2000 की नोट वापसी का GDP पर पड़ेगा क्‍या असर? 

इससे उतनी गिरावट तो नहीं होगी जितनी नोटबंदी में हुई थी लेकिन असर तो होगा. जीडीपी पर उसका नेगेटिव असर देखने को मिलेगा. 

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Saturday, 20 May, 2023
2000 Note

आरबीआई ने 2000 के नोट की लीगल टेंडर वैल्‍यू को समाप्‍त कर दी है, अब ये नोट फिलहाल तो बाजार में चलता रहेगा लेकिन इसकी वैद्यता को समाप्‍त कर दी है. आरबीआई के अनुसार ये नोट 30 सितंबर तक ही मान्‍य रहेगा. उसी तारीख तक इस नोट को बदला भी जा सकेगा. लेकिन सवाल ये है कि जैसे 2016 में नोट वापसी का असर देश की GDP पर देखने को मिला था क्‍या इस बार भी सिर्फ 2000 के नोट की वापसी का असर हमारी अर्थव्‍यवस्‍था पर पड़ेगा. इसे लेकर जानकारों का मानना है कि उतना तो नहीं लेकिन असर जरूर पड़ेगा क्‍योंकि इससे कारोबार की स्‍पीड में कमी तो आएगी. 

क्‍या कहते हैं एक्‍सपर्ट 
रिजर्व बैंक ऑ‍फ इंडिया के इस कदम का असर देश की अर्थव्‍यवस्‍था पर होगा या नहीं इस सवाल के जवाब में प्रोफेसर अरुण कुमार कहते हैं क्‍योंकि 2000 रुपये के नोट के लीगल टेंडर में न रहने के कारण इसके चलन पर तो असर पड़ेगा. प्रो. अरुण कुमार कहते है कि अब 2000 रुपये के नोट को कोई स्‍वीकार नहीं करेगा. इससे ट्रेड में परेशानी आनी शुरू हो जाएगी. कोई भी कारोबारी इस बात की परेशानी को नहीं लेगा कि पहले वो ग्राहक से ले और उसके बाद वो बैंक में जमा करे. इसका समाधान वो ये निकालेंगे कि वो लेंगे ही नहीं. वो इसे एक और उदाहरण देकर समझाते हुए कहते हैं कि अगर कोई यूपी का दुकानदार अपना सामान लेने के लिए आया हुआ है और वो अपने साथ कैश में 2000 रुपये का नोट लाया है तो उसके लिए तो परेशानी हो गई है. अब पहले तो वो बैंक से उन्‍हें चेंज कराए उसके बाद वो अपना काम करे. वो कहते हैं कि अगर ट्रेड पर असर होता है तो जीडीपी गिरेगी. अगर ट्रांजैक्‍शन कम होगा तो प्रोडक्‍शन कम होगा. अगर आपकी अर्थव्‍यवस्‍था में असर पड़ने लगे तो उसका असर जीडीपी में भी होगा.

क्‍या कोई और तरीका था
प्रो अरुण कुमार मानते हैं कि सरकार को ऐसा कदम उठाने की कोई जरुरत नहीं थी. ये नोट पहले ही अपने आप खत्‍म हो रहे थे. ऐसे कुछ ही लोग हैं जिनके पास मौजूदा समय में ये नोट मौजूद हैं. कुछ के पास 1 करोड़ हैं तो कुछ के पांच और कुछ के पास 10 करोड़ रुपये हैं. ऐसे में अगर आप उसका एवरेज भी निकालें तो लगभग 36 हजार लोग ही ऐसे आते हैं जिनके पास ये नोट होंगे. ऐसा नहीं है कि बहुत सारे लोग बहुत सारी होर्डिंग कर रहे हैं. उनका ये भी कहना है कि सरकार 5000 लोगों के पीछे पूरे 140 करोड़ लोगों को परेशान करने की कोई जरूरत नहीं थी. वो ये भी कहते हैं कि अब इससे होगा ये कि बैंकों का काम प्रभावित होगा, हालांकि उतना नहीं होगा जितना उस समय हुआ था. लेकिन फिर भी परेशानी तो होगी ही. 

सोमवार से शुरू होगा नोट बदलने का सिलसिला 
शुक्रवार को आरबीआई की ओर से जो ऐलान किया गया है उसके बाद मंगलवार से नोटों को बदलने का सिलसिला शुरू होने जा रहा है. ऐसे में अब असली तस्‍वीर सोमवार से ही देखने को मिलेगी कि आखिर क्‍या कुछ देखने को मिलता है. क्‍या पिछली बार की तरह एक बार‍ फिर बैंकों के बाहर लाइन लगती है या दिए गए समय के अनुसार धीरे-धीरे इन्‍हें बदलने के लिए आते हैं. असली तस्‍वीर सोमवार को ही दिखेगी.
 


स्विगी-जोमैटो के पूर्व अधिकारियों का AI स्टार्टअप लॉन्च, 15 लाख डॉलर की सीड फंडिंग जुटाई

AI आधारित 'पर्सनल करियर रिप्रेजेंटेटिव' तैयार करेगा स्टार्टअप, Swiggy, Razorpay और OfBusiness के दिग्गजों ने किया निवेश

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Tuesday, 04 August, 2026
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स्विगी (Swiggy) और जोमैटो (Zomato) के पूर्व अधिकारियों अनुज राठी और प्रशांत पराशर ने AI स्टार्टअप 'Profound' लॉन्च किया है. कंपनी ने मंगलवार को बताया कि उसने सीड फंडिंग राउंड में 15 लाख डॉलर (USD 1.5 Million) जुटाए हैं. यह स्टार्टअप एक ऐसा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित प्लेटफॉर्म विकसित कर रहा है, जो प्रोफेशनल्स के लिए व्यक्तिगत करियर प्रतिनिधि (Personal Career Representative) की तरह काम करेगा.

इस फंडिंग राउंड में टेक इंडस्ट्री के कई बड़े नामों ने निवेश किया है. इनमें Swiggy के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) श्रीहर्ष मजेटी, Swiggy के सह-संस्थापक नंदन रेड्डी, Zomato के पूर्व अधिकारी पंकज चड्ढा, Razorpay के CEO हर्षिल माथुर, WhatsApp के ग्लोबल हेड कुणाल शाह और OfBusiness के सह-संस्थापक भुवन गुप्ता शामिल हैं. इसके अलावा वेंचर कैपिटल फर्म Stellaris Venture Partners और 3one4 Capital ने भी इस निवेश में भाग लिया.

कंपनी के अनुसार, जुटाई गई पूंजी का इस्तेमाल इंजीनियरिंग और प्रोडक्ट टीम का विस्तार करने, AI क्षमताओं को मजबूत बनाने और अपने मैचमेकिंग व इंट्रोडक्शन इंजन के विकास में तेजी लाने के लिए किया जाएगा.

AI Rep करेगा करियर की देखभाल

बेंगलुरु स्थित Profound खुद को AI-नेटिव प्रोफेशनल नेटवर्किंग प्लेटफॉर्म के रूप में पेश कर रहा है. इस प्लेटफॉर्म पर हर यूजर को एक "AI Rep" मिलेगा. यह AI एजेंट शुरुआती 30 मिनट की वॉयस बातचीत के जरिए यूजर के कार्य अनुभव, विशेषज्ञता, करियर लक्ष्य और निर्णय लेने की शैली को समझेगा. इसके बाद यही AI एजेंट यूजर की ओर से बेहतर करियर अवसर खोजने, प्रोफेशनल परिचय कराने और उपयोगी नेटवर्किंग कनेक्शन सुझाने का काम करेगा.

Profound के सह-संस्थापक और CEO अनुज राठी ने कहा, "जिस तरह अभिनेता के पास एजेंट और खिलाड़ियों के पास मैनेजर होते हैं, उसी तरह Profound हर प्रोफेशनल को उसका अपना AI Rep उपलब्ध कराता है."

कंपनियों को भी मिलेगा AI हायरिंग असिस्टेंट

यह प्लेटफॉर्म केवल नौकरी तलाशने वालों के लिए ही नहीं, बल्कि कंपनियों के लिए भी उपयोगी होगा. हायरिंग मैनेजर अपनी ओपन पोजिशन और टीम के लिए AI प्रतिनिधि बना सकेंगे. इससे कंपनियां पारंपरिक जॉब डिस्क्रिप्शन की बजाय बातचीत के माध्यम से अपनी भर्ती आवश्यकताओं को समझा सकेंगी, जिससे सही उम्मीदवारों की पहचान और बेहतर मैचिंग संभव होगी.

Profound के सह-संस्थापक और मुख्य प्रौद्योगिकी अधिकारी (CTO) प्रशांत पराशर ने कहा कि वॉयस AI में हुई प्रगति के कारण अब किसी प्रोफेशनल के अनुभव, सोच और निर्णय क्षमता को केवल रिज्यूमे या ऑनलाइन प्रोफाइल के कीवर्ड से कहीं बेहतर तरीके से समझा जा सकता है.

बड़े टेक प्लेटफॉर्म का अनुभव

Profound के संस्थापक इससे पहले Swiggy, Zomato, Flipkart, Ola, Cleartrip और Walmart Labs जैसी कंपनियों में प्रोडक्ट और टेक्नोलॉजी लीडरशिप की जिम्मेदारियां संभाल चुके हैं. कंपनी ने बताया कि कई महीनों के रिसर्च और प्रोडक्ट डेवलपमेंट के बाद उसने शुरुआती यूजर्स के लिए प्लेटफॉर्म का अर्ली एक्सेस शुरू कर दिया है. अगले एक साल में कंपनी वैश्विक स्तर पर 10 लाख (1 मिलियन) प्रोफेशनल्स का नेटवर्क बनाने का लक्ष्य लेकर चल रही है. इसके बाद व्यापक बीटा रोलआउट किया जाएगा.

निवेशकों का मानना है कि यह प्लेटफॉर्म पारंपरिक रिज्यूमे और ऑनलाइन प्रोफाइल की सीमाओं को दूर करेगा. बातचीत आधारित AI के जरिए उम्मीदवार की कार्यशैली, निर्णय क्षमता और पेशेवर संदर्भ को बेहतर ढंग से समझा जा सकेगा, जिससे टैलेंट खोजने और भर्ती की प्रक्रिया अधिक प्रभावी बनेगी.
 


Ather Energy का घाटा 71% घटा, जून तिमाही में राजस्व 89% उछला; अगस्त में लॉन्च होगा नया EL स्कूटर

एथर एनर्जी भारत के तेजी से बढ़ते इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए विनिर्माण क्षमता का विस्तार कर रही है. कंपनी भविष्य में हर महीने 60,000 वाहनों के उत्पादन की क्षमता हासिल करना चाहती है.

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Tuesday, 04 August, 2026
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इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर निर्माता एथर एनर्जी ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (Q1 FY27) में शानदार वित्तीय प्रदर्शन दर्ज किया है. कंपनी का घाटा पिछले साल की समान अवधि की तुलना में काफी घटा है, जबकि राजस्व में करीब 89 फीसदी की मजबूत बढ़ोतरी हुई है. बढ़ती बिक्री, बेहतर ऑपरेटिंग प्रदर्शन और इलेक्ट्रिक वाहनों की बढ़ती मांग ने कंपनी के नतीजों को मजबूती दी है. कंपनी ने यह भी घोषणा की है कि उसका नया EL इलेक्ट्रिक स्कूटर अगस्त में पेश किया जाएगा.

51 करोड़ रुपये पर सिमटा शुद्ध घाटा

एथर एनर्जी का शुद्ध घाटा जून तिमाही में घटकर 51 करोड़ रुपये रह गया, जो पिछले वित्त वर्ष की समान तिमाही में 178.2 करोड़ रुपये था. इस तरह कंपनी के घाटे में करीब 71 फीसदी की कमी आई है. वहीं, कंपनी का राजस्व सालाना आधार पर 88.8 फीसदी बढ़कर 1,217 करोड़ रुपये पहुंच गया. यह वृद्धि इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर की मजबूत बिक्री और बढ़ते वॉल्यूम का परिणाम है.

EBITDA घाटे में भी बड़ी कमी

कंपनी के परिचालन प्रदर्शन में भी उल्लेखनीय सुधार हुआ है. जून तिमाही में EBITDA घाटा घटकर 33.4 करोड़ रुपये रह गया, जबकि एक साल पहले यह 134.3 करोड़ रुपये था. कंपनी का कहना है कि उत्पादन और बिक्री बढ़ने से ऑपरेटिंग लीवरेज में सुधार हुआ है, जिससे लागत पर बेहतर नियंत्रण मिला.

EV सेक्टर को लेकर कंपनी का भरोसा कायम

एथर एनर्जी का मानना है कि भारत में इलेक्ट्रिक मोबिलिटी का माहौल आगे भी अनुकूल बना रहेगा. कंपनी के अनुसार, दिल्ली EV पॉलिसी और केंद्र सरकार की PM E-Drive योजना जैसी पहलें देश में इलेक्ट्रिक वाहनों को तेजी से अपनाने में अहम भूमिका निभा रही हैं.

कंपनी का यह भी मानना है कि पेट्रोल की बढ़ती कीमतें और ईंधन उपलब्धता को लेकर बढ़ती चिंताएं इलेक्ट्रिक वाहनों की मांग को और मजबूत करेंगी. कंपनी के मुताबिक, हालिया पेट्रोल मूल्य वृद्धि से पहले ही EV की मांग में तेजी आने लगी थी.

अगस्त में पेश होगा नया EL स्कूटर

एथर एनर्जी अब अपने अगले ग्रोथ फेज की तैयारी कर रही है. कंपनी का नया EL इलेक्ट्रिक स्कूटर जल्द बाजार में आने वाला है. जून तिमाही के दौरान इस मॉडल का होमोलोगेशन पूरा हो चुका है और बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए ट्रायल भी शुरू हो गए हैं.

कंपनी के होसुर प्लांट में इस स्कूटर का व्यावसायिक उत्पादन वित्त वर्ष 2027 की दूसरी तिमाही में शुरू होगा. वहीं, अगस्त में आयोजित होने वाले Ather Community Day के दौरान इस स्कूटर से आधिकारिक तौर पर पर्दा उठाया जाएगा.

हर महीने 60,000 वाहन बनाने की तैयारी

एथर एनर्जी भारत के तेजी से बढ़ते इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए विनिर्माण क्षमता का विस्तार कर रही है. कंपनी भविष्य में हर महीने 60,000 वाहनों के उत्पादन की क्षमता हासिल करना चाहती है.

1,300 करोड़ रुपये जुटाकर मजबूत की वित्तीय स्थिति

उत्पादन विस्तार से पहले कंपनी ने 1,300 करोड़ रुपये का क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल प्लेसमेंट (QIP) सफलतापूर्वक पूरा किया. इसके तहत एथर ने 1.08 करोड़ इक्विटी शेयर 1,202 रुपये प्रति शेयर के भाव पर जारी किए. यह इश्यू प्राइस नियामकीय फ्लोर प्राइस से 2.8 फीसदी प्रीमियम पर था, हालांकि बाजार मूल्य से कुछ कम रखा गया.

कनेक्टेड टेक्नोलॉजी पर भी फोकस

एथर एनर्जी अपने सॉफ्टवेयर और कनेक्टेड-व्हीकल इकोसिस्टम को भी लगातार मजबूत कर रही है. कंपनी ने हाल ही में Gen 2 और उसके बाद के मॉडल, जिनमें 450 Apex, 450X और Rizta Z शामिल हैं, के लिए 'Pothole+ Alerts' फीचर पेश किया है.

यह फीचर कंपनी के कनेक्टेड स्कूटर नेटवर्क से मिले डेटा के आधार पर सवारी के दौरान गड्ढों, टूटी या ऊबड़-खाबड़ सड़कों और स्पीड ब्रेकर की पहले से जानकारी देता है, जिससे राइडिंग को अधिक सुरक्षित और स्मार्ट बनाया जा सके.


2032 तक बिजली क्षेत्र में बड़ा विस्तार, 874 GW क्षमता के लिए ग्रिड और स्टोरेज पर होगा बड़ा निवेश

केंद्रीय ऊर्जा राज्य मंत्री श्रीपाद नाइक ने संसद में एक लिखित जवाब में कहा कि प्रस्तावित बिजली क्षमता वृद्धि को समर्थन देने के लिए व्यापक ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत होगी.

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Tuesday, 04 August, 2026
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भारत की स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता वित्त वर्ष 2031-32 तक बढ़कर 874 गीगावॉट (GW) पहुंचने का अनुमान है. सरकार का कहना है कि इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए ट्रांसमिशन नेटवर्क का विस्तार, ग्रिड का आधुनिकीकरण और ऊर्जा भंडारण (एनर्जी स्टोरेज) प्रणालियों का बड़े पैमाने पर विकास जरूरी होगा. इससे नवीकरणीय ऊर्जा का बेहतर एकीकरण हो सकेगा और देश की लगातार बढ़ती बिजली मांग को विश्वसनीय तरीके से पूरा किया जा सकेगा.

राष्ट्रीय विद्युत योजना (National Electricity Plan) के आधार पर सरकार ने यह जानकारी दी है. केंद्रीय ऊर्जा राज्य मंत्री श्रीपाद नाइक ने संसद में एक लिखित जवाब में कहा कि प्रस्तावित बिजली क्षमता वृद्धि को समर्थन देने के लिए व्यापक ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत होगी.

ट्रांसमिशन नेटवर्क और स्टोरेज होंगे ऊर्जा परिवर्तन की रीढ़

सरकार के अनुसार, जैसे-जैसे देश के ऊर्जा मिश्रण (Energy Mix) में नवीकरणीय ऊर्जा की हिस्सेदारी बढ़ रही है, वैसे-वैसे ग्रिड को अधिक लचीला (Flexible) बनाना और ऊर्जा भंडारण समाधान विकसित करना बेहद महत्वपूर्ण हो गया है. इससे ग्रिड की स्थिरता बनी रहेगी और बिजली आपूर्ति अधिक भरोसेमंद होगी.

केंद्र सरकार ने कहा कि नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन वाले राज्यों से देश के विभिन्न मांग केंद्रों तक बिजली पहुंचाने के लिए ट्रांसमिशन नेटवर्क को लगातार मजबूत किया जा रहा है. इसके साथ ही ग्रिड मॉडर्नाइजेशन और एनर्जी स्टोरेज सिस्टम सौर और पवन ऊर्जा जैसी अनियमित (Intermittent) बिजली उत्पादन को संतुलित करने में अहम भूमिका निभाएंगे.

RDSS योजना से बिजली वितरण व्यवस्था होगी मजबूत

सरकार ने बताया कि रिवैम्प्ड डिस्ट्रीब्यूशन सेक्टर स्कीम (RDSS) बिजली वितरण कंपनियों की परिचालन क्षमता और वित्तीय स्थिति सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है. इस योजना के तहत बिजली वितरण नेटवर्क को आधुनिक बनाया जा रहा है और स्मार्ट मीटर लगाए जा रहे हैं, ताकि बिजली आपूर्ति की गुणवत्ता और विश्वसनीयता बेहतर हो सके.

पश्चिम बंगाल में भी तेजी से बढ़ा बिजली नेटवर्क

उत्तर बंगाल से जुड़े एक सवाल के जवाब में सरकार ने कहा कि पश्चिम बंगाल में भी विभिन्न केंद्रीय योजनाओं के तहत ट्रांसमिशन और वितरण नेटवर्क का व्यापक विस्तार किया गया है. RDSS के तहत राज्य में 19,893 करोड़ रुपये की परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है. वहीं, दीन दयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना (DDUGJY), इंटीग्रेटेड पावर डेवलपमेंट स्कीम (IPDS) और सौभाग्य योजना के तहत 11,049 करोड़ रुपये की बिजली वितरण परियोजनाएं लागू की गई हैं.

दार्जिलिंग और कालिम्पोंग में भी मजबूत हुआ ट्रांसमिशन नेटवर्क

ऊर्जा मंत्रालय ने बताया कि पश्चिम बंगाल में नए सबस्टेशन और ट्रांसमिशन लाइनों के जरिए ट्रांसमिशन नेटवर्क को मजबूत किया गया है. इनमें दार्जिलिंग और कालिम्पोंग जैसे क्षेत्रों की परियोजनाएं भी शामिल हैं.

सरकार के मुताबिक, इन पहलों का उद्देश्य बिजली आपूर्ति की विश्वसनीयता बढ़ाना, वितरण के दौरान होने वाले नुकसान (Distribution Losses) को कम करना और क्षेत्र में बढ़ती बिजली मांग को बेहतर तरीके से पूरा करना है.


LIC में हिस्सेदारी बेचेगी सरकार, 6.5% OFS आज से खुला, जानिए निवेशकों के लिए कितना बड़ा मौका

इस OFS के जरिए सरकार करीब 31,000 करोड़ रुपये जुटा सकती है. साथ ही, इससे LIC को न्यूनतम सार्वजनिक शेयरधारिता (MPS) के नियमों को पूरा करने की दिशा में भी मदद मिलेगी.

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Tuesday, 04 August, 2026
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केंद्र सरकार ने देश की सबसे बड़ी बीमा कंपनी भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) में 6.5 फीसदी तक हिस्सेदारी बेचने का फैसला किया है. ऑफर फॉर सेल (OFS) के जरिए होने वाली इस हिस्सेदारी बिक्री का फ्लोर प्राइस 382 रुपये प्रति शेयर तय किया गया है. नॉन-रिटेल निवेशकों के लिए यह इश्यू आज (4 अगस्त) से खुल गया है, जबकि रिटेल निवेशक 5 अगस्त को बोली लगा सकेंगे. इस OFS के जरिए सरकार करीब 31,000 करोड़ रुपये जुटा सकती है. साथ ही, इससे LIC को न्यूनतम सार्वजनिक शेयरधारिता (MPS) के नियमों को पूरा करने की दिशा में भी मदद मिलेगी.

दो चरणों में होगी हिस्सेदारी की बिक्री

निवेश और लोक संपत्ति प्रबंधन विभाग (DIPAM) के मुताबिक, सरकार पहले चरण में 2.5 फीसदी हिस्सेदारी बेचेगी. इसके साथ 4 फीसदी का ग्रीन शू विकल्प भी रखा गया है. यदि निवेशकों की मांग मजबूत रही तो कुल 6.5 फीसदी हिस्सेदारी बेची जाएगी. इस तरह सरकार 82.22 करोड़ से अधिक शेयर बाजार में उतारेगी.

382 रुपये रखा गया फ्लोर प्राइस

OFS के लिए फ्लोर प्राइस 382 रुपये प्रति शेयर तय किया गया है, जो सोमवार को बीएसई पर LIC के 424.35 रुपये के बंद भाव से करीब 10 फीसदी कम है. नॉन-रिटेल निवेशकों के लिए इश्यू 4 अगस्त को खुला है, जबकि रिटेल निवेशक 5 अगस्त को इसमें भाग ले सकेंगे.

सरकार को मिल सकते हैं 31,000 करोड़ रुपये

अगर पूरा OFS सफल रहता है और सभी शेयर फ्लोर प्राइस पर बिक जाते हैं तो सरकार को करीब 31,000 करोड़ रुपये मिल सकते हैं. यह विनिवेश कार्यक्रम सरकार के पूंजी जुटाने और सार्वजनिक हिस्सेदारी बढ़ाने की रणनीति का हिस्सा है.

क्यों जरूरी है यह OFS?

वर्तमान में LIC में सरकार की 96.5 फीसदी हिस्सेदारी है. सेबी ने LIC को 16 मई 2027 तक न्यूनतम 10 फीसदी सार्वजनिक शेयरधारिता (Minimum Public Shareholding) हासिल करने की छूट दी है. यह OFS उसी लक्ष्य की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है.

2022 के IPO के बाद दूसरी बड़ी हिस्सेदारी बिक्री

LIC का ऐतिहासिक IPO मई 2022 में आया था, जब सरकार ने 3.5 फीसदी हिस्सेदारी बेची थी. अब करीब चार साल बाद सरकार एक बार फिर OFS के जरिए अपनी हिस्सेदारी घटाने जा रही है. इससे बाजार में LIC के शेयरों की उपलब्धता बढ़ेगी और शेयर की लिक्विडिटी में सुधार होगा.

निवेशकों और शेयर पर क्या होगा असर?

बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि बड़े OFS के दौरान शेयरों की अतिरिक्त सप्लाई के कारण अल्पावधि में कीमतों में उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है. हालांकि, लंबी अवधि में इससे शेयर की लिक्विडिटी बढ़ती है और निवेशकों के लिए ट्रेडिंग आसान होती है. 382 रुपये का फ्लोर प्राइस उन निवेशकों के लिए भी आकर्षक अवसर हो सकता है, जो अब तक LIC के शेयर में निवेश नहीं कर पाए हैं.
 


तेल कंपनियों पर सरकार का बड़ा फैसला, पेट्रोल-डीजल और ATF के निर्यात पर बढ़ा विंडफॉल टैक्स

सरकार का कहना है कि यह फैसला वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों और रिफाइनिंग मार्जिन की समीक्षा के बाद लिया गया है. हालांकि, इस बढ़ोतरी का असर घरेलू पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर नहीं पड़ेगा.

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Tuesday, 04 August, 2026
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केंद्र सरकार ने पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात पर लगने वाले विंडफॉल टैक्स (स्पेशल एडिशनल एक्साइज ड्यूटी) में एक बार फिर बढ़ोतरी कर दी है. नए फैसले के तहत डीजल, पेट्रोल और एयर टर्बाइन फ्यूल (ATF) के एक्सपोर्ट पर टैक्स बढ़ा दिया गया है. सरकार का कहना है कि यह फैसला वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों और रिफाइनिंग मार्जिन की समीक्षा के बाद लिया गया है. हालांकि, इस बढ़ोतरी का असर घरेलू पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर नहीं पड़ेगा, लेकिन निर्यात करने वाली निजी रिफाइनिंग कंपनियों के मार्जिन पर दबाव बढ़ सकता है.

डीजल, पेट्रोल और ATF पर कितना बढ़ा टैक्स?

वित्त मंत्रालय की अधिसूचना के अनुसार, 3 अगस्त से डीजल के निर्यात पर स्पेशल एडिशनल एक्साइज ड्यूटी (SAED) 15.5 रुपये प्रति लीटर से बढ़ाकर 25.5 रुपये प्रति लीटर कर दी गई है. वहीं, ATF के निर्यात पर यह शुल्क 14.5 रुपये से बढ़कर 22 रुपये प्रति लीटर हो गया है. पेट्रोल के निर्यात पर लगने वाला टैक्स भी 2.5 रुपये से बढ़ाकर 3.5 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया है.

क्या होता है विंडफॉल टैक्स?

जब वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों या रिफाइनिंग मार्जिन में तेजी के कारण तेल कंपनियों को अप्रत्याशित (Windfall) मुनाफा होता है, तब सरकार उस अतिरिक्त लाभ का एक हिस्सा टैक्स के रूप में वसूलती है. इस टैक्स का उद्देश्य घरेलू बाजार में ईंधन की उपलब्धता बनाए रखना और कंपनियों को केवल ऊंचे मुनाफे के लिए बड़े पैमाने पर निर्यात करने से रोकना है.

सरकार ने क्यों बढ़ाया निर्यात शुल्क?

पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव के बीच सरकार ने मार्च से डीजल और ATF के निर्यात पर विंडफॉल टैक्स लागू किया था, जबकि मई से पेट्रोल भी इसके दायरे में आ गया. सरकार हर पखवाड़े वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों और रिफाइनिंग मार्जिन की समीक्षा के आधार पर इस टैक्स में बदलाव करती है. ताजा बढ़ोतरी भी इसी समीक्षा प्रक्रिया का हिस्सा है.

किन कंपनियों पर पड़ेगा सबसे ज्यादा असर?

इस फैसले का सबसे अधिक असर उन निजी रिफाइनिंग कंपनियों पर पड़ सकता है, जो अपने उत्पादों का बड़ा हिस्सा विदेशों में बेचती हैं. रिलायंस इंडस्ट्रीज और नयारा एनर्जी जैसी कंपनियों के निर्यात मार्जिन पर इसका दबाव बढ़ सकता है. दूसरी ओर, इंडियन ऑयल (IOCL), भारत पेट्रोलियम (BPCL) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम (HPCL) जैसी सरकारी तेल कंपनियों पर इसका असर सीमित रहने की संभावना है, क्योंकि उनका अधिकांश उत्पादन घरेलू बाजार में ही खपता है.

क्या महंगा होगा पेट्रोल-डीजल?

घरेलू उपभोक्ताओं के लिए राहत की बात यह है कि विंडफॉल टैक्स में बढ़ोतरी का असर पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों पर नहीं पड़ेगा. यह टैक्स केवल निर्यात किए जाने वाले ईंधन पर लगाया जाता है. इसलिए देशभर के पेट्रोल पंपों पर मिलने वाले पेट्रोल और डीजल की कीमतों में फिलहाल किसी बदलाव की संभावना नहीं है.
 


RBI की स्वैप योजना का असर, FCNR(B) जमा बढ़ते ही बैंकों की CD पर निर्भरता घटी

FCNR(B) जमा बढ़ने से बैंकिंग प्रणाली में नकदी की स्थिति मजबूत हुई है. इसका असर CD की ब्याज दरों पर भी पड़ा और जून के आखिर से ये दरें 7.57 फीसदी से घटकर 6.85 फीसदी पर आ गईं.

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Tuesday, 04 August, 2026
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विदेशी मुद्रा अनिवासी (बैंक) यानी FCNR(B) जमा में तेज बढ़ोतरी का असर अब बैंकों की फंडिंग रणनीति पर भी साफ दिखाई देने लगा है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की रियायती स्वैप सुविधा के बाद बैंकों ने विदेशी मुद्रा जमा जुटाने पर जोर दिया, जिससे सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट (CD) के जरिए धन जुटाने की जरूरत कम हो गई. इसी का नतीजा है कि जुलाई में बैंकों और वित्तीय संस्थानों ने CD के जरिए करीब 95,000 करोड़ रुपये जुटाए, जबकि जून में यह आंकड़ा 1.8 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया था. बढ़ी हुई नकदी के चलते CD की ब्याज दरों में भी 70 आधार अंकों तक की गिरावट दर्ज की गई.

जून के मुकाबले जुलाई में आधा रह गया CD जुटाव

प्राइम डेटाबेस के आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल में बैंकों ने CD के जरिए 45,700 करोड़ रुपये जुटाए थे. यह आंकड़ा मई में बढ़कर 1.11 लाख करोड़ रुपये और जून में 1.8 लाख करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया. उस समय जमा की तुलना में ऋण वितरण तेज रहने और नकदी की जरूरत बढ़ने के कारण बैंकों को CD बाजार का अधिक सहारा लेना पड़ा था.

RBI की स्वैप सुविधा से बढ़ा FCNR(B) जमा

जून की शुरुआत में RBI ने रियायती स्वैप सुविधा शुरू की थी, जिसके बाद बैंकों ने विदेशी मुद्रा जमा जुटाने की रफ्तार बढ़ा दी. रिजर्व बैंक के अनुसार, 31 जुलाई तक बैंकों ने इस सुविधा के तहत करीब 41 अरब डॉलर जुटाए हैं, जिनमें 36.7 अरब डॉलर नई FCNR(B) जमा के जरिए आए हैं. इससे बैंकों को घरेलू बाजार के बजाय विदेशी स्रोतों से अपेक्षाकृत सस्ती फंडिंग मिलने लगी.

सस्ती फंडिंग से CD दरों में भी आई गिरावट

FCNR(B) जमा बढ़ने से बैंकिंग प्रणाली में नकदी की स्थिति मजबूत हुई है. इसका असर CD की ब्याज दरों पर भी पड़ा और जून के आखिर से ये दरें 7.57 फीसदी से घटकर 6.85 फीसदी पर आ गईं. विशेषज्ञों का कहना है कि जब बैंकों को कम लागत पर विदेशी मुद्रा में फंड मिल रहा है, तो उन्हें घरेलू बाजार से महंगी उधारी लेने की जरूरत कम पड़ रही है.

क्या कहते हैं बैंकिंग विशेषज्ञ?

एक वरिष्ठ बैंकर के मुताबिक, FCNR(B) जमा में बढ़ोतरी के बाद CD पर निर्भरता कम होना स्वाभाविक है. RBI की स्वैप योजना ने बैंकों को सस्ती फंडिंग का विकल्प दिया है, जिससे घरेलू बाजार से धन जुटाने की आवश्यकता घटी है. वहीं, दूसरे वरिष्ठ बैंकर का कहना है कि पहली तिमाही में फंडिंग की मांग असामान्य रूप से अधिक थी, जबकि वित्त वर्ष की शुरुआत के बाद आमतौर पर CD दरों में नरमी देखने को मिलती है.

क्या होता है सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट (CD)?

सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट (CD) बैंकों द्वारा जारी किया जाने वाला एक अल्पकालिक वित्तीय साधन है, जिसकी अवधि आमतौर पर 7 दिन से लेकर 1 वर्ष तक होती है. बैंक इसका उपयोग नकदी प्रबंधन, परिसंपत्ति और देनदारियों के बीच संतुलन बनाए रखने तथा फंडिंग के वैकल्पिक स्रोत उपलब्ध कराने के लिए करते हैं.
 


लगातार चार दिन की तेजी के बाद आज कैसी रहेगी बाजार की चाल? इन शेयरों पर रहेगी निवेशकों की नजर

सोमवार को सेंसेक्स 544.39 अंक यानी 0.70 फीसदी की बढ़त के साथ 78,639.03 पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी 390.70 अंक यानी 1.60 फीसदी उछलकर 24,774.30 के स्तर पर पहुंच गया.

Last Modified:
Tuesday, 04 August, 2026
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घरेलू शेयर बाजार ने पिछले चार कारोबारी सत्रों में लगातार शानदार तेजी दर्ज की है. सोमवार को सेंसेक्स और निफ्टी दोनों मजबूत बढ़त के साथ बंद हुए, जबकि रुपये ने भी डॉलर के मुकाबले एक महीने का उच्च स्तर छुआ. अब मंगलवार के कारोबार में निवेशकों की नजर बाजार की अगली चाल पर रहेगी. आज अडानी ग्रुप, पेटीएम, एलआईसी, मीशो, इंडियन ऑयल समेत कई कंपनियों से जुड़ी बड़ी खबरों के चलते इन शेयरों में हलचल देखने को मिल सकती है.

सोमवार को चौथे दिन भी तेजी के साथ बंद हुआ बाजार

सोमवार को बॉम्बे स्टॉरक एक्सचेंज (BSE) सेंसेक्स 544.39 अंक यानी 0.70 फीसदी की बढ़त के साथ 78,639.03 पर बंद हुआ, जबकि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) निफ्टी 390.70 अंक यानी 1.60 फीसदी उछलकर 24,774.30 के स्तर पर पहुंच गया. कारोबार के दौरान सेंसेक्स 800 अंकों से अधिक चढ़ा, जबकि निफ्टी 24,800 के स्तर को भी पार कर गया. वहीं, रुपया डॉलर के मुकाबले मजबूत होकर एक महीने के उच्च स्तर 95.12 पर पहुंच गया.

आईटी और बैंकिंग शेयरों ने संभाली बाजार की कमान

सेंसेक्स के 30 में से 21 शेयर बढ़त के साथ बंद हुए. इंडिगो 4.22 फीसदी की तेजी के साथ सबसे बड़ा गेनर रहा. टीसीएस और इन्फोसिस में 3 फीसदी से अधिक की बढ़त दर्ज की गई. इसके अलावा इटरनल, आईटीसी, एक्सिस बैंक, बजाज फिनसर्व, एलएंडटी, एचसीएल टेक और ट्रेंट के शेयरों में भी अच्छी खरीदारी देखने को मिली. दूसरी ओर, सन फार्मा, भारती एयरटेल, टाटा स्टील, मारुति सुजुकी और महिंद्रा एंड महिंद्रा के शेयर गिरावट के साथ बंद हुए.

कच्चे तेल में नरमी से मिला बाजार को सहारा

सोमवार की तेजी के पीछे सबसे बड़ी वजह कच्चे तेल की कीमतों में आई गिरावट रही. अमेरिका की ओर से ईरान के साथ बातचीत शुरू होने के संकेत मिलने के बाद ब्रेंट क्रूड 83.82 डॉलर प्रति बैरल और डब्ल्यूटीआई क्रूड 79.76 डॉलर प्रति बैरल तक फिसल गया. इससे वैश्विक बाजार में राहत का माहौल बना और भारतीय शेयर बाजार को भी समर्थन मिला.

आज इन शेयरों पर रहेगी बाजार की नजर

आज के कारोबार में कई कंपनियों के शेयर खबरों के चलते फोकस में रहेंगे. अदाणी ग्रुप ने ओडिशा में 1 गीगावाट क्षमता के एआई आधारित डेटा सेंटर के लिए 1 लाख करोड़ रुपये के निवेश का प्रस्ताव दिया है. SAIF Partners ब्लॉक डील के जरिए Paytm में 2.3 फीसदी हिस्सेदारी बेच सकता है. केंद्र सरकार आज और कल OFS के जरिए LIC में 6.5 फीसदी तक हिस्सेदारी बेचने जा रही है. वहीं, Peak XV Partners और Elevation Capital, Meesho में करीब 1,900 करोड़ रुपये की ब्लॉक डील कर सकते हैं. Essar Group ने ब्रिटेन में लो-कार्बन ऊर्जा परियोजनाओं में 4.3 अरब पाउंड निवेश की योजना बनाई है. UPL Corporation के CEO माइक फ्रैंक ने इस्तीफा दिया है. MobiKwik अपने लेंडिंग कारोबार में AI का इस्तेमाल बढ़ाने की तैयारी में है, जबकि Indian Oil अगले पांच से छह वर्षों में पेट्रोकेमिकल परियोजनाओं पर 1 लाख करोड़ रुपये निवेश करने की योजना पर काम कर रही है.

(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)


 


भारत-यूके FTA से टेक्सटाइल निर्यात को मिल सकती है 1 अरब डॉलर की बढ़त: रिपोर्ट

रिपोर्ट में कहा गया है कि FTA का फायदा ब्रिटिश सप्लायर्स की तुलना में भारतीय निर्यातकों को अधिक मिलेगा. पहले भारतीय उत्पादों पर 12 प्रतिशत का टैरिफ नुकसान था, जो अब खत्म हो गया है.

Last Modified:
Monday, 03 August, 2026
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भारत और यूनाइटेड किंगडम (UK) के बीच हुए मुक्त व्यापार समझौते (FTA) से भारतीय टेक्सटाइल उद्योग को बड़ा फायदा मिल सकता है. इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च (Ind-Ra) की रिपोर्ट के मुताबिक, इस समझौते से मध्यम से लंबी अवधि में भारत के टेक्सटाइल निर्यात में करीब 1 अरब डॉलर (लगभग 900 मिलियन डॉलर) की अतिरिक्त बढ़ोतरी हो सकती है. हालांकि, इसका वास्तविक लाभ कंपनियों की क्षमता विस्तार, लागत नियंत्रण और वित्तीय अनुशासन पर निर्भर करेगा.

भारतीय टेक्सटाइल उद्योग के लिए बड़ा अवसर

इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च (Ind-Ra) की रिपोर्ट के अनुसार, भारत-यूके मुक्त व्यापार समझौता (FTA) भारतीय टेक्सटाइल निर्यातकों के लिए सकारात्मक साबित हो सकता है. एजेंसी का मानना है कि यह समझौता टेक्सटाइल कंपनियों की क्रेडिट प्रोफाइल को भी मजबूत करेगा.

Ind-Ra के कॉरपोरेट रेटिंग्स के निदेशक रोहित सडाका ने कहा कि बड़ी और एकीकृत (इंटीग्रेटेड) टेक्सटाइल कंपनियां अपने मजबूत वित्तीय संसाधनों, स्थापित ग्राहक नेटवर्क और बड़े कारोबार के कारण इस अवसर का बेहतर लाभ उठा सकेंगी. वहीं, छोटी कंपनियों के लिए विस्तार के दौरान अत्यधिक कर्ज लेने की स्थिति में वित्तीय दबाव और नकदी संबंधी चुनौतियां बढ़ सकती हैं.

भारत के लिए अहम बाजार है UK

रिपोर्ट के अनुसार, यूनाइटेड किंगडम भारत के टेक्सटाइल निर्यात का तीसरा सबसे बड़ा बाजार है, जहां देश के कुल टेक्सटाइल निर्यात का करीब 6.1 प्रतिशत जाता है. दूसरी ओर, भारत में ब्रिटेन से आने वाले टेक्सटाइल उत्पादों की हिस्सेदारी घरेलू खपत के 1 प्रतिशत से भी कम है. वर्तमान में ब्रिटेन के कुल टेक्सटाइल आयात बाजार में भारत की हिस्सेदारी केवल 6.9 प्रतिशत है, जिससे आगे विस्तार की पर्याप्त संभावनाएं मौजूद हैं.

भारतीय निर्यातकों को मिलेगा प्रतिस्पर्धी लाभ

रिपोर्ट में कहा गया है कि FTA का फायदा ब्रिटिश सप्लायर्स की तुलना में भारतीय निर्यातकों को अधिक मिलेगा. पहले भारतीय उत्पादों पर 12 प्रतिशत का टैरिफ नुकसान था, जो अब खत्म हो गया है. इससे ब्रिटेन में भारतीय टेक्सटाइल उत्पादों की लागत प्रतिस्पर्धात्मक रूप से कम होगी और समय के साथ भारत चीन के मुकाबले अपनी हिस्सेदारी बढ़ा सकता है.

हालांकि, बांग्लादेश से मुकाबला आसान नहीं होगा, क्योंकि वहां उत्पादन लागत कम है और बड़े पैमाने पर उत्पादन की क्षमता मौजूद है. इसके बावजूद यदि ब्रिटेन के टेक्सटाइल आयात बाजार में भारत की हिस्सेदारी मौजूदा 6.9 प्रतिशत से बढ़कर 10 प्रतिशत तक पहुंचती है, तो भारतीय कंपनियों के लिए करीब 900 मिलियन डॉलर के अतिरिक्त निर्यात का अवसर पैदा हो सकता है.

मुनाफे में बढ़ोतरी आने में लगेगा समय

रिपोर्ट में कहा गया है कि FTA से प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त जरूर मिलेगी, लेकिन कंपनियों के मुनाफे में तुरंत बड़ा सुधार होने की संभावना नहीं है. ब्रिटेन के खरीदार टैरिफ में मिली राहत का कुछ हिस्सा कम कीमत के रूप में मांग सकते हैं, जिससे शुरुआती दौर में मार्जिन पर दबाव रह सकता है.

हालांकि, लंबे समय में निर्यात बढ़ने से कंपनियों की परिचालन क्षमता (ऑपरेटिंग लीवरेज) बेहतर होगी और लाभप्रदता को समर्थन मिलेगा. वहीं, ईंधन, बिजली, माल ढुलाई और शिपिंग लागत में बढ़ोतरी से अल्पावधि में कुछ लाभ कम हो सकता है.
 


चीन पर भारत की सख्ती बरकरार, FY26 में सिर्फ ₹1 करोड़ के एक FDI प्रस्ताव को मिली मंजूरी

आंकड़े बताते हैं कि राष्ट्रीय सुरक्षा और सीमा से जुड़े देशों के निवेश पर लागू 'प्रेस नोट-3' के तहत सरकार अब भी बेहद सतर्क रुख अपनाए हुए है.

Last Modified:
Monday, 03 August, 2026
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भारत सरकार ने वित्त वर्ष 2025-26 में चीन से आए केवल एक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) प्रस्ताव को मंजूरी दी, जिसकी कुल राशि महज 1 करोड़ रुपये रही. वहीं, हांगकांग से आए 13 निवेश प्रस्तावों को स्वीकृति मिली, जिनका कुल मूल्य 610.42 करोड़ रुपये है. ये आंकड़े दिखाते हैं कि भारत सीमा साझा करने वाले देशों से आने वाले निवेश पर अब भी कड़ी निगरानी बनाए हुए है.

उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (DPIIT) के अनुसार, अप्रैल 2025 से मार्च 2026 के बीच सरकार ने कुल 63 एफडीआई प्रस्तावों को मंजूरी दी, जिनकी कुल कीमत 10,292.67 करोड़ रुपये (करीब 1.18 अरब डॉलर) रही.

प्रेस नोट-3 के तहत होती है जांच

अप्रैल 2020 में लागू किए गए प्रेस नोट-3 के तहत भारत के साथ भूमि सीमा साझा करने वाले देशों से आने वाले निवेश के लिए सरकारी मंजूरी अनिवार्य कर दी गई थी. यह फैसला कोविड-19 महामारी के दौरान भारतीय कंपनियों के अवसरवादी अधिग्रहण को रोकने के उद्देश्य से लिया गया था.

मार्च 2026 में सरकार ने इस नियम में आंशिक राहत देते हुए कुछ निवेशों को ऑटोमैटिक रूट के तहत अनुमति दी, लेकिन यह छूट चीन, हांगकांग और भारत की भूमि सीमा साझा करने वाले अन्य देशों में पंजीकृत कंपनियों पर लागू नहीं होती. ऐसे मामलों में अब भी सरकारी मंजूरी जरूरी है.

सिंगापुर रहा सबसे बड़ा निवेशक

मंजूर किए गए प्रस्तावों के मूल्य के आधार पर सिंगापुर सबसे बड़ा निवेश स्रोत रहा. उसके 3,259.88 करोड़ रुपये के पांच प्रस्तावों को मंजूरी मिली. इसके बाद ब्रिटेन के पांच प्रस्ताव (2,477.67 करोड़ रुपये) और थाईलैंड के दो प्रस्ताव (1,600 करोड़ रुपये) स्वीकृत हुए.

भारत में चीन का FDI अब भी बेहद सीमित

DPIIT के आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल 2000 से मार्च 2026 के बीच भारत में कुल एफडीआई इक्विटी निवेश में चीन की हिस्सेदारी केवल 0.32 प्रतिशत रही. इस अवधि में चीन से 2.51 अरब डॉलर (करीब 16,162.25 करोड़ रुपये) का निवेश आया, जिससे वह निवेश करने वाले देशों की सूची में 23वें स्थान पर रहा.

वहीं, हांगकांग 15वें स्थान पर रहा. इस अवधि में वहां से 4.91 अरब डॉलर (करीब 31,220.30 करोड़ रुपये) का निवेश भारत आया, जो कुल एफडीआई इक्विटी प्रवाह का 0.62 प्रतिशत है.

पिछले वित्त वर्ष में भी यही रुझान

वित्त वर्ष 2024-25 में भी सरकार ने चीन के केवल एक एफडीआई प्रस्ताव को मंजूरी दी थी, जिसकी कीमत 28.71 करोड़ रुपये थी. उस वर्ष सरकारी मार्ग के तहत कुल 82 निवेश प्रस्तावों को स्वीकृति मिली थी, जिनका मूल्य 39,758 करोड़ रुपये था. इनमें हांगकांग के 11 प्रस्ताव शामिल थे, जिनकी कुल कीमत 1,225.28 करोड़ रुपये थी.


भारत की फैक्ट्री ग्रोथ पड़ी धीमी, जुलाई में PMI फिसलकर 53.5 पर पहुंचा

नए ऑर्डर और भर्ती में सुस्ती, जुलाई में मैन्युफैक्चरिंग PMI अगस्त 2021 के बाद सबसे निचले स्तर पर आ गया है.

Last Modified:
Monday, 03 August, 2026
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जुलाई में भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की रफ्तार धीमी पड़ गई. HSBC इंडिया मैन्युफैक्चरिंग PMI घटकर 53.5 पर आ गया, जो अगस्त 2021 के बाद का सबसे निचला स्तर है. नए ऑर्डर, कच्चे माल की खरीद और भर्तियों की गति कमजोर रहने से फैक्ट्री गतिविधियों में सुस्ती देखने को मिली, हालांकि मजबूत निर्यात मांग और सप्लाई चेन में सुधार ने सेक्टर को कुछ राहत दी.

जुलाई में मैन्युफैक्चरिंग PMI 53.5 पर आया

भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की वृद्धि जुलाई में धीमी पड़ गई. सोमवार को जारी HSBC इंडिया मैन्युफैक्चरिंग परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (PMI) के अनुसार, जुलाई में PMI घटकर 53.5 पर आ गया, जो जून में 54.2 था. यह अगस्त 2021 के बाद का सबसे निचला स्तर है और इसके साथ ही इंडेक्स अपने दीर्घकालिक औसत 54.2 से भी नीचे रहा. हालांकि PMI का 50 से ऊपर बने रहना इस बात का संकेत है कि मैन्युफैक्चरिंग गतिविधियां अब भी विस्तार के दौर में हैं, लेकिन उनकी रफ्तार काफी धीमी हो गई है.

नए ऑर्डर और उत्पादन में सुस्ती

रिपोर्ट के मुताबिक, कंपनियों को जुलाई में नए ऑर्डर मिलते रहे, लेकिन उनकी वृद्धि पिछले चार वर्षों से अधिक समय में दूसरी सबसे कमजोर रही. बाजार की चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों और कुछ प्रमुख उत्पादों की मांग में कमी का असर ऑर्डर बुक पर दिखाई दिया. उत्पादन में बढ़ोतरी जारी रही, लेकिन इसकी गति भी कमजोर बनी रही. कंज्यूमर गुड्स कंपनियों का प्रदर्शन अपेक्षाकृत कमजोर रहा, जबकि इंटरमीडिएट और कैपिटल गुड्स से जुड़े उद्योगों ने बेहतर प्रदर्शन किया.

निर्यात मांग बनी मजबूत

घरेलू बाजार में सुस्ती के बावजूद निर्यात ऑर्डर में अच्छी बढ़ोतरी दर्ज की गई. कंपनियों ने बताया कि कनाडा, मिस्र, इंडोनेशिया, केन्या, नेपाल, दक्षिण अफ्रीका, थाईलैंड और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे देशों से मांग मजबूत बनी रही, जिससे उत्पादन को सहारा मिला.

सप्लाई चेन में सुधार, लेकिन पश्चिम एशिया का तनाव चिंता

HSBC की मुख्य भारत अर्थशास्त्री प्रांजुल भंडारी ने कहा कि जुलाई में सप्लायर्स की डिलीवरी में सुधार हुआ, जिससे सप्लाई चेन की दिक्कतें कम होने के संकेत मिले हैं. हालांकि, पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव भविष्य में सप्लाई पर असर डाल सकते हैं. इसी आशंका के चलते कंपनियां कच्चे माल और तैयार उत्पादों का स्टॉक बढ़ा रही हैं.

कच्चे माल की खरीद और भर्ती की रफ्तार घटी

कंपनियों ने भविष्य की जरूरतों को देखते हुए कच्चे माल की खरीद जारी रखी, लेकिन इसकी रफ्तार पिछले 31 महीनों के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई. वहीं, तैयार माल का स्टॉक 11 वर्षों से अधिक समय में सबसे तेज गति से बढ़ा. रोजगार के मोर्चे पर लगातार 29वें महीने नई भर्तियां हुईं, लेकिन भर्ती की रफ्तार लगातार तीसरे महीने कमजोर रही और मौजूदा विस्तार चक्र में सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई.

लागत का दबाव कम, कंपनियों ने बढ़ाईं कीमतें

जुलाई में कच्चे माल की लागत बढ़ने का दबाव घटकर पांच महीने के निचले स्तर पर आ गया. हालांकि, परिवहन लागत अब भी ऊंची बनी हुई है. कंपनियों ने बढ़ती लागत का असर ग्राहकों पर डालते हुए उत्पादों की कीमतों में हल्की बढ़ोतरी की. इसके बावजूद कंपनियों का कारोबारी भरोसा मजबूत हुआ है और उन्हें उम्मीद है कि आने वाले महीनों में मांग, इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं, नए ग्राहकों और बेहतर मार्केटिंग के दम पर कारोबार में तेजी आएगी.