान का बिश्नोई समाज काले हिरण को अपने परिवार का हिस्सा मानता है और वहां काले हिरण की पूजा की जाती है. इस घटना से बिश्नोई समाज बेहद नाराज हुआ और इस नाराजगी से बदले की आग भड़क गई. अप्रैल 2018 में अदालत ने सलमान खान को इस मामले में दोषी करार देते हुए 5 साल की सजा सुनाई. हालांकि, उसी दिन सलमान 50 हजार रुपए के निजी मुचलके पर जमानत लेकर बाहर आ गए. तब से सलमान खान बिश्नोई समाज के निशाने पर हैं.

वक्त बीता, लेकिन दुश्मनी कायम
साल 2023 में लॉरेंस बिश्नोई ने जेल से ही एक वीडियो जारी किया था. इस वीडियो में लॉरेंस ने धमकी देते हुए कहा था कि यदि सलमान खान ने माफी नहीं मांगी, दो अंजाम बहुत बुरा होगा. इस वीडियो को जारी करने से पहले लॉरेंस दो बार बॉलीवुड एक्टर की हत्या की साजिश रच चुका था. अब सामने आई बड़ी साजिश से यह स्पष्ट हो गया है कि मामला भले ही पुराना हो गया हो, लेकिन लॉरेंस बिश्नोई उसे अब तक भूला नहीं है. सलमान को बिश्नोई गैंग से खतरे को देखते हुए ही महाराष्ट्र सरकार ने उन्हें Y+ सिक्योरिटी दी हुई है. 


इस एयर होस्टेस के कारनामे सुनकर आंखों के सामने घूम जाएगी फिल्म Crew की स्टोरी

केरल में एक एयर होस्टेज को सोने के तस्करी के आरोप में गिरफ्तार किया गया है.

Last Modified:
Friday, 31 May, 2024
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हाल ही में तब्बू, करीना कपूर और कृति सेनन की फिल्म क्रू (Crew) रिलीज हुई थी. इस फिल्म में तीनों एयर होस्टेस की भूमिका में नजर आई हैं. Crew में दिखाया गया है कि तीनों एयर होस्टेस आर्थिक परेशानियों के चलते सोने की तस्करी करने लगती हैं. वह अलग-अलग शेप में सोने को भारत से बाहर ले जाती हैं. तस्करी का सोना छिपाने के लिए कई अजीब तरीके भी आजमाती हैं. क्रू की ऑन-स्क्रीन ये स्टोरी केरल में ऑफ-स्क्रीन देखने को मिली है. यानी केरल में बिल्कुल ऐसा ही एक मामला सामने आया है.     

ऐसे छिपा रखा था 1 किलो सोना
एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, केरल के कन्नूर एयरपोर्ट पर एयर इंडिया एक्सप्रेस की एक एयर होस्टेस (Cabin Crew) को सोने की तस्करी के आरोप में गिरफ्तार किया गया है. कस्टम अधिकारियों ने आरोपी से लगभग एक किलो सोना बरामद किया है. एयर होस्टेस यह सोना मस्कट से कथित तौर पर अपने प्राइवेट पार्ट में छिपाकर ला रही थी. बताया जा रहा है कि वह पहले भी कई बार ऐसे सोने की तस्करी कर चुकी है. क्रू मूवी की तरह आरोपी ने भी सोने को अलग शेप में ढाला हुआ था, ताकि वह जांच अधिकारियों को मात दे सके. 

ऐसे सामने आया कारनामा
आरोपी एयर होस्टेस की पहचान कोलकाता निवासी सुरभि खातून के रूप में हुई है और उसे 14 दिनों की रिमांड पर भेजा गया है. सुरभि मस्कट से कन्नूर आ रही एयर इंडिया एक्सप्रेस फ्लाइट की केबिन क्रू मेंबर थी. क्रू फिल्म में तीनों एयर होस्टेस के कारनामों की पोल एक खुफिया जानकारी के आधार पर खुलती है. खातून के साथ भी ऐसा ही हुआ है. जानकारी के अनुसार, कस्टम विभाग को खबर मिली थी कि कोई एयर होस्टेज सोने की तस्करी कर रही है, इसी आधार पर जब सुरभि खातून की तलाशी ली गई तो सभी हैरान रह गए.  

अपनी तरह का पहला मामला
आरोपी एयर होस्टेस ने सोने को बेहद अजीब आकार में ढालकर अपने प्राइवेट में पार्ट में छिपा रखा था. कहा जा रहा है कि भारत में यह पहला मामला है, जब किसी एयरलाइन के चालक दल का कोई सदस्य इस तरह सोना छिपाकर तस्करी करने के आरोप में पकड़ा गया है. सुरभि खातून के कारनामों को देखकर लगता है कि या तो वो फिल्म क्रू से ज्यादा इंस्पायर थीं या फिर बाय चांस फिल्म उनकी कहानी पर बन गई. खैर, जो भी हो दोनों ही कहानियों से एक ही सीख मिलती है कि बुरे काम का नतीजा बुरा ही होता है.   
 


भारत में Insolvency And Bankruptcy Code, 2016 के तहत बिना कर्ज वाली कंपनी का अधिग्रहण करना है आसान, जानिए कैसे?

IBC के प्रावधानों के अनुसार कोई भी व्यक्ति भारत में किसी भी क्षेत्र में और किसी भी सेक्टर की बिना कर्ज वाली कंपनी प्राप्त कर सकता है, बशर्ते कि कोई कॉर्पोरेट देनदार CIRP या लिक्विडेशन के तहत उपलब्ध हो.

Last Modified:
Friday, 31 May, 2024
BWHindia

दुनिया में कहीं भी, जहां कानून का शासन है, एक कर्ज मुक्त (जीरो डेब्ट) कंपनी को अधिग्रहित करना भारत में दिवाला और दिवालियापन संहिता, 2016 ("IBC" या "संहिता" या "कोड") के प्रावधानों के तहत जितना आसान और सहज है, उतना कहीं नहीं है. यह उन कंपनियों और व्यक्तियों के लिए एक बेहतरीन अवसर है जिनके पास काफी पैसा है. वे कंपनियों को चालू स्थिति में उनकी वास्तविक कीमत से कम में, लगभग लिक्विडेशन कॉस्ट पर खरीद सकते हैं, और इस तरह किसी भी उपयुक्त बिजनेस एरिया और इलाके में एक नई कंपनी स्थापित करने के लिए समय, संसाधन और ट्रांजिशन पीरियड को बचा सकते हैं. 

भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने Innoventive Industries Ltd. बनाम ICICI Bank & Anr. - (2018) 1 SCC 407 मामले में यह निर्णय लिया कि संहिता की योजना (कॉर्पोरेट देनदार के संदर्भ में, जिसका अर्थ है एक कॉर्पोरेट व्यक्ति जो किसी व्यक्ति का कर्जदार है जैसा कि IBC के तहत परिभाषित है) यह सुनिश्चित करना है कि जब एक चूक होती है, जिसका मतलब है कि एक कर्ज देय हो जाता है और इसका भुगतान नहीं किया जाता है, तो दिवाला समाधान प्रक्रिया शुरू हो जाती है. धारा 3(12) में चूक को बहुत व्यापक रूप में परिभाषित किया गया है, जिसका मतलब है कि कर्ज का भुगतान नहीं होना, चाहे उसका कुछ हिस्सा ही क्यों न हो या एक किस्त राशि ही क्यों न हो. "कर्ज" का अर्थ जानने के लिए हमें धारा 3(11) पर जाना होगा, जो बताती है कि कर्ज का मतलब "दावा" के संबंध में एक दायित्व या बाध्यता है और "दावा" का मतलब जानने के लिए हमें धारा 3(6) पर वापस जाना होगा जो "दावा" को भुगतान के अधिकार के रूप में परिभाषित करती है, चाहे वह विवादित हो. कोड तब लागू हो जाता है जब चूक की राशि एक करोड़ रुपये या अधिक होती है (धारा 4).

कॉर्पोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया को कॉर्पोरेट देनदार (corporate debtor), वित्तीय लेनदार (financial creditor) या संचालन लेनदार (operational creditor) द्वारा शुरू किया जा सकता है. संहिता में वित्तीय लेनदार और संचालन लेनदार के कर्ज में अंतर किया गया है. वित्तीय लेनदार को धारा 5(7) के तहत एक ऐसे व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया गया है जिसे वित्तीय कर्ज देना होता है और धारा 5(8) में वित्तीय कर्ज को परिभाषित किया गया है जिसका मतलब है कि यह पैसा समय के मूल्य के लिए दिया जाता है. इसके विपरीत, संचालन लेनदार का मतलब है वह व्यक्ति जिसे संचालन कर्ज देना होता है और धारा 5(21) के तहत संचालन कर्ज का मतलब वस्तुओं या सेवाओं के प्रावधान के संबंध में एक दावे से है.

"जब वित्तीय लेनदार इस प्रक्रिया को शुरू करता है, तो धारा 7 महत्वपूर्ण हो जाती है. धारा 7(1) के स्पष्टीकरण के तहत, एक चूक किसी भी वित्तीय लेनदार के लिए देय वित्तीय कर्ज के संबंध में होती है - यह कर्ज आवेदक वित्तीय लेनदार के लिए देय नहीं होना चाहिए. धारा 7(2) के तहत, धारा 7(1) के तहत एक आवेदन उस प्रकार और तरीके में किया जाना चाहिए जो निर्धारित किया गया है, जो हमें दिवाला और दिवालियापन (अधिनिर्णायक प्राधिकारी के लिए आवेदन) नियम, 2016 की ओर ले जाता है। नियम 4 के तहत, आवेदन वित्तीय लेनदार द्वारा फॉर्म 1 में किया जाता है जिसमें आवश्यक दस्तावेज और रिकॉर्ड संलग्न होते हैं। फॉर्म 1 एक विस्तृत फॉर्म है जिसमें 5 भाग होते हैं, जिसमें भाग I में आवेदक के विवरण, भाग II में कॉर्पोरेट देनदार के विवरण, भाग III में प्रस्तावित अंतरिम समाधान पेशेवर के विवरण, भाग IV में वित्तीय कर्ज के विवरण और भाग V में चूक के दस्तावेज, रिकॉर्ड और साक्ष्य होते हैं.

नियम 4(3) के तहत, आवेदक को आवेदन की एक प्रति अधिनिर्णायक प्राधिकारी (Adjudicating Authority) को पंजीकृत डाक या स्पीड पोस्ट द्वारा कॉर्पोरेट देनदार के पंजीकृत कार्यालय में भेजनी होती है. अधिनिर्णायक प्राधिकारी को जानकारी उपयोगिता के रिकॉर्ड या वित्तीय लेनदार द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य के आधार पर चूक के अस्तित्व को 14 दिनों के भीतर सुनिश्चित करना होता है. यह धारा 7(5) के चरण पर है, जहां अधिनिर्णायक प्राधिकारी को यह सुनिश्चित करना होता है कि चूक हुई है, कि कॉर्पोरेट देनदार यह बता सकता है कि चूक नहीं हुई है, जिसका मतलब है कि "कर्ज", जिसमें विवादित दावा भी शामिल हो सकता है, देय नहीं है. कर्ज देय नहीं हो सकता यदि यह कानूनी या तथ्यात्मक रूप से भुगतान योग्य नहीं है. जैसे ही अधिनिर्णायक प्राधिकारी यह सुनिश्चित करता है कि चूक हुई है, आवेदन को स्वीकार करना अनिवार्य होता है, जब तक कि यह अधूरा न हो, इस स्थिति में वह आवेदक को 7 दिनों के भीतर नोटिस प्राप्त होने के बाद दोष को सुधारने के लिए नोटिस दे सकता है. उप-धारा (7) के तहत, अधिनिर्णायक प्राधिकारी फिर आदेश को वित्तीय लेनदार और कॉर्पोरेट देनदार को आवेदन के स्वीकार या अस्वीकार करने के 7 दिनों के भीतर संप्रेषित करेगा.

धारा 7 की योजना धारा 8 की योजना के विपरीत है, जहां एक संचालन लेनदार को चूक होने पर पहले संहिता की धारा 8(1) में दिए गए तरीके से संचालन देनदार को बिना भुगतान किए गए कर्ज का मांग नोटिस देना होता है. धारा 8(2) के तहत, कॉर्पोरेट देनदार मांग नोटिस या उप-धारा (1) में उल्लिखित चालान की प्राप्ति के 10 दिनों के भीतर, संचालन लेनदार को विवाद की उपस्थिति या किसी मुकदमे या मध्यस्थता कार्यवाही की लंबितता का रिकॉर्ड ला सकता है, जो पहले से मौजूद हो, यानी कि ऐसा नोटिस या चालान प्राप्त होने से पहले. जैसे ही ऐसे विवाद का अस्तित्व होता है, संचालन लेनदार संहिता के प्रभाव से बाहर हो जाता है. 

"दूसरी ओर, जैसा कि हमने देखा है, वित्तीय कर्ज की चूक करने वाले कॉर्पोरेट देनदार के मामले में, अधिनिर्णायक प्राधिकारी को केवल सूचना उपयोगिता के रिकॉर्ड या वित्तीय लेनदार द्वारा प्रस्तुत अन्य साक्ष्य को देखकर यह सुनिश्चित करना होता है कि चूक हुई है. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कर्ज विवादित है, जब तक कि कर्ज 'देय' है, यानी कानून द्वारा रोके जाने तक या इसे भविष्य की तारीख में भुगतान के रूप में देय नहीं किया गया है. केवल तभी जब यह अधिनिर्णायक प्राधिकारी की संतुष्टि के लिए साबित हो जाता है कि चूक हुई है, अधिनिर्णायक प्राधिकारी आवेदन को अस्वीकार कर सकता है और नहीं भी. 

दिवाला समाधान प्रक्रिया का बाकी हिस्सा भी बहुत महत्वपूर्ण है. पूरी प्रक्रिया को धारा 12 के तहत आवेदन के स्वीकार किए जाने की तारीख से 180 दिनों के भीतर पूरा किया जाना है और इसे केवल 180 दिनों से आगे 90 दिनों तक ही बढ़ाया जा सकता है यदि ऋणदाताओं की समिति द्वारा 66% वोटिंग शेयरों के आवश्यक प्रतिशत के मतदान से ऐसा निर्णय लिया जाता है. यह देखा जा सकता है कि समय महत्वपूर्ण है यह देखने के लिए कि क्या कॉर्पोरेट इकाई को अपने पैरों पर खड़ा किया जा सकता है, ताकि लिक्विडेशन से बचा जा सके, अधिकतम 330 दिनों की अवधि के भीतर.

जैसे ही आवेदन स्वीकार किया जाता है, धारा 14 के तहत अधिनिर्णायक प्राधिकारी द्वारा अधिस्थगन (Moratorium) की घोषणा की जाती है और एक सार्वजनिक घोषणा की जाती है जिसमें, अन्य बातों के अलावा, दावों की प्रस्तुति की अंतिम तिथि और अंतरिम समाधान पेशेवर के विवरण शामिल होते हैं, जिसे कॉर्पोरेट देनदार के प्रबंधन के साथ लगाया जाता है और दावों को प्राप्त करने के लिए जिम्मेदार होता है. धारा 17 के तहत, कॉर्पोरेट देनदार का पूर्व प्रबंधन एक अंतरिम समाधान पेशेवर ("IRP") में निहित होता है जो संहिता के अध्याय IV के तहत पंजीकृत एक प्रशिक्षित व्यक्ति होता है. यह अंतरिम समाधान पेशेवर अब कॉर्पोरेट देनदार के संचालन को एक चल रहे व्यवसाय के रूप में ऋणदाताओं की समिति ("CoC") के निर्देशों के तहत प्रबंधित करता है, जिसे अधिनियम की धारा 21 के तहत नियुक्त किया गया है. इस समिति द्वारा निर्णय कम से कम 66% वोटिंग शेयरों के वोट से लिए जाते हैं. धारा 28 के तहत, एक समाधान पेशेवर, जो एक अंतरिम समाधान पेशेवर है जिसे समाधान प्रक्रिया को पूरा करने के लिए नियुक्त किया गया है, फिर उसे वित्त जुटाने, सुरक्षा हित बनाने, आदि के लिए व्यापक शक्तियां दी जाती हैं, ऋणदाताओं की समिति की पूर्व स्वीकृति के अधीन.

धारा 30 के तहत, कोई भी व्यक्ति जो कॉर्पोरेट इकाई को फिर से खड़ा करने में रुचि रखता है, समाधान पेशेवर (Resolution Professional) को एक समाधान योजना प्रस्तुत कर सकता है, जो एक सूचना ज्ञापन के आधार पर तैयार की जाती है. इस योजना में दिवाला समाधान प्रक्रिया की लागत का भुगतान, योजना की स्वीकृति के बाद कॉर्पोरेट देनदार के मामलों का प्रबंधन और योजना का कार्यान्वयन और पर्यवेक्षण शामिल होना चाहिए. केवल तभी जब इस योजना को वित्तीय लेनदारों के वोटिंग शेयरों के कम से कम 66% वोट से स्वीकृत किया जाता है और अधिनिर्णायक प्राधिकारी संतुष्ट होता है कि स्वीकृत योजना धारा 30 में उल्लिखित कानूनी आवश्यकताओं को पूरा करती है, वह अंततः इस योजना को स्वीकृत करता है, जो फिर कॉर्पोरेट देनदार और उसके कर्मचारियों, सदस्यों, लेनदारों, गारंटरों और अन्य हितधारकों पर बाध्यकारी होती है. 

महत्वपूर्ण रूप से और यह विषय पर पहले के कानूनों से एक बड़ा प्रस्थान है, जैसे ही अधिनिर्णायक प्राधिकारी समाधान योजना को स्वीकृत करता है, धारा 14 के तहत प्राधिकारी द्वारा पारित अधिस्थगन आदेश का प्रभाव समाप्त हो जाता है. इसलिए संहिता की योजना एक प्रयास करने के लिए है, पूर्व प्रबंधन को अपने अधिकारों से हटाकर और इसे एक पेशेवर एजेंसी (IRP या RP) में निवेश करने के लिए, कॉर्पोरेट इकाई के व्यवसाय को एक चल रहे व्यवसाय के रूप में जारी रखने के लिए जब तक एक समाधान योजना तैयार नहीं हो जाती, इस घटना में प्रबंधन को योजना के तहत सौंप दिया जाता है ताकि कॉर्पोरेट इकाई अपने कर्ज का भुगतान कर सके और फिर से अपने पैरों पर खड़ी हो सके. यह सब 330 दिनों की अवधि के भीतर किया जाना है अन्यथा लिक्विडेशन प्रक्रिया शुरू हो जाती है.

उपरोक्त प्रक्रिया और योजना से यह स्पष्ट है कि एक समाधान आवेदनकर्ता (IBC की धारा 25) नीलामी में हिस्सा लेकर यदि सफल होता है, तो समाधान पेशेवर (Resolution Professional) से कॉर्पोरेट देनदार को ऋणदाताओं की समिति की स्वीकृति के साथ खरीद सकता है। एक बार जब समाधान योजना (IBC की धारा 26) को स्वीकृत और अनुमोदित कर दी जाती है और अधिनिर्णायक प्राधिकारी {IBC की धारा 5(1)} के तहत धारा 31 के तहत स्वीकृत कर दी जाती है, तो यह सभी लेनदारों, शेयरधारकों और सभी हितधारकों पर अप्लाईड होती है, और सफल समाधान आवेदनकर्ता कॉर्पोरेट देनदार का पूर्ण मालिक बन जाता है, जिसमें इसके सभी संपत्तियाँ, कर्मचारी, भूमि/इमारत, संयंत्र और मशीनरी और सभी चल, टेंजिबल और इनटेंजिबल असेट्स और अधिकार शामिल होते हैं.

IBC में कोई विशिष्ट धारा नहीं है जो यह घोषित करती हो कि समाधान योजना के अधिनिर्णायक प्राधिकारी (राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण की उपयुक्त बेंच) द्वारा स्वीकृत किए जाने पर समाधान आवेदनकर्ता द्वारा कॉर्पोरेट देनदार की सफल अधिग्रहण पर, कॉर्पोरेट देनदार के सभी कर्ज और दावे भुगतान/विचार के भुगतान या वित्तीय लेनदारों/संचालन लेनदारों को स्वीकृत समाधान योजना के अनुसार संतुष्ट हो जाएंगे. हालांकि, इस मुद्दे पर कानून को भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा विभिन्न महत्वपूर्ण निर्णयों के माध्यम से अंतिम रूप से स्थापित किया गया है और यह IBC के उद्देश्यों और धारा 31 के प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए है. 

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने, Committee of Creditors of Essar Steel India Ltd. (through authorized signatory) v. Satish Kumar Gupta & Ors. - (2020) 8 SCC 531 मामले में यह निर्णय लिया कि जब संकटग्रस्त संपत्तियों का समाधान होता है, तो IBC बहुत स्पष्ट है. एक सफल समाधान आवेदनकर्ता अचानक पेंडिंग क्लेम का सामना नहीं कर सकता है जब उसकी समाधान योजना को स्वीकृत कर लिया गया है क्योंकि यह अनिश्चितता उत्पन्न करेगा कि संभावित समाधान आवेदनकर्ता को कितना भुगतान करना होगा जो कॉर्पोरेट देनदार का व्यवसाय सफलतापूर्वक अधिग्रहण करता है. सभी दावों को समाधान पेशेवर के पास प्रस्तुत और निर्णय किया जाना चाहिए ताकि संभावित समाधान आवेदनकर्ता को ठीक से पता हो कि क्या भुगतान करना है ताकि वह फिर कॉर्पोरेट देनदार का व्यवसाय अधिग्रहण और चला सके. सफल समाधान आवेदनकर्ता इसे एक नए सिरे से करता है, जैसा कि हमने ऊपर बताया है.

इसमें कोई संदेह नहीं है कि IBC एक फायदेमंद कानून है जो कॉर्पोरेट देनदार को फिर से अपने पैरों पर खड़ा करता है, केवल लेनदारों के लिए वसूली कानून नहीं है. इसलिए, कॉर्पोरेट देनदार के हितों को इसके प्रबंधकों, जो प्रबंधन में होते हैं उनसे अलग कर दिया गया है. इस प्रकार, IBC के तहत समाधान प्रक्रिया का उद्देश्य कॉर्पोरेट देनदार की संकटग्रस्त संपत्तियों के लिए एक समाधान खोजना है. यह प्रक्रिया कॉर्पोरेट देनदार की संपत्तियों के मूल्य को अधिकतम करती है और दिवाला समाधान प्रक्रिया के दौरान उन्हें संरक्षित और सुरक्षित रखती है. अंतिम उद्देश्य सभी हितधारकों के लिए एक लाभकारी समाधान खोजना है, जिसमें लेनदार, कॉर्पोरेट देनदार और समग्र रूप से अर्थव्यवस्था शामिल हैं. इसलिए, यह आवश्यक है कि दिवाला आरंभ तिथि के समय कॉर्पोरेट देनदार के खिलाफ सभी दावों को समाधान पेशेवर के पास प्रस्तुत किया जाए और उनका निर्णय लिया जाए ताकि सफल समाधान आवेदनकर्ता कॉर्पोरेट देनदार को एक नए सिरे से संभाल सके. 

यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि IBC एक व्यापक कोड है, जिसका उद्देश्य भारत में दिवाला और दिवालियापन संकट को हल करना है. कोड के तहत प्रस्तावित प्रक्रिया यह सुनिश्चित करती है कि कॉर्पोरेट देनदार को पुनर्जीवित किया जाए और सभी पिछले दायित्वों के साथ उसे फिर से अपने पैरों पर खड़ा किया जाए और कॉर्पोरेट देनदार का प्रबंधन और नियंत्रण सफल समाधान आवेदनकर्ता को सौंप दिया जाए जो कॉर्पोरेट देनदार को एक साफ स्लेट पर संभाल सके. इसलिए, सफल समाधान आवेदनकर्ता को समाधान योजना को कार्यान्वित करने का एक उचित मौका दिया जाना चाहिए. समाधान प्रक्रिया को बाधित करने का कोई भी प्रयास उन दावों को उठाकर जो समाधान पेशेवर के पास प्रस्तुत नहीं किए गए हैं और उनका निर्णय नहीं लिया गया है, पूरी प्रक्रिया को कमजोर करेगा और IBC के उद्देश्य को विफल कर देगा. 

हम पहले ही देख चुके हैं कि IBC सभी हितधारकों पर लागू होता है, जिसमें सरकारी प्राधिकरण भी शामिल हैं. इसका कारण यह है कि IBC का अंतिम उद्देश्य कॉर्पोरेट देनदार की दिवाला को हल करना और कॉर्पोरेट देनदार को फिर से अपने पैरों पर खड़ा करना और पिछले दायित्वों से मुक्त करना है. समाधान योजना, एक बार स्वीकृत होने के बाद, सभी हितधारकों पर बाध्यकारी होती है, जिसमें वे सरकारी प्राधिकरण भी शामिल हैं जिनके दावे समाधान पेशेवर द्वारा निर्णय नहीं लिए गए हैं, क्योंकि ये दावे अंतिम समाधान योजना का हिस्सा नहीं होते हैं जिसे अधिनिर्णायक प्राधिकारी द्वारा स्वीकृत किया गया है. ऐसे दावे समाप्त हो जाते हैं, और दावेदारों को कॉर्पोरेट देनदार के खिलाफ कोई और रास्ता नहीं मिलता है.

यह भी महत्वपूर्ण है कि जब लेनदारों की समिति द्वारा समाधान योजना स्वीकृत हो जाती है और इसे अधिनिर्णायक प्राधिकारी द्वारा स्वीकृत होने से पहले, कुछ श्रेणी के लेनदारों (जैसे कि संचालन लेनदारों) को उनके बकाया राशि की पूरी छूट नहीं मिल सकती है. यह लेनदारों की समिति का कर्तव्य है कि सभी हितधारकों के हितों का ध्यान रखा जाए और संपत्तियों के मूल्य को अधिकतम किया जाए ताकि बकाया राशि का अधिकतम भुगतान किया जा सके. सफल समाधान आवेदनकर्ता को कॉर्पोरेट देनदार का व्यवसाय एक नई शुरुआत के साथ चलाना चाहिए, पिछले दायित्वों से मुक्त होकर, ताकि कंपनी को पुनर्जीवित किया जा सके और उसे निरंतर बनाए रखा जा सके.

एक बार जब समाधान योजना को अधिनिर्णायक प्राधिकारी द्वारा स्वीकृत कर लिया जाता है, तो जो दावे समाधान योजना का हिस्सा नहीं हैं वे समाप्त हो जाएंगे. कोई भी व्यक्ति किसी ऐसे दावे के बारे में कोई कार्यवाही शुरू या जारी रखने का हकदार नहीं होगा जो समाधान योजना का हिस्सा नहीं है. इन दावों के समाप्त होने में केंद्रीय सरकार, किसी राज्य सरकार या किसी स्थानीय प्राधिकरण के साथ-साथ अन्य सभी हितधारक, जैसे कि कर्मचारी, सदस्य, लेनदार, और गारंटर शामिल हैं. समाधान योजना की स्वीकृति और सभी हितधारकों पर इसके बाध्यकारी प्रभाव, जिसमें दावों का समाप्त होना भी शामिल है, यह सुनिश्चित करते हैं कि सफल समाधान आवेदनकर्ता कॉर्पोरेट देनदार का व्यवसाय बिना किसी बाधा या पिछले दायित्वों के कारण होने वाले व्यवधानों के चला सके. 

धारा 31 IBC में 2019 का संशोधन स्पष्टीकरणात्मक और घोषणात्मक प्रकृति का है और इसलिए इसका प्रभाव पूर्ववर्ती होगा. इस प्रकार, जब NCLT द्वारा समाधान योजना स्वीकृत हो जाती है, तो जो दावे समाधान योजना का हिस्सा नहीं हैं, वे समाप्त हो जाएंगे और उनसे संबंधित कार्यवाहियां समाप्त हो जाएंगी. चूंकि याचिका का विषय वे कार्यवाहियां हैं जो योजना की स्वीकृति से पहले के उत्तरदाताओं के दावों से संबंधित हैं, वे जारी नहीं रह सकतीं. समान रूप से, जो दावे समाधान योजना का हिस्सा नहीं हैं, वे समाप्त हो जाएंगे. 

Tata Power Western Odisha Distribution Ltd. (TPWODL) & Anr. v. Jagannath Sponge Pvt. Ltd. Director - Civil Appeal No. 5556/2023 के मामले में, माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने बिजली आपूर्ति कंपनी द्वारा पिछले बकायों के दावे को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और कहा कि "टाटा पावर वेस्टर्न ओडिशा डिस्ट्रीब्यूशन लिमिटेड बिजली कनेक्शन देने के लिए बकाया राशि का भुगतान कराने पर जोर नहीं दे सकता, जो कि जलप्रपात तंत्र (waterfall mechanism) के अनुसार भुगतान की जानी चाहिए. यदि सफल समाधान आवेदनकर्ता को कॉर्पोरेट देनदार द्वारा भुगतान किए जाने वाले बकायों का भुगतान करने के लिए कहा जाए, तो साफ स्लेट सिद्धांत निष्फल हो जाएगा. कॉर्पोरेट देनदार के बकायों का भुगतान समाधान योजना में निर्धारित तरीके से किया जाना चाहिए, जैसा कि अधिनिर्णायक प्राधिकारी द्वारा स्वीकृत योजना में है. उसी सिद्धांत को Southern Power Distribution Company of Andhra Pradesh Ltd. v. Gavi Siddeswara Steels (India) Pvt. Ltd. & Anr. - SC Civil Appeal No. 5716-5717/2023 के मामले में भी बताया गया था।

Ruchi Soya Industries Ltd. & Ors. v. UOI & Ors. - (2022) 6 SCC 343 के एक अन्य मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अपने पहले के दृष्टिकोण की पुनः पुष्टि करते हुए कहा कि एक बार जब समाधान योजना को अधिनिर्णायक प्राधिकारी द्वारा धारा 31 की उप-धारा (1) के तहत विधिवत स्वीकृत कर लिया जाता है, तो समाधान योजना में दिए गए दावे स्थायी हो जाएंगे और कॉर्पोरेट देनदार, उसके कर्मचारी, सदस्य, लेनदार, केंद्रीय सरकार, राज्य सरकार या किसी स्थानीय प्राधिकरण, गारंटर और अन्य हितधारकों पर बाध्यकारी होंगे. समाधान योजना की स्वीकृति की तिथि पर, सभी दावे जो समाधान योजना का हिस्सा नहीं हैं, समाप्त हो जाएंगे और किसी भी व्यक्ति को ऐसे दावे के संबंध में कोई कार्यवाही शुरू या जारी रखने का हकदार नहीं होगा.

अरुण कुमार जगतरामका बनाम जिंदल स्टील एंड पावर लिमिटेड एवं अन्य - (2021) 7 SCC 474 मामले में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने यह दोहराया कि एक बार समाधान योजना स्वीकृत हो जाने पर यह सभी हितधारकों पर बाध्यकारी हो जाती है और इसे सभी लाभों के साथ प्रस्तुत किया जाता है, जो कि कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 230 से अलग है. धारा 31 के तहत समाधान योजना की स्वीकृति के परिणामस्वरूप साफ सलेट मिलती है, जैसा कि इस कोर्ट ने एस्सार स्टील (इंडिया) लिमिटेड (सीओसी) बनाम सतीश कुमार गुप्ता मामले में कहा है. 

105. कोड की धारा 31(1) स्पष्ट करती है कि एक बार समाधान योजना को ऋणदाताओं की समिति द्वारा स्वीकृत कर दिए जाने पर यह सभी हितधारकों, जिसमें गारंटर भी शामिल हैं, पर बाध्यकारी होगी. इसका कारण यह है कि यह प्रावधान सुनिश्चित करता है कि सफल समाधान आवेदक कॉर्पोरेट देनदार का व्यवसाय एक नई सलेट पर शुरू कर सके. एसबीआई बनाम वी. रामकृष्णन मामले में, इस कोर्ट ने धारा 31 का हवाला देते हुए कहा था

25. उत्तरदाताओं द्वारा धारा 31 का भी प्रबलता से हवाला दिया गया था. यह धारा केवल यह कहती है कि एक बार समाधान योजना, जो ऋणदाताओं की समिति द्वारा स्वीकृत की गई है, प्रभाव में आती है, तो यह कॉर्पोरेट देनदार और गारंटर दोनों पर बाध्यकारी होगी. इसका कारण यह है कि अन्यथा, भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 133 के तहत, बिना गारंटर की सहमति के ऋण में किए गए किसी भी परिवर्तन से गारंटर भुगतान से मुक्त हो जाएगा. वास्तव में, धारा 31(1) यह स्पष्ट करती है कि गारंटर भुगतान से बच नहीं सकता क्योंकि स्वीकृत समाधान योजना में ऐसे प्रावधान शामिल हो सकते हैं जो गारंटर द्वारा किए जाने वाले भुगतानों के बारे में हों. शायद यही कारण है कि फॉर्म 6 में संलग्नक VI(e) और नियम एवं विनियमन 36(2) के तहत व्यक्तिगत गारंटी के संबंध में जानकारी की आवश्यकता होती है. उत्तरदाताओं के दृष्टिकोण का समर्थन करने के बजाय, यह स्पष्ट है कि वास्तव में, धारा 31 एक व्यक्तिगत गारंटर को बिना किसी स्थगन के ऋणों के भुगतान के लिए बाध्य होने के पक्ष में एक और कारक है.

"धारा 31 के तहत स्वीकृत समाधान योजना का लाभ यह है कि सफल समाधान आवेदक कॉर्पोरेट देनदार का व्यवसाय "फ्रेस सलेट" पर शुरू करता है. माननीय सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न मामलों में उपरोक्त दृष्टिकोण के अनुरूप, उच्च न्यायालयों और अपीलीय प्राधिकरण (NCLAT) ने भी फ्रेस सलेट सिद्धांत का पालन करते हुए टिप्पणियां कीं, जिनमें से कुछ मामले और उनकी टिप्पणियां निम्नलिखित हैं:

i.    इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड बनाम आर्सेलर मित्तल निप्पन स्टील इंडिया लिमिटेड - 2023 SCC OnLine Del 6318 
ii.    जेएसडब्ल्यू स्टील लिमिटेड बनाम अशोक कुमार गुल्ला एवं अन्य - 2019 SCC OnLine NCLAT 854 
iii.    शापोरजी पलोनजी एंड कंपनी प्राइवेट लिमिटेड बनाम कोबरा वेस्ट पावर कंपनी लिमिटेड एवं अन्य - 2023 SCC OnLine NCLAT 968 
iv.    क्षेत्रीय भविष्य निधि आयुक्त कर्मचारी भविष्य निधि संगठन बनाम वंदना गर्ग एवं अन्य - 2021 SCC OnLine NCLAT 146 
v.    कस्टम्स एवं एक्साइज कमिश्नर - जयपुर-I बनाम अशिका कॉमर्शियल प्राइवेट लिमिटेड (आरपी राजेश कुमार अग्रवाल के माध्यम से) एवं अन्य - 2022 SCC OnLine NCLAT 1939 
vi.    अश्विनकुमार जयंतिलाल पटेल बनाम श्री संजय जितेंद्रलाल शाह एवं अन्य - 2023 SCC OnLine NCLAT 1085

हालांकि, एक बार उपरोक्त प्रक्रिया पूरी हो जाने और समाधान योजना स्वीकृत हो जाने के बाद, सफल समाधान आवेदक के खिलाफ कोई नया दावा नहीं किया जा सकता या लागू नहीं किया जा सकता. सफल समाधान आवेदक केवल उन्हीं दावों को पूरा करने के लिए बाध्य है जो स्वीकार किए गए हैं और अंततः स्वीकृत समाधान योजना का हिस्सा बने हैं. यह मुद्दा महत्वपूर्ण है क्योंकि सफल समाधान आवेदक को उन दावों का बचाव या विरोध नहीं करना चाहिए जो समाधान योजना में शामिल नहीं हैं और न ही उसे उन कार्रवाइयों का सामना करना चाहिए जो कॉर्पोरेट देनदार के कथित या स्वीकृत बकाया के संबंध में लाए जा सकते हैं जो स्वीकार नहीं किए गए थे. किसी अन्य स्थिति को अपनाने से साफ और नई सलेट सिद्धांतों का उल्लंघन होगा जो IBC के तहत समाधान प्रक्रिया को दिशा देते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने IBC के अंतर्निहित समाधान प्रक्रिया के इरादे का उल्लेख करते हुए इस पहलू को "हाइड्रा-हेडेड मॉन्स्टर" के रूप में वर्णित किया था. वास्तव में, घनश्याम मिश्रा मामले में महत्वपूर्ण रूप से यह कहा गया है कि सभी दावे जो समाधान योजना का हिस्सा नहीं हैं, वे समाप्त हो जाएंगे और कोई भी व्यक्ति ऐसे दावे के संबंध में किसी भी कार्यवाही को "शुरू या जारी" नहीं रख सकता.

"सुप्रीम कोर्ट के "Essar Steel India Limited Through Authorised Signatory" (Supra) के निर्णय से स्पष्ट है कि सफल समाधान आवेदक को अचानक "निर्णयहीन" दावों का सामना नहीं करना पड़ सकता है जब उसकी प्रस्तुत समाधान योजना को स्वीकार कर लिया गया हो, क्योंकि इससे संभावित समाधान आवेदक के द्वारा देय राशि में अनिश्चितता पैदा हो जाएगी जो कॉर्पोरेट देनदार का व्यवसाय सफलतापूर्वक लेता है. सभी दावों को समाधान पेशेवर को प्रस्तुत और निर्णयित करना होगा ताकि संभावित समाधान आवेदक को ठीक से पता हो कि उसे क्या भुगतान करना है ताकि वह कॉर्पोरेट देनदार का व्यवसाय ले सके और चला सके. यह सफल समाधान आवेदक एक नई सलेट पर करता है, जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने बताया है. 

इस तथ्यात्मक परिप्रेक्ष्य में, इस अपील में विचार करने का मुख्य बिंदु यह है कि क्या अपीलकर्ता/'ऑपरेशनल क्रेडिटर' को "Fourth Dimension Solutions" (Supra) में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित अनुपात के प्रकाश में मध्यस्थता कार्यवाही को जारी रखने की अनुमति दी जा सकती है. यह मामला सीनियर वकील श्री पी. नागेश द्वारा प्रस्तुत किया गया है जो SRA का प्रतिनिधित्व करते हैं कि एक बार समाधान योजना को स्वीकृत कर लिया गया है, जैसा कि 'Ghanshyam Mishra and Sons Private Limited' (Supra), 'K. Shashidhar' बनाम 'Indian Overseas Bank & Anr.' 'Maharashtra Seamless Ltd.' बनाम 'Padamanabhan Venkatesh & Ors.' और 'Kalpraj Dharamshi & Anr.' बनाम 'Kotak Investment Advisors Ltd. & Anr.' में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित नजीर में, जो दावे समाधान योजना का हिस्सा नहीं हैं, वे समाप्त हो जाएंगे और कोई भी व्यक्ति ऐसे दावे के संबंध में कोई कार्यवाही जारी रखने का हकदार नहीं होगा. 

समाधान योजना को अनुमोदित करने के बाद, ऐसे सभी दावे जो समाधान योजना का हिस्सा नहीं हैं, समाप्त हो जाएंगे. कोई भी व्यक्ति उस दावे के संबंध में कोई कार्यवाही शुरू या जारी रखने का हकदार नहीं है जो समाधान योजना का हिस्सा नहीं है. सभी बकाया राशि, जिसमें केंद्र सरकार, किसी राज्य सरकार या किसी स्थानीय प्राधिकरण के वैधानिक बकाया शामिल हैं, यदि समाधान योजना का हिस्सा नहीं हैं, तो वे समाप्त हो जाएंगे और ऐसी बकाया राशि के संबंध में समाधान प्राधिकरण द्वारा धारा 31 के तहत स्वीकृति की तारीख से पहले की अवधि के लिए कोई कार्यवाही जारी नहीं रखी जा सकती. 

यह दर्शाता है कि समाधान योजना का हिस्सा नहीं होने वाले ऋणदाताओं के दावे समाधान योजना के स्वीकृत होते ही समाप्त हो जाते हैं. इस समाधान योजना में, कॉर्पोरेट देनदार के निदेशकों के दावों पर समाधान पेशेवर द्वारा विचार नहीं किया गया क्योंकि वे कॉर्पोरेट देनदार से संबंधित पक्ष हैं. हालांकि, एक ही समय में, CoC ने अपनी वाणिज्यिक बुद्धिमानी में उन निदेशकों के दावे को कानून के प्रावधानों के खिलाफ और ऊपर वर्णित सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को अनदेखा करते हुए आगे बढ़ाने की अनुमति दी, जबकि ऑपरेशनल क्रेडिटर्स के दावे पूरी तरह समाप्त हो गए.

निषकर्ष:

उपरोक्त निर्णयों और स्थापित कानून से यह निश्चित है कि कोई भी व्यक्ति भारत के किसी भी क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र और किसी भी क्षेत्र में बिना कर्ज वाली कंपनी प्राप्त कर सकता है, बशर्ते कि कोई कॉर्पोरेट देनदार IBC के प्रावधानों के तहत CIRP या लिक्विडेशन में हो. कॉर्पोरेट देनदार, स्वीकृत समाधान योजना के तहत सभी देनदारियों और दायित्वों, कानूनी या अन्यथा के साथ एक चालू इकाई होगी, साथ ही अन्य संबंधित लाभ भी मिलेंगे.

वास्तव में, लिक्विडेशन के दौरान भी न्यायिक प्राधिकरण अपने विवेकानुसार निर्देश दे सकता है कि एक चालू इकाई के रूप में कॉर्पोरेट देनदार का अधिग्रहण बिना किसी संभावित देनदारियों के हस्तांतरित किया जाए. जैसा कि शिव शक्ति इंटरग्लोब एक्सपोर्ट्स बनाम केटीसी फूड्स (P); कंपनी अपील (AT) (दिवालियापन) संख्या 650 का 2020 NCLAT में रखा गया है. 
 


NCLT में  ZEE MEDIA की बड़ी जीत, ट्रिब्यूनल ने मंजूर की डॉ. सुभाष चंद्रा की याचिका

एनसीएलटी ने दिवालिया कार्यवाही में रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल को बदलने की एस्सेल ग्रुप के संस्थापक डॉ. सुभाष चंद्रा की याचिका को मंजूर कर लिया है.

Last Modified:
Thursday, 30 May, 2024
BWHindia

नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल ने 27 मई को दिए अपने आदेश में तहत ZEE TV के संस्थापक डॉ. सुभाष चंद्रा की कार्यवाही में रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल (RP) को बदलने का निर्देश दिया है. ये आदेश NCLT के समक्ष डॉ. चंद्रा द्वारा दायर एक याचिका के बाद पारित किया गया है, इस याचिका में डॉ चंद्रा ने NCLT  की तरफ से नियुक्त किए गए रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल (RP) को 22 अप्रैल, 2024 के आदेश के तहत बदलने की मांग की थी.  

डॉ सुभाष चंद्रा की ओर से किया गया ये आग्रह

इस केस में पर्सनल गारंटर यानी डॉ सुभाष चंद्रा की ओर से आग्रह किया गया कि वह हजारों करोड़ रुपये के मामले में रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल की क्षमता पर भरोसा करने में असमर्थ है. साथ ही ये भी कहा गया कि था कि रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल को प्रक्रिया में पर्सनल गारंटर का मार्गदर्शन और सहायता करने की स्थिति में होना चाहिए न कि सिर्फ एक पोस्ट ऑफिस की भूमिका में होना चाहिए. कार्यवाही के दौरान, ट्रिब्यूनल को यह भी बताया गया कि पहली बैठक लोधी होटल में रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल द्वारा बुलाई गई थी और रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल के साथ एक वकील भी था, जिसे रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल ने स्वीकार किया था. 

ट्रिब्यूनल ने दिए ये निर्देश

सभी पक्षों को सुनने के बाद ट्रिब्यूनल ने माना कि IBC 2016 की धारा 105 के प्रावधानों के अनुसार कार्यों का निर्वहन करते समय रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल की भूमिका केवल पर्सनल गारंटर के लिए सलाहकार के रूप में सेवा का विस्तार करना है. जिसके बाद ट्रिब्यूनल ने रेजोल्यूशन प्रोफेशनल (RP) को बदलने का निर्देश दिया और आगे निर्देश दिया कि रेजोल्यूशन प्रोफेशनल 22 अप्रैल, 2024 के आदेश के अनुसार अपने कार्यों का निर्वहन नए सिरे से करेगा.

क्या है ये मामाल?

आपको बता दें कि  22 अप्रैल को NCLT में डियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस की याचिका पर मीडिया दिग्गज सुभाष चंद्रा के खिलाफ दिवालिया कार्यवाही शुरू करने का आदेश दिया. दरअसल सुभाष चंद्रा समूह की जुड़ी कंपनी विवेक इन्फ्राकान लिमिटेड को दिए गए कर्ज के गारंटर थे. 2022 में विवेक इन्फ्राकान द्वारा लगभग170 करोड़ रुपये का भुगतान नहीं करने के लिए बाद इंडिया बुल्स हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड ने NCLT का दरवाजा खटखटाया था.