गुजरे जमाने की बात हो जाएंगे FASTag, इस तरह होगी टोल टैक्स की वसूली 

सरकार एक नई योजना पर काम कर रही है, जिसके तहत FASTag और टोल प्लाजा जल्द ही खत्म हो जाएंगे.

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Thursday, 25 August, 2022
फाइल फोटो

फास्टैग और टोल प्लाजा जल्द ही गुजरे जमाने की बात होने वाले हैं. सरकार की योजना नेशनल हाईवे से टोल हटाकर अब ऑटोमेटिक नंबर प्लेट रीडर कैमरे से टोल टैक्स वसूलने की है. अभी टोल प्लाजा पर FASTag के जरिए टैक्स काटा जाता है, लेकिन, आने वाले समय में ऑटोमेटिक नंबर प्लेट रीडर कैमरे ये काम करेंगे. कैमरे ऑटोमेटिक नंबर प्लेट को रीड करेंगे और टोल टैक्स का पैसा वाहन मालिक के बैंक अकाउंट से कट जाएगा.

पायलट प्रोजेक्ट पर काम शुरू
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने इस संबंध में जानकारी देते हुए कहा कि इस योजना पर पायलट प्रोजेक्ट के रूप में काम जारी है और इसे लागू करने के लिए कानूनी संशोधन पर भी विचार किया जाएगा. गडकरी ने कहा कि अब टोल प्लाजा को हटाने और नंबर प्लेट रीडर कैमरे लगाने की तैयारी है, जो वाहन चालकों से टोल टैक्स की वसूली करेंगे. यदि ऐसा होता है, तो टोल टैक्स की वसूली में लगने वाले समय में कमी आएगी. 

अड़चनों का भी किया जिक्र
केंद्रीय मंत्री ने बताया कि इस प्रोजेक्ट में कुछ अड़चनें भी सामने आ रही हैं, जिन्हें सुलझाने पर काम किया जा रहा है. उदाहरण के तौर पर यदि नंबर प्लेट पर नंबर के अलावा कुछ और भी लिखा है, तो कैमरे को रीड करने में दिक्कत आ सकती है. उन्होंने कहा कि इसके अलावा एक और बड़ी दिक्कत यह है कि टोल टैक्स नहीं देने वाले वाहन चालक को कैसे दंडित किया जाए? क्योंकि टोल टैक्स को स्किप करने वाले वाहन मालिक को दंडित करने का कोई कानूनी प्रावधान अभी नहीं है. इसलिए इसे भी कानून के दायरे में लाने की जरूरत है. 

तय की जाएगी समय सीमा
नितिन गडकरी ने कहा कि जिन गाड़ियों में इस तरह के नंबर प्लेट नहीं होगी, उन्हें इसे लगावाने के लिए एक निश्चित समय दिया जाएगा. बता दें कि FASTag अमल में आने के बाद टोल टैक्स में लगने वाले समय में कमी आई है. लेकिन कई जगहों पर फास्टैग रीड करने को लेकर दिक्कतें अभी भी आती रहती हैं. एक अनुमान के अनुसार, फिलहाल, हाईवे पर करीब 40000 करोड़ रुपए के कुल टोल टैक्स में 97 फीसदी कलेक्शन FASTags से हो रहा है. जबकि, तीन फीसदी टैक्स कैश या कार्ड के जरिए वसूला जा रहा है. 


हुरुन इंडिया वुमन लीडर्स लिस्ट 2026: कारोबार से खेल तक 117 महिलाओं ने बनाई खास जगह

इस वर्ष सूची में 12 श्रेणियों के तहत 117 महिलाओं को सम्मानित किया गया है. बिजनेस, स्टार्टअप, खेल, मीडिया, साहित्य और सामाजिक प्रभाव जैसे विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान देने वाली इन महिलाओं ने भारत में नेतृत्व की नई मिसाल पेश की है.

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Thursday, 30 July, 2026
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कैंडेरे बाय कल्याण ज्वेलर्स और हुरुन इंडिया ने '2026 कैंडेरे हुरुन इंडिया वुमन लीडर्स लिस्ट' का दूसरा संस्करण जारी किया है. इस वर्ष 12 श्रेणियों में 117 भारतीय महिलाओं को सम्मानित किया गया है, जिन्होंने कारोबार, नवाचार, खेल, मीडिया, साहित्य और सामाजिक बदलाव जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान दिया है.

पिछले साल के मुकाबले 21% बढ़ी सूची

2025 में जहां इस सूची में 9 श्रेणियों के तहत 97 महिलाओं को शामिल किया गया था, वहीं इस बार 12 श्रेणियों में 117 महिलाओं को जगह मिली है. यानी सम्मानित महिलाओं की संख्या में 21% की बढ़ोतरी हुई है. सूची का दायरा बढ़ाकर महिलाओं के नेतृत्व के और अधिक क्षेत्रों को शामिल किया गया है.

देश की दिग्गज हस्तियों को मिली जगह

इस सूची में किरण मजूमदार-शॉ, रोशनी नादर मल्होत्रा, फाल्गुनी नायर, निसाबा गोदरेज, सुधा मूर्ति, अनीता डोंगरे और मसाबा गुप्ता के अलावा पीवी सिंधु, साइना नेहवाल, मैरी कॉम, मनु भाकर और मीराबाई चानू जैसी खेल हस्तियां शामिल हैं. वहीं फे डिसूजा, बरखा दत्त, पालकी शर्मा उपाध्याय, ट्विंकल खन्ना, नमिता थापर, कुशा कपिला और अनन्या बिरला को भी सूची में स्थान मिला है.

39 लाख करोड़ रुपये का संयुक्त मूल्यांकन

रिपोर्ट के मुताबिक सूची में शामिल महिलाओं का संयुक्त मूल्यांकन 39 लाख करोड़ रुपये है, जो फिनलैंड की जीडीपी से भी अधिक है. सम्मानित महिलाओं की औसत आयु 48 वर्ष है. सूची में 19 वर्षीय पैरा-तीरंदाज शीतल देवी सबसे कम उम्र की, जबकि 86 वर्षीय उद्यमी रजनी बेक्टर सबसे वरिष्ठ महिला हैं.

खुद के दम पर बनाई पहचान

सूची में शामिल 117 महिलाओं में से 98 ने अपनी पहचान स्वयं बनाई है, जबकि विरासत में नेतृत्व पाने वाली महिलाओं की संख्या काफी कम है. मुंबई लगातार दूसरे वर्ष 26 सम्मानित महिलाओं के साथ देश का सबसे बड़ा महिला नेतृत्व केंद्र बना हुआ है.

इन श्रेणियों में रहा सबसे अधिक प्रतिनिधित्व

वैल्यू क्रिएशन श्रेणी में 19 महिलाओं को सम्मान मिला, जबकि वेल्थ क्रिएशन श्रेणी में 18 महिलाओं को शामिल किया गया. सबसे बड़ी श्रेणी ओलंपिक और पैरालंपिक पदक विजेताओं की रही, जिसमें 20 खिलाड़ियों को जगह मिली. इनमें 60% पैरा-एथलीट हैं.

इन महिलाओं ने अपनी-अपनी श्रेणियों में किया नेतृत्व

एचसीएलटेक की चेयरपर्सन रोशनी नादर मल्होत्रा वेल्थ मल्टीप्लायर्स श्रेणी में शीर्ष पर रहीं. हिंदुस्तान यूनिलीवर की सीईओ एवं एमडी प्रिया नायर प्रोफेशनल सीईओ श्रेणी में पहले स्थान पर हैं. अपोलो हॉस्पिटल्स की प्रीथा रेड्डी और सुनीता रेड्डी वेटरन्स श्रेणी में संयुक्त रूप से शीर्ष पर रहीं. रिन्यू पावर की वैशाली निगम सिन्हा न्यू इकोनॉमी, बीबा की मीना बिंद्रा इंडियन फैशन एंड लाइफस्टाइल, रजनी बेक्टर हार्टलैंड फाउंडर्स और सुधा मूर्ति ऑथर्स श्रेणी में शीर्ष स्थान पर हैं. पैरा निशानेबाज अवनि लेखरा ओलंपिक और पैरालंपिक मेडलिस्ट श्रेणी में सबसे आगे हैं.

कैंडेरे के प्रबंध निदेशक संजय रघुरामन ने कहा कि इस पहल का उद्देश्य ऐसी महिलाओं को सम्मानित करना है, जिनका नेतृत्व और प्रभाव भारत के भविष्य को नई दिशा दे रहा है. वहीं हुरुन इंडिया के संस्थापक एवं मुख्य शोधकर्ता अनस रहमान जुनैद ने कहा कि इस बार सूची का दायरा पहले से अधिक व्यापक किया गया है, ताकि कॉरपोरेट जगत के साथ खेल, मीडिया, साहित्य और सामाजिक परिवर्तन के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान देने वाली महिलाओं को भी समान पहचान मिल सके.
 


Eicher Motors ने Royal Enfield के आंध्र प्रदेश प्लांट के लिए 1,225 करोड़ रुपये के निवेश को दी मंजूरी, बढ़ेगी उत्पादन क्षमता

स्टॉक एक्सचेंज को दी गई नियामकीय सूचना में Eicher Motors ने कहा कि यह निवेश भविष्य में मिलने वाले दीर्घकालिक विकास अवसरों के लिए कंपनी को तैयार रखने और चरणबद्ध तरीके से उत्पादन क्षमता बढ़ाने की रणनीति का हिस्सा है.

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Thursday, 30 July, 2026
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घरेलू और वैश्विक बाजार में बढ़ती मांग को पूरा करने की तैयारी में जुटी Eicher Motors ने बड़ा निवेश करने का फैसला किया है. कंपनी के निदेशक मंडल ने Royal Enfield के आंध्र प्रदेश में बनने वाले नए ग्रीनफील्ड मैन्युफैक्चरिंग प्लांट के पहले चरण के लिए 1,225 करोड़ रुपये के निवेश को मंजूरी दे दी है. यह निवेश कंपनी की पहले घोषित 2,500 करोड़ रुपये की विस्तार योजना का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य दीर्घकालिक विकास और भविष्य की मांग के अनुरूप उत्पादन क्षमता बढ़ाना है.

29 जुलाई को मंजूर किए गए इस निवेश के तहत नए प्लांट के पहले चरण का निर्माण किया जाएगा. यह सुविधा पूरी क्षमता पर संचालित होने पर सालाना 4.5 लाख मोटरसाइकिलों का उत्पादन कर सकेगी. कंपनी का लक्ष्य वित्त वर्ष 2030 तक इस चरण को पूरा करने का है. इस परियोजना का पूरा वित्तपोषण कंपनी अपने आंतरिक संसाधनों (Internal Accruals) से करेगी.

मई में हुई थी विस्तार योजना की घोषणा

Eicher Motors ने मई में आंध्र प्रदेश में Royal Enfield का नया विनिर्माण संयंत्र स्थापित करने की घोषणा की थी. यह चरणबद्ध निवेश कार्यक्रम का हिस्सा है, जिसके जरिए कंपनी घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बढ़ती मांग को देखते हुए अपनी विनिर्माण क्षमता का विस्तार कर रही है.

15 लाख से बढ़कर होगी 24.5 लाख मोटरसाइकिल की सालाना क्षमता

वर्तमान में Royal Enfield की तमिलनाडु स्थित ओरगडम (Oragadam) और वल्लम वडागल (Vallam Vadagal) इकाइयों में कुल मिलाकर लगभग 15 लाख मोटरसाइकिलों की वार्षिक उत्पादन क्षमता है.

इसके अलावा कंपनी चेय्यार (Cheyyar) प्लांट में ब्राउनफील्ड विस्तार परियोजना पर भी काम कर रही है, जिसके वित्त वर्ष 2028 तक पूरा होने की उम्मीद है. इसके बाद तमिलनाडु की तीनों इकाइयों की संयुक्त वार्षिक उत्पादन क्षमता बढ़कर लगभग 20 लाख मोटरसाइकिल हो जाएगी.

कंपनी ने कहा कि उसकी मौजूदा उत्पादन क्षमता लगभग पूरी तरह उपयोग में आ चुकी है. ऐसे में भविष्य की मांग को पूरा करने के लिए आंध्र प्रदेश में नए प्लांट की स्थापना जरूरी हो गई है. इस प्लांट का पहला चरण शुरू होने के बाद Royal Enfield की सभी इकाइयों की कुल वार्षिक उत्पादन क्षमता बढ़कर लगभग 24.5 लाख मोटरसाइकिल हो जाएगी.

घरेलू और निर्यात कारोबार को मिलेगा बढ़ावा

कंपनी का मानना है कि आंध्र प्रदेश में बनने वाला नया संयंत्र Royal Enfield की दीर्घकालिक घरेलू और निर्यात रणनीति को मजबूती देगा. कंपनी अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अपनी मौजूदगी बढ़ाने के साथ-साथ मिड-साइज मोटरसाइकिल सेगमेंट में अपने उत्पाद पोर्टफोलियो का भी विस्तार कर रही है.

कंपनी ने क्या कहा?

स्टॉक एक्सचेंज को दी गई नियामकीय सूचना में Eicher Motors ने कहा कि यह निवेश भविष्य में मिलने वाले दीर्घकालिक विकास अवसरों के लिए कंपनी को तैयार रखने और चरणबद्ध तरीके से उत्पादन क्षमता बढ़ाने की रणनीति का हिस्सा है.
 


पतंजलि की इंश्योरेंस सेक्टर में एंट्री, मैग्मा जनरल इंश्योरेंस में ₹4,500 करोड़ की डील को IRDAI की मंजूरी

यह अधिग्रहण पतंजलि के लिए एफएमसीजी और आयुर्वेद उत्पादों से आगे बढ़कर वित्तीय सेवाओं के क्षेत्र में प्रवेश का रास्ता खोलेगा.

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Thursday, 30 July, 2026
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योग गुरु बाबा रामदेव की पतंजलि आयुर्वेद अब इंश्योरेंस कारोबार में कदम रखने जा रही है. इंश्योरेंस रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (IRDAI) ने पतंजलि आयुर्वेद और धर्मपाल सत्यपाल ग्रुप (DS Group) के मैग्मा जनरल इंश्योरेंस के अधिग्रहण को मंजूरी दे दी है. करीब ₹4,500 करोड़ की इस डील के जरिए पतंजलि फाइनेंशियल सर्विस सेक्टर में अपनी मौजूदगी बढ़ाएगी. इस अधिग्रहण के बाद पतंजलि नॉन-लाइफ इंश्योरेंस कंपनी की प्रमुख प्रमोटर बन जाएगी.

मैग्मा जनरल इंश्योरेंस में खरीदेगी 73.6% हिस्सेदारी

IRDAI की मंजूरी के बाद पतंजलि आयुर्वेद मैग्मा जनरल इंश्योरेंस में 73.6% हिस्सेदारी खरीदेगी. वहीं, रजनीगंधा पान मसाला बनाने वाला धर्मपाल सत्यपाल ग्रुप (DS Group) और अन्य निवेशक मिलकर कंपनी में 24.5% हिस्सेदारी हासिल करेंगे.

इस डील में DS Group को-इन्वेस्टर के तौर पर शामिल होगा. इसके अलावा अदार पूनावाला की सनोटी प्रॉपर्टीज, सेलका डेवलपर्स और जगुआर एडवाइजरी सर्विसेज जैसे शेयरहोल्डर्स अपनी हिस्सेदारी बेचेंगे. इससे पहले मैग्मा जनरल इंश्योरेंस में सनोटी प्रॉपर्टीज की 72.4% हिस्सेदारी थी.

फाइनेंशियल सर्विस सेक्टर में पतंजलि का विस्तार

यह अधिग्रहण पतंजलि के लिए एफएमसीजी और आयुर्वेद उत्पादों से आगे बढ़कर वित्तीय सेवाओं के क्षेत्र में प्रवेश का रास्ता खोलेगा. कंपनी की योजना मैग्मा जनरल इंश्योरेंस के प्रोडक्ट पोर्टफोलियो को बढ़ाने और देशभर में इसकी पहुंच का विस्तार करने की है.

पतंजलि के पास देशभर में मजबूत वितरण नेटवर्क है. कंपनी के उत्पाद करीब 2 लाख काउंटर्स पर उपलब्ध हैं, जिनमें रिलायंस रिटेल, हाइपर सिटी, स्टार बाजार जैसी नेशनल चेन और 250 से अधिक पतंजलि मेगा स्टोर शामिल हैं. कंपनी इस नेटवर्क का इस्तेमाल इंश्योरेंस प्रोडक्ट्स की पहुंच बढ़ाने के लिए कर सकती है.

प्रीमियम ग्रोथ में मैग्मा का बेहतर प्रदर्शन

मैग्मा जनरल इंश्योरेंस ने पिछले कुछ वर्षों में प्रीमियम कलेक्शन में मजबूत वृद्धि दर्ज की है. CareEdge Ratings के अनुसार, कंपनी का ग्रॉस डायरेक्ट प्रीमियम वित्त वर्ष 2021 से वित्त वर्ष 2025 के बीच 22% के कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट (CAGR) से बढ़कर ₹3,334 करोड़ हो गया. इस दौरान जनरल इंश्योरेंस इंडस्ट्री की औसत वृद्धि दर करीब 10% रही.

कंपनी ने वित्त वर्ष 2025 में ब्रेक-ईवन हासिल किया और ₹1 करोड़ का मुनाफा दर्ज किया, जबकि वित्त वर्ष 2024 में उसे ₹141 करोड़ का नुकसान हुआ था. वित्त वर्ष 2026 के पहले नौ महीनों में कंपनी ने ₹27 करोड़ का नेट प्रॉफिट दर्ज किया.

पतंजलि बनाएगी इंश्योरेंस कारोबार को मजबूत

IRDAI की मंजूरी की शर्तों के तहत पतंजलि कंपनी की सॉल्वेंसी और ग्रोथ को सपोर्ट करने के लिए जरूरी पूंजी निवेश करती रहेगी. 31 दिसंबर 2025 तक मैग्मा जनरल इंश्योरेंस का सॉल्वेंसी मार्जिन 1.81 गुना था, जो नियामकीय सीमा 1.50 गुना से अधिक है.

पतंजलि की योजना इंश्योरेंस कारोबार को खासतौर पर सेमी-अर्बन और ग्रामीण बाजारों तक पहुंचाने की है, जहां अभी भी बीमा सेवाओं की पहुंच सीमित है. कंपनी अपने मौजूदा ग्रामीण नेटवर्क के जरिए जनरल इंश्योरेंस प्रोडक्ट्स की बिक्री बढ़ाने पर फोकस कर सकती है.
 


Hero Realty के CMO करण कुमार का इस्तीफा, शुरू करेंगे नई एडवाइजरी फर्म

Hero Realty में अपने कार्यकाल के दौरान करण कुमार ने कंपनी की मार्केटिंग रणनीति को मजबूत करने, ब्रांड पोजिशनिंग को आगे बढ़ाने और डिजिटल मार्केटिंग क्षमताओं को विस्तार देने में अहम भूमिका निभाई.

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Thursday, 30 July, 2026
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हीरो रियलटी (Hero Realty) के चीफ मार्केटिंग ऑफिसर (CMO) करण कुमार ने कंपनी से अपना कार्यकाल पूरा कर लिया है. 25 साल से अधिक के मार्केटिंग, ब्रांड बिल्डिंग और बिजनेस ट्रांसफॉर्मेशन अनुभव वाले करण कुमार अब अपने करियर के अगले चरण की ओर बढ़ रहे हैं. वह बिजनेस ग्रोथ, मार्केटिंग ट्रांसफॉर्मेशन और लीडरशिप पर केंद्रित एक स्वतंत्र एडवाइजरी प्लेटफॉर्म शुरू करने की तैयारी कर रहे हैं.

Hero Realty में निभाई अहम भूमिका

Hero Realty में अपने कार्यकाल के दौरान करण कुमार ने कंपनी की मार्केटिंग रणनीति को मजबूत करने, ब्रांड पोजिशनिंग को आगे बढ़ाने और डिजिटल मार्केटिंग क्षमताओं को विस्तार देने में अहम भूमिका निभाई.

कंपनी से पहले वह कई प्रमुख संगठनों के साथ नेतृत्वकारी भूमिकाओं में काम कर चुके हैं, जिनमें ITC, Fabindia, DLF और ART Fertility Clinics शामिल हैं. इन संस्थानों में उन्होंने ब्रांड विकास, बिजनेस विस्तार और ट्रांसफॉर्मेशन से जुड़े महत्वपूर्ण कार्यों का नेतृत्व किया.

नई एडवाइजरी पहल की तैयारी

Hero Realty से अलग होने के बाद करण कुमार अब अपने अनुभव का इस्तेमाल व्यापक स्तर पर कंपनियों के साथ काम करने के लिए करना चाहते हैं. वह बिजनेस ग्रोथ, मार्केटिंग बदलाव और लीडरशिप डेवलपमेंट पर केंद्रित एक स्वतंत्र एडवाइजरी प्लेटफॉर्म तैयार कर रहे हैं. कंपनी और प्लेटफॉर्म से जुड़ी आगे की जानकारी और संभावित साझेदारियों का ऐलान आने वाले महीनों में किए जाने की उम्मीद है.

करण कुमार ने कही यह बात

अपने बदलाव के बारे में करण कुमार ने कहा, "मेरे करियर का सबसे संतोषजनक हिस्सा उन संगठनों की मदद करना रहा है, जो विकास और बदलाव के महत्वपूर्ण दौर से गुजर रहे थे. यह अगला चरण उन अनुभवों को व्यापक स्तर पर व्यवसायों तक पहुंचाने और ऐसे अवसरों के साथ काम करने के बारे में है, जहां मैं बड़े स्तर पर सार्थक व्यावसायिक प्रभाव पैदा कर सकूं." उनका नया कदम मार्केटिंग और बिजनेस स्ट्रैटेजी के क्षेत्र में उनके लंबे अनुभव को एक स्वतंत्र सलाहकार भूमिका में विस्तार देने की दिशा में माना जा रहा है.
 


"अब यह सिर्फ कब्जा नहीं, पूरी अधीनता है", पूर्व वित्त सचिव का वित्तीय नियामकों पर बड़ा आरोप

भारत की वित्तीय नियामक संस्थाएं अब स्वतंत्र नहीं रह गई हैं, ऐसा भारत के एक पूर्व वित्त सचिव का तर्क है. यह आरोप गंभीर है, विवादित है और इसके पीछे का सवाल सात दशक पुराना है.

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Thursday, 30 July, 2026
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पलक शाह

भारत की वित्तीय व्यवस्था में सत्ता आमतौर पर चुनाव के बाद हाथ नहीं बदलती. सरकारें आती-जाती रहती हैं. वित्त मंत्री बजट पेश करते हैं, पद छोड़ते हैं और उनकी जगह नए लोग आ जाते हैं. लेकिन बाजारों को कौन नियंत्रित करेगा, एक्सचेंजों की अध्यक्षता कौन करेगा, बैंकों की निगरानी कौन करेगा और अगली कुर्सी पर कौन बैठेगा, यह तय करने वाले लोग अक्सर उसी प्रशासनिक नेटवर्क से आते हैं. वे एक पद से रिटायर होते हैं और दूसरे पद पर फिर दिखाई देते हैं, एक-दूसरे की नियुक्तियां करते हैं और अंततः एक-दूसरे के उत्तराधिकारी बन जाते हैं.

पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग इस कहानी को अलग नजरिए से देखते हैं. उनका मानना है कि संस्थाएं सरकार के अधीन हो चुकी हैं. उनका विश्लेषण करीब 70 साल पहले से शुरू होता है.

लगभग 1957

जनवरी 1957 में भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर ने इस्तीफा दे दिया था. सर बेनेगल रामा राव ने प्रधानमंत्री को कई बार वित्त मंत्री टी.टी. कृष्णमाचारी के व्यवहार की शिकायत की थी. कृष्णमाचारी ने ऐसी नीतियों की घोषणा करनी शुरू कर दी थी, जिन पर बैंक की सहमति नहीं थी और उन्होंने सार्वजनिक रूप से संस्था की आलोचना भी की थी. रामा राव ने जवाहरलाल नेहरू से उनका समर्थन मांगा.

नेहरू ने अपने मंत्री का समर्थन किया. अपने जवाब में उन्होंने गवर्नर से कहा कि हालांकि रिजर्व बैंक को सरकार को सलाह देनी चाहिए, लेकिन यह बेतुका होगा कि वह अपने अलग उद्देश्यों के आधार पर काम करे और यह कि रिजर्व बैंक की नीतियां "स्पष्ट रूप से केंद्र सरकार की नीतियों के विपरीत नहीं हो सकतीं."

रामा राव ने 14 जनवरी 1957 को पद छोड़ दिया. इसके बाद 61 वर्षों तक किसी अन्य RBI गवर्नर ने इस्तीफा नहीं दिया.

सुभाष चंद्र गर्ग, जो 2019 तक वित्त सचिव रहे, मानते हैं कि यह बहस अब समाप्त हो चुकी है और इसका परिणाम रिजर्व बैंक के पक्ष में नहीं गया.

"अब यह केवल कब्जे (capture) की स्थिति नहीं है," वह कहते हैं. "यह पूरी तरह अधीनता की स्थिति है. पचास के दशक में कृष्णमाचारी RBI को सरकार का एक विभाग बनाना चाहते थे. अब यह हो चुका है."

यह उस व्यक्ति की ओर से दिया गया असामान्य रूप से सीधा बयान है, जिसने अपने करियर का बड़ा हिस्सा वित्त मंत्रालय के अंदर बिताया. इसे उनके पद छोड़ने की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए पढ़ना जरूरी है.

गर्ग को मार्च 2019 में वित्त सचिव नियुक्त किया गया था. जुलाई में, निर्मला सीतारमण के पहले बजट के कुछ सप्ताह बाद, उन्हें बिजली मंत्रालय भेज दिया गया. अगले दिन उन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति मांगी और 31 अक्टूबर 2019 को सरकार से बाहर हो गए. तब से उन्होंने कहा है कि वित्त मंत्री ने उनका तबादला किया था. दूसरे शब्दों में, वह एक ऐसे आलोचक हैं जिनका अपना एक इतिहास है.

वह उन बहुत कम लोगों में से भी एक हैं, जिन्होंने उस विभाग का नेतृत्व किया है जो उस व्यवस्था के केंद्र में बैठता है, जिसका वह अब वर्णन कर रहे हैं. और यह भी महत्वपूर्ण है कि उनकी व्याख्या किसी राजनीतिक पक्षधरता पर आधारित नहीं है.

1990 के दशक में जिसे ठीक करने की कोशिश की गई थी

गर्ग की शुरुआत इस बात से होती है कि वित्त मंत्रालय पहले इन सभी कामों को सीधे तौर पर करता था.

"वित्त मंत्रालय पहले लगभग इन सभी कार्यों को सीधे नियंत्रित करता था," वह कहते हैं. "कंट्रोलर ऑफ कैपिटल इश्यूज शेयर जारी करने और प्रीमियम को मंजूरी देता था. आर्थिक मामलों का विभाग सीधे स्टॉक एक्सचेंजों का प्रबंधन करता था."

1990 के दशक के सुधारों ने इसे बदला और इसके पीछे एक खास वजह थी.

जब निजी पूंजी को अनुमति दी गई, तब सरकार केवल नियम बनाने वाली संस्था नहीं रह गई थी. वह खुद भी बाजार की सबसे बड़ी भागीदारों में शामिल थी — सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों, भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) और अपनी स्वामित्व वाली कंपनियों के माध्यम से.

"सरकार के भी एक बड़े खिलाड़ी होने के कारण स्वतंत्र नियामकों की जरूरत स्वाभाविक थी," गर्ग कहते हैं. "कई नियामकों और बाजार इंफ्रास्ट्रक्चर संस्थाओं में निजी क्षेत्र के लोगों को जगह मिली. उनकी स्वतंत्रता दिखाई देनी और विश्वसनीय होनी जरूरी थी."

यही वह व्यवस्था थी, जिससे मौजूदा पैटर्न अलग होता दिखता है.

गर्ग इस बदलाव को किसी एक सरकार से नहीं जोड़ते, बल्कि इसे तीन दशकों में फैली प्रक्रिया बताते हैं, हालांकि हाल के दौर को लेकर वह स्पष्ट हैं.

"पिछले तीन दशकों में, खासकर मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद, नियामकों और बाजार इंफ्रास्ट्रक्चर संस्थाओं की गरिमा और उनकी स्वतंत्रता को एक बाधा, एक रुकावट के रूप में देखा जाने लगा है," वह कहते हैं. "इसमें कोई संदेह नहीं है कि इन सभी पदों पर सरकार के भरोसेमंद और चुने हुए अधिकारी नियुक्त किए जाते हैं."

रिकॉर्ड लंबे दौर की इस बात को ज्यादा समर्थन देता है, छोटे दौर की तुलना में. 2005 के बाद से अधिकांश समय SEBI की अध्यक्षता मौजूदा या सेवानिवृत्त नौकरशाहों ने की है और यह स्थिति अलग-अलग विचारधारा वाली सरकारों के दौरान भी रही है.

नियामक के कामकाज पर अब तक का सबसे गंभीर आंतरिक आरोप — 2010 में SEBI बोर्ड के एक सदस्य द्वारा प्रधानमंत्री को लिखे गए पत्र में लगाया गया था, जिसमें आरोप था कि बोर्ड ने अपने ही चेयरमैन को जांच से बचाने के लिए कदम उठाए — यह पत्र UPA सरकार के दौरान लिखा गया था.

यहां जो कुछ भी हुआ है, वह लंबे समय से हो रहा है और एक से अधिक सरकारों के कार्यकाल में हुआ है.

आरोप (The Charge)

गर्ग का मुख्य आरोप अधिक कठिन है और इसे किसी निष्कर्ष के बजाय एक दावे के रूप में देखा जाना चाहिए.

"मेरा मानना है कि वे सरकार की इच्छाओं को पूरा करने के लिए काम करते हैं," वह नियामकों के बारे में कहते हैं. "मैंने वित्तीय क्षेत्र के किसी भी नियामक या बाजार इंफ्रास्ट्रक्चर संस्था द्वारा एक भी स्वतंत्र रुख अपनाते नहीं देखा है. इसके विपरीत, ऐसे कई उदाहरण हैं जहां उन्होंने राजनीतिक नेतृत्व के करीब हितों से जुड़े उल्लंघनों को दबाया है."

वह इन उदाहरणों का नाम नहीं लेते.

जब उनसे पूछा गया कि व्यक्तिगत रूप से ईमानदार होने के बावजूद अधिकारी इस तरह से व्यवहार क्यों करते हैं, तो उनका जवाब दबाव की बजाय प्रशिक्षण और सोच से जुड़ा है.

"सरकारी अनुभव निश्चित रूप से किसी अधिकारी को यह समझ देता है कि सरकार कैसे काम करती है और सरकार के भीतर चीजों को कैसे आगे बढ़ाया जा सकता है," वह कहते हैं.

"दुर्भाग्य से, जिन अधिकारियों के पास निजी क्षेत्र का अनुभव नहीं है, वे इसे समझने और उसकी कमी को पूरा करने के लिए वास्तविक प्रयास नहीं करते. परिणामस्वरूप, आप उन्हें सरकार की धुन पर चलते हुए देखते हैं."

बैंक ऐसा क्यों करते हैं (Why the Banks do it)

गर्ग इस सवाल पर अधिक संतुलित नजरिया रखते हैं कि निजी बैंक अपने बोर्ड में सेवानिवृत्त अधिकारियों को क्यों नियुक्त करते हैं. उनका जवाब किसी साजिश की बजाय प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़ा है.

वह बताते हैं कि वित्तीय सेवा विभाग (Department of Financial Services) व्यवहार में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का विभाग बनकर काम करता है, भले ही उसकी बनाई नीतियां सभी बैंकों पर लागू होती हैं.

"सरकार निजी बैंकों से शायद ही कभी बात करती है. वित्त मंत्री केवल सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से मिलते हैं."

इसलिए निजी बैंक खुद के लिए सरकार तक पहुंच बनाने का रास्ता तलाशते हैं.

"निजी क्षेत्र के बैंक यह जानने के लिए कि क्या हो रहा है और कभी-कभी अपनी बात सरकार तक पहुंचाने के लिए, सरकारी अधिकारियों को अपने अंशकालिक चेयरमैन या सलाहकार के रूप में नियुक्त करना उपयोगी समझते हैं."

उनके नजरिए से यह बैंकिंग व्यवस्था को भ्रष्ट करने वाला कदम नहीं है. यह उन बैंकों का तरीका है जो ऐसे मंत्रालय के साथ काम करने की कोशिश कर रहे हैं, जो उनसे सीधे संवाद नहीं करता.

जब उनसे पूछा गया कि क्या इसका नतीजा एक ऐसी नियुक्ति व्यवस्था के रूप में सामने आता है, जहां एक पीढ़ी संस्थानों को अगली पीढ़ी को सौंपती रहती है, तो उनका जवाब एक पंक्ति में था:

"यह सेवा करियर और प्रमोशन सिस्टम का हिस्सा जैसा ही है."

दूसरा पक्ष (The Other Side)

गर्ग के नजरिए के खिलाफ एक गंभीर तर्क मौजूद है और इनमें से कुछ तर्क उन्हीं पृष्ठभूमि वाले लोगों की ओर से आते हैं.

RBI गवर्नर रह चुके IAS अधिकारी दुव्वुरी सुब्बाराव का तर्क है कि नतीजा व्यक्ति पर निर्भर करता है, उसकी पृष्ठभूमि पर नहीं. उनका कहना है कि यह तय नहीं है कि हाल में रिटायर हुआ वित्त मंत्रालय का अधिकारी सरकार के निर्देशों के आगे झुक जाएगा. सरकार के कामकाज की समझ एक संपत्ति है, जिसे अन्य चीजों के साथ संतुलित करना जरूरी है.

इसके अलावा एक व्यावहारिक समस्या भी है, जिसका गर्ग के तर्क में उल्लेख नहीं है.

किसी एक्सचेंज या डिपॉजिटरी में पब्लिक इंटरेस्ट डायरेक्टर को हितों के टकराव से मुक्त होना चाहिए. इसके कारण ब्रोकिंग, बैंकिंग, फंड मैनेजमेंट या सिक्योरिटीज कानून में काम कर चुके ज्यादातर लोग अयोग्य हो जाते हैं.

ऐसे में सेवानिवृत्त अधिकारी, शिक्षाविद और न्यायाधीश ही प्रमुख विकल्प बचते हैं और बोर्डों की संरचना भी इसी को दर्शाती है.

NSE के निदेशक मंडल में मणिपुर हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश, IIT बॉम्बे के दो प्रोफेसर और TCS तथा Egon Zehnder के पूर्व मुख्य कार्यकारी अधिकारी शामिल हैं.

NSE Clearing के बोर्ड में कोई भी सेवानिवृत्त सिविल सेवक नहीं है.

और एक असहज तथ्य यह भी है कि गर्ग खुद दो वर्षों तक आर्थिक मामलों के विभाग (Department of Economic Affairs) के सचिव और फिर वित्त सचिव के रूप में उस व्यवस्था के केंद्र में रहे थे, जिसके बारे में वह अब कहते हैं कि वह नियामकों को अधीन बना रही है. 

क्या यह सच साबित होता है (Whether it Holds)

सुधारों के मुद्दे पर गर्ग एक पूर्व सचिव के तौर पर असामान्य रूप से निराशावादी नजर आते हैं.

"कोई भी सुधार सफल नहीं हो सकता, अगर उस समय की सरकार ने सब कुछ केंद्रीकृत करने और किसी भी चीज को छोड़ने से इनकार करने का फैसला कर लिया हो," वह कहते हैं, "और व्यवस्था में बाकी सभी लोग एक खराब व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाना भी बेहद जोखिम भरा मानते हों."

जब उनसे पूछा गया कि क्या इसके बावजूद कुछ किया जा सकता है जैसे स्वतंत्र नियुक्ति समिति, पात्रता का विस्तार या लागू किए जा सकने वाले कूलिंग-ऑफ पीरियड — तो वह कोई निश्चित व्यवस्था नहीं बताते.

उनका कहना है कि असली समस्या व्यवस्था नहीं, बल्कि सोच और इच्छाशक्ति की है.

इसके बाद बात लंबे समय के नजरिए पर आती है और यही बातचीत का एकमात्र हिस्सा है जहां वह आशावादी दिखाई देते हैं.

"मेरा मानना है कि इसके नकारात्मक परिणाम किसी न किसी सरकार को इसे ठीक करने और संस्थाओं की कार्यक्षमता व स्वतंत्रता बहाल करने के लिए मजबूर करेंगे," वह कहते हैं.

"हिंदुस्तान में खुद को सुधारने की अद्भुत क्षमता है, भले ही इसमें देर लग जाए."

रिजर्व बैंक के गवर्नर के रूप में रामा राव के उत्तराधिकारी ने इस्तीफा नहीं दिया. उन्होंने समझौता किया.

इसके बाद 2018 तक कोई अन्य गवर्नर अपने कार्यकाल के पूरा होने से पहले पद से नहीं हटा.

गर्ग के अपने आकलन के अनुसार, जिस सुधार की वह उम्मीद कर रहे हैं, उसमें अभी समय लग सकता है.

1957 में क्या हुआ था (What happened in 1957)

यह सवाल कि भारत का केंद्रीय बैंक सरकार के प्रति जवाबदेह है या अपने स्वतंत्र दायित्व के प्रति, एक बार पहले ही तय हो चुका था, शुरुआती दौर में और रिजर्व बैंक के पक्ष में नहीं.

सर बेनेगल रामा राव 1949 से RBI गवर्नर थे. 1956 से वित्त मंत्री रहे टी.टी. कृष्णमाचारी के साथ उनके संबंध काफी खराब हो गए थे.

रामा राव ने कृष्णमाचारी के व्यवहार को लेकर नेहरू से एक से अधिक बार शिकायत की थी.

एक मौके पर मंत्री ने गवर्नर की मौजूदगी में ऐसी मौद्रिक नीति की घोषणा कर दी थी, जो बैंक के रुख से अलग थी.

अंतिम टकराव एक बिलों पर स्टांप ड्यूटी के मुद्दे को लेकर हुआ, जिसकी घोषणा रिजर्व बैंक की सहमति के बिना कर दी गई थी.

रामा राव ने प्रधानमंत्री से समर्थन मांगा.

नेहरू ने समर्थन देने से इनकार कर दिया. उन्होंने लिखा कि रिजर्व बैंक को नीति मामलों में सरकार को सलाह देनी चाहिए, लेकिन वह अपने अलग उद्देश्यों के आधार पर काम नहीं कर सकता और उसकी नीतियां केंद्र सरकार की नीतियों के विपरीत नहीं हो सकतीं.

रामा राव ने 14 जनवरी 1957 से प्रभावी अपना इस्तीफा दे दिया.

उन्होंने कृष्णमाचारी को लिखा कि रिजर्व बैंक पर सार्वजनिक हमलों के बाद "किसी भी आत्मसम्मान रखने वाले गवर्नर के लिए" वित्त मंत्रालय द्वारा अपेक्षित सहयोग देना संभव नहीं है.

दिसंबर 2018 में उर्जित पटेल के इस्तीफे तक वह RBI के आखिरी गवर्नर थे, जिन्होंने अपना कार्यकाल पूरा होने से पहले पद छोड़ा था.

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
 


Marvell का भारत में बड़ा निवेश, AI और सेमीकंडक्टर विकास के लिए अगले 3 साल में लगाएगी $250 मिलियन

कंपनी के मुताबिक, भारत में बढ़ाया जा रहा यह विस्तार उसके वैश्विक इनोवेशन नेटवर्क को मजबूत करेगा और AI, क्लाउड कंप्यूटिंग तथा डेटा इंफ्रास्ट्रक्चर एप्लिकेशन के लिए एडवांस्ड सेमीकंडक्टर सॉल्यूशंस के डिजाइन और विकास में मदद करेगा.

Last Modified:
Thursday, 30 July, 2026
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सेमीकंडक्टर और डेटा इंफ्रास्ट्रक्चर सॉल्यूशंस क्षेत्र की प्रमुख कंपनी Marvell Technology ने भारत में अपनी मौजूदगी बढ़ाने के लिए बड़ा निवेश करने का ऐलान किया है. कंपनी अगले तीन वर्षों में भारत में 250 मिलियन डॉलर (करीब ₹2,000 करोड़ से अधिक) का निवेश करेगी. इस निवेश का इस्तेमाल तकनीक, प्रतिभा विकास और इंफ्रास्ट्रक्चर विस्तार पर किया जाएगा. कंपनी बेंगलुरु स्थित अपनी फैसिलिटी का विस्तार करेगी और हैदराबाद में भी अपनी मौजूदगी मजबूत करेगी, जिससे AI, क्लाउड और डेटा इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी अगली पीढ़ी की सेमीकंडक्टर तकनीकों के विकास को गति मिलेगी.

भारत में दोगुनी करेगी कर्मचारियों की संख्या

Marvell ने बताया कि इस निवेश के तहत कंपनी अगले तीन वर्षों में भारत में अपने कर्मचारियों की संख्या दोगुनी करने की योजना बना रही है. इसके अलावा बेंगलुरु ऑफिस में एक नए विंग की शुरुआत की जाएगी और हैदराबाद में ऑपरेशनल क्षमता का विस्तार किया जाएगा.

कंपनी के मुताबिक, भारत में बढ़ाया जा रहा यह विस्तार उसके वैश्विक इनोवेशन नेटवर्क को मजबूत करेगा और AI, क्लाउड कंप्यूटिंग तथा डेटा इंफ्रास्ट्रक्चर एप्लिकेशन के लिए एडवांस्ड सेमीकंडक्टर सॉल्यूशंस के डिजाइन और विकास में मदद करेगा.

भारत बना Marvell का रणनीतिक इंजीनियरिंग हब

Marvell के वाइस प्रेसिडेंट और इंडिया कंट्री मैनेजर नवीन बिश्नोई ने कहा कि भारत कंपनी के लिए इंजीनियरिंग उत्कृष्टता का एक रणनीतिक केंद्र बन चुका है. उन्होंने कहा कि भारत में कंपनी की टीम दुनिया के प्रमुख हाइपरस्केलर्स और क्लाउड प्रोवाइडर्स को सपोर्ट करने वाली इंफ्रास्ट्रक्चर टेक्नोलॉजी के विकास में अहम भूमिका निभा रही है.

उन्होंने कहा कि कंपनी भारत में रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) निवेश बढ़ाने, सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम को मजबूत करने और नई तकनीकी प्रतिभाओं को तैयार करने के लिए प्रतिबद्ध है.

भारत में 20 साल पूरे कर रही कंपनी

Marvell ने वर्ष 2006 में बेंगलुरु से भारत में अपना परिचालन शुरू किया था. पिछले 20 वर्षों में भारत कंपनी का दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा R&D केंद्र बन गया है.

बेंगलुरु, पुणे और हैदराबाद स्थित Marvell की टीमें एडवांस्ड प्रोसेस टेक्नोलॉजी (2nm और उससे आगे), हाई-स्पीड एनालॉग IP, सब-सिस्टम डिजाइन, सॉफ्टवेयर/फर्मवेयर डेवलपमेंट और एंड-टू-एंड सिलिकॉन डेवलपमेंट जैसे क्षेत्रों में काम कर रही हैं.

कंपनी के मुताबिक, Marvell India के कर्मचारी कई पेटेंट विकसित कर चुके हैं और इंजीनियरिंग प्रोडक्टिविटी व इनोवेशन को बढ़ाने के लिए AI टूल्स के इस्तेमाल में भी अहम भूमिका निभा रहे हैं.

सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम को बढ़ावा देने पर फोकस

Marvell भारत के सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम को मजबूत करने के लिए विश्वविद्यालयों, स्टार्टअप्स, इंडस्ट्री एसोसिएशंस और सरकारी संस्थानों के साथ भी काम कर रही है. कंपनी विभिन्न विश्वविद्यालयों के साथ इंटर्नशिप प्रोग्राम, फैकल्टी डेवलपमेंट, संयुक्त रिसर्च प्रोजेक्ट्स और नए पाठ्यक्रमों के विकास पर सहयोग कर रही है, ताकि छात्रों को एडवांस्ड टेक्नोलॉजी क्षेत्र में करियर के लिए तैयार किया जा सके. इसके अलावा कंपनी उभरते हुए स्टार्टअप्स के साथ मेंटरशिप और रणनीतिक साझेदारी के जरिए भी काम कर रही है.

Marvell Scholarship Program से तैयार होगी नई टेक्नोलॉजी टैलेंट

कार्यक्रम के दौरान Marvell ने अपने **Marvell Scholarship for Technical and Engineering Merit (MSTEM)** प्रोग्राम को भी रेखांकित किया. इस पहल का उद्देश्य AI और सेमीकंडक्टर क्षेत्र के लिए भविष्य की इंजीनियरिंग प्रतिभाओं को तैयार करना है.

इस साल शुरू किए गए MSTEM प्रोग्राम के तहत इलेक्ट्रॉनिक्स, इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग और कंप्यूटर साइंस की पढ़ाई कर रहे छात्रों को वित्तीय सहायता, इंडस्ट्री एक्सपोजर और वास्तविक तकनीकी अनुभव उपलब्ध कराया जा रहा है.

कंपनी के अनुसार, इस प्रोग्राम के लिए भारत के प्रमुख विश्वविद्यालयों से 7,000 से अधिक आवेदन मिले थे, जिनमें से 100 प्रतिभाशाली छात्रों को स्कॉलरशिप के लिए चुना गया है. यह पहल भारत में सेमीकंडक्टर और AI इनोवेशन के लिए मजबूत टैलेंट पाइपलाइन तैयार करने की दिशा में एक कदम है.
 


Meta का Q2 प्रदर्शन: विज्ञापन से बढ़ी कमाई, लेकिन AI खर्च ने घटाया मुनाफा

मेटा ने अप्रैल-जून तिमाही में 60.8 अरब डॉलर का राजस्व दर्ज किया, जो पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 28% अधिक है. यह आंकड़ा विश्लेषकों के 60.19 अरब डॉलर के अनुमान से भी ज्यादा रहा.

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Thursday, 30 July, 2026
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फेसबुक की पैरेंट कंपनी मेटा प्लेटफॉर्म्स (Meta Platforms) ने वित्त वर्ष 2026 की दूसरी तिमाही में उम्मीद से बेहतर राजस्व दर्ज किया, लेकिन बढ़ते आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) निवेश, कानूनी खर्च और कर्मचारियों पर बढ़े खर्च के चलते मुनाफा बाजार अनुमान से नीचे रहा. कंपनी की आय में मजबूत विज्ञापन कारोबार का बड़ा योगदान रहा, हालांकि खर्च में तेज बढ़ोतरी से निवेशकों की चिंता बढ़ गई. 

राजस्व उम्मीद से बेहतर, मुनाफा रहा कमजोर

मेटा ने अप्रैल-जून तिमाही में 60.8 अरब डॉलर का राजस्व दर्ज किया, जो पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 28% अधिक है. यह आंकड़ा विश्लेषकों के 60.19 अरब डॉलर के अनुमान से भी ज्यादा रहा. कंपनी की आय में डिजिटल विज्ञापन और नए कारोबारों से बढ़ते योगदान की अहम भूमिका रही. हालांकि, कंपनी की एडजस्टेड आय प्रति शेयर (EPS) 6.18 डॉलर रही, जबकि बाजार का अनुमान 7.17 डॉलर प्रति शेयर का था. खर्च में तेज बढ़ोतरी के कारण मुनाफे पर दबाव देखने को मिला.

AI निवेश से बढ़ा खर्च

मेटा का शुद्ध मुनाफा दूसरी तिमाही में 14% घटकर 15.85 अरब डॉलर रह गया, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह 18.34 अरब डॉलर था. प्रति शेयर आय भी पिछले साल के 7.14 डॉलर से घटकर 6.18 डॉलर रह गई.

कंपनी का कुल खर्च 55% बढ़कर 42 अरब डॉलर पहुंच गया. इसमें 2.4 अरब डॉलर का कानूनी खर्च और 1.2 अरब डॉलर का कर्मचारियों से जुड़ा सेवरेंस खर्च शामिल है. इसके अलावा AI विशेषज्ञों की नियुक्ति और कंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर पर भी कंपनी ने भारी निवेश किया है.

मेटा ने तिमाही के दौरान पूंजीगत खर्च (Capital Expenditure) के रूप में 31.1 अरब डॉलर खर्च किए, जिससे उसकी AI क्षमता बढ़ाने की योजना को बल मिलता है.

विज्ञापन कारोबार ने दिया सहारा

मेटा के मुख्य ऐप कारोबार, जिसमें फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सऐप शामिल हैं, से राजस्व 28% बढ़कर 60.4 अरब डॉलर हो गया. कंपनी का विज्ञापन राजस्व 27% बढ़कर 59.4 अरब डॉलर पहुंच गया. विज्ञापन इंप्रेशन में 14% और प्रति विज्ञापन औसत कीमत में 12% की बढ़ोतरी दर्ज की गई.

कंपनी ने विज्ञापन के अलावा अन्य आय स्रोतों में भी बढ़ोतरी दर्ज की. फैमिली ऑफ ऐप्स सेगमेंट में 'अन्य राजस्व' 73% बढ़कर 1 अरब डॉलर हो गया, जिसमें व्हाट्सऐप पेड मैसेजिंग और सब्सक्रिप्शन सेवाओं का योगदान रहा.

Reality Labs का राजस्व बढ़ा

मेटा की वर्चुअल और ऑगमेंटेड रियलिटी यूनिट Reality Labs का राजस्व 16% बढ़कर 431 मिलियन डॉलर हो गया. हालांकि, कंपनी के विज्ञापन कारोबार की तुलना में यह अभी भी छोटा हिस्सा है.

बढ़ाया खर्च का अनुमान

मेटा ने तीसरी तिमाही के लिए 61 अरब डॉलर से 64 अरब डॉलर के बीच राजस्व का अनुमान जताया है. कंपनी के मुताबिक, यह पिछले साल की तुलना में करीब 20-30% की वृद्धि को दर्शाता है. वित्त वर्ष 2026 के लिए मेटा ने अपने कुल खर्च का अनुमान बढ़ाकर 165 अरब डॉलर से 169 अरब डॉलर कर दिया है. कंपनी ने पूंजीगत खर्च (Capex) का अनुमान भी बढ़ाकर 130 अरब डॉलर से 145 अरब डॉलर कर दिया है, जबकि पहले यह अनुमान 125 अरब डॉलर से 145 अरब डॉलर था.

जुकरबर्ग बोले- AI से मजबूत हो रहे हैं प्रोडक्ट्स

मेटा के सीईओ मार्क जुकरबर्ग ने कहा कि AI कंपनी के प्रमुख प्रोडक्ट्स को बेहतर बना रहा है और विज्ञापनदाताओं को बेहतर परिणाम हासिल करने में मदद कर रहा है.

जुकरबर्ग के मुताबिक, दूसरी तिमाही में मेटा के ऐप्स का इस्तेमाल करने वाले दैनिक यूजर्स की संख्या 3.6 अरब रही. इंस्टाग्राम के दैनिक सक्रिय यूजर्स 2 अरब तक पहुंच गए हैं, जबकि Threads के मासिक सक्रिय यूजर्स 50 करोड़ से अधिक हो गए हैं.

उन्होंने कहा कि मेटा का लक्ष्य "सुपरइंटेलिजेंस को सीधे लोगों तक पहुंचाना" है और कंपनी की कंप्यूटिंग क्षमता की मांग अभी भी उपलब्ध आपूर्ति से अधिक बनी हुई है.

मेटा की CFO सुसान ली ने कहा कि कंपनी का बड़ा यूजर बेस AI क्षेत्र में उसे प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त देता है. उनके अनुसार, AI तकनीक के तेजी से विस्तार के बीच इंडस्ट्री ने कंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर में अब तक जरूरत के मुकाबले कम निवेश किया है.
 


वित्त वर्ष 2025-26 में टोल से रिकॉर्ड कमाई, ₹70,278 करोड़ पहुंचा कलेक्शन, यूपी सबसे आगे

देशभर में भी टोल वसूली में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है. वित्त वर्ष 2025-26 में राष्ट्रीय राजमार्गों से कुल टोल कलेक्शन बढ़कर ₹70,278.18 करोड़ पहुंच गया.

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Thursday, 30 July, 2026
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उत्तर प्रदेश ने टोल टैक्स वसूली के मामले में देश के सभी राज्यों को पीछे छोड़ दिया है. वित्त वर्ष 2025-26 में राज्य ने राष्ट्रीय राजमार्गों और एक्सप्रेसवे से रिकॉर्ड ₹8,862.12 करोड़ का टोल कलेक्शन किया है. केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी की ओर से राज्यसभा में साझा किए गए आंकड़ों के मुताबिक, यूपी ने राजस्थान, महाराष्ट्र और गुजरात जैसे बड़े राज्यों को पीछे छोड़ते हुए पहला स्थान हासिल किया है. राज्य में तेजी से बढ़ते एक्सप्रेसवे नेटवर्क और वाहनों की आवाजाही में बढ़ोतरी को इस रिकॉर्ड कलेक्शन की प्रमुख वजह माना जा रहा है.

टोल वसूली में राजस्थान दूसरे स्थान पर

नितिन गडकरी द्वारा दिए गए आंकड़ों के अनुसार, टोल कलेक्शन के मामले में राजस्थान ₹7,317.51 करोड़ के संग्रह के साथ दूसरे स्थान पर रहा. इसके बाद महाराष्ट्र तीसरे, गुजरात चौथे और कर्नाटक पांचवें स्थान पर रहे.

यूपी में बढ़ा एक्सप्रेसवे नेटवर्क

उत्तर प्रदेश में टोल राजस्व बढ़ने की बड़ी वजह राज्य में राष्ट्रीय राजमार्गों और एक्सप्रेसवे नेटवर्क का विस्तार है. राज्य में वर्तमान में 141 टोल प्लाजा संचालित हो रहे हैं, जो देश में दूसरे सबसे ज्यादा हैं. टोल प्लाजा की संख्या के मामले में राजस्थान 172 टोल प्लाजा के साथ पहले स्थान पर है. इसके बाद महाराष्ट्र में 105, मध्य प्रदेश में 98 और कर्नाटक में 68 टोल प्लाजा हैं.

देशभर में टोल कलेक्शन ने बनाया रिकॉर्ड

देशभर में भी टोल वसूली में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है. वित्त वर्ष 2025-26 में राष्ट्रीय राजमार्गों से कुल टोल कलेक्शन बढ़कर ₹70,278.18 करोड़ पहुंच गया, जबकि वित्त वर्ष 2024-25 में यह आंकड़ा ₹61,408.15 करोड़ था. इसमें निजी वाहनों के लिए शुरू की गई एनुअल पास स्कीम से मिले ₹1,795.18 करोड़ भी शामिल हैं.

रोड इंफ्रास्ट्रक्चर विस्तार से बढ़ा राजस्व

केंद्र सरकार के मुताबिक, देश में सड़क बुनियादी ढांचे के विस्तार, नए एक्सप्रेसवे के निर्माण और राष्ट्रीय राजमार्गों पर वाहनों की बढ़ती संख्या के कारण टोल राजस्व में लगातार वृद्धि हो रही है. उत्तर प्रदेश में भी यमुना एक्सप्रेसवे, पूर्वांचल एक्सप्रेसवे, बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स के विस्तार से टोल आय में तेजी आई है.
 


ऑटो कंपोनेंट बिजनेस में L&T की एंट्री, अगले 5 साल में ₹5,000 करोड़ निवेश करेगी कंपनी

L&T का अनुमान है कि जिस औद्योगिक बी2बी इलेक्ट्रॉनिक्स बाजार को वह लक्ष्य बना रही है, उसका आकार फिलहाल करीब 2 अरब डॉलर है, जो 2031 तक बढ़कर 4.85 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है.

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Thursday, 30 July, 2026
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इंजीनियरिंग एवं इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र की दिग्गज कंपनी लार्सन एंड टुब्रो (L&T) ने ऑटो कंपोनेंट और इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) टेक्नोलॉजी कारोबार में बड़ा कदम उठाया है. कंपनी अगले पांच वर्षों में ₹5,000 करोड़ का निवेश कर तमिलनाडु में अत्याधुनिक विनिर्माण केंद्र स्थापित करेगी. इस केंद्र में ईवी मोटर, एडवांस्ड सेफ्टी सिस्टम और कनेक्टेड व्हीकल टेक्नोलॉजी का निर्माण किया जाएगा. L&T का मानना है कि तेजी से बढ़ते ऑटो इलेक्ट्रॉनिक्स बाजार में यह निवेश कंपनी की नई ग्रोथ रणनीति का अहम हिस्सा साबित होगा.

ऑटो इलेक्ट्रॉनिक्स कारोबार में बढ़ाएगी मौजूदगी

यह निवेश L&T के इलेक्ट्रॉनिक प्रोडक्ट्स एंड सिस्टम्स (EPS) बिजनेस के जरिए किया जाएगा. कंपनी की 'लक्ष्य 31' रणनीति के तहत मोबिलिटी, पावर इलेक्ट्रॉनिक्स, रोबोटिक्स, ऑटोमेशन और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम डिजाइन एवं मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों पर फोकस बढ़ाया जा रहा है. EPS ग्रुप के प्रमुख प्रशांत जैन ने कहा कि यह कंपनी के लिए नया कारोबार नहीं, बल्कि उसकी इंजीनियरिंग विशेषज्ञता का स्वाभाविक विस्तार है.

2031 तक दोगुना होगा बाजार

L&T का अनुमान है कि जिस औद्योगिक बी2बी इलेक्ट्रॉनिक्स बाजार को वह लक्ष्य बना रही है, उसका आकार फिलहाल करीब 2 अरब डॉलर है, जो 2031 तक बढ़कर 4.85 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है. कंपनी इस बाजार में 10-15% हिस्सेदारी हासिल करने का लक्ष्य लेकर चल रही है.

R&D और नई तकनीकों पर होगा खर्च

₹5,000 करोड़ का निवेश अगले पांच वर्षों में मैन्युफैक्चरिंग, रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D), टेक्नोलॉजी लाइसेंसिंग और टेस्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर पर किया जाएगा. कंपनी का उद्देश्य बौद्धिक संपदा (IP) आधारित इलेक्ट्रॉनिक्स कारोबार को मजबूत करना और भविष्य की ऑटोमोबाइल टेक्नोलॉजी में अपनी पकड़ बनाना है.

मिला पहला बड़ा ऑर्डर

L&T के मोबिलिटी बिजनेस को पहला कमर्शियल ऑर्डर भी मिल चुका है. कंपनी अगले तीन वर्षों में एक दोपहिया वाहन निर्माता को 5 लाख इलेक्ट्रिक ट्रैक्शन मोटर की आपूर्ति करेगी. इन मोटरों का बड़े पैमाने पर उत्पादन अगले महीने से कोयंबटूर स्थित संयंत्र में शुरू होगा. यह मोटर इजरायल की EVR Motors की लाइसेंसी तकनीक पर आधारित हैं, जिनमें बेहतर टॉर्क डेंसिटी और कम मटेरियल उपयोग जैसी विशेषताएं हैं.

ADAS टेक्नोलॉजी पर भी फोकस

कंपनी भारतीय बाजार के लिए एडवांस्ड ड्राइवर असिस्टेंस सिस्टम (ADAS) को किफायती बनाने की दिशा में भी काम कर रही है. L&T का मानना है कि फिलहाल देश की करीब 80% गाड़ियों में ड्राइवर-असिस्टेंस सिस्टम नहीं है, जबकि 2027 से कमर्शियल वाहनों में ऑटोमैटिक इमरजेंसी ब्रेकिंग (AEB) जैसे फीचर अनिवार्य होने की संभावना है. ऐसे में ऑटो इलेक्ट्रॉनिक्स और सेफ्टी टेक्नोलॉजी का बाजार आने वाले वर्षों में तेजी से बढ़ सकता है.
 


कल 889 अंक उछला था सेंसेक्स, निवेशकों ने कमाए ₹4 लाख करोड़, जानें आज किन शेयरों पर रहेगी नजर?

बुधवार को BSE सेंसेक्स 888.68 अंक यानी 1.16% की बढ़त के साथ 77,654.60 अंक पर बंद हुआ. वहीं, NSE निफ्टी 264.85 अंक यानी 1.10% चढ़कर 24,250.20 के स्तर पर पहुंच गया.

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Thursday, 30 July, 2026
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घरेलू शेयर बाजार ने बुधवार को शानदार तेजी के साथ कारोबार का समापन किया था. आईटी और एफएमसीजी शेयरों में जोरदार खरीदारी के दम पर बीएसई सेंसेक्स 888.68 अंक चढ़ा, जबकि निवेशकों की संपत्ति में करीब ₹4 लाख करोड़ का इजाफा हुआ. अब गुरुवार के कारोबार में निवेशकों की नजर वैश्विक संकेतों, कच्चे तेल की कीमतों और PNB, NBCC, BHEL समेत कई कंपनियों से जुड़े बड़े घटनाक्रमों पर रहेगी. ऐसे में जानिए, बुधवार को बाजार का प्रदर्शन कैसा रहा और आज किन शेयरों पर फोकस रहेगा.

बुधवार को बाजार में रही दमदार तेजी

बुधवार को बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) सेंसेक्स 888.68 अंक यानी 1.16% की बढ़त के साथ 77,654.60 अंक पर बंद हुआ. वहीं, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) निफ्टी 264.85 अंक यानी 1.10% चढ़कर 24,250.20 के स्तर पर पहुंच गया. कारोबार के दौरान सेंसेक्स 900 अंक से अधिक उछला था. डॉलर के मुकाबले रुपया भी 0.2% मजबूत होकर 95.6475 पर बंद हुआ, जबकि पिछले कारोबारी सत्र में यह 95.8525 पर बंद हुआ था.

₹4 लाख करोड़ बढ़ी निवेशकों की संपत्ति

बाजार में तेजी के चलते बीएसई में सूचीबद्ध कंपनियों का कुल मार्केट कैप करीब ₹4 लाख करोड़ बढ़कर 483 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया. सेंसेक्स की 30 में से 25 कंपनियों के शेयर बढ़त के साथ बंद हुए, जिससे निवेशकों की संपत्ति में बड़ा इजाफा हुआ.

IT और FMCG शेयरों ने दिखाई मजबूती

बुधवार के कारोबार में हिंदुस्तान यूनिलीवर 4.7% की तेजी के साथ सबसे बड़ा गेनर रहा. इसके अलावा इंफोसिस, ट्रेंट, लार्सन एंड टुब्रो, टाटा स्टील, भारती एयरटेल, टीसीएस, एचडीएफसी बैंक, एचसीएल टेक और कोटक महिंद्रा बैंक के शेयरों में भी अच्छी खरीदारी देखने को मिली. दूसरी ओर, अडानी पोर्ट्स, महिंद्रा एंड महिंद्रा, पावर ग्रिड, भारत इलेक्ट्रॉनिक्स (BEL) और एनटीपीसी के शेयर गिरावट के साथ बंद हुए.

ब्रॉडर मार्केट में भी रही खरीदारी

निफ्टी मिडकैप इंडेक्स 0.82% और निफ्टी स्मॉलकैप इंडेक्स 1.48% की बढ़त के साथ बंद हुए. सेक्टोरल इंडेक्स में आईटी, मेटल और एफएमसीजी सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाले सेक्टर रहे, जबकि रियल्टी और ऑटो इंडेक्स दबाव में रहे.

कच्चे तेल में तेजी ने बढ़ाई चिंता

बाजार में तेजी के बीच पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने निवेशकों की चिंता भी बढ़ाई. अमेरिकी जवाबी कार्रवाई के बाद ऊर्जा आपूर्ति को लेकर आशंकाएं तेज हुईं, जिससे कारोबार के दौरान ब्रेंट क्रूड करीब 5% उछलकर 88 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया. हालांकि शुरुआती कारोबार में यह 84 डॉलर प्रति बैरल के आसपास था.

आज इन शेयरों पर रहेगी नजर

बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, गुरुवार के कारोबार में कई शेयर निवेशकों के रडार पर रहेंगे. पंजाब नेशनल बैंक (PNB) के बोर्ड ने GIFT City स्थित IFSC बैंकिंग यूनिट के जरिए मीडियम टर्म नोट (MTN) प्रोग्राम के तहत 1.5 अरब डॉलर तक विदेशी फंड जुटाने को मंजूरी दी है. वहीं, एनबीसीसी (NBCC) ने सेशेल्स सरकार के साथ 7.5 करोड़ डॉलर की हाउसिंग परियोजना का करार किया है. भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (BHEL) को नाइजीरिया की डांगोटे पेट्रोलियम रिफाइनरी से आठ गैस टर्बाइन जनरेटर पैकेज की सप्लाई का बड़ा ऑर्डर मिला है.

इसके अलावा विक्रान इंजीनियरिंग ने अरुणाचल प्रदेश में 132 केवी मियाओ-नामसाई ट्रांसमिशन लाइन का सफल संचालन शुरू किया है. वहीं, मैपल इंफ्रास्ट्रक्चर ट्रस्ट में इन्वेस्टेक इंडिया फंड मैनेजमेंट ने 20.75 लाख यूनिट खरीदी हैं. टीआईएल (TIL) में सिंगुलैरिटी इक्विटी फंड-I ने 5.26 लाख शेयर खरीदे हैं, जबकि महान एक्सिम्प और सालगर्न मर्चेंट्स ने अपनी हिस्सेदारी बेची है. इन सभी घटनाक्रमों के चलते आज इन शेयरों पर बाजार की खास नजर रहेगी. 

(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)