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अडानी समूह के इस प्रोजेक्‍ट से बदल सकती है तटीय क्षेत्रों की तस्‍वीर, बढ़ेगा रोजगार

दुनिया भर में, मैंग्रोव 123 देशों में हैं, जो लगभग 150,000 वर्ग किमी के क्षेत्र को कवर करते हैं. लगभग एक तिहाई दक्षिण पूर्व एशिया में है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago

अडानी समूह ने भारत में गुजरात के तटीय क्षेत्रों में मैंग्रोव को लेकर एक पायलट प्रोजेक्‍ट की शुरुआत की है. इस पायलट प्रोजेक्‍ट के तहत तटीय क्षेत्रों में मैंग्रोव का वृक्षारोपड़ करके गैर मैंग्रोव वनस्‍पति से बना एक बॉयो डॉयसर्विटी क्षेत्र विकसित करने को लेकर काम कर रही है. ये जहां एक ओर समुद्री जीवों के लिए कई तरह की सुरक्षा देने का करता है वहीं दूसरी ओर समुद्र को तट की ओर आने से भी रोकता है. यही नहीं ये रोजगार के लिए कई तरह के अवसर पैदा करा रहा है. 

आखिर क्‍या है ये पायलट प्रोजेक्‍ट? 
मैंग्रोव को बढ़ाने के लिए अदाणी समूह ने एक स्मार्ट समाधान पेश किया है. समुद्री तट के किनारे समूह ने मैंग्रोव वृक्षारोपण के साथ गैर-मैंग्रोव वनस्पति से बना एक बायो-शील्ड विकसित किया है. शुरुआत में, गुजरात के भरूच जिले के जंबुसर तालुका के टंकारी गांव में समुद्र तट पर 1 किमी लंबाई और 180 मीटर चौड़ाई के क्षेत्र की पहचान की गई थी. समुद्र के किनारे से पहले 50 मीटर का उपयोग मैंग्रोव वृक्षारोपण के लिए किया गया था, जो प्राकृतिक बांस की बाड़ से संरक्षित था, जो समुद्री तट की रक्षा करने, क्षेत्र में मत्स्य पालन और समग्र जैव विविधता को बढ़ावा देने में मदद करता है.

यह क्षेत्र के इकोसिस्टम को बढ़ाने में भी सहायता करता है. अदाणी समूह का यह पायलट प्रोजेक्ट देश भर में ऐसी नवीन परियोजनाओं को सफलतापूर्वक लागू करने का रोडमैप साबित हो सकता है. इसके बाद के 50 मीटर में पिलुडी वृक्षारोपण शामिल है, एक तेल-बीज पौधा जो आस-पास के समुदायों के लिए अतिरिक्त आय के स्रोत के रूप में कार्य करता है.

मवेशियों के लिए चारे का करता है इंतजाम? 
इस वृक्षारोपरण अभियान में 50 मीटर में शारू और उंट-मोराड वृक्षारोपण शामिल है, जो शुष्क मौसम के दौरान मवेशियों के पालन के लिए चारे की आपूर्ति करता है. शेष 30 मीटर में चारा, फल और औषधीय पौधे शामिल हैं, जो पर्याप्त आर्थिक मूल्य पेश करते हैं और खारे हवाओं को रोकने में मदद करते हैं, जिससे क्षेत्र के हरियाली में वृद्धि होती है. यह परियोजना एक प्राकृतिक ढाल बन गई और टिकाऊ जीवन के लिए अपनी तरह के पहले अवसर प्रस्तुत किए. नर्सरी निर्माण, वृक्षारोपण, मैंग्रोव संरक्षण और जैव ढाल की सुरक्षा की पूरी प्रक्रिया स्थानीय ग्रामीणों और मछुआरे समुदाय की मदद से की जा रही है, जिससे उन्हें आजीविका के अवसर प्रदान किए जा रहे हैं. इसके अलावा 44 लाख से अधिक पेड़ लगाए गए हैं. सीवेज ट्रीटेड पानी के उपयोग से वृक्षारोपण में सहायता और ताजे पानी के स्रोतों पर निर्भरता कम करने के दोहरे लाभ मिले हैं. गुजरात के मुंद्रा जैसे कुछ स्थानों पर, 100% सिंचाई सीवेज उपचारित जल के माध्यम से की जाती है.

क्यों जरूरी हैं मैंग्रोव फॉरेस्ट?
मैंग्रोव का महत्व समुद्री घास और कोरल रीफ की तरह ही है और इनका आपस में एक करीबी रिश्ता है. जहां मैंग्रोव और समुद्री घास गाद और प्रदूषकों को समुद्र के भीतर जाने से रोकते हैं और कोरल रीफ को जिन्दा रखते हैं वहीं दूसरी और कोरल रीफ विनाशकारी समुद्री लहरों की ताकत को कम करके मैंग्रोव और समुद्री घास को बचाती है. मैंग्रोव न केवल तटीय भूमि में समुद्र के प्रवेश को रोकते हैं बल्कि वह मछलियों, झींगा, केकड़ों और कई जन्तुओं और वनस्पति प्रजातियों को निवास और प्रजनन क्षेत्र प्रदान करते हैं. इस तरह से जैव विविधता के संरक्षण में उनका अहम रोल है.

मैंग्रोव कटाव को कम करके और तूफान की घटनाओं के दौरान तूफान के प्रभावों को कम करके आसपास के आबादी वाले क्षेत्रों की रक्षा करने में मदद करने के लिए प्राकृतिक बुनियादी ढांचा प्रदान करते हैं. वे इकोसिस्टम के लिए भी महत्वपूर्ण हैं. उनकी घनी जड़ें मिट्टी को बांधने और बनाने में मदद करती हैं. भारत में मैंग्रोव का फैलाव कई राज्यों की समुद्र तट रेखा पर है लेकिन यह हर जगह नहीं हैं.

मैंग्रोव है भारत के तटीय संरक्षण की संजीवनी
भारत मैंग्रोव के योगदान को संरक्षण और बहाली के साधन समेत ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन से निपटने और जलवायु प्रभावों को कम करने के तरीके के रूप में उपयोग करने की कोशिश कर रहा है. सभी वैश्विक मैंग्रोव हर वर्ष 21 मिलियन टन तक कार्बन सोख सकते हैं, जो समतुल्य ऊपरी उष्णकटिबंधीय वनों से लगभग 10 गुना अधिक है. इसके अलावा, मैंग्रोव इकोसिस्टम तटीय गाद, कार्बन भंडारण में 10% से 15% का योगदान देता है और लगभग 10% कण स्थलीय कार्बन को समुद्र में निर्यात करता है. मैंग्रोव वन उत्पादक इकोसिस्टम का निर्माण करते हैं, जो वैश्विक वन क्षेत्र के 0.4% से भी कम का प्रतिनिधित्व करते हैं, और वे समुद्री पर्यावरण और समुदायों को कई सामान और सेवाएँ प्रदान करते हैं.


देश के पूर्वी तट पर पश्चिम बंगाल और ओडिशा और पश्चिमी तट पर गुजरात में मैंग्रोव के घने जंगल हैं. यह दिलचस्प है कि भारत के दो राज्य, पश्चिम बंगाल में जहां तट रेखा सबसे छोटी है और गुजरात में जहां तट रेखा की लंबाई सबसे अधिक है, मैंग्रोव का सबसे घना फैलाव है. दूसरे राज्य जैसे ओडिशा, तमिलनाडु और केरल के अलावा अंडमान में मैंग्रोव की संख्या ज्यादा है. भारत में मैंग्रोव की अधिकता वाले सभी इलाकों में या तो आबादी का दबाव है या औद्योगिक विकास का ढांचा है. दुनिया भर में, मैंग्रोव 123 देशों में हैं, जो लगभग 150,000 वर्ग किमी के क्षेत्र को कवर करते हैं. लगभग एक तिहाई दक्षिण पूर्व एशिया में है.


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