वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, मई में ईंधन और बिजली श्रेणी की थोक महंगाई बढ़कर 30.33 प्रतिशत हो गई, जबकि अप्रैल में यह 24.89 प्रतिशत थी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
देश में महंगाई का दबाव लगातार बढ़ता दिखाई दे रहा है. खुदरा महंगाई में तेजी के बाद अब थोक महंगाई (WPI) भी मई 2026 में बढ़कर 9.68 प्रतिशत पर पहुंच गई है, जो अप्रैल में 8.26 प्रतिशत थी. ईंधन और बिजली की कीमतों में उछाल, खाद्य वस्तुओं की महंगाई और विनिर्मित उत्पादों की बढ़ती लागत ने थोक मूल्य सूचकांक को ऊपर धकेला है. पश्चिम एशिया में जारी तनाव और कच्चे तेल की ऊंची कीमतों का असर अब भारतीय अर्थव्यवस्था पर साफ दिखाई देने लगा है.
ईंधन और बिजली ने बढ़ाया महंगाई का दबाव
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, मई में ईंधन और बिजली श्रेणी की थोक महंगाई बढ़कर 30.33 प्रतिशत हो गई, जबकि अप्रैल में यह 24.89 प्रतिशत थी. कच्चे पेट्रोलियम की महंगाई दर भी बढ़कर 61.51 प्रतिशत पर पहुंच गई, जो एक महीने पहले 56.31 प्रतिशत थी. पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य में आपूर्ति बाधित होने से वैश्विक ऊर्जा बाजार प्रभावित हुआ, जिसका सीधा असर भारत के आयात बिल और घरेलू कीमतों पर पड़ा.
खाद्य वस्तुओं के दामों में भी तेजी
मई में खाद्य वस्तुओं की थोक महंगाई बढ़कर 3.60 प्रतिशत हो गई, जबकि अप्रैल में यह 2.43 प्रतिशत थी. खाद्य उत्पादों की कीमतों में वृद्धि ने आम उपभोक्ताओं के बजट पर अतिरिक्त दबाव डाला है. विशेषज्ञों का मानना है कि ऊर्जा लागत बढ़ने से परिवहन और सप्लाई चेन महंगी हुई है, जिसका असर खाद्य कीमतों पर भी दिखाई दे रहा है.
विनिर्मित उत्पादों की लागत बढ़ी
विनिर्मित उत्पादों की महंगाई दर भी मई में बढ़कर 7.48 प्रतिशत हो गई, जो अप्रैल में 6.68 प्रतिशत थी. कच्चे माल और ऊर्जा की लागत बढ़ने से उत्पादन खर्च में इजाफा हुआ है, जिसका असर विभिन्न औद्योगिक उत्पादों की कीमतों पर पड़ रहा है.
खुदरा महंगाई भी 16 महीने के उच्च स्तर पर
थोक महंगाई के साथ-साथ खुदरा महंगाई (CPI) भी मई में बढ़कर 3.93 प्रतिशत पर पहुंच गई, जो पिछले 16 महीनों का उच्चतम स्तर है. अप्रैल में यह 3.48 प्रतिशत थी. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) मौद्रिक नीति तय करते समय मुख्य रूप से खुदरा महंगाई को आधार मानता है. सरकार ने महंगाई दर को 4 प्रतिशत के लक्ष्य के आसपास बनाए रखने का लक्ष्य निर्धारित किया है.
RBI ने भी बढ़ाया महंगाई का अनुमान
इस महीने की शुरुआत में RBI ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए महंगाई का अनुमान 4.6 प्रतिशत से बढ़ाकर 5.1 प्रतिशत कर दिया था. केंद्रीय बैंक का मानना है कि वैश्विक ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी और कच्चे माल की लागत बढ़ने से महंगाई पर दबाव बना रह सकता है. मई के दूसरे पखवाड़े में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में करीब 7.50 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी भी महंगाई बढ़ने की प्रमुख वजहों में शामिल रही है.
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं और पश्चिम एशिया में तनाव जारी रहता है, तो आने वाले महीनों में महंगाई पर और दबाव बढ़ सकता है. ऐसे में RBI की आगामी मौद्रिक नीति बैठकों पर बाजार की नजर रहेगी, क्योंकि बढ़ती महंगाई ब्याज दरों को लेकर केंद्रीय बैंक के रुख को प्रभावित कर सकती है.
हॉर्मुज जलडमरूमध्य फिर खुलेगा, तेल और गैस आपूर्ति सामान्य होने की उम्मीद; वैश्विक बाजारों को बड़ी राहत
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
करीब तीन महीने तक चले सैन्य संघर्ष के बाद अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध विराम और शांति समझौते का रास्ता साफ हो गया है. दोनों देशों ने संघर्ष समाप्त करने के लिए एक रूपरेखा पर सहमति बना ली है, जिस पर 19 जून को स्विट्जरलैंड में औपचारिक हस्ताक्षर होने की उम्मीद है. समझौते के तहत हॉर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोला जाएगा और ईरानी बंदरगाहों पर लगी अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी हटाई जाएगी. इस घटनाक्रम को वैश्विक ऊर्जा बाजार और विश्व अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है.
ट्रंप ने किया समझौते का ऐलान
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर समझौते की पुष्टि करते हुए कहा कि दोनों पक्षों के बीच बातचीत सफल रही है. उन्होंने हॉर्मुज जलडमरूमध्य को टोल-मुक्त तरीके से खोलने और ईरानी बंदरगाहों पर लगी अमेरिकी नाकेबंदी हटाने की मंजूरी देने की बात कही. ट्रंप ने अपने संदेश में लिखा, “दुनिया के जहाज अपने इंजन चालू करें, तेल को बहने दें.” हालांकि समझौते की विस्तृत शर्तें अभी सार्वजनिक नहीं की गई हैं.
हॉर्मुज जलडमरूमध्य क्यों है इतना महत्वपूर्ण?
हॉर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे रणनीतिक समुद्री मार्गों में से एक है. खाड़ी क्षेत्र से निर्यात होने वाले कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस और कई अन्य महत्वपूर्ण वस्तुओं का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है. युद्ध के दौरान इस मार्ग पर असर पड़ने से वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित हुई थी और ऊर्जा कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिला था. अब इसके दोबारा खुलने से तेल, गैस और उर्वरकों की आपूर्ति सामान्य होने की उम्मीद बढ़ गई है.
पाकिस्तान ने निभाई मध्यस्थ की भूमिका
रिपोर्ट्स के अनुसार, इस समझौते को अंतिम रूप देने में पाकिस्तान ने महत्वपूर्ण मध्यस्थ की भूमिका निभाई. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने कहा कि दोनों पक्षों ने सभी मोर्चों पर सैन्य कार्रवाई को तत्काल और स्थायी रूप से समाप्त करने पर सहमति जताई है. ईरान के उप विदेश मंत्री ने भी समझौते की पुष्टि करते हुए इसे दोनों देशों के बीच शत्रुता समाप्त करने की दिशा में अहम कदम बताया है.
ईरान और अमेरिका दोनों ने जताई संतुष्टि
ईरान के सरकारी मीडिया ने इस समझौते को अपनी कूटनीतिक जीत बताया है और दावा किया है कि अमेरिका को युद्ध समाप्त करने के लिए समझौते का रास्ता अपनाना पड़ा. हालांकि तेहरान की ओर से अभी विस्तृत आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है. दूसरी ओर अमेरिका इसे क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में पेश कर रहा है.
परमाणु कार्यक्रम पर अभी भी बरकरार है विवाद
युद्ध विराम के बावजूद ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर चिंताएं बनी हुई हैं. रिपोर्टों के अनुसार ईरान के पास बड़ी मात्रा में उच्च स्तर का समृद्ध यूरेनियम मौजूद है, जिसे लेकर पश्चिमी देशों की चिंता लगातार बनी हुई है.
अमेरिका चाहता है कि इस यूरेनियम को या तो नष्ट किया जाए या फिर किसी तीसरे देश में स्थानांतरित किया जाए. रूस ने इसे अपने यहां सुरक्षित रखने की पेशकश भी की है. हालांकि मौजूदा समझौते में इस मुद्दे का अंतिम समाधान नहीं निकाला गया है और इस पर आगे अलग से वार्ता होने की संभावना है.
इजराइल और अमेरिकी नेताओं की मिली-जुली प्रतिक्रिया
समझौते को लेकर इजराइल पूरी तरह संतुष्ट नहीं बताया जा रहा है. वहीं अमेरिका में भी कुछ रिपब्लिकन नेताओं ने इसकी आलोचना की है. उनका कहना है कि यह समझौता कई मायनों में 2015 के परमाणु समझौते जैसा दिखता है, जिसे ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में समाप्त कर दिया था.
तेल बाजार और वैश्विक अर्थव्यवस्था को मिल सकती है राहत
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समझौता सफलतापूर्वक लागू होता है और हॉर्मुज जलडमरूमध्य पूरी तरह खुला रहता है, तो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति में सुधार होगा. इससे कच्चे तेल और गैस की कीमतों पर दबाव कम हो सकता है, जिसका सकारात्मक असर दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं और महंगाई पर पड़ेगा. फिलहाल निवेशकों, ऊर्जा कंपनियों और वैश्विक बाजारों की नजर 19 जून को स्विट्जरलैंड में होने वाले औपचारिक हस्ताक्षर और उसके बाद की परिस्थितियों पर टिकी हुई है.
रिपोर्ट के अनुसार, कीमती धातुओं की बढ़ती कीमतें भी महंगाई को ऊपर धकेल रही हैं. व्यक्तिगत देखभाल और अन्य वस्तुओं की श्रेणी में महंगाई 18.46 फीसदी पर बनी हुई है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देश में महंगाई एक बार फिर रफ्तार पकड़ती नजर आ रही है. मई 2026 में खुदरा महंगाई दर (CPI) बढ़कर 3.93 फीसदी पर पहुंच गई, जो अप्रैल में 3.48 फीसदी थी. हालांकि यह अभी भी भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के 4 फीसदी के लक्ष्य के आसपास है, लेकिन खाद्य पदार्थों, ईंधन और परिवहन लागत में बढ़ोतरी ने आने वाले महीनों को लेकर चिंता बढ़ा दी है. सेंट्रम ब्रोकरेज का मानना है कि यदि महंगाई का दबाव इसी तरह बना रहा तो RBI अक्टूबर 2026 की मौद्रिक नीति समीक्षा में रेपो रेट में 0.25 फीसदी की बढ़ोतरी कर सकता है.
खाद्य महंगाई बनी सबसे बड़ी चिंता
मई में खाद्य महंगाई बढ़कर 4.78 फीसदी हो गई, जबकि अप्रैल में यह 4.20 फीसदी थी. सब्जियों की कीमतों में तेजी इसका प्रमुख कारण रही. टमाटर की महंगाई दर 35.3 फीसदी से बढ़कर 48.4 फीसदी पर पहुंच गई, जबकि अदरक की महंगाई 14.4 फीसदी से बढ़कर 32.5 फीसदी हो गई. हालांकि आलू की कीमतों में अभी भी राहत बनी हुई है और इसके दाम सालाना आधार पर 23.7 फीसदी नीचे हैं.
विशेषज्ञों का कहना है कि पिछले वर्ष खाद्य वस्तुओं की कीमतों में आई गिरावट का आधार प्रभाव अब खत्म हो रहा है, जिससे आने वाले महीनों में और अधिक खाद्य वस्तुएं महंगी हो सकती हैं.
ईंधन महंगा, परिवहन लागत पर असर
15 से 25 मई के बीच पेट्रोल और डीजल की कीमतों में करीब 7.5 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी हुई थी. इसका असर अब महंगाई के आंकड़ों में दिखने लगा है. परिवहन महंगाई अप्रैल में लगभग शून्य थी, जो मई में बढ़कर 1.75 फीसदी हो गई. वहीं, माल ढुलाई सेवाओं की महंगाई 7.63 फीसदी तक पहुंच गई है. बढ़ती लॉजिस्टिक्स लागत का असर आने वाले समय में रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर भी पड़ सकता है.
सोना-चांदी की चमक से भी बढ़ा महंगाई का दबाव
रिपोर्ट के अनुसार, कीमती धातुओं की बढ़ती कीमतें भी महंगाई को ऊपर धकेल रही हैं. व्यक्तिगत देखभाल और अन्य वस्तुओं की श्रेणी में महंगाई 18.46 फीसदी पर बनी हुई है. चांदी के आभूषणों की महंगाई 155 फीसदी से अधिक दर्ज की गई है, जबकि सोना, हीरा और प्लैटिनम से जुड़े उत्पादों की महंगाई 40 फीसदी से ऊपर बनी हुई है. आयात शुल्क में वृद्धि का असर अब भी बाजार में दिखाई दे रहा है.
रेस्तरां में खाना भी हुआ महंगा
बढ़ती लागत का असर होटल और रेस्तरां क्षेत्र पर भी दिख रहा है. रेस्तरां और होटल सेवाओं की महंगाई अप्रैल के 4.2 फीसदी से बढ़कर मई में 5.75 फीसदी हो गई. विशेषज्ञों का कहना है कि कमर्शियल एलपीजी की सीमित उपलब्धता और बढ़ती परिचालन लागत के कारण होटल एवं रेस्तरां संचालकों पर दबाव बढ़ा है, जिसका बोझ अब ग्राहकों पर पड़ रहा है.
कुछ राहत के संकेत भी मौजूद
महंगाई के बीच कुछ सकारात्मक संकेत भी सामने आए हैं. जून की शुरुआत में देश के प्रमुख जलाशयों में जल स्तर सामान्य से बेहतर रहा है. टमाटर, प्याज और आलू की बाजार आवक भी महीने-दर-महीने 5 से 6 फीसदी बढ़ी है. इसके अलावा भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने अगले दो सप्ताह तक भीषण गर्मी की संभावना कम बताई है. इससे खाद्य महंगाई पर कुछ हद तक नियंत्रण रहने की उम्मीद की जा रही है.
मानसून और कच्चा तेल बने सबसे बड़े जोखिम
सेंट्रम ब्रोकरेज का मानना है कि आने वाले महीनों में महंगाई की दिशा तय करने में मानसून और कच्चे तेल की कीमतें सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी. मौसम विभाग के दूसरे अनुमान के अनुसार 2026 का दक्षिण-पश्चिम मानसून सामान्य से कमजोर रह सकता है. सामान्य वर्षा के मुकाबले करीब 90 फीसदी बारिश का अनुमान है, जबकि कमजोर मानसून की संभावना 60 फीसदी तक बताई गई है. एल नीनो के संकेत भी कृषि उत्पादन के लिए चुनौती बन सकते हैं.
दूसरी ओर पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण ब्रेंट क्रूड 90 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बना हुआ है. यदि तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं तो इसका सीधा असर ईंधन, परिवहन और उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों पर पड़ेगा.
RBI की अगली चाल क्या होगी?
ब्रोकरेज रिपोर्ट के मुताबिक फिलहाल महंगाई RBI के लक्ष्य के करीब है और कोर महंगाई भी नियंत्रण में है. ऐसे में अगस्त की मौद्रिक नीति बैठक में ब्याज दरों में बदलाव की संभावना कम दिखाई देती है. हालांकि यदि खाद्य महंगाई, ईंधन कीमतों और परिवहन लागत में बढ़ोतरी जारी रहती है और CPI महंगाई RBI की ऊपरी सीमा की ओर बढ़ती है, तो अक्टूबर 2026 में केंद्रीय बैंक रेपो रेट में 0.25 फीसदी की बढ़ोतरी कर सकता है.
सेंट्रम ब्रोकरेज का अनुमान है कि वित्त वर्ष 2026-27 में औसत खुदरा महंगाई करीब 5.1 फीसदी रह सकती है. इससे संकेत मिलता है कि महंगाई का दबाव निकट भविष्य में पूरी तरह खत्म होता नहीं दिख रहा है.
'Healthy', 'Vegan' और 'True Vitamin' जैसे दावों पर उठे सवाल, उपभोक्ताओं को गुमराह करने का आरोप
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने उपभोक्ताओं को गुमराह करने वाले ब्रांड नामों, ट्रेड नेम और उत्पाद दावों के इस्तेमाल को लेकर आठ खाद्य कंपनियों को नोटिस जारी किया है. नियामक का कहना है कि इन कंपनियों की ब्रांडिंग और मार्केटिंग गतिविधियां खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006 के प्रावधानों का उल्लंघन कर सकती हैं.
FSSAI ने रविवार को अपने आधिकारिक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के माध्यम से इस कार्रवाई की जानकारी दी. नियामक के अनुसार, कंपनियों की ब्रांडिंग और प्रचार सामग्री की समीक्षा के बाद यह कदम उठाया गया है.
FSSAI has issued notices to several food business operators (FBOs) for violating provisions of the FSS Act, 2006 regarding misleading brand names, trade names, and product claims... (1)2 pic.twitter.com/CgSVspoQxS
— FSSAI (@fssaiindia) June 14, 2026
इन कंपनियों को भेजा गया नोटिस
नोटिस पाने वाली कंपनियों में Emami Healthy & Tasty, Health Aid, Troovy, The Healthy Factory, Healthy Master, Healthy Choice, Plan B और Neuherbs शामिल हैं. FSSAI का आरोप है कि इन कंपनियों द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे कुछ नाम, टैगलाइन और उत्पाद दावे उपभोक्ताओं के बीच गलत धारणा पैदा कर सकते हैं.
Emami और Plan B पर क्या हैं आरोप
कोलकाता स्थित Emami Group की खाद्य तेल इकाई Emami Healthy & Tasty के ट्रेड नेम को लेकर नियामक ने आपत्ति जताई है. FSSAI का मानना है कि यह नाम उपभोक्ताओं को उत्पाद की गुणवत्ता या स्वास्थ्य लाभ के बारे में भ्रमित कर सकता है. वहीं, प्लांट-बेस्ड फूड ब्रांड Plan B पर अपने उत्पादों को "Plant Based Vegan" बताकर प्रचारित करने का आरोप है. प्राधिकरण के अनुसार कंपनी ने अपने FSSAI लाइसेंस में आवश्यक वीगन फूड अनुमोदन प्राप्त किए बिना ऐसे दावों का इस्तेमाल किया, जिससे ग्राहकों के बीच गलत संदेश जा सकता है.
'Zero Maida' और 'Healthy' दावों की जांच
The Healthy Factory के "Zero Maida Whole Wheat Bread" और "Zero Maida Pizza Base" जैसे उत्पाद भी जांच के दायरे में आए हैं. FSSAI का कहना है कि इन उत्पादों में आटे के अलावा अन्य अवयव भी मौजूद हैं, इसलिए "जीरो मैदा" जैसे दावों की सत्यता पर सवाल खड़े होते हैं. इसी तरह Troovy के "Healthy Mix Veggie Chips", "Healthy Ragi Chips" और "Healthy Moong Dal Chips" जैसे स्नैक उत्पादों को लेकर भी नियामक ने आपत्ति जताई है. उसके अनुसार इन उत्पादों में कई अन्य सामग्री शामिल हैं, ऐसे में इन्हें सीधे तौर पर "Healthy" बताना उपभोक्ताओं को भ्रमित कर सकता है.
Neuherbs के 'True Vitamin' ब्रांड पर भी सवाल
FSSAI ने Neuherbs की "True Vitamin" उत्पाद श्रृंखला को भी नोटिस भेजा है. नियामक का कहना है कि "True Vitamin" शब्दावली खाद्य सुरक्षा नियमों में परिभाषित या मान्यता प्राप्त नहीं है, इसलिए इसका इस्तेमाल ग्राहकों को गलत संदेश दे सकता है.
टैगलाइन और ब्रांड नाम भी बने जांच का विषय
कार्रवाई केवल उत्पादों तक सीमित नहीं रही. FSSAI ने Healthy Master की टैगलाइन "Vision to Serve Healthy", Healthy Choice के "Healthy Food for Healthy Life Poha" और Health Aid के ब्रांड नाम पर भी आपत्ति दर्ज की है. प्राधिकरण का मानना है कि इस तरह के नाम और दावे ग्राहकों को यह विश्वास दिला सकते हैं कि उत्पाद विशेष स्वास्थ्य लाभ प्रदान करते हैं, जबकि इसके लिए स्पष्ट नियामकीय आधार आवश्यक है.
उपभोक्ता हितों की सुरक्षा पर जोर
FSSAI ने स्पष्ट किया है कि खाद्य उत्पादों के नाम, पैकेजिंग और विज्ञापनों में किए जाने वाले दावे तथ्यात्मक, पारदर्शी और नियमों के अनुरूप होने चाहिए. नियामक का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि उपभोक्ता किसी आकर्षक नाम या दावे से प्रभावित होकर गलत जानकारी के आधार पर खरीदारी का निर्णय न लें.
खाद्य सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह कार्रवाई खाद्य उद्योग को अधिक जवाबदेह बनाने और उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है.
नीतिगत सुधार, निजी निवेश और स्टार्टअप्स के दम पर अंतरिक्ष क्षेत्र में तेजी से बढ़ेगा भारत का दबदबा
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था (स्पेस इकोनॉमी) अगले एक दशक में करीब पांच गुना बढ़कर 40-45 अरब डॉलर तक पहुंच सकती है. केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने रविवार को यह जानकारी दी. उन्होंने कहा कि नीतिगत सुधारों, निजी क्षेत्र की बढ़ती भागीदारी और तेजी से बढ़ रहे स्पेस स्टार्टअप्स के कारण भारत का अंतरिक्ष क्षेत्र अभूतपूर्व विकास की ओर बढ़ रहा है.
भारत की स्पेस इकोनॉमी में तेजी से हो रहा विस्तार
जितेंद्र सिंह ने बताया कि वर्तमान में भारत की स्पेस इकोनॉमी का आकार लगभग 8-9 अरब डॉलर है और देश में 400 से अधिक स्पेस स्टार्टअप्स सक्रिय हैं. कुछ वर्षों पहले इनकी संख्या बेहद सीमित थी. उन्होंने कहा कि यह वृद्धि भारत में मजबूत होते नवाचार (इनोवेशन) इकोसिस्टम और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के प्रति बढ़ती जनभागीदारी का प्रमाण है.
उन्होंने कहा, "सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि आज आम नागरिक खुद को भारत की वैज्ञानिक प्रगति से जुड़ा हुआ महसूस करता है और उसमें अपनी भागीदारी देखता है." उनके अनुसार विज्ञान अब केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय चेतना का हिस्सा बन चुका है.
प्रधानमंत्री मोदी की पहल ने बदली तस्वीर
जितेंद्र सिंह ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी को जनचर्चा के केंद्र में लाने का श्रेय प्रधानमंत्री Narendra Modi की दूरदर्शी सोच को दिया. उन्होंने कहा कि **डिजिटल इंडिया**, Gaganyaan और Deep Ocean Mission जैसी पहलों ने तकनीक आधारित विकास को मुख्यधारा में लाने का काम किया है.
चंद्रयान-3 ने बढ़ाया वैश्विक सम्मान
मंत्री ने कहा कि चंद्रयान-3 जैसे मिशनों ने भारत को दुनिया के अग्रणी अंतरिक्ष देशों की श्रेणी में पहुंचाया है और आम लोगों के बीच अंतरिक्ष विज्ञान के प्रति रुचि बढ़ाई है. उन्होंने कहा कि भारत का आगामी मानव अंतरिक्ष मिशन गगनयान स्वदेशी तकनीकों पर भरोसा और मजबूत करेगा.
शासन और विकास में बढ़ रहा अंतरिक्ष तकनीक का उपयोग
जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारत अब केवल अंतरिक्ष अन्वेषण तक सीमित नहीं है, बल्कि शासन और बुनियादी ढांचा विकास में भी अंतरिक्ष तकनीक का व्यापक उपयोग कर रहा है. उन्होंने बताया कि पीएम गति शक्ति और शहरी विकास से जुड़े कई कार्यक्रमों में योजना निर्माण, निगरानी और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए सैटेलाइट डेटा का इस्तेमाल किया जा रहा है.
निजी कंपनियों और स्टार्टअप्स के लिए खुले नए अवसर
मंत्री ने कहा कि हाल के वर्षों में किए गए सुधारों के चलते अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोला गया है. इससे स्टार्टअप्स अब लॉन्च सेवाओं, सैटेलाइट निर्माण, डेटा सेवाओं और विभिन्न अंतरिक्ष आधारित अनुप्रयोगों में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं.
उन्होंने कहा, "कम समय में जिस गति से यह क्षेत्र बढ़ा है, वह भारत की स्पेस इकोनॉमी की अपार संभावनाओं को दर्शाता है."
अस्थायी चुनौतियां वैज्ञानिक प्रगति का हिस्सा
हाल में हुए कुछ प्रक्षेपणों में आई तकनीकी चुनौतियों पर बोलते हुए जितेंद्र सिंह ने कहा कि हालिया PSLV मिशन में आई तकनीकी गड़बड़ी का विश्लेषण पूरा कर लिया गया है और आवश्यक सुधारात्मक कदम उठाए जा चुके हैं. उन्होंने विश्वास जताया कि भविष्य के मिशन इन अनुभवों से और अधिक मजबूत बनेंगे.
उन्होंने कहा कि अस्थायी असफलताएं वैज्ञानिक प्रगति का स्वाभाविक हिस्सा होती हैं और चंद्र तथा अंतरग्रहीय मिशनों में भारत की पहली कोशिश में मिली सफलताएं दुनिया की अग्रणी अंतरिक्ष शक्तियों की तुलना में देश की मजबूत उपलब्धियों को दर्शाती हैं.
वेदांता लिमिटेड से अलग होकर बनी चार नई कंपनियां, वेदांता एलुमिनियम मेटल, वेदांता पावर, वेदांता ऑयल एंड गैस और वेदांता आयरन एंड स्टील आज शेयर बाजार में सूचीबद्ध होंगी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के मेटल और माइनिंग सेक्टर के सबसे बड़े कॉरपोरेट पुनर्गठन में से एक माने जा रहे वेदांता (Vedanta) डीमर्जर का अहम चरण सोमवार, 15 जून को पूरा होने जा रहा है. वेदांता लिमिटेड से अलग होकर बनी चार नई कंपनियां, वेदांता एलुमिनियम मेटल (Vedanta Aluminium Metal), वेदांता पावर (Vedanta Power), वेदांता ऑयल एंड गैस (Vedanta Oil & Gas) और वेदांता आयरन एंड स्टील (Vedanta Iron & Steel), आज शेयर बाजार में सूचीबद्ध होंगी. इस लिस्टिंग के साथ निवेशकों को पहली बार इन कारोबारों में अलग-अलग निवेश करने का अवसर मिलेगा. बाजार की नजर इस बात पर रहेगी कि निवेशक और संस्थागत फंड इन स्वतंत्र कारोबारों को किस तरह वैल्यू देते हैं और इनमें से कौन-सा स्टॉक सबसे अधिक आकर्षण का केंद्र बनता है.
डीमर्जर के बाद शुरू होगा वैल्यू अनलॉकिंग का नया दौर
वेदांता ने डीमर्जर के लिए 1 मई को रिकॉर्ड डेट तय की थी. रिकॉर्ड डेट तक कंपनी के शेयर रखने वाले निवेशकों को नई चारों कंपनियों में एक-एक शेयर आवंटित किया गया है. हालांकि अब तक केवल वेदांता लिमिटेड का शेयर ही कारोबार कर रहा था, जबकि नई कंपनियों की वास्तविक बाजार वैल्यू सामने नहीं आई थी. सोमवार की लिस्टिंग के बाद पहली बार बाजार इन कारोबारों का अलग-अलग मूल्यांकन करेगा.
कौन-कौन सी कंपनियां होंगी लिस्ट
स्टॉक एक्सचेंज के नोटिस के अनुसार सोमवार को Vedanta Oil & Gas, Vedanta Power, Vedanta Aluminium Metal और Vedanta Iron & Steel के शेयरों में कारोबार शुरू होगा. शुरुआती चरण में इन शेयरों को ट्रेड-टू-ट्रेड (T2T) सेगमेंट में रखा जाएगा, जहां हर सौदे में अनिवार्य डिलीवरी लेनी और देनी होगी. इस दौरान इंट्रा-डे ट्रेडिंग की अनुमति नहीं होगी.
ब्रोकरेज को किस कारोबार में दिख रहा है सबसे ज्यादा दम
नुवामा (Nuvama Institutional Equities) का मानना है कि वेदांता का संसाधन आधारित कारोबार मजबूत नकदी प्रवाह और विविध पोर्टफोलियो के कारण लंबी अवधि में बेहतर प्रदर्शन कर सकता है. ब्रोकरेज के मुताबिक जिंक, लेड और सिल्वर कारोबार कंपनी की सबसे बड़ी ताकत बने हुए हैं, जबकि एल्युमिनियम और जिंक उत्पादन में संभावित वृद्धि भविष्य की ग्रोथ को गति दे सकती है.
वहीं एमके (Emkay Global Financial Services) का मानना है कि Vedanta Aluminium और Vedanta Power को स्वतंत्र इकाइयों के रूप में बाजार बेहतर वैल्यूएशन दे सकता है. खासकर एल्युमिनियम कारोबार में लागत घटने और मांग बढ़ने से निवेशकों की रुचि अधिक रहने की संभावना है.
डीमर्जर के बाद निवेशकों को पहली बार एल्युमिनियम, बिजली, तेल एवं गैस तथा आयरन-स्टील जैसे अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी पसंद के अनुसार निवेश करने की सुविधा मिलेगी. अब किसी एक कंपनी के भीतर सभी कारोबारों में निवेश करने के बजाय निवेशक सीधे उस सेक्टर पर दांव लगा सकेंगे, जिसमें उन्हें सबसे अधिक संभावनाएं दिखाई देती हैं.
किस शेयर पर रहेगी सबसे ज्यादा नजर
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि लिस्टिंग के बाद Vedanta Aluminium Metal और Vedanta Power निवेशकों के बीच सबसे अधिक चर्चा में रह सकते हैं. एल्युमिनियम कारोबार की मजबूत मांग और पावर बिजनेस की स्थिर आय क्षमता इन्हें अन्य कंपनियों की तुलना में बेहतर वैल्यूएशन दिला सकती है. हालांकि अंतिम फैसला बाजार की शुरुआती प्रतिक्रिया और निवेशकों की रुचि पर निर्भर करेगा.
विशेषज्ञों के अनुसार डीमर्जर का सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि अब प्रत्येक कारोबार की वास्तविक क्षमता और बाजार मूल्य अलग-अलग सामने आएगा. इससे निवेशकों को बेहतर निवेश निर्णय लेने में मदद मिलेगी और वेदांता समूह की विभिन्न कंपनियों में छिपी वैल्यू भी उजागर होगी.
NSE को IPO की जरूरत नहीं है, उसे सिर्फ सोमवार सुबह का एक ओपनिंग प्राइस चाहिए.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
कंपनियों के दो प्रकार होते हैं जो IPO लेकर आती हैं. पहला प्रकार वह होता है जिसे पैसे की जरूरत होती है, विकास के लिए नई पूंजी जुटाने, कर्ज चुकाने, फैक्ट्रियां बनाने या बड़ी संख्या में कर्मचारियों की भर्ती करने के लिए.
दूसरा प्रकार वह होता है जिसे पैसों की बिल्कुल जरूरत नहीं होती, लेकिन फिर भी IPO की पूरी प्रक्रिया से गुजरता है क्योंकि व्यवस्था यही मांग करती है, निवेश बैंकरों को अपनी फीस चाहिए होती है और किसी ने अब तक यह बौद्धिक साहस नहीं दिखाया कि पूछा जाए कि क्या यह पूरी प्रक्रिया वास्तव में अनावश्यक है.
NSE स्पष्ट रूप से, प्रमाणिक रूप से और लगभग अपमानजनक हद तक दूसरे प्रकार की कंपनी है.
और फिर भी, हम यहां हैं. पूरे बीस गिनिए, बीस बुक रनिंग लीड मैनेजर्स नियुक्त किए जा चुके हैं. कोटक, JM फाइनेंशियल, एक्सिस कैपिटल, मॉर्गन स्टेनली, जे.पी. मॉर्गन, HSBC, सिटी, ICICI सिक्योरिटीज और SBI कैपिटल मार्केट्स.
इतना बड़ा समूह कि उसे ट्रैक करने के लिए स्प्रेडशीट की जरूरत पड़ जाए. यह सब ऐसे ऑफर के लिए किया जा रहा है जिसमें कोई नए शेयर जारी नहीं होंगे, कोई नई पूंजी नहीं जुटाई जाएगी और संबंधित एक्सचेंज पहले से ही देश के सबसे अधिक जांचे-परखे जाने वाले वित्तीय संस्थानों में से एक है.
ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस (DRHP) को 5 से 15 जून के बीच दाखिल करने की तैयारी की जा रही थी. लक्ष्य था दिसंबर 2026 से पहले लिस्टिंग. सभी के दिमाग में शुभ तारीख थी — दिवाली, 8 नवंबर.
और इस पूरी कवायद के बदले बैंकरों की इस फौज को मिलने वाली राशि? सतर्क अनुमान के अनुसार ₹100-200 करोड़ से अधिक. यह ₹25,000 करोड़ से ₹30,000 करोड़ के OFS पर 1 प्रतिशत से भी कम मिश्रित शुल्क के आधार पर है.
इस पूरे इकोसिस्टम में कोई भी जिस सवाल को पर्याप्त जोर से नहीं पूछ रहा है, वह है: क्यों?
नियामकीय समस्या, जो वास्तव में कोई समस्या है ही नहीं
आइए संरचनात्मक तर्क से शुरुआत करें, क्योंकि यह इस IPO की पूरी अवधारणा को लगभग चार वाक्यों में ध्वस्त कर देता है.
SEBI का IPO ढांचा DRHP, 30 दिन की समीक्षा, रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस, प्राइस बैंड, बुक बिल्डिंग, रोडशो और लॉक-इन मुख्य रूप से एक कारण से अस्तित्व में है: जनता को प्रमोटरों से बचाने के लिए.
पूरी व्यवस्था उस असमानता पर आधारित है जिसमें एक नियंत्रक शेयरधारक व्यवसाय के बारे में सब कुछ जानता है, जबकि खुदरा निवेशक कुछ नहीं जानता. SEBI बीच में बैठकर कहता है: सब कुछ उजागर करो, अपनी कीमत का औचित्य बताओ और तब तक मत बेचो जब तक जनता को यह समझने का उचित अवसर न मिल जाए कि वह क्या खरीद रही है.
NSE का कोई प्रमोटर नहीं है.
यह कोई तकनीकी बात नहीं है. यह एक ऐसी संरचनात्मक सच्चाई है जिसके गहरे परिणाम हैं.
यहां कोई अंबानी नहीं है, कोई अडानी नहीं है, कोई संस्थापक परिवार नहीं है जो 60 प्रतिशत हिस्सेदारी रखता हो और आपकी कीमत पर आंशिक निकास चाहता हो.
एक्सचेंज का स्वामित्व विभिन्न वित्तीय संस्थानों, ट्रेडिंग सदस्यों और विदेशी निवेशकों के बीच फैला हुआ है. इनमें से किसी के पास नियंत्रणकारी हिस्सेदारी नहीं है.
10 जून 2026 तक ट्रेडिंग सदस्यों, उनके सहयोगियों और एजेंटों की संयुक्त हिस्सेदारी चुकता पूंजी का 35.17 प्रतिशत थी. कोई एक संस्था हावी नहीं है.
और यहीं पर MPS का तर्क तलवार की तरह काम करता है.
SEBI के न्यूनतम सार्वजनिक शेयरधारिता (MPS) नियम के अनुसार सूचीबद्ध कंपनियों को कम से कम 25 प्रतिशत सार्वजनिक स्वामित्व बनाए रखना होता है.
जिस कंपनी में प्रमोटर की हिस्सेदारी 75 प्रतिशत या उससे अधिक हो, उसे हिस्सेदारी बेचनी पड़ती है. इसके लिए समय-सीमा, अनुपालन तंत्र और उल्लंघन पर कार्रवाई की व्यवस्था है.
पूरी व्यवस्था का उद्देश्य प्रमोटरों को संपत्ति साझा करने के लिए बाध्य करना है.
लेकिन NSE, जिसका कोई प्रमोटर ही नहीं है, लगभग निश्चित रूप से एक भी IPO शेयर बिकने से पहले ही 25 प्रतिशत से अधिक सार्वजनिक शेयरधारिता रखता है.
MPS अनुपालन की समस्या यहां अस्तित्व में ही नहीं है.
25 प्रतिशत हिस्सेदारी घटाने की आवश्यकता किसी भी सार्थक अर्थ में लागू नहीं होती.
तो फिर सवाल यह है कि DRHP आखिर किसलिए है?
1.9 लाख शेयरधारक पहले से ही आपकी प्राइस डिस्कवरी कर रहे हैं
अब दूसरा तथ्य, जो उतना ही निर्णायक है.
NSE के शेयर पहले से ही सक्रिय, आक्रामक और बड़े पैमाने पर कारोबार में हैं.
ग्रे मार्केट वर्षों से NSE के शेयरों के लिए एक समानांतर एक्सचेंज चला रहा है.
मई 2026 के अंत तक NSE के गैर-सूचीबद्ध शेयर लगभग ₹1,980 प्रति शेयर पर कारोबार कर रहे थे. इससे एक्सचेंज का कुल मूल्यांकन लगभग ₹6 लाख करोड़ बैठता है.
52 सप्ताह का उच्चतम स्तर ₹2,470 था.
52 सप्ताह का न्यूनतम स्तर ₹1,891 था.
ये काल्पनिक आंकड़े नहीं हैं. ये वास्तविक लेन-देन, वास्तविक प्राइस डिस्कवरी और वास्तविक खरीदारों एवं विक्रेताओं द्वारा व्यक्त वास्तविक मूल्यांकन हैं.
NSE के लगभग 1.9 लाख शेयरधारक हैं. यह शेयरधारकों की संख्या के हिसाब से भारत की सबसे बड़ी गैर-सूचीबद्ध कंपनी है और कई सूचीबद्ध कंपनियों से भी आगे है.
ये कोई शांत, निष्क्रिय निवेशक नहीं हैं जो किसी दराज में शेयर रखकर बैठे हों.
वे अभी कारोबार कर रहे हैं.
आज.
ऐसी कीमतों पर जो 2021 के ₹740 से बढ़कर आज बोनस इश्यू समायोजन के बाद लगभग ₹2,000 तक पहुंच चुकी हैं.
तो IPO इस तस्वीर में क्या जोड़ रहा है?
प्राइस डिस्कवरी नहीं, वह पहले से हो रही है.
लिक्विडिटी नहीं, बाजार पहले से मौजूद है.
पारदर्शिता नहीं NSE, निफ्टी 50 की आधी कंपनियों से अधिक विस्तृत खुलासे करता है.
पूंजी निर्माण नहीं, क्योंकि OFS से NSE को एक भी रुपया नहीं मिलेगा.
IPO जो जोड़ रहा है, वह है:
- 6 महीने की देरी.
- 20 बैंक.
- सैकड़ों करोड़ रुपये की फीस.
- एक DRHP जिसकी समीक्षा SEBI को करनी होगी.
- एक लॉक-इन अवधि जो मौजूदा धारकों को नुकसान पहुंचाती है.
- एक प्राइस बैंड जो उस परिसंपत्ति में कृत्रिम बाधाएं पैदा करता है जिसकी कीमत पहले से बाजार तय कर रहा है.
और एक दिवाली लिस्टिंग की तारीख, जो वित्तीय निर्णय से ज्यादा ज्योतिषीय परामर्श जैसी लगती है.
अमेरिकी मॉडल: गति कोई खामी नहीं, बल्कि एक विशेषता है
जब 2018 में Spotify ने सूचीबद्ध होने का फैसला किया, तो उसके CEO Daniel Ek ने ऐसा निर्णय लिया जिसे वॉल स्ट्रीट ने लगभग व्यक्तिगत अपमान की तरह लिया.
उन्होंने रोडशो नहीं किया.
उन्होंने कोई अंडरराइटिंग सिंडिकेट नियुक्त नहीं किया.
उन्होंने कोई बुक प्राइस नहीं तय की.
वे सीधे New York Stock Exchange के पास गए, कहा कि कंपनी के शेयर मौजूद हैं, मौजूदा बाजार के आधार पर उनकी यह कीमत है, और फिर उन्हें कारोबार के लिए खुलने दिया.
किसी बैंकर को अरबों डॉलर के सौदे पर 3 से 7 प्रतिशत फीस नहीं मिली.
किसी संस्थागत निवेशक को पहले दिन बाजार मूल्य से कम कीमत पर विशेष आवंटन नहीं मिला जिसे वह तुरंत बेचकर सुनिश्चित लाभ कमा सके.
किसी खुदरा निवेशक को शुरुआती कारोबार से बाहर नहीं रखा गया.
शेयर खुले. लोगों ने खरीदा. लोगों ने बेचा. और एक कीमत सामने आई.
2021 में Coinbase ने यही किया.
Slack ने किया.
Palantir ने किया.
Warby Parker ने किया.
हर बार निवेश बैंकिंग जगत का तर्क एक जैसा था: डायरेक्ट लिस्टिंग जोखिम भरी है, शेयर में अस्थिरता आ सकती है, कीमत को स्थिर रखने के लिए अंडरराइटर जरूरी हैं.
और हर बार कंपनियों ने पाया कि बाजार खुद ही कीमत तय करने में पूरी तरह सक्षम है, बिना इसके कि Goldman Sachs को इस विशेषाधिकार के लिए सैकड़ों करोड़ रुपये दिए जाएं.
अमेरिका बड़ी और स्थापित कंपनियों को डायरेक्ट लिस्टिंग के जरिए सूचीबद्ध करता है क्योंकि वहां के नियामकों ने एक ऐसी सच्चाई को स्वीकार किया जिसे SEBI अभी तक पूरी तरह आत्मसात नहीं कर पाया है.
जहां पहले से प्राइस डिस्कवरी मौजूद हो, जहां शेयरधारक पहले से शेयर रखते और उनका कारोबार करते हों, और जहां नई पूंजी नहीं जुटाई जा रही हो, वहां IPO प्रक्रिया बाजार के लिए सेवा नहीं बल्कि एक कर (टैक्स) बन जाती है.
यह मौजूदा शेयरधारकों से संपत्ति लेकर बैंकरों को हस्तांतरित करती है.
पहले दिन शेयर में जो उछाल आता है, वह सफल प्राइस डिस्कवरी का संकेत नहीं होता. वह इस बात का संकेत होता है कि शेयरों की कीमत जानबूझकर कम रखी गई थी, जिससे संस्थागत निवेशकों को लाभ पहुंचाया जा सके.
जून 2026 तक भारत का मार्केट कैप-टू-GDP अनुपात लगभग 119.85 प्रतिशत है.
सरकार और SEBI लंबे समय से इस आंकड़े को बढ़ाने की दिशा में काम कर रहे हैं — अधिक लिस्टिंग, गहरे बाजार और व्यापक भागीदारी के माध्यम से.
NSE जितना समय DRHP तैयार करने में लगाएगा, उतने समय तक भारत का बाजार पूंजीकरण ₹5-6 लाख करोड़ कम आंका जाता रहेगा.
यदि NSE अगले सप्ताह डायरेक्ट लिस्टिंग के जरिए सूचीबद्ध हो जाए, तो यह एक ही सुबह में भारत के मार्केट कैप-टू-GDP अनुपात में उतना योगदान दे सकता है जितना एक पूरी तिमाही में दर्जनों मिड-कैप IPO भी नहीं कर पाते.
इस गणित में कोई जटिलता नहीं है.
हवा में लटका हुआ जुर्माना
आगे बढ़ने से पहले देरी के एकमात्र वैध कारण पर बात कर लेते हैं, क्योंकि इसके साथ ईमानदारी बरतना जरूरी है.
NSE और SEBI एक दशक से अधिक समय से को-लोकेशन घोटाले को लेकर कानूनी विवाद में उलझे हुए हैं.
यह वही मामला है जिसमें कुछ ब्रोकर्स को NSE के ट्रेडिंग सर्वरों तक माइक्रोसेकंड के स्तर पर विशेष पहुंच मिली थी, जिससे वे हाई-फ्रीक्वेंसी ट्रेडिंग रणनीतियों के जरिए बाजार के अन्य प्रतिभागियों की कीमत पर लाभ कमा सके.
SEBI के बाहरी विशेषज्ञ पैनल ने सिफारिश की है कि NSE को को-लोकेशन और डार्क फाइबर मामले के निपटारे के लिए लगभग ₹1,880 करोड़ का भुगतान करना चाहिए.
NSE ने ₹1,387.39 करोड़ की पेशकश की थी.
पैनल ने कहा कि राशि अधिक होनी चाहिए.
फाइल अब अंतिम मंजूरी के लिए SEBI के पूर्णकालिक सदस्यों (Whole-Time Members) के पास है.
राशि का भुगतान अभी तक नहीं हुआ है.
निपटारा अभी तक पूरा नहीं हुआ है.
यही एकमात्र वास्तविक आधार है जिस पर नियामक लिस्टिंग में देरी को उचित ठहराते रहे हैं.
ऐसा नहीं कि जुर्माना लंबित होने पर एक्सचेंज सूचीबद्ध नहीं हो सकता, बल्कि इसलिए कि अंतिम निपटान राशि एक ज्ञात देनदारी होनी चाहिए जिसे किसी भी लिस्टिंग दस्तावेज में उजागर किया जाए.
और SEBI की NOC भी इसी मामले में पर्याप्त प्रगति होने के बाद जारी की गई.
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण बात है:
निपटारा और लिस्टिंग का तरीका दो अलग-अलग प्रश्न हैं.
NSE ₹1,880 करोड़ का भुगतान कर सकता है.
केवल FY25 में उसका शुद्ध लाभ ₹12,188 करोड़ था, जो पिछले वर्ष की तुलना में 47 प्रतिशत अधिक था.
उसने ₹35 प्रति शेयर के लाभांश की भी सिफारिश की.
यह जुर्माना एक वर्ष के लाभ का लगभग 15 प्रतिशत है.
यह ऐसी कंपनी नहीं है जिसे धन जुटाने के लिए समय चाहिए.
उसे केवल एक चेक लिखना है, मामला बंद करना है और सूचीबद्ध होना है.
SEBI द्वारा पैनल की अनुशंसित राशि पर अंतिम निर्णय लेने में दिखाई गई हिचकिचाहट ही वास्तव में कैलेंडर को रोक रही है.
न धन की कमी.
न संरचना की जटिलता.
और निश्चित रूप से बीस निवेश बैंकरों की आवश्यकता भी नहीं.
₹1,880 करोड़ का भुगतान कीजिए.
इसी सप्ताह.
और फिर सूचीबद्ध हो जाइए.
वह टकराव जिसका कोई नाम नहीं लेता
इस पूरी प्रक्रिया में एक ऐसा संस्थागत हितों का टकराव मौजूद है जो इतना बुनियादी है कि उसे स्पष्ट शब्दों में कहना लगभग असभ्य लगता है.
SEBI, NSE का नियामक है.
SEBI ही वह संस्था भी है जो NSE के DRHP को मंजूरी देगी.
SEBI के पूर्व अधिकारी विभिन्न निकायों में मौजूद हैं जिनका संबंध एक्सचेंज से है.
को-लोकेशन मामले का निपटारा, जिसकी सिफारिश SEBI के पैनल ने की है, SEBI के अपने पूर्णकालिक सदस्यों के समक्ष लंबित है.
और NSE को बाजार में जाने से पहले SEBI की NOC की आवश्यकता थी.
अब इसमें एक और परत जोड़िए.
SEBI में पंजीकृत कंपनियों को NSE के लिस्टिंग ऑब्लिगेशंस एंड डिस्क्लोजर रिक्वायरमेंट्स का पालन करना पड़ता है.
NSE हर बार फीस कमाता है जब कोई कंपनी सूचीबद्ध होती है, जब कोई डेरिवेटिव ट्रेड होता है और जब कोई ब्रोकर किसी पोजीशन का निपटान करता है.
SEBI नियम लिखता है.
NSE उनसे कमाई करता है.
IPO प्रक्रिया के तहत SEBI को NSE द्वारा दायर DRHP की समीक्षा करनी होगी.
SEBI उस संस्था का अध्ययन करेगा जिसे वह नियंत्रित करता है, उसी इकाई के खुलासों को मंजूरी देगा जिसकी निगरानी करता है और उस एक्सचेंज के लिस्टिंग दस्तावेज पर टिप्पणियां जारी करेगा जिसके दैनिक संचालन की वह निगरानी करता है.
हितों के टकराव का कोई भी फॉर्म इतना बड़ा नहीं है कि इस स्थिति को समेट सके.
यह ऐसा है जैसे रेफरी अंतिम सीटी बजाने से पहले टीम में हिस्सेदारी खरीद ले.
डायरेक्ट लिस्टिंग इस समस्या को खत्म कर देती है
डायरेक्ट लिस्टिंग ठीक उसी समस्या को समाप्त कर देती है.
SEBI को मंजूरी देने के लिए किसी DRHP की आवश्यकता नहीं होती.
NSE के मौजूदा खुलासे, ऑडिट किए गए वित्तीय विवरण, शेयरधारिता संबंधी आंकड़े और गवर्नेंस रिपोर्ट पहले से उपलब्ध हैं.
एक्सचेंज उन्हीं नियमों के तहत कारोबार के लिए खुल जाता है जो हर दूसरी सूचीबद्ध कंपनी पर लागू होते हैं.
SEBI को एक साथ नियामक और IPO का द्वारपाल बनने की जरूरत नहीं होती.
उसे सिर्फ नियामक बने रहने की जरूरत होती है.
मॉरीशस वाला सवाल, जिसका जवाब अब भी नहीं मिला
कम से कम एक काम DRHP प्रक्रिया जरूर करेगी, जो शायद एक शांत डायरेक्ट लिस्टिंग नहीं कर पाए, NSE के ऑफशोर शेयरधारकों के लाभकारी स्वामित्व (Beneficial Ownership) को सार्वजनिक करना.
जिन्हें अब "मॉरीशस फाइल्स" कहा जाने लगा है, वे NSE के शेयरधारक रजिस्टर पर एक स्थायी प्रश्नचिह्न बने हुए हैं.
IFCI द्वारा हिस्सेदारी बेचने के बाद DVI Fund Mauritius ने शेयर खरीदे थे.
अन्य ऑफशोर संस्थाओं के पास भी ऐसी संरचनाओं के माध्यम से हिस्सेदारी है, जिनमें वास्तविक लाभकारी स्वामित्व स्पष्ट नहीं है.
2015 में लगभग ₹17,500 करोड़ के मूल्यांकन से बढ़कर आज लगभग ₹6 लाख करोड़ तक पहुंचने का असाधारण सफर यह दर्शाता है कि जिन लोगों ने इन मॉरीशस वाहनों के पीछे बैठकर शुरुआती दौर में निवेश किया था, वे अब लगभग 34 गुना बढ़ चुकी परिसंपत्ति के मालिक हैं.
वे कौन हैं?
उन्होंने कितना भुगतान किया था?
क्या उनके पास खरीद के समय ऐसी कोई जानकारी थी जो सार्वजनिक नहीं थी?
डायरेक्ट लिस्टिंग की स्थिति में इन सवालों के जवाब अनिवार्य प्री-लिस्टिंग खुलासों के जरिए दिए जा सकते हैं.
ठीक वैसे ही जैसे SEBI किसी सूचीबद्ध कंपनी से लाभकारी स्वामित्व की जानकारी मांगता है.
पारदर्शिता सुनिश्चित करने का एकमात्र तरीका DRHP नहीं है.
यदि SEBI चाहे तो डायरेक्ट लिस्टिंग की शर्त के रूप में लाभकारी स्वामित्व की घोषणा अनिवार्य कर सकता है.
यह छह महीने की DRHP समीक्षा प्रक्रिया से कहीं अधिक तेज और प्रभावी पारदर्शिता प्रदान करेगा.
यह तर्क कि खुलासे सुनिश्चित करने के लिए IPO प्रक्रिया जरूरी है, उल्टा तर्क है.
खुलासे की आवश्यकताएं पूंजी जुटाने की प्रक्रिया से स्वतंत्र रूप से भी लागू की जा सकती हैं.
यह पूछने के लिए कि एक्सचेंज का मालिक कौन है, आपको बीस बैंकरों की जरूरत नहीं है.
निवेश बैंकरों की वह संख्या जो सभी को शर्मिंदा करनी चाहिए
एक OFS के लिए बीस बुक रनिंग लीड मैनेजर.
ऑफर फॉर सेल (OFS) में मौजूदा शेयरधारक अपने शेयर बेचते हैं.
NSE को स्वयं इससे कुछ नहीं मिलता.
कोई भी राशि कंपनी की बैलेंस शीट में नहीं जाती.
यह केवल मौजूदा धारकों संस्थानों, ट्रेडिंग सदस्यों और ऑफशोर निवेशकों से नए सार्वजनिक निवेशकों को शेयरों के हस्तांतरण की प्रक्रिया है.
बीस BRLM मिलकर एक प्रॉस्पेक्टस छापेंगे, एक ऐसी संस्था के लिए रोडशो करेंगे जिसे भारत का हर गंभीर निवेशक पहले से जानता है, उन शेयरों के लिए बुक बनाएंगे जिनकी कीमत पहले से ग्रे मार्केट में स्थापित है, और फिर उन्हें QIB, HNI और खुदरा निवेशकों के बीच मानक 50-15-35 अनुपात में आवंटित करेंगे.
इसके बदले, यदि ₹23,000 करोड़ के इश्यू पर केवल 0.5 प्रतिशत मिश्रित शुल्क भी माना जाए, तो फीस ₹115 करोड़ बैठती है.
यदि शुल्क 1 प्रतिशत हो तो राशि ₹230 करोड़ तक पहुंच जाती है.
और यदि इसे उन उच्च शुल्कों से तुलना करें जो ऐतिहासिक रूप से बड़े IPO में वसूले गए हैं, तो यह आंकड़ा और ऊपर जा सकता है.
यह पैसा कहीं से जादुई रूप से नहीं आता.
यह उस छूट से आता है जिस पर शेयरों की पेशकश की जाती है.
और वह छूट परिभाषा के अनुसार मौजूदा शेयरधारकों से मूल्य लेकर नए निवेशकों और बैंकरों को स्थानांतरित करती है.
बैंकर फीस में दिया गया हर रुपया वह रुपया है जो मौजूदा शेयरधारकों को नहीं मिलता.
इनमें वे संस्थान, ट्रेडिंग सदस्य और वे खुदरा निवेशक भी शामिल हैं जिन्होंने वर्षों तक NSE के गैर-सूचीबद्ध शेयरों को धैर्यपूर्वक संभाल कर रखा है.
जब कोई नई पूंजी जुटाई ही नहीं जा रही, तब यह केवल एक लागत है.
और ऐसी लागत जिसका लाभ डायरेक्ट लिस्टिंग के माध्यम से बहुत कम खर्च में हासिल किया जा सकता है.
ये सप्ताह कैसा दिख सकता है
यदि इच्छाशक्ति हो, तो SEBI और NSE निम्नलिखित योजना को लागू कर सकते हैं.
NSE ₹1,880 करोड़ के निपटान को अंतिम रूप दे और उसका भुगतान करे.
इसके लिए केवल एक बोर्ड प्रस्ताव और एक चेक की जरूरत है.
NSE की नकदी स्थिति को देखते हुए यह कोई जटिल लेन-देन नहीं है.
इसके बाद NSE एक प्री-लिस्टिंग डिस्क्लोजर दस्तावेज दाखिल करे.
DRHP नहीं, बल्कि एक विस्तृत सूचना ज्ञापन.
इसमें वित्तीय आंकड़े, लाभकारी स्वामित्व सहित शेयरधारिता संरचना, गवर्नेंस, जोखिम कारक और को-लोकेशन मामले के निपटान का विवरण शामिल हो.
यह दस्तावेज पहले से लगभग तैयार है.
FY25 तक के ऑडिट किए गए खाते उपलब्ध हैं.
गवर्नेंस संबंधी खुलासे नियमित हैं.
और जोखिम कारकों को बाजार अच्छी तरह समझता है.
इसके बाद SEBI खुलासे को स्वीकार करे, MPS अनुपालन की पुष्टि करे — जो NSE की शेयरधारिता संरचना को देखते हुए आसानी से पूरा होता है — और लिस्टिंग की तारीख तय करे.
NSE के शेयर संतुलन और निष्पक्षता के लिए किसी प्रतिद्वंद्वी एक्सचेंज पर कारोबार के लिए स्वीकार किए जाएं.
ओपनिंग प्राइस 1.9 लाख मौजूदा शेयरधारकों और नए खरीदारों द्वारा दिए गए खरीद-बिक्री आदेशों से तय हो.
ठीक उसी तरह जैसे बाजार में हर दूसरे शेयर की कीमत तय होती है.
एक्सचेंज कारोबार शुरू कर दे.
भारत का कुल सूचीबद्ध बाजार पूंजीकरण एक ही सुबह में लगभग ₹5-6 लाख करोड़ बढ़ जाए.
मार्केट कैप-टू-GDP अनुपात 119 प्रतिशत से बढ़कर लगभग 135 प्रतिशत की ओर बढ़े.
ऐसा इसलिए नहीं कि नई कंपनियां बनाई गईं, बल्कि इसलिए कि लगभग दो लाख भारतीयों के स्वामित्व वाली एक मौजूदा कंपनी को आखिरकार अपना उचित टिकर सिंबल मिल गया.
और बीस BRLM कोई दूसरा काम ढूंढ़ लें.
दिवाली के दीपक बनाम सोमवार सुबह की घंटी
NSE का मुहूर्त ट्रेडिंग के दौरान सूचीबद्ध होना एक आकर्षक विचार है.
दिवाली का प्रतीकात्मक कारोबारी सत्र, शुभ शुरुआत और उत्सवी माहौल के बीच स्वयं पर कारोबार करता हुआ एक्सचेंज — यह एक अच्छी कहानी है.
लेकिन मुहूर्त ट्रेडिंग केवल एक प्रतीकात्मक घंटे के लिए होती है.
बाकी बाजार पूरे साल चलता है.
और आज से 8 नवंबर तक का हर दिन ऐसा दिन है जब 1.9 लाख शेयरधारक अपने NSE शेयरों का किसी नियमित एक्सचेंज पर कारोबार नहीं कर सकते.
वे एक्सचेंज-गारंटीड सेटलमेंट का लाभ नहीं ले सकते.
वे सूचीबद्ध कंपनी ढांचे द्वारा प्रदान की जाने वाली पूरी सुरक्षा का आनंद नहीं ले सकते.
देरी का हर दिन एक और वास्तविकता को भी लंबा करता है, ग्रे मार्केट का अस्तित्व.
एक ऐसा बाजार जो पूरी तरह अनियमित है.
पूरी तरह अपारदर्शी है.
जहां सेटलमेंट की कोई गारंटी नहीं है.
जहां कोई सर्किट ब्रेकर नहीं है.
और जहां निवेशक संरक्षण का कोई औपचारिक ढांचा नहीं है.
विडंबना यह है कि जिस संस्था का काम प्रतिभूतियों के लिए विनियमित और पारदर्शी बाजार उपलब्ध कराना है, वही अपनी तैयारियों के दौरान अपने शेयरों को एक अनियमित ग्रे मार्केट में कारोबार करने दे रही है.
यह विडंबना किसी की नजर से ओझल नहीं है.
कट्टरपंथी निष्कर्ष
NSE को इसी महीने एक प्री-लिस्टिंग डिस्क्लोजर मेमोरेंडम दाखिल करना चाहिए.
उसे ₹1,880 करोड़ का निपटान तुरंत कर देना चाहिए, पिछले वर्ष NSE ने ₹12,188 करोड़ का लाभ कमाया था. यह कोई वित्तीय कठिनाई नहीं, बल्कि एक गवर्नेंस संबंधी निर्णय है.
उसे अपने लाभकारी शेयरधारकों की सार्वजनिक घोषणा करनी चाहिए, विशेष रूप से उन निवेशकों की जो मॉरीशस और अन्य ऑफशोर संरचनाओं के माध्यम से हिस्सेदारी रखते हैं.
और फिर उसे सूचीबद्ध हो जाना चाहिए.
दिवाली पर नहीं.
दिसंबर में नहीं.
ऐसे रोडशो के बाद नहीं जो सिंगापुर, लंदन, न्यूयॉर्क और अबू धाबी का दौरा करे ताकि बीस बैंक उस संस्था का परिचय कराने के लिए फीस वसूल सकें जिसे वैश्विक वित्त जगत में किसी परिचय की आवश्यकता ही नहीं है.
इसी सप्ताह.
शेयर खुलेंगे.
कीमत तय होगी.
खरीदार और विक्रेता लेन-देन करेंगे.
भारत का बाजार पूंजीकरण बढ़ेगा.
और वह संस्था जो बाजार के नियम बनाती है, आखिरकार स्वयं भी उन्हीं नियमों का पालन करेगी, हर तिमाही, हर आय घोषणा और उस पूरे बाजार की निगरानी के तहत जिसे वह संचालित करती है.
NSE ने एक दशक तक भारत को यह बताया कि लंबित नियामकीय मामलों के कारण वह सूचीबद्ध होने के लिए तैयार नहीं है.
निपटान लगभग पूरा हो चुका है.
NOC जारी हो चुकी है.
शेयरधारक पहले से ही कारोबार कर रहे हैं.
अब केवल एक ही काम बाकी है, लिस्ट होना.
ड्रामा खत्म कीजिए.
बुक खोलिए.
घंटी बजाइए.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
नागपुर में एनडीए सरकार के 12 वर्ष पूरे होने के अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम में गडकरी ने बताया कि उन्होंने 100 फीसदी एथेनॉल के उपयोग को कानूनी मंजूरी देने वाली फाइल पर हस्ताक्षर कर दिए हैं.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत में वैकल्पिक ईंधन को बढ़ावा देने की दिशा में केंद्र सरकार ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है. केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने 100 प्रतिशत एथेनॉल फ्यूल के उपयोग को कानूनी मान्यता देने वाले नियमों को मंजूरी दे दी है. सरकार का मानना है कि यह फैसला न केवल पेट्रोलियम आयात पर देश की निर्भरता कम करेगा, बल्कि स्वच्छ ऊर्जा, किसानों की आय और आत्मनिर्भर ईंधन अर्थव्यवस्था को भी बढ़ावा देगा.
100% एथेनॉल के उपयोग को मिली कानूनी मान्यता
नागपुर में एनडीए सरकार के 12 वर्ष पूरे होने के अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम में गडकरी ने बताया कि उन्होंने 100 फीसदी एथेनॉल के उपयोग को कानूनी मंजूरी देने वाली फाइल पर हस्ताक्षर कर दिए हैं. इसके साथ ही भारत में एथेनॉल को एक वैध और व्यापक परिवहन ईंधन के रूप में अपनाने का रास्ता साफ हो गया है. गडकरी ने कहा कि एथेनॉल पेट्रोल का एक व्यवहारिक विकल्प बन सकता है और इससे देश के भारी-भरकम ईंधन आयात बिल को कम करने में मदद मिलेगी.
₹22 लाख करोड़ के आयात बिल को कम करने पर फोकस
भारत वर्तमान में कच्चे तेल और अन्य पेट्रोलियम उत्पादों के आयात पर सालाना करीब 22 लाख करोड़ रुपये खर्च करता है. सरकार का लक्ष्य घरेलू स्तर पर उत्पादित एथेनॉल जैसे वैकल्पिक ईंधनों के इस्तेमाल को बढ़ाकर इस खर्च को कम करना है. गडकरी लंबे समय से एथेनॉल आधारित अर्थव्यवस्था के समर्थक रहे हैं. उन्होंने कहा कि जब उन्होंने पहली बार इस विचार को आगे बढ़ाया था, तब कई लोगों ने इसका मजाक उड़ाया था, लेकिन अब यह सपना हकीकत का रूप ले रहा है.
फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों को मिल रही रफ्तार
सरकार के इस कदम के साथ देश में फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों का विस्तार भी तेज होने की उम्मीद है. हाल ही में गडकरी और केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने मारुति सुजुकी की एथेनॉल-संगत वैगनआर लॉन्च की थी. यह वाहन E20 से लेकर E100 तक एथेनॉल-पेट्रोल मिश्रण पर चलने में सक्षम है, फिलहाल इसे E85 ईंधन के उपयोग की मंजूरी प्राप्त है.
हीरो, टोयोटा और हुंडई समेत कई कंपनियां तैयार
गडकरी ने बताया कि हीरो मोटोकोर्प पहले ही स्प्लेंडर प्लस और HF डीलक्स के फ्लेक्स-फ्यूल संस्करण बाजार में उतार चुकी है. इन मोटरसाइकिलों में E85-संगत इंजन लगाए गए हैं. उन्होंने यह भी कहा कि टोयोटा, सुजुकी, एमजी मोटर और हुंडई जैसी कंपनियां अगले डेढ़ महीने के भीतर 100 प्रतिशत एथेनॉल पर चलने वाले वाहन लॉन्च करने की तैयारी कर रही हैं.
ग्रीन हाइड्रोजन पर भी सरकार का जोर
एथेनॉल के साथ-साथ सरकार ग्रीन हाइड्रोजन को भी भविष्य के ईंधन के रूप में बढ़ावा दे रही है. गडकरी ने बताया कि नागपुर में जल्द ही एक पायलट परियोजना शुरू की जाएगी, जिसमें हाइड्रोजन रीफ्यूलिंग स्टेशन और दो हाइड्रोजन से चलने वाली बसें शामिल होंगी. ये बसें पानी से तैयार किए गए ग्रीन हाइड्रोजन पर चलेंगी और आम लोगों के लिए उपलब्ध होंगी. गडकरी ने कहा कि हाइड्रोजन आधारित सार्वजनिक परिवहन का दौर अब दूर नहीं है.
नीतिगत बदलाव से मिलेगा बड़ा समर्थन
सरकार ने हाल ही में 22 से 30 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण वाले पेट्रोल को केंद्रीय उत्पाद शुल्क से छूट देने का फैसला किया है. इससे इन मिश्रणों को E20 ईंधन के समान दर्जा मिल गया है. इसके अलावा केंद्रीय मोटर वाहन नियमों में संशोधन का प्रस्ताव भी तैयार किया गया है, जिसके तहत E85 और 100 प्रतिशत एथेनॉल ईंधन को औपचारिक मान्यता दी जाएगी. विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव भारत में वैकल्पिक और स्वदेशी ईंधनों के बड़े पैमाने पर उपयोग का मार्ग प्रशस्त करेगा.
ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में अहम कदम
100 प्रतिशत एथेनॉल फ्यूल को कानूनी मंजूरी मिलना भारत की ऊर्जा नीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव माना जा रहा है. इससे आयातित ईंधन पर निर्भरता कम होने, किसानों के लिए नए अवसर पैदा होने, पर्यावरणीय लाभ मिलने और देश को ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है. आने वाले महीनों में फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों और एथेनॉल आधारित इंफ्रास्ट्रक्चर के विस्तार पर सभी की नजर रहेगी.
शांति की उम्मीदों का सबसे बड़ा असर एशियाई बाजारों में देखने को मिला. अमेरिकी बाजारों में S&P 500 फ्यूचर्स 0.9 प्रतिशत और नैस्डैक फ्यूचर्स 1.5 प्रतिशत तक मजबूत हुए.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पश्चिम एशिया में जारी तनाव खत्म होने की उम्मीद ने वैश्विक बाजारों का माहौल बदल दिया है. अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते की खबरों से कच्चे तेल की कीमतों में 4 प्रतिशत से अधिक की गिरावट आई है, जबकि एशियाई शेयर बाजारों में जोरदार तेजी दर्ज की गई. तेल में नरमी से महंगाई और ब्याज दरों पर दबाव घटने की उम्मीद बढ़ी है. इसी बीच विशेषज्ञों के अनुसार, भारतीय शेयर बाजार में भी सकारात्मक शुरुआत के संकेत हैं, जहां वेदांता, एथर एनर्जी, JSW Energy, ONGC, HPCL और Dr Reddy's समेत कई शेयर कंपनी-विशेष खबरों के चलते निवेशकों के फोकस में रहेंगे.
आज इन शेयरों पर रहेगी निवेशकों की नजर
सोमवार 15 जून के कारोबारी सत्र में कई प्रमुख शेयर निवेशकों के रडार पर रहेंगे, क्योंकि इन कंपनियों से जुड़ी महत्वपूर्ण घोषणाएं सामने आई हैं. वेदांता की डीमर्जर के बाद बनी चार नई कंपनियों की शेयर बाजार में लिस्टिंग, एथर एनर्जी और KIMS की फंड जुटाने की योजनाएं, JSW Energy की नई जलविद्युत परियोजना की शुरुआत, NLC India को खनन ब्लॉक मिलने और Power Grid को नया ट्रांसमिशन प्रोजेक्ट हासिल होने जैसी खबरें बाजार का ध्यान आकर्षित करेंगी. वहीं Aurobindo Pharma को US FDA से नियामकीय चुनौती, ONGC की सहयोगी कंपनी OPaL के फंड जुटाने की मंजूरी, HPCL द्वारा 19.25 रुपये प्रति शेयर के अंतिम डिविडेंड की रिकॉर्ड डेट तय करना, Meesho का 202 करोड़ रुपये का अधिग्रहण सौदा, SEPC को SAIL से बड़ा ऑर्डर, Ipca Laboratories का वैश्विक लाइसेंसिंग समझौता और Dr Reddy's द्वारा अमेरिका में नई कैंसर दवा लॉन्च करने की घोषणा भी इन शेयरों में गतिविधि बढ़ा सकती है. इन सभी घटनाक्रमों के चलते बाजार खुलते ही संबंधित स्टॉक्स में निवेशकों की ओर से मजबूत प्रतिक्रिया देखने को मिल सकती है.
युद्धविराम की दिशा में बड़ा कदम
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिका और ईरान युद्ध रोकने तथा रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज स्ट्रेट को दोबारा खोलने पर सहमत हो गए हैं. यह जलमार्ग वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए बेहद अहम माना जाता है. समझौते की संभावना से निवेशकों का भरोसा बढ़ा है और वैश्विक बाजारों में जोखिम लेने की धारणा मजबूत हुई है.
एशियाई बाजारों में जबरदस्त तेजी
शांति की उम्मीदों का सबसे बड़ा असर एशियाई बाजारों में देखने को मिला. जापान का निक्केई इंडेक्स कारोबार के दौरान 4 प्रतिशत से अधिक उछल गया, जबकि दक्षिण कोरिया का कॉस्पी इंडेक्स 4.3 प्रतिशत तक चढ़ गया. जापान जैसे तेल आयातक देशों को कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट से सीधा फायदा मिलने की उम्मीद है.
अमेरिका और यूरोप के बाजारों में भी सकारात्मक संकेत
यूरोपीय बाजारों के फ्यूचर्स में भी मजबूती देखी गई. EURO STOXX 50 और DAX फ्यूचर्स में 0.2 प्रतिशत तथा FTSE फ्यूचर्स में 0.3 प्रतिशत की बढ़त दर्ज हुई. वहीं अमेरिकी बाजारों में S&P 500 फ्यूचर्स 0.9 प्रतिशत और नैस्डैक फ्यूचर्स 1.5 प्रतिशत तक मजबूत हुए.
ब्याज दरों को लेकर बढ़ीं उम्मीदें
विशेषज्ञों का मानना है कि तेल की कीमतों में गिरावट से वैश्विक महंगाई पर दबाव कम होगा, जिससे केंद्रीय बैंकों को ब्याज दरों में नरमी बरतने का अवसर मिल सकता है. इस सप्ताह अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, ऑस्ट्रेलिया, स्विट्जरलैंड, स्वीडन, नॉर्वे और रूस के केंद्रीय बैंक अपनी मौद्रिक नीति बैठकों का आयोजन करने वाले हैं.
बाजार को उम्मीद है कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व अपनी आगामी बैठक में ब्याज दरों को 3.50 से 3.75 प्रतिशत के दायरे में बरकरार रख सकता है. नए चेयरमैन केविन वॉर्श की अगुवाई में यह फेड की पहली बैठक होगी.
कच्चे तेल में भारी गिरावट
पश्चिम एशिया में शांति की संभावना और होर्मुज स्ट्रेट के दोबारा खुलने की उम्मीद से कच्चे तेल की कीमतों में तेज गिरावट आई है. वैश्विक बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड 4.29 प्रतिशत टूटकर 83.64 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया, जबकि अमेरिकी बेंचमार्क WTI क्रूड 4.92 प्रतिशत गिरकर 80.70 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा है.
होर्मुज स्ट्रेट क्यों है इतना महत्वपूर्ण?
बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि दुनिया की करीब 20 प्रतिशत कच्चे तेल की आपूर्ति होर्मुज स्ट्रेट के रास्ते होती है. 28 फरवरी को संघर्ष शुरू होने के बाद से एक अरब बैरल से अधिक तेल आपूर्ति प्रभावित हुई थी. ऐसे में इस समुद्री मार्ग के फिर से खुलने की संभावना वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए राहत भरी खबर मानी जा रही है. अमेरिका-ईरान समझौते की दिशा में बढ़ते कदमों ने फिलहाल वैश्विक बाजारों की चिंता कम कर दी है. तेल की कीमतों में गिरावट, महंगाई में संभावित नरमी और ब्याज दरों को लेकर सकारात्मक उम्मीदों के बीच आने वाले दिनों में शेयर बाजारों का रुख मजबूत बना रह सकता है. भारतीय बाजार में भी ऊर्जा, एविएशन, पेंट, केमिकल और उपभोक्ता क्षेत्र की कंपनियों को सस्ते कच्चे तेल का लाभ मिल सकता है, जबकि ऊपर बताए गए स्टॉक-विशिष्ट ट्रिगर्स कई शेयरों में अतिरिक्त तेजी का कारण बन सकते हैं.
रिलायंस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सही कहा कि किसी नियम का उल्लंघन करना और धोखाधड़ी करना एक ही बात नहीं है. लेकिन सबसे गंभीर मामलों में सबूत के स्तर को ऊंचा उठाते हुए अदालत एक ऐसे सवाल को अनुत्तरित छोड़ गई, जिसका जवाब उसने नहीं दिया: ऐसे बाजार में, जहां गलत काम गुमनाम, इलेक्ट्रॉनिक और बिना किसी स्पष्ट पीड़ित के होता है, एक नागरिक नियामक धोखाधड़ी को साबित कैसे करे?
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
किसी इतने सावधानीपूर्वक तर्कसंगत फैसले पर सवाल उठाना दुर्लभ है, और ऐसा होना भी चाहिए. आगे जो कहा जा रहा है, वह उसी भावना में है, यह शिकायत नहीं, बल्कि एक तर्क है.
न्यायमूर्ति पारदीवाला का यह विश्लेषण कि पोजिशन-लिमिट का उल्लंघन अपने आप में धोखाधड़ी नहीं बन जाता, पूरे सम्मान के साथ कहा जाए तो लगभग निश्चित रूप से सही है और काफी समय से अपेक्षित भी था. वर्षों तक सेबी ने किसी सर्कुलर के उल्लंघन और बाजार को धोखा देने के बीच की रेखा को धुंधला कर दिया था, और अदालत ने उसे फिर से स्पष्ट किया. लेकिन किसी फैसले का महत्व केवल उस मामले से नहीं मापा जाता जिसे वह सुलझाता है, बल्कि उन मामलों से मापा जाता है जिन्हें भविष्य में वह नियंत्रित करेगा. और इसी कसौटी पर देखें तो रिलायंस के लिए जीत माने जा रहे इस फैसले के भीतर अदालत ने सेबी के प्रवर्तन बोझ के साथ कुछ ऐसा किया है, जिसे लगभग कोई पढ़ ही नहीं रहा.
यह बात फैसले के पैराग्राफ 178 से 180 में छिपी है और आसानी से नजरअंदाज हो सकती है क्योंकि इसे निरंतरता की भाषा में प्रस्तुत किया गया है. सेबी की पूरी संरचना एक मूल सिद्धांत पर आधारित है: वह एक नागरिक नियामक है, अभियोजक नहीं. इसलिए वह गलत आचरण को ‘संभावनाओं के संतुलन’ के आधार पर साबित करती है, न कि ‘संदेह से परे’ के मानक पर. यह केवल सेबी की विशेषता नहीं है. पूरी दुनिया में श्वेतपोश अपराधों के प्रवर्तन की यही सार्वभौमिक तर्क प्रणाली है, क्योंकि बाजार में होने वाली धोखाधड़ी शायद ही कभी कोई स्वीकारोक्ति छोड़ती है और लगभग कभी भी ऐसा प्रत्यक्ष सबूत नहीं देती जिसे निर्णायक माना जा सके. नागरिक मानक इसलिए अस्तित्व में है ताकि नियामक उन चतुर अपराधियों तक पहुंच सके, जिनकी दोषसिद्धि लगभग पूर्ण निश्चितता के साथ कभी साबित नहीं की जा सकती.
अदालत ने इस मानक को औपचारिक रूप से बरकरार रखा. उसने स्पष्ट कहा कि परीक्षण नागरिक ही रहेगा, ‘संभावनाओं के संतुलन’ का ही रहेगा और परिणाम दंडात्मक होने के बावजूद ‘संदेह से परे’ सबूत की आवश्यकता नहीं होगी. लेकिन अदालत ने जो किया वह कहीं अधिक सूक्ष्म है, और यही हिस्सा सेबी के कामकाज को बदल देगा. Bater v. Bater और इसी अदालत के Alupro फैसले का हवाला देते हुए पीठ ने कहा कि नागरिक मानक के भीतर भी “विभिन्न स्तर” होते हैं और जहां प्रेरित करना अनुपस्थित हो लेकिन धोखाधड़ी की आशंका हो, वहां सेबी को “संभावनाओं के संतुलन का उच्चतर स्तर” संतुष्ट करना होगा.
मानक आपराधिक स्तर तक नहीं पहुंचा है. लेकिन उसे नागरिक मानक के ऊपरी छोर की ओर काफी आगे बढ़ा दिया गया है और सबसे अधिक उन्हीं मामलों में, जो सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हैं.
जरा सोचिए कि इसका क्या अर्थ है. ‘संभावनाओं का संतुलन’ मूल रूप से नियामक की सहायता के लिए बनाया गया था, ताकि वह इस आधार पर कार्रवाई कर सके कि एक समझदार व्यक्ति किस निष्कर्ष को अधिक संभावित मानेगा. यदि उससे अधिक की मांग की जाए, तो हर चालाक धोखेबाज बच निकल सकता है.
अब अदालत ने यह व्यवस्था बना दी है कि जैसे-जैसे कथित धोखाधड़ी की गंभीरता बढ़ेगी, सबूत का बोझ भी बढ़ेगा. आरोप जितना गंभीर होगा, सबूत को उतना ही अधिक निश्चितता के करीब होना पड़ेगा. सबसे गंभीर धोखाधड़ी के मामलों में सबसे कठोर प्रमाण की आवश्यकता होगी. दूसरे शब्दों में, जो धोखाधड़ी सबसे अधिक महत्वपूर्ण हैं, उन्हें साबित करना अब सबसे कठिन हो गया है. यही इस फैसले का केंद्रीय इंजन है, और इसके बारे में मेरी बाकी चिंताएं इसी एक बदलाव से निकलती हैं.
फैसले के पैराग्राफ 220 के ढांचे पर विचार कीजिए, जिसे इस निर्णय का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बताया जा रहा है.
अदालत कहती है कि जहां नुकसान साबित हो जाए, वहां अलग से इरादे को साबित करने की जरूरत नहीं है. लेकिन जहां नुकसान साबित नहीं किया जा सकता, वहां धोखाधड़ीपूर्ण इरादे के अधिक मजबूत सबूत आवश्यक होंगे. कागज पर यह तर्क सुंदर लगता है. लेकिन जब इसे उसी बाजार में लागू किया जाए जिसका वर्णन अदालत कर रही थी, स्क्रीन-आधारित, गुमनाम और नकद-निपटान वाला, तो समस्या तुरंत सामने आ जाती है.
ऐसे बाजार में नुकसान को किसी एक प्रतिपक्ष से जोड़ पाना लगभग असंभव होता है, क्योंकि किसी को नहीं पता कि स्क्रीन के दूसरी तरफ कौन था. इसका अर्थ है कि अधिकांश हेरफेर मामलों में नियामक को दूसरे विकल्प पर निर्भर होना पड़ेगा: उसे इरादे के अधिक मजबूत सबूत प्रस्तुत करने होंगे, और वह भी अदालत द्वारा निर्धारित नए, अधिक कठोर मानक के तहत. जबकि संबंधित व्यक्ति का इरादा उसके अपने दिमाग के अलावा कहीं और मौजूद ही नहीं होता.
अदालत का जवाब संभवतः यह होगा और यह एक उचित उत्तर है, कि वह किसी व्यक्ति को धोखेबाज घोषित करने से पहले केवल बेहतर सबूत की मांग कर रही है. यह एक सम्मानजनक दृष्टिकोण है. लेकिन यह व्यावहारिक सवाल को अनुत्तरित छोड़ देता है. और सिद्धांत नहीं, बल्कि यही व्यावहारिक सवाल है, जहां यह फैसला सबसे अधिक चुनौतीपूर्ण दिखाई देता है.
यह बदलाव चुपचाप परिष्कृत और संसाधन-संपन्न खिलाड़ियों के पक्ष में भी जाता है. अदालत ने प्रमोटरों को कोई प्रतिरक्षा नहीं दी, और ऐसा कहना गलत होगा. शेयर बाजार को दशकों तक कवर करने के अनुभव से मैं जानता हूं कि अधिकांश पारंपरिक हेरफेर मामलों में प्रमोटर अपनी ही कंपनियों के शेयरों के साथ खेलते पाए जाते हैं. पीठ ने केवल रिलायंस मामले में सेबी के विशिष्ट आर्थिक सिद्धांत को खारिज किया, पूरी श्रेणी को नहीं.
लेकिन फैसले के प्रभाव को देखें. एक परिष्कृत और अच्छी सलाह से लैस ऑपरेटर जानबूझकर अपने पीछे केवल परिस्थितिजन्य सबूत छोड़ता है, न कोई स्पष्ट पीड़ित, न लिखित इरादा, केवल ट्रेड्स का पैटर्न. और जब परिस्थितिजन्य साक्ष्य के आधार पर दोष सिद्ध करने के लिए आवश्यक सबूत का स्तर बढ़ा दिया जाता है, तो अनजाने में सबसे सक्षम गलतकर्ताओं के खिलाफ कार्रवाई करना, कम चतुर अपराधियों की तुलना में कहीं अधिक कठिन हो जाता है. यह अदालत द्वारा परिष्कृत लोगों को पुरस्कृत करना नहीं है; बल्कि परीक्षण की संरचना अपने आप ऐसा परिणाम पैदा करती है.
यहीं वह सवाल सामने आता है जिसे फैसला उठाता तो है, लेकिन उसका जवाब नहीं देता. आधुनिक बाजार हेरफेर अब मुख्य रूप से एल्गोरिदमिक, अप्रत्यक्ष और गुमनाम है. यह परतदार आदेशों, जुड़े हुए खातों और ऐसे समय निर्धारण के जरिए होता है जिसे कोई मानव आंख पकड़ नहीं सकती. यह ऐसे बाजार में होता है जिसे इस तरह बनाया गया है कि कोई भी प्रतिभागी दूसरे की पहचान न जान सके.
अदालत ने सेबी से कहा है कि अब वह केवल बाजार शक्ति के आधार पर धोखाधड़ी का अनुमान नहीं लगा सकती. उसे प्रेरित करने, नुकसान या इरादे को दिखाना होगा. और सबसे गंभीर मामलों में इन्हें उच्चतर प्रमाण स्तर पर साबित करना होगा.
इनमें से हर मांग अपने आप में उचित लगती है. लेकिन जब इन्हें एक साथ रखकर स्क्रीन-आधारित बाजार पर लागू किया जाता है, तो यह ऐसा बोझ बन जाता है जिसके निर्वहन का तरीका फैसला कहीं नहीं बताता. एक नागरिक नियामक ऐसे बाजार में, जिसे व्यापार करने वालों के हर निशान को मिटाने के लिए डिजाइन किया गया हो, बढ़े हुए मानक पर धोखाधड़ीपूर्ण इरादे को कैसे साबित करे? अदालत इसका उत्तर नहीं देती. उसने मानक तो ऊंचा कर दिया, लेकिन यह नहीं बताया कि सेबी उसके लिए आधार कहां खोजे.
इसका अर्थ यह नहीं कि अदालत का अंतिम निष्कर्ष गलत था. रिलायंस के खिलाफ धोखाधड़ी का निष्कर्ष उस रिकॉर्ड पर टिक नहीं सकता था जो सेबी ने तैयार किया था, और उसके ढहने के लिए नियामक की अपनी अति-जागरूकता ही जिम्मेदार थी. लेकिन किसी ऐतिहासिक फैसले का मूल्यांकन समय के साथ होता है. यह फैसला एक कठिन संस्थागत प्रश्न छोड़ जाता है, जिसे इसके लेखक ने खुला छोड़ दिया है: उन गुमनाम इलेक्ट्रॉनिक बाजारों में, जहां आज वास्तव में धोखाधड़ी होती है, अदालत ने नियामक को यह तो बता दिया कि उसे क्या साबित करना है और किस स्तर तक साबित करना है, लेकिन यह नहीं बताया कि वह ऐसा कैसे करे.
सुप्रीम कोर्ट के रिलायंस फैसले का पहला हिस्सा सुर्खियों में रहा. दूसरा हिस्सा उसकी चुप्पी वह चीज है जिसके साथ सेबी को आने वाले वर्षों तक जीना होगा. जैसा कि एक वरिष्ठ वकील ने मुझसे कहा: "यही चुप्पी वह दरार है, जहां अगले दशक के मुकदमेबाज अपनी खुदाई करेंगे."
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने कहा कि पिछले 20 वर्षों में दोनों देशों के बीच वस्तुओं और सेवाओं का द्विपक्षीय व्यापार 20 अरब डॉलर से बढ़कर 220 अरब डॉलर से अधिक हो गया है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से प्रस्तावित अंतरिम व्यापार समझौता अब अंतिम चरण में पहुंच गया है. भारत में अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर ने कहा है कि दोनों देशों के बीच 99 प्रतिशत मुद्दों पर सहमति बन चुकी है और केवल कुछ अंतिम बिंदुओं पर बातचीत जारी है. उन्होंने उम्मीद जताई कि आने वाले कुछ हफ्तों या महीनों में इस समझौते पर हस्ताक्षर हो सकते हैं, जिससे दोनों देशों के आर्थिक संबंधों को नई मजबूती मिलेगी.
अंतिम दौर में पहुंची व्यापार वार्ता
दिल्ली स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान सर्जियो गोर ने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित अंतरिम व्यापार समझौता लगभग तैयार है. उन्होंने बताया कि समझौते के केवल अंतिम एक प्रतिशत हिस्से पर सहमति बननी बाकी है.
गोर के अनुसार, हाल ही में भारत ने लंबित मुद्दों को सुलझाने के लिए एक उच्चस्तरीय टीम वाशिंगटन डीसी भेजी थी. वहीं अगले सप्ताह अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल भी आगे की बातचीत के लिए भारत आएगा. उन्होंने विश्वास जताया कि दोनों पक्ष जल्द ही समझौते को अंतिम रूप देने में सफल होंगे.
दो दशकों में 11 गुना बढ़ा द्विपक्षीय व्यापार
अमेरिकी राजदूत ने भारत-अमेरिका आर्थिक संबंधों की मजबूती पर जोर देते हुए कहा कि पिछले 20 वर्षों में दोनों देशों के बीच वस्तुओं और सेवाओं का द्विपक्षीय व्यापार 20 अरब डॉलर से बढ़कर 220 अरब डॉलर से अधिक हो गया है. उन्होंने कहा कि अमेरिका आज भारत के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों में शामिल है, जबकि भारत भी अमेरिका के प्रमुख ट्रेडिंग पार्टनर्स में तेजी से उभर रहा है. यह बढ़ता व्यापार दोनों देशों की आर्थिक साझेदारी की गहराई को दर्शाता है.
फरवरी में तय हुआ था समझौते का ढांचा
भारत और अमेरिका ने फरवरी 2026 में अंतरिम व्यापार समझौते के फ्रेमवर्क पर सहमति बनने को लेकर एक संयुक्त बयान जारी किया था. इसके बाद से दोनों देशों के अधिकारी विभिन्न तकनीकी और व्यापारिक मुद्दों पर लगातार बातचीत कर रहे हैं. अब बातचीत अंतिम चरण में पहुंच चुकी है और दोनों पक्ष जल्द समझौते पर हस्ताक्षर करने की दिशा में काम कर रहे हैं.
AI, टेक्नोलॉजी और निवेश में बढ़ेंगे अवसर
सर्जियो गोर ने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), उन्नत प्रौद्योगिकी, निवेश, फार्मास्यूटिकल्स, अनुसंधान और नवाचार जैसे क्षेत्रों में भारत और अमेरिका के बीच सहयोग की अपार संभावनाएं हैं. उनके मुताबिक, दोनों देशों के पास तकनीकी क्षमता, प्रतिभा और बाजार का ऐसा संयोजन है जो वैश्विक स्तर पर नई आर्थिक और तकनीकी संभावनाओं को जन्म दे सकता है.
हाई-टेक और क्रिटिकल मिनरल्स में साझेदारी पर जोर
गोर ने कहा कि उभरती तकनीकों और महत्वपूर्ण खनिजों (Critical Minerals) के क्षेत्र में भारत और अमेरिका की साझेदारी वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है. उन्होंने कहा कि दुनिया तेजी से तकनीकी बदलाव के दौर से गुजर रही है और यह बदलाव वैश्विक शक्ति संतुलन को भी प्रभावित कर रहा है.
उनका मानना है कि इन अवसरों का लाभ उठाने के लिए भारत और अमेरिका से बेहतर साझेदार कोई नहीं हो सकता.
21वीं सदी की निर्णायक रणनीतिक साझेदारी की ओर
अमेरिकी राजदूत ने कहा कि दोनों देशों को अपने संबंधों को केवल व्यापार तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि इसे 21वीं सदी की सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदारियों में बदलना चाहिए. उन्होंने कहा कि भारत और अमेरिका की संयुक्त ताकतें तकनीकी नवाचार, आर्थिक विकास और वैश्विक चुनौतियों के समाधान में अहम भूमिका निभा सकती हैं. साथ ही यह साझेदारी दोनों देशों के नागरिकों को प्रत्यक्ष लाभ पहुंचाने वाली साबित हो सकती है.
व्यापार समझौते से क्या होगा फायदा?
विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरिम व्यापार समझौते के लागू होने से दोनों देशों के बीच व्यापारिक बाधाएं कम होंगी, निवेश को बढ़ावा मिलेगा और कई क्षेत्रों में बाजार पहुंच आसान होगी. इससे भारतीय निर्यातकों और अमेरिकी कंपनियों दोनों को लाभ मिल सकता है. यदि समझौता तय समय पर संपन्न हो जाता है, तो यह भारत-अमेरिका आर्थिक संबंधों में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हो सकता है.