कोविड के समय से जब वर्क फ्रॉम होम का कल्चर प्रारंभ हुआ, तब से इन कार्यों के घंटों में और बढ़ोतरी हो गई है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
नई दिल्लीः ऑफिस में काम करने वाले कर्मचारी अक्सर एक दिन में कहने को तो आठ से नौ घंटे का समय व्यतीत करते हैं, लेकिन यह हमेशा 10 से 12 घंटे का समय हो जाता है. कोविड के समय से जब वर्क फ्रॉम होम का कल्चर प्रारंभ हुआ, तब से इन कार्यों के घंटों में और बढ़ोतरी हो गई है. हालांकि अब कर्मचारी चाहते हैं कि काम के घंटों में कटौती हो क्योंकि वर्क लाइफ बैलेंस बनाने में कई तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है. हफ्ते में पांच दिन काम और दो दिन की छुट्टी भी लोगों को अपर्याप्त लगने लगी है.
लोगों से ली गई राय
वहीं एक ग्लोबल सर्वे में जब लोगों से इस बारे में राय ली गई तो वो चाहते है कि काम के घंटे कम हों और छुट्टी का दिन बढ़ाया जाए ताकि वो परिवार को भी वक्त दे पाएं. ए ग्लोबल वर्कफोर्स व्यू' द्वारा किए गए एक सर्वे में 17 देशों के लगभग 33 हजार कर्मचारियों से बात की गई, इस सर्वे में कई चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं.
होना चाहिए अधिक लचीलापन
कर्मचारी अपने कामकाजी जीवन में अधिक लचीलेपन की मांग कर रहे हैं और इसे पाने के लिए समझौता करने के लिए तैयार हैं. भारत में 76.07% कर्मचारी अपने काम के घंटों पर नियंत्रण रखना पसंद करेंगे और कहा कि वे दूरस्थ रूप से काम करने की लचीलेपन की गारंटी के लिए वेतन में कटौती करेंगे.
एडीपी रिसर्च इंस्टीट्यूट के 'पीपल एट वर्क 2022: ए ग्लोबल वर्कफोर्स व्यू' के एक सर्वे 17 देशों में लगभग 33,000 श्रमिकों का सर्वेक्षण किया और खुलासा किया कि 10 में से सात से अधिक (71%) अपने काम के समय की संरचना में अधिक लचीलेपन की मांग कर रहे हैं, जिसमें कंप्रेसिंग भी शामिल है.
वर्क फ्रॉम होम को मिली प्रॉयोरिटी
घर से काम करने वाले भी तेजी से अपने नियोक्ताओं के साथ करियर की प्रगति के बारे में अधिक बातचीत कर रहे हैं. 10 में से लगभग सात कर्मचारी (73%) महसूस करते हैं कि घर से काम करने के दौरान भी उन पर ध्यान दिया जा रहा है और 74% ने यह भी बताया है कि नियोक्ता अपस्किलिंग और प्रशिक्षण आवश्यकताओं के बारे में बातचीत करने के लिए तैयार हैं. जब काम पर मानसिक स्वास्थ्य की बात आती है, तो 56% कर्मचारियों का कहना है कि वे घर से काम करते हुए भी अपने प्रबंधकों द्वारा समर्थित महसूस करते हैं.
राहुल गोयल, एमडी, दक्षिण पूर्व एशिया और भारत, एडीपी ने कहा, "वर्तमान में कर्मचारियों को काम पर संतुष्ट रखने के लिए परंपरागत नौ से पांच के लिए अभिनव वैकल्पिक विकल्पों की आवश्यकता है. कर्मचारियों के कार्य-जीवन पर अधिक लचीलेपन और नियंत्रण की पेशकश करना विचार करने योग्य है क्योंकि उन्होंने महामारी के दौरान अत्यधिक दबाव को सहन किया है और अपने निरंतर प्रदर्शन के माध्यम से महत्वपूर्ण संपत्ति साबित हुए हैं."
नियोक्ताओं को अपने प्रयासों को पुनर्संतुलित करने की आवश्यकता हो सकती है, ताकि जो लोग हर दिन काम पर यात्रा कर रहे हैं, वे उतना ही सराहना और पोषित महसूस करें, जितना कि उनके करियर की प्रगति, मानसिक स्वास्थ्य और अन्य मुद्दों पर उतना ही विचार किया जा रहा है, जितना कि उनके काम करने वालों में.
VIDEO: 2023 के लिए क्या है Byju's की रणनीति, किस पर रहेगा जोर?
गौतम अडानी के नेतृत्व वाला अडानी ग्रुप अब ऊर्जा और बुनियादी ढांचे के पारंपरिक कारोबार से आगे बढ़कर डिजिटल क्षेत्र में अपनी मौजूदगी मजबूत करने पर जोर दे रहा है. प्रस्तावित फंडिंग इसी रणनीति का हिस्सा है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और क्लाउड कंप्यूटिंग की बढ़ती मांग के बीच अडानी ग्रुप अपने डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर कारोबार का विस्तार करने की तैयारी में है. इसके लिए समूह करीब 1.5 अरब डॉलर (करीब 12,500 करोड़ रुपये) का विदेशी कर्ज जुटाने के लिए कई अंतरराष्ट्रीय बैंकों से बातचीत कर रहा है. कंपनी ने 2035 तक डेटा सेंटर और अन्य डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर में 100 अरब डॉलर निवेश करने का लक्ष्य रखा है.
गौतम अडानी के नेतृत्व वाला अडानी ग्रुप अब ऊर्जा और बुनियादी ढांचे के पारंपरिक कारोबार से आगे बढ़कर डिजिटल क्षेत्र में अपनी मौजूदगी मजबूत करने पर जोर दे रहा है. प्रस्तावित फंडिंग इसी रणनीति का हिस्सा है. मामले से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, यह कर्ज विदेशी बाजारों से जुटाया जाएगा. हालांकि, अभी इसकी ब्याज दर और अन्य शर्तों को अंतिम रूप नहीं दिया गया है.
इन वैश्विक बैंकों से चल रही है बातचीत
इस फंडिंग की जिम्मेदारी अडानी ग्रुप की संयुक्त उद्यम कंपनी अडानीकॉनेक्स प्राइवेट (AdaniConneX Pvt.) संभाल रही है. यह कंपनी डेटा सेंटर ऑपरेटर एजकॉनेक्स (EdgeConneX) के साथ मिलकर बनाई गई है.
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अडानीकॉनेक्स इस कर्ज के लिए डीबीएस ग्रुप होल्डिंग्स (DBS Group Holdings), फर्स्ट अबू धाबी बैंक (FAB) और मित्सुबिशी यूएफजे फाइनेंशियल ग्रुप (MUFG) समेत कई बड़े बैंकों के संपर्क में है.
इसके अलावा नैटिक्सिस (Natixis SA), आईएनजी बैंक (ING Bank NV) और सोसाइटी जनरले (Societe Generale SA) जैसे अंतरराष्ट्रीय कर्जदाताओं के साथ भी बातचीत की जा रही है. प्रस्तावित कर्ज की अवधि पांच से सात साल हो सकती है. हालांकि, अभी तक इसकी शर्तें तय नहीं हुई हैं.
पहले भी 800 मिलियन डॉलर का कर्ज जुटा चुकी है कंपनी
अडानीकॉनेक्स ने कुछ महीने पहले ही डेटा सेंटर कारोबार के लिए 800 मिलियन डॉलर का कर्ज हासिल किया था. यह कर्ज 18 महीने की अवधि के लिए लिया गया था. अब कंपनी 1.5 अरब डॉलर की नई फंडिंग जुटाने की कोशिश कर रही है, जिससे डेटा सेंटर कारोबार के विस्तार को गति मिल सके.
समूह ने 2035 तक डेटा सेंटर समेत डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में करीब 100 अरब डॉलर निवेश करने की योजना बनाई है. ऐसे में नई फंडिंग कंपनी की दीर्घकालिक विस्तार रणनीति का अहम हिस्सा मानी जा रही है.
रिलायंस भी AI इंफ्रास्ट्रक्चर में करेगी 110 अरब डॉलर का निवेश
भारत के डेटा सेंटर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इंफ्रास्ट्रक्चर बाजार में अडानी ग्रुप के सामने रिलायंस इंडस्ट्रीज भी बड़ी तैयारी कर रही है. मुकेश अंबानी के नेतृत्व वाली रिलायंस ने अगले सात साल में AI से जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर में 110 अरब डॉलर तक निवेश करने की योजना बनाई है.
AI और क्लाउड कंप्यूटिंग सेवाओं की बढ़ती मांग के कारण डेटा सेंटर की जरूरत तेजी से बढ़ रही है. इन तकनीकों को संचालित करने के लिए बड़े स्तर पर कंप्यूटिंग क्षमता, स्टोरेज और डिजिटल नेटवर्क की आवश्यकता होती है. यही वजह है कि देश के बड़े कारोबारी समूह इस क्षेत्र में निवेश बढ़ा रहे हैं.
2030 तक 8 गीगावाट हो सकती है भारत की डेटा सेंटर क्षमता
भारत में डेटा सेंटर बाजार तेजी से विस्तार कर रहा है. उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, अगस्त 2026 में देश की कुल डेटा सेंटर क्षमता करीब 1.57 गीगावाट थी. अनुमान है कि 2030 तक यह बढ़कर लगभग 8 गीगावाट हो सकती है.
इस क्षेत्र में अगले सात से आठ वर्षों के दौरान करीब 200 अरब डॉलर का निवेश आने की संभावना जताई जा रही है. AI, क्लाउड सेवाओं, डिजिटल भुगतान और ऑनलाइन कारोबार के विस्तार से डेटा स्टोरेज और प्रोसेसिंग की मांग बढ़ रही है. ऐसे में अडानी ग्रुप और रिलायंस जैसे बड़े कारोबारी समूहों का निवेश भारत के डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर बाजार के विस्तार में अहम भूमिका निभा सकता है.
डिज्नी पिछले कई वर्षों से लागत घटाने और कारोबार के पुनर्गठन की प्रक्रिया में जुटी है. इस दौरान कंपनी हजारों कर्मचारियों की छंटनी कर चुकी है और अरबों डॉलर के खर्च में कटौती की है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
दुनिया की दिग्गज एंटरटेनमेंट कंपनी वॉल्ट डिज्नी (Walt Disney) एक बार फिर बड़े पैमाने पर छंटनी की तैयारी कर रही है. कंपनी अपने कारोबार के कुछ हिस्सों में सालाना खर्च 20 फीसदी तक कम करना चाहती है. इसके लिए हजारों कर्मचारियों की नौकरियां जा सकती हैं. ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, कंपनी ने कुछ मैनेजरों को खर्च घटाने के संभावित उपायों की पहचान करने को कहा है. इसमें कर्मचारियों की संख्या कम करने के साथ-साथ परिचालन खर्च में कटौती भी शामिल हो सकती है.
रिपोर्ट के अनुसार, छंटनी का असर डिज्नी के सभी कारोबार पर एक जैसा नहीं होगा. कंपनी के थीम पार्क, टेलीविजन नेटवर्क और फिल्म स्टूडियो जैसे कारोबार पर इसका अपेक्षाकृत अधिक असर पड़ सकता है. हालांकि, कंपनी की ओर से छंटनी की अंतिम संख्या या इसकी समयसीमा को लेकर कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है.
कहां होगा बचाए गए पैसों का इस्तेमाल?
डिज्नी के नए मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) जोश डी'अमारो (Josh D'Amaro) लागत में कटौती से बचाई गई रकम का एक हिस्सा कंपनी के दूसरे कारोबार में दोबारा निवेश करना चाहते हैं. इसमें फिल्म और टेलीविजन कंटेंट, टेक्नोलॉजी, थीम पार्क और क्रूज शिप कारोबार शामिल हैं.
कंपनी का उद्देश्य परिचालन को अधिक प्रभावी बनाना और उन क्षेत्रों में निवेश बढ़ाना है, जहां भविष्य में कारोबार की संभावनाएं बेहतर हैं.
पहले भी हजारों कर्मचारियों की जा चुकी है नौकरी
डिज्नी पिछले कई वर्षों से लागत घटाने और कारोबार के पुनर्गठन की प्रक्रिया में जुटी है. इस दौरान कंपनी हजारों कर्मचारियों की छंटनी कर चुकी है और अरबों डॉलर के खर्च में कटौती की है.
पहले किए गए पुनर्गठन का असर ABC, Pixar, ESPN, फिल्म स्टूडियो और कंपनी के एक्सपीरियंस बिजनेस समेत कई डिवीजनों पर पड़ा था. कंपनी के पिछले वित्त वर्ष के अंत तक दुनियाभर में करीब 2.31 लाख कर्मचारी थे.
यह ताजा कदम ऐसे समय उठाया जा रहा है, जब डिज्नी ने चालू वित्त वर्ष में एडजस्टेड प्रति शेयर आय (Adjusted EPS) में दोहरे अंकों की वृद्धि का लक्ष्य रखा है. कंपनी इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए लागत पर नियंत्रण और कारोबार की दक्षता बढ़ाने पर जोर दे रही है.
टीवी कारोबार के पुनर्गठन की भी तैयारी
इससे पहले 1 अक्टूबर को वॉल स्ट्रीट जर्नल की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि डिज्नी अपने टेलीविजन डिवीजन का पुनर्गठन करने की योजना बना रही है. इसके साथ ही कंपनी की लीगल और ग्लोबल अफेयर्स यूनिट में भी कर्मचारियों की संख्या घटाई जा सकती है.
एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री में बढ़ रहा छंटनी का दबाव
डिज्नी का यह फैसला पूरी एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री में हो रहे बदलावों के बीच आया है. पारंपरिक टेलीविजन से होने वाली कमाई में गिरावट और स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म के सब्सक्राइबर बढ़ने की रफ्तार धीमी होने से कंपनियों पर दबाव बढ़ रहा है.
इसके अलावा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, ऑनलाइन वीडियो सर्विस और टेक्नोलॉजी कंपनियों के स्ट्रीमिंग कारोबार से प्रतिस्पर्धा भी तेज हो गई है. दर्शकों का ध्यान आकर्षित करने और कमाई के नए मॉडल विकसित करने की चुनौती के बीच कई कंपनियां अपने खर्च कम कर रही हैं.
नेटफ्लिक्स, सोनी पिक्चर्स एंटरटेनमेंट, स्काईडांस के स्वामित्व वाली पैरामाउंट और वार्नर ब्रदर्स जैसी कंपनियां भी कर्मचारियों की संख्या घटाने के कदम उठा चुकी हैं. ऐसे में डिज्नी की नई लागत कटौती योजना को एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री में जारी व्यापक बदलावों के हिस्से के रूप में देखा जा रहा है.
कंपनी ने बताया कि विस्तार के तहत आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), क्लाउड कंप्यूटिंग और डेटा के क्षेत्र में विशेष क्षमताएं विकसित की जाएंगी. इसके अलावा हेल्थकेयर और लाइफ साइंसेज, हाईटेक, ऑटोमोटिव और मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों पर भी ध्यान दिया जाएगा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
वैश्विक टेक्नोलॉजी सर्विसेज कंपनी NTT DATA कर्नाटक के मंगलुरु में अपने कारोबार का विस्तार करने की तैयारी कर रही है. कंपनी की योजना 2027 के अंत तक यहां कर्मचारियों की संख्या बढ़ाकर 2,500 से अधिक करने की है. फिलहाल मंगलुरु में कंपनी के करीब 900 कर्मचारी काम कर रहे हैं. इस विस्तार के जरिए कंपनी बेंगलुरु से आगे कर्नाटक के अन्य शहरों में भी अपनी मौजूदगी मजबूत करना चाहती है.
कंपनी ने बताया कि विस्तार के तहत आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), क्लाउड कंप्यूटिंग और डेटा के क्षेत्र में विशेष क्षमताएं विकसित की जाएंगी. इसके अलावा हेल्थकेयर और लाइफ साइंसेज, हाईटेक, ऑटोमोटिव और मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों पर भी ध्यान दिया जाएगा.
यह घोषणा कंपनी के वैश्विक नेतृत्व और कर्नाटक के आईटी एवं बायोटेक्नोलॉजी मंत्री प्रियांक खड़गे के बीच बेंगलुरु में हुई बैठक के बाद की गई.
Niveus Solutions के अधिग्रहण से मंगलुरु में हुई एंट्री
NTT DATA ने Niveus Solutions का अधिग्रहण करने के बाद मंगलुरु में अपना कारोबार शुरू किया था. अब कंपनी इस तटीय शहर को बेंगलुरु के साथ टेक्नोलॉजी और डिजिटल टैलेंट के एक प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित करना चाहती है.
प्रस्तावित विस्तार से ऐसे पेशेवरों की मांग बढ़ने की उम्मीद है, जिनके पास AI और डेटा से जुड़ी विशेषज्ञता के साथ-साथ अलग-अलग उद्योगों की जरूरतों के मुताबिक तकनीकी जानकारी हो.
बेंगलुरु से बाहर भी टेक्नोलॉजी हब विकसित करने की तैयारी
कर्नाटक सरकार बेंगलुरु के अलावा राज्य के दूसरे शहरों में भी टेक्नोलॉजी हब विकसित करने की दिशा में काम कर रही है. इसके लिए सरकार दूसरे क्षेत्रों में उपलब्ध प्रतिभाओं और शैक्षणिक संस्थानों की क्षमता का इस्तेमाल करना चाहती है.
कर्नाटक के आईटी एवं बायोटेक्नोलॉजी मंत्री प्रियांक खड़गे ने कहा, "कर्नाटक के विकास का अगला अध्याय बेंगलुरु से आगे लिखा जा रहा है और मंगलुरु इस कहानी का नेतृत्व कर रहा है."
बैठक के दौरान कंपनी और राज्य सरकार के अधिकारियों के बीच प्रतिभा विकास, बुनियादी ढांचे, निवेश को बढ़ावा देने और स्टार्टअप एवं शैक्षणिक संस्थानों के साथ सहयोग जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई.
AI और डेटा में स्किल डेवलपमेंट पर जोर
प्रतिभा विकास को लेकर राज्य सरकार ने उद्योगों की जरूरतों के अनुरूप कौशल विकास कार्यक्रम शुरू करने का प्रस्ताव रखा. इन कार्यक्रमों में AI और डेटा से जुड़ी विशेषज्ञता के साथ-साथ संबंधित उद्योगों की जरूरतों के मुताबिक प्रशिक्षण देने पर जोर होगा. इसके लिए क्षेत्र के इंजीनियरिंग और मेडिकल संस्थानों की मदद लेने की योजना है.
इसके अलावा सरकार ने मंगलुरु में बेहतर ऑफिस स्पेस और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर उपलब्ध कराने पर भी चर्चा की. इसमें राज्य की सस्टेनेबल डेटा सेंटर नीति के तहत डेटा सेंटर में निवेश को बढ़ावा देना शामिल है.
अधिकारियों के मुताबिक, निवेश से जुड़ी प्रक्रियाओं को आसान बनाने के लिए एक विशेष सिंगल-विंडो टीम भी बनाई जाएगी. इसके साथ ही स्थानीय शैक्षणिक संस्थानों, कर्नाटक के स्टार्टअप और डीप-टेक इकोसिस्टम के साथ साझेदारी की संभावनाएं भी तलाशी जाएंगी.
अप्रैल से सितंबर 2026 के बीच मेनबोर्ड आईपीओ के जरिए कंपनियों ने कुल 84,400 करोड़ रुपये जुटाए, जो पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में जुटाए गए 64,900 करोड़ रुपये के मुकाबले 30 फीसदी अधिक है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के प्राथमिक बाजार में वित्त वर्ष 2026-27 की पहली छमाही के दौरान आईपीओ के जरिए पूंजी जुटाने में अच्छी बढ़ोतरी दर्ज की गई है. अप्रैल से सितंबर 2026 के बीच मेनबोर्ड आईपीओ के जरिए कंपनियों ने कुल 84,400 करोड़ रुपये जुटाए, जो पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में जुटाए गए 64,900 करोड़ रुपये के मुकाबले 30 फीसदी अधिक है. इस दौरान सितंबर महीने में ही कुल फंड का करीब 94 फीसदी हिस्सा जुटाया गया. ग्रांट थॉर्नटन भारत की रिपोर्ट में यह जानकारी सामने आई है.
सितंबर में 32 कंपनियों ने लॉन्च किए आईपीओ
ग्रांट थॉर्नटन भारत की रिपोर्ट 'इंडिया आईपीओ मार्केट: एच1 एफवाई27 एंड क्यू2 एफवाई27 रिव्यू' के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026-27 की पहली छमाही में कुल 71 कंपनियों ने शेयर बाजार में कदम रखा. पिछले साल की समान अवधि में यह संख्या 55 थी.
जुलाई से सितंबर के बीच आईपीओ बाजार में गतिविधियां काफी तेज रहीं. सितंबर सबसे व्यस्त महीना रहा, जब 32 कंपनियों ने अपने आईपीओ लॉन्च किए और इनके जरिए कुल 40,400 करोड़ रुपये जुटाए. इससे पता चलता है कि पहली छमाही के दौरान आईपीओ से जुटाई गई अधिकांश पूंजी सितंबर में आई.
निवेशकों की बढ़ी दिलचस्पी, लिस्टिंग पर औसतन 18% का रिटर्न
आईपीओ बाजार में निवेशकों की दिलचस्पी भी बढ़ी है. वित्त वर्ष 2026-27 की पहली छमाही में आईपीओ की लिस्टिंग के दिन औसतन 18 फीसदी का रिटर्न मिला, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह आंकड़ा 10 फीसदी था.
वहीं, खुदरा निवेशकों की ओर से औसत ओवरसब्सक्रिप्शन भी बढ़कर 28 गुना हो गया, जो एक साल पहले 25 गुना था. इससे नए आईपीओ में खुदरा निवेशकों की भागीदारी बढ़ने का संकेत मिलता है.
फाइनेंशियल सर्विसेज सेक्टर की सबसे बड़ी हिस्सेदारी
सेक्टर के लिहाज से देखें तो आईपीओ के जरिए जुटाई गई कुल पूंजी में फाइनेंशियल सर्विसेज कंपनियों की हिस्सेदारी सबसे अधिक रही. इस सेक्टर ने कुल फंड जुटाने में 43 फीसदी योगदान दिया. वहीं, आईपीओ की संख्या के मामले में कैपिटल गुड्स सेक्टर सबसे आगे रहा. इस क्षेत्र की 15 कंपनियों ने पहली छमाही के दौरान आईपीओ लॉन्च किए.
घरेलू संस्थागत निवेशकों ने बाजार को दिया सहारा
जुलाई से सितंबर 2026 के दौरान घरेलू संस्थागत निवेशकों (DII) ने शेयर बाजार में 1.69 लाख करोड़ रुपये का शुद्ध निवेश किया. इसके मुकाबले विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) का शुद्ध निवेश 13,900 करोड़ रुपये रहा.
रिपोर्ट के मुताबिक, घरेलू संस्थागत निवेशकों की मजबूत भागीदारी ने बाजार की मुश्किल परिस्थितियों के बावजूद बड़ी संख्या में शेयर जारी करने में मदद की. इस दौरान सितंबर में निफ्टी 50 में 5.7 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई.
IPO बाजार में आगे भी बनी हुई है बड़ी तैयारी
ग्रांट थॉर्नटन भारत में पार्टनर और कैपिटल मार्केट्स एडवाइजरी लीडर करण मारवाह ने कहा कि वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही में भारत का आईपीओ बाजार सतर्कता से तेजी की ओर बढ़ा, जिससे पहली छमाही में रिकॉर्ड फंड जुटाने में मदद मिली.
उन्होंने कहा कि आईपीओ के जरिए बड़ी मात्रा में पूंजी जुटाया जाना दिखाता है कि बाजार नई कंपनियों के शेयर जारी करने की क्षमता रखता है. हालांकि, निवेशकों की मांग अब चुनिंदा कंपनियों तक सीमित होती जा रही है और वे कंपनियों के बुनियादी प्रदर्शन, आईपीओ की कीमत, कॉरपोरेट गवर्नेंस और जुटाई गई पूंजी के इस्तेमाल जैसे पहलुओं पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं.
रिपोर्ट के मुताबिक, आईपीओ बाजार में आगे भी गतिविधियां जारी रहने की संभावना है. वित्त वर्ष 2026-27 की पहली छमाही में 100 मेनबोर्ड कंपनियों और 159 छोटे एवं मझोले उद्यमों (SME) ने आईपीओ लाने के लिए ड्राफ्ट ऑफर डॉक्यूमेंट दाखिल किए हैं.
हालांकि, रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया गया है कि ड्राफ्ट दस्तावेज दाखिल करने का मतलब यह नहीं है कि सभी कंपनियां आईपीओ लेकर आएंगी. नियामकीय मंजूरी मिलने में लगने वाला समय, आवश्यक मंजूरियों में देरी और कंपनियों की तैयारी जैसे कारक इन आईपीओ के बाजार में आने की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
नए नियमों में हवाई टिकटों की कीमतों को लेकर पारदर्शिता बढ़ाने पर भी जोर दिया गया है. इसके तहत एयरलाइंस को बुकिंग के दौरान और टिकट जारी करते समय यात्रियों को कुल भुगतान की जाने वाली राशि स्पष्ट रूप से बतानी होगी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
कच्चे तेल और एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) की कीमतों में उतार-चढ़ाव के बीच हवाई टिकट महंगे होने की आशंकाओं को देखते हुए केंद्र सरकार ने विमानन क्षेत्र के नियमों में बदलाव किया है. नए नियमों के तहत असाधारण परिस्थितियों में सरकार एयरलाइंस के टिकट किराए को लेकर सीधे हस्तक्षेप कर सकेगी. केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्रालय की ओर से अधिसूचित 'भारतीय वायुयान नियम, 2026' के अनुसार, जनहित को ध्यान में रखते हुए सरकार एयरलाइंस को किराए के संबंध में निर्देश जारी कर सकती है. हालांकि, यह हस्तक्षेप विशेष परिस्थितियों में और एक निश्चित समय सीमा के लिए ही किया जा सकेगा.
एयरलाइंस को किराए का ब्योरा DGCA को देना होगा
नए नियमों के नियम 192 के तहत नियमित हवाई सेवाएं संचालित करने वाली एयरलाइंस को अपनी परिचालन लागत समेत अन्य संबंधित कारकों के आधार पर टिकटों का किराया तय करना होगा. साथ ही, उन्हें किराए का पूरा विवरण नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (DGCA) को देना होगा. यदि सरकार को लगता है कि कोई असाधारण परिस्थिति पैदा हुई है और जनहित में हस्तक्षेप जरूरी है, तो वह एयरलाइंस को लिखित निर्देश जारी कर सकती है.
इसके अलावा, एयरलाइंस को अपनी वेबसाइट और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म पर टिकटों का किराया प्रदर्शित करना अनिवार्य होगा. DGCA इन कंपनियों द्वारा तय किए जाने वाले किराए की निगरानी भी करेगा.
टिकट बुकिंग के दौरान बतानी होगी पूरी कीमत
नए नियमों में हवाई टिकटों की कीमतों को लेकर पारदर्शिता बढ़ाने पर भी जोर दिया गया है. इसके तहत एयरलाइंस को बुकिंग के दौरान और टिकट जारी करते समय यात्रियों को कुल भुगतान की जाने वाली राशि स्पष्ट रूप से बतानी होगी. इसमें मूल किराया (बेस फेयर), टैक्स, अन्य शुल्क, टिकट कैंसिलेशन चार्ज और रिफंड की शर्तों का अलग-अलग विवरण देना होगा.
इससे यात्रियों को यह समझने में आसानी होगी कि टिकट की मूल कीमत कितनी है और अन्य शुल्कों के रूप में उनसे कितनी रकम वसूली जा रही है. नियमों का उद्देश्य एयरलाइंस द्वारा लिए जाने वाले विभिन्न शुल्कों और सरकारी टैक्स के बीच अंतर भी स्पष्ट करना है.
1994 से एयरलाइंस को किराया तय करने की आजादी
भारत में वर्ष 1994 में हवाई किराए तय करने की प्रक्रिया को नियंत्रण मुक्त (डिरिगुलेट) कर दिया गया था. इसके बाद एयरलाइंस को बाजार की परिस्थितियों के अनुसार टिकटों की कीमतें तय करने की छूट मिल गई. आमतौर पर कंपनियां यात्रियों की मांग, परिचालन लागत और टिकट बुकिंग के समय के आधार पर किराया निर्धारित करती हैं. इसी वजह से एक ही फ्लाइट में अलग-अलग समय पर टिकट बुक करने वाले यात्रियों को अलग-अलग कीमत चुकानी पड़ सकती है.
सरकार के अधिकारों में क्या हुआ बदलाव?
पहले लागू एयरक्राफ्ट रूल्स, 1937 के नियम 135(4) के तहत DGCA को एविएशन सेक्टर में अत्यधिक या अनुचित कीमतों और कंपनियों की मिलीभगत जैसी स्थितियों में निर्देश जारी करने का अधिकार था. नए भारतीय वायुयान नियम, 2026 के नियम 192 में किराए की निगरानी का प्रावधान बरकरार रखा गया है. हालांकि, इसमें सरकार के हस्तक्षेप का आधार असाधारण परिस्थितियों और जनहित की जरूरत को बनाया गया है.
इस तरह नए नियमों के तहत केंद्र सरकार को विशेष परिस्थितियों में एयरलाइन किराए को लेकर निर्देश जारी करने का अधिकार मिला है. इससे हवाई किराए और टिकट बुकिंग से जुड़ी जानकारी में पारदर्शिता बढ़ाने के साथ यात्रियों के हितों की सुरक्षा पर भी जोर दिया गया है.
सोमवार को बीएसई सेंसेक्स 1,233.25 अंक यानी 1.66 फीसदी की बढ़त के साथ 75,692.78 पर बंद हुआ. वहीं, एनएसई निफ्टी 387.70 अंक यानी 1.68 फीसदी चढ़कर 23,440.80 के स्तर पर पहुंच गया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय शेयर बाजार में मंगलवार को लगातार दूसरे कारोबारी सत्र में तेजी जारी रहने के संकेत मिल रहे हैं. कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट, विदेशी निवेशकों की खरीदारी और गिफ्ट निफ्टी में मजबूती से बाजार को सहारा मिल सकता है. गिफ्ट निफ्टी करीब 120 अंक उछलकर 23,525 के आसपास पहुंच गया है. हालांकि, एशियाई बाजारों में कमजोरी और अमेरिकी टेक शेयरों में बिकवाली के चलते निवेशक सतर्क रह सकते हैं. आज बाजार की दिशा तय करने में वैश्विक संकेतों के साथ कंपनियों के सितंबर तिमाही के नतीजे भी अहम होंगे. खासतौर पर एसबीआई, बजाज फिनसर्व और एनएसई के नतीजों पर निवेशकों की नजर रहेगी.
सोमवार को सेंसेक्स 1,233 अंक उछला
सप्ताह के दूसरे कारोबारी सत्र से पहले सोमवार को घरेलू शेयर बाजार में जोरदार तेजी देखने को मिली. बीएसई सेंसेक्स 1,233.25 अंक यानी 1.66 फीसदी की बढ़त के साथ 75,692.78 पर बंद हुआ. वहीं, एनएसई निफ्टी 387.70 अंक यानी 1.68 फीसदी चढ़कर 23,440.80 के स्तर पर पहुंच गया. हालांकि, मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में तेजी प्रमुख सूचकांकों के मुकाबले सीमित रही. निफ्टी मिडकैप इंडेक्स करीब 1 फीसदी और स्मॉलकैप इंडेक्स 0.7 फीसदी बढ़कर बंद हुआ.
सोमवार के कारोबार में रिलायंस इंडस्ट्रीज, टाटा स्टील, श्रीराम फाइनेंस, कोल इंडिया और जेएसडब्ल्यू स्टील निफ्टी के टॉप गेनर्स रहे. दूसरी ओर, इंफोसिस, अदाणी पोर्ट्स, सन फार्मा, एक्सिस बैंक और एचडीएफसी लाइफ के शेयरों में गिरावट दर्ज की गई. सेक्टोरल आधार पर एनर्जी, पीएसयू बैंक, कंज्यूमर ड्यूरेबल्स, इंफ्रास्ट्रक्चर, ऑटो और ऑयल एंड गैस सेक्टर में 1 से 4.6 फीसदी तक की तेजी रही, जबकि आईटी, मीडिया और फार्मा इंडेक्स करीब 0.5 फीसदी टूटकर बंद हुए.
कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट
भारतीय शेयर बाजार के लिए कच्चे तेल की कीमतों में नरमी एक सकारात्मक संकेत है. सोमवार को ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 7.6 फीसदी गिरकर 104.77 डॉलर प्रति बैरल पर आ गई थी. वहीं, अमेरिकी WTI क्रूड 96.46 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुआ. अमेरिका और ईरान के बीच कूटनीतिक बातचीत में प्रगति की उम्मीद से तेल की कीमतों में गिरावट आई.
हालांकि, मंगलवार सुबह तेल की कीमतों में हल्की रिकवरी देखने को मिली. ईरान के क़ेशम द्वीप पर अमेरिकी हमले की खबर के बाद ब्रेंट क्रूड करीब 105.25 डॉलर और WTI क्रूड 96.93 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था. इससे पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने की आशंका बनी हुई है. भारत के लिए कच्चे तेल की कीमतें अहम हैं, क्योंकि इनके बढ़ने से आयात बिल और महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है.
विदेशी निवेशकों ने की 3,115 करोड़ रुपये की खरीदारी
सोमवार को विदेशी निवेशकों की खरीदारी ने भी घरेलू बाजार को सहारा दिया. विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) ने भारतीय शेयर बाजार में करीब 3,115 करोड़ रुपये की शुद्ध खरीदारी की. हालांकि, घरेलू संस्थागत निवेशकों (DII) ने इस दौरान करीब 392 करोड़ रुपये की शुद्ध बिकवाली की. विदेशी निवेशकों की वापसी से बाजार में निवेशकों का भरोसा मजबूत होने की उम्मीद है.
अमेरिकी बाजारों में मिला-जुला कारोबार
सोमवार को अमेरिकी शेयर बाजारों में मिला-जुला कारोबार देखने को मिला. डाउ जोंस 213.67 अंक यानी 0.41 फीसदी की बढ़त के साथ 51,983.98 पर बंद हुआ. दूसरी ओर, S&P 500 में 0.51 फीसदी की गिरावट आई और यह 7,541.40 पर आ गया. टेक्नोलॉजी शेयरों में बिकवाली के कारण नैस्डैक 1.07 फीसदी टूटकर 25,164.32 पर बंद हुआ.
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पर टेक कंपनियों के बढ़ते खर्च और उनके ऊंचे वैल्यूएशन को लेकर निवेशकों की चिंताएं बढ़ रही हैं. इसका असर अमेरिकी टेक शेयरों पर देखने को मिला. इसके अलावा अमेरिका में मिडटर्म चुनावों से पहले भी निवेशक सतर्क रुख अपना रहे हैं.
एशियाई बाजारों में कमजोरी
मंगलवार को एशियाई बाजारों में कमजोरी देखने को मिल रही है. दक्षिण कोरिया का कोस्पी इंडेक्स शुरुआती कारोबार में 3 फीसदी से ज्यादा गिर गया. टेक्नोलॉजी शेयरों पर दबाव और AI सेक्टर में बढ़ते निवेश को लेकर चिंताएं इसकी प्रमुख वजह हैं. वहीं, जापान का निक्केई 225 नेशनल हॉलिडे के कारण बंद है. वैश्विक बाजारों से मिल रहे इन मिले-जुले संकेतों के बीच भारतीय बाजार में निवेशकों की नजर शुरुआती कारोबार पर रहेगी.
सोने-चांदी की कीमतों में हल्की तेजी
मंगलवार को शुरुआती एशियाई कारोबार में सोने और चांदी की कीमतों में हल्की तेजी देखने को मिली. कॉमैक्स पर सोना करीब 3,952 डॉलर प्रति औंस पर कारोबार कर रहा था. वहीं, चांदी की कीमत 50 डॉलर प्रति औंस के आसपास पहुंच गई. निवेशक वैश्विक तनाव और अमेरिकी आर्थिक संकेतों के बीच सुरक्षित निवेश विकल्पों पर भी नजर बनाए हुए हैं.
आज इन शेयरों पर रहेगी निवेशकों की नजर
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, मंगलवार को भारतीय स्टेट बैंक (SBI), बजाज फिनसर्व और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) समेत कई कंपनियां सितंबर तिमाही के नतीजे जारी करेंगी. इसके बजाज होल्डिंग्स एंड इन्वेस्टमेंट, बाटा इंडिया, एमसीएक्स, महानगर गैस, मेट्रोपोलिस हेल्थकेयर और उत्कर्ष स्मॉल फाइनेंस बैंक के नतीजों पर भी निवेशकों की नजर रहेगी. वहीं, आईटीसी का कंसोलिडेटेड नेट प्रॉफिट सालाना आधार पर 18.5 फीसदी घटकर 4,229.3 करोड़ रुपये रहा, जबकि नाल्को का मुनाफा 28.3 फीसदी बढ़कर 1,835 करोड़ रुपये और मारिको का मुनाफा 29.2 फीसदी बढ़कर 558 करोड़ रुपये पहुंच गया. दूसरी ओर, केईसी इंटरनेशनल का मुनाफा 81.5 फीसदी गिरकर 29.7 करोड़ रुपये और कंटेनर कॉरपोरेशन का मुनाफा 6.9 फीसदी घटकर करीब 353 करोड़ रुपये रहा. अमारा राजा एनर्जी के 2,320 करोड़ रुपये के निवेश, ट्राइडेंट की 4,650 करोड़ रुपये की विस्तार योजना और कंटेनर कॉरपोरेशन के 1.90 रुपये प्रति शेयर के अंतरिम डिविडेंड के ऐलान से भी संबंधित शेयर फोकस में रहेंगे.
इसके अलावा ल्यूपिन को अमेरिकी दवा नियामक यूएसएफडीए से एमिफैम्प्रिडीन की 10 एमजी टैबलेट के जेनेरिक वर्जन के लिए मंजूरी मिली है. एनबीसीसी ने बिहार में करीब 2,000 करोड़ रुपये की चार रीडेवलपमेंट परियोजनाओं के लिए समझौता किया है. वहीं, गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स को भारतीय नौसेना से करीब 32,000 करोड़ रुपये के पांच युद्धपोत बनाने का ऑर्डर मिला है. आज एसएफसी एनवायरनमेंटल टेक्नोलॉजीज और बीएलएस पॉलिमर्स की मेनबोर्ड सेगमेंट में, जबकि विस्कॉन इंडस्ट्रीज की एसएमई सेगमेंट में लिस्टिंग प्रस्तावित है.
क्या आज भी जारी रहेगी बाजार में तेजी?
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, बाजार की आगे की चाल कई अहम कारकों पर निर्भर करेगी. कच्चे तेल की कीमतों में नरमी, विदेशी निवेशकों की खरीदारी और कंपनियों के तिमाही नतीजे बाजार को सहारा दे सकते हैं. हालांकि, पश्चिम एशिया में जारी तनाव, अमेरिकी टेक शेयरों में बिकवाली और एशियाई बाजारों की कमजोरी निवेशकों की चिंता बढ़ा सकती है. ऐसे में निवेशकों की नजर गिफ्ट निफ्टी के संकेतों के साथ-साथ वैश्विक घटनाक्रम और घरेलू कंपनियों के नतीजों पर बनी रहेगी.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
सोमवार, 2 नवंबर को बीएसई सेंसेक्स और एनएसई निफ्टी दोनों में जोरदार तेजी दर्ज की गई. कारोबार के दौरान सेंसेक्स 75,692 और निफ्टी 23,440 के स्तर को पार कर गए. दोनों प्रमुख सूचकांक लगातार तीसरे कारोबारी सत्र में बढ़त के साथ बंद हुए.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पश्चिम एशिया में तनाव कम होने की उम्मीद और कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट ने सोमवार को भारतीय शेयर बाजार को बड़ी राहत दी. रिलायंस इंडस्ट्रीज के मजबूत तिमाही नतीजों के बाद शेयरों में जोरदार खरीदारी ने बाजार की तेजी को और बल दिया. सेंसेक्स 1,233 अंक उछल गया, जबकि बीएसई में सूचीबद्ध कंपनियों का कुल बाजार पूंजीकरण करीब 8 लाख करोड़ रुपये बढ़ गया.
भारतीय शेयर बाजार में कारोबारी सप्ताह की शुरुआत शानदार रही. सोमवार, 2 नवंबर को बीएसई सेंसेक्स और एनएसई निफ्टी दोनों में जोरदार तेजी दर्ज की गई. कारोबार के दौरान सेंसेक्स 75,692 और निफ्टी 23,440 के स्तर को पार कर गए. दोनों प्रमुख सूचकांक लगातार तीसरे कारोबारी सत्र में बढ़त के साथ बंद हुए. बाजार में खरीदारी का असर मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों पर भी दिखाई दिया. दोनों सूचकांकों में करीब 1 फीसदी तक की तेजी रही.
रिलायंस इंडस्ट्रीज के शेयरों में जोरदार उछाल
सोमवार को बाजार की तेजी में रिलायंस इंडस्ट्रीज (RIL) के शेयरों की सबसे अहम भूमिका रही. सितंबर तिमाही के उम्मीद से बेहतर नतीजों के बाद कंपनी के शेयरों में जबरदस्त खरीदारी देखने को मिली. शेयर करीब 9.41 फीसदी उछलकर बंद हुआ. अप्रैल 2020 के बाद यह कंपनी के शेयरों में एक दिन की सबसे बड़ी तेजी बताई जा रही है.
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, सोमवार को बाजार में आई तेजी के पीछे रिलायंस इंडस्ट्रीज का सबसे बड़ा योगदान रहा. कंपनी के शेयरों में तेजी के चलते एनर्जी इंडेक्स 3.9 फीसदी से अधिक चढ़ गया.
इन सेक्टरों में दिखी सबसे ज्यादा खरीदारी
निफ्टी के शेयरों में रिलायंस इंडस्ट्रीज और टाटा स्टील सबसे ज्यादा बढ़त दर्ज करने वाले शेयरों में शामिल रहे. दूसरी ओर, इंफोसिस और आईसीआईसीआई बैंक के शेयरों में कमजोरी देखने को मिली.
सेक्टर के लिहाज से ऑयल एंड गैस, मेटल और पीएसयू बैंक शेयरों में अच्छी खरीदारी रही. वहीं, आईटी और मीडिया सेक्टर दबाव में रहे.
बड़ी कंपनियों के साथ मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में भी तेजी का रुख बना रहा. निफ्टी मिडकैप 100 इंडेक्स 1.19 फीसदी और निफ्टी स्मॉलकैप 100 इंडेक्स 0.71 फीसदी की बढ़त के साथ बंद हुआ. बाजार में तेजी का दायरा भी व्यापक रहा. निफ्टी 500 में शामिल 391 शेयर बढ़त के साथ बंद हुए, जबकि 105 शेयरों में गिरावट दर्ज की गई.
निवेशकों की दौलत में 8 लाख करोड़ रुपये का इजाफा
शेयर बाजार में आई इस तेजी से निवेशकों को एक ही दिन में करीब 8 लाख करोड़ रुपये का फायदा हुआ. बीएसई में सूचीबद्ध कंपनियों का कुल बाजार पूंजीकरण बढ़कर करीब 482.41 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया. शुक्रवार, 30 अक्टूबर को बाजार बंद होने के समय यह आंकड़ा 474.37 लाख करोड़ रुपये था. इस तरह एक कारोबारी सत्र में बाजार पूंजीकरण में करीब 8.04 लाख करोड़ रुपये की बढ़ोतरी हुई.
110 डॉलर के नीचे आया ब्रेंट क्रूड
कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट भी भारतीय शेयर बाजार के लिए राहत की वजह बनी. अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड का भाव 110 डॉलर प्रति बैरल के नीचे आ गया. पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष को खत्म करने के लिए कूटनीतिक प्रयास तेज होने से निवेशकों की धारणा में सुधार आया है.
दरअसल, कतर और ईरान के अधिकारियों के बीच लगातार तीसरे दिन बातचीत जारी रही. इन चर्चाओं का मकसद अमेरिका और इजरायल के ईरान के खिलाफ जारी युद्ध को समाप्त करने के लिए समझौते का रास्ता तलाशना है. हालांकि, क्षेत्र में तनाव और अमेरिका की ओर से संभावित सैन्य कार्रवाई को लेकर अनिश्चितता अभी बनी हुई है.
कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट भारत जैसे आयात पर निर्भर देशों के लिए राहत लेकर आती है. इससे तेल आयात बिल, महंगाई और कंपनियों की लागत पर दबाव कम होने की उम्मीद रहती है.
विदेशी निवेशकों की खरीदारी से भी मिला सहारा
घरेलू शेयर बाजार को विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) की खरीदारी से भी समर्थन मिला. उपलब्ध प्रोविजनल आंकड़ों के मुताबिक, विदेशी निवेशकों ने 30 अक्टूबर को भारतीय शेयर बाजार में 3,598 करोड़ रुपये के शेयर खरीदे थे. इससे बाजार की धारणा को मजबूती मिली.
निफ्टी के लिए 23,600 का स्तर अहम
विशेषज्ञों के मुताबिक, निफ्टी के लिए 23,250 से 23,270 का स्तर तत्काल सपोर्ट जोन है. वहीं, ऊपर की तरफ 23,600 का स्तर अहम रेजिस्टेंस रहेगा. उनका कहना है कि अगर निफ्टी मजबूती के साथ 23,600 के ऊपर निकलता है तो बाजार में शॉर्ट कवरिंग बढ़ सकती है. इससे मौजूदा तेजी को और मजबूती मिल सकती है और निफ्टी 23,750 के स्तर तक पहुंच सकता है.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
इस प्रस्ताव का उद्देश्य निवेशकों को म्यूचुअल फंड में निवेश बनाए रखने के लिए प्रोत्साहित करना है. मौजूदा व्यवस्था में एक स्कीम से दूसरी स्कीम में स्विच करने को यूनिट्स की बिक्री माना जाता है और इस पर लागू नियमों के अनुसार कैपिटल गेन टैक्स देना पड़ता है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय शेयर बाजार में विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली और घरेलू निवेशकों के घटते रिटर्न के बीच भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने सरकार को दो अहम टैक्स राहत देने की सिफारिश की है. इसके तहत विदेशी निवेशकों पर लगने वाला लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन (LTCG) टैक्स खत्म करने और घरेलू म्यूचुअल फंड निवेशकों को एक स्कीम से दूसरी स्कीम में निवेश ट्रांसफर करने पर टैक्स छूट देने का प्रस्ताव है. हालांकि, इन सिफारिशों पर अंतिम फैसला केंद्र सरकार को लेना है.
बजट से पहले सरकार को भेजे गए सुझाव
समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने मामले की जानकारी रखने वाले दो सूत्रों के हवाले से बताया कि सेबी ने ये सुझाव फरवरी 2027 में पेश होने वाले केंद्रीय बजट से पहले सरकार को दिए हैं. हालांकि, सेबी की सिफारिशें बाध्यकारी नहीं हैं और इन्हें लागू करने का फैसला सरकार को करना है.
बताया जा रहा है कि सेबी ने पिछले दो वर्षों में विदेशी निवेशकों के साथ हुई कई बैठकों के बाद ये प्रस्ताव तैयार किए हैं. इन बैठकों में विदेशी निवेशकों ने भारत में लागू टैक्स व्यवस्था को लेकर अपनी चिंताएं जाहिर की थीं. लगातार विदेशी बिकवाली के कारण भारतीय रुपये पर भी दबाव पड़ा है.
विदेशी निवेशकों की बिकवाली रोकने की कोशिश
भारतीय शेयर बाजार का प्रदर्शन पिछले दो वर्षों में कई अन्य उभरते बाजारों के मुकाबले कमजोर रहा है. इस साल विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयरों में रिकॉर्ड 31 अरब डॉलर की बिकवाली की है. वहीं, घरेलू शेयर बाजार से मिलने वाला रिटर्न ठहरने के कारण खुदरा निवेशकों का विदेशों में निवेश बढ़ा है.
सूत्रों के मुताबिक, सेबी के प्रस्ताव का उद्देश्य विदेशी निवेशकों पर शुरुआती टैक्स बोझ कम करना और भारतीय बाजार में निवेश को आकर्षक बनाना है.
फिलहाल भारत में एक साल से अधिक समय तक रखे गए शेयरों और अन्य पात्र प्रतिभूतियों पर 12.5 फीसदी लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स लगता है. वहीं, एक साल या उससे कम समय तक रखी गई प्रतिभूतियों की बिक्री से होने वाले मुनाफे पर 20 फीसदी शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन (STCG) टैक्स देना पड़ता है. इसके अलावा शेयरों की खरीद-बिक्री पर सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (STT) और लाभांश पर टैक्स डिडक्टेड एट सोर्स (TDS) भी लागू होता है.
ब्रोकरेज फर्म जेफरीज ने हाल ही में जारी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि कैपिटल गेन टैक्स में कटौती से विदेशी निवेशकों के लिए भारतीय बाजार का आकर्षण बढ़ सकता है और निवेश को समर्थन मिल सकता है. वहीं, ब्रोकरेज फर्म IIFL का अनुमान है कि कैपिटल गेन टैक्स खत्म होने से विदेशी निवेशकों का रिटर्न 2.3 प्रतिशत अंक तक बढ़ सकता है.
म्यूचुअल फंड निवेशकों को भी मिल सकती है टैक्स राहत
सेबी ने घरेलू म्यूचुअल फंड निवेशकों के लिए भी टैक्स राहत का प्रस्ताव दिया है. इसके तहत अगर कोई निवेशक अपनी म्यूचुअल फंड स्कीम की यूनिट्स को दूसरी स्कीम में ट्रांसफर करता है, तो इसे टैक्स के दायरे में आने वाली बिक्री नहीं माना जाना चाहिए. हालांकि, इस छूट का लाभ तभी मिल सकता है, जब निवेशक ने संबंधित यूनिट्स को एक साल से अधिक समय तक अपने पास रखा हो.
इस प्रस्ताव का उद्देश्य निवेशकों को म्यूचुअल फंड में निवेश बनाए रखने के लिए प्रोत्साहित करना है. मौजूदा व्यवस्था में एक स्कीम से दूसरी स्कीम में स्विच करने को यूनिट्स की बिक्री माना जाता है और इस पर लागू नियमों के अनुसार कैपिटल गेन टैक्स देना पड़ता है.
बाजार के कमजोर प्रदर्शन के बीच प्रस्ताव
पिछले दो वर्षों में भारतीय शेयर बाजार का प्रदर्शन दूसरे उभरते बाजारों की तुलना में कमजोर रहा है. इस दौरान निफ्टी 50 में 4.8 फीसदी की गिरावट आई, जबकि MSCI इमर्जिंग मार्केट इंडेक्स में 40 फीसदी की तेजी दर्ज की गई.
म्यूचुअल फंड निवेशकों को भी इक्विटी स्कीमों से अपेक्षित रिटर्न नहीं मिला है. फंड रिसर्च कंपनी मॉर्निंगस्टार के आंकड़ों के मुताबिक, इस अवधि में लार्जकैप शेयरों में निवेश करने वाले फंड्स का औसत रिटर्न 1.6 फीसदी घटा है.
भारतीय म्यूचुअल फंड उद्योग के पास फिलहाल 82.6 लाख करोड़ रुपये की संपत्ति प्रबंधन के तहत है. इस उद्योग में सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIP) के जरिये हर महीने औसतन 3,000 करोड़ रुपये का निवेश आता है.
इस समझौते के तहत राज्य के औद्योगिक क्लस्टर में सामुदायिक बॉयलर इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने पर विचार किया जाएगा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
स्टीमहाउस इंडिया लिमिटेड ने हरियाणा सरकार के साथ 500 करोड़ रुपये के प्रस्तावित निवेश को लेकर समझौता ज्ञापन (MoU) किया है. इसके तहत पानीपत और सोनीपत जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में सामुदायिक बॉयलर और केंद्रीकृत भाप उत्पादन व्यवस्था विकसित करने की संभावनाओं का आकलन किया जाएगा. हालांकि, अभी किसी परियोजना को अंतिम मंजूरी नहीं मिली है.
औद्योगिक इकाइयों में प्रदूषण नियंत्रण और ऊर्जा आपूर्ति से जुड़ी जरूरतों को देखते हुए स्टीमहाउस इंडिया लिमिटेड हरियाणा में निवेश की संभावनाएं तलाश रही है. कंपनी ने हरियाणा सरकार के हरियाणा एंटरप्राइजेज प्रमोशन सेंटर (HEPC) के साथ 500 करोड़ रुपये के प्रस्तावित निवेश को लेकर समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं. इस समझौते के तहत राज्य के औद्योगिक क्लस्टर में सामुदायिक बॉयलर इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने पर विचार किया जाएगा.
इस पहल के तहत औद्योगिक इकाइयों को एक ही स्थान से भाप उपलब्ध कराने के लिए केंद्रीकृत उत्पादन और पाइपलाइन आधारित वितरण व्यवस्था की संभावनाओं का अध्ययन किया जाएगा. कंपनी ने इसके लिए पानीपत और सोनीपत जैसे औद्योगिक केंद्रों का उल्लेख किया है.
क्या है सामुदायिक बॉयलर व्यवस्था
सामुदायिक बॉयलर प्रणाली में एक केंद्रीकृत संयंत्र में भाप तैयार की जाती है और पाइपलाइन नेटवर्क के जरिए कई औद्योगिक इकाइयों तक पहुंचाई जाती है. मौजूदा व्यवस्था में कई उद्योग अपनी जरूरत के मुताबिक अलग-अलग बॉयलर का इस्तेमाल करते हैं.
केंद्रीकृत व्यवस्था में ईंधन प्रबंधन, प्रदूषण नियंत्रण और उत्सर्जन की निगरानी एक ही प्रणाली के तहत की जा सकती है. हालांकि, इसका प्रभाव इस्तेमाल की जाने वाली तकनीक और परिचालन के दौरान पर्यावरणीय मानकों के पालन पर निर्भर करेगा.
छोटे औद्योगिक क्लस्टर में ऐसी व्यवस्था को बढ़ावा देने का मुद्दा केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के दिशा-निर्देशों में भी शामिल रहा है.
अभी शुरुआती चरण में है योजना
कंपनी ने स्पष्ट किया है कि हरियाणा सरकार के साथ हुआ यह समझौता केवल संभावनाओं का पता लगाने के लिए है. यह किसी परियोजना को आवंटित किए जाने या उसके निर्माण की गारंटी नहीं है. प्रस्तावित निवेश और परियोजनाओं पर आगे का फैसला तकनीकी एवं व्यावसायिक व्यवहार्यता, औद्योगिक मांग, पर्यावरणीय जरूरतों और जरूरी सरकारी मंजूरियों के आधार पर होगा.
स्टीमहाउस इंडिया के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक विशाल एस. बुधिया ने कहा कि हरियाणा के औद्योगिक क्षेत्रों में केंद्रीकृत भाप उत्पादन और वितरण व्यवस्था की संभावनाओं का अध्ययन किया जाएगा. उन्होंने कहा कि इस तरह की व्यवस्था में प्रदूषण नियंत्रण प्रणाली और ईंधन प्रबंधन को भी ध्यान में रखना होगा.
औद्योगिक भाप और नाइट्रोजन की आपूर्ति करती है कंपनी
साल 2015 में स्थापित स्टीमहाउस इंडिया लिमिटेड (पूर्व नाम अंकलेश्वर इको एनर्जी लिमिटेड) औद्योगिक भाप के उत्पादन और वितरण का कारोबार करती है. कंपनी अपने बॉयलर संयंत्रों के अलावा दूसरी उत्पादन इकाइयों से खरीदी गई भाप की भी पाइपलाइन नेटवर्क के जरिए आपूर्ति करती है.
कंपनी गुजरात के अंकलेश्वर में नाइट्रोजन उत्पादन और वितरण की सुविधा भी संचालित करती है. यहां प्रेशर स्विंग एडसॉर्प्शन (PSA) तकनीक से नाइट्रोजन तैयार कर औद्योगिक ग्राहकों को उपलब्ध कराई जाती है. कंपनी के शेयर बीएसई और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) में सूचीबद्ध हैं.
फेयरफैक्स, IDBI बैंक का नियंत्रण हासिल करने के लिए 52,878 करोड़ रुपये का भुगतान कर रहा है. लेकिन इसके चेयरमैन प्रेम वत्सा ने निवेशकों से कहा है कि IDBI खुद फेयरफैक्स के बीमा और वित्तीय सेवा कारोबार को खरीदने के लिए नकद भुगतान करेगा. फेयरफैक्स ने इस रकम को उन स्रोतों में भी शामिल किया है, जिनसे वह अधिग्रहण के लिए भुगतान करेगी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
IDBI अपने ही अधिग्रहण की फंडिंग में कैसे मदद कर सकता है
खरीदार बैंक खरीद रहा है. बैंक से उम्मीद है कि वह खरीदार का कारोबार खरीदेगा. और दूसरे सौदे से मिलने वाली रकम पहले सौदे की फंडिंग योजना का हिस्सा है. किसी बैंक के अधिग्रहण के लिए यह वित्तीय व्यवस्था का एक असाधारण तरीका है.
फेयरफैक्स के अधिकारियों ने 15 अक्टूबर को निवेशकों के साथ कॉन्फ्रेंस कॉल में खुद इस बात का जिक्र किया था. यह वह दिन था, जब कैबिनेट ने बिक्री को मंजूरी दी थी. Businessworld ने इस बातचीत की पूरी ट्रांसक्रिप्ट की समीक्षा की है.
रेमंड जेम्स के एक विश्लेषक ने सीधा सवाल पूछा. फेयरफैक्स अपनी बीमा कंपनी गो डिजिट को IDBI के तहत कैसे लाएगी? क्या IDBI अपनी अतिरिक्त नकदी का इस्तेमाल बाजार भाव पर शेयर खरीदने के लिए करेगा?
फेयरफैक्स के संस्थापक और चेयरमैन प्रेम वत्सा ने जवाब दिया:
"इसकी प्रक्रिया यह है कि IDBI बैंक के पास अतिरिक्त पूंजी है. इसलिए वे नकद भुगतान करेंगे... हमें उम्मीद है कि सौदे के समय वे बाजार भाव पर नकद भुगतान करेंगे."
इसी कॉन्फ्रेंस कॉल में इससे पहले वत्सा ने बताया था कि फेयरफैक्स IDBI के अधिग्रहण के लिए भुगतान कैसे करेगी. उन्होंने कहा था कि इसके लिए "मौजूदा नकदी, हमारी बीमा कंपनियों से मिलने वाला डिविडेंड, संभावित परिसंपत्ति बिक्री... और डिजिट तथा IIFL कैपिटल का उनके संबंधित बाजार मूल्यों पर योगदान" इस्तेमाल किया जाएगा.
फेयरफैक्स के प्रेसिडेंट पीटर क्लार्क ने इसके बाद इस रकम का आंकड़ा भी बताया. उन्होंने कहा कि इस खरीद के लिए 5.6 अरब डॉलर की जरूरत है. जहां तक "लाइफ ऑपरेशंस और IIFL कैपिटल सहित डिजिट इंश्योरेंस के योगदान" की बात है, तो इन तीनों कंपनियों की कीमत अपने आप में करीब 3 अरब डॉलर है.
क्लार्क का बताया 3 अरब डॉलर का आंकड़ा 5.6 अरब डॉलर की कुल खरीद कीमत के आधे से ज्यादा है. इसका मतलब है कि बैंक अपने ही अधिग्रहण के लिए भुगतान करने में मदद कर सकता है.
इससे इस खबर का सबसे अहम सवाल उठता है: क्या फेयरफैक्स अपने पैसे से IDBI खरीद रही है या अधिग्रहण के लिए जरूरी रकम का एक बड़ा हिस्सा खुद IDBI से आने की उम्मीद है?
एक ही तस्वीर के चार पहलू
यह पहला सवाल नहीं है, जिसे Businessworld ने इस बिक्री को लेकर उठाया है. यह चौथा सवाल है.
कीमत
DIPAM के 13 अगस्त के आंतरिक नोट से पता चलता है कि अधिकारियों ने फेयरफैक्स की बोली खोली, 94.42 रुपये के रिजर्व प्राइस को खारिज किया और उसके बाद ही नए मूल्यांकन का आदेश दिया. नए मूल्यांकन में कीमत 75.99 रुपये आई, जो फेयरफैक्स की 81 रुपये की बोली से कम थी. सरकार का कहना है कि उसकी प्रक्रियाएं दिशानिर्देश हैं, नियम नहीं और यह प्रक्रिया "डबल ब्लाइंड" थी.
विक्रेता के बोर्डरूम में कौन था?
बिक्री प्रक्रिया के सात महीनों के दौरान LIC की निवेश समिति में शामिल एक निदेशक फेयरफैक्स के नियंत्रण वाली कंपनी थॉमस कुक इंडिया के बोर्ड में भी थे. LIC IDBI की 30.24 फीसदी हिस्सेदारी बेच रही थी. LIC ने यह नहीं बताया है कि संबंधित निदेशक ने इस भूमिका की जानकारी दी थी या खुद को इस प्रक्रिया से अलग किया था.
कंपनियां
कैबिनेट की मंजूरी के एक दिन बाद फेयरफैक्स ने घोषणा की कि वह गो डिजिट और IIFL कैपिटल में अपनी हिस्सेदारी IDBI को "उनके संबंधित बाजार मूल्यों" पर हस्तांतरित करेगी. गो डिजिट लाइफ गैर-सूचीबद्ध कंपनी है और उसका कोई बाजार मूल्य उपलब्ध नहीं है. इन तीनों कंपनियों का कोई स्वतंत्र मूल्यांकन सार्वजनिक नहीं किया गया है.
पैसा
अब फेयरफैक्स के अपने अधिकारियों का कहना है कि IDBI इन कंपनियों के लिए नकद भुगतान करेगा और यह नकदी IDBI को खरीदने के लिए इस्तेमाल की जाएगी.
इनमें से हर पहलू को अलग-अलग समझाया जा सकता है. लेकिन एक साथ देखने पर ये ऐसी बिक्री की तस्वीर पेश करते हैं, जिसमें बोली देखे जाने के बाद कीमत तय हुई, विक्रेता का एक निदेशक खरीदार के समूह की कंपनी के बोर्ड में बैठा था और खरीदार की फंडिंग योजना उस बैंक से मिलने वाले पैसे पर निर्भर है, जिसे वह खरीद रहा है.
पैसा कैसे आगे बढ़ेगा
- फेयरफैक्स सरकार और LIC से IDBI की 60.72 फीसदी हिस्सेदारी 52,878 करोड़ रुपये में खरीदेगी. यह सौदा 81 रुपये प्रति शेयर के भाव पर होगा. कैबिनेट के फैसले वाले दिन के बाजार भाव से यह कीमत कम थी.
- फेयरफैक्स को IDBI का नियंत्रण मिलेगा. 30 सितंबर को बैंक की नेटवर्थ 61,164 करोड़ रुपये थी.
- IDBI, फेयरफैक्स की गो डिजिट जनरल, गो डिजिट लाइफ और IIFL कैपिटल में हिस्सेदारी खरीदेगा. फेयरफैक्स के मुताबिक, यह खरीद "उनके संबंधित बाजार मूल्यों" पर होगी.
- पैसा फेयरफैक्स समूह के पास जाएगा. उसके अधिकारियों ने इन "योगदानों" को उन स्रोतों में शामिल किया है, जिनसे IDBI की खरीद के लिए भुगतान किया जाएगा.
क्लार्क का बताया 3 अरब डॉलर का आंकड़ा इन तीनों कारोबारों के लिए फेयरफैक्स का अपना मूल्यांकन है, न कि पूरा हो चुका भुगतान. सौदे की कीमत से संकेतित विनिमय दर के हिसाब से यह करीब 28,300 करोड़ रुपये होता है. यह फेयरफैक्स द्वारा IDBI के लिए चुकाई जा रही रकम का 54 फीसदी है.
ATB कॉरमार्क के एक अन्य विश्लेषक ने कॉन्फ्रेंस कॉल में वत्सा से इस योजना का सार बताते हुए कहा, "डिजिट और IIFL को इसमें शामिल किया जाएगा. आप नकदी लेंगे, शायद अतिरिक्त पूंजी से." वत्सा ने जवाब में कहा, "हां, यह सही है, जेफ." इसके बाद उन्होंने हिस्सेदारी की सीमा पर बात की.
अभी सौदे की कोई अंतिम संरचना तय नहीं हुई है और वत्सा ने यह भी कहा कि IDBI एक सार्वजनिक कंपनी है. लेकिन जब उनसे सीधे पूछा गया कि IDBI भुगतान कैसे करेगा, तो उनका जवाब था- नकद.
IDBI के दूसरे शेयरधारकों के लिए सवाल
फेयरफैक्स के पास IDBI की 60.72 फीसदी हिस्सेदारी होगी. बाकी 39.28 फीसदी हिस्सेदारी अन्य शेयरधारकों के पास होगी, जिसमें ज्यादातर हिस्सा सरकार और LIC का है.
IDBI को अपनी नकदी के बदले इन तीनों कंपनियों के शेयर मिलेंगे, इसलिए यह पैसा बिना किसी बदले के नहीं दिया जा रहा है. लेकिन यह बैंक का पैसा है और हर शेयरधारक का इस बात में हित है कि इसका इस्तेमाल कैसे किया जाता है. इससे तीन सवाल उठते हैं:
- क्या इन कारोबारों का स्वतंत्र और उचित मूल्यांकन किया जा रहा है, खासकर गो डिजिट लाइफ का, जिसका कोई बाजार मूल्य नहीं है?
- क्या बैंक अपनी इतनी पूंजी इन कंपनियों पर खर्च करने की स्थिति में है?
- क्या यह खरीद सभी शेयरधारकों के हित में है या मुख्य रूप से उस विक्रेता के हित में, जिसका खरीदार पर नियंत्रण है?
यह पूंजी किसकी है?
IDBI की "अतिरिक्त पूंजी" अचानक नहीं आई है.
एक दशक पहले IDBI भारत के सबसे संकटग्रस्त बैंकों में शामिल था. इसे संकट से निकालने के लिए सरकार और भारत की सरकारी बीमा कंपनी LIC ने पूंजी लगाई थी. 2019 में दोनों ने बैंक का नियंत्रण अपने हाथ में लिया. इसी साल कैबिनेट ने 9,300 करोड़ रुपये की अतिरिक्त पूंजी को मंजूरी दी थी, जिसे सरकार और LIC के बीच बांटा गया था.
वत्सा ने कॉन्फ्रेंस कॉल में खुद इस बात को स्वीकार किया. उन्होंने कहा कि IDBI "2016 से 2020 के दौरान संकट में आ गया था" और उसे करीब 6.4 अरब डॉलर का संचयी नुकसान हुआ था, जिसकी भरपाई LIC और भारत सरकार ने की थी.
यह बदलाव सफल रहा. 30 सितंबर, 2026 को IDBI का पूंजी पर्याप्तता अनुपात 27.10 फीसदी था. यह पूंजी संरक्षण बफर सहित 11.5 फीसदी के नियामकीय न्यूनतम स्तर से दोगुने से भी ज्यादा है.
पूंजी पर्याप्तता अनुपात का मतलब तिजोरी में रखी नकदी नहीं है. लेकिन यह वह वित्तीय मजबूती है, जिसे सार्वजनिक धन से दोबारा खड़ा किया गया.
अब यही मजबूती फेयरफैक्स के निवेश प्रस्ताव का अहम आधार है. और फेयरफैक्स के चेयरमैन का कहना है कि बैंक की "अतिरिक्त पूंजी" का इस्तेमाल फेयरफैक्स की अपनी कंपनियों के लिए नकद भुगतान में होगा.
कॉन्फ्रेंस कॉल में वत्सा ने IDBI को "27 फीसदी पूंजी पर्याप्तता के साथ वित्तीय रूप से बेहद मजबूत" बताया और इसकी खरीद को "जीवन में एक बार मिलने वाला अवसर" कहा. बैंक के भविष्य के डिविडेंड के बारे में उन्होंने कहा, "उनके पास बहुत अच्छी पूंजी है. और यह रकम हमारे पास आएगी."
RBI के लिए एक सवाल
RBI इस बात की सीमा तय करता है कि कोई बैंक अपनी कितनी पूंजी दूसरी कंपनियों में लगा सकता है. वित्तीय सेवाओं से जुड़े वाणिज्यिक बैंकों के लिए 2025 के निर्देशों के तहत:
- किसी बैंक की एक सहायक कंपनी या वित्तीय सेवा कंपनी में इक्विटी हिस्सेदारी "बैंक की चुकता शेयर पूंजी और रिजर्व के 10 फीसदी से अधिक नहीं होनी चाहिए" (पैरा 23).
- ऐसी सभी कंपनियों में बैंक की कुल इक्विटी हिस्सेदारी "20 फीसदी से अधिक नहीं होनी चाहिए" (पैरा 26).
इन सीमाओं की गणना बैंक की चुकता पूंजी और रिजर्व के आधार पर होती है, न कि नेटवर्थ के आधार पर. IDBI के मौजूदा निवेश भी इन सीमाओं में शामिल होंगे. फेयरफैक्स ने इन तीनों कारोबारों का मूल्य करीब 3 अरब डॉलर बताया है. लेकिन इतनी बड़ी खरीद इन सीमाओं के भीतर कैसे आएगी और इसके लिए किन मंजूरियों की जरूरत होगी, इस बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई है.
इन निर्देशों के तहत ऐसे निवेश के लिए RBI की पहले से मंजूरी लेना भी जरूरी है. इसलिए वत्सा की ओर से बताए गए नकद भुगतान नियामकीय स्तर पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं. इन सीमाओं को किस तरह लागू किया जाएगा, यह सौदे की संरचना पर निर्भर करेगा और अभी यह तय नहीं हुई है.
फेयरफैक्स ने कहा है कि इन योगदानों के लिए RBI, SEBI और डिजिट के मामले में बीमा नियामक IRDAI की मंजूरी जरूरी होगी.
क्या सरकार ने अपना अधिकार छोड़ दिया?
बिक्री के बाद भी सरकार और LIC के पास IDBI की 34 फीसदी हिस्सेदारी रहेगी. लेकिन उन्होंने कोई विशेष अधिकार अपने पास नहीं रखने पर सहमति जताई है.
DIPAM के 13 अगस्त, 2026 के आंतरिक नोट में इस फैसले का उल्लेख है, जिसकी रिपोर्ट Businessworld पहले ही कर चुका है. नोट के मुताबिक, सरकार ने शेयर खरीद समझौते का विकल्प इसलिए चुना क्योंकि "IDBI बैंक के प्रबंधन नियंत्रण का हस्तांतरण होगा और सौदा पूरा होने के बाद भारत सरकार और LIC को अनुबंध के तहत कोई विशेष अधिकार नहीं दिए जाएंगे" (पैरा 2.6).
क्या इसका मतलब यह है कि उन्हें किसी भी तरह के शेयरधारक मतदान अधिकार नहीं मिलेंगे? ऐसे बयानों पर सरकार से स्पष्टता की जरूरत है. सरकार का यह भी कहना है कि दोनों IDBI के बोर्ड से अपने नामित निदेशकों को वापस बुला लेंगे.
इसी नोट में फेयरफैक्स को खरीदार के रूप में चुनने की सिफारिश की गई थी. इसमें फेयरफैक्स की उस योजना का उल्लेख नहीं है, जिसके तहत IDBI को गो डिजिट और IIFL कैपिटल का अधिग्रहण करना था. यह भी नहीं बताया गया है कि सरकार को इस योजना की जानकारी थी या नहीं. फेयरफैक्स ने 14 अक्टूबर को इस योजना की घोषणा की थी. इसी दिन कैबिनेट ने बिक्री को मंजूरी दी थी.
घटनाक्रम पर नजर डालना जरूरी है
- सरकार ने IDBI को 81 रुपये प्रति शेयर के भाव पर बेचा, जो उस दिन के बाजार मूल्य से करीब 10 फीसदी कम था.
- बिक्री के बाद सरकार ने अपने विशेष अधिकार छोड़ दिए.
- एक दिन के भीतर फेयरफैक्स ने कहा कि IDBI की अतिरिक्त पूंजी से फेयरफैक्स की अपनी कंपनियों को बाजार भाव पर खरीदा जाएगा.
## फेयरफैक्स का पक्ष
फेयरफैक्स का कहना है कि इस योजना से "एक एकीकृत वित्तीय सेवा कंपनी तैयार होगी, जो भारतीयों की वित्तीय जरूरतों के लिए एक ही जगह पर समाधान उपलब्ध करा सकेगी." डिजिट, IDBI के ग्राहकों को बीमा बेच सकती है. कॉन्फ्रेंस कॉल में वत्सा ने कहा था कि फेयरफैक्स इन कारोबारों का विलय नहीं करेगी और न ही उनका नाम बदलेगी. उन्होंने कहा, "हमने कभी भी तालमेल से मिलने वाले फायदे (सिनर्जी) में विश्वास नहीं किया है."
इस योजना के पक्ष में एक ठोस तर्क भी है.
एक दशक से भी कम समय पहले शुरू हुई गो डिजिट अब एक सूचीबद्ध और मुनाफे में चल रही बीमा कंपनी है. IIFL कैपिटल एक स्थापित ब्रोकरेज कंपनी है. IDBI के ग्राहकों को डिजिट का बीमा बेचने से बैंक को कमाई हो सकती है और इसका फायदा उसके सभी शेयरधारकों, सरकार और LIC को भी मिल सकता है.
लेकिन कंपनियां अच्छी हैं या नहीं, यह एक अलग सवाल है. शर्तें कौन तय करेगा, यह दूसरा सवाल है. फेयरफैक्स विक्रेता होगी. IDBI के नियंत्रक शेयरधारक के रूप में खरीदार की ओर से भी उसका निर्णायक प्रभाव होगा. कोई अच्छा कारोबार भी बैंक के दूसरे शेयरधारकों को नुकसान पहुंचा सकता है, अगर कीमत और सौदे का समय उस पक्ष की ओर से तय किया जाए, जो दूसरी तरफ बैठा है.
भारतीय नियम इस जोखिम को पहचानते हैं. सूचीबद्ध कंपनियों के लिए SEBI के नियमों के तहत संबंधित पक्षों के साथ बड़े लेनदेन के लिए कंपनी की ऑडिट समिति और शेयरधारकों की मंजूरी जरूरी होती है. ऐसे लेनदेन में संबंधित पक्षों को मतदान करने की अनुमति नहीं होती.
फेयरफैक्स यह वादा भी नहीं कर रही है कि वह IDBI के कामकाज के तरीके में बदलाव करेगी. कॉन्फ्रेंस कॉल में वत्सा ने कहा था कि राकेश शर्मा मुख्य कार्यकारी अधिकारी बने रहेंगे. डिजिट और IIFL कैपिटल "काफी हद तक स्वतंत्र रूप से" काम करती रहेंगी. उन्होंने दोहराया कि फेयरफैक्स ने "कभी भी सिनर्जी में विश्वास नहीं किया है."
इस योजना के पक्ष में तर्क इन कंपनियों के कारोबार पर आधारित है. लेकिन यह खबर पैसे और उसके इस्तेमाल का फैसला कौन करेगा, इस सवाल को उठा रही है.
फेयरफैक्स इस बात पर भी जोर दे रही है कि अभी कुछ भी अंतिम नहीं है.
कोई बाध्यकारी समझौता नहीं हुआ है. उसकी विज्ञप्ति में कहा गया है कि IDBI की खरीद "दोनों या इनमें से किसी एक योगदान के पूरा हुए बिना भी हो सकती है." इसमें यह भी कहा गया है कि डिजिट या IIFL कैपिटल के संचालन और प्रबंधन के तरीके में किसी बदलाव की उम्मीद नहीं है.
वत्सा ने कॉन्फ्रेंस कॉल की शुरुआत में "सरकार और उनकी टीम को बेहद पारदर्शी और प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया अपनाने" के लिए धन्यवाद दिया था. हालांकि, DIPAM के अपने नोट में दर्ज है कि केवल एक बोलीदाता ने संशोधित प्रस्ताव जमा किया था और पहली बोलियां असफल होने के बाद रिजर्व प्राइस को खारिज कर दिया गया था.
इन सबके बावजूद बुनियादी गणित नहीं बदलता. एक खरीदार, जो कैबिनेट के फैसले वाले दिन IDBI के शेयर मूल्य से करीब 10 फीसदी कम भुगतान कर रहा है, प्रस्ताव दे रहा है कि बैंक अपनी अतिरिक्त पूंजी से खरीदार की अपनी कंपनियों को बाजार भाव पर खरीदे.
सवाल
- क्या फेयरफैक्स की बोली में सरकार को बताया गया था कि IDBI की पूंजी का इस्तेमाल फेयरफैक्स की कंपनियों को खरीदने के लिए किया जाएगा?
- क्या सरकार या उसके मूल्यांकनकर्ताओं ने 81 रुपये की कीमत को उचित मानते समय इस बात को ध्यान में रखा था?
- क्या IDBI नकद भुगतान करेगा या शेयर जारी करेगा? अगर नकद भुगतान होगा, तो कितनी रकम दी जाएगी?
- RBI इन खरीद पर 10 फीसदी और 20 फीसदी की निवेश सीमाएं कैसे लागू करेगा?
- गो डिजिट लाइफ का मूल्यांकन कौन करेगा, जिसका कोई बाजार मूल्य उपलब्ध नहीं है?
- क्या IDBI के सबसे बड़े अल्पसंख्यक शेयरधारकों के रूप में सरकार और LIC को इस हस्तांतरण पर मतदान का अधिकार मिलेगा?
संपादक की टिप्पणी
- श्री वत्सा और श्री क्लार्क के सभी उद्धरण 15 अक्टूबर की कॉन्फ्रेंस कॉल की पूरी ट्रांसक्रिप्ट से लिए गए हैं.
- 28,300 करोड़ रुपये = 3 अरब डॉलर × (52,878 करोड़ रुपये ÷ 5.6 अरब डॉलर). क्लार्क का 3 अरब डॉलर का आंकड़ा तीनों कंपनियों के लिए है, जिसमें गैर-सूचीबद्ध गो डिजिट लाइफ भी शामिल है. 54% = 3 ÷ 5.6. 46% = 28,300 ÷ 61,164.
- हिस्सेदारी का मूल्य Businessworld की गणना पर आधारित है.
- 30 अक्टूबर को कारोबार बंद होने के समय गो डिजिट जनरल का बाजार पूंजीकरण 24,109 करोड़ रुपये था (स्क्रीनर); इसका 57 फीसदी करीब 13,700 करोड़ रुपये होता है.
- 57 फीसदी का आंकड़ा जेफरीज और अन्य रिपोर्टों से लिया गया है; फेयरफैक्स की विज्ञप्ति में कोई प्रतिशत नहीं दिया गया है.
- IIFL कैपिटल के बारे में वत्सा ने कॉन्फ्रेंस कॉल में कहा था कि फेयरफैक्स के पास "मेरा ख्याल है, इसकी 51 फीसदी हिस्सेदारी होगी."
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(BW रिपोर्टर्स पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free की लेखिका हैं. यह एक तीखा खुलासा है, जिसने भारत के वित्तीय बाजारों के छिपे हुए पक्ष को सामने लाया. मुंबई में करीब दो दशकों की जमीनी रिपोर्टिंग के साथ पलक ने पैसे, सत्ता और नियमन के बीच के गठजोड़ की गहराई से पड़ताल करने वाले पत्रकार के रूप में पहचान बनाई है. उनके लेख भारत के प्रतिष्ठित वित्तीय दैनिकों, जिनमें The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line शामिल हैं, में प्रकाशित हुए हैं.
19 वर्ष की उम्र में अपराध रिपोर्टिंग की ओर आकर्षित हुईं पलक ने जल्द ही महसूस किया कि 1980 के दशक के मुंबई के गैंग युद्धों की जगह अब कॉरपोरेट टावरों में चलने वाली सफेदपोश योजनाओं ने ले ली है. इस समझ ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने भारत की ‘व्हाइट मनी’ अर्थव्यवस्था की जटिल गतिविधियों को समझने में वर्षों बिताए हैं. शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामकीय खामियों तक, उनका काम हाई फाइनेंस की चमकदार सतह के पीछे छिपे उन समूहों को सामने लाता है जो पर्दे के पीछे से फैसलों को प्रभावित करते हैं. सच्चाई सामने लाने का उनका जुनून और उन कड़ियों को जोड़ने की क्षमता, जिन्हें दूसरे नजरअंदाज कर देते हैं, उन्हें एक मजबूत पत्रकार बनाती है, जो यथास्थिति को चुनौती देने और उन खिलाड़ियों को बेनकाब करने से नहीं डरतीं जो खुद को कानून से ऊपर समझते हैं.)