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इमामों के वेतन से जुड़े मुद्दे पर CIC उदय माहुरकर के तीखे तेवर, SC के फैसले पर उठाया सवाल
केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) ने सुप्रीम कोर्ट के 1993 में दिए एक फैसले पर सवाल खड़े करते हुए उसे संविधान का उल्लंघन बताया है.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago
मस्जिदों के इमामों को पारिश्रमिक देने के सुप्रीम कोर्ट के 1993 के आदेश को केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) ने संविधान का उल्लंघन करार दिया है. आयोग ने इसे गलत उदाहरण तय करने वाला फैसला बताते हुए कहा कि इसके चलते अनावश्यक राजनीतिक विवाद और सामाजिक असामंजस्य की स्थिति पैदा हुई है. CIC ने यह बात दिल्ली सरकार और दिल्ली वक्फ बोर्ड द्वारा इमामों को दिए जाने वाले वेतन की जानकारी मांगने वाले एक RTI आवेदन के जवाब में कही.
93 में SC ने दिया था आदेश
एक RTI एक्टिविस्ट के आवेदन पर सुनवाई करते हुए केंद्रीय सूचना आयुक्त उदय माहुरकर ने कहा कि अदालत का यह आदेश संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन करता है. संविधान में कहा गया है कि करदाताओं के पैसे का इस्तेमाल किसी धर्म विशेष के लिए नहीं किया जा सकता. गौरतलब है कि ऑल इंडिया इमाम ऑर्गनाइजेशन की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने 1993 में वक्फ बोर्ड को निर्देश दिया था कि वह उसके द्वारा संचालित मस्जिदों के इमामों को पारिश्रमिक प्रदान करे.
क्या था RTI में?
RTI आवेदन में दिल्ली की मस्जिदों में इमामों को दी जाने वाली सैलरी के बारे में जानकारी मांगी गई थी. साथ ही यह भी पूछा था कि क्या हिंदू मंदिरों के पुजारियों को भी इस तरह का वेतन दिया जा रहा है? उदय माहुरकर ने अपने आदेश की प्रति केंद्रीय कानून मंत्री को भेजने का निर्देश दिया, ताकि संविधान के अनुच्छेद 25 से 28 तक का सही अर्थों में पालन सुनिश्चित हो सके. सूचना आयुक्त माहुरकर ने कहा कि दिल्ली वक्फ बोर्ड को दिल्ली सरकार से लगभग 62 करोड़ रुपए का वार्षिक अनुदान मिलता है, जबकि स्वतंत्र स्रोतों से इसकी अपनी मासिक आय लगभग 30 लाख रुपए है.
सूचना आयुक्त ने केंद्र और राज्यों से सरकारी धन के मामले में सभी धर्मों-संप्रदायों के पुरोहितों से एक जैसा बर्ताव करने के लिए कहा है. उन्होंने आगे कहा कि धार्मिक समानता के अन्य मामलों में भी यह फैसला लागू किया जाना चाहिए.
कितना मिलता है पैसा?
दिल्ली में वक्फ मस्जिदों के इमामों और मुअज्जिनों को 18 हजार और 16 हजार रुपए का मासिक मानदेय दिल्ली सरकार की ओर से करदाताओं के पैसे से दिया जा रहा है. जबकि एक हिंदू मंदिर के पुजारी को उक्त मंदिर को नियंत्रित करने वाले ट्रस्ट से प्रति माह सिर्फ दो हजार रुपए मिल रहे हैं. सूचना आयुक्त ने कहा कि मुस्लिम समुदाय को धार्मिक लाभ देने जैसे कदम, जैसा कि वर्तमान मामले में उठाया गया है, वास्तव में, अंतर धार्मिक सद्भाव को गंभीर रूप से प्रभावित करता है.
मिलेगा 25 हजार का मुआवजा
आयोग ने कहा कि दिल्ली वक्फ बोर्ड ने शुरू में आरटीआई आवेदन का ठीक से जवाब नहीं दिया, जो एक तरह से सूचना को छिपाने का स्पष्ट प्रयास किया गया था. आयोग ने दिल्ली वक्फ बोर्ड और दिल्ली के मुख्यमंत्री के कार्यालय को आरटीआई में मांगी गई जानकारी देने का आदेश दिया है. इसके साथ ही आयोग ने दिल्ली वक्फ बोर्ड को आरटीआई कार्यकर्ता सुभाष अग्रवाल को 25 हजार रुपए मुआवजे देने का आदेश भी दिया है. आयोग का कहना है कि अग्रवाल को जानकारी हासिल करने में संसाधन और समय की बर्बादी से गुजरना पड़ा, इसलिए उन्हें मुआवजा दिया जाए.
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