होम / बिजनेस / BARC बोर्ड में श्रीनिवासन स्वामी की एंट्री, हंसा रिसर्च कनेक्शन पर फिर उठे सवाल
BARC बोर्ड में श्रीनिवासन स्वामी की एंट्री, हंसा रिसर्च कनेक्शन पर फिर उठे सवाल
विज्ञापन एजेंसियों के संघ ने आरके स्वामी समूह के कार्यकारी समूह अध्यक्ष श्रीनिवासन के. स्वामी को बीएआरसी बोर्ड के लिए चुना है. हालांकि 2020 के टीआरपी विवाद से जुड़े हंसा रिसर्च के साथ समूह के संबंधों को लेकर इस नियुक्ति ने बीएआरसी की विश्वसनीयता और प्रशासनिक व्यवस्था पर नई बहस छेड़ दी है.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 52 minutes ago
भारत की टेलीविजन रेटिंग एजेंसी बीएआरसी (BARC) के बोर्ड में श्रीनिवासन के. स्वामी की नियुक्ति ने मीडिया और विज्ञापन उद्योग में नई बहस को जन्म दे दिया है. भारतीय विज्ञापन एजेंसियों के संघ ने आरके स्वामी समूह के कार्यकारी समूह अध्यक्ष श्रीनिवासन स्वामी को बीएआरसी बोर्ड में शशि सिन्हा की जगह नामित और निर्वाचित किया है. कागजों पर यह एक सामान्य औद्योगिक नियुक्ति है. श्रीनिवासन स्वामी विज्ञापन जगत के अनुभवी नाम हैं और देश के प्रमुख विज्ञापन समूहों में से एक आरके स्वामी का नेतृत्व करते हैं. लेकिन इस नियुक्ति के साथ हंसा रिसर्च का नाम एक बार फिर चर्चा में आ गया है, जो 2020 के चर्चित टीआरपी विवाद से जुड़ा रहा था.
हंसा रिसर्च कनेक्शन क्यों बना सवाल?
हंसा रिसर्च, आरके स्वामी समूह का हिस्सा है. 2020 के कथित टीआरपी हेरफेर मामले में इस कंपनी की भूमिका को लेकर सवाल उठे थे. उस समय हंसा रिसर्च को मुंबई और महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में बीएआरसी के दर्शक मापने वाले उपकरण लगाने और उनके रखरखाव की जिम्मेदारी दी गई थी.
इन उपकरणों से मिलने वाला डेटा टेलीविजन चैनलों की रेटिंग तय करने में अहम भूमिका निभाता है. यही रेटिंग विज्ञापनदाताओं, एजेंसियों और प्रसारकों के लिए काफी महत्वपूर्ण होती है. मुंबई पुलिस की चार्जशीट में हंसा विजन प्राइवेट लिमिटेड, जिसे हंसा रिसर्च की होल्डिंग कंपनी बताया गया था, की भूमिका को लेकर कई आरोप लगाए गए थे. चार्जशीट के अनुसार, कंपनी के कुछ टेलीविजन चैनलों के साथ व्यावसायिक हित थे, जिनकी जानकारी बीएआरसी को नहीं दी गई थी. हालांकि, इन आरोपों को चुनौती दी गई थी और ये आरोप हंसा रिसर्च, उसके समूह या अधिकारियों के खिलाफ दोष सिद्ध होने के बराबर नहीं हैं.
टीआरपी विवाद के बाद बीएआरसी की साख पर फिर सवाल
2020 के टीआरपी विवाद ने भारत की टेलीविजन दर्शक मापन प्रणाली की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे. इसके बाद बीएआरसी ने अपनी व्यवस्था में पारदर्शिता और प्रशासनिक ढांचे को मजबूत करने की दिशा में कई कदम उठाए.
अब श्रीनिवासन स्वामी की नियुक्ति ऐसे समय में हुई है, जब बीएआरसी की विश्वसनीयता और उसके प्रशासनिक ढांचे पर पहले से ही नजर बनी हुई है. उद्योग से जुड़े कुछ अधिकारियों का मानना है कि भले ही श्रीनिवासन स्वामी के खिलाफ किसी तरह की सीधी भूमिका या संलिप्तता का आरोप नहीं है, लेकिन हंसा रिसर्च के साथ उनके समूह के संबंधों के कारण हितों के टकराव की आशंका का सवाल खड़ा हो सकता है.
मीडिया उद्योग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि असली सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कोई वास्तविक हितों का टकराव है या नहीं. बल्कि यह भी है कि क्या बीएआरसी के पास ऐसे मजबूत नियम हैं, जो किसी भी संभावित व्यावसायिक प्रभाव से रेटिंग प्रणाली को अलग और निष्पक्ष रख सकें.
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की नजर से और संवेदनशील हुआ मामला
बीएआरसी का काम सिर्फ सामान्य बाजार अनुसंधान तक सीमित नहीं है. टेलीविजन रेटिंग के आधार पर विज्ञापन का पैसा, चैनलों का मूल्यांकन, कार्यक्रमों की रणनीति और पूरे टीवी कारोबार के कई अहम फैसले प्रभावित होते हैं. यही वजह है कि बीएआरसी से सामान्य उद्योग संस्था की तुलना में अधिक पारदर्शिता और निष्पक्षता की अपेक्षा की जाती है.
मौजूदा समय में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के स्तर पर भी बीएआरसी और भारत की टेलीविजन दर्शक मापन प्रणाली के भविष्य को लेकर चर्चा और समीक्षा चल रही है. ऐसे में श्रीनिवासन स्वामी की नियुक्ति को केवल एक व्यक्ति की बोर्ड में एंट्री के रूप में नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसे बीएआरसी के प्रशासनिक ढांचे की एक नई परीक्षा के तौर पर भी देखा जा रहा है.
श्रीनिवासन स्वामी ने क्या कहा?
E4M की ओर से भेजे गए सवालों का श्रीनिवासन स्वामी ने सीधे जवाब नहीं दिया. हालांकि, विज्ञापन एजेंसियों के संघ के सदस्यों को भेजे एक ईमेल में उन्होंने कहा कि हंसा रिसर्च समूह ही इस पूरे मामले में शिकायतकर्ता था और कथित अनियमितताओं को सबसे पहले उसी ने उजागर किया था. स्वामी के मुताबिक, 6 अक्टूबर 2020 को हंसा के एक वरिष्ठ अधिकारी ने आंतरिक स्तर पर कथित गड़बड़ी का पता लगाया और मुंबई पुलिस में प्राथमिकी दर्ज कराई. शिकायत में आरोप लगाया गया था कि कंपनी के एक पूर्व फील्ड अधिकारी ने टीआरपी डेटा से छेड़छाड़ की थी और मामले की व्यापक जांच की मांग की गई थी.
उन्होंने कहा कि कंपनी ने केवल संबंधित कर्मचारी को हटाने के बजाय पूरे मामले की जांच कराने का रास्ता चुना और इस प्रक्रिया में कानूनी परेशानियों का भी सामना किया, लेकिन नैतिकता के साथ समझौता नहीं किया.
स्वामी ने यह भी कहा कि हंसा रिसर्च ने मुंबई पुलिस के खिलाफ बॉम्बे हाईकोर्ट में आपराधिक रिट याचिका दायर की थी. उनके अनुसार, कंपनी के खिलाफ गलत कार्रवाई के आरोपों को लेकर उसे अदालत से राहत मिली थी और इससे जुड़े तथ्य न्यायिक रिकॉर्ड में उपलब्ध हैं.
बीएआरसी के लिए प्रशासनिक व्यवस्था की परीक्षा
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि बीएआरसी ने 2020 के टीआरपी विवाद के बाद अपने प्रशासनिक ढांचे को कितना मजबूत किया है. क्या बोर्ड के सभी सदस्यों और उनसे जुड़े समूहों के संभावित व्यावसायिक हितों का पूरा खुलासा किया जाता है? क्या बीएआरसी के पास ऐसे पर्याप्त नियम हैं, जो बोर्ड के फैसलों, सेवा प्रदाताओं, प्रसारकों और रेटिंग प्रणाली को किसी व्यक्ति या समूह के व्यावसायिक हितों से अलग रख सकें?
उद्योग के जानकारों का मानना है कि श्रीनिवासन स्वामी की नियुक्ति पर अंतिम बहस उनकी व्यक्तिगत साख या अनुभव से ज्यादा बीएआरसी की संस्थागत पारदर्शिता पर केंद्रित हो सकती है. क्योंकि बीएआरसी की सबसे बड़ी ताकत भरोसा है और उसकी सबसे बड़ी चुनौती भी वही है. 2020 के टीआरपी विवाद ने दिखाया था कि रेटिंग प्रणाली में विश्वास कितना संवेदनशील हो सकता है. अब हंसा रिसर्च के पुराने विवाद से जुड़े एक समूह के प्रमुख की बीएआरसी बोर्ड में नियुक्ति ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या रेटिंग संस्था अपने प्रशासनिक ढांचे को लेकर उद्योग, विज्ञापनदाताओं, प्रसारकों और नियामकों का भरोसा पूरी तरह कायम रख पाएगी.
आने वाले दिनों में यह नियुक्ति बीएआरसी के लिए केवल एक बोर्ड बदलाव नहीं, बल्कि उसकी पारदर्शिता, हितों के टकराव से निपटने की क्षमता और विश्वसनीयता की एक अहम परीक्षा साबित हो सकती है.
टैग्स