द अंबानी इंडेक्स

जियो की लिस्टिंग के बाद एक परिवार निफ्टी के सातवें हिस्से और सेंसेक्स के छठे हिस्से को प्रभावित करने की क्षमता रखेगा. वहीं, अधिक संपत्ति के मालिक अडानी की हिस्सेदारी इन सूचकांकों में महज 2 फीसदी है.

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Tuesday, 27 October, 2026
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पलक शाह

तेल, डेटा, बंदरगाह: भारत पर नियंत्रण की लड़ाई

आज रात मुकेश अंबानी और गौतम अडानी बराबरी पर हैं. कल जियो इस बराबरी को खत्म कर देगा. लेकिन भारत के दो सबसे अमीर परिवारों के बीच असली लड़ाई नियंत्रण को लेकर है: बाजार के स्कोरबोर्ड पर नियंत्रण और उन भौतिक महत्वपूर्ण केंद्रों पर नियंत्रण, जिनके जरिए अर्थव्यवस्था चलती है. दोनों मोर्चों पर अंबानी की स्थिति अमीरों की सूची से मिलने वाले संकेतों से ज्यादा मजबूत है.

बराबरी की टक्कर

भारत के अब तक के सबसे बड़े आईपीओ की पूर्व संध्या पर दोनों कारोबारी साम्राज्यों का आकार लगभग एक जैसा है. रिलायंस इंडस्ट्रीज (16.1 लाख करोड़ रुपये) और जियो फाइनेंशियल (1.5 लाख करोड़ रुपये) को मिलाकर अंबानी की सूचीबद्ध कंपनियों का मूल्य लगभग 17.6 लाख करोड़ रुपये है. अडानी की सूचीबद्ध कंपनियों का कुल मूल्य लगभग 17 लाख करोड़ रुपये है.

जियो की लिस्टिंग से यह संतुलन बदल जाएगा. उम्मीद है कि सुर्खियों में अंबानी के 30 लाख करोड़ रुपये के कारोबारी साम्राज्य का जिक्र होगा. इस आंकड़े में जियो की गिनती दो बार होती है: रिलायंस के पास जियो की 64.48% हिस्सेदारी है और यह हिस्सेदारी पहले से ही रिलायंस के शेयरों की कीमत में शामिल है. जियो को एक बार गिनने पर, ग्रे मार्केट की कीमत के आधार पर अंबानी का सूचीबद्ध कारोबारी साम्राज्य बढ़कर लगभग 22 लाख करोड़ रुपये हो जाता है. इस तरह अडानी पर उनकी बढ़त 4-5 लाख करोड़ रुपये की होगी.

अंबानी के पास बाजार का स्कोरबोर्ड

रिलायंस पहले से ही दोनों प्रमुख सूचकांकों में सबसे अधिक भार वाला शेयर है: निफ्टी 50 में 8.94% और सेंसेक्स में 11.06%. जियो फाइनेंशियल को जोड़ने पर अंबानी समूह की हिस्सेदारी निफ्टी में लगभग 9.6% हो जाती है.

जियो के आने से यह हिस्सेदारी और बढ़ जाएगी. इसके शेयरों के पूरी तरह कारोबार योग्य होने के बाद, यह समूह निफ्टी में लगभग 14% और सेंसेक्स में 16% भार रख सकता है. भारत के प्रमुख बाजार सूचकांकों में किसी भी परिवार की इतनी बड़ी हिस्सेदारी नहीं रही है. यह एचडीएफसी बैंक से भी अधिक होगी, जिसका कोई प्रमोटर नहीं है.

बाजार में भार का मतलब ताकत है. हर इंडेक्स फंड और एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ETF) को इसी अनुपात में शेयर खरीदने पड़ते हैं. कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO), जो इक्विटी में निवेश केवल निफ्टी और सेंसेक्स ईटीएफ के जरिए करता है, आज हर 100 रुपये में से लगभग 10 रुपये रिलायंस में लगाता है. जियो को पूरी तरह शामिल करने पर यह राशि लगभग 15 रुपये हो जाएगी. इस समूह के शेयरों में 1% का बदलाव सेंसेक्स को लगभग 120 अंक तक प्रभावित कर सकता है.

लेकिन कल से नहीं

सूचकांकों में किसी शेयर का भार केवल उन शेयरों के आधार पर तय होता है, जिनका बाजार में कारोबार हो सकता है. लिस्टिंग के दिन जियो के केवल 2.93% शेयर ही कारोबार के लिए उपलब्ध होंगे, जिनका मूल्य लगभग 30,000-37,000 करोड़ रुपये होगा. रिलायंस की हिस्सेदारी की गिनती कभी नहीं होती और बाकी हिस्सेदारी का बड़ा हिस्सा, जो मेटा, गूगल और 2020 के निवेशकों के पास है, छह महीने तक लॉक-इन में रहेगा.

इस वजह से फिलहाल जियो दोनों सूचकांकों से बाहर रहेगा. सितंबर में बीएसई लिमिटेड को निफ्टी में शामिल होने के लिए लगभग 1.41 लाख करोड़ रुपये के फ्री फ्लोट की जरूरत थी, जो जियो के मौजूदा कारोबार योग्य शेयरों के मूल्य से चार गुना अधिक है. नियमों के मौजूदा प्रावधानों को देखते हुए, 2027 के मध्य से लेकर आखिरी महीनों तक जियो के सूचकांकों में शामिल होने की संभावना है.

इसके बाद भी 14% हिस्सेदारी प्रभाव तो है, लेकिन नियंत्रण नहीं. प्रमोटर अपने शेयरों का कारोबार करके सूचकांक को अपनी दिशा में नहीं मोड़ सकते और निफ्टी में अब भी बैंकों की हिस्सेदारी लगभग पांचवां हिस्सा है. सितंबर में नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) के सूचकांक में बदलाव के दौरान रिलायंस का भार वास्तव में घटा दिया गया था.

अंबानी का महत्वपूर्ण केंद्र: जामनगर

अंबानी के पास देश की सबसे रणनीतिक भौतिक संपत्तियों में से एक भी है. जामनगर दुनिया की सबसे बड़ी एकल-स्थान वाली रिफाइनरी है, जहां प्रतिदिन लगभग 12.4 लाख से 14 लाख बैरल कच्चे तेल का प्रसंस्करण होता है. सालाना लगभग 6.8 करोड़ टन की क्षमता के साथ यह भारत की कुल रिफाइनिंग क्षमता का लगभग एक चौथाई हिस्सा है. यह डीजल और अन्य ईंधनों का एक बड़ा निर्यातक भी है.

इस संपत्ति का भू-राजनीतिक महत्व है.

पिछले बुधवार को अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो तीन दिन की भारत यात्रा पर जामनगर पहुंचे और अंबानी परिवार से मुलाकात की. उनकी इस यात्रा में नई दिल्ली को पूरी तरह छोड़ दिया गया. बातचीत में ऊर्जा आपूर्ति, डेटा सेंटरों के लिए बिजली और रिलायंस द्वारा वेनेजुएला के कच्चे तेल के प्रसंस्करण जैसे मुद्दे शामिल थे. आलोचकों ने इसे कूटनीतिक इतिहास की पहली ऐसी घटना बताया. वजह चाहे जो भी हो, वॉशिंगटन जामनगर पहुंचा.

इससे कुछ दिन पहले एलन मस्क ने एक्स पर अंबानी का मजाक उड़ाते हुए उन्हें “प्रधानमंत्री अंबानी” यानी भारत का असली बॉस कहा था. मस्क नाराज थे क्योंकि भारत में स्टारलिंक की शुरुआत में देरी हो रही थी. इसके बावजूद अमेरिका के शीर्ष राजनयिक जामनगर पहुंचे. दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति ने तंज कसा और वॉशिंगटन ने जवाब में वहां जाकर मुलाकात की.

जियो के नेटवर्क को भी इसमें जोड़ें, जिसके पास भारत के लगभग 39% मोबाइल ग्राहक हैं और जो 5G होम ब्रॉडबैंड का लगभग 70% हिस्सा संभालता है, तो अंबानी अर्थव्यवस्था की दो महत्वपूर्ण पाइपलाइनों को नियंत्रित करते हैं: ईंधन और डेटा, और जल्द ही बिजली भी.

अगला मोर्चा सौर ऊर्जा का है. कच्छ में अडानी के 30 गीगावाट क्षमता वाले खावड़ा पार्क के पास, जिसे पहले ही दुनिया का सबसे बड़ा नवीकरणीय ऊर्जा संयंत्र बताया जा रहा है, रिलायंस लगभग 5.5 लाख एकड़ जमीन पर नवीकरणीय ऊर्जा पार्क विकसित करने की तैयारी कर रहा है. इसकी क्षमता भविष्य में 100 गीगावाट तक पहुंच सकती है. इसे जामनगर में रिलायंस की गीगा फैक्ट्रियों से ऊर्जा उपकरणों की आपूर्ति मिलेगी. जमीन पर अडानी कई साल आगे हैं और उनकी लगभग 9-11 गीगावाट क्षमता पहले से चालू है. लेकिन कागजों पर अंबानी उसी क्षेत्र में उनसे बड़ा प्रोजेक्ट बनाने की योजना बना रहे हैं, जिसे अडानी अपना मजबूत क्षेत्र मानते हैं.

अडानी की पाइपलाइन: बंदरगाह, बिजली, हवाई अड्डे

अडानी की निफ्टी में हिस्सेदारी मुश्किल से 2% है, जो अडानी पोर्ट्स और अडानी एंटरप्राइजेज के जरिए आती है. सेंसेक्स में केवल अडानी पोर्ट्स शामिल है. सेंसेक्स में शामिल उनके शेयरों में 1% का बदलाव सूचकांक को लगभग 9 अंक तक प्रभावित करता है.

लेकिन उनकी असली ताकत भौतिक बुनियादी ढांचे में है. वित्त वर्ष 2026 में उनके बंदरगाहों ने भारत के कुल माल ढुलाई का 27.1% और कंटेनर कारोबार का लगभग 45% हिस्सा संभाला. अडानी पावर देश की सबसे बड़ी निजी ताप विद्युत उत्पादक कंपनी है. अंबुजा देश की दूसरी सबसे बड़ी सीमेंट निर्माता कंपनी है. वह मुंबई के हवाई अड्डे और नए नवी मुंबई हवाई अड्डे का संचालन भी करते हैं. सूचकांकों में किसी भी बदलाव से इन संपत्तियों पर उनका नियंत्रण खत्म नहीं हो सकता.

कम में ज्यादा, ज्यादा में कम

अंबानी के पास ज्यादा कंपनियों में कम हिस्सेदारी है. अडानी के पास कम कंपनियों में ज्यादा हिस्सेदारी है.

मापदंड                                                                         अंबानी                                                                          अडानी                                                              
27 अक्टूबर को सूचीबद्ध कंपनियों का मूल्य               लगभग 17.6 लाख करोड़ रुपये                                              लगभग 17 लाख करोड़ रुपये                                            
जियो की लिस्टिंग के बाद, दोहरी गिनती हटाकर        लगभग 22 लाख करोड़ रुपये                                                  लगभग 17 लाख करोड़ रुपये                                            
नेटवर्थ (ब्लूमबर्ग, 26 अक्टूबर)                                79.3 अरब डॉलर                                                                 102 अरब डॉलर                                                       
प्रमोटर हिस्सेदारी                                                 रिलायंस इंडस्ट्रीज में लगभग 50%                                           प्रमुख कंपनियों में लगभग 65-75%                                    

निफ्टी 50 में भार                                                 9.6%, जियो के साथ लगभग 14% तक                                     लगभग 2%                                                            
सेंसेक्स में भार                                                    11.1%, जियो के साथ लगभग 16% तक                                    लगभग 1.2%                                                          
भौतिक महत्वपूर्ण केंद्र                                      भारत की लगभग 25% रिफाइनिंग क्षमता; लगभग 39% मोबाइल उपयोगकर्ता  बंदरगाहों के कुल माल का लगभग 27%; सबसे बड़ी निजी ताप विद्युत कंपनी 

कम सूचकांक हिस्सेदारी वाला व्यक्ति अमीरों की सूची में सबसे ऊपर क्यों है? इसकी वजह है स्वामित्व.

अडानी परिवार के पास अडानी पावर की लगभग 75% और अडानी पोर्ट्स व अडानी एंटरप्राइजेज की दो-तिहाई से तीन-चौथाई हिस्सेदारी है. रिलायंस के प्रमोटरों के पास लगभग 50% हिस्सेदारी है.

इसलिए अडानी की 102 अरब डॉलर की संपत्ति उनके समूह के कुल बाजार मूल्य का लगभग 57% है. वहीं, अंबानी की 79.3 अरब डॉलर की संपत्ति उनके समूह के बाजार मूल्य का लगभग 43% है. अधिक हिस्सेदारी का मतलब है बाजार में कारोबार के लिए कम शेयर और सूचकांकों में कम भार, लेकिन प्रत्येक रुपये के बाजार मूल्य के मुकाबले अधिक व्यक्तिगत संपत्ति.

अंबानी के पास ज्यादा कंपनियों में कम हिस्सेदारी है. अडानी के पास कम कंपनियों में ज्यादा हिस्सेदारी है.

असली सवाल

बाजार के स्कोरबोर्ड पर नियंत्रण से ऐसे खरीदार मिलते हैं, जिन्हें निवेश करना ही होता है. इससे बेहतर गिरवी संपत्ति और सस्ती पूंजी हासिल करने में भी मदद मिलती है. वहीं, बुनियादी ढांचे पर नियंत्रण का मतलब है कि अर्थव्यवस्था को उनकी सेवाओं की जरूरत है.

हालांकि, दोनों की अपनी सीमाएं हैं. बाजार में कारोबार के लिए कम शेयर उपलब्ध होने से उतार-चढ़ाव बढ़ जाता है. मई के बाद से अडानी समूह के बाजार मूल्य में लगभग 3 लाख करोड़ रुपये की गिरावट आई है. वहीं, बाजार में किसी एक समूह का अधिक संकेंद्रण दोनों तरह से असर डाल सकता है. अगर किसी एक परिवार की कंपनियों का भार प्रमुख सूचकांकों के सातवें हिस्से तक पहुंच जाए, तो उस परिवार के लिए एक खराब सप्ताह भारत में हर एसआईपी और भविष्य निधि खाते के लिए भी खराब सप्ताह बन सकता है.

कल की लिस्टिंग अंबानी को भारत के बाजार के स्कोरबोर्ड पर सबसे अधिक भार वाला समूह बना देगी और जामनगर पहले से ही उन्हें ऐसा कारोबारी बना चुका है, जिससे मिलने वॉशिंगटन आता है.

अडानी के पास परिवहन और बिजली ग्रिड का बड़ा हिस्सा है और अपनी कंपनियों पर भी उनका अधिक स्वामित्व है.

एक कारोबारी साम्राज्य ईंधन, डेटा और सूचकांक पर हावी है, जबकि दूसरा बंदरगाहों, बिजली और अमीरों की सूची में दबदबा रखता है. भारत पर नियंत्रण की लड़ाई इन सभी मोर्चों पर लड़ी जा रही है.

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स 

पलक शाह अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और द मार्केट माफिया: क्रॉनिकल ऑफ इंडियाज हाई-टेक स्टॉक मार्केट स्कैंडल एंड द कैबल दैट वेंट स्कॉट-फ्री के लेखक हैं. यह पुस्तक भारत के वित्तीय बाजारों के अंधेरे पहलुओं को उजागर करते हैं. मुंबई में करीब दो दशक तक जमीनी स्तर पर रिपोर्टिंग करने वाले पलक ने धन, सत्ता और नियमन के बीच के गठजोड़ की पड़ताल की है. उनके लेख भारत के प्रमुख वित्तीय समाचार पत्रों, जिनमें द इकोनॉमिक टाइम्स, बिजनेस स्टैंडर्ड, द फाइनेंशियल एक्सप्रेस और द हिंदू बिजनेस लाइन शामिल हैं, में प्रकाशित हुए हैं. 19 वर्ष की उम्र में अपराध रिपोर्टिंग की ओर आकर्षित हुए पलक ने जल्द ही महसूस किया कि 1980 के दशक में मुंबई की गैंगवार की जगह संगठित अपराध के अधिक परिष्कृत रूप ने ले ली है. इसमें कॉरपोरेट इमारतों के भीतर चलने वाली सफेदपोश वित्तीय धोखाधड़ी शामिल है. इसी अनुभव ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित किया, जहां उन्होंने भारत की 'सफेद धन' अर्थव्यवस्था की जटिल कार्यप्रणाली को समझने में वर्षों बिताए हैं. शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामकीय खामियों तक, उनका काम वित्तीय दुनिया की चमकदार सतह के पीछे काम करने वाले समूहों को उजागर करता है. सच सामने लाने का उनका जुनून और उन कड़ियों को जोड़ने की क्षमता, जिन्हें दूसरे लोग नजरअंदाज कर देते हैं, उन्हें भारतीय पत्रकारिता में एक ऐसी प्रभावशाली आवाज बनाती है जो यथास्थिति को चुनौती देने और खुद को कानून से ऊपर समझने वालों को बेनकाब करने से नहीं हिचकती.


BS-VII के नए नियमों में सिर्फ धुआं नहीं, ब्रेक और टायर से होने वाले प्रदूषण पर भी रहेगी नजर: रिपोर्ट

रिपोर्ट के अनुसार, हल्के मालवाहक वाहनों के लिए अप्रैल 2030 और बसों-ट्रकों के लिए अप्रैल 2031 से लागू करने का प्रस्ताव, कारें और दोपहिया वाहन फिलहाल दायरे से बाहर.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Tuesday, 27 October, 2026
Last Modified:
Tuesday, 27 October, 2026
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भारत में वाहनों से होने वाले प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए प्रस्तावित भारत स्टेज-7 (BS-VII) मानक अब केवल इंजन और एग्जॉस्ट से निकलने वाले धुएं तक सीमित नहीं रहेंगे. सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय की ओर से जारी मसौदा नियमों में ब्रेक से निकलने वाली धूल, टायरों की घिसावट, इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरी की क्षमता और वाहन के लंबे समय तक प्रदूषण मानकों पर खरा उतरने जैसे पहलुओं को भी शामिल किया गया है. इन प्रस्तावों के लागू होने पर वाहनों के प्रदूषण का आकलन केवल प्रयोगशाला में किए गए परीक्षण के आधार पर नहीं, बल्कि सड़क पर उनके वास्तविक प्रदर्शन और इस्तेमाल की अवधि के दौरान भी किया जाएगा.

RedLab की रिपोर्ट के मुताबिक, BS-VII के मसौदा नियमों में हल्के मालवाहक वाहनों के लिए 1 अप्रैल 2030 और बसों तथा मध्यम एवं भारी मालवाहक वाहनों के लिए 1 अप्रैल 2031 से नए प्रावधान लागू करने का प्रस्ताव है. हालांकि, ये अभी मसौदा नियम हैं और सार्वजनिक परामर्श के बाद इनमें बदलाव हो सकता है. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कारों के लिए अप्रैल 2029 से BS-VII के अलग प्रस्ताव की चर्चा हुई है, लेकिन इसकी पुष्टि नहीं हो सकी है. दोपहिया वाहन फिलहाल इन मसौदों के दायरे में शामिल नहीं हैं.

पहली बार ब्रेक से निकलने वाली धूल पर भी सीमा

वाहनों के ब्रेक लगाने पर ब्रेक पैड और डिस्क के घिसने से बारीक कण निकलते हैं. ये कण हवा में फैल सकते हैं और सांस के जरिए शरीर में प्रवेश कर सकते हैं. अब तक भारत के भारत स्टेज उत्सर्जन मानकों में ब्रेक डस्ट के लिए ऐसी सीमा निर्धारित नहीं थी.

प्रस्तावित नियमों के तहत हल्के मालवाहक वाहनों में ब्रेक से निकलने वाले कणों पर अप्रैल 2032 से सीमा लगाने की तैयारी है. रिपोर्ट के अनुसार, शुरुआती चरण में अलग-अलग श्रेणियों के वाहनों और उनके वजन के आधार पर यह सीमा 3 से 11 मिलीग्राम प्रति किलोमीटर तक होगी. इसके बाद 1 अप्रैल 2035 से सभी पावरट्रेन के लिए 3 मिलीग्राम प्रति किलोमीटर की समान सीमा प्रस्तावित है.

इसका मतलब है कि पेट्रोल, डीजल और अन्य ईंधन से चलने वाले वाहनों के साथ इलेक्ट्रिक वाहनों को भी ब्रेक से होने वाले प्रदूषण के नियमों का पालन करना होगा. इलेक्ट्रिक वाहनों में रीजनरेटिव ब्रेकिंग के कारण सामान्य ब्रेक का इस्तेमाल कम हो सकता है, लेकिन इससे ब्रेक डस्ट का उत्सर्जन पूरी तरह समाप्त नहीं होता.

बसों और ट्रकों के लिए ब्रेक उत्सर्जन की सीमाएं बाद के चरणों में निर्धारित करने का प्रस्ताव है. हालांकि, इनके लिए अंतिम आंकड़े अभी स्पष्ट नहीं हैं.

टायरों की घिसावट पर नियम, लेकिन सीमा तय नहीं

वाहनों के टायर सड़क पर चलते समय धीरे-धीरे घिसते हैं. इससे निकलने वाले रबर और अन्य पदार्थ सड़क की धूल में मिल जाते हैं और बारिश के पानी के साथ नालियों, मिट्टी तथा जलस्रोतों तक पहुंच सकते हैं. इनके कुछ बारीक कण हवा में भी फैल सकते हैं. इस तरह टायरों की घिसावट वायु प्रदूषण और माइक्रोप्लास्टिक से जुड़ी एक चिंता है.

BS-VII के मसौदे में टायरों की घिसावट को नियंत्रित करने के लिए परीक्षण का प्रावधान किया गया है. हल्के मालवाहक वाहनों में इस्तेमाल होने वाले C1 श्रेणी के टायरों के लिए 1 अप्रैल 2032 और बसों तथा ट्रकों में इस्तेमाल होने वाले C2 और C3 श्रेणी के टायरों के लिए 1 अप्रैल 2035 से नियम प्रस्तावित हैं.

हालांकि, टायरों की घिसावट की अधिकतम स्वीकार्य सीमा और परीक्षण से जुड़े कुछ विवरण अलग से अधिसूचित किए जाने हैं. इसलिए अभी यह स्पष्ट नहीं है कि टायर निर्माताओं को किन अंतिम मानकों का पालन करना होगा.

एक अन्य सवाल यह है कि क्या ये नियम केवल नए वाहनों के साथ लगाए जाने वाले टायरों पर लागू होंगे या बाद में बदले जाने वाले टायरों पर भी समान शर्तें लागू होंगी. मसौदे में इस बारे में स्पष्टता नहीं है.

इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरी की क्षमता पर भी नजर

प्रस्तावित BS-VII नियमों में इलेक्ट्रिक और प्लग-इन हाइब्रिड हल्के मालवाहक वाहनों की बैटरी की क्षमता को लेकर भी न्यूनतम मानक निर्धारित किए गए हैं.

मसौदे के मुताबिक, ऐसे वाहनों की बैटरी को पांच साल या एक लाख किलोमीटर चलने तक अपनी मूल क्षमता का कम से कम 75 फीसदी बनाए रखना होगा. वहीं, आठ साल या 1.6 लाख किलोमीटर के बाद बैटरी की क्षमता कम से कम 67 फीसदी रहने का प्रस्ताव है.

उदाहरण के लिए, 40 किलोवाट-घंटे (kWh) की बैटरी को पांच साल या एक लाख किलोमीटर के बाद कम से कम 30 kWh और आठ साल या 1.6 लाख किलोमीटर के बाद कम से कम 26.8 kWh क्षमता बनाए रखनी होगी.

हालांकि, ये प्रावधान फिलहाल प्रस्तावित श्रेणियों के इलेक्ट्रिक और प्लग-इन हाइब्रिड वैन के लिए हैं. बसों और ट्रकों की बैटरी क्षमता को लेकर नियम बाद के चरणों में लाने का प्रस्ताव है. मसौदे में बैटरी वारंटी की शर्तों को लेकर स्पष्ट प्रावधान नहीं है.

सड़क पर भी होगी उत्सर्जन की जांच

BS-VII के तहत वाहनों को केवल प्रयोगशाला में उत्सर्जन परीक्षण पास करना पर्याप्त नहीं होगा. प्रस्तावित नियमों में वास्तविक सड़क परिस्थितियों में भी वाहनों के उत्सर्जन की जांच और उनकी उपयोग अवधि के दौरान मानकों के अनुपालन की व्यवस्था शामिल है.

रिपोर्ट के अनुसार, हल्के मालवाहक वाहनों के लिए उत्सर्जन मानकों के अनुरूप प्रदर्शन बनाए रखने की अवधि को चरणबद्ध तरीके से बढ़ाने का प्रस्ताव है. सबसे भारी ट्रकों और बसों के लिए भी लंबी अवधि तक प्रदूषण नियंत्रण प्रणालियों के प्रभावी रहने की शर्तें रखी गई हैं.

प्रस्तावित प्रावधानों के अनुसार, हल्के मालवाहक वाहनों को शुरुआती चरण में दो लाख किलोमीटर या 10 साल तक निर्धारित शर्तों के तहत उत्सर्जन मानकों पर खरा उतरना होगा. सबसे भारी ट्रकों और बसों के लिए यह अवधि आगे चलकर 8.75 लाख किलोमीटर या 15 साल तक हो सकती है.

वाहनों में लगे मॉनिटर उत्सर्जन के आंकड़ों पर नजर रखेंगे. प्रस्ताव में ईंधन और बिजली की खपत तथा भारी वाहनों के मामले में उनके भार से जुड़ी जानकारी दर्ज करने की व्यवस्था भी शामिल है. हल्के मालवाहक वाहनों के लिए 2032 और भारी वाहनों के लिए 2033 से कुछ आंकड़े वायरलेस माध्यम से गुमनाम रूप में भेजने का प्रस्ताव है.

हालांकि, इन आंकड़ों को कौन प्राप्त करेगा और नियमों का उल्लंघन सामने आने पर किस तरह कार्रवाई होगी, इस बारे में रिपोर्ट ने स्पष्टता की कमी की ओर ध्यान दिलाया है.

एग्जॉस्ट उत्सर्जन में क्या बदलेगा?

प्रस्तावित नियमों के तहत हल्के मालवाहक वाहनों के एग्जॉस्ट उत्सर्जन की कई सीमाएं BS-VI के स्तर पर ही रखने की बात है. हालांकि, बारीक कणों की गिनती का दायरा 23 नैनोमीटर से घटाकर 10 नैनोमीटर तक करने का प्रस्ताव है. इससे पहले की तुलना में छोटे कणों को भी उत्सर्जन आकलन में शामिल किया जा सकेगा.

दूसरी ओर, बसों और ट्रकों के लिए नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx) उत्सर्जन सीमा को मौजूदा BS-VI स्तर की तुलना में लगभग आधा करने का प्रस्ताव है. इसके अलावा, अमोनिया, मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड जैसे उत्सर्जकों को भी नियमों में शामिल किया गया है.

प्रस्तावित नियमों में वाहनों के लिए एक 'एनवायरनमेंटल व्हीकल पासपोर्ट' जारी करने की व्यवस्था भी शामिल है. इसमें ईंधन की खपत, बैटरी की सेहत और उत्सर्जन से संबंधित जानकारी दर्ज हो सकती है. साथ ही, इंजन, कंट्रोल यूनिट, बैटरी, ओडोमीटर और प्रदूषण नियंत्रण प्रणालियों से छेड़छाड़ रोकने के प्रावधान भी प्रस्तावित हैं.

मौजूदा वाहनों पर तत्काल असर नहीं

रिपोर्ट के मुताबिक, नए नियम संबंधित लागू होने की तारीखों के बाद निर्मित वाहनों पर लागू होंगे. इसलिए पहले से सड़कों पर चल रहे वाहनों को इन मसौदा प्रावधानों के कारण तत्काल बदलाव करने की जरूरत नहीं होगी.

हालांकि, नए मानकों के लागू होने से वाहन निर्माताओं के अलावा ब्रेक पैड, डिस्क, टायर, बैटरी और वाहन सॉफ्टवेयर बनाने वाली कंपनियों पर भी अनुपालन से जुड़ी नई जिम्मेदारियां आ सकती हैं. इसके साथ ही परीक्षण प्रयोगशालाओं को भी नई प्रक्रियाओं और उपकरणों की जरूरत पड़ सकती है.

फिलहाल टायरों की अंतिम सीमा, भारी वाहनों के ब्रेक और बैटरी से जुड़े कुछ आंकड़े, बदले जाने वाले पुर्जों पर नियमों का दायरा और कुछ कार्यान्वयन संबंधी विवरण स्पष्ट नहीं हैं. सार्वजनिक परामर्श के बाद मसौदे में बदलाव संभव है.

BS-VII का प्रस्तावित दायरा इस दिशा में बदलाव का संकेत देता है कि वाहन से होने वाले प्रदूषण को केवल एग्जॉस्ट से निकलने वाले धुएं तक सीमित न रखकर ब्रेक, टायर, बैटरी और वाहन की पूरी उपयोग अवधि के दौरान उसके प्रदर्शन के आधार पर भी देखा जाए.


माइक्रोसॉफ्ट का 60 हजार कर्मचारियों को स्वैच्छिक नौकरी छोड़ने का ऑफर, भारत समेत 4 देशों में लागू होगी योजना

कंपनी के भारत में करीब 23,000 कर्मचारी हैं, लेकिन अभी यह स्पष्ट नहीं है कि इनमें से कितने कर्मचारी इस योजना के लिए पात्र होंगे. योग्य कर्मचारियों को आर्थिक सहायता, स्वास्थ्य बीमा और करियर ट्रांजिशन सेवाएं दी जाएंगी.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Tuesday, 27 October, 2026
Last Modified:
Tuesday, 27 October, 2026
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दिग्गज टेक्नोलॉजी कंपनी माइक्रोसॉफ्ट (Microsoft) ने भारत, अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा में पात्र कर्मचारियों के लिए स्वैच्छिक नौकरी छोड़ने की योजना (Voluntary Exit Offer) शुरू की है. इसके तहत कंपनी कर्मचारियों को नौकरी छोड़ने के बदले आर्थिक सहायता और करियर में बदलाव के लिए सहयोग देगी. कंपनी की इस योजना के लिए दुनियाभर में करीब 60,000 कर्मचारी पात्र हैं. हालांकि, भारत में कितने कर्मचारी इस प्रस्ताव का लाभ उठा सकेंगे, इसे लेकर फिलहाल स्पष्ट जानकारी नहीं है.

माइक्रोसॉफ्ट की कार्यकारी उपाध्यक्ष और मुख्य मानव संसाधन अधिकारी (Chief People Officer) एमी कोलमैन ने एक ब्लॉग पोस्ट में इस योजना की जानकारी दी. कंपनी के भारत में करीब 23,000 कर्मचारी हैं. पात्र भारतीय कर्मचारियों को इस प्रस्ताव पर फैसला लेने के लिए 1 दिसंबर तक का समय दिया गया है.

एक साल की नौकरी पर एक महीने की बेसिक सैलरी

स्वैच्छिक निकास योजना के तहत कर्मचारियों को मिलने वाला पैकेज सामान्य सेवरेंस पैकेज के समान बताया जा रहा है. इसके तहत कर्मचारी को कंपनी में पूरी की गई सेवा के प्रत्येक वर्ष के लिए एक महीने की बेसिक सैलरी दी जाएगी. इसके अलावा स्वास्थ्य बीमा और करियर ट्रांजिशन से जुड़ी सेवाएं भी पैकेज का हिस्सा होंगी.

कोलमैन के मुताबिक, यह ऑफर चारों देशों में भाग लेने वाली टीमों के लेवल 70 और उससे नीचे के पात्र कर्मचारियों के लिए उपलब्ध होगा. यह सीमित अवधि की पहल है, जिसका उद्देश्य उन कर्मचारियों को विकल्प देना है, जो माइक्रोसॉफ्ट से बाहर करियर के अवसर तलाशने पर विचार कर रहे हैं.

योजना सभी विभागों और टीमों में एक समान तरीके से लागू नहीं होगी. कंपनी के मुताबिक, इसमें कर्मचारियों की भागीदारी संबंधित कारोबार की प्राथमिकताओं, ग्राहकों के प्रति प्रतिबद्धताओं और कर्मचारियों की जरूरतों पर निर्भर करेगी.

पात्र कर्मचारियों को उनके व्यक्तिगत स्वैच्छिक निकास प्रस्ताव से जुड़ी जानकारी ईमेल के जरिए भेजी जाएगी.

कर्मचारियों को करियर बदलने का विकल्प

कोलमैन ने कहा कि यह प्रस्ताव उन पात्र कर्मचारियों को सहयोग के साथ कंपनी से बाहर करियर की नई राह चुनने का अवसर देता है, जो पहले से इस दिशा में विचार कर रहे हैं. उनके मुताबिक, इस योजना से कंपनी के संबंधित संगठनों को भी बदलती कारोबारी जरूरतों के अनुरूप अपने कार्यबल में बदलाव करने का एक अतिरिक्त विकल्प मिलेगा.

उन्होंने यह भी कहा कि माइक्रोसॉफ्ट कर्मचारियों को नए कौशल विकसित करने और उपयुक्त अवसर मिलने पर कंपनी के भीतर ही करियर के दूसरे विकल्प तलाशने में सहयोग देना जारी रखेगी.

कोलमैन के अनुसार, हर टीम और कर्मचारी के लिए एक जैसा तरीका अपनाना संभव नहीं है. कंपनी बदलती कारोबारी जरूरतों और कर्मचारियों को आगे बढ़ने तथा योगदान देने के अवसरों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करेगी.

उन्होंने कहा कि माइक्रोसॉफ्ट इस स्वैच्छिक निकास योजना को एक नई पहल के रूप में देख रही है और इसके आगे बढ़ने के साथ इसके अनुभव का आकलन करेगी.

भारत में AI और टेक्नोलॉजी पर निवेश जारी रखेगी कंपनी

स्वैच्छिक निकास योजना के बीच माइक्रोसॉफ्ट ने भारत में अपनी मौजूदगी बढ़ाने की प्रतिबद्धता दोहराई है. कंपनी के प्रवक्ता के मुताबिक, माइक्रोसॉफ्ट देश के प्रतिभा और प्रौद्योगिकी इकोसिस्टम में निवेश कर रही है और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से जुड़ी भारत की महत्वाकांक्षाओं को समर्थन दे रही है.

कंपनी ने 2025 से 2029 के बीच भारत में क्लाउड और AI इंफ्रास्ट्रक्चर, कौशल विकास तथा परिचालन गतिविधियों के लिए 20.5 अरब डॉलर के निवेश की प्रतिबद्धता जताई है.

इसके अलावा, माइक्रोसॉफ्ट का लक्ष्य 2030 तक भारत में 2 करोड़ लोगों को AI से जुड़े कौशल प्रदान करना है. कंपनी के प्रवक्ता के अनुसार, वह इस लक्ष्य को पूरा करने की दिशा में आगे बढ़ रही है.

इस तरह एक ओर माइक्रोसॉफ्ट पात्र कर्मचारियों को स्वैच्छिक रूप से कंपनी छोड़ने का विकल्प दे रही है, वहीं दूसरी ओर भारत में AI, क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर और कौशल विकास से जुड़े निवेश जारी रखने की बात कह रही है.


अब 100% एथेनॉल से चल सकेंगी गाड़ियां, सरकार ने बदले मोटर वाहन नियम

E100 फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों को मिली मंजूरी, E85 के साथ उत्सर्जन प्रमाणन नियमों में शामिल हुआ E100; कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता घटाने की कोशिश

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Tuesday, 27 October, 2026
Last Modified:
Tuesday, 27 October, 2026
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सरकार ने 100 फीसदी एथेनॉल (E100) से चलने वाले वाहनों को अनुमति देने के लिए केंद्रीय मोटर वाहन नियमों (CMVR) में संशोधन किया है. इस कदम का उद्देश्य फ्लेक्स-फ्यूल तकनीक को बढ़ावा देना और कच्चे तेल के आयात पर भारत की निर्भरता कम करना है. सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) ने सोमवार को नियमों में बदलाव करते हुए उत्सर्जन प्रमाणन से जुड़े प्रावधानों में E85 के साथ E100 को भी शामिल किया. इन ईंधनों से चलने वाले वाहनों को अपनी संबंधित श्रेणियों के उत्सर्जन और सुरक्षा मानकों का पालन करना होगा.

E85 के साथ E100 को भी नियमों में जगह

मंत्रालय का यह फैसला अप्रैल में जारी मसौदा अधिसूचना के बाद आया है. उस समय मंत्रालय ने परीक्षण और प्रमाणन मानकों में E100 को शामिल करने का प्रस्ताव दिया था. इससे पहले संबंधित प्रावधानों में केवल E85 का उल्लेख था.

E85 पेट्रोल और एथेनॉल का मिश्रण है, जिसमें मात्रा के आधार पर 85 फीसदी तक एथेनॉल होता है. वहीं, E100 में 100 फीसदी एथेनॉल होता है. हालांकि, इन दोनों ईंधनों का इस्तेमाल केवल उन्हीं वाहनों में किया जा सकता है, जिन्हें इनके अनुरूप डिजाइन और प्रमाणित किया गया है.

मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि E10 या E20 पेट्रोल के अनुकूल होने का मतलब यह नहीं है कि कोई वाहन E85 या E100 से भी चल सकता है. वाहन मालिकों को ईंधन चुनने से पहले अपने वाहन पर लगे फ्यूल कम्पैटिबिलिटी स्टिकर की जांच करनी चाहिए और निर्माता की ओर से दी गई निर्देश पुस्तिका का पालन करना चाहिए.

मौजूदा वाहन मालिकों को बदलाव की जरूरत नहीं

सरकार ने स्पष्ट किया है कि नए संशोधन के तहत मौजूदा वाहन मालिकों को अपने वाहनों में E85 या E100 ईंधन का इस्तेमाल शुरू करने अथवा वाहन में बदलाव कराने की जरूरत नहीं है. यह अनिवार्यता अभी भी नहीं है और भविष्य में भी इस अधिसूचना के तहत ऐसी कोई जरूरत नहीं होगी.

फ्लेक्स-फ्यूल वाहन इस तरह तैयार किए जाते हैं कि उनके फ्यूल सिस्टम के पुर्जे और उनमें इस्तेमाल होने वाली सामग्री E20 से लेकर E100 तक के एथेनॉल मिश्रण को संभाल सके. इस तकनीक का उद्देश्य अधिक एथेनॉल वाले ईंधन के इस्तेमाल से वाहनों के पुर्जों और अन्य सामग्रियों में होने वाली अनुकूलता संबंधी समस्याओं से बचना है.

E20 पेट्रोल के बाद अब ज्यादा एथेनॉल इस्तेमाल पर जोर

फिलहाल तेल विपणन कंपनियां E20 पेट्रोल बेच रही हैं, जिसमें 20 फीसदी तक एथेनॉल मिलाया जाता है. सरकार घरेलू स्तर पर उत्पादित एथेनॉल के इस्तेमाल को बढ़ावा दे रही है, ताकि कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम की जा सके और देश में तैयार ईंधन का उपयोग बढ़ाया जा सके.

हालांकि, E20 पेट्रोल के व्यापक इस्तेमाल के बाद कुछ वाहन मालिकों ने गाड़ियों के पुर्जों को संभावित नुकसान पहुंचने को लेकर चिंता जताई है. ऐसे में E85 और E100 जैसे उच्च एथेनॉल मिश्रण वाले ईंधनों के इस्तेमाल के लिए वाहनों की उपयुक्तता और निर्माता के दिशानिर्देशों का पालन करना महत्वपूर्ण होगा.

प्रदूषण घटाने में मिल सकती है मदद

मंत्रालय के मुताबिक, एथेनॉल का जीवाश्म कार्बन फुटप्रिंट पेट्रोल की तुलना में कम होता है. अधिक एथेनॉल मिश्रण वाले ईंधन उपयुक्त वाहनों में इस्तेमाल किए जाने पर कार्बन मोनोऑक्साइड और कुछ हाइड्रोकार्बन जैसे प्रदूषकों के उत्सर्जन को कम करने में मदद कर सकते हैं.

इसके अलावा, एथेनॉल के उत्पादन और इस्तेमाल के पूरे चक्र में ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में भी कमी आ सकती है. हालांकि, इसका वास्तविक लाभ इस बात पर निर्भर करता है कि एथेनॉल किस कच्चे माल से और किस उत्पादन प्रक्रिया के जरिए तैयार किया गया है.

सरकार का मानना है कि घरेलू एथेनॉल का अधिक इस्तेमाल देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने और आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता घटाने में मदद कर सकता है.

बायोडीजल नियमों में भी संशोधन

केंद्रीय मोटर वाहन नियमों में किए गए संशोधन के तहत बायोडीजल से संबंधित कुछ प्रावधानों को भी अपडेट किया गया है. इसके अलावा, कुछ तकनीकी सुधार भी किए गए हैं. अलग से केंद्र सरकार डीजल में आइसोब्यूटेनॉल के मिश्रण को बढ़ाने की दिशा में भी काम कर रही है.

ब्राजील और अमेरिका जैसे देशों में फ्लेक्स-फ्यूल तकनीक का पहले से इस्तेमाल हो रहा है. अब भारत भी अपने मौजूदा एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम के साथ इस तकनीक का विस्तार करने की कोशिश कर रहा है.


निर्यातकों को बड़ी राहत: मार्च 2027 तक बढ़ी RELIEF योजना की अवधि, माल ढुलाई और बीमा लागत पर मिलेगी सुरक्षा

योजना का दूसरा घटक 16 मार्च 2026 या उसके बाद ली गई ECGC की अलग-अलग और समग्र कारोबार वाली बीमा पॉलिसियों पर लागू होता है. इसके तहत पात्र माल की विभिन्न प्रकार की खेपों को शामिल किया गया है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Tuesday, 27 October, 2026
Last Modified:
Tuesday, 27 October, 2026
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पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव और समुद्री माल परिवहन में बाधाओं के बीच केंद्र सरकार ने निर्यातकों को राहत दी है. सरकार ने RELIEF योजना के दूसरे घटक की अवधि छह महीने बढ़ाकर 31 मार्च 2027 तक कर दी है. इस योजना के तहत पात्र निर्यातकों को 95 फीसदी तक जोखिम सुरक्षा मिल सकती है. इसका उद्देश्य बढ़ती माल ढुलाई लागत, बीमा प्रीमियम और युद्ध संबंधी जोखिमों के कारण निर्यातकों पर पड़ रहे वित्तीय दबाव को कम करना है.

31 मार्च 2027 तक मिलेगा योजना का लाभ

वाणिज्य विभाग ने सोमवार को बताया कि Resilience & Logistics Intervention for Export Facilitation (RELIEF) योजना के दूसरे घटक की अवधि बढ़ाई गई है. इस विस्तार का उद्देश्य निर्यातकों को पात्र खेपों के लिए भारतीय निर्यात ऋण गारंटी निगम (ECGC) से बीमा कवर लेने के लिए प्रोत्साहित करना है. योजना का लाभ लेने के इच्छुक निर्यातकों को अपने दावे और संबंधित दस्तावेज ECGC के ग्राहक पोर्टल पर जमा करने होंगे.

सरकार ने ईरान युद्ध और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण निर्यातकों को राहत देने के लिए 19 मार्च 2026 को यह योजना शुरू की थी. अब इसकी अवधि बढ़ने से पात्र निर्यातकों को अतिरिक्त समय मिलेगा.

बीमा प्रीमियम में बढ़ोतरी से भी सुरक्षा

वाणिज्य विभाग के अनुसार, RELIEF योजना के तहत पात्र निर्यातकों को 95 फीसदी तक जोखिम सुरक्षा मिल सकती है. इसके अलावा, संकट से पहले के स्तर की तुलना में बीमा प्रीमियम में हुई बढ़ोतरी से भी निर्धारित शर्तों के तहत सुरक्षा उपलब्ध है.

पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण खाड़ी और आसपास के समुद्री मार्गों पर माल परिवहन प्रभावित हुआ है. इससे भारतीय निर्यातकों के लिए माल ढुलाई की लागत, बीमा प्रीमियम और युद्ध संबंधी जोखिम बढ़ गए हैं. योजना की अवधि बढ़ाने का उद्देश्य इन अतिरिक्त लागतों के असर को कम करना और निर्यात गतिविधियों को समर्थन देना है.

किन निर्यातकों और खेपों को मिलेगा लाभ?

योजना का दूसरा घटक 16 मार्च 2026 या उसके बाद ली गई ECGC की अलग-अलग और समग्र कारोबार वाली बीमा पॉलिसियों पर लागू होता है. इसके तहत पात्र माल की विभिन्न प्रकार की खेपों को शामिल किया गया है.

इसमें पूर्ण कंटेनर लोड (FCL), आंशिक कंटेनर लोड (LCL) और रेफ्रिजरेटेड कंटेनरों के जरिये भेजे जाने वाले पात्र माल शामिल हैं. हालांकि, ऊर्जा से संबंधित खेपों को योजना के इस घटक के दायरे से बाहर रखा गया है.

497 करोड़ रुपये के बजट वाली योजना

RELIEF योजना सरकार के एक्सपोर्ट प्रमोशन मिशन का हिस्सा है. इसका कुल बजट 497 करोड़ रुपये है. इसका उद्देश्य ईरान युद्ध और पश्चिम एशिया में समुद्री मार्गों पर व्यवधान के कारण लॉजिस्टिक्स लागत में हुई असाधारण बढ़ोतरी तथा निर्यात संबंधी जोखिमों से भारतीय निर्यातकों को निपटने में मदद करना है.

योजना को निर्यातकों की अलग-अलग श्रेणियों की जरूरतों के अनुसार तीन घटकों में बांटा गया है. पहला घटक मौजूदा ECGC पॉलिसीधारकों के लिए है, जबकि दूसरा घटक भविष्य में किए जाने वाले निर्यात के लिए सहायता प्रदान करता है. तीसरा घटक उन सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSME) को लक्षित करता है, जिनके पास ECGC क्रेडिट बीमा नहीं है.

योजना की अवधि बढ़ाए जाने से पश्चिम एशिया संकट के बीच पात्र निर्यातकों को जोखिम प्रबंधन और बीमा सुरक्षा के लिए अतिरिक्त समय मिलेगा. इससे बढ़ती लॉजिस्टिक्स लागत के दबाव को कम करने में मदद मिलने की उम्मीद है.
 


मंथली एक्सपायरी पर बाजार की कमजोर शुरुआत के संकेत, गिफ्ट निफ्टी 95 अंक टूटा; आज इन शेयरों पर रहेगी नजर

कारोबार के अंत में सेंसेक्स 482.92 अंक यानी 0.66 फीसदी चढ़कर 73,606.75 पर बंद हुआ. वहीं, निफ्टी 153.20 अंक यानी 0.68 फीसदी की बढ़त के साथ 22,753.20 पर पहुंच गया.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Tuesday, 27 October, 2026
Last Modified:
Tuesday, 27 October, 2026
BWHindia

अक्टूबर सीरीज की मंथली एक्सपायरी के दिन मंगलवार को भारतीय शेयर बाजार में दबाव देखने को मिल सकता है. गिफ्ट निफ्टी 95 अंक से ज्यादा टूटकर 22,700 के नीचे पहुंच गया है, जिससे सेंसेक्स और निफ्टी की कमजोर शुरुआत के संकेत मिल रहे हैं. हालांकि, एशियाई बाजारों में तेजी और पिछले कारोबारी सत्र में घरेलू बाजार की बढ़त से निवेशकों को कुछ राहत मिल सकती है. कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, अमेरिकी फेडरल रिजर्व के ब्याज दरों पर फैसले और पश्चिम एशिया के घटनाक्रमों के बीच निवेशकों की नजर निफ्टी के अहम तकनीकी स्तरों पर रहेगी. इसके अलावा, मारुति सुजुकी, एलऐंडटी, बजाज ऑटो और टाटा स्टील समेत कई कंपनियों के तिमाही नतीजे और बीएलएस पॉलिमर्स का आईपीओ भी बाजार में चर्चा के केंद्र में रहेंगे.

पिछले सत्र में चार दिन की गिरावट पर लगा था ब्रेक

सोमवार, 26 अक्टूबर को भारतीय शेयर बाजार में तेजी के साथ लगातार चार कारोबारी सत्रों से जारी गिरावट का सिलसिला थम गया था. फार्मा, मेटल और ऑयल एंड गैस कंपनियों के शेयरों में खरीदारी से प्रमुख सूचकांक बढ़त के साथ बंद हुए थे.

कारोबार के अंत में सेंसेक्स 482.92 अंक यानी 0.66 फीसदी चढ़कर 73,606.75 पर बंद हुआ. वहीं, निफ्टी 153.20 अंक यानी 0.68 फीसदी की बढ़त के साथ 22,753.20 पर पहुंच गया. बड़ी कंपनियों की तुलना में मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में ज्यादा तेजी देखने को मिली. निफ्टी मिडकैप इंडेक्स 1.2 फीसदी और निफ्टी स्मॉलकैप इंडेक्स 1.4 फीसदी चढ़कर बंद हुए थे. हालांकि, मंगलवार को मंथली एक्सपायरी और वैश्विक संकेतों के चलते बाजार में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है.

बाजार की कमजोर शुरुआत के संकेत

मंगलवार को शुरुआती कारोबार से पहले गिफ्ट निफ्टी में 95 अंकों से ज्यादा की गिरावट दर्ज की गई और यह 22,700 के नीचे फिसल गया. इससे संकेत मिल रहे हैं कि घरेलू शेयर बाजार के प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स और निफ्टी दबाव के साथ कारोबार की शुरुआत कर सकते हैं. हालांकि, बाजार की वास्तविक दिशा वैश्विक संकेतों, कच्चे तेल की कीमतों और निवेशकों की खरीद-बिक्री पर निर्भर करेगी. मंथली एक्सपायरी के कारण भी कारोबार के दौरान उतार-चढ़ाव बढ़ने की आशंका है.

एशियाई बाजारों में तेजी

भारतीय बाजार के लिए वैश्विक संकेत मिले-जुले हैं. एक ओर गिफ्ट निफ्टी कमजोरी का संकेत दे रहा है, वहीं दूसरी ओर एशियाई बाजारों में तेजी देखने को मिल रही है. टेक शेयरों में खरीदारी के बीच जापान का निक्केई करीब 2 फीसदी और दक्षिण कोरिया का कोस्पी लगभग 4.3 फीसदी ऊपर कारोबार कर रहे हैं. हेंगसेंग और शंघाई कंपोजिट में भी हल्की मजबूती दर्ज की गई है. हालांकि, एशियाई बाजारों की तेजी के बावजूद घरेलू निवेशक कच्चे तेल की कीमतों और वैश्विक आर्थिक घटनाक्रमों को लेकर सतर्क रह सकते हैं.

कच्चे तेल की कीमतें और पश्चिम एशिया का तनाव बढ़ा सकते हैं चिंता

बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, भारतीय शेयर बाजार में मंगलवार को सतर्क रुख बना रह सकता है. इसकी प्रमुख वजह कच्चे तेल की ऊंची कीमतें हैं. अमेरिकी WTI क्रूड करीब 101 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा है, जबकि ब्रेंट क्रूड की कीमतों पर भी निवेशकों की नजर बनी हुई है.

पश्चिम एशिया में तनाव और ईरान को लेकर चल रहे कूटनीतिक प्रयासों का असर निवेशकों की धारणा पर पड़ सकता है. अमेरिका और इजरायल में होने वाले अहम मतदान से पहले क्षेत्रीय तनाव को कम करने की कोशिशें भी बाजार के लिए महत्वपूर्ण हैं. कच्चे तेल की कीमतों में तेजी भारत जैसे तेल आयातक देश के लिए महंगाई और कंपनियों की लागत के लिहाज से चिंता बढ़ा सकती है. ऐसे में तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव शेयर बाजार की दिशा को प्रभावित कर सकता है.

मंथली एक्सपायरी पर निफ्टी के लिए 22,500 का स्तर अहम

अक्टूबर सीरीज की मंथली एक्सपायरी के दिन निफ्टी के लिए 22,500 से 22,600 का दायरा महत्वपूर्ण माना जा रहा है. विशेषज्ञों के अनुसार, तकनीकी नजरिये से निफ्टी ने 20 दिन के मूविंग एवरेज और 200 सप्ताह के मूविंग एवरेज का स्तर दोबारा हासिल किया है. अब बाजार के लिए इन स्तरों के ऊपर मजबूती बनाए रखना जरूरी होगा.

तकनीकी स्तरों के लिहाज से 22,800 के ऊपर निकलने पर निफ्टी में तेजी बढ़ सकती है और यह 22,900 से 23,000 तक पहुंच सकता है. इसके विपरीत, यदि सूचकांक लगातार 22,500 के नीचे बना रहता है, तो गिरावट बढ़ने की आशंका है और निफ्टी 22,400 से 22,200 के स्तर तक फिसल सकता है.

बैंक निफ्टी के चार्ट पर डबल बॉटम पैटर्न बनने की संभावना भी दिखाई दे रही है. हालांकि, इसकी पुष्टि के लिए बैंक निफ्टी का 55,000 के ऊपर मजबूती से बंद होना जरूरी है. विशेषज्ञ के मुताबिक, यदि कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट जारी रहती है और निफ्टी 22,500 के ऊपर बना रहता है, तो शुरुआती कमजोरी के बाद बाजार में सुधार देखने को मिल सकता है.

आज खुलेगा बीएलएस पॉलिमर्स का 255 करोड़ रुपये का आईपीओ

प्राथमिक बाजार में भी मंगलवार को निवेशकों की नजर रहेगी. बीएलएस पॉलिमर्स का 255 करोड़ रुपये का आरंभिक सार्वजनिक निर्गम (IPO) 27 अक्टूबर को खुलने वाला है. एसबीआई सिक्योरिटीज ने कंपनी की मुनाफे की संभावनाओं और उत्पादन क्षमता बढ़ाने की योजना को देखते हुए लंबी अवधि के नजरिये से निवेश पर विचार करने की सलाह दी है. आईपीओ में निवेश करने वाले निवेशकों की नजर कंपनी की कारोबारी संभावनाओं और निर्गम से जुड़ी शर्तों पर रहेगी.

इन शेयरों पर रखें नजर

बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, मंगलवार, 27 अक्टूबर को मारुति सुजुकी, लार्सन ऐंड टुब्रो (L&T), बजाज ऑटो, टाटा स्टील, सिप्ला और वारी एनर्जीज समेत कई कंपनियों के सितंबर तिमाही के नतीजे जारी होंगे, जिससे इन शेयरों में हलचल देखने को मिल सकती है. वहीं, पेटीएम की मूल कंपनी वन97 कम्युनिकेशंस का मुनाफा करीब 11 गुना बढ़कर 226 करोड़ रुपये और टाटा कंज्यूमर प्रोडक्ट्स का मुनाफा 15.7 फीसदी बढ़कर 470.1 करोड़ रुपये रहा. नजारा टेक्नोलॉजीज घाटे से उबरकर मुनाफे में आ गई, जबकि सोना बीएलडब्ल्यू प्रिसिजन फोर्जिंग्स का मुनाफा 29.3 फीसदी बढ़ा. दूसरी ओर, सरकारी कंपनी आरईसी का मुनाफा 21.2 फीसदी घटकर 3,477.7 करोड़ रुपये रह गया और डालमिया भारत को 205 करोड़ रुपये का घाटा हुआ. इसके अलावा केफिन टेक्नोलॉजीज, मैनकाइंड फार्मा, बैंक ऑफ महाराष्ट्र, सुमितोमो केमिकल इंडिया और एक्वस के शेयर भी तिमाही नतीजों के चलते चर्चा में रहेंगे. कारोबारी घटनाक्रमों में सिग्मा एडवांस्ड सिस्टम्स को 973 करोड़ रुपये का रक्षा उपकरण आपूर्ति ऑर्डर मिला है, एचसीएल टेक्नोलॉजीज ने रोबोटिक डॉट एआई का अधिग्रहण पूरा किया है और जीनस पावर इन्फ्रास्ट्रक्चर्स ने 312 रुपये प्रति शेयर के भाव पर 148.2 करोड़ रुपये तक के शेयर बायबैक को मंजूरी दी है. वहीं, हाईवे इन्फ्रास्ट्रक्चर को एनएचएआई से 91.78 करोड़ रुपये का ठेका मिला है और रेमंड रियल्टी ने अपनी सहायक कंपनी में 210 करोड़ रुपये तक के निवेश के लिए समझौता किया है.

निवेशकों की नजर किन संकेतों पर रहेगी?

मंगलवार को बाजार की दिशा तय करने में गिफ्ट निफ्टी, कच्चे तेल की कीमतों, एशियाई बाजारों की चाल और अमेरिकी फेडरल रिजर्व से जुड़े संकेतों की अहम भूमिका रहेगी. इसके साथ ही निफ्टी के 22,500 से 22,600 के समर्थन क्षेत्र और 22,800 के प्रतिरोध स्तर पर निवेशकों की नजर रहेगी. मंथली एक्सपायरी के दिन तिमाही नतीजों और कंपनियों से जुड़ी खबरों के कारण शेयर-विशेष में उतार-चढ़ाव संभव है. ऐसे में निवेशकों के लिए बाजार के संकेतों और कंपनियों के वित्तीय प्रदर्शन पर नजर रखना महत्वपूर्ण होगा.

(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)


उत्तर प्रदेश में निवेश को मिलेगी रफ्तार, 500 जीसीसी बनाने का लक्ष्य, 15 एमओयू पर हस्ताक्षर

उत्तर प्रदेश ने लखनऊ में आयोजित यूपी जीसीसी इनोवेशन समिट 2026 में उद्योग जगत के साथ 15 समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए, पांच निवेशकों को लेटर ऑफ कम्फर्ट जारी किए और 13 शैक्षणिक संस्थानों के साथ समझौते किए. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 2031 तक राज्य में 500 ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर स्थापित करने का लक्ष्य रखा है.

Last Modified:
Monday, 26 October, 2026
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उत्तर प्रदेश को वैश्विक कारोबारी संचालन, उन्नत प्रौद्योगिकी, उत्पाद विकास और उच्च मूल्य वाले रोजगार के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित करने की दिशा में राज्य सरकार ने 2031 तक 500 ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (GCC) स्थापित करने का लक्ष्य निर्धारित किया है.

सोमवार को लखनऊ में आयोजित यूपी जीसीसी इनोवेशन समिट 2026 में राज्य सरकार ने कंपनियों और टैलेंट पार्टनर्स के साथ 15 समझौता ज्ञापनों (MoU) पर हस्ताक्षर किए. इसके अलावा, संभावित निवेशकों को पांच लेटर ऑफ कम्फर्ट (एलओसी) जारी किए गए और 13 शैक्षणिक संस्थानों के साथ समझौतों का आदान-प्रदान किया गया. इन पहलों का उद्देश्य निवेश बढ़ाना, उद्योग और शिक्षा जगत के बीच सहयोग मजबूत करना तथा बदलती वैश्विक कारोबारी जरूरतों के अनुरूप कार्यबल तैयार करना है.

आईआईटी कानपुर एलुमनी एसोसिएशन ने इन्वेस्ट यूपी और एचसीएलटेक के सहयोग से होटल द सेंट्रम में इस समिट का आयोजन किया. इसमें कारोबारी जगत के प्रतिनिधियों, नीति निर्माताओं, निवेशकों और प्रौद्योगिकी क्षेत्र के अधिकारियों ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), डिजिटल बदलाव, उत्पाद आधारित नवाचार और वैश्विक कारोबारी सेवाओं के भविष्य पर चर्चा की.

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि राज्य अब पारंपरिक कारोबारी गतिविधियों से आगे बढ़कर नवाचार, डिजाइन, इंजीनियरिंग और अनुसंधान से जुड़ी गतिविधियों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए तैयार है. उन्होंने राज्य के औद्योगिक आधार, कुशल कार्यबल, बुनियादी ढांचे और निवेशक केंद्रित नीतियों को अंतरराष्ट्रीय कंपनियों को आकर्षित करने में महत्वपूर्ण बताया.

बुनियादी ढांचा और प्रतिभाशाली कार्यबल यूपी की ताकत

मुख्यमंत्री ने 2017 के बाद से उत्तर प्रदेश के निवेश माहौल में आए बदलावों का उल्लेख किया. उन्होंने सिंगल-विंडो क्लीयरेंस और प्रशासनिक दक्षता पर जोर देने को निवेशकों का भरोसा बढ़ाने वाला कदम बताया. उनके अनुसार, राज्य अपनी पहले की 'बीमारू' छवि से आगे बढ़कर राजस्व अधिशेष वाला राज्य बन गया है.

राज्य की प्रमुख बुनियादी और औद्योगिक सुविधाओं में व्यापक एक्सप्रेसवे नेटवर्क, देश का सबसे बड़ा रेल नेटवर्क, पांच अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे और 75,000 एकड़ से अधिक का औद्योगिक भूमि बैंक शामिल हैं. समिट में दी गई जानकारी के अनुसार, भारत के मोबाइल विनिर्माण में उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी 55 प्रतिशत और इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स में 60 प्रतिशत है.

उत्तर प्रदेश में अनुमानित 6.7 लाख पेशेवर हैं, जिनमें तीन लाख प्रौद्योगिकी और इंजीनियरिंग क्षेत्र से जुड़े हैं. राज्य में 8,000 से अधिक उच्च शिक्षण संस्थान हैं और हर साल दो लाख से अधिक विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित (एसटीईएम) स्नातक तैयार होते हैं. इससे जीसीसी स्थापित करने या अपने मौजूदा परिचालन का विस्तार करने वाली कंपनियों को कुशल प्रतिभाएं मिल सकती हैं.

आईआईटी कानपुर, आईआईटी (बीएचयू) वाराणसी, आईआईएम लखनऊ, आईआईआईटी लखनऊ और एमएनएनआईटी प्रयागराज जैसे संस्थान इंजीनियरिंग, एआई, एनालिटिक्स और प्रबंधन के क्षेत्र में विशेषज्ञता उपलब्ध कराते हैं.

राज्य सरकार स्टेट एआई मिशन, डीप-टेक हब, एआई सिटी और रोबोटिक्स क्लस्टर जैसी पहल भी आगे बढ़ा रही है. इनका उद्देश्य एआई आधारित जीसीसी, उत्पाद इंजीनियरिंग टीमों, अनुसंधान एवं विकास केंद्रों और उन्नत कारोबारी सेवाओं को राज्य में आकर्षित करना है.

पांच निवेशकों को लेटर ऑफ कम्फर्ट जारी

राज्य सरकार ने पांच कंपनियों को लेटर ऑफ कम्फर्ट जारी किए हैं. इनमें हैवेल्स इंडिया लिमिटेड, अमेरिकप्राइज इंडिया एलएलपी, मेटलाइफ ग्लोबल ऑपरेशंस सपोर्ट सेंटर प्राइवेट लिमिटेड, एलजी सॉफ्ट इंडिया प्राइवेट लिमिटेड और डब्ल्यूएसपी कंसल्टेंट्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड शामिल हैं.

डब्ल्यूएसपी कंसल्टेंट्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड को जारी किए जाने वाले लेटर ऑफ कम्फर्ट के लिए उत्तर प्रदेश के उद्योग मंत्री की मंजूरी और औपचारिक पत्र जारी होना अभी बाकी है.

इन पत्रों का उद्देश्य निवेशकों की रुचि को वास्तविक परियोजनाओं में बदलना और जीसीसी बाजार में उत्तर प्रदेश की स्थिति मजबूत करना है. हालांकि, ये निवेश को सुविधाजनक बनाने की दिशा में उठाए गए कदम हैं. इनसे यह पुष्टि नहीं होती कि सभी प्रस्तावित परियोजनाएं शुरू हो चुकी हैं.

जीसीसी और कौशल विकास के लिए 15 समझौते

उद्योग जगत के साथ किए गए 15 एमओयू में जीसीसी के विस्तार, प्रौद्योगिकी आधारित निवेश और प्रतिभा विकास से जुड़े सहयोग शामिल हैं. इनमें ईवाई जीडीएस, एएमएल राइटसोर्स, कंप्यूटासेंटर, मेटलाइफ, डीएसवी, डैमैक, अल्ट्रुइस्ट और स्मार्टवर्क्स जैसी कंपनियों के नाम शामिल हैं.

स्मार्टवर्क्स लखनऊ में दो समर्पित कैंपस स्थापित करने की योजना बना रही है. राज्य ने जीसीसी की जरूरतों के अनुरूप प्रशिक्षण और कौशल विकास कार्यक्रमों के लिए पेटीएम, एडब्ल्यूएस, बार्कलेज, आईबीएम और नौकरी के साथ भी साझेदारी की है. पेटीएम ने इस सहयोग के तहत दो एमओयू पर हस्ताक्षर किए.

इन साझेदारियों का उद्देश्य वैश्विक कारोबारी परिचालन के विस्तार के साथ कंपनियों को प्रासंगिक तकनीकी और प्रबंधकीय कौशल वाले पेशेवर उपलब्ध कराना है. जीसीसी अब पारंपरिक सपोर्ट और डिलीवरी सेवाओं से आगे बढ़कर विशेषज्ञता आधारित काम भी कर रहे हैं.

13 शैक्षणिक संस्थान भी सहयोग में शामिल

उत्तर प्रदेश ने 13 शैक्षणिक संस्थानों के साथ समझौतों का आदान-प्रदान किया. इनमें आईआईटी कानपुर, आईआईटी रुड़की, आईआईएम लखनऊ, आईआईटी (बीएचयू) वाराणसी, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, शिव नाडर विश्वविद्यालय, एमएनएनआईटी इलाहाबाद, लखनऊ विश्वविद्यालय, आईआईआईटी इलाहाबाद, आईआईआईटी लखनऊ, दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय, एमिटी विश्वविद्यालय और डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम तकनीकी विश्वविद्यालय शामिल हैं.

इन साझेदारियों का उद्देश्य शैक्षणिक कार्यक्रमों को उद्योग की जरूरतों के अनुरूप बनाना और व्यावहारिक प्रशिक्षण, अनुसंधान तथा उद्योग आधारित कौशल विकास के अवसर बढ़ाना है. विश्वविद्यालयों और कंपनियों के बीच बेहतर तालमेल से विद्यार्थियों को एआई, एनालिटिक्स, उत्पाद इंजीनियरिंग और वैश्विक कारोबारी सेवाओं से जुड़े रोजगार के लिए तैयार करने में मदद मिलने की उम्मीद है.

जीसीसी के भविष्य पर सात सत्रों में चर्चा

समिट में निवेश संबंधी फैसलों, एआई के इस्तेमाल, नवाचार और कार्यबल विकास पर सात विषय आधारित सत्र आयोजित किए गए. इनमें जीसीसी स्थापित करने के लिए कंपनियों के स्थान चयन के कारकों, भविष्य के केंद्रों के लिए उत्तर प्रदेश को चुनने के कारणों और एआई आधारित जीसीसी विकसित करने के अनुभवों पर चर्चा हुई.

अन्य सत्रों में सेवा वितरण से उत्पाद स्वामित्व की ओर बढ़ने, स्टार्टअप के साथ जीसीसी की साझेदारी, उत्कृष्टता केंद्रों, एआई के दौर में विश्वविद्यालयों द्वारा विकसित किए जाने वाले कौशल और कार्यबल को नए कौशल सिखाने जैसे विषय शामिल रहे.

औद्योगिक विकास मंत्री नंद गोपाल गुप्ता 'नंदी' ने भी राज्य के जीसीसी इकोसिस्टम, बुनियादी ढांचे और प्रतिभाशाली कार्यबल पर अपने विचार साझा किए.

कंपनियों ने निवेश के अनुभव साझा किए

समिट में एलजी इलेक्ट्रॉनिक्स, स्मार्टवर्क्स, माइक्रोसॉफ्ट और एचसीएल टेक्नोलॉजीज के प्रतिनिधियों ने उत्तर प्रदेश की नीतियों, बुनियादी ढांचे और प्रशासनिक सहयोग की सराहना की. कंपनियों ने राज्य में चल रही परियोजनाओं और विस्तार योजनाओं की जानकारी भी दी.

एलजी इलेक्ट्रॉनिक्स के प्रतिनिधि बृजेश शर्मा ने बताया कि कंपनी अपने इको सॉल्यूशंस जीसीसी में 634 करोड़ रुपये का निवेश कर रही है और 2026 के अंत तक इसका परिचालन शुरू करने का लक्ष्य है. यह केंद्र हीटिंग, वेंटिलेशन और एयर कंडीशनिंग (एचवीएसी), हीट पंप तकनीक और उन्नत उत्पाद विकास पर ध्यान केंद्रित करेगा. प्रतिभा विकास और प्रशिक्षण के माध्यम से 500 से अधिक उच्च मूल्य वाले रोजगार सृजित करने की योजना है. कंपनी एआई आधारित डेटा सेंटर कूलिंग तकनीकों में अनुसंधान एवं विकास का भी विस्तार करना चाहती है.

स्मार्टवर्क्स के प्रतिनिधि हर्ष बिनानी ने कहा कि कंपनी नोएडा में 20 लाख वर्ग फुट से अधिक कार्यालय क्षेत्र का प्रबंधन करती है, जहां 110 से अधिक कंपनियां काम कर रही हैं. कंपनी अब लखनऊ में भी विस्तार कर रही है. उन्होंने बताया कि बीबीडी टाइम्स स्क्वायर में दो लाख वर्ग फुट का जीसीसी हब विकसित किया गया है.

बिनानी ने कहा कि लखनऊ, कानपुर और गोरखपुर जैसे शहरों के युवाओं के लिए करियर के अवसर तैयार करना महत्वपूर्ण है. उन्होंने जोर दिया कि ध्यान केवल एमओयू पर हस्ताक्षर करने तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि परियोजनाओं को जमीन पर उतारने और रोजगार पैदा करने पर भी होना चाहिए.

माइक्रोसॉफ्ट इंडिया डेवलपमेंट सेंटर के प्रतिनिधि राजीव कुमार ने राज्य में उपलब्ध प्रतिभाओं, कर्मचारियों की सुरक्षा, बुनियादी ढांचे और नीतिगत सहयोग को निवेश के लिए महत्वपूर्ण बताया. उन्होंने कहा कि जब माइक्रोसॉफ्ट नोएडा में अपना केंद्र स्थापित कर रही थी, तब नोएडा प्राधिकरण की तत्कालीन मुख्य कार्यकारी अधिकारी रितु माहेश्वरी के साथ बातचीत के बाद लगभग छह सप्ताह के भीतर जमीन उपलब्ध करा दी गई थी.

कुमार के अनुसार, केंद्र में पहले वर्ष लगभग 600 कर्मचारी थे, जिनकी संख्या तीन वर्षों में बढ़कर करीब 3,000 हो गई. लगभग 2,500 करोड़ रुपये के निवेश से विकसित इस कैंपस ने वर्ड, एक्सेल, पावरपॉइंट और कोपायलट जैसी तकनीकों के विकास में योगदान दिया है.

एचसीएल टेक्नोलॉजीज के प्रतिनिधि किरण चेरुकुरी ने राज्य की जीसीसी नीति और निवेश प्रोत्साहनों के क्रियान्वयन को महत्वपूर्ण बताया. उन्होंने कहा कि एचसीएल ने लगभग एक दशक पहले लखनऊ में अपना कैंपस स्थापित किया था और वर्तमान में वहां करीब 1,500 लोग कार्यरत हैं. उन्होंने अमेजन वेब सर्विसेज (एडब्ल्यूएस) के सहयोग से कैंपस में शुरू किए गए एआई आधारित जीसीसी सेंटर ऑफ एक्सीलेंस का भी उल्लेख किया, जिसका उद्देश्य उन्नत क्लाउड और कंप्यूटिंग सुविधाएं उपलब्ध कराना है.

एआई पर श्वेत पत्र जारी, निवेश प्रोत्साहनों पर जोर

समिट के दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 'द ट्रू इकोनॉमिक्स ऑफ एआई एडॉप्शन इन जीसीसी' शीर्षक से एक श्वेत पत्र जारी किया. इसे एचसीएल और आईआईटी कानपुर के बीच डीप-टेक नवाचार सहयोग के तहत तैयार किया गया है. इस श्वेत पत्र के जरिए जीसीसी में एआई के इस्तेमाल और उसके कारोबारी प्रभावों को प्रमुखता दी गई.

उत्तर प्रदेश जीसीसी नीति 2024 के तहत पात्र निवेशकों को 25 प्रतिशत तक पूंजीगत सब्सिडी और 50 प्रतिशत तक भूमि सब्सिडी का प्रावधान है. इसके अलावा, नीति के प्रावधानों और पात्रता मानदंडों के अधीन परिचालन संबंधी सहायता भी दी जाती है. इन प्रोत्साहनों का उद्देश्य परियोजनाओं की व्यवहार्यता बढ़ाना और कंपनियों को राज्य में उच्च मूल्य वाले परिचालन स्थापित करने या उनका विस्तार करने के लिए प्रोत्साहित करना है.

कार्यक्रम में औद्योगिक विकास मंत्री नंद गोपाल गुप्ता 'नंदी' और संसदीय कार्य एवं औद्योगिक विकास राज्य मंत्री जसवंत सिंह सैनी उपस्थित रहे. वरिष्ठ अधिकारियों में आईआईडीसी दीपक कुमार, उद्योग के अपर मुख्य सचिव आलोक कुमार, आईटी एवं इलेक्ट्रॉनिक्स के प्रमुख सचिव आलोक कुमार, इन्वेस्ट यूपी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी विजय किरण आनंद, इन्वेस्ट यूपी की एसीईओ प्रेरणा शर्मा और गजल भारद्वाज तथा आईआईटी कानपुर के निदेशक मनींद्र अग्रवाल शामिल थे.

उत्तर प्रदेश का 2031 तक 500 जीसीसी स्थापित करने का लक्ष्य देश की ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था में राज्य की भूमिका बढ़ाने की महत्वाकांक्षी योजना है. अब इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि निवेश प्रतिबद्धताओं, संस्थागत साझेदारियों और नीतिगत प्रोत्साहनों को किस हद तक वास्तविक परिचालन केंद्रों, निरंतर भर्ती और राज्यभर में कुशल पेशेवरों के लिए रोजगार के अवसरों में बदला जाता है.


AI नेटवर्क पर 450 मिलियन डॉलर तक खर्च करेगी टाटा कम्यूनिकेशन्स, बनाएगी 10,000 किमी फाइबर नेटवर्क

मुंबई-पुणे-हैदराबाद-चेन्नई कॉरिडोर से शुरू होगा नेटवर्क का पहला चरण, देश के प्रमुख डेटा सेंटर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस केंद्रों को जोड़ने पर रहेगा जोर

Last Modified:
Monday, 26 October, 2026
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टाटा कम्यूनिकेशन्स (Tata Communications) भारत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और डेटा सेंटर से जुड़ी कनेक्टिविटी की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए 400-450 मिलियन डॉलर का निवेश करने की योजना बना रही है. कंपनी इसके तहत 10,000 किलोमीटर लंबा फाइबर नेटवर्क विकसित करेगी, जो देश के प्रमुख डेटा सेंटर क्लस्टर और एआई केंद्रों को आपस में जोड़ेगा.

कंपनी के मुताबिक, इस नेटवर्क का उद्देश्य एआई से जुड़े कामकाज के लिए तेज, भरोसेमंद और अधिक क्षमता वाली कनेक्टिविटी उपलब्ध कराना है. इससे बड़े क्लाउड ऑपरेटरों, एआई प्लेटफॉर्म, उभरती क्लाउड कंपनियों और बड़े उद्यमों को फायदा मिलने की उम्मीद है. नेटवर्क को हाई बैंडविड्थ, कम लेटेंसी और बेहतर विश्वसनीयता को ध्यान में रखकर तैयार किया जाएगा.

मुंबई-पुणे-हैदराबाद-चेन्नई कॉरिडोर से होगी शुरुआत

टाटा कम्यूनिकेशन्स ने सोमवार को जारी बयान में बताया कि नेटवर्क के पहले चरण में मुंबई-पुणे-हैदराबाद-चेन्नई कॉरिडोर पर ध्यान दिया जाएगा. इसके बाद कंपनी पूर्वी तट और पश्चिम भारत के अन्य बाजारों में नेटवर्क का विस्तार करेगी. इनमें विशाखापत्तनम, भुवनेश्वर, जामनगर और गिफ्ट सिटी शामिल हैं.

प्रस्तावित नेटवर्क को कंपनी के वैश्विक कनेक्टिविटी नेटवर्क से भी जोड़ा जाएगा. इससे भारत के डेटा सेंटर क्लस्टर अंतरराष्ट्रीय केबल लैंडिंग स्टेशनों और विदेशों में मौजूद प्रमुख एआई इंफ्रास्ट्रक्चर केंद्रों से जुड़ सकेंगे. कंपनी ने हालांकि, इस नेटवर्क के विस्तार को पूरा करने की कोई समयसीमा नहीं बताई है.

डेटा सेंटर कनेक्टिविटी बाजार में बढ़ती संभावनाएं

टाटा कम्यूनिकेशन्स के प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी गणेश लक्ष्मीनारायणन ने कहा कि मध्यम अवधि में भारत में डेटा सेंटर से डेटा सेंटर तक कनेक्टिविटी का बाजार एक अरब डॉलर से अधिक का हो सकता है.

उन्होंने बताया कि कंपनी का प्रस्तावित निवेश उसके मौजूदा नेटवर्क इंफ्रास्ट्रक्चर पर आधारित है. नेटवर्क विस्तार का बढ़ता हिस्सा प्रमुख ग्राहकों की प्रतिबद्धताओं और पहले से तय मांग के आधार पर आगे बढ़ाया जा रहा है.

भारत में क्लाउड सेवाओं के बढ़ते इस्तेमाल, कंपनियों में एआई एप्लिकेशन की तैनाती और स्थानीय स्तर पर डेटा स्टोरेज व प्रोसेसिंग की जरूरत के कारण डेटा सेंटर उद्योग में निवेश बढ़ रहा है. एआई इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए कंप्यूटिंग क्षमता और भरोसेमंद बिजली आपूर्ति महत्वपूर्ण हैं, लेकिन डेटा सेंटरों के बीच बड़ी मात्रा में डेटा तेजी से भेजने की क्षमता भी उतनी ही अहम होती जा रही है.

एआई और क्लाउड कंपनियों की जरूरतें पूरी करने पर जोर

कंपनी के अनुसार, प्रस्तावित नेटवर्क बड़े क्लाउड ऑपरेटरों, एआई कंपनियों, ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (GCC), डिजिटल कारोबारों और भारत में अपना परिचालन बढ़ा रही बहुराष्ट्रीय कंपनियों की जरूरतों को पूरा करेगा.

टाटा कम्यूनिकेशन्स में नेटवर्क सर्विसेज के कार्यकारी उपाध्यक्ष और वैश्विक कारोबार प्रमुख रुपेश चोकशी ने कहा कि एआई इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए ऐसे कनेक्टिविटी नेटवर्क की जरूरत है, जो कम लेटेंसी और बेहतर विश्वसनीयता के साथ बड़ी मात्रा में डेटा ट्रांसफर कर सकें.

नए नेटवर्क के साथ कंपनी अपने मौजूदा नेशनल लॉन्ग डिस्टेंस और मेट्रो कनेक्टिविटी इंफ्रास्ट्रक्चर का भी विस्तार करने की योजना बना रही है. इसका उद्देश्य उद्यमों और डेटा सेंटर ऑपरेटरों की बढ़ती जरूरतों को पूरा करना है.

वैश्विक फाइबर नेटवर्क का भी कर रही विस्तार

टाटा कम्यूनिकेशन्स के मुताबिक, कंपनी के पास 5 लाख किलोमीटर से अधिक का सबसी ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क और 2 लाख किलोमीटर से अधिक का स्थलीय फाइबर नेटवर्क है.

जून 2026 में कंपनी ने मुंबई और सिंगापुर को जोड़ने वाली नई सबसी केबल प्रणाली विकसित करने की योजना की घोषणा की थी. इसके अलावा, वह चेन्नई और सिंगापुर को जोड़ने वाली एक अन्य केबल परियोजना में कंसोर्टियम सदस्य के रूप में शामिल है. इस परियोजना के 2029 की चौथी तिमाही में सेवा के लिए तैयार होने की उम्मीद है.

कंपनी ने 2025 में अपने TGN IA2 सबमरीन केबल को भी नेटवर्क में एकीकृत किया था, ताकि एशिया में नेटवर्क की अतिरिक्त क्षमता, लेटेंसी और कनेक्टिविटी में सुधार किया जा सके.

निवेश की नई योजना के जरिए कंपनी अब घरेलू स्तर पर एआई और डेटा सेंटर केंद्रों को जोड़ने वाले इंफ्रास्ट्रक्चर पर अपना ध्यान बढ़ा रही है. साथ ही, अपने अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क का इस्तेमाल कर कई देशों में कारोबार करने वाले ग्राहकों को कनेक्टिविटी सेवाएं उपलब्ध कराने की तैयारी कर रही है.
 


अमेजन के फेस्टिव सेल में विक्रेताओं की बिक्री 3.5 गुना बढ़ी, छोटे कारोबारों ने भी बनाया रिकॉर्ड

अमेजन के फेस्टिव सेल के पहले सप्ताह में 10 लाख रुपये से अधिक की बिक्री करने वाले छोटे और मध्यम कारोबारों की संख्या 4.6 गुना बढ़ी, महिला उद्यमियों और पारंपरिक कारीगरों को भी मिला फायदा

Last Modified:
Monday, 26 October, 2026
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अमेजन इंडिया के ग्रेट इंडियन फेस्टिवल (AGIF) 2026 के पहले सप्ताह में छोटे कारोबारों और विक्रेताओं ने शानदार प्रदर्शन किया. सामान्य दिनों की तुलना में विक्रेताओं की कुल बिक्री 3.5 गुना बढ़ गई, जबकि नए विक्रेताओं ने बेची गई यूनिट्स की संख्या में 2.5 गुना से अधिक वृद्धि दर्ज की. इस दौरान 10 लाख रुपये से ज्यादा की बिक्री करने वाले छोटे और मध्यम व्यवसायों (SMBs) की संख्या में भी 4.6 गुना से अधिक बढ़ोतरी हुई.

कंपनी के मुताबिक, इस साल के फेस्टिव सेल में छोटे कारोबारों की अब तक की सबसे अधिक भागीदारी दर्ज की गई, जो पिछले साल के मुकाबले करीब 30% ज्यादा रही. इसमें हिस्सा लेने वाले 70% से अधिक व्यवसाय टियर-2 और टियर-3 शहरों से थे. चूरू और भोपाल की महिला उद्यमियों से लेकर जोधपुर और सहारनपुर के पारंपरिक कारीगरों तक, देशभर के कारोबारियों ने त्योहारों के दौरान बढ़ी ऑनलाइन मांग का लाभ उठाया.

अमेजन की ओर से विक्रेताओं की लागत कम करने के लिए उठाए गए कदमों में 1,000 रुपये से कम कीमत वाले उत्पादों पर जीरो रेफरल फीस भी शामिल है. कंपनी का कहना है कि इन प्रयासों का उद्देश्य ऑनलाइन बिक्री को छोटे कारोबारों के लिए अधिक आसान और किफायती बनाना है.

नए विक्रेताओं और छोटे कारोबारों की बिक्री में बड़ी बढ़ोतरी

अमेजन ग्रेट इंडियन फेस्टिवल के पहले सप्ताह में नए विक्रेताओं ने बिक्री के कई अहम पड़ाव पार किए. एक लाख रुपये से ज्यादा की बिक्री करने वाले नए विक्रेताओं की संख्या सामान्य दिनों की तुलना में 2.4 गुना रही. वहीं, 10 लाख रुपये से ज्यादा की बिक्री करने वाले नए विक्रेताओं की संख्या में चार गुना से अधिक वृद्धि दर्ज की गई.

छोटे और मध्यम व्यवसायों के बीच भी बिक्री में तेजी देखने को मिली. पहले सप्ताह में 10 लाख रुपये से अधिक की बिक्री करने वाले एसएमबी की संख्या 4.6 गुना से ज्यादा बढ़ी. वहीं, एक करोड़ रुपये से ज्यादा की बिक्री करने वाले विक्रेताओं की संख्या में 1.5 गुना से अधिक वृद्धि हुई.

कंपनी के अनुसार, 500 रुपये से कम कीमत वाले उत्पाद बेचने वाले विक्रेताओं के लिए भी यह फेस्टिव सेल फायदेमंद रहा. ऐसे विक्रेताओं के समूह में, जिनकी बिक्री में 10 गुना उछाल आया, पहले 24 घंटों में शामिल विक्रेताओं की संख्या सालाना आधार पर दोगुने से अधिक रही.

महिला उद्यमियों और पारंपरिक कारीगरों को मिला फायदा

अमेजन के महिला उद्यमियों को समर्थन देने वाले कार्यक्रम 'अमेजन सहेली' से जुड़ी चुनिंदा महिला कारोबारियों ने त्योहारों के दौरान बिक्री में 10 गुना तक वृद्धि दर्ज की. चूरू, भोपाल, जयपुर और कोटा जैसे शहरों की महिला उद्यमियों ने अपने स्थानीय बाजारों से आगे बढ़कर देश के दूसरे हिस्सों में ग्राहकों तक पहुंच बनाई.

वहीं, 'अमेजन कारीगर' से जुड़े पारंपरिक शिल्पकारों की बिक्री में 1.5 गुना से अधिक वृद्धि हुई. जोधपुर, नागौर, सहारनपुर, अजमेर और नादिया के कारीगरों ने अपने हस्तनिर्मित और पारंपरिक उत्पादों की ऑनलाइन बिक्री के जरिए नए ग्राहकों तक पहुंच बनाई.

यह प्रदर्शन छोटे शहरों में कारोबार करने वाले उद्यमियों और कारीगरों के लिए ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म की बढ़ती भूमिका को भी दिखाता है.

ज्वेलरी, जूते और ऑटोमोटिव उत्पादों की रही ज्यादा मांग

ग्रेट इंडियन फेस्टिवल 2026 के पहले सप्ताह में विक्रेताओं के लिए ज्वेलरी, जूते, ऑटोमोटिव उत्पाद, बड़े घरेलू उपकरण और वायरलेस उत्पाद बिक्री के लिहाज से शीर्ष पांच श्रेणियों में शामिल रहे. इससे पता चलता है कि त्योहारों के दौरान ग्राहकों ने फैशन और व्यक्तिगत इस्तेमाल की वस्तुओं के साथ-साथ घरेलू और ऑटोमोटिव उत्पादों की भी खरीदारी की.

छोटे कारोबारों की मदद के लिए अमेजन की पहल

अमेजन इंडिया के सेलिंग पार्टनर सर्विसेज के वाइस प्रेसिडेंट सचिन कौशिक ने कहा कि हर त्योहार पर ऐसे उद्यमियों की कहानियां सामने आती हैं, जो नए ग्राहकों तक पहुंचकर अपना कारोबार बढ़ाते हैं. इस साल नए विक्रेताओं, महिला उद्यमियों, कारीगरों और छोटे कारोबारियों की सफलता उत्साहजनक रही है.

उन्होंने कहा कि भाग लेने वाले 70% से अधिक छोटे कारोबार टियर-2 और टियर-3 शहरों से हैं. जयपुर, कोटा, नागौर और नादिया जैसे शहरों के कारोबारी अब अपने स्थानीय बाजारों से काफी आगे तक ग्राहकों तक पहुंच रहे हैं. कंपनी बिक्री की लागत कम करने, आसान टूल उपलब्ध कराने और कारोबारियों को जरूरी सहायता देने पर ध्यान दे रही है.

फेस्टिव सेल से पहले विक्रेताओं को किया तैयार

ग्रेट इंडियन फेस्टिवल से पहले अमेजन इंडिया ने सितंबर में 'सेल ऑन अमेजन' डिजिटल अभियान शुरू किया था. यह अभियान 150 से अधिक शहरों और कस्बों में विक्रेता बनने के इच्छुक लोगों तक पहुंचा.

कंपनी ने 'फेस्टिव रेडीनेस सेलर एकेडमी' भी शुरू की. इसके तहत ई-कॉमर्स इन्फ्लुएंसर्स और अमेजन एड्स के विशेषज्ञों के साथ 10 सत्र आयोजित किए गए. इन सत्रों में त्योहारों के लिए कारोबार की तैयारी, विज्ञापन और बिक्री बढ़ाने जैसे विषय शामिल थे. कार्यक्रम में 'त्योहारों की तैयारी के लिए एआई का इस्तेमाल कैसे करें' जैसे सत्रों के साथ इंटरैक्टिव एआई आधारित अनुभव और सेलर यूनिवर्सिटी के संसाधन भी उपलब्ध कराए गए. इन सत्रों को औसतन 4.5 में से 5 की रेटिंग मिली.

कंपनी के मुताबिक, इन पहलों का उद्देश्य विक्रेताओं के लिए ऑनलाइन कारोबार की लागत और जटिलता कम करना तथा देशभर के छोटे और मध्यम व्यवसायों को विकास के नए अवसर उपलब्ध कराना है.
 


दिल्ली के आर्टशिला में शुरू हुआ ‘सूई धागा’ उत्सव, 16 देशों की कढ़ाई परंपराओं की झलक

एशिया-प्रशांत क्षेत्र की पारंपरिक कढ़ाई, समकालीन कला और सांस्कृतिक विरासत को एक मंच पर लाया गया. 17 जनवरी 2027 तक चलने वाले इस उत्सव में प्रदर्शनियों, कलाकारों के रेजिडेंसी कार्यक्रमों और संवाद सत्रों का होगा आयोजन.

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Monday, 26 October, 2026
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दिल्ली के आर्टशिला में 23 अक्टूबर को ‘सूई धागा: होल्डिंग टुगेदर विद नीडल एंड थ्रेड’ उत्सव की शुरुआत हुई. इस आयोजन में एशिया-प्रशांत क्षेत्र के 16 से अधिक देशों की कढ़ाई परंपराओं को प्रदर्शित किया जा रहा है. उत्सव 17 जनवरी 2027 तक चलेगा. इसके तहत प्रदर्शनियों, कलाकारों के रेजिडेंसी कार्यक्रमों, सांस्कृतिक प्रस्तुतियों और संवाद सत्रों के जरिए कढ़ाई को कला, सांस्कृतिक स्मृति और पीढ़ियों से चले आ रहे पारंपरिक ज्ञान के रूप में प्रस्तुत किया जाएगा.

इस उत्सव की मेजबानी करने वाला भारत पहला देश है. इसका आयोजन अहद अनहद सामूहिक समूह की अगुवाई में एशिया पैसिफिक क्राफ्ट्स अलायंस, आर्टशिला, क्राफ्ट्स काउंसिल ऑफ इंडिया और दिल्ली क्राफ्ट्स काउंसिल के सहयोग से किया जा रहा है. यह पहल भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय की ओर से आयोजित होने वाले आगामी इंडिया आर्ट, आर्किटेक्चर एंड डिजाइन बिएनाले से भी जुड़ी है.

‘द कंटिन्यूइंग थ्रेडलाइन’ मुख्य प्रदर्शनी का आकर्षण

उत्सव की मुख्य प्रदर्शनी ‘द कंटिन्यूइंग थ्रेडलाइन’ को सुजाता प्रसाद और ओरून दास ने क्यूरेट किया है. यह प्रदर्शनी कढ़ाई को केवल सजावटी कला तक सीमित रखने के बजाय इसके सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व को सामने लाती है. इसमें कपड़ों और कढ़ाई के जरिए पहचान, पलायन, आस्था, समुदाय और रोजमर्रा के जीवन से जुड़ी कहानियों को प्रस्तुत किया गया है.

प्रदर्शनी में पारंपरिक कढ़ाई के नमूनों के साथ समकालीन कलात्मक दृष्टिकोण भी शामिल हैं. इसका उद्देश्य यह समझना है कि हस्तशिल्प किस तरह पीढ़ियों की सामूहिक स्मृतियों को सहेजता है और बदलते सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवेश के साथ विकसित होता रहता है.

इसमें कढ़ाई की परंपराओं को आगे बढ़ाने में महिलाओं के श्रम, पीढ़ियों से हस्तांतरित तकनीकों और स्थानीय ज्ञान की भूमिका पर भी ध्यान दिया गया है. प्रदर्शनी हस्तशिल्प को अतीत की स्थिर विरासत के बजाय एक जीवंत परंपरा के रूप में देखती है, जिसे कारीगर और समुदाय लगातार नया रूप देते रहते हैं.

16 देशों की कढ़ाई परंपराओं का संगम

इस उत्सव में अफगानिस्तान, बांग्लादेश, चीन, भारत, इंडोनेशिया, ईरान, कजाकिस्तान, लाओस, मलेशिया, ओमान, फिलिस्तीन, फिलीपींस, थाईलैंड, तुर्कमेनिस्तान, उज्बेकिस्तान और वियतनाम की भागीदारी है.

इन देशों की वस्त्र और कढ़ाई परंपराओं को एक मंच पर लाने का उद्देश्य उनकी विशिष्टताओं के साथ-साथ साझा सांस्कृतिक संबंधों को भी सामने लाना है. इसके जरिए दर्शकों को विभिन्न क्षेत्रों की कलात्मक शैलियों और उनसे जुड़ी सामाजिक परंपराओं को समझने का अवसर मिलेगा.

मुख्य प्रदर्शनी के अलावा उत्सव में कलाकारों के रेजिडेंसी कार्यक्रम, सांस्कृतिक प्रस्तुतियां और संवाद सत्र भी आयोजित किए जा रहे हैं. इन गतिविधियों के माध्यम से कारीगरों, डिजाइनरों, शोधकर्ताओं और कलाकारों के बीच सीधे संवाद को बढ़ावा देने का प्रयास किया जा रहा है.

कार्यक्रम में पारंपरिक कढ़ाई को समकालीन डिजाइन, सांस्कृतिक आदान-प्रदान, रचनात्मक अर्थव्यवस्था और वस्त्र संबंधी पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण जैसे व्यापक विषयों से जोड़ने पर भी जोर दिया गया है.

कला और संस्कृति के लिए मंच है आर्टशिला

तक्षशिला एजुकेशनल सोसाइटी की ओर से स्थापित आर्टशिला एक बहु-कला सांस्कृतिक मंच है. यहां कला, वास्तुकला, हस्तशिल्प, सिनेमा, डिजाइन, साहित्य और प्रदर्शन कलाओं से जुड़े कार्यक्रम, प्रदर्शनियां और कार्यशालाएं आयोजित की जाती हैं.

वहीं, अहद अनहद विभिन्न पीढ़ियों और समुदायों के बीच सांस्कृतिक संवाद को बढ़ावा देने के लिए साहित्य, कविता, संगीत और प्रस्तुतियों से जुड़े कार्यक्रम आयोजित करता है. इसके काम में सांस्कृतिक स्मृतियों और समावेशी संवाद को विशेष महत्व दिया जाता है.

‘सूई धागा’ उत्सव के जरिए क्षेत्रीय सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करने और कढ़ाई के प्रति लोगों की समझ बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है. यह आयोजन पारंपरिक हस्तशिल्प को कलात्मक अभिव्यक्ति के साथ-साथ सांस्कृतिक ज्ञान और सामुदायिक विरासत के महत्वपूर्ण माध्यम के रूप में सामने लाता है. दिल्ली के आर्टशिला में यह उत्सव 17 जनवरी 2027 तक जारी रहेगा.
 


वॉकी-टॉकी के विज्ञापन में नियमों का उल्लंघन, CCPA ने कंपनी पर लगाया ₹1 लाख का जुर्माना

CCPA ने फ्रीक्वेंसी, लाइसेंस और सरकारी मंजूरी से जुड़ी जरूरी जानकारी नहीं देने पर की कार्रवाई; ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर नियमों का उल्लंघन करने वाली 12 कंपनियों पर अब तक 58 लाख रुपये का जुर्माना

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Monday, 26 October, 2026
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ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर वॉकी-टॉकी का प्रचार करते समय उसकी फ्रीक्वेंसी, लाइसेंस और सरकारी मंजूरी से जुड़ी जानकारी नहीं देना एक कंपनी को महंगा पड़ा है. केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (CCPA) ने होगार टेक्नोलॉजीज एंड इनोवेशन एलएलपी पर भ्रामक विज्ञापन और उपभोक्ता संरक्षण नियमों के उल्लंघन के मामले में 1 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है. प्राधिकरण के अनुसार, जरूरी जानकारी के अभाव में ग्राहक अनजाने में ऐसे उपकरण खरीद सकते हैं, जिनके इस्तेमाल के लिए उन्हें लाइसेंस या अन्य सरकारी मंजूरी की जरूरत हो सकती है.

वेबसाइट पर जरूरी जानकारी नहीं देने का मामला

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, CCPA की मुख्य आयुक्त निधि खरे और आयुक्त अनुपम मिश्रा की पीठ ने मामले की सुनवाई की. जांच में पाया गया कि कंपनी की वेबसाइट पर वॉकी-टॉकी के विज्ञापन में उपकरणों की ऑपरेटिंग फ्रीक्वेंसी और उनके इस्तेमाल के लिए जरूरी लाइसेंस व सरकारी मंजूरी से जुड़ी जानकारी स्पष्ट रूप से नहीं दी गई थी.

प्राधिकरण के मुताबिक, इस तरह की जानकारी उपलब्ध नहीं होने से उपभोक्ता यह मान सकते हैं कि संबंधित उपकरण का इस्तेमाल बिना किसी अतिरिक्त अनुमति के किया जा सकता है. इससे उन्हें कानूनी और आर्थिक परेशानी का सामना करना पड़ सकता है.

कंपनी की दलीलें CCPA ने खारिज कीं

सुनवाई के दौरान कंपनी ने दलील दी कि उसके पास वैध ‘डीलर पजेशन लाइसेंस’ है और उसके उपकरणों को इक्विपमेंट टाइप अप्रूवल (ETA) प्रमाणपत्र मिले हुए हैं. कंपनी ने यह भी कहा कि उसकी वेबसाइट पर सीधे ऑनलाइन बिक्री नहीं होती, बल्कि इसका इस्तेमाल उत्पादों की जानकारी देने और कारोबारी पूछताछ जुटाने के लिए किया जाता है.

हालांकि, CCPA ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया. प्राधिकरण के अनुसार, किसी उत्पाद के लिए सरकारी मंजूरी होना विज्ञापन में जरूरी जानकारी देने की जिम्मेदारी से छूट नहीं देता. वेबसाइट से सीधे बिक्री नहीं होने पर भी उस पर किए गए प्रचार और दावे उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के दायरे में आ सकते हैं.

वॉकी-टॉकी इस्तेमाल करने के नियम क्या हैं?

कम पावर वाले रेडियो उपकरणों के लिए वर्ष 2018 में निर्धारित नियमों के तहत 446.0 से 446.2 मेगाहर्ट्ज बैंड में काम करने वाले वॉकी-टॉकी को तय शर्तों के अधीन लाइसेंस से छूट मिल सकती है. निर्धारित फ्रीक्वेंसी बैंड से बाहर काम करने वाले उपकरणों के लिए संबंधित सरकारी नियमों और लाइसेंस की शर्तों का पालन करना जरूरी हो सकता है.

इसी वजह से वॉकी-टॉकी का विज्ञापन करते समय उसकी ऑपरेटिंग फ्रीक्वेंसी, लाइसेंस संबंधी जरूरतों और लागू मंजूरियों की जानकारी स्पष्ट रूप से देना अहम है. उपभोक्ताओं को भी खरीदने से पहले इन जानकारियों की जांच करनी चाहिए.

12 कंपनियों पर अब तक 58 लाख रुपये का जुर्माना

CCPA ने ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर वॉकी-टॉकी की लिस्टिंग की जांच शुरू की थी. इस दौरान 16,970 से अधिक ऐसी लिस्टिंग मिलीं, जिनमें नियमों के अनुरूप जरूरी जानकारी नहीं थी. इसके बाद 13 ई-कॉमर्स कंपनियों को नोटिस जारी किए गए.

प्राधिकरण अब तक 12 कंपनियों के खिलाफ अंतिम आदेश जारी कर चुका है. इन कंपनियों पर कुल 58 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया है. इनमें पांच कंपनियों पर 10-10 लाख रुपये और सात कंपनियों पर एक-एक लाख रुपये का जुर्माना शामिल है.

कुछ कंपनियों ने इन आदेशों को अदालतों और उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग में चुनौती दी है. इन मामलों में कार्यवाही जारी है. CCPA की यह कार्रवाई ऑनलाइन उत्पादों के विज्ञापन में सही और पूरी जानकारी देने की जिम्मेदारी को रेखांकित करती है.