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कभी हर घर पर था राज, आज बर्बादी की दहलीज पर खड़ी Tupperware!  

भारत में कंपनी की एंट्री 1996 में हुई और दिल्ली उसका पहला बाजार बना. उस समय केवल 30-40 महिलाओं की एक टीम बिक्री का कामकाज संभालती थी.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago

शायद ही कोई ऐसा होगा जो फूड स्टोरेज कंटेनर बनाने वाली कंपनी टपरवेयर (Tupperware) के नाम से परिचित न हो. भारतीय घरों में इस अमेरिकी कंपनी ने सालों तक राज किया है. खाना रखने के एयरटाइट प्लास्टिक के डिब्बों से लेकर टिफिन बॉक्स तक टपरवेयर लगभग हर भारतीय की चहेती बनी रही. हालांकि, ये 'राज' अब खत्म होने को है. टपरवेयर गंभीर संकट से जूझ रही है और उसने अपना कारोबार समेटने के संकेत दिए हैं. कोरोना महामारी ने इस महशूर कंपनी को ऐसा जख्म दिया है, जिसका इलाज खोज पाना उसके लिए मुश्किल हो गया है.   

फाउंडर थे कैमिकल इंजीनियर
एक जमाने में टपरवेयर (Tupperware) के प्रोडक्ट्स भारतीयों के बीच इस कदर लोकप्रिय हो गए थे कि इसे भारतीय कंपनी ही समझा जाता था, लेकिन यह एक अमेरिकी कंपनी है जिसकी स्थापना 1946 में हुई थी. इस कंपनी के फाउंडर कैमिकल इंजीनियर अर्ल सिलस टपर थे. उन्होंने प्लास्टिक के ऐसे कंटेनर विकसित किए, जो नॉन-टॉक्सिक, टिकाऊ और फ्लेक्सिबल थे. साथ ही, इनमें किसी भी प्रकार की गंध नहीं होती थी. अर्ल टपर के उत्पाद बेशक बेजोड़ थे, लेकिन उन्हें लोगों तक पहुंचाने के लिए दमदार बिक्री मॉडल की जरूरत थी.

काम आ गया 'पार्टी प्लान'
1950 के दशक की शुरुआत में टपरवेयर से एक नाम जुड़ा - ब्राउनी वाइज और कंपनी की किस्मत ही बदल गई. ब्राउनी ने जल्द ही महसूस किया कि अगर कंपनी के उत्पादों को लोकप्रिय करना है, तो महिलाओं को साथ लाना होगा. इसके लिए उन्होंने एक खास रणनीति बनाई जिसे - 'पार्टी प्लान' नाम दिया गया. इसके तहत वह महिलाओं से मिलतीं, उन्हें पार्टी करना सिखातीं. हर बार किसी एक के घर पर पार्टी होती और सभी वहां जुटते. ऐसे में खाना रखने के लिए डिब्बों की जरूरत भी पड़ती. बस उसी मौके पर ब्राउनी वाइज टपरवेयर का जिक्र छेड़ देतीं.      

महिलाओं को मिला काम 
ब्राउनी वाइज ने महिलाओं को न लेवल टपरवेयर के प्रोडक्ट खरीदने के लिए प्रेरित किया, बल्कि उन्हें टपरवेयर को कमीशन पर बेचना भी सिखाया. महिलाओं के पास घर बैठे पैसा आने लगा, यह रणनीति इतनी कारगर हुई कि धीरे-धीरे कंपनी ने अमेरिका से बाहर निकलकर भारत सहित कई देशों में अपनी पैठ बना ली. भारतीय महिलाओं के लिए टपरवेयर के डिब्बे इतने अजीज हो गए कि उनके खो जाने पर घरवालों की क्लास लगना तय था. टपरवेयर की खास बात ये है कि वो अपने प्रोडक्ट्स में लगातार बदलाव करती रही.   

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भारत में इस साल हुई एंट्री 
टपरवेयर ने ऐसे डिब्बे तैयार किए, जिसमें खाना न तो खराब होता था और न ही उनकी गंध फ्रीज में फैलती थी. कंपनी की लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि क्वीन एलिजाबेथ भी टपरवेयर के प्रोडक्ट्स इस्तेमाल करती थीं. भारत में कंपनी की एंट्री 1996 में हुई और दिल्ली उसका पहला बाजार बना. उस समय केवल 30-40 महिलाओं की एक टीम बिक्री का कामकाज संभालती थी. लेकिन धीरे-धीरे उसने भारत पर अपनी पकड़ इतनी मजबूत कर ली कि किसी दूसरी कंपनी के लिए कोई मौका नहीं था. 2009 में कंपनी ने भारत में एक्वासेफ बोतल लांच की और 2010 में देहरादून में एक नया मेनुफैक्चरिंग प्लांट भी लगाया. 2012 में गुरुग्राम में कंपनी के इंडियन हेड ऑफिस का उद्घाटन हुआ था.  

कंपनी के पास कैश की किल्लत
इतनी ऊंचाइयों पर पहुंचने के बाद भी आज कंपनी मुश्किल दौर से गुजर रही है. अमेरिकी कंपनी ने टपरवेयर का कहना है कि वो अपना कारोबार रखने की स्थिति में नहीं है. 2020 तक कंपनी अच्छा कारोबार कर रही थी, लेकिन कोरोना महामारी ने उसकी आर्थिक कमर तोड़ दी. लॉकडाउन जैसे हालातों ने टपरवेयर को इतना बड़ा नुकसान पहुंचाया कि उसके लिए आर्थिक संकट से बाहर निकलना लगभग असंभव हो गया. कंपनी इस वक्त नकदी की कमी से जूझ रही है. यदि टपरवेयर अपना कारोबार बंद करती है, तो एक ऐसी कंपनी हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी जिसने लंबे समय तक लोगों के दिलों पर राज किया.

 


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