भारत की वित्तीय नियामक संस्थाएं अब स्वतंत्र नहीं रह गई हैं, ऐसा भारत के एक पूर्व वित्त सचिव का तर्क है. यह आरोप गंभीर है, विवादित है और इसके पीछे का सवाल सात दशक पुराना है.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
पलक शाह
भारत की वित्तीय व्यवस्था में सत्ता आमतौर पर चुनाव के बाद हाथ नहीं बदलती. सरकारें आती-जाती रहती हैं. वित्त मंत्री बजट पेश करते हैं, पद छोड़ते हैं और उनकी जगह नए लोग आ जाते हैं. लेकिन बाजारों को कौन नियंत्रित करेगा, एक्सचेंजों की अध्यक्षता कौन करेगा, बैंकों की निगरानी कौन करेगा और अगली कुर्सी पर कौन बैठेगा, यह तय करने वाले लोग अक्सर उसी प्रशासनिक नेटवर्क से आते हैं. वे एक पद से रिटायर होते हैं और दूसरे पद पर फिर दिखाई देते हैं, एक-दूसरे की नियुक्तियां करते हैं और अंततः एक-दूसरे के उत्तराधिकारी बन जाते हैं.
पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग इस कहानी को अलग नजरिए से देखते हैं. उनका मानना है कि संस्थाएं सरकार के अधीन हो चुकी हैं. उनका विश्लेषण करीब 70 साल पहले से शुरू होता है.
लगभग 1957
जनवरी 1957 में भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर ने इस्तीफा दे दिया था. सर बेनेगल रामा राव ने प्रधानमंत्री को कई बार वित्त मंत्री टी.टी. कृष्णमाचारी के व्यवहार की शिकायत की थी. कृष्णमाचारी ने ऐसी नीतियों की घोषणा करनी शुरू कर दी थी, जिन पर बैंक की सहमति नहीं थी और उन्होंने सार्वजनिक रूप से संस्था की आलोचना भी की थी. रामा राव ने जवाहरलाल नेहरू से उनका समर्थन मांगा.
नेहरू ने अपने मंत्री का समर्थन किया. अपने जवाब में उन्होंने गवर्नर से कहा कि हालांकि रिजर्व बैंक को सरकार को सलाह देनी चाहिए, लेकिन यह बेतुका होगा कि वह अपने अलग उद्देश्यों के आधार पर काम करे और यह कि रिजर्व बैंक की नीतियां "स्पष्ट रूप से केंद्र सरकार की नीतियों के विपरीत नहीं हो सकतीं."
रामा राव ने 14 जनवरी 1957 को पद छोड़ दिया. इसके बाद 61 वर्षों तक किसी अन्य RBI गवर्नर ने इस्तीफा नहीं दिया.
सुभाष चंद्र गर्ग, जो 2019 तक वित्त सचिव रहे, मानते हैं कि यह बहस अब समाप्त हो चुकी है और इसका परिणाम रिजर्व बैंक के पक्ष में नहीं गया.
"अब यह केवल कब्जे (capture) की स्थिति नहीं है," वह कहते हैं. "यह पूरी तरह अधीनता की स्थिति है. पचास के दशक में कृष्णमाचारी RBI को सरकार का एक विभाग बनाना चाहते थे. अब यह हो चुका है."
यह उस व्यक्ति की ओर से दिया गया असामान्य रूप से सीधा बयान है, जिसने अपने करियर का बड़ा हिस्सा वित्त मंत्रालय के अंदर बिताया. इसे उनके पद छोड़ने की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए पढ़ना जरूरी है.
गर्ग को मार्च 2019 में वित्त सचिव नियुक्त किया गया था. जुलाई में, निर्मला सीतारमण के पहले बजट के कुछ सप्ताह बाद, उन्हें बिजली मंत्रालय भेज दिया गया. अगले दिन उन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति मांगी और 31 अक्टूबर 2019 को सरकार से बाहर हो गए. तब से उन्होंने कहा है कि वित्त मंत्री ने उनका तबादला किया था. दूसरे शब्दों में, वह एक ऐसे आलोचक हैं जिनका अपना एक इतिहास है.
वह उन बहुत कम लोगों में से भी एक हैं, जिन्होंने उस विभाग का नेतृत्व किया है जो उस व्यवस्था के केंद्र में बैठता है, जिसका वह अब वर्णन कर रहे हैं. और यह भी महत्वपूर्ण है कि उनकी व्याख्या किसी राजनीतिक पक्षधरता पर आधारित नहीं है.
1990 के दशक में जिसे ठीक करने की कोशिश की गई थी
गर्ग की शुरुआत इस बात से होती है कि वित्त मंत्रालय पहले इन सभी कामों को सीधे तौर पर करता था.
"वित्त मंत्रालय पहले लगभग इन सभी कार्यों को सीधे नियंत्रित करता था," वह कहते हैं. "कंट्रोलर ऑफ कैपिटल इश्यूज शेयर जारी करने और प्रीमियम को मंजूरी देता था. आर्थिक मामलों का विभाग सीधे स्टॉक एक्सचेंजों का प्रबंधन करता था."
1990 के दशक के सुधारों ने इसे बदला और इसके पीछे एक खास वजह थी.
जब निजी पूंजी को अनुमति दी गई, तब सरकार केवल नियम बनाने वाली संस्था नहीं रह गई थी. वह खुद भी बाजार की सबसे बड़ी भागीदारों में शामिल थी — सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों, भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) और अपनी स्वामित्व वाली कंपनियों के माध्यम से.
"सरकार के भी एक बड़े खिलाड़ी होने के कारण स्वतंत्र नियामकों की जरूरत स्वाभाविक थी," गर्ग कहते हैं. "कई नियामकों और बाजार इंफ्रास्ट्रक्चर संस्थाओं में निजी क्षेत्र के लोगों को जगह मिली. उनकी स्वतंत्रता दिखाई देनी और विश्वसनीय होनी जरूरी थी."
यही वह व्यवस्था थी, जिससे मौजूदा पैटर्न अलग होता दिखता है.
गर्ग इस बदलाव को किसी एक सरकार से नहीं जोड़ते, बल्कि इसे तीन दशकों में फैली प्रक्रिया बताते हैं, हालांकि हाल के दौर को लेकर वह स्पष्ट हैं.
"पिछले तीन दशकों में, खासकर मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद, नियामकों और बाजार इंफ्रास्ट्रक्चर संस्थाओं की गरिमा और उनकी स्वतंत्रता को एक बाधा, एक रुकावट के रूप में देखा जाने लगा है," वह कहते हैं. "इसमें कोई संदेह नहीं है कि इन सभी पदों पर सरकार के भरोसेमंद और चुने हुए अधिकारी नियुक्त किए जाते हैं."
रिकॉर्ड लंबे दौर की इस बात को ज्यादा समर्थन देता है, छोटे दौर की तुलना में. 2005 के बाद से अधिकांश समय SEBI की अध्यक्षता मौजूदा या सेवानिवृत्त नौकरशाहों ने की है और यह स्थिति अलग-अलग विचारधारा वाली सरकारों के दौरान भी रही है.
नियामक के कामकाज पर अब तक का सबसे गंभीर आंतरिक आरोप — 2010 में SEBI बोर्ड के एक सदस्य द्वारा प्रधानमंत्री को लिखे गए पत्र में लगाया गया था, जिसमें आरोप था कि बोर्ड ने अपने ही चेयरमैन को जांच से बचाने के लिए कदम उठाए — यह पत्र UPA सरकार के दौरान लिखा गया था.
यहां जो कुछ भी हुआ है, वह लंबे समय से हो रहा है और एक से अधिक सरकारों के कार्यकाल में हुआ है.
आरोप (The Charge)
गर्ग का मुख्य आरोप अधिक कठिन है और इसे किसी निष्कर्ष के बजाय एक दावे के रूप में देखा जाना चाहिए.
"मेरा मानना है कि वे सरकार की इच्छाओं को पूरा करने के लिए काम करते हैं," वह नियामकों के बारे में कहते हैं. "मैंने वित्तीय क्षेत्र के किसी भी नियामक या बाजार इंफ्रास्ट्रक्चर संस्था द्वारा एक भी स्वतंत्र रुख अपनाते नहीं देखा है. इसके विपरीत, ऐसे कई उदाहरण हैं जहां उन्होंने राजनीतिक नेतृत्व के करीब हितों से जुड़े उल्लंघनों को दबाया है."
वह इन उदाहरणों का नाम नहीं लेते.
जब उनसे पूछा गया कि व्यक्तिगत रूप से ईमानदार होने के बावजूद अधिकारी इस तरह से व्यवहार क्यों करते हैं, तो उनका जवाब दबाव की बजाय प्रशिक्षण और सोच से जुड़ा है.
"सरकारी अनुभव निश्चित रूप से किसी अधिकारी को यह समझ देता है कि सरकार कैसे काम करती है और सरकार के भीतर चीजों को कैसे आगे बढ़ाया जा सकता है," वह कहते हैं.
"दुर्भाग्य से, जिन अधिकारियों के पास निजी क्षेत्र का अनुभव नहीं है, वे इसे समझने और उसकी कमी को पूरा करने के लिए वास्तविक प्रयास नहीं करते. परिणामस्वरूप, आप उन्हें सरकार की धुन पर चलते हुए देखते हैं."
बैंक ऐसा क्यों करते हैं (Why the Banks do it)
गर्ग इस सवाल पर अधिक संतुलित नजरिया रखते हैं कि निजी बैंक अपने बोर्ड में सेवानिवृत्त अधिकारियों को क्यों नियुक्त करते हैं. उनका जवाब किसी साजिश की बजाय प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़ा है.
वह बताते हैं कि वित्तीय सेवा विभाग (Department of Financial Services) व्यवहार में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का विभाग बनकर काम करता है, भले ही उसकी बनाई नीतियां सभी बैंकों पर लागू होती हैं.
"सरकार निजी बैंकों से शायद ही कभी बात करती है. वित्त मंत्री केवल सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से मिलते हैं."
इसलिए निजी बैंक खुद के लिए सरकार तक पहुंच बनाने का रास्ता तलाशते हैं.
"निजी क्षेत्र के बैंक यह जानने के लिए कि क्या हो रहा है और कभी-कभी अपनी बात सरकार तक पहुंचाने के लिए, सरकारी अधिकारियों को अपने अंशकालिक चेयरमैन या सलाहकार के रूप में नियुक्त करना उपयोगी समझते हैं."
उनके नजरिए से यह बैंकिंग व्यवस्था को भ्रष्ट करने वाला कदम नहीं है. यह उन बैंकों का तरीका है जो ऐसे मंत्रालय के साथ काम करने की कोशिश कर रहे हैं, जो उनसे सीधे संवाद नहीं करता.
जब उनसे पूछा गया कि क्या इसका नतीजा एक ऐसी नियुक्ति व्यवस्था के रूप में सामने आता है, जहां एक पीढ़ी संस्थानों को अगली पीढ़ी को सौंपती रहती है, तो उनका जवाब एक पंक्ति में था:
"यह सेवा करियर और प्रमोशन सिस्टम का हिस्सा जैसा ही है."
दूसरा पक्ष (The Other Side)
गर्ग के नजरिए के खिलाफ एक गंभीर तर्क मौजूद है और इनमें से कुछ तर्क उन्हीं पृष्ठभूमि वाले लोगों की ओर से आते हैं.
RBI गवर्नर रह चुके IAS अधिकारी दुव्वुरी सुब्बाराव का तर्क है कि नतीजा व्यक्ति पर निर्भर करता है, उसकी पृष्ठभूमि पर नहीं. उनका कहना है कि यह तय नहीं है कि हाल में रिटायर हुआ वित्त मंत्रालय का अधिकारी सरकार के निर्देशों के आगे झुक जाएगा. सरकार के कामकाज की समझ एक संपत्ति है, जिसे अन्य चीजों के साथ संतुलित करना जरूरी है.
इसके अलावा एक व्यावहारिक समस्या भी है, जिसका गर्ग के तर्क में उल्लेख नहीं है.
किसी एक्सचेंज या डिपॉजिटरी में पब्लिक इंटरेस्ट डायरेक्टर को हितों के टकराव से मुक्त होना चाहिए. इसके कारण ब्रोकिंग, बैंकिंग, फंड मैनेजमेंट या सिक्योरिटीज कानून में काम कर चुके ज्यादातर लोग अयोग्य हो जाते हैं.
ऐसे में सेवानिवृत्त अधिकारी, शिक्षाविद और न्यायाधीश ही प्रमुख विकल्प बचते हैं और बोर्डों की संरचना भी इसी को दर्शाती है.
NSE के निदेशक मंडल में मणिपुर हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश, IIT बॉम्बे के दो प्रोफेसर और TCS तथा Egon Zehnder के पूर्व मुख्य कार्यकारी अधिकारी शामिल हैं.
NSE Clearing के बोर्ड में कोई भी सेवानिवृत्त सिविल सेवक नहीं है.
और एक असहज तथ्य यह भी है कि गर्ग खुद दो वर्षों तक आर्थिक मामलों के विभाग (Department of Economic Affairs) के सचिव और फिर वित्त सचिव के रूप में उस व्यवस्था के केंद्र में रहे थे, जिसके बारे में वह अब कहते हैं कि वह नियामकों को अधीन बना रही है.
क्या यह सच साबित होता है (Whether it Holds)
सुधारों के मुद्दे पर गर्ग एक पूर्व सचिव के तौर पर असामान्य रूप से निराशावादी नजर आते हैं.
"कोई भी सुधार सफल नहीं हो सकता, अगर उस समय की सरकार ने सब कुछ केंद्रीकृत करने और किसी भी चीज को छोड़ने से इनकार करने का फैसला कर लिया हो," वह कहते हैं, "और व्यवस्था में बाकी सभी लोग एक खराब व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाना भी बेहद जोखिम भरा मानते हों."
जब उनसे पूछा गया कि क्या इसके बावजूद कुछ किया जा सकता है जैसे स्वतंत्र नियुक्ति समिति, पात्रता का विस्तार या लागू किए जा सकने वाले कूलिंग-ऑफ पीरियड — तो वह कोई निश्चित व्यवस्था नहीं बताते.
उनका कहना है कि असली समस्या व्यवस्था नहीं, बल्कि सोच और इच्छाशक्ति की है.
इसके बाद बात लंबे समय के नजरिए पर आती है और यही बातचीत का एकमात्र हिस्सा है जहां वह आशावादी दिखाई देते हैं.
"मेरा मानना है कि इसके नकारात्मक परिणाम किसी न किसी सरकार को इसे ठीक करने और संस्थाओं की कार्यक्षमता व स्वतंत्रता बहाल करने के लिए मजबूर करेंगे," वह कहते हैं.
"हिंदुस्तान में खुद को सुधारने की अद्भुत क्षमता है, भले ही इसमें देर लग जाए."
रिजर्व बैंक के गवर्नर के रूप में रामा राव के उत्तराधिकारी ने इस्तीफा नहीं दिया. उन्होंने समझौता किया.
इसके बाद 2018 तक कोई अन्य गवर्नर अपने कार्यकाल के पूरा होने से पहले पद से नहीं हटा.
गर्ग के अपने आकलन के अनुसार, जिस सुधार की वह उम्मीद कर रहे हैं, उसमें अभी समय लग सकता है.
1957 में क्या हुआ था (What happened in 1957)
यह सवाल कि भारत का केंद्रीय बैंक सरकार के प्रति जवाबदेह है या अपने स्वतंत्र दायित्व के प्रति, एक बार पहले ही तय हो चुका था, शुरुआती दौर में और रिजर्व बैंक के पक्ष में नहीं.
सर बेनेगल रामा राव 1949 से RBI गवर्नर थे. 1956 से वित्त मंत्री रहे टी.टी. कृष्णमाचारी के साथ उनके संबंध काफी खराब हो गए थे.
रामा राव ने कृष्णमाचारी के व्यवहार को लेकर नेहरू से एक से अधिक बार शिकायत की थी.
एक मौके पर मंत्री ने गवर्नर की मौजूदगी में ऐसी मौद्रिक नीति की घोषणा कर दी थी, जो बैंक के रुख से अलग थी.
अंतिम टकराव एक बिलों पर स्टांप ड्यूटी के मुद्दे को लेकर हुआ, जिसकी घोषणा रिजर्व बैंक की सहमति के बिना कर दी गई थी.
रामा राव ने प्रधानमंत्री से समर्थन मांगा.
नेहरू ने समर्थन देने से इनकार कर दिया. उन्होंने लिखा कि रिजर्व बैंक को नीति मामलों में सरकार को सलाह देनी चाहिए, लेकिन वह अपने अलग उद्देश्यों के आधार पर काम नहीं कर सकता और उसकी नीतियां केंद्र सरकार की नीतियों के विपरीत नहीं हो सकतीं.
रामा राव ने 14 जनवरी 1957 से प्रभावी अपना इस्तीफा दे दिया.
उन्होंने कृष्णमाचारी को लिखा कि रिजर्व बैंक पर सार्वजनिक हमलों के बाद "किसी भी आत्मसम्मान रखने वाले गवर्नर के लिए" वित्त मंत्रालय द्वारा अपेक्षित सहयोग देना संभव नहीं है.
दिसंबर 2018 में उर्जित पटेल के इस्तीफे तक वह RBI के आखिरी गवर्नर थे, जिन्होंने अपना कार्यकाल पूरा होने से पहले पद छोड़ा था.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
कंपनी के मुताबिक, भारत में बढ़ाया जा रहा यह विस्तार उसके वैश्विक इनोवेशन नेटवर्क को मजबूत करेगा और AI, क्लाउड कंप्यूटिंग तथा डेटा इंफ्रास्ट्रक्चर एप्लिकेशन के लिए एडवांस्ड सेमीकंडक्टर सॉल्यूशंस के डिजाइन और विकास में मदद करेगा.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
सेमीकंडक्टर और डेटा इंफ्रास्ट्रक्चर सॉल्यूशंस क्षेत्र की प्रमुख कंपनी Marvell Technology ने भारत में अपनी मौजूदगी बढ़ाने के लिए बड़ा निवेश करने का ऐलान किया है. कंपनी अगले तीन वर्षों में भारत में 250 मिलियन डॉलर (करीब ₹2,000 करोड़ से अधिक) का निवेश करेगी. इस निवेश का इस्तेमाल तकनीक, प्रतिभा विकास और इंफ्रास्ट्रक्चर विस्तार पर किया जाएगा. कंपनी बेंगलुरु स्थित अपनी फैसिलिटी का विस्तार करेगी और हैदराबाद में भी अपनी मौजूदगी मजबूत करेगी, जिससे AI, क्लाउड और डेटा इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी अगली पीढ़ी की सेमीकंडक्टर तकनीकों के विकास को गति मिलेगी.
भारत में दोगुनी करेगी कर्मचारियों की संख्या
Marvell ने बताया कि इस निवेश के तहत कंपनी अगले तीन वर्षों में भारत में अपने कर्मचारियों की संख्या दोगुनी करने की योजना बना रही है. इसके अलावा बेंगलुरु ऑफिस में एक नए विंग की शुरुआत की जाएगी और हैदराबाद में ऑपरेशनल क्षमता का विस्तार किया जाएगा.
कंपनी के मुताबिक, भारत में बढ़ाया जा रहा यह विस्तार उसके वैश्विक इनोवेशन नेटवर्क को मजबूत करेगा और AI, क्लाउड कंप्यूटिंग तथा डेटा इंफ्रास्ट्रक्चर एप्लिकेशन के लिए एडवांस्ड सेमीकंडक्टर सॉल्यूशंस के डिजाइन और विकास में मदद करेगा.
भारत बना Marvell का रणनीतिक इंजीनियरिंग हब
Marvell के वाइस प्रेसिडेंट और इंडिया कंट्री मैनेजर नवीन बिश्नोई ने कहा कि भारत कंपनी के लिए इंजीनियरिंग उत्कृष्टता का एक रणनीतिक केंद्र बन चुका है. उन्होंने कहा कि भारत में कंपनी की टीम दुनिया के प्रमुख हाइपरस्केलर्स और क्लाउड प्रोवाइडर्स को सपोर्ट करने वाली इंफ्रास्ट्रक्चर टेक्नोलॉजी के विकास में अहम भूमिका निभा रही है.
उन्होंने कहा कि कंपनी भारत में रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) निवेश बढ़ाने, सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम को मजबूत करने और नई तकनीकी प्रतिभाओं को तैयार करने के लिए प्रतिबद्ध है.
भारत में 20 साल पूरे कर रही कंपनी
Marvell ने वर्ष 2006 में बेंगलुरु से भारत में अपना परिचालन शुरू किया था. पिछले 20 वर्षों में भारत कंपनी का दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा R&D केंद्र बन गया है.
बेंगलुरु, पुणे और हैदराबाद स्थित Marvell की टीमें एडवांस्ड प्रोसेस टेक्नोलॉजी (2nm और उससे आगे), हाई-स्पीड एनालॉग IP, सब-सिस्टम डिजाइन, सॉफ्टवेयर/फर्मवेयर डेवलपमेंट और एंड-टू-एंड सिलिकॉन डेवलपमेंट जैसे क्षेत्रों में काम कर रही हैं.
कंपनी के मुताबिक, Marvell India के कर्मचारी कई पेटेंट विकसित कर चुके हैं और इंजीनियरिंग प्रोडक्टिविटी व इनोवेशन को बढ़ाने के लिए AI टूल्स के इस्तेमाल में भी अहम भूमिका निभा रहे हैं.
सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम को बढ़ावा देने पर फोकस
Marvell भारत के सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम को मजबूत करने के लिए विश्वविद्यालयों, स्टार्टअप्स, इंडस्ट्री एसोसिएशंस और सरकारी संस्थानों के साथ भी काम कर रही है. कंपनी विभिन्न विश्वविद्यालयों के साथ इंटर्नशिप प्रोग्राम, फैकल्टी डेवलपमेंट, संयुक्त रिसर्च प्रोजेक्ट्स और नए पाठ्यक्रमों के विकास पर सहयोग कर रही है, ताकि छात्रों को एडवांस्ड टेक्नोलॉजी क्षेत्र में करियर के लिए तैयार किया जा सके. इसके अलावा कंपनी उभरते हुए स्टार्टअप्स के साथ मेंटरशिप और रणनीतिक साझेदारी के जरिए भी काम कर रही है.
Marvell Scholarship Program से तैयार होगी नई टेक्नोलॉजी टैलेंट
कार्यक्रम के दौरान Marvell ने अपने **Marvell Scholarship for Technical and Engineering Merit (MSTEM)** प्रोग्राम को भी रेखांकित किया. इस पहल का उद्देश्य AI और सेमीकंडक्टर क्षेत्र के लिए भविष्य की इंजीनियरिंग प्रतिभाओं को तैयार करना है.
इस साल शुरू किए गए MSTEM प्रोग्राम के तहत इलेक्ट्रॉनिक्स, इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग और कंप्यूटर साइंस की पढ़ाई कर रहे छात्रों को वित्तीय सहायता, इंडस्ट्री एक्सपोजर और वास्तविक तकनीकी अनुभव उपलब्ध कराया जा रहा है.
कंपनी के अनुसार, इस प्रोग्राम के लिए भारत के प्रमुख विश्वविद्यालयों से 7,000 से अधिक आवेदन मिले थे, जिनमें से 100 प्रतिभाशाली छात्रों को स्कॉलरशिप के लिए चुना गया है. यह पहल भारत में सेमीकंडक्टर और AI इनोवेशन के लिए मजबूत टैलेंट पाइपलाइन तैयार करने की दिशा में एक कदम है.
मेटा ने अप्रैल-जून तिमाही में 60.8 अरब डॉलर का राजस्व दर्ज किया, जो पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 28% अधिक है. यह आंकड़ा विश्लेषकों के 60.19 अरब डॉलर के अनुमान से भी ज्यादा रहा.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
फेसबुक की पैरेंट कंपनी मेटा प्लेटफॉर्म्स (Meta Platforms) ने वित्त वर्ष 2026 की दूसरी तिमाही में उम्मीद से बेहतर राजस्व दर्ज किया, लेकिन बढ़ते आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) निवेश, कानूनी खर्च और कर्मचारियों पर बढ़े खर्च के चलते मुनाफा बाजार अनुमान से नीचे रहा. कंपनी की आय में मजबूत विज्ञापन कारोबार का बड़ा योगदान रहा, हालांकि खर्च में तेज बढ़ोतरी से निवेशकों की चिंता बढ़ गई.
राजस्व उम्मीद से बेहतर, मुनाफा रहा कमजोर
मेटा ने अप्रैल-जून तिमाही में 60.8 अरब डॉलर का राजस्व दर्ज किया, जो पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 28% अधिक है. यह आंकड़ा विश्लेषकों के 60.19 अरब डॉलर के अनुमान से भी ज्यादा रहा. कंपनी की आय में डिजिटल विज्ञापन और नए कारोबारों से बढ़ते योगदान की अहम भूमिका रही. हालांकि, कंपनी की एडजस्टेड आय प्रति शेयर (EPS) 6.18 डॉलर रही, जबकि बाजार का अनुमान 7.17 डॉलर प्रति शेयर का था. खर्च में तेज बढ़ोतरी के कारण मुनाफे पर दबाव देखने को मिला.
AI निवेश से बढ़ा खर्च
मेटा का शुद्ध मुनाफा दूसरी तिमाही में 14% घटकर 15.85 अरब डॉलर रह गया, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह 18.34 अरब डॉलर था. प्रति शेयर आय भी पिछले साल के 7.14 डॉलर से घटकर 6.18 डॉलर रह गई.
कंपनी का कुल खर्च 55% बढ़कर 42 अरब डॉलर पहुंच गया. इसमें 2.4 अरब डॉलर का कानूनी खर्च और 1.2 अरब डॉलर का कर्मचारियों से जुड़ा सेवरेंस खर्च शामिल है. इसके अलावा AI विशेषज्ञों की नियुक्ति और कंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर पर भी कंपनी ने भारी निवेश किया है.
मेटा ने तिमाही के दौरान पूंजीगत खर्च (Capital Expenditure) के रूप में 31.1 अरब डॉलर खर्च किए, जिससे उसकी AI क्षमता बढ़ाने की योजना को बल मिलता है.
विज्ञापन कारोबार ने दिया सहारा
मेटा के मुख्य ऐप कारोबार, जिसमें फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सऐप शामिल हैं, से राजस्व 28% बढ़कर 60.4 अरब डॉलर हो गया. कंपनी का विज्ञापन राजस्व 27% बढ़कर 59.4 अरब डॉलर पहुंच गया. विज्ञापन इंप्रेशन में 14% और प्रति विज्ञापन औसत कीमत में 12% की बढ़ोतरी दर्ज की गई.
कंपनी ने विज्ञापन के अलावा अन्य आय स्रोतों में भी बढ़ोतरी दर्ज की. फैमिली ऑफ ऐप्स सेगमेंट में 'अन्य राजस्व' 73% बढ़कर 1 अरब डॉलर हो गया, जिसमें व्हाट्सऐप पेड मैसेजिंग और सब्सक्रिप्शन सेवाओं का योगदान रहा.
Reality Labs का राजस्व बढ़ा
मेटा की वर्चुअल और ऑगमेंटेड रियलिटी यूनिट Reality Labs का राजस्व 16% बढ़कर 431 मिलियन डॉलर हो गया. हालांकि, कंपनी के विज्ञापन कारोबार की तुलना में यह अभी भी छोटा हिस्सा है.
बढ़ाया खर्च का अनुमान
मेटा ने तीसरी तिमाही के लिए 61 अरब डॉलर से 64 अरब डॉलर के बीच राजस्व का अनुमान जताया है. कंपनी के मुताबिक, यह पिछले साल की तुलना में करीब 20-30% की वृद्धि को दर्शाता है. वित्त वर्ष 2026 के लिए मेटा ने अपने कुल खर्च का अनुमान बढ़ाकर 165 अरब डॉलर से 169 अरब डॉलर कर दिया है. कंपनी ने पूंजीगत खर्च (Capex) का अनुमान भी बढ़ाकर 130 अरब डॉलर से 145 अरब डॉलर कर दिया है, जबकि पहले यह अनुमान 125 अरब डॉलर से 145 अरब डॉलर था.
जुकरबर्ग बोले- AI से मजबूत हो रहे हैं प्रोडक्ट्स
मेटा के सीईओ मार्क जुकरबर्ग ने कहा कि AI कंपनी के प्रमुख प्रोडक्ट्स को बेहतर बना रहा है और विज्ञापनदाताओं को बेहतर परिणाम हासिल करने में मदद कर रहा है.
जुकरबर्ग के मुताबिक, दूसरी तिमाही में मेटा के ऐप्स का इस्तेमाल करने वाले दैनिक यूजर्स की संख्या 3.6 अरब रही. इंस्टाग्राम के दैनिक सक्रिय यूजर्स 2 अरब तक पहुंच गए हैं, जबकि Threads के मासिक सक्रिय यूजर्स 50 करोड़ से अधिक हो गए हैं.
उन्होंने कहा कि मेटा का लक्ष्य "सुपरइंटेलिजेंस को सीधे लोगों तक पहुंचाना" है और कंपनी की कंप्यूटिंग क्षमता की मांग अभी भी उपलब्ध आपूर्ति से अधिक बनी हुई है.
मेटा की CFO सुसान ली ने कहा कि कंपनी का बड़ा यूजर बेस AI क्षेत्र में उसे प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त देता है. उनके अनुसार, AI तकनीक के तेजी से विस्तार के बीच इंडस्ट्री ने कंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर में अब तक जरूरत के मुकाबले कम निवेश किया है.
देशभर में भी टोल वसूली में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है. वित्त वर्ष 2025-26 में राष्ट्रीय राजमार्गों से कुल टोल कलेक्शन बढ़कर ₹70,278.18 करोड़ पहुंच गया.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
उत्तर प्रदेश ने टोल टैक्स वसूली के मामले में देश के सभी राज्यों को पीछे छोड़ दिया है. वित्त वर्ष 2025-26 में राज्य ने राष्ट्रीय राजमार्गों और एक्सप्रेसवे से रिकॉर्ड ₹8,862.12 करोड़ का टोल कलेक्शन किया है. केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी की ओर से राज्यसभा में साझा किए गए आंकड़ों के मुताबिक, यूपी ने राजस्थान, महाराष्ट्र और गुजरात जैसे बड़े राज्यों को पीछे छोड़ते हुए पहला स्थान हासिल किया है. राज्य में तेजी से बढ़ते एक्सप्रेसवे नेटवर्क और वाहनों की आवाजाही में बढ़ोतरी को इस रिकॉर्ड कलेक्शन की प्रमुख वजह माना जा रहा है.
टोल वसूली में राजस्थान दूसरे स्थान पर
नितिन गडकरी द्वारा दिए गए आंकड़ों के अनुसार, टोल कलेक्शन के मामले में राजस्थान ₹7,317.51 करोड़ के संग्रह के साथ दूसरे स्थान पर रहा. इसके बाद महाराष्ट्र तीसरे, गुजरात चौथे और कर्नाटक पांचवें स्थान पर रहे.
यूपी में बढ़ा एक्सप्रेसवे नेटवर्क
उत्तर प्रदेश में टोल राजस्व बढ़ने की बड़ी वजह राज्य में राष्ट्रीय राजमार्गों और एक्सप्रेसवे नेटवर्क का विस्तार है. राज्य में वर्तमान में 141 टोल प्लाजा संचालित हो रहे हैं, जो देश में दूसरे सबसे ज्यादा हैं. टोल प्लाजा की संख्या के मामले में राजस्थान 172 टोल प्लाजा के साथ पहले स्थान पर है. इसके बाद महाराष्ट्र में 105, मध्य प्रदेश में 98 और कर्नाटक में 68 टोल प्लाजा हैं.
देशभर में टोल कलेक्शन ने बनाया रिकॉर्ड
देशभर में भी टोल वसूली में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है. वित्त वर्ष 2025-26 में राष्ट्रीय राजमार्गों से कुल टोल कलेक्शन बढ़कर ₹70,278.18 करोड़ पहुंच गया, जबकि वित्त वर्ष 2024-25 में यह आंकड़ा ₹61,408.15 करोड़ था. इसमें निजी वाहनों के लिए शुरू की गई एनुअल पास स्कीम से मिले ₹1,795.18 करोड़ भी शामिल हैं.
रोड इंफ्रास्ट्रक्चर विस्तार से बढ़ा राजस्व
केंद्र सरकार के मुताबिक, देश में सड़क बुनियादी ढांचे के विस्तार, नए एक्सप्रेसवे के निर्माण और राष्ट्रीय राजमार्गों पर वाहनों की बढ़ती संख्या के कारण टोल राजस्व में लगातार वृद्धि हो रही है. उत्तर प्रदेश में भी यमुना एक्सप्रेसवे, पूर्वांचल एक्सप्रेसवे, बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स के विस्तार से टोल आय में तेजी आई है.
L&T का अनुमान है कि जिस औद्योगिक बी2बी इलेक्ट्रॉनिक्स बाजार को वह लक्ष्य बना रही है, उसका आकार फिलहाल करीब 2 अरब डॉलर है, जो 2031 तक बढ़कर 4.85 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
इंजीनियरिंग एवं इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र की दिग्गज कंपनी लार्सन एंड टुब्रो (L&T) ने ऑटो कंपोनेंट और इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) टेक्नोलॉजी कारोबार में बड़ा कदम उठाया है. कंपनी अगले पांच वर्षों में ₹5,000 करोड़ का निवेश कर तमिलनाडु में अत्याधुनिक विनिर्माण केंद्र स्थापित करेगी. इस केंद्र में ईवी मोटर, एडवांस्ड सेफ्टी सिस्टम और कनेक्टेड व्हीकल टेक्नोलॉजी का निर्माण किया जाएगा. L&T का मानना है कि तेजी से बढ़ते ऑटो इलेक्ट्रॉनिक्स बाजार में यह निवेश कंपनी की नई ग्रोथ रणनीति का अहम हिस्सा साबित होगा.
ऑटो इलेक्ट्रॉनिक्स कारोबार में बढ़ाएगी मौजूदगी
यह निवेश L&T के इलेक्ट्रॉनिक प्रोडक्ट्स एंड सिस्टम्स (EPS) बिजनेस के जरिए किया जाएगा. कंपनी की 'लक्ष्य 31' रणनीति के तहत मोबिलिटी, पावर इलेक्ट्रॉनिक्स, रोबोटिक्स, ऑटोमेशन और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम डिजाइन एवं मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों पर फोकस बढ़ाया जा रहा है. EPS ग्रुप के प्रमुख प्रशांत जैन ने कहा कि यह कंपनी के लिए नया कारोबार नहीं, बल्कि उसकी इंजीनियरिंग विशेषज्ञता का स्वाभाविक विस्तार है.
2031 तक दोगुना होगा बाजार
L&T का अनुमान है कि जिस औद्योगिक बी2बी इलेक्ट्रॉनिक्स बाजार को वह लक्ष्य बना रही है, उसका आकार फिलहाल करीब 2 अरब डॉलर है, जो 2031 तक बढ़कर 4.85 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है. कंपनी इस बाजार में 10-15% हिस्सेदारी हासिल करने का लक्ष्य लेकर चल रही है.
R&D और नई तकनीकों पर होगा खर्च
₹5,000 करोड़ का निवेश अगले पांच वर्षों में मैन्युफैक्चरिंग, रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D), टेक्नोलॉजी लाइसेंसिंग और टेस्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर पर किया जाएगा. कंपनी का उद्देश्य बौद्धिक संपदा (IP) आधारित इलेक्ट्रॉनिक्स कारोबार को मजबूत करना और भविष्य की ऑटोमोबाइल टेक्नोलॉजी में अपनी पकड़ बनाना है.
मिला पहला बड़ा ऑर्डर
L&T के मोबिलिटी बिजनेस को पहला कमर्शियल ऑर्डर भी मिल चुका है. कंपनी अगले तीन वर्षों में एक दोपहिया वाहन निर्माता को 5 लाख इलेक्ट्रिक ट्रैक्शन मोटर की आपूर्ति करेगी. इन मोटरों का बड़े पैमाने पर उत्पादन अगले महीने से कोयंबटूर स्थित संयंत्र में शुरू होगा. यह मोटर इजरायल की EVR Motors की लाइसेंसी तकनीक पर आधारित हैं, जिनमें बेहतर टॉर्क डेंसिटी और कम मटेरियल उपयोग जैसी विशेषताएं हैं.
ADAS टेक्नोलॉजी पर भी फोकस
कंपनी भारतीय बाजार के लिए एडवांस्ड ड्राइवर असिस्टेंस सिस्टम (ADAS) को किफायती बनाने की दिशा में भी काम कर रही है. L&T का मानना है कि फिलहाल देश की करीब 80% गाड़ियों में ड्राइवर-असिस्टेंस सिस्टम नहीं है, जबकि 2027 से कमर्शियल वाहनों में ऑटोमैटिक इमरजेंसी ब्रेकिंग (AEB) जैसे फीचर अनिवार्य होने की संभावना है. ऐसे में ऑटो इलेक्ट्रॉनिक्स और सेफ्टी टेक्नोलॉजी का बाजार आने वाले वर्षों में तेजी से बढ़ सकता है.
बुधवार को BSE सेंसेक्स 888.68 अंक यानी 1.16% की बढ़त के साथ 77,654.60 अंक पर बंद हुआ. वहीं, NSE निफ्टी 264.85 अंक यानी 1.10% चढ़कर 24,250.20 के स्तर पर पहुंच गया.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
घरेलू शेयर बाजार ने बुधवार को शानदार तेजी के साथ कारोबार का समापन किया था. आईटी और एफएमसीजी शेयरों में जोरदार खरीदारी के दम पर बीएसई सेंसेक्स 888.68 अंक चढ़ा, जबकि निवेशकों की संपत्ति में करीब ₹4 लाख करोड़ का इजाफा हुआ. अब गुरुवार के कारोबार में निवेशकों की नजर वैश्विक संकेतों, कच्चे तेल की कीमतों और PNB, NBCC, BHEL समेत कई कंपनियों से जुड़े बड़े घटनाक्रमों पर रहेगी. ऐसे में जानिए, बुधवार को बाजार का प्रदर्शन कैसा रहा और आज किन शेयरों पर फोकस रहेगा.
बुधवार को बाजार में रही दमदार तेजी
बुधवार को बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) सेंसेक्स 888.68 अंक यानी 1.16% की बढ़त के साथ 77,654.60 अंक पर बंद हुआ. वहीं, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) निफ्टी 264.85 अंक यानी 1.10% चढ़कर 24,250.20 के स्तर पर पहुंच गया. कारोबार के दौरान सेंसेक्स 900 अंक से अधिक उछला था. डॉलर के मुकाबले रुपया भी 0.2% मजबूत होकर 95.6475 पर बंद हुआ, जबकि पिछले कारोबारी सत्र में यह 95.8525 पर बंद हुआ था.
₹4 लाख करोड़ बढ़ी निवेशकों की संपत्ति
बाजार में तेजी के चलते बीएसई में सूचीबद्ध कंपनियों का कुल मार्केट कैप करीब ₹4 लाख करोड़ बढ़कर 483 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया. सेंसेक्स की 30 में से 25 कंपनियों के शेयर बढ़त के साथ बंद हुए, जिससे निवेशकों की संपत्ति में बड़ा इजाफा हुआ.
IT और FMCG शेयरों ने दिखाई मजबूती
बुधवार के कारोबार में हिंदुस्तान यूनिलीवर 4.7% की तेजी के साथ सबसे बड़ा गेनर रहा. इसके अलावा इंफोसिस, ट्रेंट, लार्सन एंड टुब्रो, टाटा स्टील, भारती एयरटेल, टीसीएस, एचडीएफसी बैंक, एचसीएल टेक और कोटक महिंद्रा बैंक के शेयरों में भी अच्छी खरीदारी देखने को मिली. दूसरी ओर, अडानी पोर्ट्स, महिंद्रा एंड महिंद्रा, पावर ग्रिड, भारत इलेक्ट्रॉनिक्स (BEL) और एनटीपीसी के शेयर गिरावट के साथ बंद हुए.
ब्रॉडर मार्केट में भी रही खरीदारी
निफ्टी मिडकैप इंडेक्स 0.82% और निफ्टी स्मॉलकैप इंडेक्स 1.48% की बढ़त के साथ बंद हुए. सेक्टोरल इंडेक्स में आईटी, मेटल और एफएमसीजी सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाले सेक्टर रहे, जबकि रियल्टी और ऑटो इंडेक्स दबाव में रहे.
कच्चे तेल में तेजी ने बढ़ाई चिंता
बाजार में तेजी के बीच पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने निवेशकों की चिंता भी बढ़ाई. अमेरिकी जवाबी कार्रवाई के बाद ऊर्जा आपूर्ति को लेकर आशंकाएं तेज हुईं, जिससे कारोबार के दौरान ब्रेंट क्रूड करीब 5% उछलकर 88 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया. हालांकि शुरुआती कारोबार में यह 84 डॉलर प्रति बैरल के आसपास था.
आज इन शेयरों पर रहेगी नजर
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, गुरुवार के कारोबार में कई शेयर निवेशकों के रडार पर रहेंगे. पंजाब नेशनल बैंक (PNB) के बोर्ड ने GIFT City स्थित IFSC बैंकिंग यूनिट के जरिए मीडियम टर्म नोट (MTN) प्रोग्राम के तहत 1.5 अरब डॉलर तक विदेशी फंड जुटाने को मंजूरी दी है. वहीं, एनबीसीसी (NBCC) ने सेशेल्स सरकार के साथ 7.5 करोड़ डॉलर की हाउसिंग परियोजना का करार किया है. भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (BHEL) को नाइजीरिया की डांगोटे पेट्रोलियम रिफाइनरी से आठ गैस टर्बाइन जनरेटर पैकेज की सप्लाई का बड़ा ऑर्डर मिला है.
इसके अलावा विक्रान इंजीनियरिंग ने अरुणाचल प्रदेश में 132 केवी मियाओ-नामसाई ट्रांसमिशन लाइन का सफल संचालन शुरू किया है. वहीं, मैपल इंफ्रास्ट्रक्चर ट्रस्ट में इन्वेस्टेक इंडिया फंड मैनेजमेंट ने 20.75 लाख यूनिट खरीदी हैं. टीआईएल (TIL) में सिंगुलैरिटी इक्विटी फंड-I ने 5.26 लाख शेयर खरीदे हैं, जबकि महान एक्सिम्प और सालगर्न मर्चेंट्स ने अपनी हिस्सेदारी बेची है. इन सभी घटनाक्रमों के चलते आज इन शेयरों पर बाजार की खास नजर रहेगी.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
कंपनी का लक्ष्य शहरी उपभोक्ताओं के लिए ऐसा रिटेल अनुभव तैयार करना है, जहां रोजमर्रा के खाद्य उत्पादों के साथ प्रीमियम और गॉरमे कैटेगरी के विकल्प भी उपलब्ध हों.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय फूड रिटेल बाजार में प्रतिस्पर्धा के बीच उद्योग जगत के अनुभवी कारोबारी अरविंद मेदिरत्ता ने अपनी नई कंपनी Elixiir Foods के तहत FreshTerra की शुरुआत की है. कंपनी ने गुरुग्राम में अपना पहला स्टोर लॉन्च किया है और वित्त वर्ष 2027-28 तक दिल्ली-NCR में 12-15 स्टोर खोलने की योजना बनाई है. FreshTerra एक क्यूरेशन-आधारित फूड रिटेल मॉडल पर काम करेगा, जिसमें उत्पादों के चयन, गुणवत्ता और ताजगी पर विशेष ध्यान दिया जाएगा. कंपनी का लक्ष्य शहरी उपभोक्ताओं के लिए ऐसा रिटेल अनुभव तैयार करना है, जहां रोजमर्रा के खाद्य उत्पादों के साथ प्रीमियम और गॉरमे कैटेगरी के विकल्प भी उपलब्ध हों.
अरविंद मेदिरत्ता का रिटेल अनुभव कंपनी की रणनीति का अहम हिस्सा है. वह इससे पहले Metro Cash & Carry India के प्रबंध निदेशक और CEO रह चुके हैं, जहां उन्होंने लंबे समय से घाटे में चल रहे कारोबार को लाभदायक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. इससे पहले उन्होंने Walmart India में COO के तौर पर Best Price कैश एंड कैरी कारोबार को स्थापित किया था. इसके अलावा वह Walmart USA के Fresh Division और Yum! South Asia में भी नेतृत्वकारी भूमिकाएं निभा चुके हैं. इस वेंचर में उनके साथ अंबुज नारायण सह-संस्थापक और COO के रूप में जुड़े हैं. नारायण को Titan Company, Metro Cash & Carry India और Walmart India में दो दशकों से अधिक का रिटेल संचालन अनुभव है.
फंडिंग के जरिए विस्तार की तैयारी
FreshTerra को फरवरी 2026 में 9 मिलियन डॉलर की सीड फंडिंग मिली थी. इस निवेश दौर का नेतृत्व 3one4 Capital ने किया था, जबकि Incubate Fund Asia ने भी इसमें भागीदारी की थी. कंपनी इस पूंजी का इस्तेमाल स्टोर विस्तार, टेक्नोलॉजी प्लेटफॉर्म और सप्लाई चेन को मजबूत करने में करेगी.
कंपनी ने अपने कारोबार को ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों से बढ़ाने की रणनीति बनाई है. इसके तहत FreshTerra मोबाइल ऐप भी लॉन्च किया गया है, जिसके जरिए ग्राहक स्टोर विजिट के अलावा घर तक डिलीवरी का विकल्प चुन सकेंगे.
फूड रिटेल में अनुभव आधारित मॉडल
गुरुग्राम स्थित पहले स्टोर में कंपनी ने लाइव प्रिपरेशन मॉडल को शामिल किया है. इसमें ग्राहक आटा पिसाई, मसाला तैयार करने और कोल्ड-प्रेस तेल बनाने की प्रक्रिया को देख सकेंगे. कंपनी का मानना है कि इससे ग्राहकों का भरोसा बढ़ेगा और खाद्य उत्पादों की गुणवत्ता को लेकर पारदर्शिता आएगी. स्टोर में कैफे और रेडी-टू-ईट विकल्पों की सुविधा भी दी गई है, जहां ताजा सामग्री से तैयार भोजन और अन्य उत्पाद उपलब्ध होंगे.
भारतीय फूड रिटेल बाजार में बढ़ती मांग
भारत में प्रीमियम और संगठित फूड रिटेल सेगमेंट तेजी से विस्तार कर रहा है. बढ़ती शहरी आबादी, स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता और गुणवत्ता वाले खाद्य उत्पादों की मांग को देखते हुए कई कंपनियां इस क्षेत्र में निवेश बढ़ा रही हैं. FreshTerra इसी बढ़ते बाजार में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रही है.
देश में कुल रिटेल लीजिंग गतिविधि जनवरी से जून 2026 के बीच सालाना आधार पर 20 फीसदी बढ़कर करीब 39 लाख वर्ग फुट पहुंच गई. इसमें अप्रैल-जून तिमाही का योगदान करीब 20 लाख वर्ग फुट रहा.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के रिटेल सेक्टर में डायरेक्ट-टू-कंज्यूमर (D2C) ब्रांड्स तेजी से अपनी ऑफलाइन मौजूदगी मजबूत कर रहे हैं. प्रॉपर्टी कंसल्टेंसी फर्म CBRE की रिपोर्ट के मुताबिक, जनवरी-जून 2026 के दौरान देश में कुल रिटेल लीजिंग गतिविधियों में D2C ब्रांड्स की हिस्सेदारी बढ़कर 28 फीसदी पहुंच गई, जो पिछले साल की समान अवधि में 23 फीसदी थी.
भारत के रिटेल बाजार में बढ़ा D2C ब्रांड्स का विस्तार
CBRE की ‘India Retail Figures H1 2026’ रिपोर्ट के अनुसार, डिजिटल माध्यम से कारोबार शुरू करने वाले D2C ब्रांड्स अब फिजिकल स्टोर्स के जरिए ग्राहकों तक अपनी पहुंच बढ़ा रहे हैं. ब्रांड विजिबिलिटी, ग्राहकों के साथ बेहतर जुड़ाव और व्यक्तिगत खरीदारी अनुभव देने के लिए कंपनियां ऑफलाइन स्टोर नेटवर्क का विस्तार कर रही हैं.
देश में कुल रिटेल लीजिंग गतिविधि जनवरी से जून 2026 के बीच सालाना आधार पर 20 फीसदी बढ़कर करीब 39 लाख वर्ग फुट पहुंच गई. इसमें अप्रैल-जून तिमाही का योगदान करीब 20 लाख वर्ग फुट रहा.
दिल्ली-NCR में सबसे ज्यादा रिटेल स्पेस की मांग
रिपोर्ट के मुताबिक, रिटेल स्पेस की मांग में दिल्ली-NCR सबसे आगे रहा. जनवरी-जून 2026 के दौरान कुल रिटेल स्पेस टेक-अप में दिल्ली-NCR की हिस्सेदारी 35 फीसदी रही. इसके बाद चेन्नई 17 फीसदी हिस्सेदारी के साथ दूसरे और मुंबई 15 फीसदी हिस्सेदारी के साथ तीसरे स्थान पर रहा.
घरेलू रिटेलर्स का दबदबा कायम
CBRE के अनुसार, इस अवधि में घरेलू रिटेलर्स ने लीजिंग गतिविधियों में अपना दबदबा बनाए रखा और कुल मांग में उनकी हिस्सेदारी 70 फीसदी से अधिक रही. फैशन और अपैरल, फूड एंड बेवरेज, एंटरटेनमेंट और ज्वेलरी जैसे सेगमेंट में ब्रांड्स की ओर से मजबूत मांग देखने को मिली.
D2C ब्रांड्स अब विस्तार से ज्यादा मुनाफे पर दे रहे ध्यान
CBRE ने कहा कि D2C ब्रांड्स अब केवल स्टोर की संख्या बढ़ाने के बजाय स्टोर की लाभप्रदता, पूंजी दक्षता और ओमनीचैनल रणनीति पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं. प्रीमियम रिटेल स्पेस के लिए बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच ब्रांड्स अपनी फिजिकल मौजूदगी को लेकर ज्यादा सोच-समझकर फैसले ले रहे हैं.
CBRE के चेयरमैन और CEO (भारत, दक्षिण-पूर्व एशिया, मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका) अंशुमान मैगजीन ने कहा कि 2026 की पहली छमाही में भारत का रिटेल बाजार केवल विस्तार नहीं बल्कि परिपक्वता की ओर बढ़ता हुआ नजर आया है. कंपनियां अब यह तय कर रही हैं कि कहां और किस तरीके से विस्तार करना उनके लिए बेहतर होगा.
फैशन सेगमेंट में D2C ब्रांड्स की सबसे ज्यादा हिस्सेदारी
रिपोर्ट के अनुसार, D2C ब्रांड्स की रिटेल लीजिंग में फैशन और अपैरल सेगमेंट सबसे आगे रहा. H1 2026 में इस कैटेगरी की हिस्सेदारी करीब 69 फीसदी रही. इसके अलावा होमवेयर और फर्निशिंग सेगमेंट की हिस्सेदारी 12 फीसदी, जबकि ज्वेलरी सेगमेंट की हिस्सेदारी 7 फीसदी रही.
CBRE के मैनेजिंग डायरेक्टर (कंसल्टिंग एंड वैल्यूएशंस, भारत, मध्य पूर्व और अफ्रीका) रामी कौशल ने कहा कि रिटेलर्स अब नए बाजारों में अवसरों और लंबी अवधि की स्थिरता के बीच संतुलन बनाते हुए अपनी विस्तार रणनीतियों में बदलाव कर रहे हैं.
नए रिटेल फॉर्मेट आजमा रहे D2C ब्रांड्स
D2C कंपनियां अब पारंपरिक स्टोर्स के अलावा नए रिटेल मॉडल भी अपना रही हैं. कई ब्रांड्स माइक्रो-स्टोर्स और एक्सपीरियंस सेंटर जैसे फॉर्मेट के जरिए ग्राहकों को जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं.
इसके अलावा शॉप-इन-शॉप मॉडल भी लोकप्रिय हो रहा है, जिसमें डिजिटल ब्रांड्स बड़े रिटेलर्स के फुटफॉल और भरोसे का फायदा उठाते हुए कम जोखिम के साथ ऑफलाइन विस्तार कर सकते हैं. वहीं, कई कंपनियां लाइफस्टाइल आधारित रिटेल प्लेटफॉर्म भी विकसित कर रही हैं, जहां एक ही जगह पर कई D2C ब्रांड्स को प्रदर्शित किया जा रहा है. यह मॉडल नए ब्रांड्स को फिजिकल रिटेल में प्रवेश के लिए कम जोखिम वाला विकल्प उपलब्ध करा रहा है.
SBI ने इस AT-1 बॉन्ड इश्यू का बेस साइज 3,000 करोड़ रुपये रखा था, जबकि कुल इश्यू साइज 5,000 करोड़ रुपये था.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देश के सबसे बड़े बैंक भारतीय स्टेट बैंक (SBI) ने वित्त वर्ष 2027 का पहला बैंकिंग सेक्टर AT-1 बॉन्ड इश्यू सफलतापूर्वक पूरा करते हुए 4,691 करोड़ रुपये जुटाए हैं. बैंक को इस इश्यू में बेस साइज से दोगुने से अधिक बोलियां मिलीं, जो निवेशकों के बीच SBI की मजबूत वित्तीय स्थिति और भरोसे को दर्शाता है. बॉन्ड 7.75 फीसदी की कूपन दर पर जारी किए गए हैं.
SBI के AT-1 बॉन्ड इश्यू को मिला जोरदार रिस्पॉन्स
बैंक ने बुधवार को जानकारी दी है कि उन्होंने अतिरिक्त टियर-1 (AT-1) बॉन्ड के जरिए 4,691 करोड़ रुपये की पूंजी जुटाई है. यह वित्त वर्ष 2027 में किसी बैंक की ओर से जारी किया गया पहला परपेचुअल (स्थायी) बॉन्ड इश्यू है. इस बॉन्ड इश्यू पर बैंक ने 7.75 फीसदी की कट-ऑफ यील्ड तय की है. इन बॉन्ड पर पांच साल बाद कॉल ऑप्शन उपलब्ध होगा और इसके बाद हर साल बैंक को इन्हें वापस खरीदने का विकल्प मिलेगा.
5,000 करोड़ रुपये के इश्यू में मिलीं 89 बोलियां
SBI ने इस AT-1 बॉन्ड इश्यू का बेस साइज 3,000 करोड़ रुपये रखा था, जबकि कुल इश्यू साइज 5,000 करोड़ रुपये था. बैंक को बेस इश्यू के मुकाबले दोगुने से अधिक बोलियां प्राप्त हुईं, जिसके बाद उसने 4,691 करोड़ रुपये स्वीकार किए. बैंक के मुताबिक, इस इश्यू में कुल 89 बोलियां मिलीं. इसमें भविष्य निधि (PF), पेंशन फंड, म्यूचुअल फंड और अन्य बैंकों समेत कई संस्थागत निवेशकों ने हिस्सा लिया.
निवेशकों का भरोसा मजबूत: SBI चेयरमैन
SBI के चेयरमैन सी. एस. शेट्टी ने कहा कि अलग-अलग श्रेणी के निवेशकों की व्यापक भागीदारी और विभिन्न प्रकार की बोलियां यह दिखाती हैं कि देश के सबसे बड़े बैंक में निवेशकों का भरोसा कायम है. उन्होंने कहा कि यह बॉन्ड इश्यू बैंक के लिए अहम है, क्योंकि इससे फंडिंग स्रोतों में विविधता आएगी और लंबी अवधि की गैर-इक्विटी नियामकीय पूंजी जुटाने में मदद मिलेगी.
क्या होते हैं AT-1 बॉन्ड?
AT-1 यानी अतिरिक्त टियर-1 बॉन्ड ऐसे डेट इंस्ट्रूमेंट होते हैं, जिन्हें बैंक अपनी पूंजी मजबूत करने के लिए जारी करते हैं. इन्हें बेसल-III मानकों के तहत बैंक की अतिरिक्त टियर-1 पूंजी का हिस्सा माना जाता है. इन बॉन्ड की कोई निश्चित परिपक्वता अवधि नहीं होती. हालांकि, नियामकीय मंजूरी के बाद बैंक आमतौर पर पांच साल बाद इन्हें वापस खरीदने का विकल्प रखते हैं. वित्तीय संकट की स्थिति में नुकसान को समायोजित करने की क्षमता के कारण AT-1 बॉन्ड को सामान्य बॉन्ड की तुलना में अधिक जोखिम वाला निवेश माना जाता है.
कार्गो वॉल्यूम, इंटरनेशनल पोर्ट्स और लॉजिस्टिक्स कारोबार की मजबूत ग्रोथ से बढ़ी कमाई. FY27 के लिए ₹45,000 करोड़ तक के रेवेन्यू का अनुमान बरकरार.
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अडानी पोर्ट्स एंड स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन्स (APSEZ) ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (Q1FY27) में मजबूत वित्तीय प्रदर्शन दर्ज किया है. कंपनी का कंसोलिडेटेड नेट प्रॉफिट सालाना आधार पर 9 फीसदी बढ़कर ₹3,620 करोड़ रहा, जबकि परिचालन से राजस्व (Revenue from Operations) 18.5 फीसदी बढ़कर ₹10,821 करोड़ पर पहुंच गया. बेहतर कार्गो हैंडलिंग, इंटरनेशनल पोर्ट्स से मजबूत आय और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क के विस्तार ने कंपनी के प्रदर्शन को मजबूती दी.
स्टॉक एक्सचेंज को दी गई जानकारी के अनुसार, पिछले वित्त वर्ष की समान तिमाही में कंपनी का नेट प्रॉफिट ₹3,315 करोड़ और परिचालन राजस्व ₹9,126 करोड़ था. हालांकि, तिमाही नतीजों के बाद बीएसई पर कंपनी का शेयर करीब 3 फीसदी की गिरावट के साथ ₹1,720 के स्तर पर कारोबार करता दिखा.
कंपनी का EBITDA 19 फीसदी बढ़कर ₹6,540 करोड़ हो गया, जो एक साल पहले की समान अवधि में ₹5,495 करोड़ था. EBITDA मार्जिन बढ़कर 60.4 फीसदी रहा, जबकि पिछले वर्ष की पहली तिमाही में यह 60.2 फीसदी था.
ऑस्ट्रेलिया और कोलंबो स्थित पोर्ट्स का बेहतर प्रदर्शन
इंटरनेशनल पोर्ट्स कारोबार ने तिमाही के दौरान उल्लेखनीय प्रदर्शन किया. इस सेगमेंट का राजस्व 80 फीसदी बढ़कर ₹1,747 करोड़ पहुंच गया, जबकि EBITDA 256 फीसदी की वृद्धि के साथ ₹730 करोड़ रहा. कंपनी ने इसका श्रेय ऑस्ट्रेलिया और कोलंबो स्थित पोर्ट्स के बेहतर प्रदर्शन को दिया है.
मरीन कारोबार से राजस्व 67 फीसदी बढ़कर ₹901 करोड़ हो गया. ऑफशोर वेसल फ्लीट के विस्तार और यूरोप में सबसी ऑपरेशन्स के विस्तार ने इस वृद्धि में महत्वपूर्ण योगदान दिया. वहीं, घरेलू पोर्ट्स कारोबार से राजस्व में 12 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई. अधिक कार्गो वॉल्यूम, बेहतर प्रोडक्ट मिक्स और बेहतर रियलाइजेशन के चलते इस सेगमेंट का EBITDA मार्जिन 74 फीसदी रहा.
कंपनी ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए ₹43,000 करोड़ से ₹45,000 करोड़ के राजस्व और ₹25,000 करोड़ से ₹26,000 करोड़ के EBITDA का मार्गदर्शन (Guidance) बरकरार रखा है. पहली तिमाही के अंत तक नेट डेट-टू-EBITDA अनुपात 1.9 गुना रहा, जबकि पूरे वित्त वर्ष के लिए इसे 2.5 गुना तक रहने का अनुमान है.एपीएसईजेड के पूर्णकालिक निदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) अश्विनी गुप्ता ने कहा कि सभी कारोबारों में संतुलित वृद्धि कंपनी के दीर्घकालिक विकास लक्ष्यों को मजबूत आधार प्रदान कर रही है. उन्होंने कहा कि घरेलू क्षमता विस्तार, अंतरराष्ट्रीय पोर्ट्स कारोबार में बढ़ती हिस्सेदारी और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क के विस्तार के जरिए कंपनी वैश्विक स्तर पर एक अधिक विविधीकृत और प्रतिस्पर्धी परिवहन एवं लॉजिस्टिक्स प्लेटफॉर्म के रूप में अपनी स्थिति मजबूत कर रही है.
तीस रिटायर्ड नौकरशाह. सबसे ताकतवर कुर्सियां. भारत की पूरी वित्तीय व्यवस्था पर खामोश कब्जा
by
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
18 मार्च 2026 को अतनु चक्रवर्ती ने HDFC बैंक के पार्ट-टाइम चेयरमैन पद से इस्तीफा दे दिया और कुछ ऐसा कहा, जो बड़े बैंकों के चेयरमैन आमतौर पर नहीं कहते. उन्होंने लिखा कि बैंक में कुछ घटनाएं और प्रक्रियाएं "मेरे व्यक्तिगत मूल्यों और नैतिकता के अनुरूप नहीं हैं."
बैंक के अमेरिकन डिपॉजिटरी रिसीट्स (ADR) में आठ फीसदी की गिरावट आई. एक हफ्ते में करीब ₹61,000 करोड़ का बाजार मूल्य खत्म हो गया. बोर्ड ने यह पता लगाने के लिए घरेलू और अंतरराष्ट्रीय लॉ फर्मों को नियुक्त किया कि चक्रवर्ती के आरोपों का मतलब क्या था. उन्होंने अपनी रिपोर्ट में कहा कि उनके आरोपों की पुष्टि नहीं हुई. करियर फाइनेंसर के रूप में पहचान रखने वाले केकी मिस्त्री ने अंतरिम चेयरमैन का पद संभाला, जबकि बैंक स्थायी चेयरमैन की तलाश कर रहा था.
फिस उसे राजीव कुमार मिले.
चक्रवर्ती 1985 बैच के गुजरात कैडर के IAS अधिकारी हैं, जो अप्रैल 2020 तक आर्थिक मामलों के विभाग (Department of Economic Affairs) में सचिव थे. जुलाई 2026 में उनके उत्तराधिकारी के रूप में नामित राजीव कुमार (रिजर्व बैंक की मंजूरी के अधीन) भी एक रिटायर्ड IAS अधिकारी हैं. वह वित्त सचिव रहे, फिर वित्तीय सेवा सचिव बने और मई 2022 से फरवरी 2025 तक मुख्य चुनाव आयुक्त के पद पर रहे.
भारत के सबसे बड़े निजी बैंक को चेयर पर एक रिटायर्ड नौकरशाह के साथ मुश्किल अनुभव हुआ. उसने उसकी जगह भी एक रिटायर्ड नौकरशाह को ही चुना.
यह कोई संयोग नहीं है. अब सिस्टम इसी तरह काम करता है.
तीन नियामक, तीन अधिकारी
भारतीय वित्त व्यवस्था में महत्वपूर्ण पदों को गिनिए और एक ही करियर बार-बार दिखाई देता है: भारतीय प्रशासनिक सेवा में तीन दशक, वित्त मंत्रालय में अंतिम पोस्टिंग, फिर रिटायरमेंट और उसके बाद चेयरमैन की कुर्सी.
भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) की अध्यक्षता तुहिन कांत पांडे कर रहे हैं. वह 1987 बैच के ओडिशा कैडर के IAS अधिकारी हैं, जो 1 मार्च 2025 को पदभार संभालने से पहले वित्त सचिव और राजस्व सचिव रह चुके थे.
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) का नेतृत्व संजय मल्होत्रा कर रहे हैं. वह 1990 बैच के राजस्थान कैडर के IAS अधिकारी हैं. उनके नाम की घोषणा उनके पूर्ववर्ती के कार्यकाल खत्म होने से एक दिन पहले की गई थी और उन्हें राजस्व सचिव के पद से करीब तीन साल पहले RBI लाया गया, जबकि उनकी अपनी सेवानिवृत्ति में अभी समय बाकी था.
उनसे पहले RBI गवर्नर रहे शक्तिकांत दास भी IAS अधिकारी थे और वह भी पूर्व राजस्व सचिव और आर्थिक मामलों के सचिव रह चुके थे.
बीमा नियामक IRDAI की अध्यक्षता अजय सेठ कर रहे हैं. वह 1987 बैच के कर्नाटक कैडर के IAS अधिकारी हैं. जून 2025 तक वह आर्थिक मामलों के विभाग के सचिव थे और 1 सितंबर को IRDAI के चेयर पर पहुंचे. उन्होंने डेबाशीष पांडा की जगह ली, जो 1987 बैच के उत्तर प्रदेश कैडर के अधिकारी थे और वित्तीय सेवा विभाग का नेतृत्व कर चुके थे.
तीन नियामक. तीन रिटायर्ड IAS अधिकारी. सभी वित्त मंत्रालय की कुर्सी छोड़कर कुछ ही महीनों में एक नियामक संस्था के प्रमुख बन गए.
अब मायने यह रखता है कि वे नियामक किन लोगों की नियुक्तियों को मंजूरी देते हैं.
2018 के SECC नियमों के तहत, SEBI को हर चेयरपर्सन और हर पब्लिक इंटरेस्ट डायरेक्टर की नियुक्ति को मंजूरी देनी होती है, जो बाजार की बुनियादी संस्थाओं — एक्सचेंज, डिपॉजिटरी और क्लियरिंग कॉरपोरेशन में नियुक्त होते हैं. इन संस्थाओं को नियमों में बाजार का प्रथम स्तर का नियामक कहा गया है.
बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट के तहत, रिजर्व बैंक को हर निजी बैंक के पार्ट-टाइम चेयरमैन की नियुक्ति को मंजूरी देनी होती है.
इसलिए सवाल केवल यह नहीं है कि नियामकों को कौन चला रहा है. सवाल यह भी है कि नियामक किन लोगों को मंजूरी दे रहे हैं, जिसमें CEO भी शामिल हैं. इसलिए यह स्पष्ट है कि सबसे ज्यादा शक्ति किसके पास है.
नियामक तक ही सीमित नहीं है यह पैटर्न
यह पैटर्न केवल नियामक संस्थाओं तक नहीं रुकता.
SEBI के खिलाफ अपीलों की सुनवाई सिक्योरिटीज अपीलेट ट्रिब्यूनल (SAT) में होती है, जिसके दो तकनीकी सदस्य भी करियर नौकरशाह हैं.
इनमें मीरा स्वरूप शामिल हैं, जो 1988 बैच की इंडियन ऑडिट एंड अकाउंट्स सर्विस अधिकारी हैं और मार्च 2022 में नियुक्त हुईं. दूसरे हैं धीरज भटनागर, जो दिल्ली में इनकम टैक्स के प्रिंसिपल चीफ कमिश्नर के पद से रिटायर हुए और अप्रैल 2024 में नियुक्त किए गए.
इन पदों के लिए आवेदन आर्थिक मामलों का विभाग (Department of Economic Affairs) आमंत्रित करता है. वही मंत्रालय, जहां से अधिकांश नियामक संस्थाओं के प्रमुख आए हैं
असल में दांव पर क्या है
ये केवल औपचारिक पद नहीं हैं. नौ वर्षों तक नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) खुद को सूचीबद्ध नहीं करा पाया. उसका IPO 2016 से अटका हुआ था. इसकी वजह को-लोकेशन मामला और उसके बाद सामने आया लंबा गवर्नेंस विवाद था.
30 जनवरी 2026 को SEBI ने नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (NOC) जारी किया, जिससे NSE की लिस्टिंग का रास्ता साफ हुआ. NSE बोर्ड ने 6 फरवरी को ऑफर को मंजूरी दी. दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती को 16 फरवरी को खारिज कर दिया गया.
अब एक्सचेंज करीब छह फीसदी हिस्सेदारी की बिक्री (Offer for Sale) की तैयारी कर रहा है, जिसकी अनुमानित वैल्यू करीब 2.5 अरब डॉलर है. अंतिम SEBI मंजूरी अगस्त के आसपास मिलने की उम्मीद है.
इस नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट से चार महीने पहले NSE में एक नए चेयरपर्सन की नियुक्ति हुई थी, श्रीनिवास इंजेती. वह 1983 बैच के ओडिशा कैडर के IAS अधिकारी हैं.
वह सितंबर 2025 में पब्लिक इंटरेस्ट डायरेक्टर के रूप में बोर्ड में शामिल हुए और उसी महीने SEBI की मंजूरी के बाद चेयरमैन बना दिए गए.
जिस SEBI ने उनकी नियुक्ति को मंजूरी दी और बाद में NSE की लिस्टिंग प्रक्रिया को आगे बढ़ाया, उसका नेतृत्व भी 1987 बैच के उसी ओडिशा कैडर के IAS अधिकारी के पास है.
इस बात का कोई सबूत नहीं है कि दोनों घटनाओं का आपस में कोई संबंध था. NSE का IPO कई वर्षों से प्रक्रिया में था और कानूनी अड़चनें अपने तरीके से दूर हुईं.
लेकिन व्यवहार में बंद सिस्टम ऐसा ही दिखाई देता है: 2.5 अरब डॉलर का फैसला, एक रिटायर्ड अधिकारी द्वारा ऐसे संस्थान के बारे में लिया गया जिसकी अध्यक्षता एक अन्य रिटायर्ड अधिकारी कर रहा है. कमरे में कोई बाहरी व्यक्ति नहीं है और फैसले की प्रक्रिया का कोई सार्वजनिक रिकॉर्ड भी उपलब्ध नहीं है.
NSE का इतिहास भी दिलचस्प रहा है. इसके पूर्व चेयरमैन अशोक चावला 1973 बैच के IAS अधिकारी थे और वित्त मंत्रालय में काम कर चुके थे.
2019 में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) द्वारा दिल्ली की एक अदालत को यह बताए जाने के बाद कि केंद्र सरकार ने एयरसेल-मैक्सिस मामले में पांच लोगों के खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी दी है, जिनमें अशोक चावला भी शामिल थे, उन्हें NSE के चेयरमैन और पब्लिक इंटरेस्ट डायरेक्टर पद से इस्तीफा देना पड़ा.
उनकी जगह गिरीश चंद्र चतुर्वेदी आए, जो 1973 बैच के IAS अधिकारी और पूर्व पेट्रोलियम सचिव थे. वह ICICI बैंक के चेयरमैन भी रह चुके थे.
एक ही व्यक्ति ने छह साल में तीन भूमिकाएं निभाईं
मौजूदा NSE चेयरमैन श्रीनिवास इंजेती के करियर को देखना भी महत्वपूर्ण है. वह कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय में सचिव रहे. वही मंत्रालय जो भारत के कंपनी कानून और कॉरपोरेट गवर्नेंस नियम तैयार करता है.
इसके बाद वह इंटरनेशनल फाइनेंशियल सर्विसेज सेंटर अथॉरिटी (IFSCA) के संस्थापक चेयरपर्सन बने, जो GIFT City का नियामक है.
अब वह देश के सबसे बड़े एक्सचेंज के चेयरमैन हैं. छह वर्षों में एक व्यक्ति एक ही टेबल के तीन अलग-अलग हिस्सों में बैठा नियम बनाए, उन्हें लागू किया और अब ऐसी संस्था चला रहा है जो उन्हीं नियमों के अधीन है.
उनके खाली किए गए IFSCA चेयर का पद के. राजारमन ने संभाला, जो 1989 बैच के तमिलनाडु कैडर के IAS अधिकारी और पूर्व टेलीकॉम सचिव हैं.
प्रथम स्तर के नियामक
NSE इंटरनेशनल एक्सचेंज में, जो NSE समूह की GIFT City इकाई है, अप्रैल 2025 से चेयरमैन नीरज कुमार गुप्ता हैं. वह 1982 बैच के उत्तर प्रदेश कैडर के IAS अधिकारी हैं, जो सरकार के निवेश और सार्वजनिक परिसंपत्ति प्रबंधन विभाग (Department of Investment and Public Asset Management) के सचिव पद से रिटायर हुए हैं.
मेट्रोपॉलिटन स्टॉक एक्सचेंज (Metropolitan Stock Exchange) ने मई 2026 में SEBI की मंजूरी के साथ घोषणा की कि उसकी चेयरपर्सन उपमा दादा चौधरी होंगी. वह 1983 बैच की हिमाचल प्रदेश कैडर की अधिकारी हैं, जो भारत सरकार में सचिव पद से रिटायर हुईं और मसूरी स्थित सिविल सेवा अकादमी की प्रमुख बनने वाली पहली महिला थीं.
वह ऐसे बोर्ड की जिम्मेदारी संभालेंगी, जिसमें दिनेश चंदर पाटवारी चेयरमैन और पब्लिक इंटरेस्ट डायरेक्टर के रूप में काम कर चुके हैं. पाटवारी 1986 बैच के इंडियन रेवेन्यू सर्विस (IRS) अधिकारी हैं.
नेशनल कमोडिटी एंड डेरिवेटिव्स एक्सचेंज (NCDEX) की अध्यक्षता आशीष बहुगुणा कर रहे हैं, जिन्होंने 1978 में IAS ज्वाइन किया था और 2015 में रिटायर हुए.
BSE में, जिसके चेयरमैन पूर्व IIT बॉम्बे निदेशक सुभाषिस चौधरी हैं, राजीव बंसल अप्रैल 2025 से पब्लिक इंटरेस्ट डायरेक्टर हैं.
वह 1988 बैच के नगालैंड कैडर के अधिकारी हैं. वह पूर्व नागरिक उड्डयन सचिव और एयर इंडिया के पूर्व चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक रह चुके हैं.
डिपॉजिटरी और बाजार इंफ्रास्ट्रक्चर में भी वही पैटर्न
डिपॉजिटरी भारत में लगभग हर शेयर के इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को संभालती हैं.
CDSL की अध्यक्षता गुरुमूर्ति महालिंगम कर रहे हैं. वह RBI के पूर्व एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर और SEBI के पूर्व पूर्णकालिक सदस्य रह चुके हैं.
CDSL की वेबसाइट पर सूचीबद्ध उनके अन्य पदों पर नजर डालना भी महत्वपूर्ण है:
1. भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC)
2. सिटी यूनियन बैंक
3. केयर रेटिंग्स
4. केयर रेटिंग्स नेपाल
5. इंडिया इंटरनेशनल बुलियन एक्सचेंज
6. DSP पेंशन फंड मैनेजर्स
7. थॉमस कुक इंडिया
एक व्यक्ति और बैकिंग, रेटिंग, पेंशन और बाजार इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे अलग-अलग क्षेत्रों में आठ बोर्ड बीमा,
CDSL के पब्लिक इंटरेस्ट डायरेक्टर्स में राजेश तुतजा भी शामिल हैं. वह 1987 बैच के IRS अधिकारी हैं और 2020 में इनकम टैक्स (जांच) के डायरेक्टर जनरल पद से रिटायर हुए.
इसके अलावा एस. गणेश कुमार भी बोर्ड में हैं, जो RBI के पूर्व एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर रह चुके हैं. सिद्धार्थ प्रधान, जो रिटायर्ड IRS अधिकारी हैं, भी इसी बोर्ड में रह चुके हैं.
NSDL में शशांक सक्सेना पब्लिक इंटरेस्ट डायरेक्टर हैं. उन्होंने आर्थिक मामलों के विभाग में वर्षों तक सीनियर इकोनॉमिक एडवाइजर के रूप में काम किया और इससे पहले PFRDA, IBBI, इलाहाबाद बैंक, सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया और DICGC के बोर्ड में रह चुके हैं.
MCX में संतोष कुमार मोहंती, जो SEBI के पूर्व पूर्णकालिक सदस्य हैं, मई 2026 में पब्लिक इंटरेस्ट डायरेक्टर बने.
मोहंती SEBI में सबसे लंबे समय तक काम करने वाले पूर्णकालिक सदस्यों और एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर्स में से एक रहे हैं. इससे पहले वह फॉरवर्ड मार्केट कमीशन में थे. दोनों संस्थाएं MCX को रेगुलेट करती थीं, जहां अब मोहंती बोर्ड में हैं.
NSE क्लियरिंग में RBI और NPCI के पूर्व अधिकारी अभय होता चेयरमैन हैं. उनके बोर्ड में जी.एस. हेगड़े भी शामिल हैं, जो कभी RBI के प्रिंसिपल लीगल एडवाइजर थे.
पैटर्न बाजार से आगे भी जाता है
यह पैटर्न केवल बाजार तक सीमित नहीं है.
शिवासुब्रमण्यम रमन, जो 1991 बैच के इंडियन ऑडिट एंड अकाउंट्स सर्विस अधिकारी और पूर्व डिप्टी कंट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल हैं, ने जून 2025 में पेंशन नियामक PFRDA का कार्यभार संभाला.
रवि मित्तल, जो 1986 बैच के बिहार कैडर के IAS अधिकारी हैं, भारतीय दिवाला एवं शोधन अक्षमता बोर्ड (IBBI) के चेयरमैन हैं.
नेशनल फाइनेंशियल रिपोर्टिंग अथॉरिटी (NFRA), जिसे IL&FS संकट के बाद ऑडिटर निगरानी संस्था के रूप में बनाया गया था, की अध्यक्षता नितिन गुप्ता कर रहे हैं. वह रिटायर्ड IRS अधिकारी और केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) के पूर्व चेयरमैन हैं.
उन्होंने अजय भूषण पांडे की जगह ली, जो 1984 बैच के IAS अधिकारी और पूर्व वित्त सचिव थे. वह अप्रैल 2025 में एशियन इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक (AIIB) में उपाध्यक्ष पद के लिए चले गए.
प्रतिस्पर्धा आयोग (Competition Commission) की अध्यक्षता रवनीत कौर कर रही हैं. वह 1988 बैच की पंजाब कैडर अधिकारी हैं, जिसके सदस्यों में पुलिस और ऑडिट सेवाओं के अधिकारी शामिल हैं.
फाइनेंशियल सर्विसेज इंस्टीट्यूशंस ब्यूरो (FSIB), जो सरकारी बैंकों और बीमा कंपनियों के प्रमुखों का चयन करता है, में बी.पी. शर्मा शामिल हैं. वह 1981 बैच के अधिकारी और कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) के पूर्व सचिव हैं.
और फिर बैंक
ICICI बैंक के गैर-कार्यकारी चेयरमैन पद पर जुलाई 2024 से प्रदीप कुमार सिन्हा हैं. वह 1977 बैच के उत्तर प्रदेश कैडर के IAS अधिकारी हैं.
वह 2015 से 2019 तक कैबिनेट सचिव रहे, भारतीय नौकरशाही का सबसे वरिष्ठ पद. उनका कार्यकाल इतना लंबा था कि छह दशक पुराने एक नियम में संशोधन करना पड़ा ताकि उन्हें इस पद पर बने रहने की अनुमति दी जा सके. इसके बाद वह प्रधानमंत्री के प्रधान सलाहकार भी रहे.
कोटक महिंद्रा बैंक के चेयरमैन सी.एस. राजन हैं, जो रिटायर्ड IAS अधिकारी हैं और राजस्थान के मुख्य सचिव रह चुके हैं.
एक्सिस बैंक के चेयरमैन एन.एस. विश्वनाथन हैं, जो रिजर्व बैंक के पूर्व डिप्टी गवर्नर रह चुके हैं.
इंडसइंड बैंक के चेयरमैन अरिजीत बसु हैं, जो भारतीय स्टेट बैंक के पूर्व मैनेजिंग डायरेक्टर रह चुके हैं.
बैंक ऑफ बड़ौदा की अध्यक्षता 2019 से 2024 तक हसमुख अधिया ने की थी. वह रिटायर्ड IAS अधिकारी और पूर्व वित्त सचिव हैं.
बैंक छोड़ने के पांच महीने बाद उन्हें गुजरात के मुख्यमंत्री का मुख्य प्रधान सचिव नियुक्त किया गया.
सरकार, फिर बैंक, फिर दोबारा सरकार.
और अप्रैल 2026 में रिजर्व बैंक ने बंधन बैंक के लिए नए पार्ट-टाइम चेयरमैन की नियुक्ति को मंजूरी दी, जो 5 जुलाई से प्रभावी हुई: डेबाशीष पांडा.
वित्तीय सेवा विभाग के सचिव रहते हुए उन्होंने भारत के बैंकों की निगरानी में भूमिका निभाई थी और RBI, भारतीय स्टेट बैंक, बैंक ऑफ बड़ौदा और LIC के बोर्ड में भी रह चुके थे.
मार्च 2025 तक वह देश के बीमा नियामक के प्रमुख थे.
पंद्रह महीने बाद वह एक निजी बैंक के चेयरमैन हैं, जिसे उनके ही सेवा कैडर से आने वाले RBI गवर्नर ने मंजूरी दी.
वे नियम जो पहले असर डालते थे
यह व्यवस्था हमेशा इतनी आसान नहीं थी.
1990 में प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव पद से हटने के बाद बी.जी. देशमुख को टाटा समूह से जुड़ने की अनुमति मिलने से पहले कई महीने इंतजार करना पड़ा था.
2007 में वित्त सचिव अशोक झा को हुंडई इंडिया के अध्यक्ष बनने के लिए कूलिंग-ऑफ नियमों से विशेष छूट लेनी पड़ी थी. यह छूट उन्हें कुछ महीने बाद मिली, जब वह केंद्रीय बजट तैयार करने में शामिल थे.
छूट मांगी जाती थी, उन पर बहस होती थी और कई बार उन्हें खारिज भी कर दिया जाता था.
दिसंबर 2015 में अखिल भारतीय सेवाओं के अधिकारियों के निजी व्यावसायिक रोजगार में जाने के लिए कूलिंग-ऑफ अवधि को दो साल से घटाकर एक साल कर दिया गया.
वहीं, छूट की प्रक्रिया धीरे-धीरे सामान्य बन गई.
और इस नियम में एक ऐसी खामी है, जो पूरे उद्देश्य को कमजोर कर देती है.
कूलिंग-ऑफ अवधि केवल व्यावसायिक रोजगार पर लागू होती है.
यह मंत्रालय से किसी नियामक संस्था में जाने पर लागू नहीं होती, क्योंकि नियामक भी एक सरकारी संस्था होती है.
न ही इसके बाद किसी अन्य पद पर जाने से यह अवधि किसी प्रभावी तरीके से दोबारा शुरू होती है.
इसी वजह से वित्तीय सेवा सचिव से बीमा नियामक और फिर निजी बैंक चेयरमैन बनने की यात्रा में औपचारिक रूप से कोई सवाल नहीं उठता.
बचाव का पक्ष
दो पूर्व वित्त सचिवों ने इस आलोचना पर अपनी राय सार्वजनिक रूप से रखी है.
सुभाष गर्ग ने पिछले साल द प्रिंट को बताया, "यह एक बिल्कुल अभूतपूर्व स्थिति है, जहां वित्त सचिव, जो हाल ही में रिटायर हुए हैं, अब उन संस्थानों का नेतृत्व कर रहे हैं, जिनका काम स्वतंत्र नियामक की भूमिका निभाना है."
उन्होंने कहा, "यह एक खतरनाक स्थिति है क्योंकि हम नियामकों को सरकारी अधिकारियों में बदलते हुए देख रहे हैं."
गर्ग ने BW Businessworld को भी एक विस्तृत इंटरव्यू दिया है. उन्होंने Businessworld से कहा, "यह अब केवल कब्जा (capture) नहीं है. यह पूरी तरह से अधीनता (subordination) है."
बैंकों के बारे में गर्ग का तर्क है कि वे तर्कसंगत व्यवहार कर रहे हैं.
"सैद्धांतिक रूप से निजी बैंक रिटायर्ड IAS अधिकारियों को अपने बोर्ड में शामिल नहीं करने का विकल्प चुन सकते हैं. वे ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि अगर उनके बोर्ड में कोई रिटायर्ड सरकारी अधिकारी होगा, तो सरकार के साथ बेहतर संवाद स्थापित किया जा सकता है."
Business Standard के ए.के. भट्टाचार्य ने भी इस महीने इसी तरह का तर्क दिया. उनका कहना है कि रिटायर्ड IAS अधिकारियों के नेतृत्व वाली नियामक व्यवस्था से निपटना आसान हो जाता है, अगर आपके पास भी उसी पृष्ठभूमि का कोई व्यक्ति चेयर पर हो.
बैंकों की मांग नियामकों में मौजूद व्यवस्था का परिणाम है.
दूसरी तरफ एक गंभीर तर्क भी है
लोक सेवक दुनिया की सबसे कठिन चयन प्रक्रियाओं में से एक को पार करके आते हैं और फिर 35 साल तक मंत्रालयों, राज्यों और सार्वजनिक क्षेत्र के बोर्डों में काम करते हैं.
निजी क्षेत्र में कोई भी व्यक्ति भारतीय राज्य के काम करने के तरीके की वैसी समझ हासिल नहीं कर सकता.
दुव्वुरी सुब्बाराव, जो IAS अधिकारी रहे और बाद में RBI गवर्नर बने, इसलिए दोनों पक्षों के उदाहरण हैं, का कहना है कि परिणाम व्यक्ति पर निर्भर करता है, उसकी पृष्ठभूमि पर नहीं.
उन्होंने कहा, "यह तय नहीं है कि क्योंकि कोई व्यक्ति अभी-अभी सरकार से वित्त नौकरशाह के रूप में रिटायर हुआ है, वह हर निर्देश के आगे झुक जाएगा."
उनके अनुसार, सरकार की कार्य संस्कृति की समझ एक संपत्ति है, लेकिन इसे संतुलित करना जरूरी है.
आलोचक जिस समस्या को नजरअंदाज करते हैं
इस व्यवस्था में एक सप्लाई की समस्या भी है, जिसे आलोचक अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं.
एक पब्लिक इंटरेस्ट डायरेक्टर को हितों के टकराव से मुक्त होना चाहिए. इस वजह से ब्रोकिंग, बैंकिंग, फंड मैनेजमेंट या सिक्योरिटीज कानून में काम कर चुके ज्यादातर लोग बाहर हो जाते हैं.
इसके बाद विकल्पों में रिटायर्ड अधिकारी, शिक्षाविद और न्यायाधीश ही बचते हैं और बोर्ड संरचनाएं भी यही दिखाती हैं.
NSE के निदेशकों में मणिपुर हाई कोर्ट के रिटायर्ड मुख्य न्यायाधीश, IIT बॉम्बे के दो प्रोफेसर, GNLU के एक कानून प्रोफेसर और TCS तथा Egon Zehnder के पूर्व मुख्य कार्यकारी अधिकारी शामिल हैं.
CDSL के बोर्ड में IIT बॉम्बे के कंप्यूटर वैज्ञानिक और टाटा समूह के पूर्व जनरल काउंसल भी हैं.
NSE क्लियरिंग के बोर्ड में कोई रिटायर्ड नौकरशाह नहीं है.
और IL&FS संकट, खराब ऋण संकट और NSE को-लोकेशन मामले के बाद वित्तीय संस्थानों की बाहरी निगरानी की जरूरत का तर्क कमजोर नहीं बल्कि और मजबूत हुआ है.
जब किसी अंदरूनी व्यक्ति ने पहली बार खुलकर बात कही
यह तर्क कि इस व्यवस्था से कुछ गलत नहीं हुआ है, मुख्य रूप से इस बात पर टिका है कि इसके अंदर मौजूद लगभग किसी व्यक्ति ने कभी इसका विरोध नहीं किया.
दिसंबर 2010 में दो लोगों ने ऐसा किया.
जी. मोहन गोपाल, जो उस समय नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी के निदेशक थे, SEBI बोर्ड के सदस्य थे.
दो साल पहले उन्होंने और रिजर्व बैंक के पूर्व डिप्टी गवर्नर वी. लीलाधर ने दो सदस्यीय पीठ के रूप में नेशनल सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी लिमिटेड (NSDL) के IPO डिमैट घोटाले में आचरण की जांच की थी.
दिसंबर 2008 में उन्होंने तीन आदेश पारित किए.
उनके अनुसार, NSDL अपने निगरानी, जांच और मॉनिटरिंग के कर्तव्य को पूरा करने में विफल रहा था और उन्होंने इन विफलताओं के लिए व्यक्तिगत जवाबदेही तय करने के लिए एक स्वतंत्र जांच के निर्देश दिए.
इसमें एक स्पष्ट समस्या थी.
जिस व्यक्ति ने संबंधित अवधि में NSDL का नेतृत्व किया था, वह आदेश लिखे जाने तक SEBI के चेयरमैन बन चुके थे.
उनका नाम था सी.बी. भावे.
SEBI बोर्ड ने इसके बाद तीन में से दो आदेशों को नॉन-एस्ट (non est) घोषित कर दिया यानी कानूनी रूप से अस्तित्वहीन.
तर्क दिया गया कि पीठ ने नियामक की आलोचना कर अपने अधिकार क्षेत्र से आगे बढ़कर काम किया था.
जांच का निष्कर्ष गायब हो गया.
कोई स्वतंत्र जांच नहीं हुई.
24 दिसंबर 2010 को जी. मोहन गोपाल ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को एक पत्र लिखा.
इस पत्र में उन्होंने अपने शब्दों में SEBI बोर्ड के भीतर सत्ता के गंभीर दुरुपयोग और भ्रष्ट आचरण का आरोप लगाया, जिसका उद्देश्य NSDL में उनके कार्यकाल के दौरान चेयरमैन के आचरण की स्वतंत्र जांच से उन्हें बचाना था.
उन्होंने प्रधानमंत्री से SEBI द्वारा NSDL से जुड़े फैसलों की उच्च स्तरीय जांच कराने और इसके पीछे मौजूद संरचनात्मक समस्या की जांच करने की मांग की.
इस पत्र में उन बोर्ड सदस्यों के नाम भी थे, जिन्हें वह नॉन-एस्ट फैसले के लिए जिम्मेदार मानते थे. इनमें वित्त मंत्रालय के प्रतिनिधि भी शामिल थे.
प्रधानमंत्री ने यह पत्र वित्त मंत्रालय को भेज दिया.
यानी उसी मंत्रालय को, जिसकी ओर से नियुक्त प्रतिनिधि के.पी. कृष्णन (1983 बैच IAS अधिकारी) उस SEBI बोर्ड में सदस्य थे, जिसके खिलाफ शिकायत की गई थी.
इसके बाद कोई कार्रवाई नहीं हुई.
यह पत्र किसी आधिकारिक माध्यम से सार्वजनिक नहीं हुआ.
यह केवल इसलिए सामने आया क्योंकि RTI कार्यकर्ता सुभाष चंद्र अग्रवाल ने इसकी जानकारी मांगी.
जुलाई 2011 में, सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी के बाद SEBI बोर्ड ने एक असामान्य कदम उठाते हुए उन आरोपों को दोबारा बहाल किया, जिन्हें पहले वह कानूनी रूप से अस्तित्वहीन घोषित कर चुका था.
2013 में सिक्योरिटीज अपीलेट ट्रिब्यूनल (SAT) ने NSDL के खिलाफ आदेश को रद्द कर दिया.
मार्च 2014 में MCX-SX मामले में भावे का नाम शामिल करते हुए CBI ने प्रारंभिक जांच दर्ज की, जिसे पांच महीने बाद बंद कर दिया गया.
भावे ने लगातार किसी भी गलत काम से इनकार किया.
उनके या किसी अन्य नामित व्यक्ति के खिलाफ भ्रष्टाचार का कोई निष्कर्ष दर्ज नहीं किया गया.
लेकिन यही मुख्य बिंदु है.
नियामक संस्था के अंदर मौजूद दो अधिकारियों ने देश के प्रधानमंत्री को लिखित रूप में गंभीर आरोप भेजे कि भारत के सिक्योरिटीज रेगुलेटर ने अपने ही चेयरमैन से जुड़े मामले को किस तरह संभाला.
इन आरोपों की किसी स्वतंत्र संस्था ने जांच नहीं की.
एक पत्र उसी मंत्रालय को वापस भेज दिया गया, जिसके खिलाफ शिकायत थी.
दूसरी ओर, उसी मंत्रालय ने मामले को खारिज कर दिया और शिकायत करने वाले अधिकारी को दोबारा नियुक्त नहीं किया गया.
जनता को इस पूरे मामले की जानकारी केवल इसलिए मिली क्योंकि एक निजी नागरिक ने सूचना के अधिकार कानून के तहत आवेदन किया.
व्यवस्था ने खुद को साफ नहीं किया.
उसने कभी अपनी जांच नहीं की.
जिन लोगों को जांच का आदेश देना था, वही लोग शिकायत के दायरे में थे.
यह पैटर्न वास्तव में क्या बताता है
इसलिए निष्कर्ष यह नहीं है कि "नौकरशाहों ने सभी बोर्डों पर कब्जा कर लिया है."
ऐसा नहीं है.
बाजार इंफ्रास्ट्रक्चर के स्तर पर, चेयर के नीचे भारत की वित्तीय व्यवस्था वास्तव में प्रोफेसरों, न्यायाधीशों और अकाउंटेंट्स जैसे अलग-अलग क्षेत्रों से आए लोगों के मिश्रण से चल रही है.
असल निष्कर्ष ज्यादा सीमित है और इसका जवाब देना ज्यादा कठिन है.
शक्ति का केंद्रीकरण चेयर की कुर्सी पर है, वह पद जो एजेंडा तय करता है, नामांकन समिति को संचालित करता है और मुख्य कार्यकारी अधिकारियों (CEO) की नियुक्तियों को मंजूरी देता है.
यह चेयर उस नियामक की मंजूरी से आता है, जिसका अपना प्रमुख भी उसी सेवा से आया है. और उस नियुक्ति को कैबिनेट की नियुक्ति समिति (Appointments Committee of the Cabinet) मंजूरी देती है, जिसकी बैठकों और विचार-विमर्श को सार्वजनिक नहीं किया जाता.
SEBI ने खुद इस समस्या की ओर इशारा किया है.
अगस्त 2024 में जारी एक परामर्श पत्र में SEBI ने पब्लिक इंटरेस्ट डायरेक्टर की नियुक्तियों में "निष्पक्ष निर्णय प्रक्रिया" (objective decision making) लाने के लिए बाहरी विशेषज्ञों वाली एक हाई लेवल अपॉइंटमेंट कमेटी बनाने का प्रस्ताव रखा था.
दो साल बाद भी इस कमेटी के अस्तित्व को लेकर कोई सार्वजनिक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है.
इन पदों पर बैठे अधिकांश लोग उपलब्ध जानकारी के अनुसार सक्षम और ईमानदार हैं.
इस लेख में जिन नियुक्तियों का जिक्र किया गया है, उनमें से किसी ने भी कोई नियम नहीं तोड़ा है.
हर नियुक्ति ने कानून में तय सभी प्रक्रियाओं को पूरा किया है.
यह व्यवस्था के पक्ष में तर्क से ज्यादा, व्यवस्था का विवरण है.
क्योंकि इन प्रक्रियाओं को उसी सेवा के लोगों ने तैयार किया, जिसके लोग अब इन्हीं प्रक्रियाओं के जरिए चुने जा रहे हैं.
और जब कभी किसी अंदरूनी व्यक्ति ने इन प्रक्रियाओं की जांच की मांग की, तो वह मांग उन्हीं लोगों के पास पहुंची, जिनसे सवाल पूछा जा रहा था.
यही वजह है कि यह समस्या किसी एक घोटाले की बजाय एक संरचनात्मक समस्या है.
संस्थाएं केवल भ्रष्टाचार से अपनी स्वतंत्रता नहीं खोतीं.
वे तब भी कमजोर होती हैं जब निर्णय लेने वाली पूरी व्यवस्था एक ही समूह से आने वाले लोगों से भर जाती है.
इसके लिए किसी विशेष पक्षपात की जरूरत नहीं होती और न ही किसी कानून को तोड़ने की.
साझा करियर और साझा सोच भी पर्याप्त हो सकती है.
करीब तीस पुरुष और महिलाएं, जो एक ही सेवा से आए हैं, अब उन संस्थाओं के शीर्ष पर बैठे हैं जो तय करती हैं कि भारत की बचत कहां जाएगी, कौन सी कंपनियां पूंजी जुटाएंगी और कौन से बैंक किसे कर्ज देंगे.
वे यह भी तय करते हैं कि नियामक कौन होगा, किसकी निगरानी होगी और अगली महत्वपूर्ण कुर्सी पर कौन बैठेगा.
इसके लिए कोई कानून नहीं बनाया गया.
यह एक-एक नियुक्ति के जरिए हुआ.
हर नियुक्ति कानूनी थी.
सवाल यह नहीं है कि ये अधिकारी सक्षम हैं या नहीं.
सवाल यह है कि क्या किसी वित्तीय व्यवस्था में यह उचित है कि एक ही सेवा उसके नियामक, उसके रेफरी और तेजी से उन संस्थानों के पसंदीदा चेयरमैन उपलब्ध कराए, जिनकी निगरानी वही व्यवस्था करती है.
जब हर रास्ता वापस उन्हीं लोगों के समूह तक पहुंचने लगे, तो स्वतंत्रता ऐसी चीज नहीं रह जाती जिसकी गारंटी व्यवस्था देती है.
वह व्यक्ति के चुनाव पर निर्भर हो जाती है.
कुछ ऐसा ही अतनु चक्रवर्ती ने मार्च में किया और इसकी कीमत उन्हें चुकानी पड़ी.
जैसे किसी सम्राट की उत्तराधिकार योजना हो, भारत की वित्तीय संरचना में अब कुछ-कुछ वंशानुगत प्रशासनिक व्यवस्था जैसी स्थिति दिखाई देती है, खून के रिश्ते से नहीं, बल्कि कैडर के आधार पर.
हर नियुक्ति कानूनी है और उसे योग्यता के आधार पर सही ठहराया जा सकता है.
लेकिन जब इन सभी नियुक्तियों को एक साथ देखा जाता है, तो एक ऐसी तस्वीर सामने आती है जिसे कोई अकेली नियुक्ति नहीं दिखाती.
एक ऐसी व्यवस्था, जिसमें शक्ति बार-बार उसी दायरे में घूमती रहती है.
बोर्ड संरचनाएं जुलाई 2026 तक संस्थानों की अपनी वेबसाइट और एक्सचेंज फाइलिंग में उपलब्ध जानकारी के आधार पर हैं और इनमें समय-समय पर बदलाव होते रहते हैं.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)