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जामनगर क्यों जा रहे हैं अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो?

अमेरिका के शीर्ष राजनयिक अपने सबसे बड़े ग्राहक से संबंध मजबूत करने के लिए दिल्ली को दरकिनार कर रहे हैं.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 hour ago

पलक शाह

ग्राहक ही सर्वोपरि है

रिलायंस के पास वह है, जिसकी वाशिंगटन को जरूरत है

पहली बार अमेरिका के विदेश मंत्री भारत आ रहे हैं, लेकिन नई दिल्ली नहीं जाएंगे. विदेश विभाग ने 13 अक्टूबर को बताया कि मार्को रुबियो 17 से 22 अक्टूबर के बीच भारत दौरे पर मुंबई और जामनगर जाएंगे. प्रकाशित कार्यक्रम में राजधानी में किसी बैठक का जिक्र नहीं है.

जामनगर कोई राजनयिक शहर नहीं है. यह मुकेश अंबानी का रिफाइनरी शहर है, जहां दुनिया का सबसे बड़ा एकल-स्थल रिफाइनिंग कॉम्प्लेक्स स्थित है. यहां प्रतिदिन करीब 14 लाख बैरल तेल का प्रसंस्करण होता है. विदेश विभाग ने इस जगह को चुनने की वजह नहीं बताई है. हालांकि, इसकी खास वजह समझने के लिए ज्यादा कुछ कहने की जरूरत नहीं है. कुछ दिन पहले ही एलन मस्क ने अंबानी को भारत का असली बॉस बताया था.

कूटनीतिक भाषा को हटाकर देखें तो गणित आसान है

रिलायंस 20 साल के अनुबंधों के तहत अमेरिका से एथेन खरीदती है. वह अमेरिका के बाहर वेनेजुएला के कच्चे तेल की सबसे बड़ी खरीदार बन गई है. यह वह तेल है, जिसकी आपूर्ति मादुरो की गिरफ्तारी के बाद से अमेरिकी नियंत्रण में रही है. ट्रंप ने टेक्सास में 300 अरब डॉलर की एक रिफाइनरी परियोजना में रिलायंस को निवेशक बताया था, जिस पर अभी निर्माण शुरू नहीं हुआ है. अब आपूर्तिकर्ता अपने ग्राहक से मिलने आ रहा है और उसे दो चीजें चाहिए: अमेरिका महाद्वीप से ज्यादा तेल की आपूर्ति और रूस से कम तेल की खरीद, साथ ही ट्रंप द्वारा घोषित रिफाइनरी परियोजना को आकार देना.

ग्राहक: रूसी तेल से वेनेजुएला के तेल की ओर

केप्लर के आंकड़ों के मुताबिक, 2024 और 2025 के बड़े हिस्से में रिलायंस दुनिया की रूसी कच्चे तेल की सबसे बड़ी खरीदार थी. रोसनेफ्ट के साथ उसके दीर्घकालिक समझौते के तहत प्रतिदिन 5 लाख बैरल तक तेल खरीदा जा सकता था.

अक्टूबर 2025 में रोसनेफ्ट और लुकोइल पर अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद रिलायंस ने अपनी निर्यात रिफाइनरी में रूसी तेल का इस्तेमाल बंद कर दिया. हालांकि, घरेलू बाजार के लिए इस्तेमाल होने वाले संयंत्र में उसने उन रूसी विक्रेताओं से तेल खरीदना जारी रखा, जिन पर प्रतिबंध नहीं थे. फरवरी 2026 से प्रतिदिन करीब 1.5 लाख बैरल तेल खरीदने की योजना थी.

वाशिंगटन जिस बदलाव की उम्मीद कर रहा है, वह पहले ही शुरू हो चुका है. अमेरिका द्वारा निकोलस मादुरो को पकड़े जाने के बाद 2026 की शुरुआत में रिलायंस को वेनेजुएला से सीधे कच्चा तेल खरीदने के लिए अमेरिकी सामान्य लाइसेंस मिला. केप्लर के अनुमान के मुताबिक, अक्टूबर में भारत का वेनेजुएला से तेल आयात करीब 4.65 लाख बैरल प्रतिदिन रहा, जो सात साल का उच्चतम स्तर है. इस तेल की हर खेप जामनगर को सेवा देने वाले बंदरगाह सिक्का पहुंच रही है.

अमेरिका के साथ ऊर्जा संबंध कच्चे तेल से कहीं आगे तक फैले हैं. 2017 से रिलायंस अपने बहुत बड़े एथेन वाहक जहाजों के बेड़े के जरिए अमेरिका से भारत में एथेन ला रही है. इसके लिए 20 साल के आपूर्ति समझौते हैं. इस तरह वह अमेरिका से एथेन की सबसे बड़ी आयातक बन गई है. पेट्रोकेमिकल कच्चे माल के मामले में रिलायंस रूस पर नहीं, बल्कि अमेरिका पर निर्भर है.

समयसीमा: 18 अक्टूबर

रुबियो ऐसे समय भारत पहुंच रहे हैं, जब अमेरिका की एक कानूनी समयसीमा कुछ ही दिन पहले तय हुई है. इसके तहत सभी भारतीय वस्तुओं पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाया जा सकता है. ट्रंप ने 18 सितंबर को ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट पर हस्ताक्षर किए थे. यह कानून रूस से कच्चा तेल या गैस खरीदने वाले पांच सबसे बड़े खरीदारों के खिलाफ 30 दिनों के भीतर कार्रवाई का निर्देश देता है.

किसी देश पर यह कानून तभी लागू होगा, जब वह 18 अक्टूबर या उसके बाद रूस से ऊर्जा उत्पादों की नई खरीद करेगा. अनौपचारिक रैंकिंग के अनुसार, रूस के कच्चे तेल के खरीदारों में भारत दूसरे स्थान पर है, जबकि चीन पहले स्थान पर है. 12 अक्टूबर तक अमेरिकी प्रशासन ने न तो लक्षित देशों की सूची प्रकाशित की थी, न ही टैरिफ की दर या किसी छूट की जानकारी दी थी.

अभी तक किसी ने यह सवाल भी नहीं उठाया है कि अमेरिका-रूस डीजल समझौते का क्या होगा. हालांकि, नीतिगत मामलों पर नजर रखने वालों का कहना है कि डीजल समझौते से भारत को स्वतः छूट नहीं मिलती. अधिकतम यह भारत को अपना पक्ष रखने का आधार दे सकता है, छूट की गारंटी नहीं.

अमेरिकी वित्त विभाग ने 9 अक्टूबर को एक अस्थायी लाइसेंस जारी किया, जिसके तहत रूसी डीजल को 7 अप्रैल, 2027 तक बेचा और आयात किया जा सकता है. इसमें अमेरिका में आयात भी शामिल है. ट्रंप ने कहा था कि रूस 3 लाख टन से अधिक डीजल की आपूर्ति करेगा. इसके बाद नवंबर में 5 लाख टन और फिर 10 लाख टन डीजल की आपूर्ति की जाएगी.

भारत पर यह नियम क्यों लागू नहीं होता: यह लाइसेंस डीजल यानी रिफाइंड उत्पाद से संबंधित है. ग्राहम एक्ट के तहत टैरिफ का आकलन केवल कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की खरीद के आधार पर होता है, डीजल जैसे रिफाइंड उत्पादों के आधार पर नहीं. भारत की चिंता कच्चे तेल की खरीद से जुड़ी है. अमेरिकी प्रशासन ने अभी तक भारत को छूट देने पर अंतिम फैसला नहीं किया है.

बचाव का रास्ता: अमेरिकी राष्ट्रपति कांग्रेस को यह प्रमाणित करने के बाद किसी भी शुल्क से छूट दे सकते हैं कि ऐसा करना अमेरिका के राष्ट्रीय हित में है. कुछ विश्लेषकों को उम्मीद है कि भारत को ऐसी छूट मिल सकती है. इसकी एक वजह यह है कि भारत की कच्चे तेल की खरीद पर अभी दंडात्मक कार्रवाई करने से डीजल की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है. इससे उस बाजार पर असर पड़ेगा, जिसे व्हाइट हाउस शांत रखने की कोशिश कर रहा है.

फरवरी में भारत पर टैरिफ 50 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया गया था. इसकी एक वजह यह संकेत भी था कि भारत रूसी कच्चे तेल की खरीद बंद कर देगा. हालांकि, द्विपक्षीय व्यापार समझौता अब भी अटका हुआ है. ऐसे में रिलायंस के कच्चे तेल की खरीद के विकल्प भारत के लिए बातचीत का सबसे स्पष्ट आधार बन गए हैं. रूस से आने वाली हर खेप, जिसे वेनेजुएला या अमेरिकी तेल से बदला जाता है, वह सबूत है जिसे नई दिल्ली बातचीत की मेज पर रख सकती है.

300 अरब डॉलर की रिफाइनरी, जिसकी किसी ने पुष्टि नहीं की

मार्च 2026 में ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर टेक्सास के पोर्ट ऑफ ब्राउन्सविले में अमेरिका फर्स्ट रिफाइनिंग द्वारा रिफाइनरी स्थापित करने की घोषणा की थी. उन्होंने निवेश के लिए रिलायंस को धन्यवाद देते हुए इसे 300 अरब डॉलर का सौदा बताया था. रिलायंस ने इसमें अपनी भूमिका या निवेश के पैमाने की औपचारिक पुष्टि नहीं की है.

यह सुर्खियों में बताई गई रकम निर्माण लागत नहीं है. परियोजना विकसित करने वाली कंपनी के अनुसार, इसमें अगले करीब 20 वर्षों में 125 अरब डॉलर का अमेरिकी शेल कच्चा तेल खरीदना और 175 अरब डॉलर का ईंधन उत्पादन शामिल है. परियोजना की डेवलपर कंपनी एलिमेंट फ्यूल्स ने इससे पहले निर्माण लागत 3 से 4 अरब डॉलर बताई थी.

इस सौदे के साथ राजनीतिक विवाद भी जुड़ा है. प्रोपब्लिका ने जून में रिपोर्ट दी थी कि डोनाल्ड ट्रंप जूनियर की इस परियोजना में हिस्सेदारी थी और उन्होंने निवेश से पहले नवंबर 2025 में भारत में अनंत अंबानी से मुलाकात की थी. व्हाइट हाउस ने प्रोपब्लिका से कहा था कि हितों के टकराव का कोई मामला नहीं था. रिलायंस ने भी कहा था कि उसे कोई विशेष तरजीह नहीं मिली.

दौरे की योजना से परिचित लोगों का कहना है कि वाशिंगटन चाहता है कि रिलायंस ब्राउन्सविले परियोजना में अपने निवेश की एक निश्चित रकम बताए. अमेरिका में इस तरह के बड़े निवेश की घोषणा पहले एस्सार भी कर चुका है. जामनगर का दौरा इस मुद्दे को उठाने के लिए स्वाभाविक जगह है.

बीच की कड़ी

योजना से परिचित लोगों के मुताबिक, जामनगर दौरे की व्यवस्था एमपीएच होल्डिंग के चेयरमैन अंशुमान मिश्रा ने की है. मिश्रा की तस्वीरें पहले भी मुकेश अंबानी, एलन मस्क और डोनाल्ड ट्रंप के साथ आयोजनों में सामने आ चुकी हैं.

वह दोनों पक्षों के लिए नए नहीं हैं. फाइनेंशियल टाइम्स ने उन्हें पूर्व बैंकर और अंबानी के विश्वासपात्र के रूप में वर्णित किया है, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय मामलों में अंबानी को सलाह दी. हिंदुस्तान टाइम्स ने उन्हें ऐसे व्यक्ति के रूप में पेश किया है, जो वित्त, रणनीतिक परामर्श और मीडिया के क्षेत्र में लंदन, लॉस एंजिलिस और मुंबई के बीच काम करते हैं और जिनके जेरेड कुशनर से भी संबंध हैं.

ट्रंप प्रशासन तक उनकी पहुंच सार्वजनिक है. अगस्त 2025 में जब ट्रंप ने डोनाल्ड ट्रंप जूनियर के साथ एक प्रकाशन गृह के सह-संस्थापक सर्जियो गोर को भारत में अमेरिकी राजदूत नामित किया था, तब मिश्रा ने इस चयन की सराहना की और गोर को अपना मित्र बताया था.

वह उस जगह पर हैं, जहां भारतीय पूंजी और ट्रंप का वाशिंगटन एक-दूसरे से मिलते हैं. अंबानी परिवार इस संपर्क को मजबूत करने के लिए वर्षों से काम कर रहा है.

मुकेश और नीता अंबानी को जनवरी 2025 में ट्रंप के शपथ ग्रहण समारोह में मंच के पास सीट मिली थी और वे उससे एक रात पहले आयोजित कैंडललाइट डिनर में भी शामिल हुए थे. मई 2025 में अंबानी ट्रंप के सम्मान में कतर के अमीर द्वारा आयोजित राजकीय रात्रिभोज में शामिल होने के लिए दोहा गए थे. द न्यू रिपब्लिक ने प्रोपब्लिका का हवाला देते हुए रिपोर्ट दी थी कि रिलायंस की एक इकाई ने 2024 में ट्रंप ऑर्गनाइजेशन को एक ऐसी परियोजना के लिए 1 करोड़ डॉलर का विकास शुल्क दिया था, जिसकी कभी घोषणा नहीं हुई.

बातचीत की मेज पर दो मांगें

इन लोगों के मुताबिक, जामनगर दौरे का एजेंडा दो मांगों तक सीमित है. पहली, ग्राहम एक्ट के तहत टैरिफ लागू होने से पहले रिलायंस रूसी कच्चे तेल से दूरी बढ़ाकर वेनेजुएला के तेल की खरीद बढ़ाए. दूसरी, कंपनी अमेरिका में बड़े और स्पष्ट निवेश की घोषणा करे. ब्राउन्सविले परियोजना इसके लिए सबसे स्वाभाविक विकल्प है.

दौरे में वंतारा शामिल नहीं

दौरे से संबंधित आंतरिक निर्देशों में कहा गया है कि रुबियो को जामनगर स्थित वंतारा नहीं ले जाया जाना चाहिए. वंतारा अंबानी परिवार का पशु बचाव और वन्यजीव केंद्र है. योजना से परिचित लोगों ने यह जानकारी दी.

यह निर्देश प्रोपब्लिका की उस रिपोर्ट के बाद आया है, जिसमें बताया गया था कि डोनाल्ड ट्रंप जूनियर ने नवंबर 2025 में भारत दौरे के दौरान अनंत अंबानी के साथ परिवार के निजी चिड़ियाघर का दौरा किया था. यह यात्रा टेक्सास की रिफाइनरी परियोजना की घोषणा से कई महीने पहले हुई थी.

मुंबई में जयशंकर से मुलाकात

कार्यक्रम की जानकारी रखने वाले लोगों के अनुसार, विदेश मंत्री एस. जयशंकर मुंबई में रुबियो से मुलाकात करेंगे. विदेश मंत्रालय ने अभी तक इस बैठक की घोषणा नहीं की है. नई दिल्ली के लिए बातचीत का मुख्य मुद्दा अटका हुआ व्यापार समझौता और 100 प्रतिशत टैरिफ का खतरा है. रिलायंस के कच्चे तेल की खरीद से जुड़े फैसले भारत का सबसे मजबूत पक्ष हैं. वहीं, रुबियो ऐसे समय आ रहे हैं, जब अमेरिका खुद भी रूस से ईंधन खरीद रहा है. इससे जयशंकर के साथ बैठक में भारत की स्थिति मजबूत होती है.

नई दिल्ली व्यापार समझौता चाहती है. वाशिंगटन को कच्चे तेल की आपूर्ति और एक रिफाइनरी चाहिए. रिलायंस के पास दोनों हैं. यही वजह है कि दुनिया का सबसे शक्तिशाली राजनयिक सौराष्ट्र के एक रिफाइनरी शहर की यात्रा कर रहा है.

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(BW रिपोर्टर्स पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free की लेखिका हैं. यह एक तीखा खुलासा है, जिसने भारत के वित्तीय बाजारों के छिपे हुए पक्ष को सामने लाया. मुंबई में करीब दो दशकों की जमीनी रिपोर्टिंग के साथ पलक ने पैसे, सत्ता और नियमन के बीच के गठजोड़ की गहराई से पड़ताल करने वाले पत्रकार के रूप में पहचान बनाई है. उनके लेख भारत के प्रतिष्ठित वित्तीय दैनिकों, जिनमें The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line शामिल हैं, में प्रकाशित हुए हैं.

19 वर्ष की उम्र में अपराध रिपोर्टिंग की ओर आकर्षित हुईं पलक ने जल्द ही महसूस किया कि 1980 के दशक के मुंबई के गैंग युद्धों की जगह अब कॉरपोरेट टावरों में चलने वाली सफेदपोश योजनाओं ने ले ली है. इस समझ ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने भारत की ‘व्हाइट मनी’ अर्थव्यवस्था की जटिल गतिविधियों को समझने में वर्षों बिताए हैं. शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामकीय खामियों तक, उनका काम हाई फाइनेंस की चमकदार सतह के पीछे छिपे उन समूहों को सामने लाता है जो पर्दे के पीछे से फैसलों को प्रभावित करते हैं. सच्चाई सामने लाने का उनका जुनून और उन कड़ियों को जोड़ने की क्षमता, जिन्हें दूसरे नजरअंदाज कर देते हैं, उन्हें एक मजबूत पत्रकार बनाती है, जो यथास्थिति को चुनौती देने और उन खिलाड़ियों को बेनकाब करने से नहीं डरतीं जो खुद को कानून से ऊपर समझते हैं.)

 

 


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