जैसे-जैसे विवाद बढ़ते हैं और प्रवर्तन कार्रवाई तेज होती है, भारत का सबसे शक्तिशाली व्यावसायिक वंश एक असहज प्रश्न का सामना कर रहा है: आज की राजनीतिक अर्थव्यवस्था में वास्तविक पकड़ किसके हाथ में है?
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
पलक शाह
भारत के वित्तीय जंगल में रिपोर्टिंग करते हुए मैंने जल्दी ही सीख लिया था कि इस देश में शक्ति की अपनी एक व्याकरण होती है. कुछ नाम दरवाज़े खोलते हैं. कुछ नाम फाइलें बंद कर देते हैं. और कुछ नाम नीति और राजनीति की उथल-पुथल से ऊपर तैरते हुए प्रतीत होते हैं. लगभग तीन दशकों तक अंबानी उपनाम भारत में कॉर्पोरेट शक्ति की पराकाष्ठा का प्रतीक रहा है. सरकारें बदलीं. नियामक बदले. बाज़ार ऊपर-नीचे हुए. लेकिन साम्राज्य कायम रहा.
फिर भी, हाल के समय में भारत के कॉर्पोरेट परिदृश्य में कुछ असामान्य घटित हो रहा है. दो भाई, जिन्होंने लगभग दो दशकों तक व्यावसायिक प्रतिद्वंद्विता में समय बिताया मुकेश और अनिल अंबानी, अब एक साथ गहन नियामकीय, जांच और नीतिगत निगरानी का सामना कर रहे हैं. यह संयोग इसलिए उल्लेखनीय है क्योंकि वे विवादों से अपरिचित नहीं हैं, बल्कि इसलिए कि दोनों के इर्द-गिर्द कार्रवाई का पैमाना, समय और संस्थागत विस्तार भारत में हाल के समय में अभूतपूर्व है.
इन समानांतर घटनाओं के ऊपर भारतीय कॉर्पोरेट शक्ति की बदलती ज्यामिति भी परत दर परत जुड़ी हुई है. पिछले एक दशक में गौतम अडानी ऐसे एकमात्र उद्योगपति के रूप में उभरे हैं जिनका पैमाना मुकेश अंबानी की बराबरी करता है. अडानी ने बुनियादी ढांचे, नवीकरणीय ऊर्जा, हवाई अड्डों, बंदरगाहों, मीडिया और रक्षा विनिर्माण साझेदारियों में तेज़ विस्तार किया है.
मूक मुकदमेबाजी का युद्ध
मुकेश अंबानी के लिए दबाव के बिंदु शोरगुल वाले शीर्षक नहीं, बल्कि लंबी छाया वाले विवाद हैं. केंद्र में केजी-डी6 बेसिन की तेल और गैस विरासत है. भारत सरकार का दावा, जो अरबों डॉलर में है, पूंजीगत व्यय को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने और राजस्व साझाकरण से जुड़े प्रश्नों के आरोपों से संबंधित है. पन्ना–मुक्ता–ताप्ती क्षेत्रों में, दिल्ली उच्च न्यायालय ने ओएनजीसी की गैस के कथित प्रवासन और विचलन से जुड़े विवाद में रिलायंस के खिलाफ फैसला दिया. मामला अब सर्वोच्च न्यायालय में अंतिम निर्णय की प्रतीक्षा में है. मध्यस्थता में झटकों और लंबित अपीलों के साथ मिलाकर, इन पेट्रोलियम विवादों से जुड़ा संचयी वित्तीय जोखिम कई अरब डॉलर आंका गया है.
केजी-डी6 प्रकरण के बीच, दिसंबर 2025 में रिपोर्टें सामने आईं कि सरकार ने रिलायंस इंडस्ट्रीज़ और बीपी से लगभग 30 अरब डॉलर (लगभग ₹2.7 लाख करोड़) की मांग की है, यह आरोप लगाते हुए कि उन्होंने अनुबंधित गैस उत्पादन पूरा नहीं किया और भंडार प्रबंधन में चूक की. रिलायंस ने इसे तुरंत “तथ्यात्मक रूप से गलत” बताते हुए खारिज किया और स्पष्ट किया कि वास्तविक सरकारी दावा मात्र 247 मिलियन डॉलर है. अलग से, मार्च 2025 तक, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने ओएनजीसी के पड़ोसी ब्लॉक से गैस प्रवासन के आरोपों पर लगभग 2.81 अरब डॉलर (₹24,490 करोड़) का मांग नोटिस जारी किया, जो अब सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष लंबित पन्ना-मुक्ता-ताप्ती विवादों की प्रतिध्वनि है. अब तक सरकार की ओर से कुल दावों पर कोई स्पष्टीकरण नहीं आया है.
लेकिन ये बहुस्तरीय दावे, मध्यस्थता में झटकों और लंबित अपीलों के साथ मिलकर, रिलायंस की पेट्रोलियम विवादों में संचयी जोखिम को अरबों डॉलर तक बढ़ा देते हैं. याचिकाएं निजी वादियों द्वारा नहीं, बल्कि केंद्र सरकार और पेट्रोलियम मंत्रालय द्वारा दायर की गई हैं, यह दर्शाता है कि यह राज्य बनाम कॉर्पोरेट के पैमाने की लड़ाई है.
इसके समानांतर सेबी के समक्ष लंबित एक अंदरूनी व्यापार मामला है, जहां कार्यवाही वर्षों से चल रही है और संबंधित सर्वोच्च न्यायालय वाद में आदेश सुरक्षित बताया जाता है. भारत की सबसे बड़ी बाजार पूंजीकरण वाली कंपनी के लिए लंबित नियामकीय अनिश्चितता कोई फुटनोट नहीं, यह एक संरचनात्मक चर है.
नीतिगत मोड़
नीतिगत बदलावों ने भी असहजता बढ़ाई है. रिलायंस के कंसोर्टियम को उन्नत बैटरी निर्माण के लिए सरकार की उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना के तहत स्वीकृति मिली थी, जिसे बाद में प्रगति के अभाव का हवाला देते हुए रद्द कर दिया गया. फिर, नवीनतम केंद्रीय बजट में पशु और पक्षी आयात से संबंधित आयात रियायतें वापस ले ली गईं और शुल्क लगाए गए, ऐसे विकास जो समूह की उच्च-प्रोफ़ाइल वंतारा पशु संरक्षण पहल से जुड़ते हैं. बड़े डिजिटल और दूरसंचार उपक्रमों से संबंधित पूर्व कर संरचनाएं और प्रोत्साहन भी विकसित हुए हैं. इनमें से कोई भी कार्रवाई अकेले शत्रुता का संकेत नहीं देती. सामूहिक रूप से वे उस नीति रुख की ओर संकेत करती हैं जो समूह को पहले प्राप्त था, उससे अधिक सतर्क है.
यदि मुकेश अंबानी की चुनौतियां जटिल मुकदमों और नीतिगत पुनर्संतुलन में निहित हैं, तो अनिल अंबानी की स्थिति कहीं अधिक गतिशील है.
प्रवर्तन की बाढ़: अनिल की संपत्ति कुर्की
पिछले छह महीनों में, कई एजेंसियों प्रवर्तन निदेशालय, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो, सेबी, और गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय ने उनसे जुड़ी संस्थाओं के संबंध में समानांतर जांच शुरू की है. चार एजेंसियों की ये समवर्ती जांच एक “दुर्लभ अभिसरण” है.
लगभग ₹12,000 करोड़ मूल्य की संपत्तियां कथित रूप से ईडी द्वारा कुर्क की गई हैं, जो एजेंसी के इतिहास की सबसे बड़ी प्रवर्तन कार्रवाइयों में से एक है. तलाशी, समन और लुक-आउट नोटिस तेजी से जारी हुए हैं. अनिल की पत्नी टीना को ईडी कार्यालय में बुलाया गया. उनके बच्चे भी प्रवर्तन एजेंसी की जांच के दायरे में हैं.
एक उल्लेखनीय विकास सर्वोच्च न्यायालय में प्रवर्तन निदेशालय द्वारा सीलबंद लिफाफे में प्रत्युत्तर हलफनामा दाखिल करना था, एक प्रक्रियात्मक उपाय जिसने हाल के वर्षों में पारदर्शिता और विधिसम्मत प्रक्रिया पर बहस को जन्म दिया है. कई ईसीआईआर इन मामलों की आधारशिला हैं, जिनमें रिलायंस कम्युनिकेशंस और संबंधित वित्तीय संरचनाओं से जुड़े मामले शामिल हैं. जांच जारी है. कोई अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं निकला है. लेकिन संस्थागत समन्वय का यह विस्तार अंबानी परिवार के कॉर्पोरेट इतिहास में अभूतपूर्व है.
अनिल के पास क्या है?
दशकों तक, अनिल अंबानी के व्यवसाय समूह की प्रमुख सूचीबद्ध कंपनी रिलायंस इन्फ्रास्ट्रक्चर ने उनके कॉर्पोरेट पोर्टफोलियो का आधार संभाला है. इसकी सबसे प्रमुख विरासत परिसंपत्तियों में दिल्ली में बीएसईएस बिजली वितरण फ्रेंचाइज बीएसईएस यमुना पावर और बीएसईएस राजधानी पावर शामिल हैं, जिन्हें 2025 में सर्वोच्च न्यायालय से लगभग ₹21,400–₹28,400 करोड़ के लंबे समय से लंबित नियामकीय परिसंपत्तियों की चार वर्षों में वसूली की मंजूरी मिली. इसे नियामकीय निगरानी के तहत टैरिफ के माध्यम से वसूल किया जा सकता है. वर्षों के वित्तीय तनाव और विनिवेश के बाद ये कुछ शेष प्रमुख आय स्रोतों में हैं.
रोजा पावर सप्लाई कंपनी लिमिटेड, रिलायंस पावर की सहायक कंपनी, उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर के निकट रोज़ा में 1,200 मेगावाट का कोयला-आधारित तापीय विद्युत संयंत्र संचालित करती है. यह संयंत्र, जिसने 2024 के अंत में वार्डे पार्टनर्स को ऋण पूर्व-भुगतान के बाद शून्य-ऋण स्थिति प्राप्त की, राज्य को प्रमुख विद्युत आपूर्तिकर्ता है.
बिजली वितरण से परे, रिलायंस इन्फ्रास्ट्रक्चर मुंबई मेट्रो वन परियोजना संचालित करता है. यह एक प्रमुख शहरी परिवहन परिसंपत्ति है और इसमें स्टेशनों तथा ट्रांजिट-उन्मुख विकास से जुड़ी महत्वपूर्ण अचल संपत्ति शामिल है. हालांकि इसका वित्तीय प्रदर्शन मिश्रित रहा है और हालिया न्यायालय तथा मध्यस्थता कार्यवाहियों के अधीन रहा है. रक्षा क्षेत्र में, कंपनी की एयरोस्पेस और रक्षा शाखा फ्रांस की डसॉल्ट एविएशन के साथ संयुक्त उद्यम के माध्यम से भारत में विमान घटकों और फाल्कन 2000 बिजनेस जेट के निर्माण के प्रयासों का हिस्सा है. यह रिलायंस इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए कुछ उच्च-प्रौद्योगिकी विनिर्माण सहयोगों में से एक है. इस साझेदारी के नवीनतम मोड़ में, डसॉल्ट ने उद्यम में अपनी हिस्सेदारी बहुमत तक बढ़ा दी है. यह रणनीतिक नियंत्रण में बदलाव को रेखांकित करता है, जबकि रिलायंस महत्वपूर्ण अल्पसंख्यक हिस्सेदारी बनाए हुए है.
इनमें से अधिकांश प्रमुख परिसंपत्तियां, जिन्हें लंबे समय से अनिल अंबानी की वापसी का आधार माना जाता था, नियामकीय और प्रवर्तन जांच के दायरे में आ गई हैं. बीएसईएस और मुंबई मेट्रो में हिस्सेदारी भी शामिल है, जिन्हें प्रवर्तन निदेशालय द्वारा चल रही जांच में अस्थायी रूप से कुर्क किया गया है.
शक्ति की तीसरी धुरी: गौतम अडानी
दोनों भाइयों की कानूनी यात्राओं के ऊपर भारत की कॉर्पोरेट शक्ति संरचना में एक तीसरी धुरी है: गौतम अडानी. पिछले दशक में अडानी ऐसे भारतीय उद्योगपति के रूप में उभरे हैं जिनकी संपत्ति वैश्विक धनकुबेर सूचियों में मुकेश अंबानी की बराबरी करती रही है. बाज़ार प्रतिस्पर्धा बुनियादी ढांचे, ऊर्जा, रियल एस्टेट, हवाई अड्डों, रक्षा साझेदारियों और मीडिया परिसंपत्तियों तक फैल गई है. एक खेमे को दूसरे के खिलाफ नियामकीय दबाव से जोड़ने वाले आरोप, प्रति-आरोप और अटकलें अक्सर प्रसारित होती हैं. अदालत में इनमें से किसी की भी पुष्टि नहीं हुई है. फिर भी, भारत के दो सबसे बड़े समूहों के बीच शक्ति संतुलन के बदलने की धारणा बनी हुई है.
एनडीटीवी जैसे मीडिया परिसंपत्तियों का अधिग्रहण, रक्षा विनिर्माण साझेदारियों में बदलाव, शहरी बुनियादी ढांचे की परिसंपत्तियों के लिए प्रतिस्पर्धा, और नवीकरणीय ऊर्जा तथा पेट्रोकेमिकल संक्रमण में स्थिति निर्धारण, इन सभी ने भारत के सबसे बड़े व्यावसायिक घरानों और राजनीतिक प्रतिष्ठान के बीच संबंधों की जांच को तीव्र किया है. सार्वजनिक विमर्श ने कभी इन्हें संरेखण, कभी प्रतिद्वंद्विता, या दोनों के रूप में प्रस्तुत किया है. जो सत्यापित है वह सरल है: कॉर्पोरेट मानचित्र पुनः खींचा जा रहा है जबकि दोनों अंबानी भाइयों के विरुद्ध मुकदमे और प्रवर्तन कार्रवाई न्यायिक चैनलों से आगे बढ़ रही हैं.
इन घटनाक्रमों के पीछे की संस्थागत संरचना भी उतनी ही महत्वपूर्ण है. जांच एजेंसियों में वरिष्ठ नियुक्तियां और विस्तारित कार्यकाल कुछ प्रवर्तन कार्रवाइयों के साथ मेल खाते हैं. आलोचक इसे अधिकार का केंद्रीकरण मानते हैं. सरकार का कहना है कि यह आर्थिक अपराध जांच में निरंतरता और प्रभावशीलता को दर्शाता है. जो निर्विवाद है वह यह कि आज भारतीय राज्य की जांच की गति और संपत्ति फ्रीज करने की क्षमता एक दशक पहले की तुलना में कहीं अधिक है. यह स्पष्ट रूप से प्रवर्तन निदेशालय की बढ़ी हुई शक्तियों में परिलक्षित होता है. 2019 के संशोधनों के बाद, ईडी स्थानीय पुलिस की रिपोर्ट या एफआईआर की प्रतीक्षा किए बिना तलाशी और गिरफ्तारी शुरू कर सकता है. संपत्ति कुर्की तथा तलाशी और छापे की उसकी शक्तियां विशेष रूप से व्यापक हैं. मनी लॉन्ड्रिंग निवारण अधिनियम के तहत जमानत प्राप्त करना अत्यंत कठिन है. सर्वोच्च न्यायालय ने यह बरकरार रखा है कि आरोपी को यह सिद्ध करना होगा कि वह दोषी नहीं है और दोबारा अपराध करने की संभावना नहीं है. क्या इससे प्रारंभिक चरण में न्यायिक निगरानी में उल्लेखनीय कमी आई है, यह अभी भी बहस का विषय है, क्योंकि इस युग में अपराधों की प्रकृति भी अधिक जटिल हो गई है.
वैश्विक शक्ति की ज्यामिति
वैश्विक परिप्रेक्ष्य ने भारत के कॉर्पोरेट शक्ति समीकरण में एक और परत जोड़ दी है. संयुक्त राज्य अमेरिका में, संघीय अभियोजकों और प्रतिभूति एवं विनिमय आयोग ने गौतम अडानी से जुड़ी संस्थाओं के विरुद्ध दीवानी और आपराधिक कार्यवाहियां शुरू की हैं. यह प्रतिभूति प्रकटीकरण से संबंधित आरोपों के बाद हुआ है, जिन पर अदालत में विवाद जारी है और उद्योगपति को समन जारी किए गए हैं.
इसके विपरीत, मुकेश अंबानी ने वर्षों में अमेरिकी राजनीतिक और व्यावसायिक अभिजात वर्ग के साथ दृश्यमान संबंध विकसित किए हैं. अपने मुंबई स्थित निवास पर अंतरराष्ट्रीय गणमान्य व्यक्तियों और यहां तक कि ट्रम्प परिवार के सदस्यों की उपस्थिति वाले उच्च-प्रोफ़ाइल कार्यक्रमों की मेजबानी की है. और अमेरिकी कंपनियों के साथ प्रौद्योगिकी और ऊर्जा सहयोग में रिलायंस को एक रणनीतिक भागीदार के रूप में स्थापित किया है. यह तुलना उल्लेखनीय है: एक भारतीय समूह वाशिंगटन में नियामकीय चुनौतियों का सामना कर रहा है, जबकि दूसरा अंतरराष्ट्रीय कॉर्पोरेट कूटनीति को गहरा कर रहा है.
राज्य की नई ताकत
तो भारत में दोनों अंबानी भाई एक ही समय में दबाव में क्यों हैं?
एक व्याख्या संरचनात्मक है: तेल और गैस के विरासत विवाद निर्णय के चरण में परिपक्व हुए हैं. ठीक उसी समय दूरसंचार और बुनियादी ढांचे के वित्तपोषण से जुड़े वित्तीय तनाव के मामले प्रवर्तन समीक्षा के लिए तैयार हुए हैं.
दूसरी राजनीतिक अर्थव्यवस्था से जुड़ी है: जैसे-जैसे भारत उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन योजनाओं, बजटीय तर्कसंगठन और राजकोषीय सख्ती के माध्यम से औद्योगिक नीति का पुनर्संतुलन करता है, उसके सबसे बड़े समूह भी अनुपालन मानकों से अछूते नहीं हैं. तीसरी संभावना प्रतिस्पर्धी पूंजीवाद ही हो सकती है, जब कॉर्पोरेट साम्राज्य विनियमित क्षेत्रों में फैलते हैं, तो राज्य के साथ टकराव सांख्यिकीय रूप से अपरिहार्य हो जाता है.
अब तक कोई दस्तावेजी साक्ष्य समन्वित लक्ष्यीकरण स्थापित नहीं करता. न ही किसी न्यायिक निष्कर्ष ने किसी भी भाई के विरुद्ध राज्य की दुर्भावनापूर्ण कार्रवाई का संकेत दिया है. मुकेश अंबानी से जुड़े मामले विचाराधीन हैं. अनिल अंबानी से जुड़े मामले जांच के अधीन हैं. विधिसम्मत प्रक्रिया जारी है. लेकिन दृश्य स्पष्ट है: भारत की सबसे सशक्त व्यावसायिक विरासत के दो उत्तराधिकारी संप्रभु सत्ता के साथ समानांतर टकराव का सामना कर रहे हैं.
एक ऐसे देश में जहां कॉर्पोरेट पैमाना अक्सर कथित प्रतिरक्षा में अनुवादित होता है, शक्ति के शिखर पर नियामकीय अभिसरण का यह दृश्य ऐतिहासिक है. क्या यह पूंजी और राज्य शक्ति के बीच भारत के संबंधों के गहरे पुनर्गठन का संकेत है या केवल लंबे समय से लंबित कानूनी विवादों का स्वाभाविक निष्कर्ष, इसका निर्धारण टीवी स्टूडियो या बाज़ार अटकलों में नहीं, बल्कि अदालतों में होगा.
फिलहाल, यह प्रश्न दलाल स्ट्रीट और दिल्ली दोनों पर मंडरा रहा है: क्या यह अछूत उद्योगपतियों के युग का संध्या काल है, या केवल एक परिपक्व गणराज्य में उच्च-दांव का उतार-चढ़ाव, जहां अंततः सबसे शक्तिशाली लोगों को भी अपनी किस्मत सार्वजनिक दृष्टि में मुकदमेबाज़ी के माध्यम से तय करनी होती है?
अंबानी की कहानी पतन के बारे में नहीं हो सकती. लेकिन यह अधिक एक नए संतुलन के बारे में है, जहां सबसे बड़े साम्राज्य भी निर्देश नहीं देते, बल्कि बातचीत करते हैं.
व्यापारिक गलियारों में संरेखण, प्रतिद्वंद्विता और प्रभाव को लेकर अटकलें स्वतंत्र रूप से घूमती रहती हैं. साक्ष्य, हालांकि, बाज़ार की चालों और घोषित लेन-देन तक सीमित हैं. जो निर्विवाद है वह यह कि भारत के अरबपतियों की श्रेणी अब स्थिर नहीं रही.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के निडर लेखक हैं. मुंबई में लगभग दो दशकों की ग्राउंड रिपोर्टिंग के अनुभव के साथ, पालक ने खुद को एक अडिग सच की खोज करने वाले पत्रकार के रूप में स्थापित किया है, जो पैसे, सत्ता और नियमन के गठजोड़ की तहों में गहराई तक जाते हैं. उनके लेख भारत के सबसे प्रतिष्ठित वित्तीय अखबारों जैसे The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line में प्रकाशित हुए हैं जहां उनकी तीखी रिपोर्टिंग ने नरेटिव गढ़े और कॉर्पोरेट बोर्डरूम्स को हिला कर रख दिया.
19 साल की उम्र में ही अपराध पत्रकारिता की ओर खिंचाव महसूस करने वाले पालक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के मुंबई के गिरोह युद्ध अब एक और अधिक चिकने, लेकिन कहीं अधिक खतरनाक संगठित अपराध यानी कॉर्पोरेट टावरों में रची जाने वाली सफेदपोश साजिशों में बदल चुके हैं. यह अहसास ही उन्हें फाइनेंशियल जर्नलिज्म की ओर ले गया, जहां उन्होंने भारत की ‘सफेद धन’ अर्थव्यवस्था की जटिल चालों को वर्षों तक समझा और उजागर किया है. शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामक खामियों तक, पलक का काम हाई-फाइनेंस की चमक-दमक से पर्दा हटाकर दिखाता है कि असली धागे खींच कौन रहा है.)
भारत, यूरोपीय संघ, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, ब्राजील, बारबाडोस और केन्या ने न्यूयॉर्क में शुरू की ‘बहुपक्षवाद के लिए साझेदार’ पहल; अंतरराष्ट्रीय कानून, शांति और समावेशी विकास के लिए सहयोग बढ़ाने का लक्ष्य
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत, यूरोपीय संघ (EU), ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, ब्राजील, बारबाडोस और केन्या ने संयुक्त राष्ट्र में सुधार और बहुपक्षीय सहयोग को मजबूत करने के लिए ‘बहुपक्षवाद के लिए साझेदार’ (Partners for Multilateralism- P4M ),पहल शुरू की है. यह पहल 81वीं संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान 21 सितंबर को न्यूयॉर्क में शुरू की गई. सातों शुरुआती सह-प्रायोजक देशों ने P4M समिट की घोषणा को अपनाया.
P4M का उद्देश्य अलग-अलग क्षेत्रों के देशों को अंतरराष्ट्रीय कानून, शांति, समावेशी विकास और साझा समृद्धि जैसे साझा सिद्धांतों के आधार पर एक साथ लाना है. पहल ऐसे समय शुरू हुई है जब दुनिया में भू-राजनीतिक तनाव, संघर्ष, ध्रुवीकरण और संरक्षणवाद बढ़ने के बीच बहुपक्षीय सहयोग को लेकर चिंताएं सामने आ रही हैं.
संयुक्त राष्ट्र में व्यापक सुधार पर जोर
P4M घोषणा में बहुपक्षीय व्यवस्था में सुधार को प्रमुख प्राथमिकता दी गई है. इसमें खास तौर पर संयुक्त राष्ट्र को अधिक प्रभावी, प्रतिनिधित्वपूर्ण, समावेशी और मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों के अनुरूप बनाने पर जोर दिया गया है.
सदस्य देशों ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र चार्टर पर आधारित बहुपक्षीय व्यवस्था आज भी जरूरी है, लेकिन दुनिया के तेजी से बदलते स्वरूप को देखते हुए इसमें सुधार की जरूरत है. देशों के मुताबिक मौजूदा वैश्विक व्यवस्था पहले की तुलना में अधिक आपस में जुड़ी हुई, जटिल और बहुध्रुवीय हो गई है.
घोषणा में UN80 जैसी पहलों के जरिए बहुपक्षीय संस्थानों को मजबूत और अधिक प्रभावी बनाने की प्रतिबद्धता जताई गई है. इसका उद्देश्य संयुक्त राष्ट्र की संघर्षों को रोकने, संकटों से निपटने, सतत विकास को बढ़ावा देने, मानवाधिकारों की रक्षा करने और नई वैश्विक चुनौतियों से निपटने की क्षमता को मजबूत करना है.
भारत ने पहले भी उठाया है वैश्विक संस्थाओं में सुधार का मुद्दा
P4M पहल भारत के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में नई दिल्ली में हुए 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में वैश्विक शासन व्यवस्था में व्यापक सुधार की जरूरत पर जोर दिया था. उन्होंने वैश्विक नियमों को तय करने में ग्लोबल साउथ की अधिक भूमिका की बात कही थी.
मोदी ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों में बदलाव की जरूरत भी बताई थी. ऐसे में P4M के जरिए बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार और उन्हें अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण बनाने का मुद्दा भारत की प्राथमिकताओं से भी जुड़ता है.
अंतरराष्ट्रीय कानून और संप्रभु समानता पर जोर
P4M घोषणा में अंतरराष्ट्रीय कानून के पालन, देशों की संप्रभु समानता, क्षेत्रीय अखंडता और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान के सिद्धांतों को दोहराया गया है. इसमें बल प्रयोग या बल प्रयोग की धमकी पर रोक के सिद्धांत का भी समर्थन किया गया है.
सदस्य देशों ने कहा कि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में अंतरराष्ट्रीय नियमों और सहयोग की भूमिका को मजबूत करना जरूरी है. जलवायु परिवर्तन, नई तकनीकों और अन्य वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता है.
व्यापार, तकनीक और जलवायु पर भी सहयोग
P4M का एजेंडा केवल राजनीतिक और सुरक्षा मामलों तक सीमित नहीं है. घोषणा में वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को अधिक मजबूत और लचीला बनाने, बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था में सुधार और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय ढांचे को बेहतर बनाने की बात कही गई है.
इसके अलावा डिजिटल बदलाव, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, जलवायु परिवर्तन और वैश्विक स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर भी जोर दिया गया है. इसका उद्देश्य अलग-अलग क्षेत्रों के देशों के बीच व्यावहारिक सहयोग को बढ़ावा देना है.
अन्य देशों के लिए भी खुला रहेगा मंच
P4M को किसी नए औपचारिक गठबंधन के तौर पर पेश नहीं किया गया है. इसका उद्देश्य अलग-अलग भू-राजनीतिक परिस्थितियों वाले देशों को बहुपक्षीय सहयोग के साझा एजेंडे पर साथ लाना है. यह पहल भविष्य में अन्य क्षेत्रों और देशों की भागीदारी के लिए भी खुली रहेगी.
यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंतोनियो कोस्टा ने P4M को संवाद, गठबंधन निर्माण और व्यावहारिक सहयोग के लिए एक मंच बताया है. उन्होंने कहा कि यह अलग-अलग क्षेत्रों के बीच पुल बनाने और बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार तथा आधुनिकीकरण में योगदान दे सकता है.
न्यूयॉर्क में हुई P4M बैठक
P4M शिखर बैठक 21 सितंबर को न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के उच्चस्तरीय सप्ताह के दौरान हुई. इसमें भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज, बारबाडोस की प्रधानमंत्री मिया मोटली, ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा, कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी और केन्या के राष्ट्रपति विलियम रूटो शामिल हुए.
सातों शुरुआती साझेदार देशों ने कहा है कि वे दुनिया के अन्य देशों के साथ नियमित संवाद और समन्वय जारी रखेंगे, ताकि बहुपक्षीय सहयोग को मजबूत किया जा सके और वैश्विक संस्थाओं में सुधार के लिए व्यावहारिक कदम आगे बढ़ाए जा सकें.
सागरमाला फाइनेंस कॉरपोरेशन अगले सप्ताह कर सकता है देश के पहले ब्लू बॉन्ड का इश्यू, पोर्ट कनेक्टिविटी, जहाज निर्माण और तटीय बुनियादी ढांचे से जुड़ी परियोजनाओं को मिल सकता है वित्त
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत सस्टेनेबल फाइनेंस के एक नए क्षेत्र में कदम रखने जा रहा है. सागरमाला फाइनेंस कॉरपोरेशन अगले सप्ताह देश का पहला ब्लू बॉन्ड जारी कर सकता है. इसके जरिए करीब ₹1,000 करोड़ तक जुटाने की योजना है. इस रकम का इस्तेमाल समुद्री क्षेत्र, तटीय बुनियादी ढांचे और जल से जुड़ी परियोजनाओं के वित्तपोषण में किया जा सकता है. सागरमाला फाइनेंस कॉरपोरेशन बंदरगाह, जहाजरानी और जलमार्ग मंत्रालय के तहत काम करने वाली सरकारी स्वामित्व वाली वित्तीय संस्था है. प्रस्तावित ब्लू बॉन्ड के जरिए भारत ग्रीन बॉन्ड से आगे बढ़कर सस्टेनेबल डेट मार्केट के एक नए हिस्से में प्रवेश करेगा.
क्या होता है ब्लू बॉन्ड?
ब्लू बॉन्ड ऐसे डेट इंस्ट्रूमेंट होते हैं, जिनसे जुटाई गई रकम का इस्तेमाल समुद्र, महासागर, तटीय क्षेत्रों, नदियों और अन्य जल आधारित पारिस्थितिकी तंत्र से जुड़ी परियोजनाओं के लिए किया जाता है. दुनियाभर में इनका इस्तेमाल समुद्री संरक्षण, टिकाऊ मत्स्य पालन और जल बुनियादी ढांचे जैसी परियोजनाओं के लिए किया जाता रहा है. भारत में प्रस्तावित इश्यू से समुद्री और जल क्षेत्र की लंबी अवधि वाली परियोजनाओं के लिए पूंजी जुटाने का एक नया माध्यम तैयार हो सकता है.
₹1,000 करोड़ तक जुटाने की योजना
सागरमाला फाइनेंस कॉरपोरेशन पहले ही अपने पहले ब्लू बॉन्ड के जरिए ₹1,000 करोड़ तक जुटाने की योजना का संकेत दे चुका है. प्रस्तावित फंड का इस्तेमाल पोर्ट कनेक्टिविटी, जहाज निर्माण, अंतर्देशीय जलमार्ग और तटीय बुनियादी ढांचे से जुड़ी परियोजनाओं में किया जा सकता है.
इस बॉन्ड इश्यू से कंपनी के लिए कर्ज जुटाने के स्रोतों में भी विविधता आएगी. साथ ही, लंबी अवधि की बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के अनुरूप लंबी अवधि का वित्त जुटाने में मदद मिल सकती है. यह इश्यू भारत में ब्लू फाइनेंस के लिए निवेशकों की रुचि को भी परख सकता है. अभी भारत के सस्टेनेबल डेट मार्केट में ग्रीन बॉन्ड का हिस्सा अधिक रहा है.
भारत के सस्टेनेबल फाइनेंस मार्केट को मिलेगा नया विकल्प
भारत का पहला ब्लू बॉन्ड ऐसे समय में आ रहा है जब दुनियाभर में समुद्र और जल से जुड़ी परियोजनाओं के लिए वित्त जुटाने में रुचि बढ़ रही है. सेशेल्स ने 2018 में दुनिया का पहला सॉवरेन ब्लू बॉन्ड जारी किया था.
भारत में सागरमाला फाइनेंस के अलावा वडोदरा नगर निगम भी ब्लू बॉन्ड जारी करने की संभावनाओं पर काम कर रहा है. वडोदरा करीब ₹200 करोड़ का ब्लू बॉन्ड जारी करने पर विचार कर रहा है. इससे पंप हाउस, जल शोधन संयंत्र और साफ पानी के जलाशय जैसी जल संबंधी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को वित्त दिया जा सकता है.
आगे के लिए बन सकता है मॉडल
सागरमाला फाइनेंस का प्रस्तावित इश्यू भारत के डेट मार्केट में एक नए सेगमेंट की शुरुआत कर सकता है. इससे समुद्री, तटीय और जल आधारित बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए भविष्य में इस तरह के बॉन्ड के जरिए फंड जुटाने का रास्ता खुल सकता है. हालांकि, बॉन्ड का अंतिम आकार, जारी करने की तारीख और शर्तें नियामकीय मंजूरियों और उस समय की बाजार परिस्थितियों पर निर्भर करेंगी. इसके बावजूद, प्रस्तावित इश्यू भारत में ब्लू फाइनेंस के विकास की दिशा में एक नया कदम होगा.
जून 2026 तक AIF में कुल निवेश ₹7.1 लाख करोड़ पहुंचा, सालाना आधार पर निवेश प्रतिबद्धता 23.6% बढ़ी; रियल एस्टेट में पहली बार गिरावट
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
ऑल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट फंड (AIF) में निवेश का आंकड़ा पहली बार 7 लाख करोड़ रुपये के पार पहुंच गया है. भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) के आंकड़ों के मुताबिक, जून 2026 तक AIF में कुल निवेश बढ़कर 7.1 लाख करोड़ रुपये हो गया. वहीं, इस श्रेणी के फंड्स के लिए कुल निवेश प्रतिबद्धता बढ़कर 17.53 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गई, जो मार्च 2026 के अंत में 16.94 लाख करोड़ रुपये थी. यानी तीन महीने में प्रतिबद्धता में करीब 3.5 फीसदी की बढ़ोतरी हुई.
सालाना आधार पर देखें तो जून 2025 की तुलना में AIF में निवेश प्रतिबद्धता करीब 23.6 फीसदी बढ़ी है. इस दौरान AIF के जरिए जुटाया गया कुल फंड भी बढ़कर 7.58 लाख करोड़ रुपये हो गया. आंकड़े बताते हैं कि वैकल्पिक निवेश का यह सेगमेंट लगातार विस्तार कर रहा है.
क्या होता है AIF
AIF ऐसे निवेश फंड होते हैं जो आमतौर पर पारंपरिक म्यूचुअल फंड या बैंक FD से अलग तरह की संपत्तियों और कंपनियों में निवेश करते हैं. इनमें बड़े निवेशक अपना पैसा लगाते हैं और पेशेवर फंड मैनेजर उस पैसे को अलग-अलग अवसरों में निवेश करते हैं. AIF के जरिए स्टार्टअप और अनलिस्टेड कंपनियां, प्राइवेट इक्विटी, रियल एस्टेट और इंफ्रास्ट्रक्चर, कर्ज/डेट इंस्ट्रूमेंट में निवेश किया जाता है. वहीं, कुछ मामलों में शेयर और अन्य वैकल्पिक जगह भी निवेश होता है.
चार साल में तीन गुना से ज्यादा हुई प्रतिबद्धता
AIF में निवेश प्रतिबद्धता पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ी है. जून 2021 में यह 4.87 लाख करोड़ रुपये थी, जो जून 2022 में बढ़कर 6.94 लाख करोड़ रुपये हो गई. जून 2023 में यह आंकड़ा 8.45 लाख करोड़ रुपये और जून 2024 में 11.78 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया.
इसके बाद भी बढ़ोतरी का सिलसिला जारी रहा. मार्च 2026 तक AIF में निवेश प्रतिबद्धता 16.94 लाख करोड़ रुपये थी, जो जून 2026 तक बढ़कर 17.53 लाख करोड़ रुपये हो गई.
इस तरह चार साल की अवधि में AIF में निवेश के लिए की गई प्रतिबद्धता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है. यह ऐसे समय में हो रहा है जब वैकल्पिक निवेश उत्पादों के प्रति बड़े और संस्थागत निवेशकों की दिलचस्पी बढ़ी है.
रियल एस्टेट में पहली बार निवेश घटा
AIF के आंकड़ों में एक अहम बदलाव रियल एस्टेट क्षेत्र में देखने को मिला है. जून 2026 तक रियल एस्टेट में कुल निवेश 87,969 करोड़ रुपये रहा, जबकि मार्च 2026 में यह करीब 1.29 लाख करोड़ रुपये था. यानी इस क्षेत्र में तिमाही आधार पर निवेश में गिरावट दर्ज की गई.
हालांकि, निवेश के मामले में रियल एस्टेट अब भी AIF के प्रमुख क्षेत्रों में शामिल है. वहीं वित्तीय सेवाओं, सूचना प्रौद्योगिकी (IT), नॉन-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFC), बैंकों, फार्मा और हेल्थकेयर जैसे क्षेत्रों में निवेश लगातार बढ़ रहा है. इन सेक्टरों में बढ़ता निवेश AIF के पोर्टफोलियो के धीरे-धीरे ज्यादा विविध होने का संकेत देता है.
प्रतिबद्धता और निवेश में क्या अंतर है?
AIF के आंकड़ों को समझने के लिए ‘कमिटमेंट’ और ‘इन्वेस्टमेंट’ के बीच अंतर समझना जरूरी है. निवेशक जब किसी AIF में पैसा लगाने की प्रतिबद्धता जताते हैं, तो पूरी रकम आमतौर पर एक साथ फंड में नहीं आती. फंड मैनेजर जरूरत और निवेश के अवसर के अनुसार इसे अलग-अलग किस्तों में बुलाते हैं.
यही वजह है कि कुल निवेश प्रतिबद्धता का आंकड़ा जुटाए गए फंड और वास्तविक निवेश से काफी अधिक रहता है. जैसे-जैसे फंड मैनेजर निवेश के लिए प्रतिबद्ध रकम का इस्तेमाल करते हैं, उसका असर जुटाए गए फंड और वास्तविक निवेश के आंकड़ों में दिखाई देता है.
SEBI के सुधारों से भी मिला सहारा
पिछले कुछ वर्षों में बाजार नियामक SEBI ने AIF के लिए फंड जुटाने और उनके संचालन को आसान बनाने के लिए कई बदलाव किए हैं. नियामक का फोकस इस सेगमेंट के कामकाज को अधिक व्यवस्थित बनाने और निवेश प्रक्रिया को आसान करने पर रहा है.
SEBI निवेशकों को AIF जैसे वैकल्पिक निवेश उत्पादों से जोड़ने के लिए एक्रिडिटेड इन्वेस्टर फ्रेमवर्क की भी समीक्षा करने पर विचार कर रहा है. ऐसे नियामकीय बदलावों से इस सेगमेंट में निवेशकों की भागीदारी और फंड मैनेजरों के लिए पूंजी जुटाने की प्रक्रिया पर असर पड़ सकता है.
कुल मिलाकर, जून 2026 तक के आंकड़े AIF बाजार के लगातार विस्तार की तस्वीर दिखाते हैं. ₹7.1 लाख करोड़ का वास्तविक निवेश पहली बार ₹7 लाख करोड़ के पार पहुंचना और ₹17.53 लाख करोड़ की निवेश प्रतिबद्धता यह बताती है कि वैकल्पिक निवेश फंड भारतीय निवेश बाजार में लगातार बड़ा स्थान बना रहे हैं.
मजबूत मांग के बीच UltraTech, Ambuja Cement और JSW Cement का फोकस लागत घटाने, क्षमता बढ़ाने और प्रीमियम उत्पादों की बिक्री पर; आने वाले वर्षों में 7-8% सालाना बढ़ सकती है सीमेंट की मांग
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
सीमेंट कंपनियों के लिए मांग का माहौल मजबूत बना हुआ है, लेकिन बढ़ती ईंधन और माल ढुलाई लागत मुनाफे पर दबाव डाल रही है. ऐसे में कंपनियां केवल सीमेंट की कीमत बढ़ाकर मार्जिन सुधारने के बजाय लागत घटाने, प्लांट की क्षमता का बेहतर इस्तेमाल करने और प्रीमियम उत्पादों की बिक्री बढ़ाने पर जोर दे रही हैं. अल्ट्राटेक सीमेंट (UltraTech Cement), अंबुजा सीमेंट (Ambuja Cement) और जेएसडब्ल्यू सीमेंट (JSW Cement) की रणनीति में इसका असर साफ दिखाई दे रहा है.
ग्लोबल इनवेस्टमेंट बैंक Jefferies की इंडिया फोरम की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, तीनों कंपनियां आने वाले वर्षों में अलग-अलग तरीकों से लागत कम करने और ऑपरेटिंग प्रॉफिट बढ़ाने की दिशा में काम कर रही हैं. कंपनियों को उम्मीद है कि मजबूत मांग के साथ लागत पर नियंत्रण से उनकी कमाई में सुधार हो सकता है.
3-5 साल में 7-8% बढ़ सकती है सीमेंट की मांग
रिपोर्ट के अनुसार, मकान निर्माण, इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स और निजी क्षेत्र के निवेश से सीमेंट की मांग उम्मीद से बेहतर बनी हुई है. देश की सबसे बड़ी सीमेंट कंपनियों में शामिल अल्ट्राटेक की मौजूदा उत्पादन क्षमता करीब 20 करोड़ टन सालाना है. कंपनी इसे बढ़ाकर 23.7 करोड़ टन करने की तैयारी में है. 2019 के बाद कंपनी अपनी उत्पादन क्षमता करीब दोगुनी कर चुकी है. अब कंपनी का फोकस सिर्फ नई क्षमता जोड़ने पर नहीं, बल्कि मौजूदा प्लांट्स का बेहतर इस्तेमाल करने पर भी है. क्षमता का उपयोग बढ़ने से प्रति टन सीमेंट उत्पादन की औसत लागत कम हो सकती है, जिससे कंपनी के मुनाफे को सहारा मिलेगा.
अंबुजा सीमेंट: 500 रुपये प्रति टन तक लागत घटाने का लक्ष्य
अंबुजा सीमेंट का जोर भी क्षमता विस्तार के साथ लागत कम करने पर है. कंपनी ने पिछले कुछ वर्षों में ACC, Sanghi, Penna और Orient जैसी कंपनियों या उनकी परिसंपत्तियों को अपने कारोबार में जोड़ा है. हालांकि, कुछ अधिग्रहित परिसंपत्तियों के प्रदर्शन में सुधार उम्मीद से अधिक समय ले रहा है.
कंपनी ने अगले दो वर्षों में अपनी लागत करीब 500 रुपये प्रति टन तक कम करने का लक्ष्य रखा है. इसके लिए लॉजिस्टिक्स पर भी काम किया जा रहा है. अंबुजा चालू वित्त वर्ष के अंत तक सीमेंट की औसत ढुलाई दूरी करीब 15 किलोमीटर कम करने की योजना बना रही है. इससे परिवहन लागत घट सकती है.
कंपनी ऊर्जा लागत कम करने के लिए भी कदम उठा रही है. अंबुजा सीमेंट अपने कुल बिजली इस्तेमाल में ग्रीन एनर्जी की हिस्सेदारी मौजूदा करीब 30 फीसदी से बढ़ाकर 60 फीसदी करना चाहती है. इसके साथ ही मिक्स सीमेंट और ज्यादा कीमत वाले प्रीमियम उत्पादों की हिस्सेदारी बढ़ाने की योजना है. इस रणनीति का मकसद सीमेंट की कीमतों में बड़ी बढ़ोतरी किए बिना प्रति टन मुनाफा बढ़ाना है.
जेएसडब्ल्यू सीमेंट: 6.8 करोड़ टन होगी क्षमता
जेएसडब्ल्यू सीमेंट भी आने वाले वर्षों में बड़े क्षमता विस्तार की तैयारी कर रही है. कंपनी अपनी मौजूदा करीब 2.41 करोड़ टन सालाना क्षमता को अगले 5 से 7 वर्षों में बढ़ाकर करीब 6.8 करोड़ टन करना चाहती है.
कंपनी के कुल कारोबार में करीब 70 फीसदी हिस्सेदारी दूसरी कंपनियों और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स से आती है. इसलिए इंफ्रा और निर्माण गतिविधियों में तेजी उसके लिए मांग का महत्वपूर्ण आधार बनी हुई है. जेएसडब्ल्यू सीमेंट भी कीमत बढ़ाने के बजाय लागत कम करने पर जोर दे रही है. कंपनी नवीकरणीय ऊर्जा, वैकल्पिक ईंधन, वेस्ट हीट से बिजली उत्पादन और लॉजिस्टिक्स को बेहतर बनाने जैसे उपायों पर काम कर रही है. कंपनी का लक्ष्य प्रति टन ऑपरेटिंग प्रॉफिट को वित्त वर्ष 2025-26 के करीब 900 रुपये से बढ़ाकर लगभग 1,100 रुपये करना है.
कीमतों के बजाय लागत पर क्यों बढ़ा फोकस?
सीमेंट उद्योग में मांग मजबूत रहने के बावजूद कंपनियों के सामने लागत का दबाव बना हुआ है. ईंधन, बिजली और परिवहन खर्च बढ़ने पर कीमत बढ़ाना हमेशा आसान नहीं होता, क्योंकि इससे मांग पर असर पड़ सकता है और बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है. ऐसे में कंपनियों के लिए प्लांट की क्षमता का बेहतर इस्तेमाल, कम दूरी तक माल ढुलाई, सस्ती और नवीकरणीय ऊर्जा का इस्तेमाल तथा प्रीमियम सीमेंट की बिक्री बढ़ाना मुनाफा सुधारने के वैकल्पिक तरीके बन रहे हैं.
कुल मिलाकर, सीमेंट उद्योग में कंपनियों की रणनीति अब सिर्फ ‘कीमत बढ़ाओ और मार्जिन बचाओ’ तक सीमित नहीं रह गई है. मजबूत मांग के बीच उत्पादन क्षमता बढ़ाने के साथ लागत घटाने और प्रति टन कमाई बढ़ाने पर जोर है. अगर सीमेंट की मांग अनुमान के मुताबिक बढ़ती है और कंपनियां लागत नियंत्रण के अपने लक्ष्य हासिल करती हैं, तो आने वाले वर्षों में उनके ऑपरेटिंग मार्जिन और मुनाफे को सहारा मिल सकता है.
5 दिन तक प्रभावित हो सकती हैं बैंकिंग सेवाएं, हाफ इयरली क्लोजिंग के बीच हड़ताल से बढ़ सकती है परेशानी
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
बैंक कर्मचारियों की 28 सितंबर से प्रस्तावित देशव्यापी हड़ताल को लेकर वित्त मंत्रालय ने बैंक यूनियनों से आंदोलन वापस लेने की अपील की है. मंत्रालय का कहना है कि कर्मचारियों की कई प्रमुख मांगों पर पहले ही कदम उठाए जा चुके हैं और बाकी मुद्दों को बातचीत के जरिए सुलझाया जा सकता है. यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस (UFBU) ने 5 दिन के वर्किंग वीक समेत कई मांगों को लेकर 28 सितंबर से तीन दिन की हड़ताल का ऐलान किया है.
28 सितंबर से 3 दिन की हड़ताल
UFBU की प्रस्तावित हड़ताल 28 सितंबर से शुरू होगी. इससे बैंकिंग सेवाओं पर असर पड़ने की आशंका है. हड़ताल से ठीक पहले सप्ताहांत की छुट्टियां होने के कारण कई जगह लगातार पांच दिन तक बैंक शाखाओं का कामकाज प्रभावित हो सकता है.
इस हड़ताल का समय इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बैंकों की हाफ इयरली क्लोजिंग यानी 30 सितंबर के आसपास पड़ रही है. इस दौरान खातों के मिलान, प्रोविजनिंग, ट्रेजरी और अन्य वित्तीय गतिविधियों का काम महत्वपूर्ण होता है. ऐसे में बैंक कर्मचारियों की हड़ताल से ग्राहकों, कारोबारियों और सरकारी लेन-देन से जुड़े काम प्रभावित हो सकते हैं.
सरकार ने गिनाए कर्मचारियों के लिए उठाए गए कदम
वित्त मंत्रालय ने कहा है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक देश की आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और सरकार बैंक कर्मचारियों के हितों को ध्यान में रखते हुए कई कदम उठा चुकी है. मंत्रालय के मुताबिक, कर्मचारियों के वेतन और भत्तों में बढ़ोतरी, नया पे-स्केल लागू करने और स्टाफ वेलफेयर फंड का दायरा बढ़ाने जैसे फैसले लिए गए हैं. इसके अलावा असिस्टेंट जनरल मैनेजर से लेकर चीफ जनरल मैनेजर स्तर तक के उच्च पदों की संख्या भी बढ़ाई गई है. कर्मचारियों की मांगों को देखते हुए परफॉर्मेंस लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम को भी बातचीत के बाद स्थगित किया गया था.
वेतन समझौते पर समय से पहले शुरू हुई बातचीत
मंत्रालय ने बताया कि बैंक कर्मचारियों के वेतन संशोधन और भत्तों से जुड़े नए द्विपक्षीय समझौते (Bipartite Settlement) की प्रक्रिया भी समय से पहले शुरू की गई है. सरकार का कहना है कि नवंबर 2027 की निर्धारित समयसीमा से काफी पहले इस प्रक्रिया को पूरा करने का प्रयास किया जा रहा है.
5 दिन के वर्किंग वीक की मांग पर क्या कहा?
बैंक यूनियनों की प्रमुख मांगों में 5 दिन का वर्किंग वीक भी शामिल है. मौजूदा व्यवस्था में बैंक आम तौर पर दूसरे और चौथे शनिवार को बंद रहते हैं, जबकि अन्य शनिवार को कामकाज होता है. सरकार का कहना है कि बाकी शनिवार को बैंक शाखाएं खुली रहने से आम लोगों को बैंकिंग सेवाओं तक पहुंच मिलती है. मंत्रालय ने कर्मचारियों से अपील की है कि वे हड़ताल के बजाय बातचीत का रास्ता अपनाएं और लंबित मुद्दों का समाधान चर्चा के जरिए निकालें.
सरकार के अनुसार, हड़ताल से बैंकिंग सेवाओं के साथ-साथ आम ग्राहकों, कारोबारियों और स्वयं कर्मचारियों पर भी असर पड़ सकता है.
शापूरजी पलोनजी (SP) ग्रुप के पास टाटा संस की 18.37 फीसदी हिस्सेदारी है. समूह लंबे समय से इस हिस्सेदारी में अधिक तरलता चाहता है, क्योंकि उसकी होल्डिंग और ऑपरेटिंग कंपनियों पर बड़ी मात्रा में कर्ज है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
शापूरजी पलोनजी ग्रुप (SP Group) के चेयरमैन शापूर मिस्त्री ने टाटा संस की सार्वजनिक लिस्टिंग के समर्थन में टाटा ट्रस्ट्स से सहयोग की अपील की है. यह बयान ऐसे समय आया है जब भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की नियामकीय कार्रवाई के बाद टाटा संस पर शेयर बाजार में लिस्टिंग से जुड़े नियमों का पालन करने का दबाव बढ़ गया है. वहीं, टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा लिस्टिंग का विरोध कर रहे हैं.
शापूरजी पलोनजी (SP) ग्रुप के पास टाटा संस की 18.37 फीसदी हिस्सेदारी है. समूह लंबे समय से इस हिस्सेदारी में अधिक तरलता चाहता है, क्योंकि उसकी होल्डिंग और ऑपरेटिंग कंपनियों पर बड़ी मात्रा में कर्ज है. मिस्त्री ने कहा कि लिस्टिंग का मुद्दा शेयरधारकों के बीच विवाद के तौर पर देखने के बजाय सभी संबंधित पक्षों को मिलकर इसका समाधान तलाशना चाहिए. उन्होंने दोनों कारोबारी समूहों के बीच संबंधों को और मजबूत करने की इच्छा भी जताई.
लिस्टिंग को लेकर मिलकर फैसला लेने की अपील
मिस्त्री ने टाटा ट्रस्ट्स, टाटा संस, कंपनी के नेतृत्व, शेयरधारकों और अन्य हितधारकों से लिस्टिंग के मुद्दे पर सामूहिक रूप से विचार करने की अपील की. उन्होंने कहा कि SP ग्रुप और टाटा समूह के बीच संबंध 100 साल से भी ज्यादा पुराने हैं और दोनों समूहों के बीच आगे भी बेहतर सहयोग की संभावनाएं हैं.
उनका यह बयान 17 सितंबर को हुई टाटा संस बोर्ड की बैठक के बाद आया है. इस बैठक में बोर्ड ने एन. चंद्रशेखरन को कार्यकारी चेयरमैन के तौर पर एक और पांच साल का कार्यकाल देने को मंजूरी दी थी. हालांकि, नोएल टाटा ने इस प्रस्ताव के खिलाफ वोट किया था.
बोर्ड ने RBI की लागू गाइडलाइंस का पालन करने के लिए जरूरी कदम उठाने और नियामक, टाटा ट्रस्ट्स तथा अन्य हितधारकों से लागू नियमों को लेकर मार्गदर्शन लेने का भी फैसला किया था.
टाटा संस में हिस्सेदारी SP ग्रुप के लिए अहम
SP ग्रुप ने 1965 में पहली बार टाटा संस के शेयर खरीदे थे. इसके बाद समूह ने अपनी हिस्सेदारी बढ़ाकर 18.37 फीसदी कर ली, जिससे वह टाटा संस का सबसे बड़ा अल्पमत शेयरधारक बन गया. हालांकि, टाटा संस के शेयरों से जुड़े प्रतिबंधों के कारण SP ग्रुप के लिए इस हिस्सेदारी को आसानी से भुनाना संभव नहीं रहा है. समूह की कंपनियों पर मौजूद कर्ज के बीच टाटा संस में हिस्सेदारी उसके लिए संभावित नकदी स्रोत के तौर पर महत्वपूर्ण बनी हुई है. टाटा संस की सार्वजनिक लिस्टिंग होने पर इस हिस्सेदारी के लिए बाजार आधारित मूल्य भी तय हो सकता है.
नोएल टाटा ने दिया था 3 फीसदी हिस्सेदारी बेचने का प्रस्ताव
17 सितंबर की बोर्ड बैठक में नोएल टाटा ने एक प्रस्ताव रखा था. इसके तहत SP ग्रुप को टाटा संस में 3 फीसदी तक हिस्सेदारी बेचने के बदले करीब ₹25,000 करोड़ जुटाने का रास्ता सुझाया गया था. इस प्रस्ताव को टाटा संस को निजी कंपनी बनाए रखते हुए SP ग्रुप की नकदी जरूरतों को पूरा करने के वैकल्पिक तरीके के तौर पर देखा गया.
RBI के फैसले से बदला लिस्टिंग का समीकरण
टाटा संस की लिस्टिंग को लेकर बहस उस समय और तेज हो गई जब RBI ने टाटा संस की कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी (CIC) के रूप में अपना रजिस्ट्रेशन सरेंडर करने की मांग को खारिज कर दिया. इसके बाद टाटा संस पर अपर-लेयर नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी (NBFC) से जुड़े नियामकीय ढांचे के तहत लागू आवश्यकताओं का पालन करने की स्थिति बनी हुई है, जिसमें संबंधित लिस्टिंग नियम भी शामिल हैं.
बोर्ड की ओर से अनुपालन की प्रक्रिया शुरू करने का फैसला कंपनी के पहले के रुख से बदलाव को दर्शाता है. इससे पहले टाटा संस सार्वजनिक लिस्टिंग से बचने के प्रयास कर रही थी. टाटा ट्रस्ट्स के पास टाटा संस की करीब 66 फीसदी हिस्सेदारी है और वह लिस्टिंग का विरोध कर रहा है. इसके विपरीत, SP ग्रुप लगातार टाटा संस की लिस्टिंग के पक्ष में रहा है.
रक्षा मंत्रालय के अनुसार, इन APUs को Make-II फ्रेमवर्क के तहत देश में ही विकसित किया गया है. Make-II के तहत उद्योगों की अगुवाई में रिसर्च और डेवलपमेंट को बढ़ावा दिया जाता है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
रक्षा मंत्रालय ने भारतीय सेना के T-72 और T-90 टैंकों के लिए सहायक विद्युत इकाइयां (APUs) की खरीद को लेकर एक्यूरेट इंडस्ट्रीयल कंट्रोल्स (Accurate Industrial Controls Private Limited) के साथ ₹586 करोड़ का करार किया है. यह समझौता 21 सितंबर को नई दिल्ली में रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह की मौजूदगी में हुआ. APU टैंकों के महत्वपूर्ण सिस्टम के लिए बिजली का वैकल्पिक स्रोत उपलब्ध कराता है. इनमें फायर-कंट्रोल सिस्टम, फायरिंग सर्किट, गन स्टेबिलाइजेशन सिस्टम और टैंक में लगे अन्य उपकरण शामिल हैं. मंत्रालय के मुताबिक, इन APUs को सेना के मैकेनाइज्ड फॉर्मेशन की ऑपरेशनल तैयारियों, विश्वसनीयता और टिकाऊपन को मजबूत करने में मदद मिलेगी.
Make-II के तहत विकसित किए गए हैं APUs
इस खरीद को बख्तरबंद प्लेटफॉर्म में इस्तेमाल होने वाले महत्वपूर्ण सब-सिस्टम के स्वदेशीकरण की दिशा में भी अहम कदम माना जा रहा है. रक्षा मंत्रालय के अनुसार, इन APUs को Make-II फ्रेमवर्क के तहत देश में ही विकसित किया गया है. Make-II के तहत उद्योगों की अगुवाई में रिसर्च और डेवलपमेंट को बढ़ावा दिया जाता है.
आयात पर निर्भरता कम करने पर जोर
₹586 करोड़ का यह करार रक्षा क्षेत्र में घरेलू विनिर्माण क्षमता बढ़ाने और महत्वपूर्ण रक्षा उपकरणों के लिए आयात पर निर्भरता कम करने की सरकार की व्यापक रणनीति का हिस्सा है. मंत्रालय ने कहा कि यह खरीद 'विकसित भारत@2047' के विजन और मजबूत, आत्मनिर्भर तथा वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी भारतीय रक्षा उद्योग के निर्माण के उद्देश्य के अनुरूप है.
T-72 और T-90 टैंकों के बेड़े में स्वदेशी APUs की तैनाती से इन टैंकों के इलेक्ट्रॉनिक और हथियार प्रणालियों को संचालित करने वाले सहायक सिस्टम को मजबूती मिलने की उम्मीद है. साथ ही, यह रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाने की दिशा में भी योगदान देगा.
RBI के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, 19 से 21 सितंबर के बीच बैंकिंग सिस्टम में शुद्ध नकदी अधिशेष करीब ₹6 लाख करोड़ रहा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की ओर से बॉन्ड बेचकर बैंकिंग सिस्टम से अतिरिक्त नकदी निकालने का असर अब दिखाई देने लगा है. बैंकिंग सिस्टम में अतिरिक्त नकदी का अधिशेष घटकर करीब ₹6 लाख करोड़ रह गया है. इसके साथ ही बैंकों के बीच एक-दूसरे को दिए जाने वाले overnight loans की ब्याज दर भी बढ़कर 5.24 फीसदी हो गई है, जो RBI की रेपो रेट के करीब है. बॉन्ड बिक्री के साथ GST भुगतान के लिए हुई नकद निकासी ने भी सिस्टम में मौजूद अतिरिक्त नकदी को कम किया है.
सितंबर की शुरुआत में ₹11.16 लाख करोड़ था नकदी अधिशेष
RBI के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, 19 से 21 सितंबर के बीच बैंकिंग सिस्टम में शुद्ध नकदी अधिशेष करीब ₹6 लाख करोड़ रहा. सितंबर के पहले सप्ताह में यह बढ़कर ₹11.16 लाख करोड़ के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया था. यानी कुछ ही हफ्तों में बैंकिंग सिस्टम से अतिरिक्त नकदी में काफी कमी आई है.
RBI ने बैंकिंग सिस्टम में मौजूद अतिरिक्त नकदी को कम करने के लिए खुले बाजार परिचालन (OMO) के तहत सरकारी बॉन्ड बेचने का फैसला किया है. इसकी पहली नीलामी शुक्रवार को हुई थी. सोमवार को हुई दूसरी OMO नीलामी में भी निवेशकों की मजबूत मांग देखने को मिली. ₹25,000 करोड़ के बॉन्ड बेचने के लिए ₹84,942 करोड़ की बोलियां मिलीं.
कॉल रेट बढ़कर 5.24 फीसदी
बैंकिंग सिस्टम में नकदी कम होने का असर overnight call rate पर भी पड़ा है. यह दर शुक्रवार के 4.92 फीसदी से बढ़कर सोमवार को 5.24 फीसदी पर पहुंच गई. यह RBI की मौजूदा रेपो रेट के लगभग बराबर है. एक प्राथमिक डीलरशिप के वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, नकदी की स्थिति पर OMO और GST भुगतान के लिए हुई नकद निकासी, दोनों का असर पड़ा है. उन्होंने कहा कि इन दोनों वजहों से कॉल रेट रेपो रेट के करीब पहुंच गई है.
सितंबर में ₹1 लाख करोड़ के बॉन्ड बेचने की योजना
RBI ने सितंबर में कुल ₹1 लाख करोड़ के OMO के तहत सरकारी बॉन्ड बेचने की घोषणा की है. इसका मकसद बैंकिंग सिस्टम में मौजूद अतिरिक्त और अपेक्षाकृत लंबी अवधि की नकदी को कम करना है. यह अतिरिक्त नकदी मुख्य रूप से डॉलर-रुपया स्वैप सुविधा के तहत विदेशी निवेश के बड़े प्रवाह से बनी है. RBI ने अतिरिक्त नकदी को सोखने के लिए लंबी अवधि के वेरिएबल रेट रिवर्स रेपो (VRRR) जैसे दूसरे उपाय भी किए हैं.
आगे और घट सकती है बैंकिंग सिस्टम की नकदी
बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले हफ्तों में बैंकिंग सिस्टम की नकदी स्थिति में और बदलाव हो सकता है. महीने के अंत में सरकारी और अन्य भुगतान की स्थिति बदलने के साथ सिस्टम में नकदी फिर बढ़ या घट सकती है. इसके अलावा RBI की ओर से आगे भी OMO के तहत बॉन्ड बिक्री जारी रहने की संभावना है.
बैंकों के ट्रेजरी अधिकारियों के मुताबिक, आने वाले महीनों में करीब ₹1 लाख करोड़ की एक और OMO बिक्री भी नकदी अधिशेष पर असर डाल सकती है. वहीं, अर्थव्यवस्था में चलन में मौजूद नकदी बढ़ने और बैंक जमा बढ़ने के साथ बैंकों की नकद आरक्षित अनुपात (CRR) से जुड़ी जरूरतें भी बढ़ सकती हैं. इससे सिस्टम में उपलब्ध अतिरिक्त नकदी और कम हो सकती है.
10 साल के सरकारी बॉन्ड की यील्ड पर भी नजर
IDFC First Bank की मुख्य अर्थशास्त्री गौरा सेन गुप्ता के मुताबिक, फिलहाल करीब ₹13 लाख करोड़ का दीर्घकालिक नकदी अधिशेष है, जिसे पूरी तरह सिस्टम से निकालने में वित्त वर्ष 2028 की दूसरी तिमाही तक का समय लग सकता है.
बाजार प्रतिभागियों के मुताबिक, आगे चलकर 10 साल के सरकारी बॉन्ड की यील्ड 7 फीसदी से बढ़कर 7.25 फीसदी तक जा सकती है. हालांकि, सोमवार को 10 साल के सरकारी बॉन्ड की यील्ड 2 आधार अंक घटकर 7.05 फीसदी पर बंद हुई.
ONGC ने बताया कि महानदी बेसिन में ‘समुद्र मंथन’ अभियान के तहत खोदा गया यह उसका पहला कुआं है. MN-DW18-1-H-D नाम के इस कुएं को 1,623 मीटर की लक्षित गहराई तक खोदा गया था.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉर्पोरेशन (ONGC) को ओडिशा तट के पास गहरे समुद्र में प्राकृतिक गैस की खोज में सफलता मिली है. कंपनी ने ‘समुद्र मंथन’ डीपवॉटर एक्सप्लोरेशन अभियान के तहत कोणार्क से करीब 43 किलोमीटर दूर महानदी अपतटीय बेसिन में खोदे गए पहले कुएं में 1,441 से 1,452 मीटर की गहराई पर गैस की खोज की है. ONGC के अनुसार, कुएं से पिछले तीन दिनों से गैस का प्रवाह बना हुआ है और दबाव भी उत्साहजनक है. हालांकि, इस खोज को व्यावसायिक रूप से विकसित करने से पहले इसका आगे मूल्यांकन किया जाएगा.
1,623 मीटर की गहराई तक खोदा गया कुआं
ONGC ने बताया कि महानदी बेसिन में ‘समुद्र मंथन’ अभियान के तहत खोदा गया यह उसका पहला कुआं है. MN-DW18-1-H-D नाम के इस कुएं को 1,623 मीटर की लक्षित गहराई तक खोदा गया था. 18 सितंबर को कंपनी को 1,441 से 1,452 मीटर की गहराई के बीच प्राकृतिक गैस मिली.
कंपनी के अनुसार, खोज के बाद से कुएं में गैस का प्रवाह जारी है और इसका दबाव एवं फ्लो उत्साहजनक बना हुआ है. हालांकि, खोज की वास्तविक क्षमता और आर्थिक व्यवहार्यता का आकलन आगे के परीक्षण और मूल्यांकन के बाद किया जाएगा.
#ONGC strikes gas in the deep waters of Mahanadi Basin.
— Oil and Natural Gas Corporation Limited (ONGC) (@ONGC_) September 21, 2026
MDW-28, the maiden well of ONGC’s current deepwater campaign in the Mahanadi Basin is flowing gas with encouraging rates and sustained reservoir pressure.
The campaign was launched on 25 July 2026 by Hon'ble Minister of… pic.twitter.com/whAV8TubIK
जल्द उत्पादन शुरू होने की संभावना
ONGC के अनुसार, खोज स्थल ओडिशा तट से अपेक्षाकृत कम दूरी पर है. ऐसे में अगर यह खोज व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य साबित होती है तो इसके विकास और गैस को बाजार तक पहुंचाने में मौजूदा बुनियादी ढांचे का इस्तेमाल किया जा सकता है. कंपनी का कहना है कि पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस नियम, 2025 के तहत साझा बुनियादी ढांचे के इस्तेमाल से गहरे समुद्र में मिले संसाधनों को उत्पादन में लाने में मदद मिल सकती है.
यह खोज भारत के घरेलू प्राकृतिक गैस उत्पादन को बढ़ाने की दिशा में भी अहम हो सकती है, हालांकि इसके वास्तविक प्रभाव का आकलन खोज के आकार, उत्पादन क्षमता और व्यावसायिक व्यवहार्यता स्पष्ट होने के बाद ही किया जा सकेगा.
शुक्रवार को सेंसेक्स 19.63 अंक की गिरावट के साथ 74,294.96 पर बंद हुआ था, जबकि निफ्टी 75.80 अंक की बढ़त के साथ 23,346.40 पर बंद हुआ था.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारतीय शेयर बाजार ने सोमवार को लगातार चौथे कारोबारी सत्र में बढ़त दर्ज की. बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) सेंसेक्स 564.03 अंक यानी 0.76 फीसदी चढ़कर 74,858.99 पर, जबकि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) निफ्टी 67.90 अंक यानी 0.29 फीसदी की तेजी के साथ 23,414.30 पर बंद हुआ. मंगलवार को भी बाजार की शुरुआत मजबूत रहने के संकेत मिल रहे हैं. शुरुआती कारोबार में GIFT Nifty 23,500 के पार पहुंच गया है. वहीं, ब्रेंट क्रूड करीब 100 डॉलर प्रति बैरल पर है और अमेरिकी बाजारों में भी सोमवार को तेजी रही. इन संकेतों के बीच आज Hindustan Copper, Waaree Energies, Pine Labs और Lenskart Solutions समेत कई शेयर कॉरपोरेट अपडेट्स के कारण फोकस में रह सकते हैं.
सोमवार को सेंसेक्स के 24 शेयरों में तेजी
सोमवार को सेंसेक्स के 30 शेयरों में से 24 बढ़त के साथ बंद हुए, जबकि 6 शेयरों में गिरावट रही. UltraTech Cement 4.11 फीसदी की तेजी के साथ सबसे बड़ा गेनर रहा. HCL Tech 3.42 फीसदी, Eternal 2.59 फीसदी, Titan 2.49 फीसदी और ITC 1.93 फीसदी चढ़े. वहीं, Bharti Airtel 1.93 फीसदी की गिरावट के साथ सबसे बड़ा लूजर रहा. Power Grid में 1.15 फीसदी, Infosys में 0.97 फीसदी, Adani Ports में 0.72 फीसदी और Tata Steel में 0.62 फीसदी की गिरावट रही.
निफ्टी में 30 शेयर चढ़े
निफ्टी के 50 शेयरों में से 30 बढ़त और 20 गिरावट के साथ बंद हुए. Eternal 2.77 फीसदी की बढ़त के साथ टॉप गेनर रहा. HCL Tech 2.54 फीसदी, ITC 1.79 फीसदी, Sun Pharma 1.72 फीसदी और Reliance Industries 1.71 फीसदी चढ़े. गिरावट वाले शेयरों में Bharti Airtel 3.33 फीसदी टूटकर सबसे आगे रहा. Adani Ports 2.02 फीसदी, Bajaj Finance 1.83 फीसदी, Power Grid 1.55 फीसदी और Adani Enterprises 1.49 फीसदी नीचे बंद हुए.
आज बाजार के लिए क्या संकेत?
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, मंगलवार के कारोबार से पहले GIFT Nifty 23,500 के पार कारोबार कर रहा है. इससे घरेलू बाजार में मजबूत शुरुआत के संकेत मिल रहे हैं. हालांकि, बाजार खुलने के बाद दिशा वैश्विक संकेतों और घरेलू कारोबार के आधार पर बदल सकती है.
ब्रेंट क्रूड करीब 100 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा है. पिछले पांच दिनों में इसकी कीमत करीब 8 फीसदी घट चुकी है. दूसरी ओर, AI शेयरों में तेजी और क्रूड में नरमी के बीच अमेरिकी बाजार भी सोमवार को मजबूत रहे. Nasdaq करीब 600 अंक चढ़ा, जबकि S&P 500 और Dow Jones में भी करीब आधे से एक फीसदी तक की तेजी रही.
इन शेयरों पर रहेगी नजर
आज Hindustan Copper ने अगले 5-6 वर्षों में 7,000 करोड़ रुपये से अधिक के कैपेक्स की योजना के चलते फोकस में है. Waaree Energies को एक प्रमुख सोलर डेवलपर से 2 GW सोलर मॉड्यूल सप्लाई का ऑर्डर मिला है. Pine Labs में Mastercard Asia/Pacific करीब 4.3 फीसदी हिस्सेदारी ब्लॉक डील के जरिए बेच सकती है. Lenskart Solutions में Platinum Jasmine A 2018 Trust ने 3.5 करोड़ शेयर यानी करीब 2.01 फीसदी हिस्सेदारी 2,390.57 करोड़ रुपये में बेची है.
इसके अलावा, Patanjali Foods के एक Sunrich Sunflower Oil बैच की बिक्री पर खाद्य सुरक्षा कार्रवाई हुई है. Edelweiss Financial Services 300 करोड़ रुपये तक के NCD जारी कर फंड जुटाएगी. Canara Bank को Basel III Additional Tier-I Bonds की NSE डेट लिस्टिंग की मंजूरी मिली है. Suryoday Small Finance Bank के बोर्ड ने 400 करोड़ रुपये तक के NCD इश्यू को मंजूरी दी है, जबकि Share India Securities 200 करोड़ रुपये तक जुटाने के लिए कन्वर्टिबल वारंट जारी करेगी.
Lloyds Metals 1,550 करोड़ रुपये तक के NCD जारी करने के साथ क्षमता विस्तार पर 140 करोड़ रुपये निवेश करेगी. वहीं, GRSE के बोर्ड ने रायचक में ग्रीनफील्ड शिपयार्ड के लिए 2,896 करोड़ रुपये के कैपिटल बजट को मंजूरी दी है. Reliable Data Services भी 200 करोड़ रुपये तक फंड जुटाने की तैयारी में है.