विदेशी मुद्रा की कमी से जूझ रहे देशों की मदद के लिए रुपये में व्यापार भुगतान चाहता है भारत: वित्त मंत्री

निर्मला सीतारमण ने कहा कि रुपये और स्थानीय मुद्राओं में भुगतान की व्यवस्था से जरूरी वस्तुओं का आयात जारी रखने में मिलेगी मदद. आर्थिक मंदी, युद्ध और कर्ज के दबाव के बीच भारत व्यापारिक साझेदारियों को मजबूत करने पर दे रहा जोर.

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Friday, 16 October, 2026
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भारत उन देशों की मदद के लिए रुपये और स्थानीय मुद्राओं में व्यापार भुगतान की व्यवस्था का विस्तार करने पर काम कर रहा है, जो विदेशी मुद्रा की कमी से जूझ रहे हैं. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने शुक्रवार को यह बात कही. उन्होंने कहा कि इस व्यवस्था से ऐसे देशों को जरूरी वस्तुओं का आयात जारी रखने में मदद मिल सकती है.

थाईलैंड की राजधानी बैंकॉक में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक की सालाना बैठकों के दौरान अटलांटिक काउंसिल के साथ बातचीत में सीतारमण ने कहा कि जिन देशों के पास प्रमुख विदेशी मुद्राओं तक सीमित पहुंच है, उन्हें जरूरी वस्तुओं की लगातार जरूरत होने के बावजूद व्यापार जारी रखने में मुश्किलों का सामना करना पड़ता है.

वित्त मंत्री ने कहा कि भारत चाहता है कि उससे वस्तुओं का आयात करने वाले देश उनका भुगतान रुपये में कर सकें. स्थानीय मुद्राओं में भुगतान की व्यवस्था से विदेशी मुद्रा की कमी के बावजूद व्यापार जारी रखने में मदद मिल सकती है. भारत इस व्यवस्था को अपने व्यापारिक साझेदारों के लिए अधिक व्यावहारिक बनाने की दिशा में काम कर रहा है.

सीतारमण ने कहा, "भारत में हम जिन चीजों को करना चाहते हैं, उनमें से एक यह है कि भारत से वस्तुओं का आयात करने वाले देश उनके भुगतान का निपटान रुपये में करें."

उन्होंने कहा कि रुपये और स्थानीय मुद्राओं में भुगतान की व्यवस्था उन देशों के लिए फायदेमंद हो सकती है, जिनके पास प्रमुख विदेशी मुद्राओं की कमी है, लेकिन उन्हें जरूरी वस्तुओं का आयात करना पड़ता है. इस व्यवस्था का उद्देश्य विदेशी मुद्रा की कमी के बावजूद व्यापार का प्रवाह बनाए रखना है.

युद्ध और आर्थिक संकट के बीच व्यापारिक साझेदारी पर जोर

सीतारमण ने कहा कि यह पहल ऐसे समय में आगे बढ़ाई जा रही है, जब आर्थिक मंदी, भू-राजनीतिक तनाव और युद्धों का कई देशों पर असर पड़ा है. इन परिस्थितियों के कारण कुछ देश कर्ज के जाल और भुगतान संतुलन के संकट में फंस गए हैं. उन्होंने कहा कि बहुपक्षीय विकास संस्थानों को अक्सर ऐसी समस्याओं पर प्रतिक्रिया देने में तीन से चार साल लग जाते हैं, हालांकि अब इनमें से कुछ मुद्दों पर काम किया जा रहा है.

इस पृष्ठभूमि में भारत व्यापक बहुपक्षीय व्यवस्था के भीतर अपने द्विपक्षीय संबंधों को भी मजबूत करने की कोशिश कर रहा है. सीतारमण ने कहा कि भारत कई व्यापार समझौतों पर आगे बढ़ रहा है, लेकिन दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के संगठन (आसियान) के साथ मौजूदा व्यापार समझौता भारत के पक्ष में संतुलित नहीं है.

आसियान के साथ व्यापार समझौते की समीक्षा जारी

वित्त मंत्री ने कहा कि भारत आसियान देशों को व्यापार समझौते से लाभ मिलने के खिलाफ नहीं है, लेकिन मौजूदा व्यवस्था में भारत के हितों को पर्याप्त महत्व नहीं मिल रहा है. उन्होंने कहा, "आसियान देशों के साथ हमारे व्यापार समझौते से उन्हें लाभ मिलने के हम खिलाफ नहीं हैं, लेकिन यह समझौता भारत के खिलाफ काफी असंतुलित है."

सीतारमण के मुताबिक, भारत चाहता है कि इस समझौते की समीक्षा के दौरान आयातकों, विनिर्माताओं और घरेलू बाजार से जुड़ी चिंताओं का समाधान किया जाए. उन्होंने कहा कि भारत आसियान के साथ व्यापार समझौते को जारी रखना चाहता है, लेकिन इसमें कुछ बदलाव किए जाने चाहिए. समीक्षा का उद्देश्य मौजूदा व्यापार व्यवस्था से जुड़ी समस्याओं को दूर करना है, ताकि व्यापक व्यापारिक साझेदारी भी बनी रहे.

क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी से बाहर रहने के फैसले का बचाव

सीतारमण ने क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी (RCEP) में शामिल नहीं होने के भारत के फैसले का भी बचाव किया. इस समझौते में एशिया और प्रशांत क्षेत्र की 16 अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं. उन्होंने कहा कि इस समझौते से भारत को पर्याप्त लाभ मिलने की संभावना नहीं थी, जबकि भारत इसके सदस्य देशों के साथ व्यापार जारी रख सकता है.

भारत नवंबर 2019 में आरसीईपी से बाहर हो गया था. उस समय सस्ते आयात, खासकर चीन से होने वाले आयात, बढ़ते व्यापार घाटे और घरेलू उद्योगों तथा कृषि क्षेत्र को पर्याप्त सुरक्षा नहीं मिलने जैसी चिंताएं सामने थीं. सीतारमण ने कहा कि इन परिस्थितियों में आरसीईपी में शामिल होना भारत के हित में नहीं होता.
 


भारत-EFTA व्यापार समझौते से 2040 तक मिल सकती हैं 20 लाख नौकरियां: Assocham

भारत और यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ (EFTA) के बीच व्यापार एवं आर्थिक साझेदारी समझौते (TEPA) से वर्ष 2040 तक देश में 10 लाख से 20 लाख प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार पैदा हो सकते हैं. एसोचैम के मुताबिक, समझौते के तहत निवेश, मैन्युफैक्चरिंग, तकनीकी सहयोग और निर्यात को बढ़ावा मिलने से रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे.

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भारत-यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ (EFTA) व्यापार एवं आर्थिक साझेदारी समझौते ने अपना पहला वर्ष पूरा कर लिया है. उद्योग संगठन एसोचैम (Assocham) के अनुसार, अब इस समझौते का दायरा केवल व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके जरिए निवेश, विनिर्माण, तकनीकी साझेदारी और रोजगार सृजन पर भी जोर दिया जा रहा है.

EFTA ने अगले 15 वर्षों में भारत में 100 अरब डॉलर के निवेश को सुविधाजनक बनाने की प्रतिबद्धता जताई है. इसमें पहले 10 वर्षों के दौरान 50 अरब डॉलर के निवेश का लक्ष्य शामिल है. एसोचैम के अनुसार, अब इस प्रतिबद्धता को वास्तविक परियोजनाओं, विनिर्माण इकाइयों, स्वच्छ ऊर्जा से जुड़ी पहलों और विभिन्न क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों में बदलने पर ध्यान देना होगा.

एसोचैम के अध्यक्ष निर्मल के. मिंडा ने कहा, "अगला कदम TEPA के तहत 100 अरब डॉलर के निवेश और 10 लाख प्रत्यक्ष नौकरियों की महत्वाकांक्षा को व्यावहारिक परियोजनाओं और रोजगार के अवसरों में बदलना है."

उन्होंने कहा कि उन्नत विनिर्माण और ग्रीन हाइड्रोजन के क्षेत्र में इस समझौते के तहत महत्वपूर्ण अवसर मिल सकते हैं. साथ ही, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSMEs) को भी इन साझेदारियों का अभिन्न हिस्सा बनाया जाना चाहिए.

भारतीय निर्यातकों के लिए बढ़ेंगे अवसर

इस समझौते के तहत भारतीय निर्यातकों के लिए EFTA देशों के बाजारों तक पहुंच आसान हुई है. EFTA ने अपनी 92.2 फीसदी टैरिफ लाइनों पर रियायतें दी हैं, जिनके दायरे में भारत के कुल निर्यात का 99.6 फीसदी हिस्सा आता है.

फार्मास्यूटिकल्स, टेक्सटाइल, इंजीनियरिंग उत्पाद, रसायन, आभूषण, प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ और समुद्री उत्पाद जैसे क्षेत्रों को इसका लाभ मिलने की उम्मीद है. हालांकि, डेयरी, सोयाबीन और कोयले जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को संरक्षण दिया गया है.

628 अरब डॉलर के आयात बाजार में भारत के लिए अवसर

भारत और EFTA के बीच द्विपक्षीय व्यापार 26.7 अरब डॉलर तक पहुंच गया है. वहीं, EFTA देशों का वैश्विक बाजार से सालाना आयात करीब 628 अरब डॉलर का है. एसोचैम के मुताबिक, यह भारतीय कंपनियों के लिए इन बाजारों में अपनी मौजूदगी बढ़ाने और मौजूदा उत्पाद श्रेणियों से आगे निर्यात का विस्तार करने का बड़ा अवसर है.

एसोचैम के महासचिव सौरभ सान्याल ने कहा कि EFTA के कुल ऑर्गेनिक केमिकल्स आयात में भारत की 8.9 फीसदी हिस्सेदारी इस क्षेत्र में विस्तार की संभावनाओं को दर्शाती है. उनके मुताबिक, फार्मास्यूटिकल्स, मशीनरी, इलेक्ट्रिकल उपकरण, ऑटोमोबाइल, मेडिकल डिवाइस और टेक्सटाइल जैसे क्षेत्रों में भी भारतीय कंपनियों के लिए अवसर मौजूद हैं.

ये अवसर केवल बड़ी और स्थापित निर्यातक कंपनियों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि छोटे कारोबारियों को भी इन बाजारों में अपनी जगह बनाने का मौका मिल सकता है.

ग्रीन हाइड्रोजन और AI पर बढ़ेगा सहयोग

TEPA के तहत ग्रीन हाइड्रोजन भी भारत और EFTA देशों के बीच सहयोग का एक प्रमुख क्षेत्र बनकर उभर रहा है. भारत ने वर्ष 2030 तक सालाना कम से कम 50 लाख टन ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन का लक्ष्य रखा है.

एसोचैम के अनुसार, भारत का यह लक्ष्य नॉर्वे की समुद्री तकनीक संबंधी क्षमताओं, आइसलैंड की जियोथर्मल विशेषज्ञता और स्विट्जरलैंड की इलेक्ट्रोलाइजर तकनीक के साथ तालमेल बिठा सकता है. इससे तकनीकी सहयोग और औद्योगिक साझेदारियों की संभावनाएं बढ़ सकती हैं.

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), रोबोटिक्स और उन्नत विनिर्माण को भी सहयोग के संभावित क्षेत्रों में शामिल किया गया है. भारत की प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) योजनाएं, सेमीकॉन इंडिया 2.0 और इंडियाAI मिशन जैसे कार्यक्रम EFTA देशों के साथ प्रिसिजन इंजीनियरिंग, ऑटोमेशन और उभरती तकनीकों में साझेदारी को बढ़ावा देने के लिए घरेलू नीतिगत आधार उपलब्ध करा सकते हैं.

भारत-EFTA निवेश और तकनीकी साझेदारी में तेजी

एसोचैम के मुताबिक, भारत और EFTA देशों के बीच आर्थिक सहयोग बढ़ने के शुरुआती संकेत दिखाई देने लगे हैं. भारत और नॉर्वे ने अपने संबंधों को ग्रीन स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप का दर्जा दिया है. वहीं, नॉर्वे की निवेश संस्था Norfund भारत के नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में 10 करोड़ डॉलर तक निवेश कर रही है.

भारत-स्विट्जरलैंड संयुक्त अनुसंधान कार्यक्रम ने वर्ष 2026 में तीन नई संयुक्त शोध पहल शुरू की हैं. एसोचैम के अनुसार, वर्ष 2000 से अब तक EFTA देशों ने भारत में 12.48 अरब डॉलर का निवेश किया है, जिसमें स्विट्जरलैंड सबसे आगे है. दूसरी ओर, भारतीय कंपनियों ने वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान स्विट्जरलैंड में 1.28 अरब डॉलर का निवेश किया. यह दोनों पक्षों के बीच बढ़ते निवेश प्रवाह को दर्शाता है.

राज्यों, MSMEs और किसानों को भी मिलेगा लाभ

एसोचैम का कहना है कि TEPA के फायदे बड़ी कंपनियों तक सीमित नहीं रहने चाहिए. इस समझौते से MSMEs, स्टार्टअप और किसानों को भी अवसर मिल सकते हैं. महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल और पूर्वोत्तर के राज्यों को कृषि उत्पादों, समुद्री खाद्य पदार्थों, कॉफी और मसालों के निर्यात में बढ़ोतरी का लाभ मिल सकता है. इससे व्यापार साझेदारी में छोटे कारोबारियों और क्षेत्रीय उत्पादकों की भागीदारी बढ़ने की संभावना है.

TEPA के दूसरे वर्ष में प्रवेश के साथ अब बाजार तक पहुंच और निवेश संबंधी प्रतिबद्धताओं को वास्तविक परियोजनाओं, तकनीकी साझेदारियों और रोजगार में बदलने पर जोर है. एसोचैम के अनुसार, यह समझौता भारत की औद्योगिक प्रतिस्पर्धात्मकता को मजबूत करने के साथ विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को हासिल करने में भी योगदान दे सकता है.
 


मेघना छेत्री ने शुरू किया Amã Foods, GI टैग वाले खाद्य उत्पादों को मिलेगा नया बाजार

कंपनी का कहना है कि वह स्थानीय किसानों से सीधे उत्पाद खरीदकर उनकी भौगोलिक पहचान और गुणवत्ता को बनाए रखते हुए ग्राहकों तक पहुंचाएगी.

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मेघना छेत्री ने उद्यमिता की दुनिया में कदम रखते हुए Amã Foods की शुरुआत की है. इस ब्रांड का उद्देश्य भारत के भौगोलिक संकेतक (GI) टैग वाले खाद्य उत्पादों को व्यापक बाजार तक पहुंचाना है. इन उत्पादों को उनके मूल स्थान पर किसान समूहों के जरिए उगाया जाता है. ब्रांड की टैगलाइन ‘The Origin of Purity’ रखी गई है. कंपनी का कहना है कि वह स्थानीय किसानों से सीधे उत्पाद खरीदकर उनकी भौगोलिक पहचान और गुणवत्ता को बनाए रखते हुए ग्राहकों तक पहुंचाएगी.

डिजिटल मार्केटिंग के क्षेत्र में करीब 15 साल का अनुभव रखने वाली मेघना छेत्री ने ICICI Bank, State Bank of India, Accenture और Cognizant जैसी कंपनियों में काम किया है. मेघालय के शिलांग में पंजीकृत Amã Foods इसी महीने अपने उत्पादों के साथ बाजार में उतर रहा है.

लाकाडोंग हल्दी और काले चावल से शुरुआत

Amã Foods की शुरुआती उत्पाद श्रृंखला में मेघालय की जैंतिया पहाड़ियों में उगाई जाने वाली लाकाडोंग हल्दी और मणिपुर का चक-हाओ काला चावल शामिल हैं. लाकाडोंग हल्दी में करक्यूमिन की अधिक मात्रा के लिए जाना जाता है. इनके अलावा मखाना और प्रीमियम चाय भी शुरुआती उत्पादों में शामिल हैं.

कंपनी के मुताबिक, प्रत्येक उत्पाद को उसके मूल जिले में सक्रिय किसान उत्पादक संगठन (FPO) से खरीदा जाएगा. हर बैच की लैब में जांच की जाएगी. साथ ही, किसी उत्पाद पर जीआई टैग का नाम तभी इस्तेमाल किया जाएगा, जब कंपनी के पास इसके लिए अधिकृत उपयोगकर्ता के अधिकार होंगे.

फिलहाल ग्राहक Instagram पर @amaorigin के जरिए उत्पादों की प्री-ऑर्डर बुकिंग कर सकते हैं. कंपनी की अपनी वेबसाइट amaorigins.com के साथ Amazon और Flipkart पर बिक्री दिसंबर 2026 में शुरू होने की योजना है. इसके तहत देशभर में उत्पादों की आपूर्ति की जाएगी.

अप्रैल 2028 तक 30 उत्पाद जोड़ने की योजना

कंपनी अप्रैल 2027 से हर महीने दो जीआई टैग वाले उत्पाद अपनी श्रृंखला में शामिल करने की योजना बना रही है. लक्ष्य अप्रैल 2028 तक पोर्टफोलियो में 30 उत्पादों को शामिल करना है.

आने वाले समय में नागा मिर्च, कश्मीर केसर, सुंदरबन शहद, ब्याडगी मिर्च, कूर्ग की हरी इलायची, सिक्किम की बड़ी इलायची, मालाबार काली मिर्च और कोरापुट का कालाजीरा चावल जैसे उत्पाद शामिल किए जा सकते हैं. कंपनी के अनुसार, इन सभी उत्पादों की खरीद उनके मूल क्षेत्रों से की जाएगी.

किसानों को उचित कीमत दिलाने पर जोर

जीआई टैग किसी उत्पाद की भौगोलिक उत्पत्ति और उससे जुड़ी विशिष्ट विशेषताओं को कानूनी पहचान देता है. यह किसी उत्पाद के नाम को उस क्षेत्र से जोड़ता है, जहां उसकी गुणवत्ता, प्रतिष्ठा या अन्य विशेषताएं विकसित हुई हैं. भारत में सैकड़ों खाद्य उत्पादों को जीआई पहचान मिल चुकी है. इनमें से कई उत्पाद छोटे किसानों द्वारा ऐसे क्षेत्रों में उगाए जाते हैं, जो बड़े उपभोक्ता बाजारों से दूर हैं.

Amã Foods का उद्देश्य इन उत्पादों और बेहतर कीमत देने में सक्षम ग्राहकों के बीच की दूरी को कम करना है. कंपनी सीधे किसान उत्पादक संगठनों से खरीद, उत्पाद की पहचान को बनाए रखने और उसे व्यापक बाजार में बेचने की रणनीति पर काम कर रही है.

Amã Foods की संस्थापक मेघना छेत्री ने कहा, “मैं शिलांग में बड़ी हुई हूं और मैंने देखा है कि जैंतिया पहाड़ियों की लाकाडोंग हल्दी बिना किसी पहचान के बोरियों में भरकर बाहर भेज दी जाती है. बाद में इसे कहीं और सामान्य उत्पादों के साथ मिलाया जाता है. किसान को ऐसे उत्पाद के लिए सामान्य कीमत मिलती है, जिसे कानूनी तौर पर दुनिया के बेहतरीन उत्पादों में गिना जाता है. Amã इसी स्थिति को बदलने के उद्देश्य से बनाया गया है. हम उत्पाद उसके मूल स्थान से खरीदते हैं, पैक पर उसका नाम बनाए रखते हैं और उसे उन आयातित ब्रांडों के साथ बाजार में लाते हैं, जिनसे उसकी गुणवत्ता बेहतर हो सकती है.”

उन्होंने कहा कि कंपनी शुरुआत में चार उत्पादों के साथ काम कर रही है और नए उत्पादों को शामिल करने से पहले उनकी गुणवत्ता तथा स्रोत की पुष्टि पर ध्यान देगी. उनके मुताबिक, amaorigins.com पर उपलब्ध हर उत्पाद की लैब जांच और जीआई सत्यापन किया जाएगा तथा उसे सीधे उस किसान समूह से खरीदा जाएगा, जिसने उसे उगाया है.

शिलांग में पंजीकृत है कंपनी

मेघालय की रहने वाली मेघना छेत्री ने Amã Foods को शिलांग में पंजीकृत कराया है. कंपनी का संचालन मुंबई के लोअर परेल स्थित कॉरपोरेट कार्यालय से किया जा रहा है. इसकी आपूर्ति श्रृंखला मेघालय, मणिपुर और दार्जिलिंग के किसान उत्पादक संगठनों के साथ लिखित समझौतों पर आधारित है.

इन समझौतों के तहत किसान उत्पादक संगठन फसल का भंडारण करेंगे और हर महीने उत्पादों की आपूर्ति करेंगे. कंपनी का कहना है कि इस व्यवस्था के जरिए उत्पादों की गुणवत्ता, स्रोत और आपूर्ति को व्यवस्थित बनाए रखने पर जोर दिया जाएगा.
 


सालभर में 80% महंगी हुई हल्दी, ₹24,500 के पार पहुंचे वायदा भाव; आगे भी तेजी के आसार

हल्दी की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी के बीच जिन किसानों ने अपनी उपज का भंडारण कर रखा है, वे आगे और ऊंचे भाव मिलने की उम्मीद में फिलहाल बिक्री से बच रहे हैं. इससे बाजार में उपलब्ध आपूर्ति सीमित रह सकती है.

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Friday, 16 October, 2026
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हल्दी की कीमतों में तेजी का सिलसिला जारी है. बीते एक महीने में इसके दाम 18% से अधिक और एक साल में करीब 80% बढ़ चुके हैं. मांग में मजबूती, सीमित आपूर्ति और प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में सूखे की आशंका से कीमतों को सहारा मिल रहा है. उत्पादन में संभावित गिरावट और पुराने स्टॉक में कमी के चलते किसानों और स्टॉकिस्टों ने भी बिक्री सीमित कर दी है. ऐसे में आने वाले हफ्तों में हल्दी की कीमतों में और तेजी आने की आशंका जताई जा रही है.

सालभर में 80% बढ़े हल्दी के दाम

हल्दी की कीमतों में आई तेजी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले एक महीने में इसके दाम 18% से अधिक बढ़ गए हैं, जबकि सालभर में कीमतों में करीब 80% की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, हाजिर बाजार में तमिलनाडु की पेरुंदुरई मंडी में हल्दी के भाव ₹23,000 प्रति क्विंटल के पार पहुंच गए हैं. वहीं, वायदा बाजार में नेशनल कमोडिटी एंड डेरिवेटिव्स एक्सचेंज (NCDEX) पर इसके भाव ₹24,500 प्रति क्विंटल से ऊपर निकल गए हैं.

बाजार में हल्दी की सीमित आवक, प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में बारिश की कमी और अगली फसल पर मौसम के संभावित असर से कीमतों को समर्थन मिल रहा है. बाजार में तेजी की उम्मीद के कारण किसान और स्टॉकिस्ट अपनी उपज बेचने में भी सावधानी बरत रहे हैं.

पुराने स्टॉक में कमी से बढ़ी चिंता

हल्दी की कीमतों में तेजी की एक बड़ी वजह पुराने स्टॉक में कमी भी है. पिछले सीजन में 20 लाख से अधिक बोरों के मुकाबले इस बार करीब 15 लाख बोरे कैरी-फॉरवर्ड स्टॉक के रूप में उपलब्ध रहने का अनुमान है. कैरी-फॉरवर्ड स्टॉक का मतलब पिछले सीजन से बचा हुआ माल है, जिसका इस्तेमाल नए सीजन में आपूर्ति के लिए किया जाता है.

कर्नाटक में सूखे को लेकर किए गए संयुक्त सर्वे के अनुसार, राज्य में हल्दी की खेती के कुल लगभग 18,000-20,000 हेक्टेयर क्षेत्र में से 13,446 हेक्टेयर में फसल को नुकसान पहुंचा है. इससे हुए नुकसान का मूल्य ₹188.24 करोड़ आंका गया है.

पुराने स्टॉक में कमी से बाजार में आपूर्ति का अतिरिक्त बफर कमजोर हुआ है. ऐसे में यदि नई फसल का उत्पादन प्रभावित होता है, तो कीमतों पर दबाव और बढ़ सकता है.

वैश्विक बाजार में भारतीय हल्दी की मांग

मौसम संबंधी चिंताओं के बीच विदेशी खरीदारों की हल्दी में दिलचस्पी बनी हुई है. हालांकि, भारतीय निर्यातकों के लिए विदेशी मांग को पूरा करना चुनौतीपूर्ण हो रहा है. जुलाई 2026 में भारत से हल्दी का निर्यात पिछले साल के 15,071 टन से 10% घटकर 13,489 टन रह गया. हालांकि, अप्रैल से जुलाई 2026 के दौरान कुल निर्यात में बढ़ोतरी दर्ज की गई. इस अवधि में निर्यात पिछले साल के 63,020 टन से 4% बढ़कर 65,476 टन पहुंच गया.

कुछ देशों में भारतीय हल्दी की मांग में तेज वृद्धि देखने को मिली. तुर्की को निर्यात 431% बढ़कर 3,007 टन, श्रीलंका को 644% बढ़कर 156 टन और नाइजीरिया को 983% बढ़कर 69 टन हो गया.

इन आंकड़ों से पता चलता है कि कुछ अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भारतीय हल्दी की मांग मजबूत बनी हुई है. हालांकि, कुल निर्यात और कीमतों की दिशा पर घरेलू उत्पादन, उपलब्ध स्टॉक और वैश्विक मांग का असर बना रहेगा.

सूखे से अगली फसल पर खतरा

इरोड हल्दी मर्चेंट्स एंड गोडाउन ओनर्स एसोसिएशन के सचिव एम. सत्यमूर्ति के अनुसार, महाराष्ट्र के मराठवाड़ा, तेलंगाना के निजामाबाद और तमिलनाडु के कुछ हिस्सों में सूखे की स्थिति हल्दी की कीमतों को ऊपर धकेल रही है.

उन्होंने बताया कि पानी की कमी के कारण कुछ क्षेत्रों में हल्दी की बुवाई का रकबा पहले ही 20-30% तक घट चुका है. आने वाले महीनों में खेती का क्षेत्र और कम होने की आशंका है. यदि सूखे का असर लंबे समय तक बना रहता है, तो अगले साल हल्दी के उत्पादन में बड़ी गिरावट आ सकती है.

हालांकि, वर्ष 2026 में भारत में हल्दी उत्पादन करीब 15% बढ़ने का सरकारी अनुमान भी है. इसके पीछे खेती के रकबे में लगभग 20% की बढ़ोतरी को प्रमुख वजह बताया गया है, खासकर महाराष्ट्र में.

महाराष्ट्र, तेलंगाना और उत्तरी कर्नाटक में मानसून की बेहतर स्थिति के साथ तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के जलाशयों में पानी भरने से फसल को लेकर तत्काल चिंताएं कुछ कम हुई हैं. बारिश के बाद उत्तरी कर्नाटक में दोबारा बुवाई भी पूरी हो चुकी है. फिर भी अच्छी पैदावार के लिए आने वाले समय में मौसम का अनुकूल रहना जरूरी होगा.

आगे भी तेजी की उम्मीद, किसान बिक्री से बच रहे

हल्दी की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी के बीच जिन किसानों ने अपनी उपज का भंडारण कर रखा है, वे आगे और ऊंचे भाव मिलने की उम्मीद में फिलहाल बिक्री से बच रहे हैं. इससे बाजार में उपलब्ध आपूर्ति सीमित रह सकती है.

कमोडिटी एक्सपर्ट अनुज गुप्ता के मुताबिक, तकनीकी रूप से हल्दी का बाजार अभी भी मजबूत तेजी के रुझान में है. कम उत्पादन की आशंका, पुराने स्टॉक में कमी, किसानों की सीमित बिक्री और घरेलू व निर्यात मांग में मजबूती जैसे कारक कीमतों को समर्थन दे रहे हैं.

हल्दी की खेती मुख्य रूप से तमिलनाडु के इरोड और धर्मपुरी जिलों के अलावा कर्नाटक के कुछ हिस्सों में होती है. इसकी खरीद-बिक्री इरोड और पेरुंदुरई की मंडियों के साथ करंगलपलायम और गोबिचेट्टीपलायम की कृषि उत्पादक सहकारी विपणन समितियों में भी होती है.

आने वाले समय में हल्दी की कीमतों की दिशा काफी हद तक मौसम, नई फसल की पैदावार, उपलब्ध पुराने स्टॉक और निर्यात मांग पर निर्भर करेगी. यदि आपूर्ति में कमी आती है और मांग मजबूत बनी रहती है, तो कीमतों में तेजी जारी रह सकती है.


₹8,415 करोड़ के बॉन्ड राइट-ऑफ मामले में YES Bank को सुप्रीम कोर्ट से झटका, शेयरों में लगातार दूसरे दिन गिरावट

यस बैंक AT-1 बॉन्ड मामले का फैसला सिर्फ संबंधित निवेशकों के लिए ही नहीं, बल्कि बैंकिंग सेक्टर के लिए भी अहम है. यह मामला बैंक के संकट के दौरान बॉन्डधारकों के अधिकारों और पुनर्गठन प्रक्रिया में अपनाए जाने वाले कदमों से जुड़ा है.

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Friday, 16 October, 2026
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सुप्रीम कोर्ट ने यस बैंक के ₹8,415 करोड़ के AT-1 बॉन्ड राइट-ऑफ मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए केंद्र सरकार, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और बैंक की अपीलें खारिज कर दी हैं. इस फैसले के बाद यस बैंक के शेयरों में गुरुवार को 20% तक की गिरावट दर्ज की गई. वहीं, आज यानी शुक्रवार को भी खबर लिखे जाने के दौरान शेयर में 2.57 प्रतिशत तक की गिरावट दिखी.  तो आइए जानते हैं, आखिर क्या हैं AT-1 बॉन्ड, इन्हें राइट-ऑफ करने का फैसला क्यों विवादों में आया और इसका निवेशकों पर क्या असर पड़ सकता है?

क्या है यस बैंक के ₹8,415 करोड़ के बॉन्ड का पूरा मामला?

यह मामला मार्च 2020 में यस बैंक के वित्तीय संकट के दौरान उसके पुनर्गठन से जुड़ा है. उस समय बैंक की वित्तीय स्थिति को संभालने के लिए ₹8,415 करोड़ के Additional Tier-1 (AT-1) बॉन्ड को राइट-ऑफ कर दिया गया था. इसका मतलब था कि इन बॉन्ड में निवेश करने वालों की रकम पूरी तरह बट्टे खाते में डाल दी गई और निवेशकों को अपना पैसा गंवाना पड़ा.

इन बॉन्ड में संस्थागत निवेशकों, म्यूचुअल फंड और आम निवेशकों ने पैसा लगाया था. बॉन्डधारकों ने इस फैसले को चुनौती देते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख किया और अपने निवेश की रकम वापस दिलाने की मांग की.

जनवरी 2023 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने निवेशकों के पक्ष में फैसला सुनाया था. हाईकोर्ट ने कहा था कि बॉन्ड को राइट-ऑफ करना बैंक की अंतिम पुनर्गठन योजना का हिस्सा नहीं था. कोर्ट के मुताबिक, 13 मार्च 2020 को पुनर्गठन के बाद बैंक के प्रशासक ने बॉन्ड राइट-ऑफ करके अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर काम किया था. अब सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है. इसके साथ ही केंद्र सरकार, RBI और यस बैंक की अपीलें खारिज हो गई हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

जस्टिस दीपांकर दत्ता की अगुवाई वाली पीठ ने सुनवाई के बाद कहा कि बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने मामले में पहले लगाई गई रोक भी हटा दी. फैसले के बाद यस बैंक ने कहा कि वह निर्णय और उसके संभावित प्रभावों की समीक्षा कर रहा है. बैंक ने यह भी बताया कि वह फैसले की विस्तृत प्रति प्राप्त करने की प्रक्रिया में है. इसका अध्ययन करने के बाद ही वह आगे की जानकारी साझा करेगा. शेयरों में तेज गिरावट के बाद बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) ने भी बैंक से स्पष्टीकरण मांगा था.

केंद्र सरकार और RBI ने क्या दलीलें दी थीं?

केंद्र सरकार, RBI और यस बैंक ने बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी. केंद्र सरकार का तर्क था कि AT-1 बॉन्ड को राइट-ऑफ करना कानूनी था और बैंक के दो लाख से अधिक जमाकर्ताओं के हितों की रक्षा के लिए यह कदम जरूरी था.

RBI ने दलील दी थी कि बॉन्ड को संबंधित नियमों और नियामकीय शर्तों के अनुसार राइट-ऑफ किया गया था. उसका कहना था कि बैंक में सरकारी पूंजी और अन्य निवेशकों का पैसा आने से पहले यह कदम उठाया गया, ताकि जमाकर्ताओं के हित सुरक्षित रखे जा सकें.

वहीं, यस बैंक का कहना था कि 2016 के सूचना दस्तावेजों और RBI के नियमों में AT-1 बॉन्ड को स्थायी रूप से राइट-ऑफ करने का प्रावधान था. बैंक के मुताबिक, भारतीय स्टेट बैंक (SBI) और दूसरे निवेशकों से पूंजी मिलने से पहले यह कदम उठाना जरूरी था.

क्या होते हैं AT-1 बॉन्ड और इनमें कितना जोखिम होता है?

AT-1 यानी Additional Tier-1 बॉन्ड बैंकों के लिए पूंजी जुटाने का एक माध्यम हैं. बैंक इन बॉन्ड के जरिए निवेशकों से पैसा जुटाते हैं और इसका इस्तेमाल अपनी पूंजी स्थिति मजबूत करने के लिए करते हैं. ये बॉन्ड बैंक की नियामकीय पूंजी का हिस्सा होते हैं.

हालांकि, AT-1 बॉन्ड सामान्य फिक्स्ड डिपॉजिट की तरह सुरक्षित निवेश नहीं हैं. इनमें निवेश करने वालों को अधिक जोखिम उठाना पड़ सकता है. बैंक की वित्तीय स्थिति गंभीर रूप से बिगड़ने पर नियामकीय नियमों और बॉन्ड की शर्तों के तहत इनकी रकम को पूरी तरह राइट-ऑफ किया जा सकता है. ऐसी स्थिति में निवेशक अपनी पूरी निवेश राशि गंवा सकते हैं.

यही जोखिम यस बैंक के मामले में विवाद का मुख्य कारण बना. निवेशकों ने बॉन्ड राइट-ऑफ करने के फैसले को चुनौती दी थी, जबकि बैंक और नियामकों का तर्क था कि यह कदम संकट के समय लागू नियमों के अनुरूप था.

बैंकिंग सेक्टर और निवेशकों पर क्या हो सकता है असर?

यस बैंक AT-1 बॉन्ड मामले का फैसला सिर्फ संबंधित निवेशकों के लिए ही नहीं, बल्कि बैंकिंग सेक्टर के लिए भी अहम है. यह मामला बैंक के संकट के दौरान बॉन्डधारकों के अधिकारों और पुनर्गठन प्रक्रिया में अपनाए जाने वाले कदमों से जुड़ा है.

सरकार और RBI ने अदालत में दलील दी थी कि हाईकोर्ट के फैसले को लागू करने से बैंकिंग सिस्टम और संकटग्रस्त बैंकों के पुनर्गठन की भविष्य की प्रक्रियाओं पर गंभीर असर पड़ सकता है. वित्त मंत्रालय के रिकॉर्ड के अनुसार, 31 दिसंबर 2022 तक बैंकों के ₹1,02,466 करोड़ के AT-1 बॉन्ड और ₹1,92,702 करोड़ के टियर-2 बॉन्ड बकाया थे. इनमें सरकारी बैंकों की बड़ी हिस्सेदारी थी.

सुप्रीम कोर्ट द्वारा बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखने से इस मामले में बॉन्डधारकों के पक्ष को कानूनी समर्थन मिला है. हालांकि, निवेशकों को वास्तविक राहत किस रूप में और किस प्रक्रिया के तहत मिलेगी, यह फैसले के क्रियान्वयन और उससे जुड़े आगे के कदमों पर निर्भर करेगा.

इस मामले ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि AT-1 बॉन्ड में निवेश करने से पहले उसकी शर्तों, राइट-ऑफ के प्रावधानों और जोखिमों को समझना जरूरी है. ऊंचे रिटर्न की संभावना के साथ इनमें मूलधन पूरी तरह डूबने का जोखिम भी जुड़ा होता है.
 


IRFC Q2 Results: सितंबर तिमाही में ₹1,958 करोड़ का मुनाफा, ₹1.15 प्रति शेयर डिविडेंड का ऐलान

IRFC के तिमाही नतीजों के मुताबिक, सितंबर तिमाही में कंपनी का परिचालन से राजस्व (Revenue from Operations) बढ़कर ₹7,866.41 करोड़ हो गया.

Last Modified:
Friday, 16 October, 2026
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इंडियन रेलवे फाइनेंस कॉरपोरेशन (IRFC) ने वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही में शानदार प्रदर्शन किया है. जुलाई से सितंबर 2026 के दौरान कंपनी का शुद्ध मुनाफा सालाना आधार पर 10 फीसदी बढ़कर ₹1,958 करोड़ पहुंच गया. वहीं, कंपनी के बोर्ड ने शेयरधारकों के लिए ₹1.15 प्रति शेयर के अंतरिम डिविडेंड को मंजूरी दी है. कंपनी के मुताबिक, यह अब तक का उसका सबसे बड़ा अंतरिम डिविडेंड है.

ऑपरेशनल रेवेन्यू में 23.5 फीसदी की बढ़ोतरी

IRFC के तिमाही नतीजों के मुताबिक, सितंबर तिमाही में कंपनी का परिचालन से राजस्व (Revenue from Operations) बढ़कर ₹7,866.41 करोड़ हो गया. पिछले वित्त वर्ष की समान तिमाही में यह ₹6,371.89 करोड़ था. इस तरह कंपनी के परिचालन राजस्व में सालाना आधार पर करीब 23.5 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई.

कंपनी की कुल आय भी बढ़कर ₹7,924 करोड़ पहुंच गई, जबकि पिछले साल की समान अवधि में यह करीब ₹6,372 करोड़ थी. हालांकि, इस दौरान कंपनी के कुल खर्च में भी इजाफा हुआ. सितंबर तिमाही में कुल खर्च बढ़कर ₹5,966 करोड़ हो गया, जो एक साल पहले इसी अवधि में ₹4,595 करोड़ था. खर्च में बढ़ोतरी के बावजूद कंपनी ने अपने शुद्ध मुनाफे में 10 फीसदी की वृद्धि दर्ज की.

हर शेयर पर ₹1.15 का अंतरिम डिविडेंड

तिमाही नतीजों के साथ IRFC ने शेयरधारकों को अंतरिम डिविडेंड देने का ऐलान किया है. कंपनी के बोर्ड ने ₹10 की फेस वैल्यू वाले प्रत्येक शेयर पर ₹1.15 के अंतरिम डिविडेंड को मंजूरी दी है. यह शेयर की फेस वैल्यू का 11 फीसदी है.

इस घोषणा के अनुसार, यदि किसी निवेशक के पास कंपनी के 1,000 शेयर हैं, तो उसे कुल ₹1,150 का डिविडेंड मिलेगा. हालांकि, वास्तविक भुगतान लागू कर नियमों और पात्रता शर्तों के अधीन होगा.

23 अक्टूबर है रिकॉर्ड डेट

डिविडेंड का लाभ किन शेयरधारकों को मिलेगा, यह तय करने के लिए IRFC ने 23 अक्टूबर 2026 को रिकॉर्ड डेट निर्धारित की है. रिकॉर्ड डेट के अनुसार पात्र शेयरधारकों को ही अंतरिम डिविडेंड का लाभ मिलेगा.

शेयर में तेजी

तिमाही नतीजों और डिविडेंड की घोषणा के बाद IRFC के शेयर में शुक्रवार को तेजी आई है. खबर लिखे जाने तक शेयर 2.27 प्रतिशत की तेजी के साथ 80.69 रुपये पर कारोबार कर रहा था. वहीं. गुरुवार, 15 अक्टूबर 2026 को BSE पर कंपनी का शेयर 0.94 फीसदी गिरकर ₹79 पर बंद हुआ. इस भाव पर कंपनी का बाजार पूंजीकरण करीब ₹1.03 लाख करोड़ था. पिछले तीन महीनों में IRFC के शेयर में करीब 11 फीसदी की गिरावट आई है, जबकि छह महीने के दौरान यह लगभग 22 फीसदी फिसला है. एक साल की अवधि में शेयर करीब 36.7 फीसदी टूट चुका है. इस तरह कंपनी के तिमाही नतीजों में मुनाफे और परिचालन राजस्व में बढ़ोतरी देखने को मिली है, लेकिन शेयर का प्रदर्शन अब भी दबाव में है.

 


सेबी ने बदले क्लोजिंग ऑक्शन के नियम, 7 दिसंबर से लागू होंगे नए प्रावधान; जानें ट्रेडिंग और सेटलमेंट पर क्या होगा असर

नए नियमों के तहत क्लोजिंग ऑक्शन सेशन (CAS) की प्रक्रिया में भी बदलाव किया गया है. इसका उद्देश्य ऑर्डर दर्ज करने और कीमत तय करने की प्रक्रिया को व्यवस्थित करना है.

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Friday, 16 October, 2026
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बाजार नियामक सेबी ने क्लोजिंग ऑक्शन सेशन (CAS) और डेरिवेटिव्स के सेटलमेंट से जुड़े नियमों में बदलाव किया है. नए नियमों के तहत एक्सपायरी वाले दिन डेरिवेटिव्स के सेटलमेंट प्राइस का निर्धारण कैश मार्केट में दोपहर 3 बजे से 3:30 बजे तक के कारोबार के वॉल्यूम वेटेड एवरेज प्राइस (VWAP) के आधार पर किया जाएगा. इसके अलावा क्लोजिंग ऑक्शन का समय, ऑर्डर दर्ज करने की प्रक्रिया और अधूरे ऑर्डर के निपटान के नियम भी बदले गए हैं. ज्यादातर बदलाव 7 दिसंबर, 2026 से लागू होंगे, जबकि अधूरे लिमिट और आइसबर्ग ऑर्डर से जुड़े नए प्रावधान 8 फरवरी, 2027 से प्रभावी होंगे.

VWAP के आधार पर तय होगा सेटलमेंट प्राइस

सेबी के नए नियमों के अनुसार, इंडेक्स डेरिवेटिव्स का सेटलमेंट प्राइस तय करने के लिए संबंधित इंडेक्स में शामिल शेयरों के दोपहर 3 बजे से 3:30 बजे तक के VWAP को आधार बनाया जाएगा. वहीं, शेयर डेरिवेटिव्स के मामले में संबंधित शेयर का इसी अवधि का VWAP इस्तेमाल होगा. इस गणना में सभी स्टॉक एक्सचेंजों पर हुए कारोबार को शामिल किया जाएगा.

VWAP यानी वॉल्यूम वेटेड एवरेज प्राइस एक ऐसा औसत भाव है, जिसमें अधिक मात्रा में कारोबार होने वाली कीमतों को ज्यादा महत्व दिया जाता है. एक्सचेंज और क्लियरिंग कॉरपोरेशन इस दौरान संबंधित शेयरों के औसत भाव और कारोबार की मात्रा की जानकारी उपलब्ध कराएंगे. साथ ही, बाजार के प्रतिभागियों को संभावित सेटलमेंट प्राइस के संकेत भी मिलते रहेंगे.

क्लोजिंग ऑक्शन सेशन की टाइमिंग में बदलाव

नए नियमों के तहत क्लोजिंग ऑक्शन सेशन (CAS) की प्रक्रिया में भी बदलाव किया गया है. इसका उद्देश्य ऑर्डर दर्ज करने और कीमत तय करने की प्रक्रिया को व्यवस्थित करना है.

दोपहर 3:30 से 3:31 बजे तक रेफरेंस प्राइस की गणना की जाएगी और सामान्य कारोबार से CAS में बदलाव की प्रक्रिया पूरी होगी. इसके बाद 3:31 से 3:36 बजे तक निवेशक लिमिट और मार्केट, दोनों तरह के ऑर्डर दर्ज कर सकेंगे.

शाम 3:36 बजे के बाद ऑर्डर एंट्री बंद होने तक केवल लिमिट ऑर्डर दर्ज किए जा सकेंगे. इस अवधि में मार्केट ऑर्डर में बदलाव करने या उन्हें रद्द करने की अनुमति नहीं होगी. ऑर्डर दर्ज करने की प्रक्रिया शाम 3:38 से 3:40 बजे के बीच किसी भी समय बंद की जा सकती है.

इंडेक्स और शेयर डेरिवेटिव्स में ट्रेडिंग का समय क्या होगा?

नए प्रावधानों के तहत सामान्य कारोबारी दिनों में इंडेक्स डेरिवेटिव्स में ट्रेडिंग दोपहर 3:45 बजे तक जारी रहेगी. हालांकि, जिन इंडेक्स कॉन्ट्रैक्ट्स की एक्सपायरी उसी दिन होगी, उनमें कारोबार दोपहर 3:30 बजे बंद हो जाएगा.

शेयर डेरिवेटिव्स में एक्सपायरी वाले दिन भी ट्रेडिंग शाम 3:45 बजे तक जारी रह सकेगी. दूसरी ओर, कैश मार्केट का पोस्ट-क्लोजिंग सेशन शाम 3:50 से 4 बजे तक चलेगा. इस दौरान शेयरों के निर्धारित क्लोजिंग प्राइस पर सौदे किए जा सकेंगे.

अधूरे लिमिट और आइसबर्ग ऑर्डर के लिए क्या बदलेगा?

सामान्य कारोबारी सत्र में पूरे नहीं हो पाए लिमिट ऑर्डर को आम तौर पर CAS में आगे बढ़ाया जाएगा. हालांकि, स्टॉप-लॉस ऑर्डर और CAS के निर्धारित प्राइस बैंड से बाहर के ऑर्डर इस व्यवस्था में शामिल नहीं होंगे.

आइसबर्ग ऑर्डर ऐसे बड़े ऑर्डर होते हैं, जिनकी पूरी मात्रा एक साथ सार्वजनिक ऑर्डर बुक में दिखाई नहीं देती. नए नियमों के तहत निर्धारित प्राइस बैंड के भीतर ऐसे अधूरे ऑर्डर CAS में पूरी मात्रा दिखाने वाले लिमिट ऑर्डर में बदल जाएंगे. निवेशकों को मूल ऑर्डर दर्ज करते समय इस व्यवस्था से बाहर रहने का विकल्प भी मिलेगा.

इन ऑर्डर को प्राथमिकता देने का क्रम भी निर्धारित किया गया है. सामान्य कारोबारी सत्र से आगे बढ़ाए गए दूसरे लिमिट ऑर्डर के बाद, लेकिन CAS में नए दर्ज किए गए लिमिट ऑर्डर से पहले इन्हें समय की प्राथमिकता मिलेगी. इन प्रावधानों को 8 फरवरी, 2027 से लागू किया जाएगा.

सेबी ने क्यों बदले क्लोजिंग ऑक्शन के नियम?

क्लोजिंग ऑक्शन सेशन की शुरुआत 3 अगस्त को हुई थी. इसके बाद बाजार के प्रतिभागियों ने कम लिक्विडिटी, कीमतों में अचानक उतार-चढ़ाव और सेटलमेंट प्राइस को लेकर चिंताएं जताई थीं. सेबी के परामर्श पत्र पर 20,000 से अधिक सुझाव मिले थे.

ट्रेडर्स और ब्रोकर्स ने बाजार के आखिरी 30 मिनट के VWAP के आधार पर सेटलमेंट प्राइस तय करने के विकल्प का समर्थन किया. उनका तर्क था कि बाजार के प्रतिभागी इस व्यवस्था से पहले से परिचित हैं और इसे समझना तथा लागू करना अपेक्षाकृत आसान है.

सेबी ने सामान्य कारोबारी सत्र और ऑक्शन को मिलाकर सेटलमेंट प्राइस तय करने के विकल्प पर भी विचार किया था. हालांकि, अंतिम व्यवस्था में 30 मिनट के VWAP को चुना गया. इसके अलावा, रेफरेंस प्राइस से एक फीसदी के दायरे से बाहर रखे गए लिमिट ऑर्डर को रद्द करने पर रोक लगाने का प्रस्ताव अंतिम सर्कुलर में शामिल नहीं किया गया है.


सेंसेक्स 1,534 अंक उछला, निफ्टी 23,000 के पार जाने को तैयार; आज इन शेयरों पर रहेगी नजर

भारतीय शेयर बाजार में गुरुवार को जोरदार तेजी देखने को मिली. सेंसेक्स 1,533.72 अंक चढ़कर 74,315.61 पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी 50 में 374.65 अंक की बढ़त दर्ज की गई और यह 22,997.35 पर पहुंच गया.

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Friday, 16 October, 2026
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भारतीय शेयर बाजार में गुरुवार को जोरदार तेजी देखने को मिली. बीएसई सेंसेक्स 1,533.72 अंक यानी 2.11 फीसदी चढ़कर 74,315.61 पर बंद हुआ, जबकि एनएसई निफ्टी 50 में 374.65 अंक यानी 1.66 फीसदी की बढ़त दर्ज की गई और यह 22,997.35 पर पहुंच गया. आईटी, बैंकिंग और ऑटो शेयरों में खरीदारी से बाजार को सहारा मिला. वहीं, शुक्रवार सुबह GIFT निफ्टी में तेजी ने घरेलू बाजार की सकारात्मक शुरुआत के संकेत दिए. दूसरी ओर, कई कंपनियों के तिमाही नतीजे और कॉरपोरेट अपडेट आज के कारोबार में शेयरों की दिशा तय कर सकते हैं. रिलायंस इंडस्ट्रीज, विप्रो, टेक महिंद्रा, HDFC लाइफ इंश्योरेंस और पर्सिस्टेंट सिस्टम्स समेत कई शेयर निवेशकों के रडार पर रहेंगे.

सेंसेक्स और निफ्टी में कितनी आई तेजी?

गुरुवार, 15 अक्टूबर को बीएसई सेंसेक्स 1,533.72 अंक की बढ़त के साथ 74,315.61 पर बंद हुआ. कारोबार के दौरान यह 74,330.29 के स्तर तक पहुंच गया था. वहीं, एनएसई निफ्टी 50 में 374.65 अंक की तेजी आई और यह 22,997.35 पर बंद हुआ. कारोबार के दौरान निफ्टी ने 23,000 का स्तर भी पार किया.

बड़े शेयरों में खरीदारी से बाजार को मजबूती मिली, लेकिन व्यापक बाजार का प्रदर्शन मिला-जुला रहा. निफ्टी मिडकैप 100 में 0.36 फीसदी और निफ्टी स्मॉलकैप 100 में 1.31 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई. इससे संकेत मिलता है कि तेजी के बावजूद सभी श्रेणियों के शेयरों में एक जैसी खरीदारी नहीं हुई.

GIFT निफ्टी से आज क्या मिल रहे हैं संकेत?

शुक्रवार, 16 अक्टूबर की सुबह GIFT निफ्टी में बढ़त देखने को मिली. सुबह के शुरुआती अपडेट में यह 23,084 के आसपास कारोबार कर रहा था. इससे घरेलू बाजार में सकारात्मक शुरुआत की उम्मीद बनी. हालांकि, GIFT निफ्टी का स्तर लगातार बदलता रहता है और बाजार खुलने तक इसमें उतार-चढ़ाव संभव है.

आज बाजार की दिशा पर वैश्विक संकेतों, कच्चे तेल की कीमतों और विदेशी निवेशकों की गतिविधियों का असर भी रहेगा. गुरुवार की तेजी के बाद निवेशक यह देखेंगे कि खरीदारी का रुझान बरकरार रहता है या ऊंचे स्तरों पर मुनाफावसूली शुरू होती है.

आज इन शेयरों में दिख सकती है हलचल

रिलायंस इंडस्ट्रीज के शेयरों पर निवेशकों की नजर रहेगी. कंपनी के तिमाही नतीजों और प्रबंधन की टिप्पणी से तेल एवं गैस, रिटेल और डिजिटल कारोबार की स्थिति का आकलन किया जाएगा. इन कारोबारों का प्रदर्शन और आगे की योजनाएं शेयर की चाल को प्रभावित कर सकती हैं.

आईटी कंपनी विप्रो के शेयरों में तिमाही नतीजों के बाद हलचल रह सकती है. कंपनी ने दूसरी तिमाही में 24,753 करोड़ रुपये का राजस्व दर्ज किया. हालांकि, शुद्ध लाभ तिमाही आधार पर 4.5 फीसदी घटकर 3,200 करोड़ रुपये रहा. ऐसे में निवेशक कंपनी की डील बुकिंग, नए कारोबार और आगे के राजस्व अनुमान पर ध्यान देंगे.

टेक महिंद्रा के शेयर भी फोकस में रह सकते हैं. कंपनी ने जुलाई-सितंबर तिमाही में 1,585.6 करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ दर्ज किया, जो पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 32.7 फीसदी अधिक है. इस दौरान राजस्व में भी 15.6 फीसदी की वृद्धि हुई. कंपनी ने वित्त वर्ष 2027 के लिए अपना ऑपरेटिंग मार्जिन लक्ष्य बरकरार रखा है. मजबूत नतीजों के बाद निवेशकों की प्रतिक्रिया शेयर की दिशा तय कर सकती है.

HDFC लाइफ इंश्योरेंस के शेयरों में भी गतिविधि देखने को मिल सकती है. कंपनी ने दूसरी तिमाही में 522 करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ दर्ज किया, जो पिछले साल की समान अवधि से 16.5 फीसदी अधिक है. नेट प्रीमियम आय 15.8 फीसदी बढ़कर 21,856 करोड़ रुपये रही. निवेशक प्रीमियम वृद्धि, नए कारोबार और बीमा क्षेत्र की मांग से जुड़े संकेतों पर नजर रखेंगे.

जियो फाइनेंशियल सर्विसेज के शेयरों में कंपनी के वित्तीय सेवा कारोबार से जुड़े अपडेट के आधार पर हलचल रह सकती है. निवेशक कर्ज वितरण, वित्तीय सेवाओं के विस्तार और कंपनी की आय में वृद्धि की संभावनाओं का आकलन करेंगे. कारोबार में विस्तार और मुनाफे की स्थिति से जुड़े संकेत शेयर के लिए अहम होंगे.

पर्सिस्टेंट सिस्टम्स के शेयरों में भी उतार-चढ़ाव संभव है. कंपनी का दूसरी तिमाही का राजस्व सालाना आधार पर 30.3 फीसदी बढ़कर 4,663.9 करोड़ रुपये रहा. हालांकि, शुद्ध लाभ 25.4 फीसदी घटकर 351.5 करोड़ रुपये पर आ गया. राजस्व में मजबूत वृद्धि के बावजूद मुनाफे में गिरावट निवेशकों का ध्यान खींच सकती है. अब बाजार की नजर कंपनी के मार्जिन और आगे की वृद्धि पर रहेगी.

एंजेल वन के शेयरों में तिमाही प्रदर्शन के आधार पर हलचल रह सकती है. कंपनी ने दूसरी तिमाही में 335 करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ दर्ज किया, जबकि पिछले साल की समान अवधि में यह 211.7 करोड़ रुपये था. इस दौरान राजस्व 18.7 फीसदी बढ़कर 1,427 करोड़ रुपये रहा. ब्रोकिंग कारोबार की वृद्धि और बाजार में निवेशकों की सक्रियता इसके शेयरों के लिए महत्वपूर्ण होगी.

आईआईएफएल फाइनेंस के शेयरों पर भी नजर रहेगी. कंपनी का दूसरी तिमाही का समेकित शुद्ध लाभ सालाना आधार पर 103.7 फीसदी बढ़कर 766.4 करोड़ रुपये रहा. नेट इंटरेस्ट इनकम भी 50.2 फीसदी बढ़कर 2,160.7 करोड़ रुपये पर पहुंच गई. निवेशक कंपनी की आय वृद्धि, कर्ज वितरण और कर्ज की गुणवत्ता से जुड़े संकेतों पर ध्यान देंगे.

इन कंपनियों के तिमाही नतीजों पर भी रहेगी नजर

शुक्रवार को पंजाब नेशनल बैंक (PNB), एलटीएम, बजाज हाउसिंग फाइनेंस, क्रॉम्पटन ग्रीव्स कंज्यूमर इलेक्ट्रिकल्स, डीएलएफ, फेडरल बैंक, ओबेरॉय रियल्टी, टाटा कम्युनिकेशंस, तेजस नेटवर्क्स, शॉपर्स स्टॉप और उज्जीवन स्मॉल फाइनेंस बैंक समेत कई कंपनियों के तिमाही नतीजों पर निवेशकों की नजर रहेगी.

इन कंपनियों के नतीजों में राजस्व, मुनाफे, मार्जिन और प्रबंधन के भविष्य के अनुमान महत्वपूर्ण होंगे. उम्मीद से बेहतर नतीजे शेयरों को सहारा दे सकते हैं, जबकि कमजोर प्रदर्शन या भविष्य को लेकर सतर्क टिप्पणी दबाव बढ़ा सकती है.

बाजार के लिए आज कौन से फैक्टर अहम?

बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, गुरुवार की तेजी के बाद शुक्रवार को निफ्टी के 23,000 के स्तर के आसपास कारोबार पर निवेशकों की नजर रहेगी. आईटी और बैंकिंग शेयरों में खरीदारी जारी रहने से बाजार को समर्थन मिल सकता है. इसके अलावा, कंपनियों के तिमाही नतीजे और घरेलू संस्थागत निवेशकों की खरीदारी भी अहम भूमिका निभा सकती है.

दूसरी ओर, कच्चे तेल की कीमतों में तेजी, विदेशी संस्थागत निवेशकों की बिकवाली और वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता से दबाव बन सकता है. ऐसे में निवेशकों के लिए केवल शुरुआती तेजी के आधार पर बाजार की दिशा का अनुमान लगाना पर्याप्त नहीं होगा. शेयरों में कारोबार की मात्रा, तिमाही नतीजों और खरीदारी की निरंतरता पर नजर रखना महत्वपूर्ण रहेगा.

(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)


पीएम गतिशक्ति से ₹20.23 लाख करोड़ की परियोजनाओं को रफ्तार की उम्मीद, विशेषज्ञों ने बताया विकास और निवेश पर क्या होगा असर

400 से अधिक बुनियादी ढांचा परियोजनाओं का आकलन, विशेषज्ञों के मुताबिक बेहतर कनेक्टिविटी से रियल एस्टेट, निर्माण उपकरण और निजी निवेश को मिल सकते हैं नए अवसर

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Thursday, 15 October, 2026
Last Modified:
Thursday, 15 October, 2026
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केंद्र सरकार की पीएम गतिशक्ति पहल के तहत 20.23 लाख करोड़ रुपये की लागत वाली बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को समीक्षा के दायरे में लाया गया है. इनमें से 400 परियोजनाओं का नेटवर्क प्लानिंग ग्रुप (एनपीजी) मंजूरी के लिए आकलन कर चुका है. इन परियोजनाओं में सड़क, रेलवे और अन्य बुनियादी ढांचा क्षेत्र शामिल हैं. सरकार की इस पहल का उद्देश्य विभिन्न क्षेत्रों की परियोजनाओं की योजना को एकीकृत करना, सरकारी विभागों के बीच समन्वय बढ़ाना और लॉजिस्टिक्स की लागत कम करना है.

पीएम गतिशक्ति पहल के पांच साल पूरे होने के मौके पर विशेषज्ञों ने इसे भारत में बुनियादी ढांचे की योजना बनाने के तरीके में महत्वपूर्ण बदलाव बताया है. उनके मुताबिक, डिजिटल तकनीक और विभिन्न विभागों के आंकड़ों को एक साझा मंच पर लाने से परियोजनाओं की योजना, कनेक्टिविटी और क्रियान्वयन में सुधार की संभावनाएं बढ़ी हैं. हालांकि, विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि इस पहल का वास्तविक लाभ तभी मिलेगा, जब परियोजनाएं समय पर और बेहतर गुणवत्ता के साथ पूरी होंगी तथा उनका फायदा छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंचेगा.

बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की एकीकृत योजना पर जोर

पीएम गतिशक्ति की शुरुआत 13 अक्टूबर 2021 को हुई थी. इसके तहत विभिन्न क्षेत्रों की बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की योजना और विकास को एक साझा ढांचे में लाने पर जोर दिया गया है. इस पहल के अंतर्गत 500 करोड़ रुपये से अधिक के निवेश वाली लॉजिस्टिक्स और कनेक्टिविटी संबंधी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं का नेटवर्क प्लानिंग ग्रुप आकलन करता है.

एनपीजी परियोजनाओं की योजना का मूल्यांकन पीएम गतिशक्ति के निर्धारित सिद्धांतों के आधार पर करता है. इसका उद्देश्य सरकारी विभागों और बुनियादी ढांचा क्षेत्रों के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करना है, ताकि परियोजनाओं की योजना और क्रियान्वयन में समन्वय बढ़ाया जा सके. हालांकि, 20.23 लाख करोड़ रुपये की परियोजनाओं को समीक्षा के दायरे में शामिल किए जाने का अर्थ यह नहीं है कि सभी परियोजनाओं को अंतिम मंजूरी या वित्तीय स्वीकृति मिल चुकी है.

डिजिटल प्लेटफॉर्म पर 1,800 से अधिक डेटा लेयर

पीएम गतिशक्ति के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर 1,800 से अधिक डेटा लेयर एकीकृत की गई हैं. इसमें 58 केंद्रीय मंत्रालयों और विभागों के साथ सभी 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों का डेटा शामिल है.

इस प्लेटफॉर्म पर भूमि रिकॉर्ड, बंदरगाहों, जंगलों, स्कूलों, रेलवे स्टेशनों, जल निकायों, दूरसंचार टावरों और राजमार्गों से संबंधित जानकारी उपलब्ध है. इसके अलावा, इस पहल के तहत 65 से अधिक सॉफ्टवेयर मॉड्यूल और टूल विकसित किए गए हैं तथा 100 से अधिक मोबाइल और वेब एप्लिकेशन तैयार किए गए हैं.

इन डिजिटल संसाधनों का उद्देश्य विभिन्न मंत्रालयों और विभागों के आंकड़ों को एक साझा ढांचे में उपलब्ध कराना है, जिससे परियोजनाओं की योजना बनाते समय संभावित बाधाओं का आकलन किया जा सके और बेहतर फैसले लिए जा सकें.

निर्माण उपकरण उद्योग के लिए बढ़ सकते हैं अवसर

ऐसीई-ऐक्शन कंस्ट्रक्शन इक्विपमेंट लिमिटेड के सीईओ (क्रेन्स) मनीष माथुर ने कहा, “प्रधानमंत्री गतिशक्ति के पांच साल पूरे होना भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर विकास की यात्रा में एक अहम पड़ाव है. इस सरकारी पहल से विकास परियोजनाओं की बेहतर योजना बनाने और सड़क, रेलवे व परिवहन के दूसरे साधनों को आपस में जोड़ने में मदद मिली है. इससे दूर-दराज के इलाकों तक पहुंच आसान हुई है और परियोजनाओं के काम में आने वाली रुकावटों को दूर करने में मदद मिली है. अलग-अलग विभागों के बीच बेहतर तालमेल, जमीन अधिग्रहण में तेजी और मंजूरी की प्रक्रिया आसान होने से परियोजनाओं को आगे बढ़ाना आसान हुआ है. साथ ही, पर्यावरण पर पड़ने वाले असर को कम करने की दिशा में भी काम किया गया है. ये सभी प्रयास इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास बेहतर और सतत तरीके से करने के लिए जरूरी हैं.

“हमें मंजूरी के लिए अनुशंसित 20.23 लाख करोड़ रुपये की लागत वाली 400 परियोजनाओं से काफी उम्मीदें हैं. ये परियोजनाएं देश में इंफ्रास्ट्रक्चर विकास की बड़ी संभावनाओं और निर्माण कार्यों में इस्तेमाल होने वाली मशीनों की इंडस्ट्री के लिए नए अवसरों का संकेत देती हैं. सड़क, रेलवे, लॉजिस्टिक्स और दूसरे क्षेत्रों में परियोजनाओं का काम तेज होने के साथ क्रेन, मिट्टी की खुदाई करने वाली मशीनों और सामान उठाने व एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने वाले उपकरणों की मांग बढ़ने की उम्मीद है.

“यह निर्माण मशीनों की इंडस्ट्री के लिए देश की विकास योजनाओं में योगदान देने का एक बड़ा अवसर है. भरोसेमंद, आधुनिक तकनीक से लैस और भारत में बने उपकरणों की मदद से इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं को आगे बढ़ाया जा सकता है. साथ ही, इससे 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने में भी मदद मिलेगी.”

परियोजनाओं के क्रियान्वयन और तकनीक पर ध्यान जरूरी

रोडिक कंसल्टेंट्स में रोड्स एंड हाईवेज के असिस्टेंट वाइस प्रेसिडेंट अविषेक भारद्वाज ने कहा, “पिछले पांच वर्षों में प्रधानमंत्री गतिशक्ति ने भारत में इंफ्रास्ट्रक्चर की योजना बनाने के तरीके में बड़ा बदलाव किया है. इसके तहत अलग-अलग क्षेत्रों की जानकारी, इंफ्रास्ट्रक्चर नेटवर्क और सरकारी विभागों के बीच तालमेल को एक ही डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लाया गया है. साथ ही, इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी परियोजनाओं पर बेहतर तालमेल के साथ काम करने और सही जानकारी के आधार पर फैसले लेने में मदद मिल रही है.

“नेटवर्क प्लानिंग ग्रुप की ओर से करीब 20.23 लाख करोड़ रुपये की लागत वाली 400 से अधिक इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं का मूल्यांकन किया जाना इस योजना के दायरे को दिखाता है. अब जरूरत इस बात की है कि योजना बनाने के दौरान मिलने वाले फायदों को जमीन पर भी उतारा जाए. इसके लिए परियोजनाओं की तैयारी बेहतर करनी होगी, अलग-अलग सरकारी विभागों के बीच तालमेल बढ़ाना होगा और काम को समय पर और सही तरीके से पूरा करने पर ध्यान देना होगा.

“रोडिक कंसल्टेंट्स जैसी इंजीनियरिंग सलाह देने वाली कंपनियों के लिए यह बदलाव तकनीक के बढ़ते महत्व को दिखाता है. इंजीनियरिंग के अनुभव के साथ डिजिटल तकनीक और आंकड़ों का इस्तेमाल करके परियोजनाओं की बेहतर योजना बनाई जा सकती है. रोडिक में हम तकनीक की मदद से परियोजनाओं की स्थिति पर नजर रखने, काम की प्रगति की जानकारी जुटाने, संभावित समस्याओं को समय रहते पहचानने और बेहतर फैसले लेने पर ध्यान देते हैं.

“हमारा मानना है कि भारत में इंफ्रास्ट्रक्चर का अगला दौर केवल निवेश बढ़ने से तय नहीं होगा. यह भी उतना ही जरूरी होगा कि योजना बनाने, इंजीनियरिंग, तकनीक और परियोजनाओं के प्रबंधन के बीच बेहतर तालमेल हो. इससे परियोजनाओं को अधिक कुशलता और बेहतर गुणवत्ता के साथ पूरा करने में मदद मिलेगी. साथ ही, इंफ्रास्ट्रक्चर को भविष्य की जरूरतों और चुनौतियों के लिए तैयार बनाने पर भी ध्यान दिया जा सकेगा.”

निवेशकों के लिए बढ़ सकती है जमीन और विकास परियोजनाओं में संभावनाएं

भारत वेल्थ ग्रुप के सीईओ साहिल मार्शल ने कहा, “पीएम गतिशक्ति के पांच साल ने भारत में योजना बनाने के तरीके को बदल दिया है. अब निर्माण शुरू होने से कई साल पहले ही बुनियादी ढांचे की मैपिंग एक साथ की जा रही है और इसे देखा जा सकता है. इससे निवेशकों को जमीन के मामले में वह भरोसा मिल रहा है, जो पहले उनके पास नहीं था. उन्हें यह स्पष्टता मिल रही है कि विकास किस दिशा में आगे बढ़ेगा.

“सार्वजनिक पूंजीगत व्यय लगातार भारत के सबसे मजबूत आर्थिक विकास कारकों में से एक है. इससे रोजगार पैदा होता है, लॉजिस्टिक्स की लागत कम होती है और जहां-जहां बुनियादी ढांचा पहुंचता है, वहां जमीन के मूल्य में बढ़ोतरी होती है. जब सरकार पूंजी निवेश के साथ आगे बढ़ती है, तो निजी निवेशक भी भरोसे के साथ निवेश करते हैं.

“अयोध्या इसका उदाहरण है. तीन साल से भी कम समय में हवाई अड्डे, पुनर्विकसित रेलवे स्टेशन और बेहतर सड़कों ने वहां की अर्थव्यवस्था को बदल दिया है. मुझे गर्व है कि भारत वेल्थ ग्रुप वहां जमीन में निवेश करने वाले सबसे सक्रिय निवेशकों में रहा है. हमारी तकनीक इन योजनाओं के साथ भूमि उपयोग की मंजूरियों और रजिस्ट्री के आंकड़ों का विश्लेषण करती है, ताकि बाजार में कीमत बढ़ने से पहले ही संभावित मूल्य की पहचान की जा सके. इसी तरह सरकारी नीतियां निवेशकों और जमीन मालिकों, दोनों के लिए निजी अवसर पैदा करती हैं.

“20.23 लाख करोड़ रुपये की नई मंजूरी के लिए अनुशंसित परियोजनाएं देशभर में इसी तरह के अवसर पैदा कर सकती हैं. हालांकि, यह तभी संभव होगा, जब विकास का लाभ जमीनी स्तर तक पहुंचे, छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों के जमीन मालिकों तक पहुंचे और भारत के केवल बड़े महानगरों के बजाय पूरे देश को निवेश के लिए तैयार बनाया जाए.”

बेहतर कनेक्टिविटी से रियल एस्टेट को मिल सकता है बढ़ावा

अल्फा कॉर्प डेवलपमेंट लिमिटेड के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर और सीएफओ संतोष अग्रवाल ने कहा, “पीएम गतिशक्ति पहल देश में इंफ्रास्ट्रक्चर का एक ऐसा नेटवर्क तैयार करने की दिशा में अहम कदम है, जो भारत के शहरी और आर्थिक विकास को आगे बढ़ाने में मदद करेगा. करीब 20.23 लाख करोड़ रुपये की लागत वाली 400 से अधिक इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं का मूल्यांकन इस बात को दिखाता है कि अब बेहतर योजना बनाने, परिवहन के विभिन्न साधनों के बीच कनेक्टिविटी और परियोजनाओं को सही तरीके से पूरा करने पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है.

“रियल एस्टेट सेक्टर के लिए बेहतर कनेक्टिविटी और इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास नए क्षेत्रों तक पहुंच आसान बना सकता है. इससे रेजिडेंशियल और कमर्शियल इलाकों के विस्तार को बढ़ावा मिलेगा और निवेश के नए अवसर भी पैदा हो सकते हैं. इन परियोजनाओं को समय पर पूरा करना जरूरी है, ताकि इंफ्रास्ट्रक्चर पर किए जा रहे निवेश से लंबे समय तक क्षेत्रीय विकास हो और रियल एस्टेट सेक्टर को भी लगातार आगे बढ़ने में मदद मिले.”

एम3एम इंडिया के प्रेसिडेंट रॉबिन मंगला ने कहा, “पीएम गतिशक्ति पहल के तहत इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास में तेजी लाने पर दिया जा रहा जोर भारत के रियल एस्टेट सेक्टर को बड़ा बढ़ावा दे सकता है. बेहतर कनेक्टिविटी, परिवहन नेटवर्क और इंफ्रास्ट्रक्चर की एकीकृत योजना से तेजी से विकसित हो रहे क्षेत्रों का आकर्षण बढ़ सकता है. इससे रेजिडेंशियल, कमर्शियल और इंडस्ट्रियल प्रोजेक्ट्स के लिए नए अवसर खुलेंगे.

“रियल एस्टेट सेक्टर के लिए बेहतर कनेक्टिविटी रोजगार के प्रमुख केंद्रों तक पहुंच आसान बना सकती है, शहरों के योजनाबद्ध विस्तार में मदद कर सकती है और मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर की संभावनाओं वाले क्षेत्रों में निवेशकों की दिलचस्पी बढ़ा सकती है. जैसे-जैसे अलग-अलग क्षेत्रों में कनेक्टिविटी बेहतर होगी, डेवलपर्स नए बाजारों में विस्तार के अवसर तलाश सकेंगे. वहीं, कारोबारियों को लोगों और सामान की आवाजाही अधिक आसान और बेहतर बनाने में मदद मिलेगी.

“इंफ्रास्ट्रक्चर पर आधारित यह विकास रियल एस्टेट की मांग बढ़ाने, रोजगार के नए अवसर पैदा करने और देश की आर्थिक तरक्की में योगदान देने में अहम भूमिका निभा सकता है.”

बेंगलुरु के बाहरी इलाकों में आवासीय विकास की संभावना

संजीविनी ग्रुप के मैनेजिंग डायरेक्टर सुरेश एच. ए. ने कहा, “पीएम गतिशक्ति के तहत देशभर में 20.23 लाख करोड़ रुपये की 400 से अधिक परियोजनाओं को मंजूरी की सिफारिश शहरी परिवहन और शहरों के आसपास के इलाकों के विकास को नई गति देगी. इससे आवास क्षेत्र को भी फायदा होगा.

“बेंगलुरु को भी इन परियोजनाओं से काफी लाभ मिल सकता है. शहर में बुनियादी ढांचे से जुड़ी कई बाधाओं के कारण विकास की संभावनाओं का पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा है. उपनगरीय रेल नेटवर्क, बाहरी रिंग रोड और आईटी कॉरिडोर को जोड़ने वाले एक्सप्रेसवे जैसी परियोजनाओं को प्राथमिकता मिलने से शहर के बाहरी इलाकों में नए आवासीय क्षेत्र विकसित होंगे.

“इससे डेवलपर्स को किफायती और बेहतर सुविधाओं वाली एकीकृत टाउनशिप विकसित करने का अवसर मिलेगा. साथ ही, शहर के मध्य हिस्सों में ट्रैफिक का दबाव कम होगा और लोगों को बेहतर कनेक्टिविटी के साथ अच्छी जीवनशैली का विकल्प मिलेगा.”

धोलेरा जैसे नए आर्थिक केंद्रों को मिल सकती है गति

आईजी ग्रुप के मैनेजिंग डायरेक्टर ललित परिहार ने कहा, “पीएम गतिशक्ति के तहत इन बड़ी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को मंजूरी की सिफारिश धोलेरा एसआईआर जैसे नए स्मार्ट शहरों के विकास को गति देगी. हाई-स्पीड रेल, मल्टी-मॉडल लॉजिस्टिक्स पार्क और एक्सप्रेसवे को बेहतर तरीके से जोड़ने से माल की आवाजाही आसान होगी और विनिर्माण क्षेत्र को बढ़ावा मिलेगा.

“धोलेरा के लिए इसका मतलब सिर्फ बेहतर सड़कों तक सीमित नहीं है, बल्कि औद्योगिक जमीन की मांग बढ़ने, नई विनिर्माण इकाइयां स्थापित होने और कामगारों के लिए आवास की जरूरत बढ़ने के रूप में भी सामने आएगा. इससे धोलेरा का विकास एक आधुनिक शहर की परिकल्पना से आगे बढ़कर भारत के प्रमुख और बेहतर कनेक्टिविटी वाले आर्थिक केंद्र के रूप में हो सकेगा.”

परियोजनाओं को समय पर पूरा करना अहम

विशेषज्ञों के विचारों से स्पष्ट है कि पीएम गतिशक्ति का असर केवल परिवहन और निर्माण क्षेत्र तक सीमित नहीं रहने की संभावना है. बेहतर कनेक्टिविटी से निर्माण उपकरणों की मांग, जमीन में निवेश, औद्योगिक गतिविधियों, आवासीय विकास और नए आर्थिक केंद्रों के विस्तार को भी गति मिल सकती है.

हालांकि, इन संभावनाओं को वास्तविक आर्थिक लाभ में बदलने के लिए परियोजनाओं की तैयारी, विभागों के बीच समन्वय, तकनीक के प्रभावी इस्तेमाल और समयबद्ध क्रियान्वयन पर ध्यान देना जरूरी होगा. विशेषज्ञों के मुताबिक, इस पहल की सफलता का आकलन केवल परियोजनाओं की संख्या या निवेश के अनुमान से नहीं, बल्कि इस बात से भी होगा कि बेहतर बुनियादी ढांचे का लाभ छोटे शहरों, ग्रामीण क्षेत्रों, कारोबारियों और आम लोगों तक कितना पहुंचता है.

 

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Havas Q3: भारत में कारोबार का प्रदर्शन सकारात्मक, एशिया-प्रशांत और अफ्रीका में नेट रेवेन्यू ग्रोथ 6.7% घटी

तीसरी तिमाही में Havas का नेट रेवेन्यू 703 मिलियन यूरो रहा, पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 7.2% की बढ़ोतरी

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Thursday, 15 October, 2026
Last Modified:
Thursday, 15 October, 2026
BWHindia

विज्ञापन और मार्केटिंग क्षेत्र की कंपनी Havas ने 2026 की तीसरी तिमाही में भारत में सकारात्मक प्रदर्शन जारी रखा. हालांकि, एशिया-प्रशांत और अफ्रीका क्षेत्र में कंपनी की ऑर्गेनिक नेट रेवेन्यू ग्रोथ सालाना आधार पर 6.7% घट गई. कंपनी के मुताबिक, चीन में कारोबार की सुस्ती और मध्य पूर्व में भू-राजनीतिक तनाव का असर इस क्षेत्र के प्रदर्शन पर पड़ा.

कंपनी ने बताया कि 2026 के पहले नौ महीनों में भी भारत में उसका प्रदर्शन सकारात्मक रहा. इससे क्षेत्र के अन्य बाजारों में आई कमजोरी के असर को कुछ हद तक कम करने में मदद मिली. हालांकि, Havas ने भारत के लिए अलग से विकास दर के आंकड़े जारी नहीं किए.

तीसरी तिमाही में रेवेन्यू 7.2% बढ़ा

Havas ने 2026 की तीसरी तिमाही में 703 मिलियन यूरो का नेट रेवेन्यू दर्ज किया, जो पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 7.2% अधिक है. कंपनी के अनुसार, इस दौरान उसके मीडिया और क्रिएटिव डिवीजन ने समूह के प्रदर्शन को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई.

पहले नौ महीनों के दौरान एशिया-प्रशांत और अफ्रीका क्षेत्र में ऑर्गेनिक ग्रोथ 5.5% गिर गई. कंपनी ने बताया कि क्षेत्र में आई इस गिरावट का करीब आधा हिस्सा मध्य पूर्व में कारोबार की कमजोरी से जुड़ा था, जबकि शेष गिरावट मुख्य रूप से चीन में सुस्त गतिविधियों के कारण रही. इसके बावजूद, कंपनी के मुताबिक भारत में इस अवधि के दौरान प्रदर्शन सकारात्मक बना रहा.

उत्तरी अमेरिका में सबसे ज्यादा ग्रोथ

क्षेत्रीय प्रदर्शन की बात करें तो तीसरी तिमाही में उत्तरी अमेरिका Havas का सबसे मजबूत बाजार रहा. यहां ऑर्गेनिक ग्रोथ 7.5% दर्ज की गई. कंपनी ने इसका श्रेय मीडिया और क्रिएटिव, दोनों डिवीजन के प्रदर्शन को दिया. यूरोप में कंपनी की ऑर्गेनिक ग्रोथ 1.7% रही, जबकि लैटिन अमेरिका में तिमाही के दौरान 4.3% की गिरावट दर्ज की गई.

मध्य पूर्व और चीन की सुस्ती का असर

Havas के नतीजे बताते हैं कि अलग-अलग बाजारों में कारोबार की स्थिति एक जैसी नहीं रही. जहां भारत और उत्तरी अमेरिका में प्रदर्शन सकारात्मक रहा, वहीं चीन में सुस्त गतिविधियों और मध्य पूर्व में भू-राजनीतिक तनाव ने एशिया-प्रशांत और अफ्रीका क्षेत्र के नतीजों पर दबाव डाला. कंपनी ने भारत के लिए अलग से रेवेन्यू या ग्रोथ के आंकड़े साझा नहीं किए हैं. ऐसे में देश में कारोबार की बढ़ोतरी की सटीक दर का आकलन उपलब्ध जानकारी के आधार पर नहीं किया जा सकता.

 


जामनगर क्यों जा रहे हैं अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो?

अमेरिका के शीर्ष राजनयिक अपने सबसे बड़े ग्राहक से संबंध मजबूत करने के लिए दिल्ली को दरकिनार कर रहे हैं.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Thursday, 15 October, 2026
Last Modified:
Thursday, 15 October, 2026
BWHindia

पलक शाह

ग्राहक ही सर्वोपरि है

रिलायंस के पास वह है, जिसकी वाशिंगटन को जरूरत है

पहली बार अमेरिका के विदेश मंत्री भारत आ रहे हैं, लेकिन नई दिल्ली नहीं जाएंगे. विदेश विभाग ने 13 अक्टूबर को बताया कि मार्को रुबियो 17 से 22 अक्टूबर के बीच भारत दौरे पर मुंबई और जामनगर जाएंगे. प्रकाशित कार्यक्रम में राजधानी में किसी बैठक का जिक्र नहीं है.

जामनगर कोई राजनयिक शहर नहीं है. यह मुकेश अंबानी का रिफाइनरी शहर है, जहां दुनिया का सबसे बड़ा एकल-स्थल रिफाइनिंग कॉम्प्लेक्स स्थित है. यहां प्रतिदिन करीब 14 लाख बैरल तेल का प्रसंस्करण होता है. विदेश विभाग ने इस जगह को चुनने की वजह नहीं बताई है. हालांकि, इसकी खास वजह समझने के लिए ज्यादा कुछ कहने की जरूरत नहीं है. कुछ दिन पहले ही एलन मस्क ने अंबानी को भारत का असली बॉस बताया था.

कूटनीतिक भाषा को हटाकर देखें तो गणित आसान है

रिलायंस 20 साल के अनुबंधों के तहत अमेरिका से एथेन खरीदती है. वह अमेरिका के बाहर वेनेजुएला के कच्चे तेल की सबसे बड़ी खरीदार बन गई है. यह वह तेल है, जिसकी आपूर्ति मादुरो की गिरफ्तारी के बाद से अमेरिकी नियंत्रण में रही है. ट्रंप ने टेक्सास में 300 अरब डॉलर की एक रिफाइनरी परियोजना में रिलायंस को निवेशक बताया था, जिस पर अभी निर्माण शुरू नहीं हुआ है. अब आपूर्तिकर्ता अपने ग्राहक से मिलने आ रहा है और उसे दो चीजें चाहिए: अमेरिका महाद्वीप से ज्यादा तेल की आपूर्ति और रूस से कम तेल की खरीद, साथ ही ट्रंप द्वारा घोषित रिफाइनरी परियोजना को आकार देना.

ग्राहक: रूसी तेल से वेनेजुएला के तेल की ओर

केप्लर के आंकड़ों के मुताबिक, 2024 और 2025 के बड़े हिस्से में रिलायंस दुनिया की रूसी कच्चे तेल की सबसे बड़ी खरीदार थी. रोसनेफ्ट के साथ उसके दीर्घकालिक समझौते के तहत प्रतिदिन 5 लाख बैरल तक तेल खरीदा जा सकता था.

अक्टूबर 2025 में रोसनेफ्ट और लुकोइल पर अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद रिलायंस ने अपनी निर्यात रिफाइनरी में रूसी तेल का इस्तेमाल बंद कर दिया. हालांकि, घरेलू बाजार के लिए इस्तेमाल होने वाले संयंत्र में उसने उन रूसी विक्रेताओं से तेल खरीदना जारी रखा, जिन पर प्रतिबंध नहीं थे. फरवरी 2026 से प्रतिदिन करीब 1.5 लाख बैरल तेल खरीदने की योजना थी.

वाशिंगटन जिस बदलाव की उम्मीद कर रहा है, वह पहले ही शुरू हो चुका है. अमेरिका द्वारा निकोलस मादुरो को पकड़े जाने के बाद 2026 की शुरुआत में रिलायंस को वेनेजुएला से सीधे कच्चा तेल खरीदने के लिए अमेरिकी सामान्य लाइसेंस मिला. केप्लर के अनुमान के मुताबिक, अक्टूबर में भारत का वेनेजुएला से तेल आयात करीब 4.65 लाख बैरल प्रतिदिन रहा, जो सात साल का उच्चतम स्तर है. इस तेल की हर खेप जामनगर को सेवा देने वाले बंदरगाह सिक्का पहुंच रही है.

अमेरिका के साथ ऊर्जा संबंध कच्चे तेल से कहीं आगे तक फैले हैं. 2017 से रिलायंस अपने बहुत बड़े एथेन वाहक जहाजों के बेड़े के जरिए अमेरिका से भारत में एथेन ला रही है. इसके लिए 20 साल के आपूर्ति समझौते हैं. इस तरह वह अमेरिका से एथेन की सबसे बड़ी आयातक बन गई है. पेट्रोकेमिकल कच्चे माल के मामले में रिलायंस रूस पर नहीं, बल्कि अमेरिका पर निर्भर है.

समयसीमा: 18 अक्टूबर

रुबियो ऐसे समय भारत पहुंच रहे हैं, जब अमेरिका की एक कानूनी समयसीमा कुछ ही दिन पहले तय हुई है. इसके तहत सभी भारतीय वस्तुओं पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाया जा सकता है. ट्रंप ने 18 सितंबर को ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट पर हस्ताक्षर किए थे. यह कानून रूस से कच्चा तेल या गैस खरीदने वाले पांच सबसे बड़े खरीदारों के खिलाफ 30 दिनों के भीतर कार्रवाई का निर्देश देता है.

किसी देश पर यह कानून तभी लागू होगा, जब वह 18 अक्टूबर या उसके बाद रूस से ऊर्जा उत्पादों की नई खरीद करेगा. अनौपचारिक रैंकिंग के अनुसार, रूस के कच्चे तेल के खरीदारों में भारत दूसरे स्थान पर है, जबकि चीन पहले स्थान पर है. 12 अक्टूबर तक अमेरिकी प्रशासन ने न तो लक्षित देशों की सूची प्रकाशित की थी, न ही टैरिफ की दर या किसी छूट की जानकारी दी थी.

अभी तक किसी ने यह सवाल भी नहीं उठाया है कि अमेरिका-रूस डीजल समझौते का क्या होगा. हालांकि, नीतिगत मामलों पर नजर रखने वालों का कहना है कि डीजल समझौते से भारत को स्वतः छूट नहीं मिलती. अधिकतम यह भारत को अपना पक्ष रखने का आधार दे सकता है, छूट की गारंटी नहीं.

अमेरिकी वित्त विभाग ने 9 अक्टूबर को एक अस्थायी लाइसेंस जारी किया, जिसके तहत रूसी डीजल को 7 अप्रैल, 2027 तक बेचा और आयात किया जा सकता है. इसमें अमेरिका में आयात भी शामिल है. ट्रंप ने कहा था कि रूस 3 लाख टन से अधिक डीजल की आपूर्ति करेगा. इसके बाद नवंबर में 5 लाख टन और फिर 10 लाख टन डीजल की आपूर्ति की जाएगी.

भारत पर यह नियम क्यों लागू नहीं होता: यह लाइसेंस डीजल यानी रिफाइंड उत्पाद से संबंधित है. ग्राहम एक्ट के तहत टैरिफ का आकलन केवल कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की खरीद के आधार पर होता है, डीजल जैसे रिफाइंड उत्पादों के आधार पर नहीं. भारत की चिंता कच्चे तेल की खरीद से जुड़ी है. अमेरिकी प्रशासन ने अभी तक भारत को छूट देने पर अंतिम फैसला नहीं किया है.

बचाव का रास्ता: अमेरिकी राष्ट्रपति कांग्रेस को यह प्रमाणित करने के बाद किसी भी शुल्क से छूट दे सकते हैं कि ऐसा करना अमेरिका के राष्ट्रीय हित में है. कुछ विश्लेषकों को उम्मीद है कि भारत को ऐसी छूट मिल सकती है. इसकी एक वजह यह है कि भारत की कच्चे तेल की खरीद पर अभी दंडात्मक कार्रवाई करने से डीजल की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है. इससे उस बाजार पर असर पड़ेगा, जिसे व्हाइट हाउस शांत रखने की कोशिश कर रहा है.

फरवरी में भारत पर टैरिफ 50 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया गया था. इसकी एक वजह यह संकेत भी था कि भारत रूसी कच्चे तेल की खरीद बंद कर देगा. हालांकि, द्विपक्षीय व्यापार समझौता अब भी अटका हुआ है. ऐसे में रिलायंस के कच्चे तेल की खरीद के विकल्प भारत के लिए बातचीत का सबसे स्पष्ट आधार बन गए हैं. रूस से आने वाली हर खेप, जिसे वेनेजुएला या अमेरिकी तेल से बदला जाता है, वह सबूत है जिसे नई दिल्ली बातचीत की मेज पर रख सकती है.

300 अरब डॉलर की रिफाइनरी, जिसकी किसी ने पुष्टि नहीं की

मार्च 2026 में ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर टेक्सास के पोर्ट ऑफ ब्राउन्सविले में अमेरिका फर्स्ट रिफाइनिंग द्वारा रिफाइनरी स्थापित करने की घोषणा की थी. उन्होंने निवेश के लिए रिलायंस को धन्यवाद देते हुए इसे 300 अरब डॉलर का सौदा बताया था. रिलायंस ने इसमें अपनी भूमिका या निवेश के पैमाने की औपचारिक पुष्टि नहीं की है.

यह सुर्खियों में बताई गई रकम निर्माण लागत नहीं है. परियोजना विकसित करने वाली कंपनी के अनुसार, इसमें अगले करीब 20 वर्षों में 125 अरब डॉलर का अमेरिकी शेल कच्चा तेल खरीदना और 175 अरब डॉलर का ईंधन उत्पादन शामिल है. परियोजना की डेवलपर कंपनी एलिमेंट फ्यूल्स ने इससे पहले निर्माण लागत 3 से 4 अरब डॉलर बताई थी.

इस सौदे के साथ राजनीतिक विवाद भी जुड़ा है. प्रोपब्लिका ने जून में रिपोर्ट दी थी कि डोनाल्ड ट्रंप जूनियर की इस परियोजना में हिस्सेदारी थी और उन्होंने निवेश से पहले नवंबर 2025 में भारत में अनंत अंबानी से मुलाकात की थी. व्हाइट हाउस ने प्रोपब्लिका से कहा था कि हितों के टकराव का कोई मामला नहीं था. रिलायंस ने भी कहा था कि उसे कोई विशेष तरजीह नहीं मिली.

दौरे की योजना से परिचित लोगों का कहना है कि वाशिंगटन चाहता है कि रिलायंस ब्राउन्सविले परियोजना में अपने निवेश की एक निश्चित रकम बताए. अमेरिका में इस तरह के बड़े निवेश की घोषणा पहले एस्सार भी कर चुका है. जामनगर का दौरा इस मुद्दे को उठाने के लिए स्वाभाविक जगह है.

बीच की कड़ी

योजना से परिचित लोगों के मुताबिक, जामनगर दौरे की व्यवस्था एमपीएच होल्डिंग के चेयरमैन अंशुमान मिश्रा ने की है. मिश्रा की तस्वीरें पहले भी मुकेश अंबानी, एलन मस्क और डोनाल्ड ट्रंप के साथ आयोजनों में सामने आ चुकी हैं.

वह दोनों पक्षों के लिए नए नहीं हैं. फाइनेंशियल टाइम्स ने उन्हें पूर्व बैंकर और अंबानी के विश्वासपात्र के रूप में वर्णित किया है, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय मामलों में अंबानी को सलाह दी. हिंदुस्तान टाइम्स ने उन्हें ऐसे व्यक्ति के रूप में पेश किया है, जो वित्त, रणनीतिक परामर्श और मीडिया के क्षेत्र में लंदन, लॉस एंजिलिस और मुंबई के बीच काम करते हैं और जिनके जेरेड कुशनर से भी संबंध हैं.

ट्रंप प्रशासन तक उनकी पहुंच सार्वजनिक है. अगस्त 2025 में जब ट्रंप ने डोनाल्ड ट्रंप जूनियर के साथ एक प्रकाशन गृह के सह-संस्थापक सर्जियो गोर को भारत में अमेरिकी राजदूत नामित किया था, तब मिश्रा ने इस चयन की सराहना की और गोर को अपना मित्र बताया था.

वह उस जगह पर हैं, जहां भारतीय पूंजी और ट्रंप का वाशिंगटन एक-दूसरे से मिलते हैं. अंबानी परिवार इस संपर्क को मजबूत करने के लिए वर्षों से काम कर रहा है.

मुकेश और नीता अंबानी को जनवरी 2025 में ट्रंप के शपथ ग्रहण समारोह में मंच के पास सीट मिली थी और वे उससे एक रात पहले आयोजित कैंडललाइट डिनर में भी शामिल हुए थे. मई 2025 में अंबानी ट्रंप के सम्मान में कतर के अमीर द्वारा आयोजित राजकीय रात्रिभोज में शामिल होने के लिए दोहा गए थे. द न्यू रिपब्लिक ने प्रोपब्लिका का हवाला देते हुए रिपोर्ट दी थी कि रिलायंस की एक इकाई ने 2024 में ट्रंप ऑर्गनाइजेशन को एक ऐसी परियोजना के लिए 1 करोड़ डॉलर का विकास शुल्क दिया था, जिसकी कभी घोषणा नहीं हुई.

बातचीत की मेज पर दो मांगें

इन लोगों के मुताबिक, जामनगर दौरे का एजेंडा दो मांगों तक सीमित है. पहली, ग्राहम एक्ट के तहत टैरिफ लागू होने से पहले रिलायंस रूसी कच्चे तेल से दूरी बढ़ाकर वेनेजुएला के तेल की खरीद बढ़ाए. दूसरी, कंपनी अमेरिका में बड़े और स्पष्ट निवेश की घोषणा करे. ब्राउन्सविले परियोजना इसके लिए सबसे स्वाभाविक विकल्प है.

दौरे में वंतारा शामिल नहीं

दौरे से संबंधित आंतरिक निर्देशों में कहा गया है कि रुबियो को जामनगर स्थित वंतारा नहीं ले जाया जाना चाहिए. वंतारा अंबानी परिवार का पशु बचाव और वन्यजीव केंद्र है. योजना से परिचित लोगों ने यह जानकारी दी.

यह निर्देश प्रोपब्लिका की उस रिपोर्ट के बाद आया है, जिसमें बताया गया था कि डोनाल्ड ट्रंप जूनियर ने नवंबर 2025 में भारत दौरे के दौरान अनंत अंबानी के साथ परिवार के निजी चिड़ियाघर का दौरा किया था. यह यात्रा टेक्सास की रिफाइनरी परियोजना की घोषणा से कई महीने पहले हुई थी.

मुंबई में जयशंकर से मुलाकात

कार्यक्रम की जानकारी रखने वाले लोगों के अनुसार, विदेश मंत्री एस. जयशंकर मुंबई में रुबियो से मुलाकात करेंगे. विदेश मंत्रालय ने अभी तक इस बैठक की घोषणा नहीं की है. नई दिल्ली के लिए बातचीत का मुख्य मुद्दा अटका हुआ व्यापार समझौता और 100 प्रतिशत टैरिफ का खतरा है. रिलायंस के कच्चे तेल की खरीद से जुड़े फैसले भारत का सबसे मजबूत पक्ष हैं. वहीं, रुबियो ऐसे समय आ रहे हैं, जब अमेरिका खुद भी रूस से ईंधन खरीद रहा है. इससे जयशंकर के साथ बैठक में भारत की स्थिति मजबूत होती है.

नई दिल्ली व्यापार समझौता चाहती है. वाशिंगटन को कच्चे तेल की आपूर्ति और एक रिफाइनरी चाहिए. रिलायंस के पास दोनों हैं. यही वजह है कि दुनिया का सबसे शक्तिशाली राजनयिक सौराष्ट्र के एक रिफाइनरी शहर की यात्रा कर रहा है.

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(BW रिपोर्टर्स पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free की लेखिका हैं. यह एक तीखा खुलासा है, जिसने भारत के वित्तीय बाजारों के छिपे हुए पक्ष को सामने लाया. मुंबई में करीब दो दशकों की जमीनी रिपोर्टिंग के साथ पलक ने पैसे, सत्ता और नियमन के बीच के गठजोड़ की गहराई से पड़ताल करने वाले पत्रकार के रूप में पहचान बनाई है. उनके लेख भारत के प्रतिष्ठित वित्तीय दैनिकों, जिनमें The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line शामिल हैं, में प्रकाशित हुए हैं.

19 वर्ष की उम्र में अपराध रिपोर्टिंग की ओर आकर्षित हुईं पलक ने जल्द ही महसूस किया कि 1980 के दशक के मुंबई के गैंग युद्धों की जगह अब कॉरपोरेट टावरों में चलने वाली सफेदपोश योजनाओं ने ले ली है. इस समझ ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने भारत की ‘व्हाइट मनी’ अर्थव्यवस्था की जटिल गतिविधियों को समझने में वर्षों बिताए हैं. शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामकीय खामियों तक, उनका काम हाई फाइनेंस की चमकदार सतह के पीछे छिपे उन समूहों को सामने लाता है जो पर्दे के पीछे से फैसलों को प्रभावित करते हैं. सच्चाई सामने लाने का उनका जुनून और उन कड़ियों को जोड़ने की क्षमता, जिन्हें दूसरे नजरअंदाज कर देते हैं, उन्हें एक मजबूत पत्रकार बनाती है, जो यथास्थिति को चुनौती देने और उन खिलाड़ियों को बेनकाब करने से नहीं डरतीं जो खुद को कानून से ऊपर समझते हैं.)