त्योहारी और शादी के सीजन में बाजारों तक पहुंच बाधित होने का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, व्यापारिक संगठनों ने चांदनी चौक, सदर बाजार और कनॉट प्लेस समेत प्रमुख बाजारों में सुचारु आवागमन सुनिश्चित करने की मांग की.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
दिल्ली के प्रमुख बाजारों में प्रदर्शनों, जुलूसों और रास्तों में रुकावट के कारण कारोबार प्रभावित होने का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है. व्यापारिक संगठनों का दावा है कि राजधानी में रोजाना होने वाले ₹500 से ₹600 करोड़ के कारोबार में से करीब ₹250 करोड़ का कारोबार प्रभावित हो सकता है. त्योहारी और शादी के सीजन में कारोबारियों की चिंता बढ़ गई है. याचिकाकर्ताओं ने अदालत से बाजारों तक ग्राहकों और व्यापारियों की पहुंच बनाए रखने के लिए जरूरी निर्देश देने की मांग की है.
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने छोटे दुकानदारों, फेरीवालों और स्टॉल संचालकों की परेशानियों पर ध्यान दिया. उन्होंने कहा, "हम कार्रवाई करेंगे."
सुप्रीम कोर्ट में याचिका, बाजारों तक पहुंच बनाए रखने की मांग
यह याचिका दिल्ली किराना कमेटी और दिल्ली आयरन एंड हार्डवेयर मर्चेंट्स एसोसिएशन ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दाखिल की है. याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता जय अनंत देहाद्राई ने अदालत में पक्ष रखा. याचिका में मांग की गई है कि अक्टूबर 2026 से जनवरी 2027 के बीच दिल्ली के प्रमुख बाजारों में व्यापारिक गतिविधियों और आम लोगों की आवाजाही में अनावश्यक बाधा न आए.
याचिका में कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क को 16 और 17 अक्टूबर को बंद रखने के लिए नई दिल्ली नगरपालिका परिषद (NDMC) की ओर से जारी अधिसूचना का भी उल्लेख किया गया है. व्यापारिक संगठनों का कहना है कि बाजारों तक पहुंच प्रभावित होने से न केवल दुकानदारों, बल्कि कर्मचारियों, फेरीवालों, आपूर्तिकर्ताओं और दिहाड़ी मजदूरों की आय पर भी असर पड़ता है.
प्रदर्शन के अधिकार और कारोबार के बीच संतुलन पर जोर
कॉन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) के राष्ट्रीय संयुक्त महासचिव सुमित अग्रवाल ने कहा कि याचिका का उद्देश्य शांतिपूर्ण प्रदर्शन के संवैधानिक अधिकार को रोकना नहीं है. संगठन चाहता है कि प्रदर्शन के अधिकार के साथ व्यापारियों की आजीविका और आम लोगों के आवागमन के अधिकारों का भी ध्यान रखा जाए.
याचिका में चांदनी चौक, सदर बाजार, कनॉट प्लेस और खान मार्केट जैसे प्रमुख व्यावसायिक क्षेत्रों में यातायात और आवागमन सुचारु रखने की मांग की गई है. इसके साथ ही बाजारों से दूर प्रदर्शन के लिए उपयुक्त स्थान तय करने, प्रदर्शनों के समय और तरीके को व्यवस्थित करने तथा बाजारों तक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तैयार करने का आग्रह किया गया है.
दिल्ली में एक करोड़ से अधिक लोगों की आजीविका जुड़ी
कैट के मुताबिक, दिल्ली में 10 लाख से अधिक कारोबारी प्रतिष्ठान हैं, जिनसे एक करोड़ से ज्यादा लोगों की आजीविका जुड़ी हुई है. संगठन का दावा है कि रोजाना करीब पांच लाख व्यापारी दूसरे राज्यों से कारोबार के सिलसिले में दिल्ली आते हैं.
व्यापारियों के लिए त्योहारी और शादी का सीजन साल के सबसे अहम कारोबारी दौर में शामिल है. इस दौरान बाजारों में ग्राहकों की आवाजाही कम होने और बिक्री घटने से छोटे कारोबारियों के सामने किराया, कर्मचारियों का वेतन, ईएमआई और अन्य खर्चों का भुगतान करने की चुनौती खड़ी हो सकती है. कारोबार प्रभावित होने का असर परिवहन क्षेत्र से जुड़े लोगों, आपूर्तिकर्ताओं और दिहाड़ी मजदूरों की कमाई पर भी पड़ सकता है.
व्यापारी संगठनों की बैठक बुलाएगा कैट
कैट दिल्ली के प्रमुख व्यापारी संगठनों की बैठक बुलाकर इस मुद्दे पर साझा रणनीति तैयार करने की योजना बना रहा है. संगठन का जोर इस बात पर है कि ग्राहकों की बाजारों तक पहुंच बनी रहे और कारोबार सामान्य रूप से चलता रहे.
व्यापारी संगठनों का मानना है कि प्रदर्शन के संवैधानिक अधिकार का सम्मान करते हुए ऐसा समाधान निकाला जाना चाहिए, जिससे बाजारों में व्यापारिक गतिविधियां और आम लोगों की आवाजाही बाधित न हों.
वेणु श्रीनिवासन के परिवार में संपत्ति और उत्तराधिकार को लेकर विवाद ने फिर चर्चा में लाए कारोबारी घरानों के पारिवारिक झगड़े, रैनबैक्सी से लेकर दूसरे बड़े उद्योग समूहों तक ऐसे विवादों ने बदली कंपनियों की कमान और कारोबार की दिशा
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के बड़े कारोबारी घरानों में उत्तराधिकार और संपत्ति के बंटवारे को लेकर विवाद कोई नई बात नहीं है. कई परिवारों में कारोबार की कमान किसके हाथ में होगी और संपत्ति का बंटवारा कैसे होगा, इस सवाल पर मतभेद सामने आते रहे हैं. अब मल्टी-बिलियन डॉलर TVS ग्रुप के प्रमुख वेणु श्रीनिवासन के परिवार में उत्तराधिकार को लेकर विवाद चर्चा में है. इस घटनाक्रम ने एक बार फिर सवाल खड़ा किया है कि कारोबारी परिवारों में पारिवारिक मतभेद कंपनियों के नियंत्रण और भविष्य को किस तरह प्रभावित कर सकते हैं.
TVS ग्रुप: परिवार में दो पक्षों के बीच मतभेद
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, TVS ग्रुप के प्रमुख वेणु श्रीनिवासन के परिवार में उत्तराधिकार और संपत्ति के बंटवारे को लेकर विवाद सामने आया है. इस मामले में एक ओर वेणु श्रीनिवासन और उनके बेटे सुदर्शन वेणु हैं, जबकि दूसरी ओर उनकी पत्नी मल्लिका श्रीनिवासन, जो TAFE की चेयरपर्सन हैं, और बेटी लक्ष्मी वेणु हैं, जो सुंदरम-क्लेटन की मैनेजिंग डायरेक्टर हैं. इस विवाद का आगे क्या असर होगा, यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा. हालांकि, भारतीय कारोबारी इतिहास में ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं, जब परिवार के भीतर नियंत्रण को लेकर मतभेदों ने कंपनियों के नेतृत्व और कारोबार की संरचना को प्रभावित किया.
रैनबैक्सी: पिता और बेटे के बीच नियंत्रण की लड़ाई
रैनबैक्सी का इतिहास भी कारोबारी परिवार में उत्तराधिकार और कंपनी के नियंत्रण को लेकर हुए विवाद का उदाहरण है. 1980 के दशक में मोहन सिंह ने अपना कारोबार अपने तीन बेटों- परविंदर, मंजीत और अनलजीत- के बीच बांट दिया था. रैनबैक्सी की जिम्मेदारी परविंदर सिंह को मिली. उनके दोनों छोटे भाइयों की इस व्यवस्था को लेकर नाराजगी की चर्चा रही, हालांकि यह खुलकर सामने नहीं आई.
बाद में मोहन सिंह और उनके बेटे परविंदर के बीच रैनबैक्सी के नियंत्रण को लेकर मतभेद सार्वजनिक हो गए. 1999 में कंपनी के बोर्ड स्तर पर हुए घटनाक्रम के बाद परविंदर सिंह ने कंपनी की कमान अपने हाथ में ले ली.
परविंदर सिंह के बेटे शिविंदर सिंह और मालविंदर सिंह भी आगे चलकर रैनबैक्सी के कारोबार से जुड़े. इस तरह कंपनी का इतिहास दिखाता है कि पारिवारिक कारोबार में उत्तराधिकार का सवाल केवल संपत्ति के बंटवारे तक सीमित नहीं रहता, बल्कि कंपनी के नियंत्रण और नेतृत्व को भी प्रभावित कर सकता है.
यूएई के बैंक Emirates NBD की तीन भारतीय शाखाएं RBL बैंक के नेटवर्क का हिस्सा बनेंगी, भारतीय बैंक में करीब 3 अरब डॉलर के निवेश का है प्रस्ताव
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने दुबई स्थित बैंक Emirates NBD की भारत में संचालित तीन शाखाओं के RBL बैंक में विलय को मंजूरी दे दी है. यह विलय 1 दिसंबर 2026 से प्रभावी होगा. यह कदम Emirates NBD की ओर से RBL बैंक में बहुलांश हिस्सेदारी हासिल करने की प्रस्तावित योजना का हिस्सा है. इस सौदे के तहत विदेशी बैंक की भारत में मौजूदा बैंकिंग गतिविधियों को RBL बैंक के परिचालन के साथ एकीकृत किया जाएगा.
RBI ने 16 अक्टूबर को जारी अधिसूचना में बताया कि इस विलय को बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 44A(4) के तहत मंजूरी दी गई है. विलय के बाद Emirates NBD की तीनों भारतीय शाखाएं RBL बैंक के घरेलू शाखा नेटवर्क का हिस्सा बन जाएंगी.
RBL बैंक में 3 अरब डॉलर निवेश की योजना
Emirates NBD ने अक्टूबर 2025 में RBL बैंक में 60 फीसदी हिस्सेदारी हासिल करने की योजना का ऐलान किया था. इस प्रस्तावित सौदे का मूल्य करीब 3 अरब डॉलर रखा गया था. समझौते में भारत में Emirates NBD के मौजूदा बैंकिंग कारोबार को RBL बैंक के साथ एकीकृत करने का प्रावधान भी शामिल था.
जनवरी 2026 में भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) ने इस प्रस्तावित सौदे को मंजूरी दे दी थी. इस सौदे में शेयरों का तरजीही आवंटन, ओपन ऑफर और Emirates NBD की तीन भारतीय शाखाओं का RBL बैंक में विलय शामिल है.
शेयरों के तरजीही आवंटन के जरिए Emirates NBD को RBL बैंक की चुकता इक्विटी पूंजी में 60 फीसदी तक हिस्सेदारी मिल सकती है. इसके अलावा, बैंक की विस्तारित मतदान पूंजी के 26 फीसदी तक हिस्से के लिए ओपन ऑफर का प्रावधान है.
RBI ने 74 फीसदी तक हिस्सेदारी खरीदने की दी थी मंजूरी
RBI ने अप्रैल 2026 में Emirates NBD को RBL बैंक की शेयर पूंजी में 74 फीसदी तक हिस्सेदारी हासिल करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी. हालांकि, इसके साथ शर्त रखी गई थी कि दुबई स्थित बैंक RBL बैंक में कम से कम 51 फीसदी हिस्सेदारी बनाए रखेगा. केंद्रीय बैंक ने RBL बैंक में Emirates NBD के मतदान अधिकारों को भी 26 फीसदी तक सीमित किया था.
15 मई को RBL बैंक ने बताया था कि प्रस्तावित निवेश के लिए नियामकीय और सरकारी मंजूरियों की प्रक्रिया पूरी हो गई है. इस सौदे में करीब 3 अरब डॉलर यानी 26,850 करोड़ रुपये की प्राथमिक पूंजी निवेश की योजना शामिल है. बैंक ने इसे भारत के बैंकिंग क्षेत्र में होने वाले बड़े अंतरराष्ट्रीय निवेशों में से एक बताया था.
भारतीय बैंकिंग क्षेत्र में बढ़ेगी विदेशी निवेशक की हिस्सेदारी
RBI की ताजा मंजूरी के साथ Emirates NBD के भारतीय बैंकिंग कारोबार को RBL बैंक के साथ एकीकृत करने की प्रक्रिया में एक और महत्वपूर्ण कदम पूरा हो गया है. तीनों शाखाओं का विलय 1 दिसंबर 2026 से प्रभावी होने वाला है.
इस सौदे के तहत RBL बैंक में Emirates NBD की हिस्सेदारी बढ़ाने और भारत में उसके मौजूदा बैंकिंग परिचालन को एक ही नेटवर्क के अंतर्गत लाने की योजना है. करीब 3 अरब डॉलर के प्रस्तावित निवेश से भारतीय बैंकिंग क्षेत्र में विदेशी पूंजी निवेश को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है.
गन्ने के रस, चीनी और बी-हेवी मोलासेस से बने एथेनॉल की खरीद नहीं करेंगी सरकारी तेल कंपनियां, मक्का और चावल से उत्पादन को मिलेगा बढ़ावा
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देश में चीनी की बढ़ती कीमतों और उत्पादन में कमी की आशंका के बीच केंद्र सरकार ने एथेनॉल की खरीद को लेकर बड़ा फैसला लिया है. सरकार ने एथेनॉल आपूर्ति वर्ष 2026-27 में चीनी और गन्ने से जुड़े कच्चे माल से बने एथेनॉल की खरीद पर रोक लगा दी है. इस कदम का मकसद घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता बढ़ाना और कीमतों को नियंत्रित करना है. अब सरकारी तेल कंपनियां मक्का और चावल जैसे अनाज से बने एथेनॉल की खरीद पर अधिक निर्भर रहेंगी.
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सरकारी तेल कंपनियों की ओर से शुक्रवार को जारी नए टेंडर में यह प्रावधान किया गया है. नवंबर 2026 से शुरू होने वाले एथेनॉल आपूर्ति वर्ष 2026-27 में चीनी आधारित एथेनॉल के लिए चीनी के इस्तेमाल का लक्ष्य शून्य रखा गया है.
किन स्रोतों से बने एथेनॉल की खरीद पर लगी रोक?
नए टेंडर के तहत तेल कंपनियां गन्ने के रस, चीनी, चीनी की चाशनी और बी-हेवी मोलासेस से बने एथेनॉल की खरीद नहीं करेंगी. बी-हेवी मोलासेस चीनी उत्पादन के दौरान निकलने वाला एक गाढ़ा उप-उत्पाद है, जिसका इस्तेमाल एथेनॉल बनाने में किया जाता है. हालांकि, इस फैसले का मतलब एथेनॉल उत्पादन पर पूरी तरह रोक लगाना नहीं है. तेल कंपनियां दूसरे कच्चे माल से तैयार एथेनॉल की खरीद जारी रखेंगी. इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम ने संयुक्त रूप से करीब 1,100 करोड़ लीटर एथेनॉल की खरीद के लिए बोलियां आमंत्रित की हैं.
मक्का और चावल से बने एथेनॉल पर बढ़ेगी निर्भरता
सरकारी तेल कंपनियों के नए टेंडर में मक्का, टूटे हुए चावल और भारतीय खाद्य निगम (FCI) से खरीदे गए अतिरिक्त चावल से बने एथेनॉल की खरीद की अनुमति दी गई है. इससे एथेनॉल उत्पादन में अनाज की भूमिका बढ़ने की उम्मीद है.
अब तक गन्ने के रस, चीनी और उससे जुड़े उप-उत्पादों का इस्तेमाल भी एथेनॉल बनाने के लिए किया जाता रहा है. लेकिन चीनी की घरेलू मांग और कीमतों को देखते हुए सरकार ने फिलहाल इन स्रोतों से बने एथेनॉल की खरीद रोकने का फैसला किया है.
चीनी की कीमतें बढ़ने के पीछे क्या है वजह?
भारत दुनिया में चीनी की सबसे अधिक खपत करने वाले देशों में शामिल है. महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों में कम बारिश के कारण चीनी उत्पादन प्रभावित होने की आशंका है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, उत्पादन को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच चीनी की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई हैं.
ऐसे में सरकार की प्राथमिकता घरेलू बाजार में चीनी की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करना है. गन्ने का इस्तेमाल चीनी बनाने में होने से बाजार में इसकी आपूर्ति बढ़ाने में मदद मिल सकती है. भारत पिछले कुछ वर्षों से अतिरिक्त चीनी का इस्तेमाल एथेनॉल उत्पादन के लिए भी करता रहा है, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में सरकार चीनी की उपलब्धता को प्राथमिकता दे रही है.
मक्का आधारित एथेनॉल की कीमत में भी कटौती
सरकारी तेल कंपनियों ने मक्का से बनने वाले एथेनॉल पर मिलने वाली अतिरिक्त प्रोत्साहन राशि में भी कटौती की है. पहले यह राशि 5.79 रुपये प्रति लीटर थी, जिसे घटाकर 2.79 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया है. इस बदलाव के बाद मक्का आधारित एथेनॉल की खरीद कीमत 71.86 रुपये से घटकर 68.86 रुपये प्रति लीटर हो गई है. यानी तेल कंपनियां अब इसके लिए प्रति लीटर 3 रुपये कम भुगतान करेंगी.
पेट्रोल में 20 फीसदी एथेनॉल मिलाने की योजना पर क्या होगा असर?
भारत में पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने की योजना का उद्देश्य कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करना और प्रदूषण घटाने में मदद करना है. E20 पेट्रोल में 20 फीसदी एथेनॉल और 80 फीसदी पेट्रोल होता है.
हालांकि, एथेनॉल की मांग बढ़ने के साथ सरकार के सामने घरेलू खाद्य जरूरतों और ईंधन उत्पादन के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती भी है. चीनी आधारित एथेनॉल की खरीद रोकने के बाद तेल कंपनियों को मक्का और चावल जैसे दूसरे स्रोतों से पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करनी होगी.
सरकार के इस फैसले से एक ओर घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता बढ़ाने में मदद मिल सकती है, वहीं दूसरी ओर एथेनॉल उत्पादन के लिए कच्चे माल के विकल्पों का महत्व बढ़ेगा. हालांकि, पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण के लक्ष्य पर इसका वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि वैकल्पिक स्रोतों से कितनी मात्रा में एथेनॉल उपलब्ध हो पाता है.
रुपये को संभालने के लिए आरबीआई की डॉलर बिक्री, महंगे कच्चे तेल और विदेशी निवेशकों की बिकवाली से विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ा है. 9 अक्टूबर को समाप्त सप्ताह में भंडार 8.6 अरब डॉलर घटकर 726 अरब डॉलर रह गया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में लगातार पांचवें सप्ताह गिरावट दर्ज की गई है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, 9 अक्टूबर को समाप्त सप्ताह में देश का विदेशी मुद्रा भंडार 8.6 अरब डॉलर घटकर 726 अरब डॉलर रह गया. रुपये में तेज गिरावट को रोकने के लिए केंद्रीय बैंक की ओर से डॉलर बेचने और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के कारण भंडार पर दबाव बना हुआ है.
विदेशी मुद्रा भंडार 4 सितंबर को 785.71 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया था. इसके बाद से इसमें लगातार गिरावट आई है. पिछले पांच सप्ताह में देश का विदेशी मुद्रा भंडार करीब 59.7 अरब डॉलर कम हो चुका है.
विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट की क्या है वजह?
विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट की प्रमुख वजह रुपये पर बना दबाव है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की ऊंची कीमतों, विदेशी निवेशकों की बिकवाली और डॉलर की बढ़ती मांग से भारतीय मुद्रा पर दबाव बना हुआ है.
रुपये में ज्यादा उतार-चढ़ाव को रोकने के लिए आरबीआई बाजार में डॉलर बेचता है. इससे बाजार में डॉलर की उपलब्धता बढ़ती है और रुपये को सहारा मिलता है. हालांकि, डॉलर की इस बिक्री से देश के विदेशी मुद्रा भंडार में कमी आती है.
आईडीएफसी फर्स्ट बैंक की मुख्य अर्थशास्त्री गौरा सेनगुप्ता के मुताबिक, आरबीआई ने संबंधित सप्ताह के दौरान करीब 9.8 अरब डॉलर बेचे. हालांकि, विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों के मूल्यांकन में बदलाव से कुछ राहत मिली, जिससे कुल भंडार में गिरावट का असर सीमित रहा.
उन्होंने कहा कि आने वाले समय में भी विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बना रह सकता है. इसकी एक वजह भारत के भुगतान संतुलन में घाटे की आशंका है. इसके अलावा, कच्चे तेल के आयात के लिए डॉलर की मांग भी बनी रहने की संभावना है.
विदेशी मुद्रा भंडार के अलग-अलग घटकों में कितनी गिरावट?
आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार, 9 अक्टूबर को समाप्त सप्ताह में विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियां 7.14 अरब डॉलर घटकर 597.61 अरब डॉलर रह गईं. ये देश के कुल विदेशी मुद्रा भंडार का सबसे बड़ा हिस्सा हैं.
इसी अवधि में सोने के भंडार में भी 1.32 अरब डॉलर की गिरावट आई और यह 105.09 अरब डॉलर रह गया. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) से जुड़े विशेष आहरण अधिकार (SDR) 10.9 करोड़ डॉलर घटकर 18.55 अरब डॉलर रह गए. वहीं, आईएमएफ में भारत की आरक्षित स्थिति में एक करोड़ डॉलर की कमी आई और यह घटकर 4.78 अरब डॉलर रह गई.
रुपये को संभालने के लिए आरबीआई ने क्या कदम उठाए?
रुपये पर दबाव कम करने के लिए आरबीआई ने हाल के दिनों में कई कदम उठाए हैं. केंद्रीय बैंक ने सरकारी तेल कंपनियों के लिए डॉलर उपलब्ध कराने की अलग व्यवस्था शुरू की है. इसका उद्देश्य इन कंपनियों की डॉलर संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए खुले बाजार पर उनकी निर्भरता कम करना है.
इसके अलावा, विदेशी मुद्रा से जुड़े डेरिवेटिव सौदों के नियम भी सख्त किए गए हैं. आरबीआई ने 10 अक्टूबर को रुपये के खिलाफ सट्टेबाजी वाले सौदों पर अंकुश लगाने के लिए नए उपायों की घोषणा की थी. कुछ डेरिवेटिव लेनदेन के लिए विदेशी मुद्रा जोखिम के मद्देनजर अतिरिक्त रिजर्व रखने की शर्त भी लागू की गई है.
इन कदमों का उद्देश्य रुपये में अस्थिरता कम करना और विदेशी मुद्रा बाजार में दबाव को नियंत्रित करना है. हालांकि, कच्चे तेल के आयात और अन्य जरूरतों के कारण डॉलर की मांग बनी हुई है.
डॉलर के मुकाबले रुपये की क्या रही स्थिति?
शुक्रवार को डॉलर के मुकाबले रुपये में मजबूती दर्ज की गई. रुपया 10 पैसे मजबूत होकर 94.96 प्रति डॉलर पर बंद हुआ, जबकि पिछले कारोबारी सत्र में यह 95.06 प्रति डॉलर पर था. यह 8 सितंबर के बाद रुपये का सबसे मजबूत स्तर रहा. पूरे सप्ताह के दौरान रुपये में करीब 1.9 फीसदी की तेजी आई. यह पिछले चार वर्षों में रुपये का सबसे अच्छा साप्ताहिक प्रदर्शन बताया गया है.
महादेव घोटाले का शिकंजा Ebix पर कसने के बीच Eraaya ने अमेरिकी शेयर बाजारों से 12.6 मिलियन डॉलर के मॉर्गेज की जानकारी छिपाई. प्रवर्तन निदेशालय के लिखित आदेश के बावजूद 12.6 मिलियन डॉलर का यह कर्ज कंपनी के चेयरमैन विकास गर्ग की गिरफ्तारी के बाद लिया गया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
महादेव सट्टेबाजी सिंडिकेट से जुड़ा एक सनसनीखेज नया मामला सामने आया है, जिसमें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संपत्तियों को स्थानांतरित करने की चौंकाने वाली कार्रवाई की गई है. Ebix Inc. और Eraaya Lifespaces के हाई-प्रोफाइल चेयरमैन विकास गर्ग जब रायपुर में प्रवर्तन निदेशालय (ED) की हिरासत में हैं, उसी दौरान उनके कॉर्पोरेट साम्राज्य ने अपनी सबसे कीमती संपत्ति को गुपचुप तरीके से गिरवी रख दिया. अटलांटा के जॉन्स क्रीक में स्थित कंपनी के 17 एकड़ में फैले विशाल कॉर्पोरेट मुख्यालय को 12.6 मिलियन डॉलर के भारी-भरकम कर्ज के लिए गिरवी रखा गया है.
भारत के ED का कहना है कि नैस्डैक में सूचीबद्ध कंपनी Ebix को महादेव सट्टेबाजी से मिले पैसों का इस्तेमाल करके खरीदा गया था और इसमें शामिल लोगों ने हवाला नेटवर्क के जरिए कॉर्पोरेट साम्राज्य खड़ा किया. Eraaya Lifespaces भारत में सूचीबद्ध कंपनी है, जिसका संबंध गर्ग से है और ED ने इसकी सभी संपत्तियों को फ्रीज कर दिया है.
सीमा पार संपत्तियों से जुड़ा यह हालिया घटनाक्रम ED की ओर से 5 जून, 2026 को जारी स्पष्ट और प्राथमिकता वाले अनंतिम कुर्की आदेश (संख्या 16/2026) का सीधे उल्लंघन करता है. इस आदेश के तहत 940.77 करोड़ रुपये की संपत्तियों को फ्रीज किया गया था, जिसमें विशेष रूप से Ebix में Eraaya की हिस्सेदारी को निशाना बनाया गया था. अधिकारियों का स्पष्ट कहना है कि इस कंपनी का अधिग्रहण पूरी तरह से कुख्यात SkyExchange नेटवर्क से उत्पन्न जुए के अवैध धन से किया गया था, जिसे दुबई के हवाला नेटवर्क के जरिए आगे बढ़ाया गया.
जॉर्जिया में आधी रात को हुआ सौदा
भारतीय एजेंसियों की ओर से लिखित कानूनी आदेश जारी कर Ebix के नेतृत्व को चेतावनी दी गई थी कि वे किसी भी तरह की बिक्री, हस्तांतरण, संपत्ति के अधिकारों में बदलाव या उस पर किसी प्रकार का ग्रहणाधिकार बनाने की अनुमति न दें. इसके बावजूद अमेरिका में कंपनी के अधिकारियों ने गुपचुप तरीके से कार्रवाई की.
4 अगस्त, 2026 को, गर्ग को दिल्ली स्थित उनके आवास से नाटकीय तरीके से गिरफ्तार किए जाने के ठीक तीन सप्ताह बाद, Ebix के अमेरिकी प्रेसिडेंट गगन सेठी ने कैलिफोर्निया स्थित ऋणदाता Velocity Commercial Capital LLC के साथ कानूनी रूप से बाध्यकारी 'Deed to Secure Debt' पर हस्ताक्षर किए.
12 अगस्त को जॉर्जिया के भूमि रिकॉर्ड में डीड बुक 70417 के तहत दर्ज इन दस्तावेजों से पता चलता है कि Ebix ने अपने प्रतिष्ठित 1 Ebix Way कैंपस को 'अपरिवर्तनीय और बिना किसी शर्त' के मॉर्गेज पर रख दिया. इससे भी गंभीर बात यह है कि Ebix ने अमेरिकी ऋणदाता को भरोसा दिलाया कि उसके पास 'संपत्ति को गिरवी रखने का पूरा अधिकार' है. इस दौरान कंपनी ने भारत में उसके खिलाफ लगाए गए करोड़ों डॉलर के आपराधिक प्रतिबंध का कोई उल्लेख नहीं किया.
जब्ती से पहले संपत्तियों से पैसा निकालने की कोशिश
12.6 मिलियन डॉलर का यह ऋण, जिसके तहत संपत्ति वर्ष 2056 तक गिरवी रहेगी, इमारत से होने वाली किराये की पूरी आय भी कैलिफोर्निया स्थित ऋणदाता को सौंप देता है. इस घटनाक्रम से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, नई मिली रकम में से 11.5 मिलियन डॉलर का इस्तेमाल तुरंत पहले से मौजूद एक ग्रहणाधिकार को चुकाने में किया गया. यह ग्रहणाधिकार बड़े निवेशकों Watch Hill और Melanie Lane के पास था, जिन्होंने Ebix और Eraaya दोनों में निवेश किया था.
भारतीय जांचकर्ताओं के लिए इस कदम का समय और इसका उद्देश्य बेहद चिंताजनक है. अटलांटा स्थित कैंपस को भारी कर्ज के बदले गिरवी रखकर कंपनी प्रभावी रूप से इस भौतिक संपत्ति का मूल्य कम कर रही है. अमेरिकी मुख्यालय से निकलने वाला हर डॉलर भारतीय सरकार के लिए वसूली की संभावित रकम को कम करता है, यदि अदालतें अंततः संपत्तियों को जब्त करने का आदेश देती हैं.
मामले को और गंभीर बनाते हुए, इस संपत्ति को बेचने की तैयारी भी तेजी से चल रही है. कैंपस को ब्रोकर Cresa के जरिए चुपचाप बिक्री के लिए सूचीबद्ध किया गया है. बताया जा रहा है कि हेल्थकेयर क्षेत्र की दिग्गज कंपनी Emory Healthcare इसे खरीदने की प्रतीक्षा कर रही है. उसका जॉन्स क्रीक अस्पताल इस संपत्ति के ठीक बगल में स्थित है.
कॉर्पोरेट सच्चाई छिपाने की कोशिश और जमानत पर संकट
अमेरिका में संपत्ति के दस्तावेज इस लेनदेन को सार्वजनिक रूप से उजागर कर रहे हैं, लेकिन Eraaya Lifespaces ने भारतीय शेयर बाजारों में इस बारे में पूरी तरह चुप्पी साध रखी है. कंपनी ने 12.6 मिलियन डॉलर के मॉर्गेज की जानकारी भारतीय नियामकों और सार्वजनिक शेयरधारकों से छिपाई है और अनिवार्य खुलासे करने में पूरी तरह विफल रही है.
इस छिपे हुए कर्ज में एक गंभीर जोखिम भी है. अमेरिकी मॉर्गेज समझौते में कहा गया है कि अधिकारियों की ओर से किसी भी तरह की 'कुर्की या इसी तरह की प्रक्रिया' तत्काल डिफॉल्ट की स्थिति पैदा करेगी. यदि ED अटलांटा स्थित कैंपस की जब्ती को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लागू करने की कोशिश करता है, तो Velocity Commercial Capital को कर्ज की पूरी रकम तत्काल वापस मांगने का कानूनी अधिकार मिल सकता है. इससे संपत्ति को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जटिल कानूनी लड़ाई छिड़ सकती है.
इस अनधिकृत वित्तीय कार्रवाई के खुलासे से भारतीय अदालतों में बड़ा विवाद खड़ा होने की आशंका है. दिल्ली BJP के आर्थिक प्रकोष्ठ के पूर्व संयोजक गर्ग फिलहाल जमानत पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. हालांकि, जमानत संबंधी दिशानिर्देशों के तहत न्यायाधीशों को यह विचार करना होता है कि क्या आरोपी सबूतों से छेड़छाड़ कर सकता है या अवैध धन से अर्जित संपत्तियों को बेच सकता है.
जेल में रहते हुए उनकी कॉर्पोरेट कंपनियों की ओर से फ्रीज की गई संपत्तियों का मूल्य कम किए जाने के सबूत सामने आने से गर्ग की जमानत की संभावनाओं को बड़ा झटका लग सकता है. चूंकि भारत का ED का आदेश जॉर्जिया के भूमि रजिस्ट्रार को सीधे तौर पर संपत्ति से जुड़े लेनदेन रोकने के लिए बाध्य नहीं कर सकता, इसलिए नई दिल्ली को अब इस सौदे को रोकने के लिए पारस्परिक कानूनी सहायता संधियों (MLAT) को तेजी से सक्रिय करना होगा, ताकि महादेव सट्टेबाजी से हासिल अवैध धन हमेशा के लिए अमेरिकी वित्तीय प्रणाली में गायब न हो जाए.
लंदन की साजिश और इसका मुख्य रणनीतिकार
इस कॉर्पोरेट अधिग्रहण की तकनीकी भाषा के पीछे लंदन में हुई कई गोपनीय और बड़े दांव वाली बैठकों की कहानी छिपी है. यहीं दिल्ली के कारोबारी विकास गर्ग की मुलाकात दुबई स्थित कुख्यात हवाला कारोबारी हरि शंकर तिबरेवाल से हुई थी. आरोप है कि तिबरेवाल महादेव ऑनलाइन बुक साम्राज्य के प्रमुख स्तंभों में से एक था.
तिबरेवाल केवल पैसों का लेनदेन नहीं कर रहा था, बल्कि वह इस पूरी वित्तीय व्यवस्था का मुख्य रणनीतिकार था. ED के रिकॉर्ड में बार-बार समन जारी किए जाने के बाद भी उसके नाम के आगे 'पेश नहीं हुए' दर्ज है. इसके बावजूद जांचकर्ताओं ने कोलकाता में जन्मे इस कारोबारी को सट्टेबाजी ऐप से लेकर कॉर्पोरेट बोर्डरूम तक धन पहुंचाने की प्रक्रिया के केंद्र में रखा है.
लंदन में हुई रणनीतिक बैठकों के दौरान गर्ग और तिबरेवाल ने एक बेहद महत्वाकांक्षी योजना तैयार की. इसके तहत SkyExchange सट्टेबाजी प्लेटफॉर्म से होने वाली भारी अवैध कमाई का इस्तेमाल करके अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कारोबार का विस्तार करना और नैस्डैक में सूचीबद्ध एक प्रतिष्ठित अमेरिकी टेक कंपनी का अधिग्रहण करना था.
SkyExchange का मायाजाल और हवाला नेटवर्क
SkyExchange एक बड़े डिजिटल नेटवर्क की तरह काम करता था, जो छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में हजारों सट्टेबाजों से रोजाना करोड़ों रुपये जुटाता था. इस कारोबार का पैमाना बेहद बड़ा था. ED की अभियोजन शिकायतों में इस प्लेटफॉर्म का सह-स्वामित्व और सह-प्रचार तिबरेवाल के साथ घोटाले के मुख्य आरोपियों सौरभ चंद्राकर और रवि उप्पल के पास बताया गया है.
SkyExchange का कारोबार: इस प्लेटफॉर्म से 178 दर्ज सप्ताहों के दौरान हर सप्ताह 22 करोड़ रुपये की कमाई हुई. इस तरह केवल इसी प्लेटफॉर्म से अपराध की कुल आय 3,916 करोड़ रुपये रही.
Lotus365 के साथ तालमेल: गिरीश तलरेजा द्वारा संचालित इस सहयोगी नेटवर्क ने हर महीने 50 करोड़ रुपये और जोड़े.
कुल मिलाकर, यह छाया अर्थव्यवस्था सालाना 4,000 से 5,000 करोड़ रुपये का ऐसा कारोबार कर रही थी, जिसका आधिकारिक रिकॉर्ड में कोई उल्लेख नहीं था. यह किसी वैध मिड-कैप कंपनी के कारोबार के बराबर था.
दुबई से संचालित शेल कंपनियों, मिरर खातों और ऐसे वित्तीय रिकॉर्ड के जटिल नेटवर्क के जरिए, जिनका पता लगाना मुश्किल था, तिबरेवाल ने इस अवैध धन को वैध कॉर्पोरेट पूंजी में बदल दिया. इस पैसे को क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल प्लेसमेंट (QIP), विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) जैसे जटिल वित्तीय माध्यमों से भारत में वापस लाया गया. इसके बाद इस रकम को गर्ग के नियंत्रण वाली सूचीबद्ध कंपनियों में निवेश किया गया.
13 रुपये के पेनी स्टॉक से 361 मिलियन डॉलर के वैश्विक साम्राज्य तक
इस वित्तीय कहानी का सबसे चौंकाने वाला पहलू Justride Enterprises का तेजी से हुआ उभार था. यह एक लगभग अज्ञात पेनी स्टॉक था, जिसके शेयर की कीमत महज 13 रुपये थी. बाद में इसका नाम बदलकर Eraaya Lifespaces कर दिया गया. इसके बाद कंपनी के शेयरों में एक साल के भीतर करीब 6,000 फीसदी की जबरदस्त तेजी आई और अगस्त 2024 तक इसका भाव लगभग 800 रुपये प्रति शेयर पहुंच गया. इस दौरान यह कथित तौर पर अवैध धन को वैध बनाने का प्रमुख माध्यम बन गई.
इस तरह कृत्रिम रूप से तैयार की गई वित्तीय ताकत का इस्तेमाल करते हुए Eraaya ने कॉर्पोरेट जगत को तब चौंका दिया, जब उसने अमेरिका की एक दिवालियापन अदालत में 361 मिलियन डॉलर की बोली जीतकर Ebix Inc. का अधिग्रहण कर लिया. Ebix कभी बीमा सॉफ्टवेयर क्षेत्र की अग्रणी कंपनी थी, लेकिन बाद में दिवालिया हो गई.
यह कॉर्पोरेट जगत में पर्दे के पीछे की सबसे बड़ी चालों में से एक थी. एक अमेरिकी टेक कंपनी का अधिग्रहण लाखों ऐसे ऑनलाइन सट्टेबाजों के पैसों से किया गया, जिन्हें इस कथित वित्तीय नेटवर्क की वास्तविकता का अंदाजा नहीं था. इस तरह रायपुर की गलियों से लेकर अटलांटा के कांच से बने कॉर्पोरेट बोर्डरूम तक फैले अवैध धन के नेटवर्क की कहानी सामने आई.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(BW रिपोर्टर्स पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free की लेखिका हैं. यह एक तीखा खुलासा है, जिसने भारत के वित्तीय बाजारों के छिपे हुए पक्ष को सामने लाया. मुंबई में करीब दो दशकों की जमीनी रिपोर्टिंग के साथ पलक ने पैसे, सत्ता और नियमन के बीच के गठजोड़ की गहराई से पड़ताल करने वाले पत्रकार के रूप में पहचान बनाई है. उनके लेख भारत के प्रतिष्ठित वित्तीय दैनिकों, जिनमें The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line शामिल हैं, में प्रकाशित हुए हैं.
19 वर्ष की उम्र में अपराध रिपोर्टिंग की ओर आकर्षित हुईं पलक ने जल्द ही महसूस किया कि 1980 के दशक के मुंबई के गैंग युद्धों की जगह अब कॉरपोरेट टावरों में चलने वाली सफेदपोश योजनाओं ने ले ली है. इस समझ ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने भारत की ‘व्हाइट मनी’ अर्थव्यवस्था की जटिल गतिविधियों को समझने में वर्षों बिताए हैं. शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामकीय खामियों तक, उनका काम हाई फाइनेंस की चमकदार सतह के पीछे छिपे उन समूहों को सामने लाता है जो पर्दे के पीछे से फैसलों को प्रभावित करते हैं. सच्चाई सामने लाने का उनका जुनून और उन कड़ियों को जोड़ने की क्षमता, जिन्हें दूसरे नजरअंदाज कर देते हैं, उन्हें एक मजबूत पत्रकार बनाती है, जो यथास्थिति को चुनौती देने और उन खिलाड़ियों को बेनकाब करने से नहीं डरतीं जो खुद को कानून से ऊपर समझते हैं.)
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय नीतिगत बाधाओं को दूर करने, नए बिजनेस मॉडल को बढ़ावा देने और लाइव इवेंट्स व फिल्म निर्माण की प्रक्रियाओं को सरल बनाने पर कर रहा है काम
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के मीडिया और एंटरटेनमेंट सेक्टर को 100 अरब डॉलर के उद्योग में बदलने की महत्वाकांक्षा के बीच सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) खुद को केवल नियामक के बजाय उद्योग को आगे बढ़ाने वाले सहयोगी के रूप में देखता है. मंत्रालय का जोर नीतिगत बाधाओं को दूर करने, नए बिजनेस मॉडल को बढ़ावा देने और कारोबार के विस्तार के लिए अनुकूल माहौल तैयार करने पर है. मंत्रालय के संयुक्त सचिव सेंथिल राजन ने एक उद्योग कार्यक्रम में यह बात कही.
राजन के मुताबिक, भारत के मीडिया और एंटरटेनमेंट सेक्टर को आगे बढ़ाने में निजी क्षेत्र की अहम भूमिका रही है. सरकार की जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करना है कि बदलते प्लेटफॉर्म, दर्शकों की पसंद और कमाई के नए तरीकों के बीच नियम उद्योग की वृद्धि में बाधा न बनें. उन्होंने कहा, "उद्योग हमें ऐसे सहयोगी के रूप में देखता है, जो आगे बढ़ने का रास्ता आसान बनाता है. हमारा काम रास्ते की बाधाओं को दूर करना है."
राजन ने कहा कि इस क्षेत्र की विकास क्षमता का पूरा लाभ उठाने के लिए किसी एक नीतिगत फैसले पर निर्भर नहीं रहा जा सकता. इसके लिए कई स्तरों पर कदम उठाने होंगे.
टीवी विज्ञापनों के नियमों में बदलाव से ब्रॉडकास्टर्स को राहत
राजन ने नीतिगत बदलाव का उदाहरण देते हुए कहा कि पहले लीनियर टेलीविजन चैनलों पर एक घंटे में अधिकतम 12 मिनट के विज्ञापन दिखाने की सीमा थी, जिसे हटा दिया गया है. उनके मुताबिक, इससे टेलीविजन चैनलों को विज्ञापन के जरिए कमाई करने में अधिक लचीलापन मिलेगा.
डिजिटल प्लेटफॉर्म की ओर विज्ञापन खर्च बढ़ने के बीच इस बदलाव से ब्रॉडकास्टर्स को अपने विज्ञापन स्लॉट का बेहतर इस्तेमाल करने का अवसर मिलेगा. राजन ने कहा कि मंत्रालय उद्योग के अलग-अलग क्षेत्रों की चुनौतियों की समीक्षा कर रहा है, ताकि मौजूदा नीतियां कारोबार के विस्तार में बाधा न बनें.
लाइव इवेंट्स और फिल्म निर्माण की प्रक्रिया होगी आसान
मंत्रालय लाइव इवेंट्स के आयोजन और फिल्मों की शूटिंग के लिए जरूरी अनुमतियों की प्रक्रिया को सरल बनाने पर भी काम कर रहा है. राजन ने बताया कि लाइव इवेंट्स डेवलपमेंट सेल का दूसरा चरण तैयार किया जा रहा है. इसके तहत राज्य सरकारों के साथ मिलकर मंजूरी की प्रक्रिया को आसान बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं.
कई राज्य ऐसे पोर्टल से जुड़ चुके हैं, जहां आयोजक विभिन्न अनुमतियों के लिए आवेदन कर सकते हैं. राजन के मुताबिक, लाइव इवेंट्स का आर्थिक लाभ केवल मनोरंजन क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे पर्यटन, होटल और परिवहन जैसे क्षेत्रों को भी फायदा मिलता है.
फिल्म निर्माण से जुड़ी प्रक्रियाओं को आसान बनाने के लिए मंत्रालय ने इंडिया सिने हब (India Cine Hub) भी स्थापित किया है. यह एक सिंगल-विंडो पोर्टल है, जिसका उद्देश्य फिल्मों की शूटिंग के लिए जरूरी अनुमतियों को सरल बनाना और विदेशी सहयोग से जुड़ी गतिविधियों को सुविधाजनक करना है.
गेमिंग और एनीमेशन जैसे क्षेत्रों में कौशल विकास पर जोर
मीडिया और एंटरटेनमेंट उद्योग में नई तकनीकों के बढ़ते इस्तेमाल के बीच विशेष कौशल वाले पेशेवरों की मांग भी बढ़ रही है. राजन ने बताया कि WAVES समिट के बाद उद्योग के भागीदारों के सहयोग से इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिएटिव टेक्नोलॉजीज की स्थापना की गई है.
यह संस्थान गेमिंग, एनीमेशन, विजुअल इफेक्ट्स और संबंधित रचनात्मक क्षेत्रों में पेशेवरों को प्रशिक्षित करने पर ध्यान दे रहा है. संस्थान में वर्चुअल रियलिटी (VR), एक्सटेंडेड रियलिटी (XR), प्रोजेक्शन थिएटर और गेमिंग लैब जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं.
राजन ने उद्योग से इन सुविधाओं का लाभ उठाने और भारत के क्रिएटिव टेक्नोलॉजी इकोसिस्टम को मजबूत करने की अपील की.
भारतीय कंटेंट को वैश्विक बाजार तक पहुंचाने की जरूरत
राजन ने कहा कि भारतीय मीडिया और एंटरटेनमेंट उद्योग को केवल घरेलू दर्शकों या विदेशों में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों तक सीमित नहीं रहना चाहिए. उद्योग को ऐसे कंटेंट और बौद्धिक संपदा (IP) विकसित करने की जरूरत है, जिन्हें वैश्विक स्तर पर पसंद किया जाए.
उन्होंने कहा कि भारतीय फिल्मों में पहले 100 करोड़ रुपये की कमाई को बड़ी उपलब्धि माना जाता था, लेकिन बाद में उद्योग ने 1,000 करोड़ रुपये के आंकड़े को लक्ष्य बनाना शुरू किया. राजन ने 'बाहुबली' की सफलता का उल्लेख करते हुए कहा कि इससे बड़े व्यावसायिक लक्ष्य हासिल करने की संभावनाएं सामने आईं.
उनके मुताबिक, भारतीय कंटेंट क्रिएटर्स, प्रोड्यूसर्स और डिस्ट्रीब्यूटर्स को अंतरराष्ट्रीय दर्शकों को ध्यान में रखकर अपनी रणनीति बनानी होगी.
राजन ने कहा, "हमें पूरी वैल्यू चेन को वैश्विक बाजार तक पहुंचाना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि हर साल भारतीय कंटेंट के कम से कम तीन या चार प्रोडक्ट ऐसे हों, जिन्हें प्रवासी भारतीयों से आगे भी वैश्विक स्तर पर सफलता मिले."
भारत के मीडिया और एंटरटेनमेंट सेक्टर के लिए 100 अरब डॉलर के लक्ष्य को हासिल करने में सरकार और उद्योग, दोनों की भूमिका अहम होगी. जहां सरकार नीतिगत और परिचालन संबंधी बाधाओं को दूर करने पर काम कर रही है, वहीं उद्योग को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के अनुरूप कंटेंट और बिजनेस मॉडल विकसित करने होंगे.
निर्मला सीतारमण ने कहा कि रुपये और स्थानीय मुद्राओं में भुगतान की व्यवस्था से जरूरी वस्तुओं का आयात जारी रखने में मिलेगी मदद. आर्थिक मंदी, युद्ध और कर्ज के दबाव के बीच भारत व्यापारिक साझेदारियों को मजबूत करने पर दे रहा जोर.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत उन देशों की मदद के लिए रुपये और स्थानीय मुद्राओं में व्यापार भुगतान की व्यवस्था का विस्तार करने पर काम कर रहा है, जो विदेशी मुद्रा की कमी से जूझ रहे हैं. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने शुक्रवार को यह बात कही. उन्होंने कहा कि इस व्यवस्था से ऐसे देशों को जरूरी वस्तुओं का आयात जारी रखने में मदद मिल सकती है.
थाईलैंड की राजधानी बैंकॉक में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक की सालाना बैठकों के दौरान अटलांटिक काउंसिल के साथ बातचीत में सीतारमण ने कहा कि जिन देशों के पास प्रमुख विदेशी मुद्राओं तक सीमित पहुंच है, उन्हें जरूरी वस्तुओं की लगातार जरूरत होने के बावजूद व्यापार जारी रखने में मुश्किलों का सामना करना पड़ता है.
वित्त मंत्री ने कहा कि भारत चाहता है कि उससे वस्तुओं का आयात करने वाले देश उनका भुगतान रुपये में कर सकें. स्थानीय मुद्राओं में भुगतान की व्यवस्था से विदेशी मुद्रा की कमी के बावजूद व्यापार जारी रखने में मदद मिल सकती है. भारत इस व्यवस्था को अपने व्यापारिक साझेदारों के लिए अधिक व्यावहारिक बनाने की दिशा में काम कर रहा है.
सीतारमण ने कहा, "भारत में हम जिन चीजों को करना चाहते हैं, उनमें से एक यह है कि भारत से वस्तुओं का आयात करने वाले देश उनके भुगतान का निपटान रुपये में करें."
उन्होंने कहा कि रुपये और स्थानीय मुद्राओं में भुगतान की व्यवस्था उन देशों के लिए फायदेमंद हो सकती है, जिनके पास प्रमुख विदेशी मुद्राओं की कमी है, लेकिन उन्हें जरूरी वस्तुओं का आयात करना पड़ता है. इस व्यवस्था का उद्देश्य विदेशी मुद्रा की कमी के बावजूद व्यापार का प्रवाह बनाए रखना है.
युद्ध और आर्थिक संकट के बीच व्यापारिक साझेदारी पर जोर
सीतारमण ने कहा कि यह पहल ऐसे समय में आगे बढ़ाई जा रही है, जब आर्थिक मंदी, भू-राजनीतिक तनाव और युद्धों का कई देशों पर असर पड़ा है. इन परिस्थितियों के कारण कुछ देश कर्ज के जाल और भुगतान संतुलन के संकट में फंस गए हैं. उन्होंने कहा कि बहुपक्षीय विकास संस्थानों को अक्सर ऐसी समस्याओं पर प्रतिक्रिया देने में तीन से चार साल लग जाते हैं, हालांकि अब इनमें से कुछ मुद्दों पर काम किया जा रहा है.
इस पृष्ठभूमि में भारत व्यापक बहुपक्षीय व्यवस्था के भीतर अपने द्विपक्षीय संबंधों को भी मजबूत करने की कोशिश कर रहा है. सीतारमण ने कहा कि भारत कई व्यापार समझौतों पर आगे बढ़ रहा है, लेकिन दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के संगठन (आसियान) के साथ मौजूदा व्यापार समझौता भारत के पक्ष में संतुलित नहीं है.
आसियान के साथ व्यापार समझौते की समीक्षा जारी
वित्त मंत्री ने कहा कि भारत आसियान देशों को व्यापार समझौते से लाभ मिलने के खिलाफ नहीं है, लेकिन मौजूदा व्यवस्था में भारत के हितों को पर्याप्त महत्व नहीं मिल रहा है. उन्होंने कहा, "आसियान देशों के साथ हमारे व्यापार समझौते से उन्हें लाभ मिलने के हम खिलाफ नहीं हैं, लेकिन यह समझौता भारत के खिलाफ काफी असंतुलित है."
सीतारमण के मुताबिक, भारत चाहता है कि इस समझौते की समीक्षा के दौरान आयातकों, विनिर्माताओं और घरेलू बाजार से जुड़ी चिंताओं का समाधान किया जाए. उन्होंने कहा कि भारत आसियान के साथ व्यापार समझौते को जारी रखना चाहता है, लेकिन इसमें कुछ बदलाव किए जाने चाहिए. समीक्षा का उद्देश्य मौजूदा व्यापार व्यवस्था से जुड़ी समस्याओं को दूर करना है, ताकि व्यापक व्यापारिक साझेदारी भी बनी रहे.
क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी से बाहर रहने के फैसले का बचाव
सीतारमण ने क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी (RCEP) में शामिल नहीं होने के भारत के फैसले का भी बचाव किया. इस समझौते में एशिया और प्रशांत क्षेत्र की 16 अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं. उन्होंने कहा कि इस समझौते से भारत को पर्याप्त लाभ मिलने की संभावना नहीं थी, जबकि भारत इसके सदस्य देशों के साथ व्यापार जारी रख सकता है.
भारत नवंबर 2019 में आरसीईपी से बाहर हो गया था. उस समय सस्ते आयात, खासकर चीन से होने वाले आयात, बढ़ते व्यापार घाटे और घरेलू उद्योगों तथा कृषि क्षेत्र को पर्याप्त सुरक्षा नहीं मिलने जैसी चिंताएं सामने थीं. सीतारमण ने कहा कि इन परिस्थितियों में आरसीईपी में शामिल होना भारत के हित में नहीं होता.
भारत और यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ (EFTA) के बीच व्यापार एवं आर्थिक साझेदारी समझौते (TEPA) से वर्ष 2040 तक देश में 10 लाख से 20 लाख प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार पैदा हो सकते हैं. एसोचैम के मुताबिक, समझौते के तहत निवेश, मैन्युफैक्चरिंग, तकनीकी सहयोग और निर्यात को बढ़ावा मिलने से रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत-यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ (EFTA) व्यापार एवं आर्थिक साझेदारी समझौते ने अपना पहला वर्ष पूरा कर लिया है. उद्योग संगठन एसोचैम (Assocham) के अनुसार, अब इस समझौते का दायरा केवल व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके जरिए निवेश, विनिर्माण, तकनीकी साझेदारी और रोजगार सृजन पर भी जोर दिया जा रहा है.
EFTA ने अगले 15 वर्षों में भारत में 100 अरब डॉलर के निवेश को सुविधाजनक बनाने की प्रतिबद्धता जताई है. इसमें पहले 10 वर्षों के दौरान 50 अरब डॉलर के निवेश का लक्ष्य शामिल है. एसोचैम के अनुसार, अब इस प्रतिबद्धता को वास्तविक परियोजनाओं, विनिर्माण इकाइयों, स्वच्छ ऊर्जा से जुड़ी पहलों और विभिन्न क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों में बदलने पर ध्यान देना होगा.
एसोचैम के अध्यक्ष निर्मल के. मिंडा ने कहा, "अगला कदम TEPA के तहत 100 अरब डॉलर के निवेश और 10 लाख प्रत्यक्ष नौकरियों की महत्वाकांक्षा को व्यावहारिक परियोजनाओं और रोजगार के अवसरों में बदलना है."
उन्होंने कहा कि उन्नत विनिर्माण और ग्रीन हाइड्रोजन के क्षेत्र में इस समझौते के तहत महत्वपूर्ण अवसर मिल सकते हैं. साथ ही, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSMEs) को भी इन साझेदारियों का अभिन्न हिस्सा बनाया जाना चाहिए.
भारतीय निर्यातकों के लिए बढ़ेंगे अवसर
इस समझौते के तहत भारतीय निर्यातकों के लिए EFTA देशों के बाजारों तक पहुंच आसान हुई है. EFTA ने अपनी 92.2 फीसदी टैरिफ लाइनों पर रियायतें दी हैं, जिनके दायरे में भारत के कुल निर्यात का 99.6 फीसदी हिस्सा आता है.
फार्मास्यूटिकल्स, टेक्सटाइल, इंजीनियरिंग उत्पाद, रसायन, आभूषण, प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ और समुद्री उत्पाद जैसे क्षेत्रों को इसका लाभ मिलने की उम्मीद है. हालांकि, डेयरी, सोयाबीन और कोयले जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को संरक्षण दिया गया है.
628 अरब डॉलर के आयात बाजार में भारत के लिए अवसर
भारत और EFTA के बीच द्विपक्षीय व्यापार 26.7 अरब डॉलर तक पहुंच गया है. वहीं, EFTA देशों का वैश्विक बाजार से सालाना आयात करीब 628 अरब डॉलर का है. एसोचैम के मुताबिक, यह भारतीय कंपनियों के लिए इन बाजारों में अपनी मौजूदगी बढ़ाने और मौजूदा उत्पाद श्रेणियों से आगे निर्यात का विस्तार करने का बड़ा अवसर है.
एसोचैम के महासचिव सौरभ सान्याल ने कहा कि EFTA के कुल ऑर्गेनिक केमिकल्स आयात में भारत की 8.9 फीसदी हिस्सेदारी इस क्षेत्र में विस्तार की संभावनाओं को दर्शाती है. उनके मुताबिक, फार्मास्यूटिकल्स, मशीनरी, इलेक्ट्रिकल उपकरण, ऑटोमोबाइल, मेडिकल डिवाइस और टेक्सटाइल जैसे क्षेत्रों में भी भारतीय कंपनियों के लिए अवसर मौजूद हैं.
ये अवसर केवल बड़ी और स्थापित निर्यातक कंपनियों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि छोटे कारोबारियों को भी इन बाजारों में अपनी जगह बनाने का मौका मिल सकता है.
ग्रीन हाइड्रोजन और AI पर बढ़ेगा सहयोग
TEPA के तहत ग्रीन हाइड्रोजन भी भारत और EFTA देशों के बीच सहयोग का एक प्रमुख क्षेत्र बनकर उभर रहा है. भारत ने वर्ष 2030 तक सालाना कम से कम 50 लाख टन ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन का लक्ष्य रखा है.
एसोचैम के अनुसार, भारत का यह लक्ष्य नॉर्वे की समुद्री तकनीक संबंधी क्षमताओं, आइसलैंड की जियोथर्मल विशेषज्ञता और स्विट्जरलैंड की इलेक्ट्रोलाइजर तकनीक के साथ तालमेल बिठा सकता है. इससे तकनीकी सहयोग और औद्योगिक साझेदारियों की संभावनाएं बढ़ सकती हैं.
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), रोबोटिक्स और उन्नत विनिर्माण को भी सहयोग के संभावित क्षेत्रों में शामिल किया गया है. भारत की प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) योजनाएं, सेमीकॉन इंडिया 2.0 और इंडियाAI मिशन जैसे कार्यक्रम EFTA देशों के साथ प्रिसिजन इंजीनियरिंग, ऑटोमेशन और उभरती तकनीकों में साझेदारी को बढ़ावा देने के लिए घरेलू नीतिगत आधार उपलब्ध करा सकते हैं.
भारत-EFTA निवेश और तकनीकी साझेदारी में तेजी
एसोचैम के मुताबिक, भारत और EFTA देशों के बीच आर्थिक सहयोग बढ़ने के शुरुआती संकेत दिखाई देने लगे हैं. भारत और नॉर्वे ने अपने संबंधों को ग्रीन स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप का दर्जा दिया है. वहीं, नॉर्वे की निवेश संस्था Norfund भारत के नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में 10 करोड़ डॉलर तक निवेश कर रही है.
भारत-स्विट्जरलैंड संयुक्त अनुसंधान कार्यक्रम ने वर्ष 2026 में तीन नई संयुक्त शोध पहल शुरू की हैं. एसोचैम के अनुसार, वर्ष 2000 से अब तक EFTA देशों ने भारत में 12.48 अरब डॉलर का निवेश किया है, जिसमें स्विट्जरलैंड सबसे आगे है. दूसरी ओर, भारतीय कंपनियों ने वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान स्विट्जरलैंड में 1.28 अरब डॉलर का निवेश किया. यह दोनों पक्षों के बीच बढ़ते निवेश प्रवाह को दर्शाता है.
राज्यों, MSMEs और किसानों को भी मिलेगा लाभ
एसोचैम का कहना है कि TEPA के फायदे बड़ी कंपनियों तक सीमित नहीं रहने चाहिए. इस समझौते से MSMEs, स्टार्टअप और किसानों को भी अवसर मिल सकते हैं. महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल और पूर्वोत्तर के राज्यों को कृषि उत्पादों, समुद्री खाद्य पदार्थों, कॉफी और मसालों के निर्यात में बढ़ोतरी का लाभ मिल सकता है. इससे व्यापार साझेदारी में छोटे कारोबारियों और क्षेत्रीय उत्पादकों की भागीदारी बढ़ने की संभावना है.
TEPA के दूसरे वर्ष में प्रवेश के साथ अब बाजार तक पहुंच और निवेश संबंधी प्रतिबद्धताओं को वास्तविक परियोजनाओं, तकनीकी साझेदारियों और रोजगार में बदलने पर जोर है. एसोचैम के अनुसार, यह समझौता भारत की औद्योगिक प्रतिस्पर्धात्मकता को मजबूत करने के साथ विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को हासिल करने में भी योगदान दे सकता है.
कंपनी का कहना है कि वह स्थानीय किसानों से सीधे उत्पाद खरीदकर उनकी भौगोलिक पहचान और गुणवत्ता को बनाए रखते हुए ग्राहकों तक पहुंचाएगी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
मेघना छेत्री ने उद्यमिता की दुनिया में कदम रखते हुए Amã Foods की शुरुआत की है. इस ब्रांड का उद्देश्य भारत के भौगोलिक संकेतक (GI) टैग वाले खाद्य उत्पादों को व्यापक बाजार तक पहुंचाना है. इन उत्पादों को उनके मूल स्थान पर किसान समूहों के जरिए उगाया जाता है. ब्रांड की टैगलाइन ‘The Origin of Purity’ रखी गई है. कंपनी का कहना है कि वह स्थानीय किसानों से सीधे उत्पाद खरीदकर उनकी भौगोलिक पहचान और गुणवत्ता को बनाए रखते हुए ग्राहकों तक पहुंचाएगी.
डिजिटल मार्केटिंग के क्षेत्र में करीब 15 साल का अनुभव रखने वाली मेघना छेत्री ने ICICI Bank, State Bank of India, Accenture और Cognizant जैसी कंपनियों में काम किया है. मेघालय के शिलांग में पंजीकृत Amã Foods इसी महीने अपने उत्पादों के साथ बाजार में उतर रहा है.
लाकाडोंग हल्दी और काले चावल से शुरुआत
Amã Foods की शुरुआती उत्पाद श्रृंखला में मेघालय की जैंतिया पहाड़ियों में उगाई जाने वाली लाकाडोंग हल्दी और मणिपुर का चक-हाओ काला चावल शामिल हैं. लाकाडोंग हल्दी में करक्यूमिन की अधिक मात्रा के लिए जाना जाता है. इनके अलावा मखाना और प्रीमियम चाय भी शुरुआती उत्पादों में शामिल हैं.
कंपनी के मुताबिक, प्रत्येक उत्पाद को उसके मूल जिले में सक्रिय किसान उत्पादक संगठन (FPO) से खरीदा जाएगा. हर बैच की लैब में जांच की जाएगी. साथ ही, किसी उत्पाद पर जीआई टैग का नाम तभी इस्तेमाल किया जाएगा, जब कंपनी के पास इसके लिए अधिकृत उपयोगकर्ता के अधिकार होंगे.
फिलहाल ग्राहक Instagram पर @amaorigin के जरिए उत्पादों की प्री-ऑर्डर बुकिंग कर सकते हैं. कंपनी की अपनी वेबसाइट amaorigins.com के साथ Amazon और Flipkart पर बिक्री दिसंबर 2026 में शुरू होने की योजना है. इसके तहत देशभर में उत्पादों की आपूर्ति की जाएगी.
अप्रैल 2028 तक 30 उत्पाद जोड़ने की योजना
कंपनी अप्रैल 2027 से हर महीने दो जीआई टैग वाले उत्पाद अपनी श्रृंखला में शामिल करने की योजना बना रही है. लक्ष्य अप्रैल 2028 तक पोर्टफोलियो में 30 उत्पादों को शामिल करना है.
आने वाले समय में नागा मिर्च, कश्मीर केसर, सुंदरबन शहद, ब्याडगी मिर्च, कूर्ग की हरी इलायची, सिक्किम की बड़ी इलायची, मालाबार काली मिर्च और कोरापुट का कालाजीरा चावल जैसे उत्पाद शामिल किए जा सकते हैं. कंपनी के अनुसार, इन सभी उत्पादों की खरीद उनके मूल क्षेत्रों से की जाएगी.
किसानों को उचित कीमत दिलाने पर जोर
जीआई टैग किसी उत्पाद की भौगोलिक उत्पत्ति और उससे जुड़ी विशिष्ट विशेषताओं को कानूनी पहचान देता है. यह किसी उत्पाद के नाम को उस क्षेत्र से जोड़ता है, जहां उसकी गुणवत्ता, प्रतिष्ठा या अन्य विशेषताएं विकसित हुई हैं. भारत में सैकड़ों खाद्य उत्पादों को जीआई पहचान मिल चुकी है. इनमें से कई उत्पाद छोटे किसानों द्वारा ऐसे क्षेत्रों में उगाए जाते हैं, जो बड़े उपभोक्ता बाजारों से दूर हैं.
Amã Foods का उद्देश्य इन उत्पादों और बेहतर कीमत देने में सक्षम ग्राहकों के बीच की दूरी को कम करना है. कंपनी सीधे किसान उत्पादक संगठनों से खरीद, उत्पाद की पहचान को बनाए रखने और उसे व्यापक बाजार में बेचने की रणनीति पर काम कर रही है.
Amã Foods की संस्थापक मेघना छेत्री ने कहा, “मैं शिलांग में बड़ी हुई हूं और मैंने देखा है कि जैंतिया पहाड़ियों की लाकाडोंग हल्दी बिना किसी पहचान के बोरियों में भरकर बाहर भेज दी जाती है. बाद में इसे कहीं और सामान्य उत्पादों के साथ मिलाया जाता है. किसान को ऐसे उत्पाद के लिए सामान्य कीमत मिलती है, जिसे कानूनी तौर पर दुनिया के बेहतरीन उत्पादों में गिना जाता है. Amã इसी स्थिति को बदलने के उद्देश्य से बनाया गया है. हम उत्पाद उसके मूल स्थान से खरीदते हैं, पैक पर उसका नाम बनाए रखते हैं और उसे उन आयातित ब्रांडों के साथ बाजार में लाते हैं, जिनसे उसकी गुणवत्ता बेहतर हो सकती है.”
उन्होंने कहा कि कंपनी शुरुआत में चार उत्पादों के साथ काम कर रही है और नए उत्पादों को शामिल करने से पहले उनकी गुणवत्ता तथा स्रोत की पुष्टि पर ध्यान देगी. उनके मुताबिक, amaorigins.com पर उपलब्ध हर उत्पाद की लैब जांच और जीआई सत्यापन किया जाएगा तथा उसे सीधे उस किसान समूह से खरीदा जाएगा, जिसने उसे उगाया है.
शिलांग में पंजीकृत है कंपनी
मेघालय की रहने वाली मेघना छेत्री ने Amã Foods को शिलांग में पंजीकृत कराया है. कंपनी का संचालन मुंबई के लोअर परेल स्थित कॉरपोरेट कार्यालय से किया जा रहा है. इसकी आपूर्ति श्रृंखला मेघालय, मणिपुर और दार्जिलिंग के किसान उत्पादक संगठनों के साथ लिखित समझौतों पर आधारित है.
इन समझौतों के तहत किसान उत्पादक संगठन फसल का भंडारण करेंगे और हर महीने उत्पादों की आपूर्ति करेंगे. कंपनी का कहना है कि इस व्यवस्था के जरिए उत्पादों की गुणवत्ता, स्रोत और आपूर्ति को व्यवस्थित बनाए रखने पर जोर दिया जाएगा.
हल्दी की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी के बीच जिन किसानों ने अपनी उपज का भंडारण कर रखा है, वे आगे और ऊंचे भाव मिलने की उम्मीद में फिलहाल बिक्री से बच रहे हैं. इससे बाजार में उपलब्ध आपूर्ति सीमित रह सकती है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
हल्दी की कीमतों में तेजी का सिलसिला जारी है. बीते एक महीने में इसके दाम 18% से अधिक और एक साल में करीब 80% बढ़ चुके हैं. मांग में मजबूती, सीमित आपूर्ति और प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में सूखे की आशंका से कीमतों को सहारा मिल रहा है. उत्पादन में संभावित गिरावट और पुराने स्टॉक में कमी के चलते किसानों और स्टॉकिस्टों ने भी बिक्री सीमित कर दी है. ऐसे में आने वाले हफ्तों में हल्दी की कीमतों में और तेजी आने की आशंका जताई जा रही है.
सालभर में 80% बढ़े हल्दी के दाम
हल्दी की कीमतों में आई तेजी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले एक महीने में इसके दाम 18% से अधिक बढ़ गए हैं, जबकि सालभर में कीमतों में करीब 80% की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, हाजिर बाजार में तमिलनाडु की पेरुंदुरई मंडी में हल्दी के भाव ₹23,000 प्रति क्विंटल के पार पहुंच गए हैं. वहीं, वायदा बाजार में नेशनल कमोडिटी एंड डेरिवेटिव्स एक्सचेंज (NCDEX) पर इसके भाव ₹24,500 प्रति क्विंटल से ऊपर निकल गए हैं.
बाजार में हल्दी की सीमित आवक, प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में बारिश की कमी और अगली फसल पर मौसम के संभावित असर से कीमतों को समर्थन मिल रहा है. बाजार में तेजी की उम्मीद के कारण किसान और स्टॉकिस्ट अपनी उपज बेचने में भी सावधानी बरत रहे हैं.
पुराने स्टॉक में कमी से बढ़ी चिंता
हल्दी की कीमतों में तेजी की एक बड़ी वजह पुराने स्टॉक में कमी भी है. पिछले सीजन में 20 लाख से अधिक बोरों के मुकाबले इस बार करीब 15 लाख बोरे कैरी-फॉरवर्ड स्टॉक के रूप में उपलब्ध रहने का अनुमान है. कैरी-फॉरवर्ड स्टॉक का मतलब पिछले सीजन से बचा हुआ माल है, जिसका इस्तेमाल नए सीजन में आपूर्ति के लिए किया जाता है.
कर्नाटक में सूखे को लेकर किए गए संयुक्त सर्वे के अनुसार, राज्य में हल्दी की खेती के कुल लगभग 18,000-20,000 हेक्टेयर क्षेत्र में से 13,446 हेक्टेयर में फसल को नुकसान पहुंचा है. इससे हुए नुकसान का मूल्य ₹188.24 करोड़ आंका गया है.
पुराने स्टॉक में कमी से बाजार में आपूर्ति का अतिरिक्त बफर कमजोर हुआ है. ऐसे में यदि नई फसल का उत्पादन प्रभावित होता है, तो कीमतों पर दबाव और बढ़ सकता है.
वैश्विक बाजार में भारतीय हल्दी की मांग
मौसम संबंधी चिंताओं के बीच विदेशी खरीदारों की हल्दी में दिलचस्पी बनी हुई है. हालांकि, भारतीय निर्यातकों के लिए विदेशी मांग को पूरा करना चुनौतीपूर्ण हो रहा है. जुलाई 2026 में भारत से हल्दी का निर्यात पिछले साल के 15,071 टन से 10% घटकर 13,489 टन रह गया. हालांकि, अप्रैल से जुलाई 2026 के दौरान कुल निर्यात में बढ़ोतरी दर्ज की गई. इस अवधि में निर्यात पिछले साल के 63,020 टन से 4% बढ़कर 65,476 टन पहुंच गया.
कुछ देशों में भारतीय हल्दी की मांग में तेज वृद्धि देखने को मिली. तुर्की को निर्यात 431% बढ़कर 3,007 टन, श्रीलंका को 644% बढ़कर 156 टन और नाइजीरिया को 983% बढ़कर 69 टन हो गया.
इन आंकड़ों से पता चलता है कि कुछ अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भारतीय हल्दी की मांग मजबूत बनी हुई है. हालांकि, कुल निर्यात और कीमतों की दिशा पर घरेलू उत्पादन, उपलब्ध स्टॉक और वैश्विक मांग का असर बना रहेगा.
सूखे से अगली फसल पर खतरा
इरोड हल्दी मर्चेंट्स एंड गोडाउन ओनर्स एसोसिएशन के सचिव एम. सत्यमूर्ति के अनुसार, महाराष्ट्र के मराठवाड़ा, तेलंगाना के निजामाबाद और तमिलनाडु के कुछ हिस्सों में सूखे की स्थिति हल्दी की कीमतों को ऊपर धकेल रही है.
उन्होंने बताया कि पानी की कमी के कारण कुछ क्षेत्रों में हल्दी की बुवाई का रकबा पहले ही 20-30% तक घट चुका है. आने वाले महीनों में खेती का क्षेत्र और कम होने की आशंका है. यदि सूखे का असर लंबे समय तक बना रहता है, तो अगले साल हल्दी के उत्पादन में बड़ी गिरावट आ सकती है.
हालांकि, वर्ष 2026 में भारत में हल्दी उत्पादन करीब 15% बढ़ने का सरकारी अनुमान भी है. इसके पीछे खेती के रकबे में लगभग 20% की बढ़ोतरी को प्रमुख वजह बताया गया है, खासकर महाराष्ट्र में.
महाराष्ट्र, तेलंगाना और उत्तरी कर्नाटक में मानसून की बेहतर स्थिति के साथ तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के जलाशयों में पानी भरने से फसल को लेकर तत्काल चिंताएं कुछ कम हुई हैं. बारिश के बाद उत्तरी कर्नाटक में दोबारा बुवाई भी पूरी हो चुकी है. फिर भी अच्छी पैदावार के लिए आने वाले समय में मौसम का अनुकूल रहना जरूरी होगा.
आगे भी तेजी की उम्मीद, किसान बिक्री से बच रहे
हल्दी की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी के बीच जिन किसानों ने अपनी उपज का भंडारण कर रखा है, वे आगे और ऊंचे भाव मिलने की उम्मीद में फिलहाल बिक्री से बच रहे हैं. इससे बाजार में उपलब्ध आपूर्ति सीमित रह सकती है.
कमोडिटी एक्सपर्ट अनुज गुप्ता के मुताबिक, तकनीकी रूप से हल्दी का बाजार अभी भी मजबूत तेजी के रुझान में है. कम उत्पादन की आशंका, पुराने स्टॉक में कमी, किसानों की सीमित बिक्री और घरेलू व निर्यात मांग में मजबूती जैसे कारक कीमतों को समर्थन दे रहे हैं.
हल्दी की खेती मुख्य रूप से तमिलनाडु के इरोड और धर्मपुरी जिलों के अलावा कर्नाटक के कुछ हिस्सों में होती है. इसकी खरीद-बिक्री इरोड और पेरुंदुरई की मंडियों के साथ करंगलपलायम और गोबिचेट्टीपलायम की कृषि उत्पादक सहकारी विपणन समितियों में भी होती है.
आने वाले समय में हल्दी की कीमतों की दिशा काफी हद तक मौसम, नई फसल की पैदावार, उपलब्ध पुराने स्टॉक और निर्यात मांग पर निर्भर करेगी. यदि आपूर्ति में कमी आती है और मांग मजबूत बनी रहती है, तो कीमतों में तेजी जारी रह सकती है.