कंपनी ने रिकार्ड बिक्री की जानकारी जैसे ही बाजार को दी उसके बाद कंपनी के शेयर में 5 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी देखने को मिली.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
दक्षिण भारत से लेकर देश के कई राज्यों में शराब बनाकर सप्लाई करने वाली इस सोम डिस्टलरी की शराब का ऐसा नशा लोगों में चढ़ा कि कंपनी की सेल ने नया रिकॉर्ड कायम कर दिया. कंपनी ने कर्नाटक में इस बार जबरदस्त शराब की बिक्री का रिकार्ड कायम किया है, ये खबर आने के बाद कंपनी के शेयरों में 5 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी देखने को मिली. कंपनी ने अब अपने स्टॉक को स्प्लिट करने का भी निर्णय लिया है.
इस नाम से बियर बनाती है कंपनी
सोम डिस्टलरी मौजूदा समय में कर्नाटक में दो मशहूर ब्रांड के नाम से बियर बेचती है. इनमें पहला नाम है हंटर और दूसरा नाम है पावर कूल. कंपनी ने वहां शराब तो काफी समय से बेच रही है लेकिन इस महीने उसने रिकार्ड तोड़ बिक्री दर्ज की है. हालांकि अभी तक कंपनी की ओर से इस संबंध में कोई आंकड़ा जारी नहीं किया गया है. गुरुवार को कंपनी ने जैसे ही ये जानकारी शेयर बाजार के साथ साझा की वैसे ही कंपनी के शेयरों में 5 प्रतिशत तक की तेजी देखने को मिली. कंपनी के रिकार्ड पर नजर डालें तो कंपनी के शेयरों में पिछले एक महीने में 12.5 फीसदी से ज्यादा का उछाल आया है.
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कंपनी ने लिया है स्टॉक स्प्लिट करने का फैसला
कंपनी ने हाल ही में 2 अप्रैल को अपने स्टॉक को स्प्लिट करने का फैसला लिया है. कंपनी ने अपने शेयर को 1:1 में बांटने का फैसला किया है. कंपनी इससे पहले 2012 में भी अपने स्टॉक को स्प्लिट करने का फैसला ले चुकी है. इससे पहले 2012 में कंपनी अपने स्टॉक को 10 रुपये के फेस वैल्यू से 5 रुपये में स्पिल्ट कर चुकी है. कंपनी सामान्य तौर पर स्टॉक स्प्लिट करने का निर्णय तब लेती हैं जब उनके शेयर की कीमत काफी ज्यादा हो जाती है. हालांकि इससे उनकी वैल्यूएशन में तो कोई बदलाव नहीं आता लेकिन उन्हें नए निवेशक मिल जाते हैं.
कंपनी इन राज्यों में करती है कारोबार
सोम डिस्टिलरी आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, कर्नाटक, केरल और पश्चिम बंगाल सहित कई राज्यों में बिक्री और वितरण नेटवर्क मौजूद है. मौजूदा समय में कंपनी का शेयर बाजार में 301. 25 रुपये पर ट्रेड कर रहा है. गुरुवार को इसमें 5.22 प्रतिशत की बढ़ोतरी देखने को मिली.
एक विशेष इंटरव्यू में लोपेज ने ब्रांड की आवाज, कंटेंट की प्रभावशीलता, तेजी से प्रतिस्पर्धी होते मार्केटिंग इकोसिस्टम में अलग पहचान बनाने और भारत को वैश्विक व क्षेत्रीय नवाचार के केंद्र के रूप में स्थापित करने की ओमनीकॉम प्रोडक्शन की रणनीति पर बात की.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
सौम्या सहगल भूटानी
प्रोडक्शन का काम बुनियादी बदलाव के दौर से गुजर रहा है. पहले इसे मुख्य रूप से विज्ञापन के क्रियान्वयन से जुड़ी इकाई के रूप में देखा जाता था, जो किसी विचार को एक कैंपेन में बदलती थी. अब प्रोडक्शन ब्रांड्स के कंटेंट, डेटा, पर्सनलाइजेशन और तेजी से वितरण के प्रबंधन में रणनीतिक भूमिका निभा रहा है.
ओमनीकॉम प्रोडक्शन के ग्लोबल CEO सर्जियो लोपेज के मुताबिक, यह बदलाव अधिक कंटेंट तैयार करने के बजाय इस बात से जुड़ा है कि ब्रांड्स उसे किस तरह बनाते हैं, उसका प्रबंधन कैसे करते हैं और उसे किस तरह वितरित करते हैं.
लोपेज ने कहा, “प्रोडक्शन लीडर्स या प्रोडक्शन की पृष्ठभूमि से आने वाले लोगों की भूमिका हमेशा क्रियान्वयन से जुड़ी रही है. किसी के पास कोई विचार होता था और हम उसे हकीकत में बदलते थे. लेकिन पिछले एक-दो वर्षों में मार्केटिंग के बदलते स्वरूप के कारण प्रोडक्शन एक क्रियान्वयन विभाग से बदलाव लाने वाले माध्यम में तब्दील हो रहा है.”
यह बदलाव विभिन्न प्लेटफॉर्म पर कंटेंट की तेजी से बढ़ती मात्रा और व्यक्तिगत जरूरतों के अनुरूप, लक्षित और सांस्कृतिक रूप से प्रासंगिक संवाद की बढ़ती मांग से प्रेरित है. इसके परिणामस्वरूप, प्रोडक्शन मार्केटिंग संगठनों के केंद्र के करीब आ रहा है. उन्होंने कहा, “अब काम का दायरा काफी अलग है. आज हर क्लाइंट की मार्केटिंग में बदलाव की यात्रा में इसकी बड़ी भूमिका है.”
प्रोडक्शन से कंटेंट एक्सपीरियंस तक
ओमनीकॉम का अपना पुनर्गठन भी इसी बदलाव को दर्शाता है. कंपनी ने दुनियाभर की 86 प्रोडक्शन इकाइयों को एक साथ लाकर ओमनीकॉम प्रोडक्शन बनाया. इसके बाद IPG के अधिग्रहण के जरिए 25 अन्य प्रोडक्शन परिसंपत्तियां भी इसमें शामिल की गईं.
लोपेज के मुताबिक, पिछले साल इस कारोबार में 47 प्रतिशत की वृद्धि हुई. हालांकि, यह बदलाव केवल कारोबार का आकार बढ़ने तक सीमित नहीं है. वह कहते हैं, “यह एकीकरण नहीं, बल्कि बदलाव है.”
दो साल पहले ओमनीकॉम प्रोडक्शन के कारोबार में प्रिंट की हिस्सेदारी 72 प्रतिशत थी. आज यह घटकर 20 प्रतिशत रह गई है. लोपेज के अनुसार, यह बदलाव कंटेंट ट्रांसफॉर्मेशन और ब्रांड कम्युनिकेशन के प्रबंधन के लिए अधिक एकीकृत दृष्टिकोण की ओर बढ़ने को दर्शाता है.
लोपेज ने कहा, “किसी क्लाइंट को अपने दर्शकों के साथ एक संपूर्ण कंटेंट एक्सपीरियंस की जरूरत होती है. यह अनुभव लगातार एक जैसा होना चाहिए और इसे इस तरह प्रस्तुत करना जरूरी है, जो पहले के मुकाबले कहीं अधिक जटिल हो गया है.”
अब उपभोक्ताओं की यात्रा टेलीविजन के जरिए ब्रांड के बारे में जागरूकता और डिजिटल माध्यमों से विचार या खरीदारी करने तक सीमित नहीं है. दर्शक अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर जाते हैं और उम्मीद करते हैं कि ब्रांड उनकी व्यक्तिगत जरूरतों के अनुसार संवाद में बदलाव करते हुए अपनी आवाज में निरंतरता बनाए रखेंगे.
लोपेज के मुताबिक, युवा दर्शकों के मामले में यह जटिलता और अधिक है. उनका कहना है कि यह वह पीढ़ी है जो नेटफ्लिक्स और अमेजन के साथ बड़ी हुई है और कंटेंट में उसी स्तर के पर्सनलाइजेशन की अपेक्षा करती है.
ओमनीकॉम कंटेंट एक्सपीरियंस (OCX) के पीछे भी यही सोच है. लोपेज इसे क्रिएटिविटी, मीडिया और क्लाइंट्स के बीच काम करने वाले मॉडल के रूप में देखते हैं.
प्रोडक्शन का नया समीकरण
प्रोडक्शन पर दबाव का स्वरूप भी बदल रहा है. ब्रांड्स को पहले से अधिक कंटेंट चाहिए, लेकिन बजट उसी गति से जरूरी नहीं कि बढ़ रहे हों. लोपेज का मानना है, “प्रोडक्शन में दक्षता पहली जरूरत है. अगर आप दक्ष नहीं हैं, तो आज इस क्षेत्र में टिक नहीं सकते.”
उनके मुताबिक, कुछ क्लाइंट्स के लिए कंटेंट की मात्रा दोगुनी या तिगुनी हो रही है, जबकि मार्केटिंग बजट काफी धीमी गति से बढ़ रहे हैं. ऐसे में लागत, गति और ऑटोमेशन सफलता के महत्वपूर्ण पैमाने बन गए हैं. हालांकि, सफलता केवल दक्षता तक सीमित नहीं है.
ओमनीकॉम कंटेंट के प्रदर्शन के आधार पर उसकी प्रभावशीलता भी मापता है. लोपेज ने निसान के साथ कंपनी के काम का उदाहरण दिया. उनके मुताबिक, दर्शकों के लिए संवाद को अधिक प्रासंगिक बनाने के उद्देश्य से तैयार किए गए नए कंटेंट वर्कफ्लो से निवेश पर रिटर्न (ROI) दोगुना हुआ है. वह कहते हैं, “जब आप कंटेंट ट्रांसफॉर्मेशन करते हैं, तो केवल बचत नहीं होती, बल्कि इससे कहीं अधिक मूल्य भी मिलता है.”
AI की भूमिका दक्षता से आगे बढ़ेगी
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) प्रोडक्शन के इस नए समीकरण का हिस्सा बन रहा है. लोपेज का कहना है कि ओमनीकॉम के प्रमुख क्लाइंट्स के साथ होने वाले एक-तिहाई से अधिक काम में वर्जनिंग और लोकलाइजेशन जैसी गतिविधियों के लिए AI का इस्तेमाल किया जा रहा है. हालांकि, वह इन उपयोगों को AI के बदलाव की प्रक्रिया का शुरुआती चरण मानते हैं.
उनके मुताबिक, “हम एक ऐसे मुकाम पर पहुंचेंगे, जहां AI ऐसी संभावनाओं के रास्ते खोलेगा, जिनके बारे में हम आज सोच भी नहीं रहे हैं.” उनका मानना है कि भविष्य में इसका इस्तेमाल केवल तेजी से कंटेंट बनाने या बड़े स्तर पर उसे पर्सनलाइज करने तक सीमित नहीं रहेगा.
AI के कारण उद्योग को असीमित कंटेंट तैयार करने के नकारात्मक पहलुओं पर भी विचार करना पड़ सकता है. ब्रांड्स के पास अधिक संवाद तैयार करने की क्षमता होगी, लेकिन इससे उपभोक्ताओं पर जरूरत से ज्यादा कंटेंट का बोझ पड़ने का जोखिम भी है. लोपेज कहते हैं, “कंटेंट की मात्रा और उसकी गुणवत्ता के बीच एक तरह का तनाव पैदा होने वाला है.”
ब्रांड्स के लिए इसका मतलब स्पष्ट है. AI प्रोडक्शन को आसान बना सकता है, लेकिन इससे संवाद अपने आप बेहतर नहीं हो जाता.
ब्रांड की आवाज बनाए रखने की चुनौती
लोपेज के मुताबिक, प्रोडक्शन नेटवर्क की एक और बड़ी भूमिका ब्रांड की विशिष्ट पहचान और उसकी आवाज को सुरक्षित रखना तथा बड़े स्तर पर उसे बनाए रखना है.
वह जोर देकर कहते हैं, “बाजार में ब्रांड की आवाज को परिभाषित करने और उसकी निगरानी करने की सख्त जरूरत है.” ऑटोमोबाइल जैसे क्षेत्रों में उनका तर्क है कि उत्पादों और उनकी विशेषताओं के बीच अंतर कम होने से ब्रांड्स के एक जैसी पहचान वाले बाजार में खो जाने का जोखिम बढ़ रहा है.
लोपेज कहते हैं, “कीमतों को लेकर पर्सनलाइजेशन, ऑप्टिमाइजेशन और सुधार पर काफी ध्यान दिया गया है, लेकिन जरूरी नहीं कि ब्रांड निर्माण पर भी उतना ही ध्यान दिया गया हो.”
इसका समाधान क्रिएटिविटी को छोड़कर टेक्नोलॉजी या परफॉर्मेंस मार्केटिंग को अपनाना नहीं है. इसके बजाय, क्रिएटिव और ब्रांड एजेंसियों को ब्रांड की विशिष्ट आवाज और भावनात्मक पहचान तय करनी होगी. वहीं, प्रोडक्शन नेटवर्क को तेजी से जटिल होते कंटेंट इकोसिस्टम में उस विचार को बड़े स्तर पर लागू करना होगा.
वैश्विक स्तर और स्थानीय प्रासंगिकता
अलग-अलग बाजारों में काम करने वाले ब्रांड्स के लिए यह चुनौती और जटिल हो जाती है. ओमनीकॉम वैश्विक ब्रांड प्लेटफॉर्म को स्थानीय संदर्भ के अनुरूप ढालने के लिए उस प्रक्रिया का इस्तेमाल करता है, जिसे लोपेज ‘ट्रांसक्रिएशन’ कहते हैं. एप्पल, डिज्नी, निसान और लॉरियल जैसे वैश्विक ब्रांड्स के लिए इसका उद्देश्य उनकी वैश्विक पहचान को बनाए रखते हुए अलग-अलग बाजारों को स्थानीय संस्कृति और उपभोक्ता व्यवहार के अनुसार उसे अपनाने की गुंजाइश देना है.
वह कहते हैं, “उस पहचान को व्यक्त कर पाना और हर बाजार की जरूरतों तथा ब्रांड की वास्तविक पहचान के अनुरूप लागू कर पाना ही पिछले कुछ वर्षों से ट्रांसक्रिएशन का उद्देश्य रहा है.” कंटेंट के अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर बंटने और दर्शकों की सांस्कृतिक प्राथमिकताएं अधिक विशिष्ट होने के साथ निरंतरता और स्थानीय जरूरतों के बीच संतुलन बनाना लगातार महत्वपूर्ण होता जा रहा है.
भारत क्यों महत्वपूर्ण है
भारत भी ओमनीकॉम प्रोडक्शन की वैश्विक रणनीति का तेजी से महत्वपूर्ण हिस्सा बन रहा है. लोपेज के मुताबिक, डिजिटल तकनीक को तेजी से अपनाने और भारत, चीन तथा जापान जैसे देशों के बड़े आकार व विविधता के कारण एशिया-प्रशांत (APAC) क्षेत्र नवाचार के लिए एक प्रमुख बाजार है.
वह कहते हैं, “मुझे लगता है कि डिजिटल दुनिया में इस समय नवाचार दुनिया के किसी भी अन्य हिस्से की तुलना में इस क्षेत्र में तेजी से हो रहा है.” लोपेज के अनुसार, पिछले साल ओमनीकॉम प्रोडक्शन के भारत स्थित कारोबार में 35 प्रतिशत की वृद्धि हुई. अब कंपनी के कुल कर्मचारियों में 20 प्रतिशत से अधिक भारत में कार्यरत हैं. कंपनी ने देश में अपने कार्यालयों की संख्या भी एक से बढ़ाकर तीन कर दी है. हालांकि, लोपेज इस रणनीति को पारंपरिक ऑफशोर प्रोडक्शन से अलग बताते हैं.
वह कहते हैं, “हमारी रणनीति भारत को ऑफशोरिंग सेंटर बनाने की नहीं है. यह रणनीति बहुत सीमित सोच पर आधारित है और भारत में किए जा सकने वाले सभी कामों को इसमें शामिल नहीं किया जा सकता.”
इसके बजाय, वह भारत को एक ऐसे वैश्विक और क्षेत्रीय केंद्र के रूप में देखते हैं, जहां से नए विचार और काम शुरू हो सकें.
यह बदलाव प्रोडक्शन के आयोजन के तरीके में व्यापक परिवर्तन को दर्शाता है. पहले कंटेंट बनाने और उसे अलग-अलग बाजारों के अनुरूप ढालने की प्रक्रिया रैखिक थी, लेकिन अब यह क्षमताओं, तकनीक, क्रिएटिविटी और डेटा से जुड़ी वैश्विक व्यवस्था में बदल रही है.
पर्सनलाइजेशन बनाम सामूहिक अनुभव
भविष्य की बात करते हुए लोपेज मार्केटिंग के सामने एक और चुनौती की पहचान करते हैं. यह चुनौती अत्यधिक व्यक्तिगत अनुभवों की मांग और साझा सांस्कृतिक अनुभवों की जरूरत के बीच संतुलन बनाने से जुड़ी है.
उपभोक्ता चाहते हैं कि ब्रांड उनकी व्यक्तिगत पसंद को समझें. साथ ही, वे मनोरंजन, खेल और सांस्कृतिक आयोजनों जैसे साझा अनुभवों का हिस्सा भी बनना चाहते हैं.
लोपेज कहते हैं, “इन दोनों चीजों को एक साथ लाना और इनके बीच जुड़ाव स्थापित कर पाना पूरे मार्केटिंग इकोसिस्टम को बदल देगा.”
यह बदलाव फिजिकल रिटेल को भी प्रभावित कर रहा है. ई-कॉमर्स के बढ़ने के बावजूद लोपेज का कहना है कि बड़ी खरीदारी करने वाले उपभोक्ता तेजी से खरीदने से पहले उत्पादों को वास्तविक रूप में अनुभव करना चाहते हैं.
ब्रांड्स के लिए इसका मतलब है कि मार्केटिंग का भविष्य पूरी तरह डिजिटल या केवल पर्सनलाइजेशन पर आधारित नहीं होगा. इसमें व्यक्तिगत अनुभवों को सामूहिक अनुभवों से जोड़ना, डिजिटल माध्यमों से उत्पादों की खोज को वास्तविक अनुभवों से जोड़ना और बड़े स्तर पर काम करने के साथ विशिष्ट पहचान बनाए रखना शामिल होगा. इससे प्रोडक्शन की जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है.
लोपेज के अनुसार, चुनौती अब केवल कंटेंट तैयार करना नहीं है. असली सवाल यह है कि जब हर कोई बड़ी मात्रा में कंटेंट तैयार कर रहा है, तो ब्रांड्स इस भीड़ में अपनी अलग पहचान कैसे बनाएंगे और उपभोक्ताओं का भरोसा दोबारा कैसे हासिल करेंगे. कभी मुख्य रूप से क्रियान्वयन तक सीमित माने जाने वाले उद्योग के लिए यह कहीं बड़ी जिम्मेदारी है.
सौम्या सहगल भूटानी, BW रिपोर्टर्स
(BW Marketing World में सीनियर एडिटोरियल लीड के रूप में सौम्या भारत के मीडिया, मार्केटिंग और विज्ञापन इकोसिस्टम पर विस्तृत रिपोर्टिंग और विश्लेषण प्रस्तुत करती हैं.)
सैटेलाइट इंटरनेट बाजार में नियामकीय मंजूरियों को लेकर विवाद के बीच एलन मस्क की कंपनी ने कहा कि वह पांच साल से अधिक समय से भारतीय नियामकों के साथ काम कर रही है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स (SpaceX) की सैटेलाइट इंटरनेट सेवा स्टारलिंक (Starlink) ने दावा किया है कि उसने भारत में अपनी सेवाएं शुरू करने के लिए जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार कर लिया है. कंपनी के मुताबिक, उसने भारतीय नियामकों के साथ पांच साल से अधिक समय तक काम किया है और देश में हाई-स्पीड इंटरनेट सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए तैयारी पूरी कर ली है. हालांकि, व्यावसायिक परिचालन शुरू करने से पहले कुछ नियामकीय मंजूरियां मिलना अभी बाकी है.
यह घटनाक्रम भारत के सैटेलाइट कम्युनिकेशन बाजार में नियामकीय मंजूरियों और प्रतिस्पर्धा को लेकर बढ़ती बहस के बीच सामने आया है. रिलायंस इंडस्ट्रीज ने भी इस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा का स्वागत करते हुए स्पष्ट किया है कि भारत में काम करने वाली सभी कंपनियों को देश के कानूनों और नियमों का पालन करना होगा.
भारत में इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने पर स्टारलिंक का जोर
स्टारलिंक ने शुक्रवार को जारी बयान में कहा कि भारत में प्रवेश की तैयारी के तहत उसने विशेष ग्राउंड इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया है और नियामकीय जरूरतों के अनुरूप परिचालन व्यवस्था विकसित की है. कंपनी पहले भी भारत में 20 से अधिक गेटवे साइट बनाने की बात कह चुकी है, जिनमें सैकड़ों एंटीना शामिल हैं.
स्पेसएक्स में बिजनेस ऑपरेशंस की वाइस प्रेसिडेंट लॉरेन ड्रेयर ने इंडिया मोबाइल कांग्रेस में कहा था कि स्टारलिंक ने भारत के लिए विशेष सुरक्षा नियंत्रण और ऐसे उपाय विकसित किए हैं, जिनका उद्देश्य भारतीय उपयोगकर्ताओं के डेटा को देश के भीतर रखना है.
कंपनी ने भारतीय बाजार में संभावित प्रवेश को आसान बनाने के लिए भारती एयरटेल और रिलायंस जियो के साथ साझेदारी भी की है. हालांकि, इन साझेदारियों के बावजूद सेवाओं की व्यावसायिक शुरुआत नियामकीय मंजूरियों पर निर्भर करेगी.
रिलायंस इंडस्ट्रीज ने कानूनों के पालन पर दिया जोर
रिलायंस इंडस्ट्रीज ने शुक्रवार को कहा कि उसे स्टारलिंक समेत सैटेलाइट कम्युनिकेशन कंपनियों से प्रतिस्पर्धा का डर नहीं है. हालांकि, कंपनी ने जोर दिया कि भारत में कारोबार करने वाली सभी कंपनियों को देश के कानूनों और नियामकीय प्रावधानों का पालन करना चाहिए.
इससे पहले एलन मस्क ने आरोप लगाया था कि कुछ कारोबारी हित भारत में स्टारलिंक की एंट्री में बाधा डाल रहे हैं, ताकि अपने बाजार की स्थिति को सुरक्षित रखा जा सके. हालांकि, सरकार ने भेदभाव के आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि दूरसंचार सेवाओं, जिनमें सैटेलाइट कम्युनिकेशन भी शामिल है, के लिए निष्पक्ष और गैर-भेदभावपूर्ण मंजूरी व्यवस्था अपनाई जाती है.
सुरक्षा मंजूरी और FDI की स्वीकृति अभी अहम
दूरसंचार विभाग (DoT) के मुताबिक, भारत में लाइसेंस प्राप्त तीन सैटेलाइट कम्युनिकेशन ऑपरेटरों- स्टारलिंक, भारती समर्थित यूटेलसैट वनवेब और रिलायंस जियो की सैटेलाइट कम्युनिकेशन इकाई- की सुरक्षा संबंधी जांच चल रही है. कंपनियों को नियामकीय प्रक्रिया के अगले चरण में पहुंचने से पहले लागू सुरक्षा मानकों को पूरा करना होगा.
स्टारलिंक को दूरसंचार विभाग से ग्लोबल मोबाइल पर्सनल कम्युनिकेशंस बाय सैटेलाइट (GMPCS) लाइसेंस और भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन एवं प्राधिकरण केंद्र (IN-SPACe) से प्राधिकरण मिल चुका है. हालांकि, केवल इन मंजूरियों के आधार पर कंपनी व्यावसायिक सेवाएं शुरू नहीं कर सकती.
इसके लिए सुरक्षा मंजूरी, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) से संबंधित स्वीकृति और स्पेक्ट्रम आवंटन की प्रक्रिया पूरी होना भी महत्वपूर्ण है.
सैटेलाइट इंटरनेट बाजार में बढ़ रही प्रतिस्पर्धा
भारत में सैटेलाइट ब्रॉडबैंड सेवाओं को लेकर घरेलू और विदेशी कंपनियों की दिलचस्पी बढ़ रही है. इन सेवाओं के जरिए दूरदराज और उन क्षेत्रों में इंटरनेट कनेक्टिविटी उपलब्ध कराने की संभावनाएं हैं, जहां पारंपरिक नेटवर्क पहुंचाना मुश्किल है.
दूरसंचार विभाग ने सैटेलाइट स्पेक्ट्रम के प्रशासनिक आवंटन की व्यवस्था का समर्थन किया है. इसके तहत स्पेक्ट्रम उपयोग शुल्क को समायोजित सकल राजस्व (AGR) के 5 प्रतिशत पर रखने का प्रस्ताव है.
स्टारलिंक के व्यावसायिक परिचालन शुरू करने से भारतीय सैटेलाइट ब्रॉडबैंड बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है. सैटेलाइट आधारित इंटरनेट सेवाओं से मौजूदा मोबाइल और फाइबर ब्रॉडबैंड नेटवर्क को पूरक कनेक्टिविटी मिलने की उम्मीद है, खासकर उन इलाकों में जहां पारंपरिक इंटरनेट सेवाएं सीमित हैं.
SSIEL ग्रुप के ब्रांड लेयशा बासमती राइस के टीवी, ओटीटी, सिनेमा, आउटडोर और डिजिटल कैंपेन में नजर आएंगी यामी गौतम धर, प्रोडक्ट लॉन्च और उपभोक्ताओं से जुड़े कार्यक्रमों में भी होंगी शामिल
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
नेशनल अवॉर्ड विजेता अभिनेत्री यामी गौतम धर को लेयशा बासमती राइस ने अपना ब्रांड एंबेसडर नियुक्त किया है. SSIEL ग्रुप के इस ब्रांड ने 15 अक्टूबर को इसकी घोषणा की. यामी गौतम धर ब्रांड के आगामी विज्ञापन अभियानों का चेहरा होंगी. कंपनी टीवी, ओटीटी, सिनेमा, आउटडोर विज्ञापन, डिजिटल और सोशल मीडिया समेत विभिन्न माध्यमों से अपने उत्पादों का प्रचार करेगी.
ब्रांड की टैगलाइन 'कुक ब्रिलियंस टुडे' (Cook Brilliance Today) के जरिए रोजमर्रा के भोजन में गुणवत्ता और बेहतर स्वाद के महत्व को सामने लाने की कोशिश की जाएगी. कंपनी का मानना है कि खास भोजन का अनुभव केवल बड़े अवसरों तक सीमित नहीं है, बल्कि रोजाना बनने वाले खाने में भी बेहतर सामग्री की अहम भूमिका होती है.
रोजमर्रा के खाने में गुणवत्ता पर जोर
लेयशा बासमती राइस के मुताबिक, भारतीय रसोई में चावल का खास स्थान है. राजमा-चावल, दाल-चावल से लेकर खीर और बिरयानी तक, चावल कई तरह के व्यंजनों का अहम हिस्सा है. ब्रांड का उद्देश्य चावल की गुणवत्ता, खुशबू और स्वाद के जरिए रोजमर्रा के भोजन को खास अनुभव में बदलना है.
कंपनी के अनुसार, यामी गौतम धर ने अलग-अलग किस्मों के बासमती चावल को चखकर उनकी विशेषताओं को समझा. इस दौरान लेयशा बासमती राइस की विशिष्ट खुशबू ने उनका ध्यान आकर्षित किया. चावल की गुणवत्ता और स्वाद के साथ इस अनुभव ने ब्रांड के प्रति उनकी पसंद को मजबूत किया.
यामी गौतम धर ने क्या कहा?
ब्रांड के साथ जुड़ने पर यामी गौतम धर ने कहा कि उनका मानना है कि रोजमर्रा की जिंदगी में सोच-समझकर किए गए छोटे-छोटे चुनाव ही किसी अनुभव को खास बनाते हैं. खाना बनाने में इस्तेमाल होने वाली सामग्री की गुणवत्ता साधारण भोजन को भी यादगार बना सकती है.
उन्होंने कहा कि चावल हर भारतीय परिवार के भोजन का अभिन्न हिस्सा है और वह लेयशा के साथ जुड़कर रोजमर्रा के खाने में बेहतर गुणवत्ता और खास अनुभव के विचार को देशभर के घरों तक पहुंचाने को लेकर खुश हैं.
कंपनी ने साझेदारी को लेकर क्या कहा?
SSIEL ग्रुप और लेयशा बासमती राइस के मैनेजिंग डायरेक्टर अमन गुप्ता ने कहा कि यामी गौतम धर का आधुनिक दृष्टिकोण और भारतीय परिवारों की परंपराओं से जुड़ाव इस ब्रांड के विचारों के अनुरूप है. उन्होंने कहा कि भारतीय खानपान समय के साथ बदला है, लेकिन इसकी सांस्कृतिक जड़ें आज भी मजबूत हैं. चावल लोगों की अनेक यादों और पारिवारिक अनुभवों का हिस्सा है. कंपनी का उद्देश्य चावल के हर दाने के साथ गुणवत्ता और बेहतर अनुभव उपलब्ध कराना है.
विज्ञापन अभियानों और प्रोडक्ट लॉन्च में होंगी शामिल
यामी गौतम धर लेयशा बासमती राइस के 360-डिग्री मार्केटिंग और कम्युनिकेशन अभियान का हिस्सा होंगी. इसके तहत टीवी, ओटीटी, सिनेमा, आउटडोर, डिजिटल और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर ब्रांड का प्रचार किया जाएगा. इसके अलावा, वह कंपनी के प्रमुख ब्रांड अभियानों, नए उत्पादों की लॉन्चिंग और उपभोक्ताओं से जुड़े कार्यक्रमों में भी शामिल होंगी.
त्योहारी और शादी के सीजन में बाजारों तक पहुंच बाधित होने का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, व्यापारिक संगठनों ने चांदनी चौक, सदर बाजार और कनॉट प्लेस समेत प्रमुख बाजारों में सुचारु आवागमन सुनिश्चित करने की मांग की.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
दिल्ली के प्रमुख बाजारों में प्रदर्शनों, जुलूसों और रास्तों में रुकावट के कारण कारोबार प्रभावित होने का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है. व्यापारिक संगठनों का दावा है कि राजधानी में रोजाना होने वाले ₹500 से ₹600 करोड़ के कारोबार में से करीब ₹250 करोड़ का कारोबार प्रभावित हो सकता है. त्योहारी और शादी के सीजन में कारोबारियों की चिंता बढ़ गई है. याचिकाकर्ताओं ने अदालत से बाजारों तक ग्राहकों और व्यापारियों की पहुंच बनाए रखने के लिए जरूरी निर्देश देने की मांग की है.
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने छोटे दुकानदारों, फेरीवालों और स्टॉल संचालकों की परेशानियों पर ध्यान दिया. उन्होंने कहा, "हम कार्रवाई करेंगे."
सुप्रीम कोर्ट में याचिका, बाजारों तक पहुंच बनाए रखने की मांग
यह याचिका दिल्ली किराना कमेटी और दिल्ली आयरन एंड हार्डवेयर मर्चेंट्स एसोसिएशन ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दाखिल की है. याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता जय अनंत देहाद्राई ने अदालत में पक्ष रखा. याचिका में मांग की गई है कि अक्टूबर 2026 से जनवरी 2027 के बीच दिल्ली के प्रमुख बाजारों में व्यापारिक गतिविधियों और आम लोगों की आवाजाही में अनावश्यक बाधा न आए.
याचिका में कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क को 16 और 17 अक्टूबर को बंद रखने के लिए नई दिल्ली नगरपालिका परिषद (NDMC) की ओर से जारी अधिसूचना का भी उल्लेख किया गया है. व्यापारिक संगठनों का कहना है कि बाजारों तक पहुंच प्रभावित होने से न केवल दुकानदारों, बल्कि कर्मचारियों, फेरीवालों, आपूर्तिकर्ताओं और दिहाड़ी मजदूरों की आय पर भी असर पड़ता है.
प्रदर्शन के अधिकार और कारोबार के बीच संतुलन पर जोर
कॉन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) के राष्ट्रीय संयुक्त महासचिव सुमित अग्रवाल ने कहा कि याचिका का उद्देश्य शांतिपूर्ण प्रदर्शन के संवैधानिक अधिकार को रोकना नहीं है. संगठन चाहता है कि प्रदर्शन के अधिकार के साथ व्यापारियों की आजीविका और आम लोगों के आवागमन के अधिकारों का भी ध्यान रखा जाए.
याचिका में चांदनी चौक, सदर बाजार, कनॉट प्लेस और खान मार्केट जैसे प्रमुख व्यावसायिक क्षेत्रों में यातायात और आवागमन सुचारु रखने की मांग की गई है. इसके साथ ही बाजारों से दूर प्रदर्शन के लिए उपयुक्त स्थान तय करने, प्रदर्शनों के समय और तरीके को व्यवस्थित करने तथा बाजारों तक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तैयार करने का आग्रह किया गया है.
दिल्ली में एक करोड़ से अधिक लोगों की आजीविका जुड़ी
कैट के मुताबिक, दिल्ली में 10 लाख से अधिक कारोबारी प्रतिष्ठान हैं, जिनसे एक करोड़ से ज्यादा लोगों की आजीविका जुड़ी हुई है. संगठन का दावा है कि रोजाना करीब पांच लाख व्यापारी दूसरे राज्यों से कारोबार के सिलसिले में दिल्ली आते हैं.
व्यापारियों के लिए त्योहारी और शादी का सीजन साल के सबसे अहम कारोबारी दौर में शामिल है. इस दौरान बाजारों में ग्राहकों की आवाजाही कम होने और बिक्री घटने से छोटे कारोबारियों के सामने किराया, कर्मचारियों का वेतन, ईएमआई और अन्य खर्चों का भुगतान करने की चुनौती खड़ी हो सकती है. कारोबार प्रभावित होने का असर परिवहन क्षेत्र से जुड़े लोगों, आपूर्तिकर्ताओं और दिहाड़ी मजदूरों की कमाई पर भी पड़ सकता है.
व्यापारी संगठनों की बैठक बुलाएगा कैट
कैट दिल्ली के प्रमुख व्यापारी संगठनों की बैठक बुलाकर इस मुद्दे पर साझा रणनीति तैयार करने की योजना बना रहा है. संगठन का जोर इस बात पर है कि ग्राहकों की बाजारों तक पहुंच बनी रहे और कारोबार सामान्य रूप से चलता रहे.
व्यापारी संगठनों का मानना है कि प्रदर्शन के संवैधानिक अधिकार का सम्मान करते हुए ऐसा समाधान निकाला जाना चाहिए, जिससे बाजारों में व्यापारिक गतिविधियां और आम लोगों की आवाजाही बाधित न हों.
वेणु श्रीनिवासन के परिवार में संपत्ति और उत्तराधिकार को लेकर विवाद ने फिर चर्चा में लाए कारोबारी घरानों के पारिवारिक झगड़े, रैनबैक्सी से लेकर दूसरे बड़े उद्योग समूहों तक ऐसे विवादों ने बदली कंपनियों की कमान और कारोबार की दिशा
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के बड़े कारोबारी घरानों में उत्तराधिकार और संपत्ति के बंटवारे को लेकर विवाद कोई नई बात नहीं है. कई परिवारों में कारोबार की कमान किसके हाथ में होगी और संपत्ति का बंटवारा कैसे होगा, इस सवाल पर मतभेद सामने आते रहे हैं. अब मल्टी-बिलियन डॉलर TVS ग्रुप के प्रमुख वेणु श्रीनिवासन के परिवार में उत्तराधिकार को लेकर विवाद चर्चा में है. इस घटनाक्रम ने एक बार फिर सवाल खड़ा किया है कि कारोबारी परिवारों में पारिवारिक मतभेद कंपनियों के नियंत्रण और भविष्य को किस तरह प्रभावित कर सकते हैं.
TVS ग्रुप: परिवार में दो पक्षों के बीच मतभेद
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, TVS ग्रुप के प्रमुख वेणु श्रीनिवासन के परिवार में उत्तराधिकार और संपत्ति के बंटवारे को लेकर विवाद सामने आया है. इस मामले में एक ओर वेणु श्रीनिवासन और उनके बेटे सुदर्शन वेणु हैं, जबकि दूसरी ओर उनकी पत्नी मल्लिका श्रीनिवासन, जो TAFE की चेयरपर्सन हैं, और बेटी लक्ष्मी वेणु हैं, जो सुंदरम-क्लेटन की मैनेजिंग डायरेक्टर हैं. इस विवाद का आगे क्या असर होगा, यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा. हालांकि, भारतीय कारोबारी इतिहास में ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं, जब परिवार के भीतर नियंत्रण को लेकर मतभेदों ने कंपनियों के नेतृत्व और कारोबार की संरचना को प्रभावित किया.
रैनबैक्सी: पिता और बेटे के बीच नियंत्रण की लड़ाई
रैनबैक्सी का इतिहास भी कारोबारी परिवार में उत्तराधिकार और कंपनी के नियंत्रण को लेकर हुए विवाद का उदाहरण है. 1980 के दशक में मोहन सिंह ने अपना कारोबार अपने तीन बेटों- परविंदर, मंजीत और अनलजीत- के बीच बांट दिया था. रैनबैक्सी की जिम्मेदारी परविंदर सिंह को मिली. उनके दोनों छोटे भाइयों की इस व्यवस्था को लेकर नाराजगी की चर्चा रही, हालांकि यह खुलकर सामने नहीं आई.
बाद में मोहन सिंह और उनके बेटे परविंदर के बीच रैनबैक्सी के नियंत्रण को लेकर मतभेद सार्वजनिक हो गए. 1999 में कंपनी के बोर्ड स्तर पर हुए घटनाक्रम के बाद परविंदर सिंह ने कंपनी की कमान अपने हाथ में ले ली.
परविंदर सिंह के बेटे शिविंदर सिंह और मालविंदर सिंह भी आगे चलकर रैनबैक्सी के कारोबार से जुड़े. इस तरह कंपनी का इतिहास दिखाता है कि पारिवारिक कारोबार में उत्तराधिकार का सवाल केवल संपत्ति के बंटवारे तक सीमित नहीं रहता, बल्कि कंपनी के नियंत्रण और नेतृत्व को भी प्रभावित कर सकता है.
यूएई के बैंक Emirates NBD की तीन भारतीय शाखाएं RBL बैंक के नेटवर्क का हिस्सा बनेंगी, भारतीय बैंक में करीब 3 अरब डॉलर के निवेश का है प्रस्ताव
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने दुबई स्थित बैंक Emirates NBD की भारत में संचालित तीन शाखाओं के RBL बैंक में विलय को मंजूरी दे दी है. यह विलय 1 दिसंबर 2026 से प्रभावी होगा. यह कदम Emirates NBD की ओर से RBL बैंक में बहुलांश हिस्सेदारी हासिल करने की प्रस्तावित योजना का हिस्सा है. इस सौदे के तहत विदेशी बैंक की भारत में मौजूदा बैंकिंग गतिविधियों को RBL बैंक के परिचालन के साथ एकीकृत किया जाएगा.
RBI ने 16 अक्टूबर को जारी अधिसूचना में बताया कि इस विलय को बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 44A(4) के तहत मंजूरी दी गई है. विलय के बाद Emirates NBD की तीनों भारतीय शाखाएं RBL बैंक के घरेलू शाखा नेटवर्क का हिस्सा बन जाएंगी.
RBL बैंक में 3 अरब डॉलर निवेश की योजना
Emirates NBD ने अक्टूबर 2025 में RBL बैंक में 60 फीसदी हिस्सेदारी हासिल करने की योजना का ऐलान किया था. इस प्रस्तावित सौदे का मूल्य करीब 3 अरब डॉलर रखा गया था. समझौते में भारत में Emirates NBD के मौजूदा बैंकिंग कारोबार को RBL बैंक के साथ एकीकृत करने का प्रावधान भी शामिल था.
जनवरी 2026 में भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) ने इस प्रस्तावित सौदे को मंजूरी दे दी थी. इस सौदे में शेयरों का तरजीही आवंटन, ओपन ऑफर और Emirates NBD की तीन भारतीय शाखाओं का RBL बैंक में विलय शामिल है.
शेयरों के तरजीही आवंटन के जरिए Emirates NBD को RBL बैंक की चुकता इक्विटी पूंजी में 60 फीसदी तक हिस्सेदारी मिल सकती है. इसके अलावा, बैंक की विस्तारित मतदान पूंजी के 26 फीसदी तक हिस्से के लिए ओपन ऑफर का प्रावधान है.
RBI ने 74 फीसदी तक हिस्सेदारी खरीदने की दी थी मंजूरी
RBI ने अप्रैल 2026 में Emirates NBD को RBL बैंक की शेयर पूंजी में 74 फीसदी तक हिस्सेदारी हासिल करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी. हालांकि, इसके साथ शर्त रखी गई थी कि दुबई स्थित बैंक RBL बैंक में कम से कम 51 फीसदी हिस्सेदारी बनाए रखेगा. केंद्रीय बैंक ने RBL बैंक में Emirates NBD के मतदान अधिकारों को भी 26 फीसदी तक सीमित किया था.
15 मई को RBL बैंक ने बताया था कि प्रस्तावित निवेश के लिए नियामकीय और सरकारी मंजूरियों की प्रक्रिया पूरी हो गई है. इस सौदे में करीब 3 अरब डॉलर यानी 26,850 करोड़ रुपये की प्राथमिक पूंजी निवेश की योजना शामिल है. बैंक ने इसे भारत के बैंकिंग क्षेत्र में होने वाले बड़े अंतरराष्ट्रीय निवेशों में से एक बताया था.
भारतीय बैंकिंग क्षेत्र में बढ़ेगी विदेशी निवेशक की हिस्सेदारी
RBI की ताजा मंजूरी के साथ Emirates NBD के भारतीय बैंकिंग कारोबार को RBL बैंक के साथ एकीकृत करने की प्रक्रिया में एक और महत्वपूर्ण कदम पूरा हो गया है. तीनों शाखाओं का विलय 1 दिसंबर 2026 से प्रभावी होने वाला है.
इस सौदे के तहत RBL बैंक में Emirates NBD की हिस्सेदारी बढ़ाने और भारत में उसके मौजूदा बैंकिंग परिचालन को एक ही नेटवर्क के अंतर्गत लाने की योजना है. करीब 3 अरब डॉलर के प्रस्तावित निवेश से भारतीय बैंकिंग क्षेत्र में विदेशी पूंजी निवेश को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है.
गन्ने के रस, चीनी और बी-हेवी मोलासेस से बने एथेनॉल की खरीद नहीं करेंगी सरकारी तेल कंपनियां, मक्का और चावल से उत्पादन को मिलेगा बढ़ावा
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देश में चीनी की बढ़ती कीमतों और उत्पादन में कमी की आशंका के बीच केंद्र सरकार ने एथेनॉल की खरीद को लेकर बड़ा फैसला लिया है. सरकार ने एथेनॉल आपूर्ति वर्ष 2026-27 में चीनी और गन्ने से जुड़े कच्चे माल से बने एथेनॉल की खरीद पर रोक लगा दी है. इस कदम का मकसद घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता बढ़ाना और कीमतों को नियंत्रित करना है. अब सरकारी तेल कंपनियां मक्का और चावल जैसे अनाज से बने एथेनॉल की खरीद पर अधिक निर्भर रहेंगी.
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सरकारी तेल कंपनियों की ओर से शुक्रवार को जारी नए टेंडर में यह प्रावधान किया गया है. नवंबर 2026 से शुरू होने वाले एथेनॉल आपूर्ति वर्ष 2026-27 में चीनी आधारित एथेनॉल के लिए चीनी के इस्तेमाल का लक्ष्य शून्य रखा गया है.
किन स्रोतों से बने एथेनॉल की खरीद पर लगी रोक?
नए टेंडर के तहत तेल कंपनियां गन्ने के रस, चीनी, चीनी की चाशनी और बी-हेवी मोलासेस से बने एथेनॉल की खरीद नहीं करेंगी. बी-हेवी मोलासेस चीनी उत्पादन के दौरान निकलने वाला एक गाढ़ा उप-उत्पाद है, जिसका इस्तेमाल एथेनॉल बनाने में किया जाता है. हालांकि, इस फैसले का मतलब एथेनॉल उत्पादन पर पूरी तरह रोक लगाना नहीं है. तेल कंपनियां दूसरे कच्चे माल से तैयार एथेनॉल की खरीद जारी रखेंगी. इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम ने संयुक्त रूप से करीब 1,100 करोड़ लीटर एथेनॉल की खरीद के लिए बोलियां आमंत्रित की हैं.
मक्का और चावल से बने एथेनॉल पर बढ़ेगी निर्भरता
सरकारी तेल कंपनियों के नए टेंडर में मक्का, टूटे हुए चावल और भारतीय खाद्य निगम (FCI) से खरीदे गए अतिरिक्त चावल से बने एथेनॉल की खरीद की अनुमति दी गई है. इससे एथेनॉल उत्पादन में अनाज की भूमिका बढ़ने की उम्मीद है.
अब तक गन्ने के रस, चीनी और उससे जुड़े उप-उत्पादों का इस्तेमाल भी एथेनॉल बनाने के लिए किया जाता रहा है. लेकिन चीनी की घरेलू मांग और कीमतों को देखते हुए सरकार ने फिलहाल इन स्रोतों से बने एथेनॉल की खरीद रोकने का फैसला किया है.
चीनी की कीमतें बढ़ने के पीछे क्या है वजह?
भारत दुनिया में चीनी की सबसे अधिक खपत करने वाले देशों में शामिल है. महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों में कम बारिश के कारण चीनी उत्पादन प्रभावित होने की आशंका है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, उत्पादन को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच चीनी की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई हैं.
ऐसे में सरकार की प्राथमिकता घरेलू बाजार में चीनी की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करना है. गन्ने का इस्तेमाल चीनी बनाने में होने से बाजार में इसकी आपूर्ति बढ़ाने में मदद मिल सकती है. भारत पिछले कुछ वर्षों से अतिरिक्त चीनी का इस्तेमाल एथेनॉल उत्पादन के लिए भी करता रहा है, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में सरकार चीनी की उपलब्धता को प्राथमिकता दे रही है.
मक्का आधारित एथेनॉल की कीमत में भी कटौती
सरकारी तेल कंपनियों ने मक्का से बनने वाले एथेनॉल पर मिलने वाली अतिरिक्त प्रोत्साहन राशि में भी कटौती की है. पहले यह राशि 5.79 रुपये प्रति लीटर थी, जिसे घटाकर 2.79 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया है. इस बदलाव के बाद मक्का आधारित एथेनॉल की खरीद कीमत 71.86 रुपये से घटकर 68.86 रुपये प्रति लीटर हो गई है. यानी तेल कंपनियां अब इसके लिए प्रति लीटर 3 रुपये कम भुगतान करेंगी.
पेट्रोल में 20 फीसदी एथेनॉल मिलाने की योजना पर क्या होगा असर?
भारत में पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने की योजना का उद्देश्य कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करना और प्रदूषण घटाने में मदद करना है. E20 पेट्रोल में 20 फीसदी एथेनॉल और 80 फीसदी पेट्रोल होता है.
हालांकि, एथेनॉल की मांग बढ़ने के साथ सरकार के सामने घरेलू खाद्य जरूरतों और ईंधन उत्पादन के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती भी है. चीनी आधारित एथेनॉल की खरीद रोकने के बाद तेल कंपनियों को मक्का और चावल जैसे दूसरे स्रोतों से पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करनी होगी.
सरकार के इस फैसले से एक ओर घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता बढ़ाने में मदद मिल सकती है, वहीं दूसरी ओर एथेनॉल उत्पादन के लिए कच्चे माल के विकल्पों का महत्व बढ़ेगा. हालांकि, पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण के लक्ष्य पर इसका वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि वैकल्पिक स्रोतों से कितनी मात्रा में एथेनॉल उपलब्ध हो पाता है.
रुपये को संभालने के लिए आरबीआई की डॉलर बिक्री, महंगे कच्चे तेल और विदेशी निवेशकों की बिकवाली से विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ा है. 9 अक्टूबर को समाप्त सप्ताह में भंडार 8.6 अरब डॉलर घटकर 726 अरब डॉलर रह गया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में लगातार पांचवें सप्ताह गिरावट दर्ज की गई है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, 9 अक्टूबर को समाप्त सप्ताह में देश का विदेशी मुद्रा भंडार 8.6 अरब डॉलर घटकर 726 अरब डॉलर रह गया. रुपये में तेज गिरावट को रोकने के लिए केंद्रीय बैंक की ओर से डॉलर बेचने और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के कारण भंडार पर दबाव बना हुआ है.
विदेशी मुद्रा भंडार 4 सितंबर को 785.71 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया था. इसके बाद से इसमें लगातार गिरावट आई है. पिछले पांच सप्ताह में देश का विदेशी मुद्रा भंडार करीब 59.7 अरब डॉलर कम हो चुका है.
विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट की क्या है वजह?
विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट की प्रमुख वजह रुपये पर बना दबाव है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की ऊंची कीमतों, विदेशी निवेशकों की बिकवाली और डॉलर की बढ़ती मांग से भारतीय मुद्रा पर दबाव बना हुआ है.
रुपये में ज्यादा उतार-चढ़ाव को रोकने के लिए आरबीआई बाजार में डॉलर बेचता है. इससे बाजार में डॉलर की उपलब्धता बढ़ती है और रुपये को सहारा मिलता है. हालांकि, डॉलर की इस बिक्री से देश के विदेशी मुद्रा भंडार में कमी आती है.
आईडीएफसी फर्स्ट बैंक की मुख्य अर्थशास्त्री गौरा सेनगुप्ता के मुताबिक, आरबीआई ने संबंधित सप्ताह के दौरान करीब 9.8 अरब डॉलर बेचे. हालांकि, विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों के मूल्यांकन में बदलाव से कुछ राहत मिली, जिससे कुल भंडार में गिरावट का असर सीमित रहा.
उन्होंने कहा कि आने वाले समय में भी विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बना रह सकता है. इसकी एक वजह भारत के भुगतान संतुलन में घाटे की आशंका है. इसके अलावा, कच्चे तेल के आयात के लिए डॉलर की मांग भी बनी रहने की संभावना है.
विदेशी मुद्रा भंडार के अलग-अलग घटकों में कितनी गिरावट?
आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार, 9 अक्टूबर को समाप्त सप्ताह में विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियां 7.14 अरब डॉलर घटकर 597.61 अरब डॉलर रह गईं. ये देश के कुल विदेशी मुद्रा भंडार का सबसे बड़ा हिस्सा हैं.
इसी अवधि में सोने के भंडार में भी 1.32 अरब डॉलर की गिरावट आई और यह 105.09 अरब डॉलर रह गया. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) से जुड़े विशेष आहरण अधिकार (SDR) 10.9 करोड़ डॉलर घटकर 18.55 अरब डॉलर रह गए. वहीं, आईएमएफ में भारत की आरक्षित स्थिति में एक करोड़ डॉलर की कमी आई और यह घटकर 4.78 अरब डॉलर रह गई.
रुपये को संभालने के लिए आरबीआई ने क्या कदम उठाए?
रुपये पर दबाव कम करने के लिए आरबीआई ने हाल के दिनों में कई कदम उठाए हैं. केंद्रीय बैंक ने सरकारी तेल कंपनियों के लिए डॉलर उपलब्ध कराने की अलग व्यवस्था शुरू की है. इसका उद्देश्य इन कंपनियों की डॉलर संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए खुले बाजार पर उनकी निर्भरता कम करना है.
इसके अलावा, विदेशी मुद्रा से जुड़े डेरिवेटिव सौदों के नियम भी सख्त किए गए हैं. आरबीआई ने 10 अक्टूबर को रुपये के खिलाफ सट्टेबाजी वाले सौदों पर अंकुश लगाने के लिए नए उपायों की घोषणा की थी. कुछ डेरिवेटिव लेनदेन के लिए विदेशी मुद्रा जोखिम के मद्देनजर अतिरिक्त रिजर्व रखने की शर्त भी लागू की गई है.
इन कदमों का उद्देश्य रुपये में अस्थिरता कम करना और विदेशी मुद्रा बाजार में दबाव को नियंत्रित करना है. हालांकि, कच्चे तेल के आयात और अन्य जरूरतों के कारण डॉलर की मांग बनी हुई है.
डॉलर के मुकाबले रुपये की क्या रही स्थिति?
शुक्रवार को डॉलर के मुकाबले रुपये में मजबूती दर्ज की गई. रुपया 10 पैसे मजबूत होकर 94.96 प्रति डॉलर पर बंद हुआ, जबकि पिछले कारोबारी सत्र में यह 95.06 प्रति डॉलर पर था. यह 8 सितंबर के बाद रुपये का सबसे मजबूत स्तर रहा. पूरे सप्ताह के दौरान रुपये में करीब 1.9 फीसदी की तेजी आई. यह पिछले चार वर्षों में रुपये का सबसे अच्छा साप्ताहिक प्रदर्शन बताया गया है.
महादेव घोटाले का शिकंजा Ebix पर कसने के बीच Eraaya ने अमेरिकी शेयर बाजारों से 12.6 मिलियन डॉलर के मॉर्गेज की जानकारी छिपाई. प्रवर्तन निदेशालय के लिखित आदेश के बावजूद 12.6 मिलियन डॉलर का यह कर्ज कंपनी के चेयरमैन विकास गर्ग की गिरफ्तारी के बाद लिया गया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
महादेव सट्टेबाजी सिंडिकेट से जुड़ा एक सनसनीखेज नया मामला सामने आया है, जिसमें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संपत्तियों को स्थानांतरित करने की चौंकाने वाली कार्रवाई की गई है. Ebix Inc. और Eraaya Lifespaces के हाई-प्रोफाइल चेयरमैन विकास गर्ग जब रायपुर में प्रवर्तन निदेशालय (ED) की हिरासत में हैं, उसी दौरान उनके कॉर्पोरेट साम्राज्य ने अपनी सबसे कीमती संपत्ति को गुपचुप तरीके से गिरवी रख दिया. अटलांटा के जॉन्स क्रीक में स्थित कंपनी के 17 एकड़ में फैले विशाल कॉर्पोरेट मुख्यालय को 12.6 मिलियन डॉलर के भारी-भरकम कर्ज के लिए गिरवी रखा गया है.
भारत के ED का कहना है कि नैस्डैक में सूचीबद्ध कंपनी Ebix को महादेव सट्टेबाजी से मिले पैसों का इस्तेमाल करके खरीदा गया था और इसमें शामिल लोगों ने हवाला नेटवर्क के जरिए कॉर्पोरेट साम्राज्य खड़ा किया. Eraaya Lifespaces भारत में सूचीबद्ध कंपनी है, जिसका संबंध गर्ग से है और ED ने इसकी सभी संपत्तियों को फ्रीज कर दिया है.
सीमा पार संपत्तियों से जुड़ा यह हालिया घटनाक्रम ED की ओर से 5 जून, 2026 को जारी स्पष्ट और प्राथमिकता वाले अनंतिम कुर्की आदेश (संख्या 16/2026) का सीधे उल्लंघन करता है. इस आदेश के तहत 940.77 करोड़ रुपये की संपत्तियों को फ्रीज किया गया था, जिसमें विशेष रूप से Ebix में Eraaya की हिस्सेदारी को निशाना बनाया गया था. अधिकारियों का स्पष्ट कहना है कि इस कंपनी का अधिग्रहण पूरी तरह से कुख्यात SkyExchange नेटवर्क से उत्पन्न जुए के अवैध धन से किया गया था, जिसे दुबई के हवाला नेटवर्क के जरिए आगे बढ़ाया गया.
जॉर्जिया में आधी रात को हुआ सौदा
भारतीय एजेंसियों की ओर से लिखित कानूनी आदेश जारी कर Ebix के नेतृत्व को चेतावनी दी गई थी कि वे किसी भी तरह की बिक्री, हस्तांतरण, संपत्ति के अधिकारों में बदलाव या उस पर किसी प्रकार का ग्रहणाधिकार बनाने की अनुमति न दें. इसके बावजूद अमेरिका में कंपनी के अधिकारियों ने गुपचुप तरीके से कार्रवाई की.
4 अगस्त, 2026 को, गर्ग को दिल्ली स्थित उनके आवास से नाटकीय तरीके से गिरफ्तार किए जाने के ठीक तीन सप्ताह बाद, Ebix के अमेरिकी प्रेसिडेंट गगन सेठी ने कैलिफोर्निया स्थित ऋणदाता Velocity Commercial Capital LLC के साथ कानूनी रूप से बाध्यकारी 'Deed to Secure Debt' पर हस्ताक्षर किए.
12 अगस्त को जॉर्जिया के भूमि रिकॉर्ड में डीड बुक 70417 के तहत दर्ज इन दस्तावेजों से पता चलता है कि Ebix ने अपने प्रतिष्ठित 1 Ebix Way कैंपस को 'अपरिवर्तनीय और बिना किसी शर्त' के मॉर्गेज पर रख दिया. इससे भी गंभीर बात यह है कि Ebix ने अमेरिकी ऋणदाता को भरोसा दिलाया कि उसके पास 'संपत्ति को गिरवी रखने का पूरा अधिकार' है. इस दौरान कंपनी ने भारत में उसके खिलाफ लगाए गए करोड़ों डॉलर के आपराधिक प्रतिबंध का कोई उल्लेख नहीं किया.
जब्ती से पहले संपत्तियों से पैसा निकालने की कोशिश
12.6 मिलियन डॉलर का यह ऋण, जिसके तहत संपत्ति वर्ष 2056 तक गिरवी रहेगी, इमारत से होने वाली किराये की पूरी आय भी कैलिफोर्निया स्थित ऋणदाता को सौंप देता है. इस घटनाक्रम से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, नई मिली रकम में से 11.5 मिलियन डॉलर का इस्तेमाल तुरंत पहले से मौजूद एक ग्रहणाधिकार को चुकाने में किया गया. यह ग्रहणाधिकार बड़े निवेशकों Watch Hill और Melanie Lane के पास था, जिन्होंने Ebix और Eraaya दोनों में निवेश किया था.
भारतीय जांचकर्ताओं के लिए इस कदम का समय और इसका उद्देश्य बेहद चिंताजनक है. अटलांटा स्थित कैंपस को भारी कर्ज के बदले गिरवी रखकर कंपनी प्रभावी रूप से इस भौतिक संपत्ति का मूल्य कम कर रही है. अमेरिकी मुख्यालय से निकलने वाला हर डॉलर भारतीय सरकार के लिए वसूली की संभावित रकम को कम करता है, यदि अदालतें अंततः संपत्तियों को जब्त करने का आदेश देती हैं.
मामले को और गंभीर बनाते हुए, इस संपत्ति को बेचने की तैयारी भी तेजी से चल रही है. कैंपस को ब्रोकर Cresa के जरिए चुपचाप बिक्री के लिए सूचीबद्ध किया गया है. बताया जा रहा है कि हेल्थकेयर क्षेत्र की दिग्गज कंपनी Emory Healthcare इसे खरीदने की प्रतीक्षा कर रही है. उसका जॉन्स क्रीक अस्पताल इस संपत्ति के ठीक बगल में स्थित है.
कॉर्पोरेट सच्चाई छिपाने की कोशिश और जमानत पर संकट
अमेरिका में संपत्ति के दस्तावेज इस लेनदेन को सार्वजनिक रूप से उजागर कर रहे हैं, लेकिन Eraaya Lifespaces ने भारतीय शेयर बाजारों में इस बारे में पूरी तरह चुप्पी साध रखी है. कंपनी ने 12.6 मिलियन डॉलर के मॉर्गेज की जानकारी भारतीय नियामकों और सार्वजनिक शेयरधारकों से छिपाई है और अनिवार्य खुलासे करने में पूरी तरह विफल रही है.
इस छिपे हुए कर्ज में एक गंभीर जोखिम भी है. अमेरिकी मॉर्गेज समझौते में कहा गया है कि अधिकारियों की ओर से किसी भी तरह की 'कुर्की या इसी तरह की प्रक्रिया' तत्काल डिफॉल्ट की स्थिति पैदा करेगी. यदि ED अटलांटा स्थित कैंपस की जब्ती को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लागू करने की कोशिश करता है, तो Velocity Commercial Capital को कर्ज की पूरी रकम तत्काल वापस मांगने का कानूनी अधिकार मिल सकता है. इससे संपत्ति को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जटिल कानूनी लड़ाई छिड़ सकती है.
इस अनधिकृत वित्तीय कार्रवाई के खुलासे से भारतीय अदालतों में बड़ा विवाद खड़ा होने की आशंका है. दिल्ली BJP के आर्थिक प्रकोष्ठ के पूर्व संयोजक गर्ग फिलहाल जमानत पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. हालांकि, जमानत संबंधी दिशानिर्देशों के तहत न्यायाधीशों को यह विचार करना होता है कि क्या आरोपी सबूतों से छेड़छाड़ कर सकता है या अवैध धन से अर्जित संपत्तियों को बेच सकता है.
जेल में रहते हुए उनकी कॉर्पोरेट कंपनियों की ओर से फ्रीज की गई संपत्तियों का मूल्य कम किए जाने के सबूत सामने आने से गर्ग की जमानत की संभावनाओं को बड़ा झटका लग सकता है. चूंकि भारत का ED का आदेश जॉर्जिया के भूमि रजिस्ट्रार को सीधे तौर पर संपत्ति से जुड़े लेनदेन रोकने के लिए बाध्य नहीं कर सकता, इसलिए नई दिल्ली को अब इस सौदे को रोकने के लिए पारस्परिक कानूनी सहायता संधियों (MLAT) को तेजी से सक्रिय करना होगा, ताकि महादेव सट्टेबाजी से हासिल अवैध धन हमेशा के लिए अमेरिकी वित्तीय प्रणाली में गायब न हो जाए.
लंदन की साजिश और इसका मुख्य रणनीतिकार
इस कॉर्पोरेट अधिग्रहण की तकनीकी भाषा के पीछे लंदन में हुई कई गोपनीय और बड़े दांव वाली बैठकों की कहानी छिपी है. यहीं दिल्ली के कारोबारी विकास गर्ग की मुलाकात दुबई स्थित कुख्यात हवाला कारोबारी हरि शंकर तिबरेवाल से हुई थी. आरोप है कि तिबरेवाल महादेव ऑनलाइन बुक साम्राज्य के प्रमुख स्तंभों में से एक था.
तिबरेवाल केवल पैसों का लेनदेन नहीं कर रहा था, बल्कि वह इस पूरी वित्तीय व्यवस्था का मुख्य रणनीतिकार था. ED के रिकॉर्ड में बार-बार समन जारी किए जाने के बाद भी उसके नाम के आगे 'पेश नहीं हुए' दर्ज है. इसके बावजूद जांचकर्ताओं ने कोलकाता में जन्मे इस कारोबारी को सट्टेबाजी ऐप से लेकर कॉर्पोरेट बोर्डरूम तक धन पहुंचाने की प्रक्रिया के केंद्र में रखा है.
लंदन में हुई रणनीतिक बैठकों के दौरान गर्ग और तिबरेवाल ने एक बेहद महत्वाकांक्षी योजना तैयार की. इसके तहत SkyExchange सट्टेबाजी प्लेटफॉर्म से होने वाली भारी अवैध कमाई का इस्तेमाल करके अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कारोबार का विस्तार करना और नैस्डैक में सूचीबद्ध एक प्रतिष्ठित अमेरिकी टेक कंपनी का अधिग्रहण करना था.
SkyExchange का मायाजाल और हवाला नेटवर्क
SkyExchange एक बड़े डिजिटल नेटवर्क की तरह काम करता था, जो छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में हजारों सट्टेबाजों से रोजाना करोड़ों रुपये जुटाता था. इस कारोबार का पैमाना बेहद बड़ा था. ED की अभियोजन शिकायतों में इस प्लेटफॉर्म का सह-स्वामित्व और सह-प्रचार तिबरेवाल के साथ घोटाले के मुख्य आरोपियों सौरभ चंद्राकर और रवि उप्पल के पास बताया गया है.
SkyExchange का कारोबार: इस प्लेटफॉर्म से 178 दर्ज सप्ताहों के दौरान हर सप्ताह 22 करोड़ रुपये की कमाई हुई. इस तरह केवल इसी प्लेटफॉर्म से अपराध की कुल आय 3,916 करोड़ रुपये रही.
Lotus365 के साथ तालमेल: गिरीश तलरेजा द्वारा संचालित इस सहयोगी नेटवर्क ने हर महीने 50 करोड़ रुपये और जोड़े.
कुल मिलाकर, यह छाया अर्थव्यवस्था सालाना 4,000 से 5,000 करोड़ रुपये का ऐसा कारोबार कर रही थी, जिसका आधिकारिक रिकॉर्ड में कोई उल्लेख नहीं था. यह किसी वैध मिड-कैप कंपनी के कारोबार के बराबर था.
दुबई से संचालित शेल कंपनियों, मिरर खातों और ऐसे वित्तीय रिकॉर्ड के जटिल नेटवर्क के जरिए, जिनका पता लगाना मुश्किल था, तिबरेवाल ने इस अवैध धन को वैध कॉर्पोरेट पूंजी में बदल दिया. इस पैसे को क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल प्लेसमेंट (QIP), विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) जैसे जटिल वित्तीय माध्यमों से भारत में वापस लाया गया. इसके बाद इस रकम को गर्ग के नियंत्रण वाली सूचीबद्ध कंपनियों में निवेश किया गया.
13 रुपये के पेनी स्टॉक से 361 मिलियन डॉलर के वैश्विक साम्राज्य तक
इस वित्तीय कहानी का सबसे चौंकाने वाला पहलू Justride Enterprises का तेजी से हुआ उभार था. यह एक लगभग अज्ञात पेनी स्टॉक था, जिसके शेयर की कीमत महज 13 रुपये थी. बाद में इसका नाम बदलकर Eraaya Lifespaces कर दिया गया. इसके बाद कंपनी के शेयरों में एक साल के भीतर करीब 6,000 फीसदी की जबरदस्त तेजी आई और अगस्त 2024 तक इसका भाव लगभग 800 रुपये प्रति शेयर पहुंच गया. इस दौरान यह कथित तौर पर अवैध धन को वैध बनाने का प्रमुख माध्यम बन गई.
इस तरह कृत्रिम रूप से तैयार की गई वित्तीय ताकत का इस्तेमाल करते हुए Eraaya ने कॉर्पोरेट जगत को तब चौंका दिया, जब उसने अमेरिका की एक दिवालियापन अदालत में 361 मिलियन डॉलर की बोली जीतकर Ebix Inc. का अधिग्रहण कर लिया. Ebix कभी बीमा सॉफ्टवेयर क्षेत्र की अग्रणी कंपनी थी, लेकिन बाद में दिवालिया हो गई.
यह कॉर्पोरेट जगत में पर्दे के पीछे की सबसे बड़ी चालों में से एक थी. एक अमेरिकी टेक कंपनी का अधिग्रहण लाखों ऐसे ऑनलाइन सट्टेबाजों के पैसों से किया गया, जिन्हें इस कथित वित्तीय नेटवर्क की वास्तविकता का अंदाजा नहीं था. इस तरह रायपुर की गलियों से लेकर अटलांटा के कांच से बने कॉर्पोरेट बोर्डरूम तक फैले अवैध धन के नेटवर्क की कहानी सामने आई.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(BW रिपोर्टर्स पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free की लेखिका हैं. यह एक तीखा खुलासा है, जिसने भारत के वित्तीय बाजारों के छिपे हुए पक्ष को सामने लाया. मुंबई में करीब दो दशकों की जमीनी रिपोर्टिंग के साथ पलक ने पैसे, सत्ता और नियमन के बीच के गठजोड़ की गहराई से पड़ताल करने वाले पत्रकार के रूप में पहचान बनाई है. उनके लेख भारत के प्रतिष्ठित वित्तीय दैनिकों, जिनमें The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line शामिल हैं, में प्रकाशित हुए हैं.
19 वर्ष की उम्र में अपराध रिपोर्टिंग की ओर आकर्षित हुईं पलक ने जल्द ही महसूस किया कि 1980 के दशक के मुंबई के गैंग युद्धों की जगह अब कॉरपोरेट टावरों में चलने वाली सफेदपोश योजनाओं ने ले ली है. इस समझ ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने भारत की ‘व्हाइट मनी’ अर्थव्यवस्था की जटिल गतिविधियों को समझने में वर्षों बिताए हैं. शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामकीय खामियों तक, उनका काम हाई फाइनेंस की चमकदार सतह के पीछे छिपे उन समूहों को सामने लाता है जो पर्दे के पीछे से फैसलों को प्रभावित करते हैं. सच्चाई सामने लाने का उनका जुनून और उन कड़ियों को जोड़ने की क्षमता, जिन्हें दूसरे नजरअंदाज कर देते हैं, उन्हें एक मजबूत पत्रकार बनाती है, जो यथास्थिति को चुनौती देने और उन खिलाड़ियों को बेनकाब करने से नहीं डरतीं जो खुद को कानून से ऊपर समझते हैं.)
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय नीतिगत बाधाओं को दूर करने, नए बिजनेस मॉडल को बढ़ावा देने और लाइव इवेंट्स व फिल्म निर्माण की प्रक्रियाओं को सरल बनाने पर कर रहा है काम
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के मीडिया और एंटरटेनमेंट सेक्टर को 100 अरब डॉलर के उद्योग में बदलने की महत्वाकांक्षा के बीच सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) खुद को केवल नियामक के बजाय उद्योग को आगे बढ़ाने वाले सहयोगी के रूप में देखता है. मंत्रालय का जोर नीतिगत बाधाओं को दूर करने, नए बिजनेस मॉडल को बढ़ावा देने और कारोबार के विस्तार के लिए अनुकूल माहौल तैयार करने पर है. मंत्रालय के संयुक्त सचिव सेंथिल राजन ने एक उद्योग कार्यक्रम में यह बात कही.
राजन के मुताबिक, भारत के मीडिया और एंटरटेनमेंट सेक्टर को आगे बढ़ाने में निजी क्षेत्र की अहम भूमिका रही है. सरकार की जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करना है कि बदलते प्लेटफॉर्म, दर्शकों की पसंद और कमाई के नए तरीकों के बीच नियम उद्योग की वृद्धि में बाधा न बनें. उन्होंने कहा, "उद्योग हमें ऐसे सहयोगी के रूप में देखता है, जो आगे बढ़ने का रास्ता आसान बनाता है. हमारा काम रास्ते की बाधाओं को दूर करना है."
राजन ने कहा कि इस क्षेत्र की विकास क्षमता का पूरा लाभ उठाने के लिए किसी एक नीतिगत फैसले पर निर्भर नहीं रहा जा सकता. इसके लिए कई स्तरों पर कदम उठाने होंगे.
टीवी विज्ञापनों के नियमों में बदलाव से ब्रॉडकास्टर्स को राहत
राजन ने नीतिगत बदलाव का उदाहरण देते हुए कहा कि पहले लीनियर टेलीविजन चैनलों पर एक घंटे में अधिकतम 12 मिनट के विज्ञापन दिखाने की सीमा थी, जिसे हटा दिया गया है. उनके मुताबिक, इससे टेलीविजन चैनलों को विज्ञापन के जरिए कमाई करने में अधिक लचीलापन मिलेगा.
डिजिटल प्लेटफॉर्म की ओर विज्ञापन खर्च बढ़ने के बीच इस बदलाव से ब्रॉडकास्टर्स को अपने विज्ञापन स्लॉट का बेहतर इस्तेमाल करने का अवसर मिलेगा. राजन ने कहा कि मंत्रालय उद्योग के अलग-अलग क्षेत्रों की चुनौतियों की समीक्षा कर रहा है, ताकि मौजूदा नीतियां कारोबार के विस्तार में बाधा न बनें.
लाइव इवेंट्स और फिल्म निर्माण की प्रक्रिया होगी आसान
मंत्रालय लाइव इवेंट्स के आयोजन और फिल्मों की शूटिंग के लिए जरूरी अनुमतियों की प्रक्रिया को सरल बनाने पर भी काम कर रहा है. राजन ने बताया कि लाइव इवेंट्स डेवलपमेंट सेल का दूसरा चरण तैयार किया जा रहा है. इसके तहत राज्य सरकारों के साथ मिलकर मंजूरी की प्रक्रिया को आसान बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं.
कई राज्य ऐसे पोर्टल से जुड़ चुके हैं, जहां आयोजक विभिन्न अनुमतियों के लिए आवेदन कर सकते हैं. राजन के मुताबिक, लाइव इवेंट्स का आर्थिक लाभ केवल मनोरंजन क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे पर्यटन, होटल और परिवहन जैसे क्षेत्रों को भी फायदा मिलता है.
फिल्म निर्माण से जुड़ी प्रक्रियाओं को आसान बनाने के लिए मंत्रालय ने इंडिया सिने हब (India Cine Hub) भी स्थापित किया है. यह एक सिंगल-विंडो पोर्टल है, जिसका उद्देश्य फिल्मों की शूटिंग के लिए जरूरी अनुमतियों को सरल बनाना और विदेशी सहयोग से जुड़ी गतिविधियों को सुविधाजनक करना है.
गेमिंग और एनीमेशन जैसे क्षेत्रों में कौशल विकास पर जोर
मीडिया और एंटरटेनमेंट उद्योग में नई तकनीकों के बढ़ते इस्तेमाल के बीच विशेष कौशल वाले पेशेवरों की मांग भी बढ़ रही है. राजन ने बताया कि WAVES समिट के बाद उद्योग के भागीदारों के सहयोग से इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिएटिव टेक्नोलॉजीज की स्थापना की गई है.
यह संस्थान गेमिंग, एनीमेशन, विजुअल इफेक्ट्स और संबंधित रचनात्मक क्षेत्रों में पेशेवरों को प्रशिक्षित करने पर ध्यान दे रहा है. संस्थान में वर्चुअल रियलिटी (VR), एक्सटेंडेड रियलिटी (XR), प्रोजेक्शन थिएटर और गेमिंग लैब जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं.
राजन ने उद्योग से इन सुविधाओं का लाभ उठाने और भारत के क्रिएटिव टेक्नोलॉजी इकोसिस्टम को मजबूत करने की अपील की.
भारतीय कंटेंट को वैश्विक बाजार तक पहुंचाने की जरूरत
राजन ने कहा कि भारतीय मीडिया और एंटरटेनमेंट उद्योग को केवल घरेलू दर्शकों या विदेशों में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों तक सीमित नहीं रहना चाहिए. उद्योग को ऐसे कंटेंट और बौद्धिक संपदा (IP) विकसित करने की जरूरत है, जिन्हें वैश्विक स्तर पर पसंद किया जाए.
उन्होंने कहा कि भारतीय फिल्मों में पहले 100 करोड़ रुपये की कमाई को बड़ी उपलब्धि माना जाता था, लेकिन बाद में उद्योग ने 1,000 करोड़ रुपये के आंकड़े को लक्ष्य बनाना शुरू किया. राजन ने 'बाहुबली' की सफलता का उल्लेख करते हुए कहा कि इससे बड़े व्यावसायिक लक्ष्य हासिल करने की संभावनाएं सामने आईं.
उनके मुताबिक, भारतीय कंटेंट क्रिएटर्स, प्रोड्यूसर्स और डिस्ट्रीब्यूटर्स को अंतरराष्ट्रीय दर्शकों को ध्यान में रखकर अपनी रणनीति बनानी होगी.
राजन ने कहा, "हमें पूरी वैल्यू चेन को वैश्विक बाजार तक पहुंचाना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि हर साल भारतीय कंटेंट के कम से कम तीन या चार प्रोडक्ट ऐसे हों, जिन्हें प्रवासी भारतीयों से आगे भी वैश्विक स्तर पर सफलता मिले."
भारत के मीडिया और एंटरटेनमेंट सेक्टर के लिए 100 अरब डॉलर के लक्ष्य को हासिल करने में सरकार और उद्योग, दोनों की भूमिका अहम होगी. जहां सरकार नीतिगत और परिचालन संबंधी बाधाओं को दूर करने पर काम कर रही है, वहीं उद्योग को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के अनुरूप कंटेंट और बिजनेस मॉडल विकसित करने होंगे.