आप Israel-Hamas War के पीछे मौजूद सीक्रेट पाइपलाइन के बारे में जानते हैं?

Israel-Hamas War को लेकर मीडिया द्वारा सुनाई गई कहानी को तो लोगों ने मान लिया है पर क्या आपको युद्ध की हकीकत पता है?

Last Modified:
Saturday, 18 November, 2023
Israel Secret pipeline

Levina Neythiri, रणनीतिक मामलों की एक्सपर्ट एवं रक्षा विशेषज्ञ

हमास के आतंकवादियों ने कैसे इजराइल-गाजा (Israel-Gaza) सीमा पर मौजूद नेगेव रेगिस्तान में एक रेव पार्टी पर हमला किया और सैकड़ों निर्दोष लोगों को मारकर, कई लोगों को बंधक बना लिया, ये कहानी तो सभी लोगों को पता है. लेकिन क्या आप इजराइल-हमास युद्ध (Israel Hamas War) के पीछे मौजूद प्रमुख कारण को जानते हैं? गाजा पट्टी के करीब मौजूद नेगेव रेगिस्तान के विशाल विस्तार से होकर एक गुप्त तेल पाइपलाइन गुजरती है, जो न केवल इजराइल राज्य के लिए एक जीवन रेखा है, बल्कि सुएज नहर (Suez Canal) की संभावित प्रतिद्वंद्वी भी है. सुएज नहर यूरोप और एशिया के बीच मौजूद केवल दो ट्रांजिट पॉइंट्स में से एक है और एशिया से हर दिन अरबों डॉलर मूल्य का कच्चा तेल ले जाने वाली शिपिंग लाइनें भी इसी नहर से होकर जाती हैं. 158 मील लंबी ये पाइपलाइन, लाल सागर पर मौजूद इजरायली तट को देश की तेल रिफाइनरियों से जोड़ती है. आमतौर पर, कुछ ऐसा जो इजरायली अर्थव्यवस्था को मजबूत कर सकता है, वह हमास और हौथिस जैसे आतंकवादी समूहों के लिए एक कैंसरग्रस्त घाव की तरह है, जो अब इजरायल में पाइपलाइन को बंद कर पाने वाले बिंदुओं को अपना लक्ष्य बना रहे हैं.

कौन करता है इस पाइपलाइन की देखरेख?
इस पाइपलाइन को इजराइल की सरकारी कंपनी इलियट एशकेलोन पाइपलाइन कंपनी (EAPC) के द्वारा नियंत्रित किया जाता है. कुछ सालों पहले तक यह इजरायल का सबसे बड़ा राष्ट्रीय रहस्य था लेकिन एक घातक तेल रिसाव की बदौलत इसका खुलासा हो गया. फिर भी पूरी संभावना है कि भविष्य में EAPC दुनिया की अग्रणी तेल परिवहन प्रणाली बन जाएगी. ये इजराइल को सिर्फ तेल की आपूर्ति नहीं करती है, बल्कि मध्य पूर्व से यूरोप और एशिया के अधिकांश हिस्सों में अरबों बैरल तेल को सुरक्षित रूप से ले जाने में भी इसकी भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण है. सऊदी के सबसे बड़े अंग्रेजी अखबार, द अरब न्यूज ने जून 2021 की एक समाचार रिपोर्ट ने सुझाव दिया कि UAE (संयुक्त अरब अमीरात) ने अक्टूबर 2020 में इजरायल की सरकारी कंपनी के साथ एक समझौता करने के बाद इजरायली पाइपलाइन के माध्यम से यूरोप में तेल पहुंचाना शुरू कर दिया है. इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया था कि 2021 में अमीराती जहाजों द्वारा देश के दक्षिणी हिस्से में इलियट बंदरगाह (वर्तमान में हमास के भारी हमलों का सामना कर रहे क्षेत्र) पर तेल ले जाना शुरू कर दिया था. इसके बाद इजरायली सार्वजनिक प्रसारक ने इलियट-एशकेलोन पाइपलाइन से जुड़े तेल टैंकरों की तस्वीरें भी दिखाई थीं, जिनमें पाइपलाइन के द्वारा तेल की आपूर्ति हो रही थी. सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने इस महीने इस्लामिक-अरब शिखर सम्मेलन में टेल-अवीव के साथ सभी राजनयिक और आर्थिक संबंधों को खत्म करने और अरब हवाई क्षेत्र में इजराइल के विमानों को प्रवेश देने से इनकार करने के प्रस्ताव को रोक दिया था. इस प्रस्ताव में यह भी कहा गया था कि तेल का उत्पादन करने वाले मध्य पूर्वी देशों को गाजा में युद्धविराम की स्थिति प्राप्त करने के लिए "साधन के रूप में तेल का उपयोग करने की धमकी देनी चाहिए". 

हमास का हमला- पागलपन में इस्तेमाल किया गया तरीका
यूरोप जाने वाले ईरानी जहाज, लाल सागर के किनारे इजराइल के सबसे दक्षिणी सिरे पर स्थित इलियट बंदरगाह तक तेल पहुंचाएंगे. वहां से तेल को उत्तरी गाजा के सिरे से लगभग 5 किलोमीटर उत्तर में भूमध्यसागरीय तट पर स्थित एक शहर अश्कलोन तक पहुंचाया जाता था. पाइपलाइन का मार्ग सिनाई द्वीप से होकर गुजरता है, जो 200 किलोमीटर चौड़ा है, जो इसे प्रभावी रूप से मिस्र की सुएज नहर से अलग करता है. हालांकि 1979 में ईरानी क्रांति के साथ यह कोलैबरेशन समाप्त हो गया, जिसने इजराइल और ईरान के बीच गतिशीलता को काफी हद तक बदलकर रख दिया था. क्रांति के बाद, ईरान और इजराइल कट्टर विरोधी बन गए. फिर भी, क्रांति के बाद कुछ समय के लिए, इजराइल ने विवेकपूर्वक ईरानी तेल को पाइपलाइन के माध्यम से प्रवाहित करने की अनुमति दी.

EAPC ने खींचा लोगों का ध्यान
2014 में जब पाइपलाइन के टूटने से इजराइल में सबसे खराब पर्यावरणीय संकट पैदा हुआ तब EAPC कुछ समय के लिए कुछ लोगों का ध्यान खींचने में कामयाब रही थी. संयुक्त अरब अमीरात, इजराइल और बहरीन से जुड़े अब्राहम समझौते पर हस्ताक्षर होने तक EAPC पाइपलाइन फिर से अस्पष्टता में बदल गई थी. इसके बाद, EAPC तेल पाइपलाइन के संबंध में इजराइल और यूएई के बीच चर्चा हुई, जो लाल सागर को भूमध्य सागर से जोड़ती है. इजरायली अधिकारियों ने विशेष रूप से इस पाइपलाइन के संचालन के संबंध में उच्च स्तर की गोपनीयता बनाए रखी. इन ट्रेड कॉरिडोर्स का महत्व आर्थिक जीवन शक्ति से कहीं अधिक है. वे अक्सर भविष्य के संघर्षों और कभी-कभी युद्ध की धुरी के रूप में काम करते हैं. ऐतिहासिक उदाहरण के तौर पर आप ये समझिये कि जैसे सोवियत-अफगान संघर्ष, अजरबैजान और आर्मेनिया के बीच लंबे समय से चली आ रही प्रतिद्वंद्विता और रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे तनाव, और इजराइल-हमास युद्ध (Israel Hamas War), सभी असाधारण महत्व वाले इन ट्रेड कॉरिडोर्स में घटित हुए. इनमें से अधिकांश कॉरिडोर्स, दुनिया भर में मौजूद 7 चोक पॉइंट्स को पार करते हैं. युद्ध और संघर्षों को समझने के लिए केवल मतभेद वाले पक्षों की सतही स्तर की धारणा से परे जाने की आवश्यकता है. सैन्य रणनीतिक बनाने वालों और भू-राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में यह भूगोल और उनमें मौजूद व्यापारिक हितों का मिश्रण है जो अक्सर युद्ध को बढ़ावा देता है. अंतर्राष्ट्रीय साजिशों और भू-राजनीति की दुनिया ऐसी कहानियों से भरी पड़ी है जो अक्सर सतह के नीचे छिपी रहती हैं और सामने आने का इंतजार करती हैं. इस हमले के पीछे की रणनीति क्या है और बेखौफ आतंकी किसके हाथ में खेल रहे हैं? ईरान, कतर, रूस और चीन, इजरायल की तेल पाइपलाइन और उसकी इलियट परियोजना को नष्ट होते देख सबसे ज्यादा खुश होंगे, क्योंकि इसके अस्तित्व से ही इन देशों को मुख्य रूप से क्षेत्रीय कॉरिडोर्स पर नियंत्रण स्थापित करने के युद्ध का खतरा है.

EAPC कैसे बदल सकती है तेल परिवहन का परिदृश्य?
EAPC की प्रतिदिन क्षमता 600,000 बैरल जितनी प्रभावशाली है और इसके साथ ही एक विशाल भंडारण स्थान भी है जो लगभग 23 मिलियन बैरल को इकट्ठा करने में सक्षम है. अब आप इसकी तुलना इसके पड़ोसी सुएज नहर से करें. खाड़ी से यूरोप तक पहुंचाए जाने वाले तेल का एक महत्वपूर्ण हिस्सा या तो सुएज नहर या मिस्र की सुमेद पाइपलाइन के माध्यम से गुजरता है, जिसकी क्षमता 2.5 मिलियन बैरल प्रतिदिन है. सम्मिलित पाइपलाइन की क्षमता EAPC की व्यापक क्षमताओं का लगभग 1/10वां हिस्सा है. EAPC की बहुत सी असाधारण विशेषताओं में से एक VLCC (Very Large Crude Corridor) नामक विशाल सुपरटैंकरों को संभालने की क्षमता में निहित है, जो 2 मिलियन बैरल तक पेट्रोलियम परिवहन करने में सक्षम हैं. इसके उलट 150 साल पहले बनाई गई सुएज नहर (Suez Canal) अपनी गहराई और चौड़ाई से जुड़ी सीमाओं से जूझ रही है, जो इसे वीएलसीसी की केवल आधी क्षमता के साथ सुएजमैक्स के रूप में पहचाने जाने वाले जहाजों को समायोजित करने तक सीमित है. परिणामस्वरूप सुएज नहर से परंपरागत रूप से दो जहाजों को किराए पर लेने वाले तेल व्यापारियों को इजराइल के माध्यम से भेजे जाने वाले एक वीएलसीसी जहाज के लिए भुगतान करना पड़ता है. सुएज के माध्यम से एकतरफा शुल्क अनुमानित $300,000 से $400,000 तक बढ़ने के साथ-साथ EAPC पाइपलाइन अपने ग्राहकों को  लागत पर पर्याप्त लाभ प्रदान कर सकती है. कुछ समय पहले तक उत्तरी इजराइल में मौजूद एशकेलोन में में डॉकिंग करने वाले जहाजों को GCC बंदरगाहों तक पहुंचने से रोक दिया गया था, जिससे EAPC की ग्राहक शिपिंग कंपनियों को अपनी पहचान छिपाने के लिए कई पंजीकरण और अन्य युक्तियों सहित विस्तृत रणनीति अपनाने के लिए प्रेरित किया गया था. यही एक कारण है कि इजराइल ने कभी भी EAPC के बारे में बहुत अधिक जानकारी साझा नहीं की, जिससे उसके ग्राहकों को नुकसान होता.

इजराइल ने मुआवजा देने से किया इनकार
EAPC के आसपास गोपनीयता के इस जटिल जाल को एक और वजह से जिम्मेदार ठहराया जा सकता है. इजराइल अपने मुनाफे को ईरान के साथ साझा करता है. 2015 में, एक स्विस अदालत ने फैसला सुनाया कि इजराइल EAPC पाइपलाइन से होने वाले मुनाफे के हिस्से के रूप में ईरान को लगभग 1.1 बिलियन डॉलर का भुगतान करने के लिए बाध्य था. हालांकि, इजराइल ने इस मुआवजे के फैसले का पालन करने से इनकार कर दिया. इजराइल के प्रतिरोध का कारण समझना मुश्किल नहीं है. मौजूदा ईरानी शासन ने इजराइल के साथ सहयोग करने से इनकार कर दिया है जिससे निकट भविष्य में शांति और लाभ के बंटवारे की उम्मीद नहीं की जा सकती है.

क्षेत्रीय नियंत्रण की लड़ाई
वैश्विक भू-राजनीति के जटिल जाल में सात महत्वपूर्ण समुद्री चोक पॉइंट मौजूद हैं जो दुनिया के रणनीतिक परिदृश्य को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. ये चोक पॉइंट, अक्सर संकीर्ण मार्ग, बड़े क्षेत्रों के बीच महत्वपूर्ण कनेक्टर के रूप में काम करते हैं और इन्हें आमतौर पर जलडमरूमध्य या नहर के रूप में जाना जाता है, जिसके माध्यम से बड़ी मात्रा में समुद्री यातायात प्रभावित होता है. ध्यान देने योग्य बात ये है कि इनमें से तीन महत्वपूर्ण चोक पॉइंट मध्य पूर्व में स्थित हैं, जो इस क्षेत्र की बारहमासी चुनौतियों में जटिलता की एक अतिरिक्त परत जोड़ते हैं. इससे साफ हो जाता है कि मध्य-पूर्व (Middle East) में लगातार उथल-पुथल क्यों देखी जाती है. मध्य-पूर्व की जटिल भू-राजनीतिक गतिशीलता तब स्पष्ट हो जाती है जब कोई इसके भौगोलिक परिदृश्य पर करीब से नजर डालता है. मध्य पूर्व में चोक पॉइंट की तिकड़ी, अर्थात् सुएज नहर, बाब अल मंडेब और होर्मज संकरी राह मौजूद है. ये सभी चोक पॉइंट अंतर्राष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखला और माल के समुद्री परिवहन में लिंचपिन के रूप में काम करते हैं. इनमें से दो चोक पॉइंट इजराइल के ठीक बगल में हैं और एक थोड़ा दूर UAE के पास मौजूद है. उल्लेखनीय रूप से, तकनीकी प्रगति वाले इस युग में भी लगभग 80% वैश्विक व्यापार समुद्री शिपिंग मार्गों पर ही निर्भर है. यह तथ्य ऊपर सूचीबद्ध चोक बिंदुओं के महत्व को दर्शाता है. 2020 में सुएज नहर में व्यवधान के बावजूद, मिस्र के सुएज नहर आर्थिक क्षेत्र ने अक्टूबर में चाइना एनर्जी के साथ 6.75 बिलियन डॉलर का एक समझौता पूरा किया था. इसके साथ ही कतर ने मिस्र की अर्थव्यवस्था में 5 अरब डॉलर के बड़े निवेश का वादा किया है. यहाँ ध्यान देने वाली बात ये है कि मिस्र ने अपने हालिया इतिहास में शायद ही कभी इतना बड़ा विदेशी निवेश देखा है. सुएज नहर के संचालन में किसी भी प्रकार की अप्रत्याशित जटिलताओं या असफलताओं की स्थिति में चीन और कतर को बिना किसी संदेह के नतीजों का खामियाजा भुगतना पड़ेगा. सुएज नहर में कारोबार का नुकसान इन दोनों देशों को नुकसान पहुंचाएगा. हाल के दशकों में, मिस्र और इजराइल ने उल्लेखनीय स्तर का सहयोग विकसित किया है और इनकी बदौलत क्षेत्र की भू-राजनीति पर महत्वपूर्ण परिणाम हुए हैं. ईस्टर्न मेडिटेरेनियन पाइपलाइन कंपनी (EAPC) की परिचालन क्षमता में सक्रियता इस साझेदारी को खतरे में डाल देगी. यह प्रयास विवाद से रहित नहीं है, क्योंकि यह सुएज नहर के माध्यम से किए जाने वाले मिस्र के आकर्षक व्यापार का लगभग 10-12% हिस्सा छीनने के लिए तैयार है. संभावित प्रभाव मिस्र की सीमाओं से परे तक फैलते हैं, जिससे चीन और कतर सहित तीसरे पक्ष के हितधारकों के लिए चिंताएं बढ़ जाती हैं. 

इजराइल के लिए नाजुक है स्थिति
अपने पड़ोसी देश इजिप्ट के साथ नाजुक राजनयिक संबंध का त्याग किए बिना इजराइल को इस चुनौती से निपटने की जरूरत है जिसकी वजह से यह स्थिति और ज्यादा जटिल हो गई है. यह इजराइल की ओर से एक संतुलन अधिनियम की मांग करता है, क्योंकि इजराइल क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने के साथ-साथ अपनी ऊर्जा को भी सुरक्षित करना चाहता है. EAPC के पास अजरबैजान और कजाकिस्तान जैसे उत्पादकों द्वारा भेजे गए जहाजों से अश्कलोन में उतारे गए तेल को अकाबा की खाड़ी में तैनात टैंकरों तक पहुंचाने की जबरदस्त क्षमता मौजूद है. ये टैंकर चीन, दक्षिण कोरिया और एशिया के विभिन्न अन्य क्षेत्रों सहित दूरगामी गंतव्यों के लिए नियत हैं. इस गतिशीलता का महत्व न केवल ऊर्जा व्यापार में बल्कि इसके भू-राजनीतिक निहितार्थों में भी निहित है. अजरबैजान, इजराइल के साथ अपने बहुमुखी संबंधों के कारण खड़ा है, जिसमें व्यापार और सैन्य सहयोग दोनों ही शामिल हैं. यह बंधन रणनीतिक रूप से लाभकारी होते हुए भी, क्षेत्र में भू-राजनीतिक परिदृश्य को जटिल बनाता है. इसके विपरीत, अजरबैजान के ऐतिहासिक प्रतिद्वंद्वी, आर्मेनिया को ईरान का समर्थन प्राप्त है, जो मुख्य रूप से उनके लंबे समय से चले आ रहे संबंधों और व्यापार संबंधों की वजह से उपजा है. आर्मेनिया और अजरबैजान दोनों अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन कॉरिडोर (INSTC) में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जो रूस को अजरबैजान के माध्यम से ईरान से जोड़ता है और यह भारत तक फैला हुआ है, जिससे एशिया के अन्य हिस्सों में माल के परिवहन की सुविधा मिलती है. यहां इस बात को ध्यान में रखना जरूरी है कि रूस दुनिया में सबसे अधिक स्वीकृत देश है और ईरान, प्रतिबंधों के मुकाबले थोड़ा बेहतर प्रदर्शन करता है, जिससे INSTC का संरक्षण उनके लिए सर्वोपरि हो जाता है. इन जटिल भू-राजनीतिक हालातों की पृष्ठभूमि में हम भारत-मध्य पूर्व-यूरोप कॉरिडोर (IMEU) के उद्भव को देखते हैं. यह गलियारा भारत, मध्य पूर्व और यूरोप के बीच व्यापार और कनेक्टिविटी को बढ़ावा देता है. इस समीकरण में मध्य पूर्व खंड काफी हद तक इजराइल, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और सऊदी अरब जैसे प्रमुख खिलाड़ियों तक ही सीमित है. IMEC, INSTC का रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी बनने की ओर आगे बढ़ रहा है, जिससे क्षेत्रीय तनाव और ज्यादा बढ़ जाएगा. यह भू-राजनीतिक शतरंज की बिसात हमें ध्यान दिलाती है कि कैसे अजरबैजान और आर्मेनिया जैसे संघर्ष पूरे महाद्वीपों में गूंजते हैं, और इजराइल-हमास युद्ध से जुड़े हुए हैं. मध्य पूर्व में चल रहा इजराइल-हमास संघर्ष, क्षेत्रीय तनाव और वैश्विक भू-राजनीति के बीच जटिल अंतर्संबंध का प्रतीक है जहां हर कदम के परिणाम अंतरराष्ट्रीय संबंधों के जटिल ताने-बाने में फैल जाते हैं.

निष्कर्ष में क्या कहा जा सकता है?
वर्तमान परिदृश्य में, इलियट और एशकेलॉन पाइपलाइन को बाधित करने की ईरान की क्षमता पर खतरा मंडरा रहा है. यदि ईरान इलियट और एशकेलॉन पाइपलाइन को नुकसान पहुंचाने में कामयाब हो जाता है, तो वह EAPC के माध्यम से अपने व्यापार के नुकसान का बदला ले पायेगा जिससे इजराइल, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और सऊदी अरब सहित प्रमुख खिलाड़ियों के सामने चुनौतियां बढ़ जाएंगी. इसके साथ ही, इजराइल-हमास संघर्ष संयुक्त राज्य अमेरिका को कमजोर करने में कामयाब रहा है. अमेरिका की नौसैनिक संपत्ति, सेंटकॉम (सेंट्रल कमांड) क्षेत्र में महत्वपूर्ण एकाग्रता के साथ मध्य पूर्व को कवर करती है. यह रणनीतिक पुनर्गठन, संयुक्त राज्य अमेरिका को अन्य वैश्विक चिंताओं, विशेष रूप से यूक्रेन, पर इजराइल के लिए अपने समर्थन को प्राथमिकता देने के लिए मजबूर करता है. फोकस में यह बदलाव रूस के हितों के अनुरूप है, जिससे उसे स्थिति का लाभ उठाने की अनुमति मिलती है. अराजकता की इस स्थिति में कतर और चीन नामक दो अपेक्षाकृत शांत लेकिन प्रभावशाली देश भी हैं, जो महत्वपूर्ण नतीजों के लिए तैयार हैं. यदि EAPC अपनी अधिकतम परिचालन क्षमता प्राप्त कर लेता है तो सुएज नहर में उनके पर्याप्त निवेश पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा. इस व्यवधान के आर्थिक प्रभाव कई उद्योगों पर पड़ सकते हैं और मौजूदा भू-राजनीतिक गतिशीलता को और तेज कर सकते हैं. मीडिया के आख्यानों द्वारा इजराइल-हमास युद्ध को एक सभ्यतागत संघर्ष में बदल दिया गया है, लेकिन क्या ऐसा है? यह व्यावसायिक हित हैं जिन्हें प्रत्येक खिलाड़ी सुरक्षित रखने का प्रयास कर रहा है. यह युद्ध कॉरिडोर्स का युद्ध है.
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भारत का निर्यात बना नई ताकत, 863 अरब डॉलर के पार पहुंचा विदेशी व्यापार

निर्यात वृद्धि में सबसे बड़ा योगदान सेवा क्षेत्र का रहा है. सेवा निर्यात 2024-25 में 387.55 अरब डॉलर से बढ़कर 2025-26 में 421.32 अरब डॉलर तक पहुंच गया है, जो 8.71 प्रतिशत की वृद्धि है.

Last Modified:
Thursday, 07 May, 2026
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वैश्विक आर्थिक चुनौतियों के बावजूद भारत ने वित्त वर्ष 2026 में निर्यात के मोर्चे पर ऐतिहासिक प्रदर्शन किया है. देश का कुल माल और सेवाओं का निर्यात बढ़कर 863.11 अरब डॉलर तक पहुंच गया है. यह पिछले वर्ष की तुलना में 4.59 प्रतिशत की वृद्धि को दर्शाता है और भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती को उजागर करता है.

रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा कुल निर्यात

वाणिज्य मंत्रालय के संशोधित आंकड़ों के अनुसार भारत का कुल निर्यात वित्त वर्ष 2024-25 के 825.26 अरब डॉलर से बढ़कर 2025-26 में 863.11 अरब डॉलर हो गया है. यह अब तक का सबसे उच्च स्तर है. रुपये के हिसाब से यह आंकड़ा लगभग 81.42 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है, जो भारत के वैश्विक व्यापार में बढ़ते प्रभाव को दर्शाता है.

हर मिनट 15 करोड़ रुपये का निर्यात

सरकारी डेटा के अनुसार भारत ने पिछले वित्त वर्ष में औसतन हर मिनट 15.50 करोड़ रुपये से अधिक का निर्यात किया. इसके अलावा हर दिन लगभग 22,325 करोड़ रुपये का निर्यात हुआ और हर 24 घंटे में करीब 930 करोड़ रुपये का व्यापार दर्ज किया गया. यह आंकड़े देश की मजबूत होती निर्यात क्षमता और वैश्विक बाजार में बढ़ती हिस्सेदारी को दर्शाते हैं.

वस्तु निर्यात में हल्की बढ़त

रिपोर्ट के अनुसार वस्तु यानी गुड्स निर्यात 437.70 अरब डॉलर से बढ़कर 441.78 अरब डॉलर हो गया है. यह 0.93 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है. वैश्विक अनिश्चितताओं और व्यापारिक चुनौतियों के बावजूद भारत का माल निर्यात लगातार स्थिर गति से आगे बढ़ता रहा है और कुल निर्यात में अहम योगदान देता रहा है.

सेवा निर्यात बना सबसे मजबूत क्षेत्र

निर्यात वृद्धि में सबसे बड़ा योगदान सेवा क्षेत्र का रहा है. सेवा निर्यात 2024-25 में 387.55 अरब डॉलर से बढ़कर 2025-26 में 421.32 अरब डॉलर तक पहुंच गया है, जो 8.71 प्रतिशत की वृद्धि है. यह अब तक का सबसे उच्च स्तर है. विशेषज्ञों के अनुसार IT सेवाएं, बिजनेस सॉल्यूशंस और प्रोफेशनल एक्सपर्टीज की बढ़ती वैश्विक मांग ने इस क्षेत्र को मजबूत बनाया है.

अर्थव्यवस्था की मजबूती का संकेत

विशेषज्ञों का मानना है कि निर्यात में यह वृद्धि भारत की वैश्विक बाजार में बढ़ती हिस्सेदारी और आर्थिक स्थिरता का संकेत है. वैश्विक चुनौतियों के बावजूद यह प्रदर्शन दिखाता है कि भारत की अर्थव्यवस्था लगातार मजबूत हो रही है और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में उसकी स्थिति और सशक्त बन रही है.

वित्त वर्ष 2026 में भारत का रिकॉर्ड निर्यात यह दर्शाता है कि देश तेजी से वैश्विक व्यापार में अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है. माल और सेवाओं दोनों क्षेत्रों में हुई वृद्धि ने भारतीय अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया है और भविष्य के लिए सकारात्मक संकेत दिए हैं.
 


खनिज अधिकार कर मामले में केंद्र-राज्य आमने-सामने, 20 मई को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई

यह मामला 25 जुलाई 2024 को आए सुप्रीम कोर्ट की नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ के फैसले से शुरू हुआ था. 8:1 के बहुमत से दिए गए इस फैसले में कहा गया कि राज्यों के पास खनिज अधिकारों पर कर लगाने की विधायी क्षमता है.

Last Modified:
Thursday, 07 May, 2026
BWHindia

भारत का सुप्रीम कोर्ट 20 मई को खनिज अधिकारों पर कर लगाने के राज्यों के विधायी अधिकार से जुड़े कई याचिकाओं पर सुनवाई करेगा. यह मामला तब सामने आया जब केंद्र सरकार ने अदालत को बताया कि इस विषय पर उसकी क्यूरेटिव याचिका अभी लंबित है. यह विवाद पिछले साल आए एक ऐतिहासिक फैसले से जुड़ा है, जिसमें राज्यों को खनिज युक्त भूमि और खनिज अधिकारों पर कर लगाने का अधिकार मान्यता दी गई थी.

संविधान पीठ के फैसले से शुरू हुआ विवाद

यह मामला 25 जुलाई 2024 को आए सुप्रीम कोर्ट की नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ के फैसले से शुरू हुआ था. 8:1 के बहुमत से दिए गए इस फैसले में कहा गया कि राज्यों के पास खनिज अधिकारों पर कर लगाने की विधायी क्षमता है.

अदालत ने स्पष्ट किया था कि संविधान की यूनियन लिस्ट की एंट्री 54 के तहत संसद को खनिज भूमि और खनिज अधिकारों पर कर लगाने का एकमात्र अधिकार प्राप्त नहीं है.

केंद्र सरकार की क्यूरेटिव याचिका लंबित

इस फैसले के बाद सितंबर 2024 में पुनर्विचार याचिकाएं खारिज कर दी गई थीं. इसके बाद केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में क्यूरेटिव याचिका दाखिल कर फैसले पर पुनर्विचार की मांग की है. सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत से अनुरोध किया कि इस मामले की सुनवाई तब तक न की जाए जब तक क्यूरेटिव याचिका पर निर्णय नहीं हो जाता.

कुछ वकीलों ने इस अनुरोध का समर्थन करते हुए सुनवाई टालने की बात कही, जबकि राज्यों की ओर से पेश वकीलों ने देरी का विरोध किया और कहा कि पुनर्विचार याचिकाएं पहले ही खारिज हो चुकी हैं.

2005 से जुड़े बकाया वसूली के आदेश

14 अगस्त 2024 के एक अन्य फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने खनिज संपन्न राज्यों को खनिज अधिकारों और खनिज युक्त भूमि से संबंधित रॉयल्टी और टैक्स की वसूली की अनुमति दी थी. यह वसूली 1 अप्रैल 2005 से बकाया राशि पर लागू होगी और इसे 1 अप्रैल 2026 से शुरू होकर 12 वर्षों में चरणबद्ध तरीके से वसूला जाएगा.

ब्याज और जुर्माने पर राहत

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि 25 जुलाई 2024 से पहले की अवधि के लिए उठाए गए किसी भी कर या मांग पर ब्याज या जुर्माना नहीं लगाया जाएगा. यह निर्णय लंबे समय से चले आ रहे कानूनी अनिश्चितता को ध्यान में रखते हुए दिया गया था.

केंद्र और राज्यों के बीच जारी कानूनी टकराव

यह मामला केंद्र और राज्यों के बीच अधिकार क्षेत्र को लेकर चल रहे लंबे कानूनी संघर्ष को दर्शाता है. अब सभी की नजरें 20 मई की सुप्रीम कोर्ट सुनवाई पर टिकी हैं, जिससे इस विवाद की दिशा तय हो सकती है.
 


अमेरिका-ईरान शांति वार्ता की अनिश्चितता से कच्चे तेल की कीमतों में उछाल, बाजार सतर्क

निवेशकों ने अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते की संभावना और समय-सीमा का पुनर्मूल्यांकन किया, जिससे पश्चिम एशिया से आपूर्ति बाधित होने की चिंताओं में बदलाव देखने को मिला.

Last Modified:
Thursday, 07 May, 2026
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वैश्विक बाजारों में गुरुवार को शुरुआती कारोबार के दौरान कच्चे तेल की कीमतों में तेजी दर्ज की गई. यह उछाल उस गिरावट के बाद आया है, जिसमें पिछले सत्र में कीमतें 7 प्रतिशत से अधिक गिर गई थीं. निवेशकों ने अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते की संभावना और समय-सीमा का पुनर्मूल्यांकन किया, जिससे पश्चिम एशिया से आपूर्ति बाधित होने की चिंताओं में बदलाव देखने को मिला.

ब्रेंट और WTI क्रूड में बढ़ोतरी

ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स 88 सेंट यानी 0.9 प्रतिशत बढ़कर 102.15 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया. वहीं अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड 1.12 डॉलर यानी 1.2 प्रतिशत बढ़कर 96.20 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था.

पिछली गिरावट के बाद रिकवरी

यह रिकवरी बुधवार को हुई तेज गिरावट के बाद देखने को मिली, जब दोनों बेंचमार्क दो सप्ताह के निचले स्तर पर पहुंच गए थे. उस समय बाजारों में यह उम्मीद थी कि कूटनीतिक प्रयासों से पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष समाप्त हो सकता है.

हालांकि, बाद में बाजार की धारणा बदल गई जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि तेहरान के साथ आमने-सामने बातचीत के लिए “अभी समय नहीं है”, जिससे संकेत मिला कि वार्ता अभी भी अस्थिर स्थिति में है.

ईरान की प्रतिक्रिया और वार्ता की स्थिति

इसी बीच, एक वरिष्ठ ईरानी सांसद ने कथित तौर पर अमेरिकी प्रस्ताव को “समझौते का ठोस ढांचा” नहीं बल्कि केवल एक “इच्छा सूची” बताया. अमेरिकी मीडिया आउटलेट एक्सियोस की रिपोर्ट के अनुसार, वॉशिंगटन ने ईरान से अगले 48 घंटों के भीतर संभावित समझौते से जुड़े कई प्रमुख बिंदुओं पर जवाब मांगा है. रिपोर्ट में कहा गया है कि दोनों पक्ष संघर्ष शुरू होने के बाद से अब तक किसी भी समय की तुलना में समझौते के सबसे करीब हैं.

आपूर्ति में देरी की आशंका

विशेषज्ञों के अनुसार, यदि जल्द ही शांति समझौता भी हो जाता है, तो पश्चिम एशिया से कच्चे तेल की आपूर्ति सामान्य होने में कई सप्ताह लग सकते हैं. इस दौरान वैश्विक रिफाइनर और ऊर्जा कंपनियां मांग पूरी करने के लिए अपने भंडार का उपयोग करती रहेंगी.

अमेरिकी भंडार में गिरावट से समर्थन

कीमतों को अतिरिक्त समर्थन तब मिला जब अमेरिकी सरकार के बुधवार को जारी आंकड़ों में कच्चे तेल और ईंधन के भंडार में फिर गिरावट दर्ज की गई. यूएस एनर्जी इंफॉर्मेशन एडमिनिस्ट्रेशन (EIA) ने बताया कि ईरान संकट से जुड़ी आपूर्ति बाधाओं की भरपाई के प्रयासों के कारण भंडार लगातार कम हो रहा है.

वैश्विक घटनाओं पर भी नजर

निवेशक अब पश्चिम एशिया के बाहर की भू-राजनीतिक घटनाओं पर भी नजर बनाए हुए हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की अगले सप्ताह होने वाली बैठक भी वैश्विक बाजार धारणा और मांग के अनुमान को प्रभावित कर सकती है.

 


भारत के रक्षा निर्यात में FY2017 से 25 गुना वृद्धि, घरेलू उत्पादन रिकॉर्ड स्तर पर: रिपोर्ट

रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2025 में भारत का रक्षा उत्पादन रिकॉर्ड 1.54 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जो FY2015 की तुलना में तीन गुना से अधिक है.

Last Modified:
Thursday, 07 May, 2026
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भारत के रक्षा क्षेत्र ने पिछले एक दशक में उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की है. घरेलू उत्पादन और रक्षा निर्यात में तेज़ बढ़ोतरी के साथ देश आत्मनिर्भरता की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है. यह जानकारी रुबिक्स डेटा साइंसेज़ की एक रिपोर्ट में सामने आई है.

रक्षा उत्पादन रिकॉर्ड स्तर पर

रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2025 में भारत का रक्षा उत्पादन रिकॉर्ड 1.54 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जो FY2015 की तुलना में तीन गुना से अधिक है. सरकार ने FY2029 तक रक्षा उत्पादन को बढ़ाकर 3 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचाने का लक्ष्य तय किया है. वहीं, रक्षा बजट भी बढ़कर FY2027 में 7.85 लाख करोड़ रुपये हो गया, जो कुल केंद्रीय बजट का 14.67 प्रतिशत है.

घरेलू कंपनियों को बढ़ावा

रिपोर्ट में कहा गया है कि इस वृद्धि का प्रमुख कारण घरेलू खरीद को बढ़ावा देने वाली सरकारी नीतियां हैं. FY2025 में रक्षा मंत्रालय ने 2.09 लाख करोड़ रुपये के 193 अनुबंध किए, जिनमें 92 प्रतिशत अनुबंध संख्या के आधार पर और 81 प्रतिशत मूल्य के आधार पर भारतीय कंपनियों को दिए गए. वर्तमान में देश की लगभग 65 प्रतिशत रक्षा आवश्यकताओं का उत्पादन भारत में ही हो रहा है, जबकि एक दशक पहले रक्षा क्षेत्र आयात पर काफी निर्भर था.

रक्षा निर्यात में बड़ी छलांग

भारत के रक्षा निर्यात में भी मजबूत वृद्धि दर्ज की गई है. FY2026 में रक्षा निर्यात 38,400 करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जो पिछले वर्ष की तुलना में 63 प्रतिशत अधिक है और FY2017 के मुकाबले 25 गुना वृद्धि दर्शाता है. भारत अब 80 से अधिक देशों को रक्षा उपकरण निर्यात कर रहा है, जिनमें ब्रह्मोस मिसाइल और आकाश वायु रक्षा प्रणाली जैसे अत्याधुनिक सिस्टम शामिल हैं. सरकार ने FY2029 तक रक्षा निर्यात को 50,000 करोड़ रुपये तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है.

आयात में विविधता की रणनीति

हालांकि भारत अभी भी दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा हथियार आयातक बना हुआ है, लेकिन अब वह अपने आपूर्तिकर्ता देशों में विविधता ला रहा है. रूस की हिस्सेदारी में गिरावट आई है, जबकि फ्रांस और इज़राइल की मौजूदगी बढ़ी है. FY2026 में भारत ने 71 अरब अमेरिकी डॉलर मूल्य के 55 रक्षा खरीद प्रस्तावों को मंजूरी दी.

निजी क्षेत्र और स्टार्टअप्स की भागीदारी

रिपोर्ट में निजी क्षेत्र की बढ़ती भागीदारी को भी रेखांकित किया गया है. वर्तमान में 16,000 से अधिक MSME और 1,000 से ज्यादा रक्षा स्टार्टअप इस क्षेत्र में योगदान दे रहे हैं. हालांकि, रिपोर्ट ने कुछ चुनौतियों की ओर भी ध्यान दिलाया है, जिनमें महत्वपूर्ण आयातों पर निर्भरता, सीमित अनुसंधान एवं विकास (R&D) निवेश और सप्लाई चेन संबंधी कमजोरियां शामिल हैं.

आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ता भारत

कुल मिलाकर, रिपोर्ट संकेत देती है कि भारत का रक्षा क्षेत्र निरंतर सरकारी नीतियों और बढ़ती औद्योगिक क्षमता के समर्थन से आत्मनिर्भरता की दिशा में मजबूती से आगे बढ़ रहा है.
 


पश्चिम एशिया संकट से बढ़ा आर्थिक दबाव, फिर भी मजबूत बनी हुई है भारत की अर्थव्यवस्था: रिपोर्ट

तेल की बढ़ती कीमतें, सप्लाई चेन में रुकावट और विदेशी निवेश में उतार-चढ़ाव के बीच घरेलू मांग और मजबूत वित्तीय सिस्टम भारत को दे रहे सहारा.

Last Modified:
Thursday, 07 May, 2026
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पश्चिम एशिया में जारी तनाव और युद्ध का असर अब वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ-साथ भारत पर भी साफ दिखाई देने लगा है. कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों, व्यापारिक मार्गों में बाधा और विदेशी निवेश में अस्थिरता ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ाया है. हालांकि इन चुनौतियों के बावजूद भारत की आर्थिक स्थिति अपेक्षाकृत मजबूत बनी हुई है. वित्त मंत्रालय और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) का मानना है कि मजबूत घरेलू मांग, स्थिर बैंकिंग व्यवस्था और सरकार की नीतिगत तैयारियों ने अर्थव्यवस्था को बड़े झटकों से बचाए रखा है.

ऊर्जा और व्यापार पर बढ़ा दबाव

इसके बावजूद वित्त मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट कहती है कि भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत है, भले ही थोड़ी हिली हुई है. इसकी वजह है देश के अंदर मजबूत मांग, स्थिर वित्तीय सिस्टम और सरकार की नीतियां, जो झटकों को संभाल रही हैं.

पश्चिम एशिया संकट का सबसे बड़ा असर भारत के ऊर्जा आयात और व्यापार पर पड़ रहा है. भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा तेल और गैस आयात करता है और मिडिल ईस्ट इस आपूर्ति का प्रमुख केंद्र है. तनाव बढ़ने से न केवल तेल महंगा हुआ है, बल्कि शिपिंग लागत और सप्लाई चेन पर भी असर पड़ा है.

विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार बढ़ती भू-राजनीतिक अनिश्चितता से निर्यात, आयात और उत्पादन लागत प्रभावित हो सकती है. कई उद्योगों को कच्चे माल की उपलब्धता और समय पर शिपमेंट को लेकर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है.

महंगाई और ग्रोथ पर बढ़ा जोखिम

कच्चे तेल की कीमतें हाल के दिनों में 110 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गई हैं, जिससे भारत का आयात बिल बढ़ने की आशंका है. तेल महंगा होने का सीधा असर महंगाई पर पड़ता है, क्योंकि परिवहन से लेकर उत्पादन तक लगभग हर क्षेत्र में लागत बढ़ जाती है.

RBI ने भी चेतावनी दी है कि महंगे कच्चे माल और सप्लाई में बाधा आर्थिक विकास की रफ्तार को धीमा कर सकती है. हालांकि सरकार फिलहाल पेट्रोल और डीजल की कीमतों को स्थिर रखने की कोशिश कर रही है, लेकिन लंबे समय तक ऐसा करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है.

विदेशी निवेश में उतार-चढ़ाव

वैश्विक अनिश्चितता का असर विदेशी निवेश पर भी दिखाई दे रहा है. 2026 के शुरुआती महीनों में विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजारों से करीब 1.8 लाख करोड़ रुपये निकाले हैं. इससे शेयर बाजार और रुपये पर दबाव बढ़ा है.

हालांकि घरेलू निवेशकों ने इस दौरान बाजार को स्थिर बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई है. म्यूचुअल फंड और रिटेल निवेशकों की लगातार भागीदारी ने बाजार में भरोसा बनाए रखा.

क्यों मजबूत मानी जा रही है भारतीय अर्थव्यवस्था?

विशेषज्ञों के अनुसार भारत की अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत उसकी घरेलू मांग है. देश की 60 फीसदी से ज्यादा आर्थिक गतिविधियां घरेलू खपत पर आधारित हैं, जिससे बाहरी झटकों का असर सीमित रहता है.

इसके अलावा बैंकिंग सेक्टर की स्थिति मजबूत है, कंपनियों की बैलेंस शीट पहले से बेहतर हुई है और भारत का विदेशी मुद्रा भंडार करीब 697 अरब डॉलर के स्तर पर बना हुआ है. सेवाओं का निर्यात भी अर्थव्यवस्था को मजबूती दे रहा है.

संकट को अवसर में बदलने की चुनौती

अर्थशास्त्रियों का मानना है कि मौजूदा संकट भारत के लिए एक बड़ा सबक भी है. देश को ऊर्जा आयात पर निर्भरता कम करने, सप्लाई चेन को मजबूत बनाने और नवीकरणीय ऊर्जा के इस्तेमाल को तेज करने की जरूरत है.

सरकार पहले से ही ग्रीन एनर्जी, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने पर जोर दे रही है. आने वाले समय में यही कदम भारत को वैश्विक झटकों से ज्यादा सुरक्षित बना सकते हैं.

आगे कैसी रहेगी अर्थव्यवस्था की चाल?

फिलहाल भारत की अर्थव्यवस्था दबाव में जरूर है, लेकिन उसकी बुनियादी स्थिति मजबूत मानी जा रही है. घरेलू मांग, सरकारी निवेश और वित्तीय स्थिरता ने अर्थव्यवस्था को सहारा दिया है. हालांकि पश्चिम एशिया का संकट अगर लंबा खिंचता है तो महंगाई, व्यापार और विकास दर पर असर और गहरा हो सकता है. ऐसे में सरकार और केंद्रीय बैंक के अगले कदम भारतीय अर्थव्यवस्था की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे.
 

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भारत-वियतनाम रिश्तों को मिली नई उड़ान, 2030 तक 25 अरब डॉलर व्यापार का लक्ष्य तय

पीएम नरेंद्र मोदी और वियतनाम के राष्ट्रपति तो लाम की बैठक में रक्षा, डिजिटल पेमेंट, फार्मा और दुर्लभ खनिज समेत 18 अहम समझौतों पर सहमति बनी है.

Last Modified:
Thursday, 07 May, 2026
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भारत और वियतनाम ने अपने द्विपक्षीय संबंधों को नई ऊंचाई देने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वियतनाम के राष्ट्रपति तो लाम के बीच नई दिल्ली के हैदराबाद हाउस में हुई उच्चस्तरीय वार्ता के बाद दोनों देशों ने अपने रिश्तों को “उन्नत व्यापक रणनीतिक साझेदारी” के स्तर तक ले जाने का फैसला किया. इस दौरान 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 25 अरब डॉलर तक पहुंचाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया गया. साथ ही रक्षा, डिजिटल भुगतान, फार्मा, शिक्षा, बैंकिंग, दुर्लभ खनिज और संस्कृति समेत कई क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर सहमति बनी.

18 समझौतों पर हस्ताक्षर, डिजिटल और फार्मा सहयोग को बढ़ावा

भारत और वियतनाम के बीच कुल 18 समझौतों की घोषणा की गई. इनमें दवा नियामक संस्थाओं के बीच हुआ करार खास रहा, जिससे वियतनाम में भारतीय दवाओं की उपलब्धता बढ़ेगी. इसके अलावा दोनों देशों ने डिजिटल भुगतान प्रणाली को जोड़ने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया. भारत के यूपीआई और वियतनाम की भुगतान प्रणाली को जल्द एकीकृत करने की योजना है, जिससे दोनों देशों के बीच वित्तीय लेनदेन आसान होगा.

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारत से वियतनाम को कृषि, मत्स्य और पशु उत्पादों का निर्यात अब और आसान होगा. उन्होंने यह भी कहा कि जल्द ही वियतनाम के लोग भारतीय अंगूर और अनार का स्वाद चख सकेंगे.

रक्षा साझेदारी में तेजी, ब्रह्मोस मिसाइल पर चर्चा

बैठक के दौरान रक्षा सहयोग प्रमुख मुद्दों में शामिल रहा. दोनों देशों के बीच ब्रह्मोस मिसाइल खरीद को लेकर चर्चा हुई, जिसकी संभावित कीमत करीब 62.9 करोड़ डॉलर बताई जा रही है. इस सौदे में प्रशिक्षण और लॉजिस्टिक सहायता भी शामिल हो सकती है.

प्रधानमंत्री मोदी ने वियतनाम को सुखोई-30 लड़ाकू विमानों और किलो श्रेणी की पनडुब्बियों के रखरखाव, मरम्मत और संचालन में भारत की ओर से सहयोग की पेशकश की. भारत पहले भी वियतनाम को तेज रफ्तार नौकाओं, पनडुब्बी बैटरियों और नौसेना जहाजों के विकास के लिए 50 करोड़ डॉलर की ऋण सहायता देने की घोषणा कर चुका है.

दक्षिण चीन सागर और क्षेत्रीय सुरक्षा पर भी चर्चा

भारत और वियतनाम के बीच हुई प्रतिनिधिमंडल स्तर की वार्ता में दक्षिण चीन सागर की स्थिति और क्षेत्रीय सुरक्षा पर भी विस्तार से चर्चा हुई. दोनों नेताओं ने क्षेत्र में शांति, स्थिरता, कानून व्यवस्था और समृद्धि बनाए रखने के लिए मिलकर काम करने पर सहमति जताई.

प्रधानमंत्री मोदी ने वियतनाम को भारत की “एक्ट ईस्ट पॉलिसी” और “विजन ओशन” का अहम स्तंभ बताया. उन्होंने कहा कि दोनों देशों के रिश्ते अब केवल सांस्कृतिक और आर्थिक सहयोग तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि सुरक्षा, आपूर्ति श्रृंखला और सामरिक साझेदारी के नए आयाम भी स्थापित करेंगे.

व्यापार और निवेश को मिलेगी नई गति

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि पिछले एक दशक में भारत और वियतनाम के बीच व्यापार दोगुना होकर 16 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है. अब दोनों देशों ने इसे 2030 तक 25 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य रखा है. साथ ही भारत-आसियान व्यापार समझौते को इस साल के अंत तक उन्नत करने पर भी सहमति बनी है.

दोनों देशों ने केंद्रीय बैंकों के बीच सहयोग बढ़ाने, राज्यों और शहरों के स्तर पर साझेदारी मजबूत करने और निवेश को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया. विशेषज्ञों का मानना है कि यह साझेदारी आने वाले वर्षों में हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की रणनीतिक स्थिति को और मजबूत करेगी.
 


कल बाजार में दिखी जोरदार तेजी, आज इन बड़े शेयरों और ग्लोबल संकेतों पर रहेगी नजर

बुधवार को BSE सेंसेक्स 940.73 अंक की मजबूती के साथ 77,958.52 अंक पर बंद हुआ, जबकि NSE  निफ्टी 298.15 अंक की बढ़त के साथ 24,330.95 अंक पर पहुंच गया था.

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Thursday, 07 May, 2026
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पश्चिम एशिया में तनाव कम होने और कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट के संकेतों के बीच बुधवार को घरेलू शेयर बाजार में शानदार तेजी देखने को मिली थी. बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE)
सेंसेक्स 940.73 अंक यानी 1.22 फीसदी की मजबूती के साथ 77,958.52 अंक पर बंद हुआ, जबकि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE)  निफ्टी 298.15 अंक यानी 1.24 फीसदी की बढ़त के साथ 24,330.95 अंक पर पहुंच गया था. बैंकिंग, ऑटो और एविएशन शेयरों में जोरदार खरीदारी से निवेशकों का भरोसा मजबूत हुआ था. अब गुरुवार को बाजार की नजर वैश्विक संकेतों, अमेरिका और एशियाई बाजारों के रुख, क्रूड ऑयल की चाल और कई बड़ी कंपनियों के मार्च तिमाही नतीजों पर रहेगी. 

इन शेयरों ने दिखाई दमदार तेजी

सेंसेक्स के 30 शेयरों में से 21 शेयर बढ़त के साथ बंद हुए. सबसे ज्यादा तेजी इंडिगो के शेयर में देखने को मिली, जो 6.73 फीसदी चढ़ा. इसके अलावा ट्रेंट, एशियन पेंट्स, एसबीआई, एक्सिस बैंक, एचडीएफसी बैंक, महिंद्रा एंड महिंद्रा, बजाज फाइनेंस, मारुति और बजाज फिनसर्व के शेयरों में भी 2 फीसदी से ज्यादा की तेजी दर्ज की गई.

दूसरी ओर रिलायंस इंडस्ट्रीज के शेयर में सबसे ज्यादा 1.79 फीसदी की गिरावट रही. इसके अलावा पावरग्रिड, एनटीपीसी, लार्सन एंड टुब्रो, एचसीएल टेक और टाइटन के शेयर भी दबाव में रहे.

मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में भी खरीदारी

बाजार की तेजी केवल बड़े शेयरों तक सीमित नहीं रही. व्यापक बाजार यानी ब्रॉडर मार्केट में भी खरीदारी का माहौल देखने को मिला. निफ्टी मिडकैप इंडेक्स 1.76 फीसदी और निफ्टी स्मॉलकैप इंडेक्स 1.93 फीसदी मजबूत होकर बंद हुए. सेक्टोरल इंडेक्स की बात करें तो निफ्टी पीएसयू बैंक, निफ्टी प्राइवेट बैंक, निफ्टी बैंक और निफ्टी रियल्टी इंडेक्स में अच्छी तेजी रही. हालांकि एफएमसीजी सेक्टर अपेक्षाकृत कमजोर रहा.

कच्चे तेल में गिरावट से बाजार को मिला सहारा

बाजार में तेजी की एक बड़ी वजह कच्चे तेल की कीमतों में आई गिरावट भी रही. अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने होर्मुज स्ट्रेट में चल रहे “प्रोजेक्ट फ्रीडम” को फिलहाल रोकने की घोषणा की है. यह परियोजना जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए शुरू की गई थी. ट्रंप के मुताबिक, अमेरिका फिलहाल इस बात का आकलन कर रहा है कि ईरान के साथ किसी संभावित समझौते की गुंजाइश बन सकती है या नहीं. इस बयान के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतों में करीब 7 फीसदी की गिरावट आई और यह 102 डॉलर प्रति बैरल के आसपास ट्रेड करता दिखा. कच्चे तेल की कीमतों में नरमी से भारतीय बाजार को राहत मिली, क्योंकि इससे आयात लागत और महंगाई के दबाव में कमी आने की उम्मीद बढ़ी है.

विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया में तनाव कम होने और क्रूड ऑयल की कीमतों में गिरावट ने निवेशकों की धारणा को मजबूत किया है. बैंकिंग, ऑटो और एविएशन शेयरों में आई खरीदारी ने बाजार को ऊंचे स्तर पर बंद होने में मदद की. आने वाले दिनों में वैश्विक संकेत और कच्चे तेल की चाल बाजार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे.

आज इन शेयरों पर रखें नजर

बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, आज भारतीय शेयर बाजार की शुरुआत मजबूत संकेतों के साथ होने की उम्मीद है और निवेशकों की नजर कई बड़े शेयरों पर रहेगी. GIFT निफ्टी में बढ़त और वैश्विक बाजारों से मिले सकारात्मक संकेतों के बीच Paytm की पैरेंट कंपनी One97 Communications, Bajaj Auto, Meesho, Aditya Birla Real Estate, South Indian Bank, Indian Bank, Mahindra Lifespaces, Larsen & Toubro (L&T), Deepak Fertilizers और Newgen Software Technologies जैसे शेयर फोकस में रह सकते हैं. Paytm ने मार्च तिमाही में घाटे से निकलकर 184 करोड़ रुपये का मुनाफा दर्ज किया है, जबकि Bajaj Auto का शुद्ध लाभ दोगुने से ज्यादा बढ़ा है. Meesho का घाटा घटा है और Aditya Birla Real Estate भी नुकसान से मुनाफे में आई है. South Indian Bank के मजबूत नतीजे और Indian Bank की पूंजी जुटाने की योजना भी निवेशकों का ध्यान खींच सकती है. वहीं Mahindra Lifespaces ने मुंबई में बड़ा प्रीमियम प्रोजेक्ट लॉन्च किया है और L&T को JSW Steel से 10,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का बड़ा ऑर्डर मिला है. Deepak Fertilizers ने अधिग्रहण के जरिए अपने कारोबार का विस्तार किया है, जबकि Newgen Software को अंतरराष्ट्रीय ऑर्डर मिला है. इसके अलावा आज BSE, MRF, Britannia, Biocon, Lupin, Dabur, Bharat Forge, Pidilite और अन्य कई कंपनियां मार्च तिमाही के नतीजे जारी करेंगी, जिससे बाजार में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है.

(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)


उद्योग जगत के दिग्गजों ने लॉन्च की Daksham Capital, प्रीमियम फैमिली ऑफिस और वित्तीय सेवा फर्म

भारत में 2035 तक सर्विसेबल वेल्थ पूल के लगभग 9 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचने की संभावना के बीच, दक्षम् कैपिटल का उद्देश्य बिखरी हुई सलाहकारी सेवाओं को एकीकृत और रिसर्च-आधारित प्लेटफॉर्म के माध्यम से सुव्यवस्थित करना है.

Last Modified:
Wednesday, 06 May, 2026
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वित्तीय सेवा क्षेत्र के चार अनुभवी दिग्गजों ने अपनी साझा सोच और विशेषज्ञता के बल पर “दक्षम् कैपिटल” (Daksham Capital) की शुरुआत की है. यह एक मल्टी-फैमिली ऑफिस, प्रीमियम प्राइवेट बैंकिंग और वेल्थ मैनेजमेंट फर्म है, जो उच्च-नेट-वर्थ (HNI) और अल्ट्रा-हाई-नेट-वर्थ (UHNI) व्यक्तियों, पारिवारिक व्यवसायों, CXO स्तर के पेशेवरों और वैश्विक भारतीय निवेशकों को सेवाएं प्रदान करेगी.

दिल्ली-एनसीआर से संचालन, अनुभवी नेतृत्व टीम

दिल्ली-एनसीआर में मुख्यालय वाली इस कंपनी का नेतृत्व साकेत लखोटिया (ग्रुप CEO), आस्था मागो (COO), अचिन भारद्वाज (जॉइंट CIO) और पंकज केडिया (जॉइंट CIO) कर रहे हैं. इन सभी के पास प्राइवेट बैंकिंग, फंड मैनेजमेंट, इन्वेस्टमेंट बैंकिंग, कॉर्पोरेट एडवाइजरी और संस्थागत वित्त जैसे क्षेत्रों में व्यापक अनुभव है. यह नेतृत्व टीम रणनीतिक प्रबंधन, बाजार की समझ और संस्थागत अनुभव का संतुलित मिश्रण प्रस्तुत करती है.

भारत के वेल्थ सेक्टर में बड़ा अवसर

भारत में 2035 तक सर्विसेबल वेल्थ पूल के लगभग 9 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचने की संभावना के बीच, दक्षम् कैपिटल का उद्देश्य बिखरी हुई सलाहकारी सेवाओं को एकीकृत और रिसर्च-आधारित प्लेटफॉर्म के माध्यम से सुव्यवस्थित करना है.

निवेश दर्शन और कंपनी का दृष्टिकोण

ग्रुप सीईओ साकेत लखोटिया ने कहा, “भारत का वेल्थ मैनेजमेंट क्षेत्र एक महत्वपूर्ण मोड़ पर है. आज के निवेशक पहले से अधिक जागरूक और विवेकशील हैं, वे केवल संबंध-आधारित सलाह नहीं, बल्कि संस्थागत स्तर की मजबूती चाहते हैं. हमारा निवेश ढांचा इसी अपेक्षा पर आधारित है, जो स्वामित्व शोध और अनुशासित प्रक्रियाओं के माध्यम से दीर्घकालिक परिणाम सुनिश्चित करता है.”

रिसर्च-फर्स्ट और प्रोसेस-ड्रिवन प्लेटफॉर्म

दक्षम् कैपिटल का मूल आधार रिसर्च-प्रथम और प्रक्रिया-आधारित दृष्टिकोण है. कंपनी का प्लेटफॉर्म संस्थागत स्तर के शोध, स्वामित्व आवंटन मॉडल, अनुशासित उत्पाद चयन और निरंतर पोर्टफोलियो मॉनिटरिंग को एक साथ जोड़ता है, ताकि निवेशक जटिल वित्तीय माहौल में सही निर्णय ले सकें.

जोखिम प्रबंधन और रिटर्न ऑप्टिमाइजेशन के लिए कंपनी एक व्यवस्थित प्रक्रिया अपनाती है, जिसमें हर निवेश निर्णय को उपयुक्तता, विविधीकरण, लिक्विडिटी, जोखिम और दीर्घकालिक संपत्ति निर्माण के नजरिए से परखा जाता है.

“दक्षम् कम्पास” पर आधारित मूल्य प्रणाली

कंपनी के मार्गदर्शक सिद्धांत “दक्षम् कम्पास” पर आधारित हैं, विजडम (ज्ञान), स्टेबिलिटी (स्थिरता), एथिक्स (नैतिकता) और निच (विशेषज्ञता). ये सिद्धांत अनुभव-आधारित अंतर्दृष्टि, अनुशासित प्रक्रियाओं, व्यक्तिगत समाधान और अटूट ईमानदारी के प्रति कंपनी की प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं.

तकनीक और मानव विशेषज्ञता का संयोजन

दक्षम् कैपिटल मानव समझ और एल्गोरिदमिक सटीकता का संयोजन करते हुए डेटा इंटेलिजेंस, एनालिटिक्स और AI-आधारित सलाह का उपयोग करता है, जिससे निवेशकों को स्पष्टता, लचीलापन और बेहतर नियंत्रण मिलता है.

मजबूत ट्रैक रिकॉर्ड और भविष्य की योजना

600 से अधिक ग्राहकों को सलाह देने और 1 बिलियन डॉलर से अधिक की परिसंपत्तियों के प्रबंधन का पूर्व अनुभव रखने वाली यह फर्म तेजी से बढ़ते इस उद्योग में एक नया दृष्टिकोण लेकर आई है. कंपनी का लक्ष्य अनुशासित, पारदर्शी और दीर्घकालिक वेल्थ रणनीतियां प्रदान करना है.

 


भारत का विदेशी निवेश उछला, FY26 में 26.7 अरब डॉलर के पार

विशेषज्ञों का मानना है कि ODI में यह तेजी भारतीय कंपनियों के बढ़ते आत्मविश्वास को दर्शाती है. कंपनियां नए बाजारों और क्षेत्रों में अवसर तलाशते हुए वैश्विक स्तर पर अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज करा रही हैं.

Last Modified:
Wednesday, 06 May, 2026
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भारत की विदेशी निवेश गतिविधियों में वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान जोरदार तेजी देखने को मिली है. वित्त मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के अनुसार, ओवरसीज डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (ODI) आउटफ्लो बढ़कर 26.7 अरब डॉलर से अधिक हो गया, जो वित्त वर्ष 2023-24 की तुलना में करीब 84 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है.

लगातार बढ़ रहा वैश्विक विस्तार

आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि भारतीय कंपनियों का वैश्विक विस्तार लगातार बढ़ रहा है. FY25 में ODI आउटफ्लो 24.2 अरब डॉलर रहा, जबकि FY24 में यह लगभग 14.5 अरब डॉलर था. यह रुझान बताता है कि भारत की कंपनियां अंतरराष्ट्रीय बाजारों में तेजी से अपनी मौजूदगी बढ़ा रही हैं.

इक्विटी निवेश का दबदबा

FY26 में कुल निवेश का बड़ा हिस्सा इक्विटी निवेश के रूप में रहा, जो 18.6 अरब डॉलर से अधिक था. वहीं, 8 अरब डॉलर से ज्यादा निवेश लोन के रूप में किया गया. इससे साफ है कि कंपनियां रणनीतिक हिस्सेदारी के साथ-साथ वित्तीय सहयोग का भी सहारा ले रही हैं.

सिंगापुर बना सबसे बड़ा गंतव्य

भौगोलिक रूप से सिंगापुर भारतीय निवेश के लिए सबसे बड़ा गंतव्य बना रहा, जहां FY26 में 7.6 अरब डॉलर से अधिक का निवेश गया. इसके बाद अमेरिका का स्थान रहा, जहां 4 अरब डॉलर से ज्यादा निवेश हुआ, जबकि मॉरीशस को 2.4 अरब डॉलर से अधिक का निवेश प्राप्त हुआ.

सेवाएं सेक्टर सबसे आगे

क्षेत्रवार आंकड़ों में वित्तीय, बीमा और व्यवसायिक सेवाएं सबसे आगे रहीं. इस सेक्टर में 11 अरब डॉलर से अधिक निवेश हुआ, जो कुल आउटफ्लो का करीब 45 प्रतिशत है. इसके बाद मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में 4.6 अरब डॉलर से अधिक और थोक-खुदरा व्यापार, रेस्तरां और होटल सेक्टर में करीब 3 अरब डॉलर का निवेश हुआ.

मासिक रुझानों में उतार-चढ़ाव

मासिक आंकड़ों में कुछ अस्थिरता भी देखी गई. सितंबर में सबसे ज्यादा 4 अरब डॉलर से अधिक का निवेश हुआ, जबकि नवंबर में यह घटकर करीब 0.8 अरब डॉलर रह गया.

ODI क्या है और क्यों अहम

ODI का मतलब है भारतीय कंपनियों द्वारा विदेशों में संयुक्त उपक्रम या पूरी तरह स्वामित्व वाली सहायक कंपनियों में किया गया निवेश. इससे कंपनियों को वैश्विक स्तर पर विस्तार करने और अंतरराष्ट्रीय वैल्यू चेन से जुड़ने में मदद मिलती है. सरकार की उदारीकृत नीति के तहत कंपनियां अपनी नेटवर्थ के चार गुना तक विदेश में निवेश कर सकती हैं. इसके अलावा, लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम के तहत व्यक्तिगत निवेश की भी अनुमति है.

नीतिगत सुधार और आगे की राह

अधिकारियों के अनुसार, सरकार का उद्देश्य विदेशी निवेश से जुड़े नियमों को सरल बनाना और उन्हें वैश्विक कारोबारी जरूरतों के अनुरूप बनाना है. भारतीय कंपनियां अब तेजी से अंतरराष्ट्रीय बाजारों में विस्तार और विविधीकरण की ओर बढ़ रही हैं.

विशेषज्ञों का मानना है कि ODI में यह तेजी भारतीय कंपनियों के बढ़ते आत्मविश्वास को दर्शाती है. कंपनियां नए बाजारों और क्षेत्रों में अवसर तलाशते हुए वैश्विक स्तर पर अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज करा रही हैं.
 


सर्विस सेक्टर में तेजी, अप्रैल में PMI 58.8 पर पहुंचा

अप्रैल में सर्विस सेक्टर की गतिविधियों में उछाल का सबसे बड़ा कारण मजबूत घरेलू मांग रही. कंपनियों को नए ऑर्डर्स में तेजी देखने को मिली, जिससे कुल बिजनेस गतिविधियों में सुधार हुआ.

Last Modified:
Wednesday, 06 May, 2026
BWHindia

भारत के सर्विस सेक्टर ने वित्त वर्ष 2026-27 की शुरुआत दमदार प्रदर्शन के साथ की है. अप्रैल में सर्विसेज PMI बढ़कर 58.8 पर पहुंच गया, जो पिछले पांच महीनों का उच्चतम स्तर है. मजबूत घरेलू मांग, ई-कॉमर्स गतिविधियों में तेजी और नए ऑर्डर्स में सुधार ने इस वृद्धि को गति दी, जबकि वैश्विक चुनौतियों के बावजूद सेक्टर में सकारात्मक रुझान कायम रहा.

घरेलू मांग बनी ग्रोथ की मुख्य ताकत

अप्रैल में सर्विस सेक्टर की गतिविधियों में उछाल का सबसे बड़ा कारण मजबूत घरेलू मांग रही. कंपनियों को नए ऑर्डर्स में तेजी देखने को मिली, जिससे कुल बिजनेस गतिविधियों में सुधार हुआ. ई-कॉमर्स और ट्रांसपोर्ट से जुड़ी सेवाओं में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई. हालांकि, पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण निर्यात मांग कमजोर रही, लेकिन घरेलू बाजार ने इस कमी की भरपाई कर दी.

निर्यात में नरमी, वैश्विक परिस्थितियों का असर

अंतरराष्ट्रीय बाजारों से मिलने वाले नए ऑर्डर्स में गिरावट दर्ज की गई. न्यू एक्सपोर्ट बिजनेस इंडेक्स एक साल से अधिक समय के दूसरे सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया. कंपनियों ने इसके पीछे पश्चिम एशिया संघर्ष और कमजोर इनबाउंड टूरिज्म को प्रमुख कारण बताया. इससे संकेत मिलता है कि फिलहाल सर्विस सेक्टर की निर्भरता घरेलू मांग पर अधिक बढ़ गई है.

लागत दबाव बरकरार, लेकिन राहत के संकेत

सर्विस सेक्टर की कंपनियों को अप्रैल में बढ़ती लागत का सामना करना पड़ा. खाद्य पदार्थों, गैस, श्रम और अन्य इनपुट की कीमतों में वृद्धि से ऑपरेटिंग खर्च बढ़ा. हालांकि, मार्च के मुकाबले इनपुट लागत महंगाई में थोड़ी कमी आई, लेकिन यह अब भी ऊंचे स्तर पर बनी हुई है.

दिलचस्प बात यह रही कि कंपनियों ने बढ़ी हुई लागत का पूरा बोझ ग्राहकों पर नहीं डाला. आउटपुट कीमतों में वृद्धि तीन महीनों की सबसे धीमी रही, जिससे संकेत मिलता है कि कंपनियां प्रतिस्पर्धा बनाए रखने के लिए लागत का कुछ हिस्सा खुद वहन कर रही हैं.

रोजगार में सुधार, हायरिंग में तेजी

नए कारोबार में मजबूती का असर रोजगार पर भी देखने को मिला. कंपनियों ने बढ़ते काम के दबाव को संभालने के लिए शॉर्ट-टर्म और जूनियर लेवल कर्मचारियों की भर्ती बढ़ाई. सर्विस सेक्टर के सभी प्रमुख क्षेत्रों में रोजगार बढ़ा, जिससे लंबित कार्यों का दबाव कुछ हद तक कम हुआ.

कारोबारी भरोसा थोड़ा कमजोर, लेकिन रुख सकारात्मक

हालांकि कंपनियां भविष्य को लेकर आशावादी बनी हुई हैं, लेकिन मार्च के मुकाबले कारोबारी भरोसे में हल्की गिरावट आई है. पश्चिम एशिया का भू-राजनीतिक तनाव और लगातार ऊंची लागत को कंपनियां आगे के लिए प्रमुख जोखिम मान रही हैं.

कंपोजिट PMI में भी मजबूती के संकेत

सिर्फ सर्विस सेक्टर ही नहीं, बल्कि समग्र अर्थव्यवस्था में भी सुधार दिखा. कंपोजिट PMI मार्च के 57.0 से बढ़कर अप्रैल में 58.2 पर पहुंच गया. यह मैन्युफैक्चरिंग और सर्विसेज दोनों क्षेत्रों में मजबूती का संकेत देता है, जिससे निजी क्षेत्र के उत्पादन में तेज वृद्धि दर्ज हुई.

अप्रैल के आंकड़े साफ संकेत देते हैं कि भारत का सर्विस सेक्टर मजबूत घरेलू मांग के सहारे तेजी से आगे बढ़ रहा है. हालांकि वैश्विक अनिश्चितताएं और लागत दबाव चुनौतियां बने हुए हैं, फिर भी सेक्टर की बुनियाद मजबूत नजर आ रही है और आने वाले महीनों में स्थिर वृद्धि की उम्मीद बनी हुई है.