एक अस्थिर रुख से निवेशकों का भरोसा टूट सकता है, कॉर्पोरेट गवर्नेंस कमजोर पड़ सकती है, और भारत की वित्तीय प्रणाली की संवेदनशीलताएं खतरे में पड़ सकती हैं. यह सिर्फ एक परिवार के विवाद की बात नहीं है, बल्कि भारत के वित्तीय भविष्य के केंद्र की बात है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
पलक शाह
किर्लोस्कर ब्रदर्स लिमिटेड (KBL) और किर्लोस्कर ऑयल इंजिन्स लिमिटेड (KOEL) के बीच 2009 के फैमिली सेटलमेंट डीड (DFS) को लेकर चला आ रहा लंबा विवाद अब केवल पारिवारिक झगड़ा नहीं रह गया है, बल्कि यह भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) के लिए एक निर्णायक मोड़ बन गया है. नियामक की असंगत भूमिका, जिसमें उसने पहले भारत के सुप्रीम कोर्ट में एक अतिरिक्त हलफनामा दायर कर दोनों पक्षों से फैमिली सेटलमेंट का खुलासा करने की मांग की, फिर दिसंबर 2024 में एक मजबूत आदेश जारी किया, और अंततः सितंबर 2025 में एक विरोधाभासी हलफनामे के साथ उसे कमजोर कर दिया और उसकी विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है.
इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि सेबी का यह डगमगाता रवैया भारत की कॉर्पोरेट गवर्नेंस प्रणाली को कमजोर कर सकता है, निवेशकों का भरोसा खत्म कर सकता है, और ऐसी प्रणालीगत कमजोरियों को जन्म दे सकता है जो देश के वित्तीय बाजारों और उससे आगे तक असर डाल सकती हैं.
किर्लोस्कर विवाद: एक बड़ी बीमारी का लक्षण
किर्लोस्कर गाथा के केंद्र में 2009 का DFS है, जिसे परिवार के प्रतिष्ठित औद्योगिक साम्राज्य (जिसकी शुरुआत 19वीं सदी की एक साइकिल दुकान से हुई थी) में स्वामित्व, प्रबंधन और नियंत्रण को स्पष्ट करने के लिए बनाया गया था.
इस समझौते में शामिल नॉन-कम्पीट क्लॉज का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि पारिवारिक इकाइयाँ एक-दूसरे के व्यवसायों में हस्तक्षेप न करें, जिससे स्पष्टता और स्थिरता बनी रहे. फिर भी इसका असंगत क्रियान्वयन जैसे कि KOEL द्वारा 2009 में टोयोटा ज्वाइंट वेंचर की इकाइयों में ₹250 करोड़ के शेयर ट्रांसफर के अनुरूप व्यवहार, लेकिन 2017 में KBL के प्रतिद्वंद्वी ला गज्जर मशीनरीज के अधिग्रहण का विरोधाभासी कदम ने इस कानूनी लड़ाई को जन्म दिया जो अब सुप्रीम कोर्ट में लंबित है.
DFS का खुलासा, जिसे SEBI के लिस्टिंग ऑब्लिगेशंस एंड डिस्क्लोजर रिक्वायरमेंट्स (LODR) रेग्युलेशन 30A और क्लॉज 5A के अंतर्गत अनिवार्य किया गया है, एक विवाद का केंद्र बन गया है, जिससे SEBI के नियामक संकल्प की नाजुकता उजागर हुई है.
30 दिसंबर 2024 को SEBI ने एक स्पष्ट और मजबूत आदेश जारी किया, जिसमें KOEL और अन्य किर्लोस्कर इकाइयों को LODR प्रावधानों के तहत DFS का खुलासा करने का आदेश दिया गया. नियामक की टिप्पणियां स्पष्ट थीं:
DFS की नॉन-कम्पीट क्लॉज अप्रत्यक्ष रूप से सूचीबद्ध इकाइयों को बाध्य करती हैं, भले ही वे इसके हस्ताक्षरकर्ता न हों.
यह समझौता "प्रचलित" और "महत्वपूर्ण" है, और इसमें शेयरधारकों के हित शामिल हैं.
खुलासा "इससे भले ही सूचीबद्ध इकाई एक पक्ष न हो" अनिवार्य है ताकि "सूचना समरूपता" बनी रहे और निवेशकों को निर्णय लेने के लिए आवश्यक जानकारी मिल सके.
यह निर्देश पारदर्शिता और अच्छी कॉर्पोरेट गवर्नेंस के प्रति SEBI की प्रतिबद्धता का एक आधार स्तंभ था, विशेष रूप से भारत के प्रवर्तक-चालित कॉर्पोरेट वातावरण में, जहाँ पारिवारिक समझौते अक्सर रणनीतिक दिशा तय करते हैं. यह अल्पसंख्यक शेयरधारकों के अधिकारों की सुरक्षा की दिशा में एक मजबूत कदम था, जिसे निवेशकों और गवर्नेंस समर्थकों ने सराहा.
2025 की पलटी: एक पीछे हटता कदम
सितंबर 2025 तक SEBI का संकल्प कमजोर पड़ गया. KOEL, किर्लोस्कर इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड और तीन अन्य समूह कंपनियों द्वारा दायर रिट याचिकाओं (संख्या 702, 495, 560, 607 और 710/2025) के जवाब में, जिसमें रेग्युलेशन 30A की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी, SEBI ने बॉम्बे हाई कोर्ट में ऐसे हलफनामे दायर किए जिन्होंने उसके पहले के रुख से स्पष्ट विचलन दर्शाया.
नियामक ने कहा कि विवादित प्रावधानों के तहत किए गए खुलासे "इस बात का प्रमाण नहीं हैं कि कंपनियां ऐसे समझौतों को बाध्यकारी मानती हैं या उनसे कोई दायित्व उत्पन्न होता है." इस रुख के तहत कंपनियों को खुलासे के साथ अस्वीकरण (डिस्क्लेमर) जोड़ने की अनुमति दी गई, जिससे SEBI के 2024 के आदेश की अनिवार्यता व्यावहारिक रूप से निष्प्रभावी हो गई. हालांकि, बॉम्बे हाई कोर्ट ने 23 सितंबर 2025 के अपने आदेश में याचिकाकर्ताओं को उनकी याचिकाएं वापस लेने की अनुमति दी, लेकिन यह भी स्पष्ट किया कि SEBI के इस वक्तव्य का पूर्ववर्ती आदेशों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, और न ही यह SEBI अपीलीय अधिकरण (SAT) या अन्य मंचों पर चल रहे मामलों को प्रभावित करेगा.
KBL ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई और कहा कि SEBI के इस बदलाव से उसकी ही नियामक रूपरेखा कमजोर हुई है. लेकिन तब तक नुकसान हो चुका था. SEBI की असंगति ने विवादों को लम्बा खींचने का रास्ता खोल दिया और जवाबदेही कम कर दी.
SEBI की असंगति के बीच KOEL की रणनीतिक चालें
KOEL ने SEBI के नरम रुख का तुरंत लाभ उठाया. 26 सितंबर 2025 को स्टॉक एक्सचेंज को दिए गए एक खुलासे में, उसने SEBI की "गैर-बाध्यकारी" स्थिति का हवाला देते हुए यह दावा किया कि DFS कोई लागू प्रतिबंध नहीं लगाता, लेकिन KBL ने 3 अक्टूबर 2025 को BSE और NSE को एक सख्त पत्र में इसे "निवेशकों के लिए एक गंभीर भ्रामक प्रस्तुति" बताया और KOEL के बोर्ड व अनुपालन अधिकारी के खिलाफ Reg 30A के उल्लंघन पर कार्रवाई की मांग की.
KOEL की यह रणनीति DFS के दायरे पर अस्पष्टता बनाए रखना और SEBI, SAT और हाई कोर्ट में मुकदमा चलाना ने लगभग एक दशक से लंबित इस विवाद को और लम्बा खींच दिया है. DFS के प्रति यह चयनात्मक अनुपालन टोयोटा संयुक्त उद्यम शेयर ट्रांसफर में अनुपालन लेकिन नॉन-कम्पीट क्लॉज की उपेक्षा नियामक अनिश्चितता के जोखिमों को उजागर करता है.
व्यवस्था पर प्रभाव: भारत की वित्तीय प्रणाली को खतरा
किर्लोस्कर मामले में SEBI का असंगत रुख सिर्फ एक पारिवारिक विवाद की बात नहीं है. यह भारत के वित्तीय बाजारों और कॉर्पोरेट गवर्नेंस प्रणाली के लिए गंभीर खतरे पेश करता है. रेग्युलेशन 30A के तहत खुलासों को अस्वीकरण के साथ कमजोर करने की अनुमति देकर SEBI ने अनजाने में एक ऐसा छेद बना दिया है जो LODR के मूल उद्देश्य प्रवर्तक समझौतों में पारदर्शिता को कमजोर करता है. यह उन सभी अन्य प्रवर्तकों के विपरीत है जिन्होंने अपने निजी समझौतों का खुलासा किया है.
इसका व्यापक असर चिंताजनक और दूरगामी है:
निवेशक विश्वास में गिरावट : भारत के 5,000 से अधिक सूचीबद्ध कंपनियों वाले बाज़ार पारदर्शी खुलासों पर निर्भर हैं. कमजोर खुलासों की अनुमति से सूचना विषमता बढ़ेगी और निवेशक प्रवर्तक समझौतों से जुड़े जोखिमों का आकलन नहीं कर पाएंगे. जब ऐसे गुप्त समझौते सामने आते हैं, जो कॉर्पोरेट नियंत्रण या रणनीति को बदल सकते हैं, तो इससे बाजार में भारी झटके आ सकते हैं और विशेष रूप से खुदरा निवेशकों की पूंजी नष्ट हो सकती है.
कॉर्पोरेट गवर्नेंस का कमजोर होना : भारत के अधिकांश व्यवसाय प्रवर्तक-चालित हैं, जहाँ पारिवारिक समझौते रणनीतिक निर्णयों को प्रभावित करते हैं. SEBI की यह मिसाल प्रवर्तकों को ऐसे समझौतों को चुनिंदा रूप से और अस्वीकरण के साथ उजागर करने की छूट देती है, जिससे जवाबदेही से बचा जा सकता है.
नियामक अनिश्चितता में वृद्धि : SEBI की असंगति कंपनियों को लंबे मुकदमों के लिए प्रोत्साहित करती है, जैसा कि KOEL के बहु-मंच रणनीति में देखा गया. इससे अनुपालन में देरी होती है, न्याय में विलंब होता है और न्यायिक व नियामक प्रणाली पर बोझ बढ़ता है.
वैश्विक प्रतिस्पर्धा को नुकसान : भारत एक वैश्विक वित्तीय केंद्र बनने की दिशा में प्रयास कर रहा है, लेकिन SEBI की असंगति विदेशी निवेशकों को यह संकेत देती है कि यहाँ नियामक प्रणाली कमजोर है. इससे भारत की वैश्विक स्तर पर सिंगापुर या लंदन जैसे वित्तीय केंद्रों के मुकाबले स्थिति कमजोर हो सकती है.
बचाव के लिए मिसाल : किर्लोस्कर मामला प्रवर्तकों को LODR दायित्वों से बचने की रणनीति सिखाता है. अस्वीकरण के साथ समझौतों का खुलासा करके कंपनियाँ उनके वास्तविक प्रभाव को छिपा सकती हैं.
SEBI और भारत के बाजारों के लिए एक निर्णायक क्षण
किर्लोस्कर गाथा SEBI की बाजार अखंडता बनाए रखने की क्षमता की परीक्षा है. जबकि KBL का 3 अक्टूबर 2025 का पत्र BSE और NSE के लिए एक चेतावनी हो सकता है, KOEL की कथित गलतबयानी से निपटने के लिए, मुख्य जिम्मेदारी SEBI पर ही है कि वह भरोसा बहाल करे.
नियामक को अपने विरोधाभासी रुख को स्पष्ट करना होगा और रेग्युलेशन 30A को पूरी सख्ती और निरंतरता से लागू करना होगा. अगर वह ऐसा करने में विफल रहता है, तो यह नियामक चूक की संस्कृति को स्थायी बना सकता है, जहाँ प्रवर्तक महत्वपूर्ण समझौतों को छिपाने के लिए रास्ते खोजते हैं, जिससे निवेशक असुरक्षित रह जाते हैं और बाजार अस्थिर हो जाते हैं.
भारत एक निर्णायक मोड़ पर है. वैश्विक आर्थिक शक्ति बनने की इसकी महत्वाकांक्षा एक मजबूत, पारदर्शी वित्तीय प्रणाली पर निर्भर करती है. किर्लोस्कर मामले से SEBI यह साबित कर सकता है कि वह बाजार की अखंडता का एक मजबूत रक्षक है या फिर असंगति की विरासत छोड़ सकता है जो भारत के बाजारों को वर्षों तक परेशान करती रहेगी.
यह सिर्फ एक परिवार का विवाद नहीं है. यह भारत के वित्तीय भविष्य का सवाल है. SEBI को निर्णायक कदम उठाने होंगे, पारदर्शिता और जवाबदेही के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहरानी होगी, वरना वह एक कमजोर नियामक की पहचान में बदल सकता है.
बीते कारोबारी सत्र में BSE सेंसेक्स 109.25 अंक चढ़कर 77,100.47 के स्तर पर बंद हुआ, जबकि NSE एनएसई निफ्टी 34.35 अंक की बढ़त के साथ 24,056 पर पहुंच गया.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पिछले कारोबारी सत्र यानी गुरुवार, 25 जून को भारतीय शेयर बाजार सीमित बढ़त के साथ बंद हुआ था. बॉम्बे स्टक एक्सचेंज (BSE) सेंसेक्स 109.25 अंक चढ़कर 77,100.47 के स्तर पर बंद हुआ, जबकि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) एनएसई निफ्टी 34.35 अंक की बढ़त के साथ 24,056 पर पहुंच गया. शुक्रवार को मुहर्रम के अवसर पर बाजार बंद रहा. अब सोमवार को बाजार खुलने से पहले निवेशकों के बीच यह सवाल है कि आज का माहौल कैसा रहेगा. कच्चे तेल की कीमतों में आई तेज गिरावट, रुपये में मजबूती और विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) की चुनिंदा खरीदारी ने बाजार की धारणा को मजबूत किया है, जिससे नए कारोबारी सप्ताह की शुरुआत सकारात्मक रहने की उम्मीद जताई जा रही है.
FIIs के रुख में बदलाव के दो बड़े कारण
बाजार के आंकड़ों के अनुसार 15 जून से 25 जून के बीच नौ कारोबारी सत्रों में से पांच दिन विदेशी संस्थागत निवेशक कैश मार्केट में शुद्ध खरीदार रहे. हालांकि खरीदारी का स्तर अभी सीमित है, लेकिन इससे यह संकेत जरूर मिला है कि विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली का दौर धीरे-धीरे थमता दिखाई दे रहा है. विशेषज्ञों
के मुताबिक विदेशी निवेशकों की धारणा में बदलाव के पीछे दो प्रमुख वजहें हैं:
1. रुपये में मजबूती और स्थिरता
मई के मध्य में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय मुद्रा दबाव में थी, लेकिन हाल के दिनों में रुपये में मजबूती देखने को मिली है. मजबूत और स्थिर रुपया विदेशी निवेशकों के लिए भारतीय बाजार को अधिक आकर्षक बनाता है, क्योंकि ऐसी स्थिति में उन्हें मुद्रा विनिमय से होने वाले नुकसान का जोखिम कम रहता है.
2. कोरिया और ताइवान के बाजारों में दबाव
दक्षिण कोरिया और ताइवान के शेयर बाजारों में बढ़ी अस्थिरता और मुनाफावसूली ने भी वैश्विक निवेशकों का ध्यान भारत की ओर मोड़ा है. दक्षिण कोरिया के बाजार में हाल में एक दिन में भारी गिरावट दर्ज की गई थी, जिससे निवेशकों ने अपेक्षाकृत स्थिर बाजारों की तलाश शुरू की. ऐसे में भारत एक बेहतर विकल्प के रूप में उभरता दिखाई दे रहा है.
कच्चे तेल में गिरावट से मिली राहत
भारत के लिए सबसे सकारात्मक संकेतों में से एक कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट है. ब्रेंट क्रूड 73 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आने से देश के आयात बिल पर दबाव कम होने की उम्मीद है. इससे चालू खाते और भुगतान संतुलन से जुड़ी चिंताएं भी कम हो सकती हैं. तेल कीमतों में नरमी का असर रुपये और बाजार दोनों के लिए सकारात्मक माना जा रहा है.
आज निवेशकों के लिए कैसा रहेगा माहौल
विश्लेषकों का मानना है कि सोमवार को बाजार की शुरुआत सकारात्मक रह सकती है. कच्चे तेल में नरमी, विदेशी निवेशकों की वापसी और भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर बनी उम्मीदें निवेशकों के भरोसे को मजबूत कर रही हैं. हालांकि व्यापक खरीदारी का दौर शुरू होने में अभी कुछ समय लग सकता है और वैश्विक बाजारों के संकेतों पर भी निवेशकों की नजर बनी रहेगी. फिलहाल बाजार का रुख सतर्क आशावाद का है और निवेशकों के लिए चुनिंदा सेक्टरों और मजबूत बुनियादी कंपनियों पर नजर रखना बेहतर रणनीति हो सकती है.
इन शेयरों पर रखें नजर
आज के कारोबार में कई बड़े शेयर निवेशकों के रडार पर रहेंगे. आईटी कंपनी Persistent Systems ने जर्मनी की Nagarro SE के अधिग्रहण का ऐलान किया है, जबकि HDFC Bank ने पूर्व चेयरमैन अतनु चक्रवर्ती से जुड़े आरोपों की जांच में किसी भी तरह के सबूत न मिलने की जानकारी दी है. Kotak Mahindra Bank नए CEO की तलाश शुरू करने जा रहा है और IRFC के OFS को शानदार प्रतिक्रिया मिलने से सरकार ने करीब 2,084 करोड़ रुपये जुटाए हैं. Transrail Lighting को 459 करोड़ रुपये के नए विदेशी ऑर्डर मिले हैं, वहीं KEC International पर लगा प्रतिबंध हटने से कंपनी फिर से Power Grid के टेंडरों में हिस्सा ले सकेगी. Power Grid ने अपनी उधारी सीमा बढ़ाने का प्रस्ताव मंजूर किया है, जबकि Adani Ports की क्रेडिट रेटिंग में सुधार हुआ है. फार्मा सेक्टर में Dr Reddy's Laboratories और Aurobindo Pharma के संयंत्रों का USFDA निरीक्षण पूरा हुआ है. Hexaware Technologies को Amazon Bedrock के लिए Anthropic का अधिकृत रीसेलर बनाया गया है. IIFL Finance ने 10,000 करोड़ रुपये तक जुटाने की मंजूरी दी है, Waaree Energies ने अमेरिकी जांच से जुड़े आरोपों पर सफाई दी है और Bajaj Healthcare को Cenobamate टैबलेट के निर्माण व बिक्री के लिए महत्वपूर्ण सिफारिश मिली है. इसके अलावा Puravankara ने अपनी सहायक कंपनी में हिस्सेदारी बेचने का फैसला किया है, जबकि Rajesh Exports ने ED की तलाशी कार्रवाई की जानकारी दी है. इन सभी घटनाक्रमों के चलते सोमवार के कारोबार में इन शेयरों में अच्छी हलचल देखने को मिल सकती है.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
मुंबई में 25 जून 2026 को लिथियम अर्बन टेक्नोलॉजीज ने घोषणा की कि उसे JSW ग्रीन मोबिलिटी से रणनीतिक निवेश प्राप्त हुआ है. कंपनी का लक्ष्य अगले दो वर्षों में अपने कारोबार को तीन गुना तक बढ़ाना है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के तेजी से बढ़ते इलेक्ट्रिक मोबिलिटी सेक्टर को बड़ा समर्थन मिला है. ईवरसोर्स कैपिटल समर्थित लिथियम अर्बन टेक्नोलॉजीज में JSW ग्रीन मोबिलिटी ने रणनीतिक निवेश किया है. इस निवेश से कंपनी के विस्तार को गति मिलेगी, अगले दो वर्षों में तीन गुना वृद्धि का लक्ष्य हासिल करने में मदद मिलेगी और देशभर में 12,000 से 15,000 नए रोजगार सृजित होने की उम्मीद है.
अगले दो वर्षों में तीन गुना वृद्धि का लक्ष्य
मुंबई में 25 जून 2026 को लिथियम अर्बन टेक्नोलॉजीज ने घोषणा की कि उसे JSW ग्रीन मोबिलिटी से रणनीतिक निवेश प्राप्त हुआ है. कंपनी का लक्ष्य अगले दो वर्षों में अपने कारोबार को तीन गुना तक बढ़ाना है. कंपनी का मानना है कि इस निवेश से उसके एकीकृत ई-मोबिलिटी प्लेटफॉर्म को मजबूती मिलेगी और देश में टिकाऊ परिवहन समाधानों के विस्तार में तेजी आएगी.
25,000 से अधिक यात्राओं का रोजाना संचालन
लिथियम अर्बन टेक्नोलॉजीज वर्तमान में 3,000 से अधिक वाहनों और 1,300 चार्जरों के नेटवर्क के जरिए प्रतिदिन 25,000 से ज्यादा यात्राओं का संचालन कर रही है. कंपनी 100 से अधिक एंटरप्राइज ग्राहकों को सेवाएं प्रदान कर रही है. कंपनी का एकीकृत प्लेटफॉर्म इलेक्ट्रिक फ्लीट, चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, फ्लीट इंटेलिजेंस सिस्टम और केंद्रीकृत परिचालन क्षमताओं को एक साथ जोड़ता है.
ई-मोबिलिटी इकोसिस्टम को मिलेगा बढ़ावा
ईवरसोर्स कैपिटल के मुख्य कार्यकारी अधिकारी धनपाल झावेरी ने कहा, "मोबिलिटी अब केवल वाहनों तक सीमित नहीं रही है. भविष्य उन प्लेटफॉर्म्स का है जो इंफ्रास्ट्रक्चर, तकनीक और परिचालन को बड़े स्तर पर एकीकृत कर सकें. लिथियम ने मजबूत परिचालन क्षमता वाला व्यवसाय विकसित किया है और JSW ग्रीन मोबिलिटी का निवेश इसके विकास के लिए नई संभावनाएं लेकर आया है."
उन्होंने कहा कि कंपनी ने फ्लीट, चार्जिंग नेटवर्क, इंटेलिजेंट मोबिलिटी सिस्टम और केंद्रीय परिचालन तंत्र को एक प्लेटफॉर्म पर लाकर ऐसी क्षमताएं विकसित की हैं, जिन्हें बड़े स्तर पर दोहराना आसान नहीं है.
भारत की मोबिलिटी में हो रहा बड़ा बदलाव
JSW समूह के पार्थ जिंदल ने कहा, "भारत का मोबिलिटी सेक्टर तेजी से बदल रहा है. शहरीकरण, इलेक्ट्रिफिकेशन और डिजिटल कॉमर्स के विस्तार से नई संभावनाएं पैदा हो रही हैं. भविष्य तकनीक आधारित और एकीकृत मोबिलिटी प्लेटफॉर्म का होगा."
उन्होंने कहा कि लिथियम ने मजबूत निष्पादन क्षमता और उच्च गुणवत्ता वाले इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ एक अलग पहचान बनाई है. कंपनी के साथ साझेदारी भारत में स्वच्छ मोबिलिटी के भविष्य को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी.
इलेक्ट्रिक मोबिलिटी के लिए मजबूत आधार तैयार
लिथियम अर्बन टेक्नोलॉजीज के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉन थॉमस ने कहा, "भारत का वाणिज्यिक परिवहन क्षेत्र अभी भी पारंपरिक ईंधन आधारित वाहनों पर निर्भर है. भविष्य की जरूरत केवल वाहनों को बदलना नहीं है, बल्कि ऐसे इंफ्रास्ट्रक्चर और तकनीकी प्रणालियां विकसित करना है जो बड़े स्तर पर इलेक्ट्रिफिकेशन को सफल बना सकें." उन्होंने कहा कि पिछले एक दशक में कंपनी ने चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, फ्लीट इंटेलिजेंस सिस्टम और नेटवर्क ऑपरेशन सेंटर जैसी मजबूत नींव तैयार की है.
चार्जिंग नेटवर्क और तकनीक का होगा विस्तार
कंपनी के अनुसार यह निवेश लिथियम के विकास के अगले चरण की शुरुआत है. कंपनी अपने वाहन बेड़े, चार्जिंग नेटवर्क और तकनीकी क्षमताओं का विस्तार करेगी. जैसे-जैसे परिवहन प्रणाली इलेक्ट्रिक, कनेक्टेड और सॉफ्टवेयर आधारित होती जा रही है, कंपनी भारत की बदलती मोबिलिटी जरूरतों को पूरा करने के लिए बड़े स्तर पर परिचालन क्षमता विकसित करने पर ध्यान केंद्रित कर रही है.
12,000 से 15,000 नए रोजगार सृजित होंगे
कंपनी की विस्तार योजना से देशभर में 12,000 से 15,000 नए रोजगार पैदा होने की उम्मीद है. इससे इलेक्ट्रिक मोबिलिटी सेक्टर को बढ़ावा मिलेगा और भारत के स्वच्छ ऊर्जा तथा नेट-जीरो लक्ष्यों को हासिल करने में भी मदद मिलेगी.
JSW ग्रीन मोबिलिटी का फोकस
JSW ग्रीन मोबिलिटी, JSW समूह की कंपनी है, जो चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और मोबिलिटी सेवाओं पर काम कर रही है. कंपनी का लक्ष्य तकनीक आधारित और टिकाऊ परिवहन समाधान विकसित करना है.
स्टील, ऊर्जा, इंफ्रास्ट्रक्चर और मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्रों में JSW समूह की मजबूत मौजूदगी के दम पर कंपनी भारत में स्वच्छ और स्मार्ट परिवहन व्यवस्था को बढ़ावा देने की दिशा में काम कर रही है.
लिथियम अर्बन टेक्नोलॉजीज के बारे में
वर्ष 2015 में स्थापित लिथियम अर्बन टेक्नोलॉजीज भारत की प्रमुख एकीकृत एंटरप्राइज मोबिलिटी कंपनियों में शामिल है. कंपनी कॉरपोरेट कर्मचारी परिवहन, राइड-हेलिंग, लॉजिस्टिक्स, चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, एआई आधारित ट्रांसपोर्ट ऑप्टिमाइजेशन और सुरक्षा सेवाएं प्रदान करती है.
कंपनी का उद्देश्य केवल वाहन उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि भारत के लिए एक व्यापक और टिकाऊ मोबिलिटी इकोसिस्टम तैयार करना है.
एलियनकाइंड अब अपने विस्तार, डिजिटल अनुभव और समुदाय आधारित मॉडल के जरिए भारत के प्रीमियम फूड एंड बेवरेज बाजार में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत के तेजी से उभरते नेक्स्ट-जेनरेशन फूड एंड बेवरेज ब्रांड एलियनकाइंड (Alienkind) ने प्री-सीरीज ए फंडिंग राउंड में 32 लाख डॉलर (करीब 27 करोड़ रुपये) जुटाए हैं. कंपनी इस पूंजी का उपयोग नए बाजारों में विस्तार, ब्रांड विकास और तकनीक आधारित उपभोक्ता अनुभव को मजबूत करने में करेगी. कंपनी आने वाले महीनों में बड़े सीरीज-ए फंडिंग राउंड की भी तैयारी कर रही है.
प्री-सीरीज ए राउंड में जुटाई 32 लाख डॉलर की पूंजी
एलियनकाइंड ने प्री-सीरीज ए फंडिंग राउंड में 32 लाख डॉलर की पूंजी जुटाने की घोषणा की है. कंपनी का कहना है कि इस निवेश से उसके अगले चरण की वृद्धि को गति मिलेगी और नए शहरों व बाजारों में विस्तार की योजना को मजबूती मिलेगी. कंपनी जल्द ही बड़े सीरीज-ए फंडिंग राउंड के लिए भी तैयारी कर रही है.
डिजाइन, संस्कृति और अनुभव पर आधारित ब्रांड
एलियनकाइंड खुद को एक नई पीढ़ी के उपभोक्ताओं के लिए तैयार किए गए ब्रांड के रूप में पेश करता है. कंपनी डिजाइन, संस्कृति और समुदाय आधारित अनुभवों के जरिए उपभोक्ताओं के साथ जुड़ने पर जोर देती है. ब्रांड का उद्देश्य ऐसे ग्राहकों को आकर्षित करना है, जो किसी ब्रांड को केवल उत्पाद के रूप में नहीं बल्कि अपनी पहचान और व्यक्तित्व के विस्तार के रूप में देखते हैं.
मौजूदा निवेशकों का मिला समर्थन
इस फंडिंग राउंड में कंपनी के मौजूदा निवेशकों ने भी भाग लिया. इनमें सुपर.मनी के संस्थापक प्रकाश सिकारिया, फ्लिपकार्ट के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट रवि अय्यर और बेन एंड कंपनी के ग्लोबल इनोवेशन हेड अर्पण सेठ समेत अन्य निवेशक शामिल हैं.
‘पारंपरिक एफएंडबी मॉडल की सीमाएं तोड़ना चाहते हैं’
एलियनकाइंड के सह-संस्थापक विक्रम कक्किरेनी ने कहा, “एलियनकाइंड को पारंपरिक फूड एंड बेवरेज इकोसिस्टम की सीमाओं को तोड़ने के उद्देश्य से बनाया गया था. पारंपरिक व्यवस्था केवल लेन-देन पर आधारित थी, जबकि एलियनकाइंड उससे आगे बढ़कर उपभोक्ताओं के साथ गहरा जुड़ाव स्थापित करना चाहता है.”
FY27 तक 1 करोड़ डॉलर ARR का लक्ष्य
कंपनी का लक्ष्य वित्त वर्ष 2026-27 के अंत तक 1 करोड़ डॉलर के वार्षिक आवर्ती राजस्व (ARR) तक पहुंचना है. कंपनी का कहना है कि यह उपलब्धि ब्रांड संस्कृति और प्रभावी निष्पादन के सही संतुलन का परिणाम होगी.
एलियनकाइंड को भारत के सबसे तेजी से बढ़ते फूड एंड बेवरेज ब्रांडों में शामिल किया जा रहा है. कंपनी ने केवल 16 महीनों में कई शहरों में विस्तार किया है और उपभोक्ताओं के बीच मजबूत पहचान बनाई है.
FY28 तक 100 स्टोर खोलने की योजना
कंपनी की योजना वित्त वर्ष 2027-28 तक देश के प्रमुख शहरों में 100 स्टोर स्थापित करने की है. कंपनी का मानना है कि उसकी अनूठी वैल्यू प्रपोजिशन, प्रतिस्पर्धी मूल्य निर्धारण और रणनीतिक ब्रांड पोजिशनिंग ने उसे बाजार में अलग पहचान दिलाने में मदद की है.
एलियनकाइंड अब अपने विस्तार, डिजिटल अनुभव और समुदाय आधारित मॉडल के जरिए भारत के प्रीमियम फूड एंड बेवरेज बाजार में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है.
भारतीय MSME क्षेत्र पहले की तुलना में अधिक डिजिटल, अधिक संगठित, अधिक महत्वाकांक्षी और वैश्विक बाजारों से जुड़ा हुआ बन रहा है.
by
रितु राणा
भारत का MSME (सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम) क्षेत्र आज एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है. पारंपरिक और स्थानीय स्तर तक सीमित रहने वाले छोटे कारोबार अब डिजिटल तकनीक, ई-कॉमर्स, निर्यात और वैश्विक बाजारों की मदद से नई ऊंचाइयों तक पहुंच रहे हैं. देश के करीब 6 करोड़ MSME भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन चुके हैं और लगभग 1 ट्रिलियन डॉलर का आर्थिक मूल्य सृजित करते हैं, जो देश की जीडीपी में करीब 30 प्रतिशत योगदान देता है. विश्व MSME दिवस के अवसर पर भारतीय MSME क्षेत्र में उभरते कुछ प्रमुख रुझान छोटे कारोबारों की बदलती तस्वीर को स्पष्ट करते हैं. तो आइए इस रिपोर्ट पर एक नजर डालते हैं.
भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूत नींव बने MSME
देश के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम रोजगार, उत्पादन और निर्यात के प्रमुख स्रोत बन चुके हैं. MSME क्षेत्र न केवल लाखों परिवारों की आय का आधार है, बल्कि देश की आर्थिक वृद्धि को भी गति दे रहा है. उद्यम पोर्टल पर पंजीकृत MSME की संख्या 6.8 करोड़ से अधिक हो चुकी है, जो वर्ष 2025 की शुरुआत की तुलना में 18 प्रतिशत अधिक है. यह दर्शाता है कि यह क्षेत्र पहले की तुलना में अधिक संगठित और औपचारिक होता जा रहा है.
निर्यात और विनिर्माण में रिकॉर्ड बढ़ोतरी
पिछले पांच वित्तीय वर्षों में MSME निर्यात तीन गुना बढ़कर 12 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है. वर्तमान में देश के कुल निर्यात में इस क्षेत्र की हिस्सेदारी लगभग 46 प्रतिशत है. भारत का विनिर्माण क्षेत्र वैश्विक बाजार में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज करा रहा है. छोटे शहरों के उद्यमी अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं. अशिर्वाद ओवरसीज के महेंद्र केवलानी ने छोटे शहर से निर्यात आधारित कारोबार स्थापित किया और ई-कॉमर्स की मदद से वैश्विक बाजारों तक पहुंच बनाई. वहीं, डॉगसी च्यू के संस्थापक भूपेंद्र खानाल ने हिमालयी याक के दूध से बनने वाले चुरपी उत्पाद को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई. हिमालय के 125 गांवों से प्राप्त प्राकृतिक सामग्री पर आधारित यह ब्रांड आज 30 से अधिक देशों में मौजूद है और लगभग 260 करोड़ रुपये का वार्षिक कारोबार कर रहा है.
ई-कॉमर्स बना विकास का नया इंजन
भारत का ई-कॉमर्स बाजार आने वाले वर्षों में MSME के लिए बड़ा अवसर बनकर उभर रहा है. अनुमान है कि वर्ष 2030 तक देश का ई-कॉमर्स बाजार 70-80 अरब डॉलर से बढ़कर 180-200 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है. विशेषज्ञों का मानना है कि इस अतिरिक्त वृद्धि में लगभग आधा योगदान MSME क्षेत्र का होगा. डिजिटल प्लेटफॉर्म और ऑनलाइन मार्केटप्लेस छोटे कारोबारों को सीधे ग्राहकों तक पहुंचने का अवसर दे रहे हैं.
हस्तशिल्प और पारंपरिक कारोबार को मिली नई पहचान
भारतीय कारीगर अर्थव्यवस्था भी डिजिटल बदलाव का लाभ उठा रही है. पूर्व विज्ञापन पेशेवर अनिंदिता चौधरी ने पुणे में इकोसर्व इंडिया की स्थापना की. यह उद्यम कौना, शीतलपाटी, बांस, वाटर हायसिंथ, सुपारी के पत्तों और जूट जैसी प्राकृतिक सामग्रियों से उत्पाद तैयार करता है और लगभग 30 कारीगरों को रोजगार देता है. साथ ही इकोसर्व इंडिया प्राकृतिक फाइबर आधारित उत्पादों के माध्यम से सिंगल-यूज प्लास्टिक का टिकाऊ विकल्प उपलब्ध करा रही है. वहीं, मनु गुलाटी द्वारा स्थापित लूप्स एन नॉट्स अब ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए वैश्विक ग्राहकों तक पहुंच बना चुका है. इससे स्पष्ट होता है कि डिजिटल बाजार भारतीय हस्तशिल्प को नई पहचान दे रहे हैं.
फूड प्रोसेसिंग और होमवेयर सेक्टर में बढ़े अवसर
फूड प्रोसेसिंग क्षेत्र में सूक्ष्म और लघु उद्यमों को मिलने वाला ऋण मध्यम उद्यमों की तुलना में अधिक तेजी से बढ़ा है. इससे इस क्षेत्र में वित्तीय संस्थानों का बढ़ता भरोसा दिखाई देता है. मध्य प्रदेश के आनंद कश्यप ने इंजीनियरिंग का करियर छोड़कर ऑर्गेनिक आनंद की स्थापना की. स्थानीय किसानों से प्राप्त सामग्री से बने अचार, पापड़ और पारंपरिक खाद्य उत्पादों के जरिए उनका कारोबार शुरू हुआ. बाद में प्रशिक्षण और बाजार तक पहुंच मिलने के बाद उनका मासिक कारोबार 10 लाख रुपये से अधिक हो गया. लवली बबीश की बीटरूट्स इको लिविंग ने अपसाइकिल किए गए नारियल के खोल और प्राकृतिक सामग्रियों से बने उत्पादों के जरिए 25 गुना वृद्धि दर्ज की.
महिला उद्यमिता तेजी से बढ़ रही
महिला उद्यमी भारतीय MSME क्षेत्र की नई ताकत बनकर उभर रही हैं. प्रेरणा अग्रवाल की समाख्या सस्टेनेबल अल्टरनेटिव्स तीन हजार से अधिक कारीगरों और पशुपालकों के नेटवर्क के साथ काम करती है और टिकाऊ वस्त्र तथा लाइफस्टाइल उत्पाद तैयार करती है. अरुणा दारा की अपना ग्रीन प्रोडक्ट्स ने पांच राज्यों में 13 उत्पादन इकाइयां स्थापित कर करीब 300 महिलाओं को रोजगार दिया है. इकोसर्व इंडिया में काम करने वाले कारीगरों में लगभग 90 प्रतिशत महिलाएं हैं. एक रिपोर्ट के अनुसार, महिलाओं का डिजिटल मैच्योरिटी इंडेक्स 57.4 है, जबकि पुरुषों का 57.7. यह बताता है कि डिजिटल क्षमता के मामले में लैंगिक अंतर तेजी से कम हो रहा है.
डिजिटलीकरण की रफ्तार अभी भी चुनौती
हालांकि MSME क्षेत्र में डिजिटल बदलाव तेजी से हो रहा है, लेकिन यह समान रूप से नहीं बढ़ रहा है. भारत का डिजिटल मैच्योरिटी इंडेक्स 2023 में 56.6 से बढ़कर 2025 में 58.0 हो गया है. इसके बावजूद केवल 12 प्रतिशत MSME ही पूर्ण डिजिटल परिपक्वता हासिल कर पाए हैं. यह आंकड़ा दर्शाता है कि छोटे कारोबारों के सामने अभी भी तकनीकी क्षमता और डिजिटल अपनाने की चुनौती मौजूद है.
वॉलमार्ट वृद्धि कार्यक्रम की अहम भूमिका
वर्ष 2019 से वॉलमार्ट वृद्धि कार्यक्रम देशभर के 1.15 लाख से अधिक MSME को डिजिटल क्षमताएं, व्यावसायिक कौशल और बाजार तक पहुंच उपलब्ध कराने में मदद कर चुका है. वॉलमार्ट के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट, जनरल मर्चेंडाइजिंग एंड फैशन सोर्सिंग, अवनीश गुप्ता ने कहा, "भारत का जीवंत नवाचार इकोसिस्टम और यहां के MSME की विकास क्षमता हमें लगातार प्रेरित करती है. अनेक सूक्ष्म उद्यमों को आगे बढ़ने के लिए आवश्यक जानकारी, आधुनिक उपकरणों और बाजार तक पहुंच हासिल करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है. इन उद्यमियों को महत्वपूर्ण व्यावसायिक कौशल और बाजार तक पहुंच उपलब्ध कराकर हमने उन्हें अपने कारोबार को टिकाऊ तरीके से स्थापित करने और उसका विस्तार करने में मदद की है."
निष्कर्ष
भारतीय MSME क्षेत्र पहले की तुलना में अधिक डिजिटल, अधिक संगठित, अधिक महत्वाकांक्षी और वैश्विक बाजारों से जुड़ा हुआ बन रहा है. विनिर्माण और निर्यात, डिजिटल कारोबार, महिला उद्यमिता, फूड प्रोसेसिंग और सस्टेनेबिलिटी जैसे पांच प्रमुख रुझान आने वाले वर्षों में देश के छोटे कारोबारों की दिशा तय करेंगे.
विश्व MSME दिवस पर यह स्पष्ट दिखाई देता है कि भारत के छोटे कारोबार अब केवल स्थानीय बाजारों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे वैश्विक स्तर पर अपनी नई पहचान बनाने की ओर तेजी से आगे बढ़ रहे हैं.
गौतम अडानी के खिलाफ आरोप वापस लेने के फैसले पर जज ने उठाए सवाल, 13 जुलाई तक मांगा विस्तृत स्पष्टीकरण
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
उद्योगपति गौतम अडानी से जुड़े अमेरिकी मामले में एक नया मोड़ सामने आया है. अमेरिकी अदालत ने न्याय विभाग से यह स्पष्ट करने को कहा है कि उसने अडानी के खिलाफ आपराधिक आरोप वापस लेने का फैसला क्यों किया. अदालत ने फिलहाल मामले को खारिज करने से इनकार कर दिया है और अभियोजकों को 13 जुलाई तक अतिरिक्त जानकारी देने का निर्देश दिया है.
अदालत ने मांगा विस्तृत स्पष्टीकरण
अमेरिकी जिला न्यायाधीश निकोलस गाराउफिस ने अपने लिखित आदेश में कहा कि संघीय अभियोजक यह पर्याप्त रूप से स्पष्ट नहीं कर पाए हैं कि वे इस मामले को क्यों छोड़ना चाहते हैं. अदालत का कहना है कि सरकार की ओर से दी गई जानकारी इतनी पर्याप्त नहीं है कि उसके आधार पर कोई निष्कर्ष निकाला जा सके.
न्यायाधीश ने कहा कि सरकार का संक्षिप्त और निष्कर्षात्मक बयान अदालत को न तो किसी निर्णय तक पहुंचने का आधार देता है और न ही मामले का उचित विश्लेषण करने का अवसर प्रदान करता है.
क्या हैं गौतम अडानी पर आरोप?
वर्ष 2024 में गौतम अडानी पर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने अडानी समूह की एक सहायक कंपनी की सौर ऊर्जा परियोजना के लिए मंजूरी हासिल करने के उद्देश्य से भारतीय सरकारी अधिकारियों को रिश्वत देने की साजिश रची थी.
इसके अलावा उन पर अमेरिकी निवेशकों को समूह की भ्रष्टाचार विरोधी नीतियों के बारे में गुमराह करने का भी आरोप लगाया गया था.
न्याय विभाग ने वापस लिया था मामला
पिछले महीने अमेरिकी न्याय विभाग ने कहा था कि वह इस मामले को आगे नहीं बढ़ाएगा. इसके बाद अडानी की कानूनी टीम ने ब्रुकलिन स्थित अदालत से आरोपों को औपचारिक रूप से खारिज करने का अनुरोध किया था. हालांकि, अदालत ने फिलहाल मामले को समाप्त करने से इनकार कर दिया है और सरकार से अधिक विस्तृत जानकारी मांगी है.
अडानी समूह ने आरोपों से किया इनकार
अडानी समूह लगातार सभी आरोपों को खारिज करता रहा है. समूह का कहना है कि उसने कोई गलत काम नहीं किया है और उसके खिलाफ लगाए गए आरोप निराधार हैं. अडानी के वकील रॉबर्ट जिउफ्रा ने अदालत में दायर अपने पत्र में कहा कि यह मामला अमेरिकी कानून के अधिकार क्षेत्र से बाहर है. उन्होंने यह भी तर्क दिया कि अभियोजन पक्ष भारत में कथित रिश्वतखोरी के आरोपों को साबित नहीं कर पाएगा.
13 जुलाई पर टिकीं निगाहें
अब अमेरिकी अदालत द्वारा अतिरिक्त जानकारी मांगे जाने के बाद इस मामले पर एक बार फिर सबकी नजरें टिक गई हैं. अभियोजकों को 13 जुलाई तक अपना विस्तृत जवाब दाखिल करना होगा. इसके बाद ही यह साफ हो पाएगा कि अदालत इस मामले में आगे क्या रुख अपनाती है और गौतम अडानी के खिलाफ मामला पूरी तरह समाप्त होगा या नहीं.
सशिधर जगदीशन का एचडीएफसी बैंक बिखरता हुआ नजर आ रहा है और अब भारतीय बैंकिंग नियामकों के सामने वह सवाल खड़ा है, जिससे वे अधिक समय तक बच नहीं सकते कि क्या उन्हें एक बार फिर बैंक की कमान सौंपी जानी चाहिए.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
पलक शाह
एक विशेष प्रकार का संस्थागत संकट होता है, जो किसी एक बड़े धमाके के साथ अपनी घोषणा नहीं करता. वह धीरे-धीरे जमा होता है. वह सावधानीपूर्वक नौकरशाही भाषा में लिखे गए इस्तीफा पत्रों में दिखाई देता है. वह उन शेयर चार्टों में नजर आता है, जिनमें चार कारोबारी सत्रों के भीतर 1.35 लाख करोड़ रुपये की बाजार पूंजी समाप्त हो जाती है. वह उन सतर्कता रिपोर्टों में सामने आता है, जिन्हें सार्वजनिक रूप से पढ़े जाने की कभी उम्मीद नहीं की गई थी, और उन अदालती सुनवाइयों में भी, जहां बैंक का शीर्ष अधिकारी वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों का सामना करता है, इससे पहले कि तकनीकी आधार पर आरोपों को रद्द कर दिया जाए. यह सशिधर जगदीशन के नेतृत्व वाले एचडीएफसी बैंक की कहानी है और यह अभी समाप्त नहीं हुई है.
जगदीशन का प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी के रूप में कार्यकाल अक्टूबर 2026 में समाप्त हो रहा है. नामांकन और पारिश्रमिक समिति को उनके तीसरे कार्यकाल की सिफारिश आरबीआई को करनी है. प्रक्रिया से परिचित लोगों के अनुसार, नियामक ने स्पष्ट कर दिया है कि ऐसी किसी भी सिफारिश को अंतिम रूप देने से पहले वह एक स्थायी चेयरमैन की नियुक्ति चाहता है. आज की स्थिति में बैंक के पास कोई स्थायी चेयरमैन नहीं है. इस पद पर रहे अंतिम व्यक्ति ने मार्च में इस्तीफा देते हुए कहा था कि कुछ "घटनाएं और कार्यप्रणालियां" उनकी व्यक्तिगत नैतिकता के अनुरूप नहीं थीं. तब से बैंक अंतरिम चेयरमैन केकी मिस्त्री के नेतृत्व में काम कर रहा है. बताया जाता है कि आरबीआई बोर्ड पर चेयरमैन की नियुक्ति प्रक्रिया तेज करने का दबाव बना रहा है. बोर्ड धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है. और इसी प्रक्रियागत उलझन के बीच स्वयं जगदीशन भी खड़े हैं, जिनका भविष्य अब एक ऐसे नैतिक विवाद और एक ऐसे नियामक के बीच फंसा हुआ है, जो उन्हें जल्द मंजूरी देने की कोई जल्दी में नहीं दिखता.
वह योजना जो मार्केटिंग नहीं थी
यह समझने के लिए कि आखिर दरार कहां से शुरू हुई, आपको 2021 में लौटना होगा. एचडीएफसी बैंक के वरिष्ठ प्रबंधन ने एक महत्वपूर्ण लक्ष्य की पहचान की थी, महाराष्ट्र राज्य सड़क विकास निगम, एक सरकारी अवसंरचना एजेंसी, जिसके पास भूमि अधिग्रहण से जुड़े लगभग 25,000 करोड़ रुपये के फंड थे. आंतरिक रिकॉर्ड के अनुसार, एमएसआरडीसी अधिकारियों ने बैंक के एक जोनल प्रमुख के साथ हुई एक "मौखिक" समझ के माध्यम से संकेत दिया था कि वे अपनी जमा राशि पर 6.01 प्रतिशत रिटर्न की अपेक्षा रखते हैं, जो किसी सामान्य जमाकर्ता को मिलने वाली 3.5 प्रतिशत बचत दर से लगभग दोगुना था.
कोई बैंक व्यक्तिगत जमाकर्ताओं को अलग-अलग ब्याज दरें नहीं दे सकता. जमा पर ब्याज दरों से संबंधित आरबीआई के मास्टर निर्देश इस मामले में पूरी तरह स्पष्ट हैं. इसलिए, कथित रूप से, शीर्ष स्तर पर किसी ने यह तय किया कि यदि पैसा ब्याज के रूप में नहीं दिया जा सकता, तो उसे किसी और तरीके से दिया जाएगा.
इसके बाद जो हुआ, उसे एक आंतरिक सतर्कता रिपोर्ट ने बाद में गंभीर शब्दों में दर्ज किया. कुल 45 करोड़ रुपये का अंतर बैंक के मार्केटिंग बजट के माध्यम से भेजा गया. कागजों पर इसे एमएसआरडीसी द्वारा चलाए जा रहे एक सड़क सुरक्षा जागरूकता अभियान के लिए "प्रायोजन" के रूप में दिखाया गया. इसके लिए चार स्थानीय मार्केटिंग विक्रेताओं का उपयोग मध्यस्थ संस्थाओं के रूप में किया गया. किसी कानूनी टीम ने इसकी समीक्षा नहीं की. अनुपालन विभाग की कोई मंजूरी नहीं ली गई. इस व्यवस्था से जुड़े किसी भी सार्वजनिक दस्तावेज में "6.01 प्रतिशत" का कहीं उल्लेख नहीं था.
सतर्कता रिपोर्ट में कई अधिकारियों के बयान दर्ज हैं, जिनके अनुसार जगदीशन "उस बैठक में शामिल थे, जो इस बात की जांच के लिए बुलाई गई थी कि बैंक एमएसआरडीसी को किस प्रकार मुआवजा दे सकता है और मार्केटिंग बजट के माध्यम से अंतर राशि उपलब्ध कराने के निर्णय का हिस्सा थे." मुख्य वित्तीय अधिकारी श्रीनिवासन वैद्यनाथन भी इन चर्चाओं में उपस्थित थे.
एचडीएफसी बैंक का आधिकारिक पक्ष यह रहा है कि यह व्यवस्था नियमों के दायरे में थी, किसी जमाकर्ता को नुकसान नहीं हुआ और भुगतान वैध मार्केटिंग गतिविधियों का हिस्सा थे. आरबीआई ने अपनी समीक्षा के बाद कोई दंड नहीं लगाया. बैंक द्वारा नियुक्त स्वतंत्र कानून फर्मों ने कथित तौर पर किसी आपराधिक कृत्य के प्रमाण नहीं पाए. मई 2026 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने लीलावती ट्रस्ट मामले में जगदीशन के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करते हुए निचली अदालत के आदेश को "आपराधिक प्रक्रिया का गंभीर दुरुपयोग" बताया.
तो क्या सब कुछ साफ है?
पूरी तरह नहीं.
वह चेयरमैन जो चले गए
17 मार्च 2026 को अतनु चक्रवर्ती एक प्रतिष्ठित आईएएस अधिकारी, पूर्व आर्थिक मामलों के सचिव और सार्वजनिक रूप से नाटकीय कदमों से दूर रहने वाले व्यक्ति ने एचडीएफसी बैंक के गैर-कार्यकारी चेयरमैन पद से इस्तीफा दे दिया. उन्होंने किसी विशेष घटना का उल्लेख नहीं किया. उन्होंने जगदीशन का नाम नहीं लिया. उन्होंने केवल इतना कहा कि बैंक के भीतर दो वर्षों में जो कुछ उन्होंने देखा, वह उनके मूल्यों के अनुकूल नहीं था.
बाजार ने इस संकेत को तुरंत समझ लिया. अगले कुछ दिनों में एचडीएफसी बैंक के शेयर लगभग 11 से 12 प्रतिशत तक गिर गए. लगभग 21 अरब डॉलर की बाजार पूंजी समाप्त हो गई. जांच के लिए तीन बाहरी कानून फर्मों ट्राइलीगल, वाडिया गांधी एंड कंपनी और एक अमेरिकी फर्म को नियुक्त किया गया. उनकी रिपोर्टें अब तक सार्वजनिक नहीं की गई हैं.
जो जानकारी सामने आई है, उसके अनुसार चक्रवर्ती के कार्यकाल के दौरान जगदीशन की प्रबंधन टीम के साथ मतभेद रहे. बताया जाता है कि उन्होंने जापान के मित्सुबिशी यूएफजे फाइनेंशियल ग्रुप को एचडीबी फाइनेंशियल सर्विसेज में अल्पांश हिस्सेदारी बेचने की योजना का विरोध किया था. उन्होंने दुबई स्थित बैंक के परिचालन पर अधिक निगरानी की मांग भी की थी, जहां स्थानीय नियामक ने नए ग्राहकों को जोड़ने पर प्रतिबंध लगाया था. जगदीशन की टीम ने इन कमियों को "तकनीकी" बताया, लेकिन चक्रवर्ती ने उन्हें केवल तकनीकी मामला नहीं माना.
दूसरे शब्दों में, चेयरमैन और सीईओ कुछ समय से अलग-अलग दिशाओं में काम कर रहे थे. चेयरमैन ने पहले कदम पीछे खींचे, लेकिन उनका इस्तीफा इस प्रकार लिखा गया कि सीईओ के लिए इसे अपनी जीत घोषित करना आसान नहीं था.
शीर्ष पद पर खालीपन
एचडीएफसी बैंक अब एक असहज स्थिति में फंस गया है. वह आरबीआई की मंजूरी के बिना नया चेयरमैन नियुक्त नहीं कर सकता. वह जगदीशन के तीसरे कार्यकाल पर आरबीआई की स्पष्ट मंजूरी भी प्राप्त नहीं कर सकता, क्योंकि सिफारिश पर हस्ताक्षर करने के लिए चेयरमैन मौजूद नहीं है. बाहरी कानून फर्मों की रिपोर्टें अभी भी सार्वजनिक नहीं की गई हैं.
जो गवर्नेंस संरचना कभी कार्यकारी शक्ति पर औपचारिक नियंत्रण का काम करती थी एचडीएफसी लिमिटेड का प्रमोटर समूह वह 2023 में मूल कंपनी के बैंक में विलय के बाद पूरी तरह समाप्त हो गई. अब न कोई नियंत्रक शेयरधारक है, न कोई संस्थापक परिवार और न ही कोई ऐसा संस्थागत स्वर, जिसके पास सीधे जवाबदेही मांगने की क्षमता और प्रेरणा दोनों हों.
इसके बजाय आज एक 13 लाख करोड़ रुपये का बैंक संस्थागत जड़ता के सहारे चल रहा है. इसका सीईओ पुनर्नियुक्ति की प्रतीक्षा में है और ऐसे फैसलों पर निर्भर है, जिन्हें लेने की कोई जल्दी किसी को नहीं दिखती. दूसरी ओर, चेयरमैन के इस्तीफे के तीन महीने बाद भी बोर्ड शेयरधारकों को यह नहीं बता पाया है कि बाहरी जांचकर्ताओं ने क्या पाया.
आदित्य पुरी ने 26 वर्षों में जो व्यवस्था बनाई थी, उसे हमेशा बैंक की सबसे बड़ी ताकत माना गया. सिस्टम, प्रक्रियाएं और बहस की जगह निष्पादन की संस्कृति. लेकिन वह व्यवस्था उस स्थिति को नहीं झेल सकती, जब यह सवाल वास्तविक रूप से उठने लगे कि संस्था को चलाएगा कौन क्योंकि अब संरचना में ऐसा कोई नहीं बचा है, जिसके पास इस सवाल का उत्तर देने की शक्ति और इच्छा दोनों हों.
वह क्षण आ चुका है. जगदीशन अभी भी बैंक में मौजूद हैं. सवाल केवल इतना है कि कब तक.
एचडीएफसी बैंक में अन्य विवाद
एमएसआरडीसी प्रकरण, जैसा कि अब सामने आ रहा है, दरअसल एक लंबी सूची का केवल सबसे प्रमुख मामला था. बैंक के करीबी सूत्रों का कहना है कि पिछले दो वर्षों के दौरान चक्रवर्ती की आपत्तियां उन कई मुद्दों से जुड़ी थीं, जिनकी रिपोर्टिंग बहुत कम हुई है.
वर्ली स्थित अल्टिमस बिल्डिंग का उदाहरण लें. बैंक का प्रबंधन अपने कॉर्पोरेट कार्यालय को रहेजा बिल्डर्स द्वारा विकसित एक प्रीमियम लीज संपत्ति में स्थानांतरित करने का प्रयास कर रहा था. चक्रवर्ती ने हितों के टकराव की ओर संकेत किया, बैंक के एक निदेशक के बिल्डर से संबंध थे और ऑडिट टीम ने भी इस सौदे में कई गंभीर अनियमितताओं को चिन्हित किया था. उन्होंने इसका विरोध किया. अंततः परिसर समिति ने इस लेनदेन को रद्द कर दिया. यह एक शांत जीत थी, लेकिन यह बताती है कि बोर्डरूम के भीतर चेयरमैन किन परिस्थितियों का सामना कर रहे थे.
सबसे हालिया और शायद सबसे विस्फोटक मामला फाइनडीएनए (FynDNA) से जुड़ा है, जो एक आईटी विक्रेता है और जिसे बैंक से एक उच्च मूल्य का अनुबंध मिला था. अब ऑडिट समिति के निर्देश पर इसकी जांच की जा रही है. फाइनडीएनए का स्वामित्व सी. एन. राम बैंक के पहले प्रौद्योगिकी प्रमुख, उनके पुत्र और मन्मथ कुलकर्णी, जिनकी पृष्ठभूमि ओरेकल से जुड़ी रही है, से संबंधित बताया जाता है. उस अनुबंध का पूरा विवरण और ऑडिट समिति के निष्कर्ष एक अलग कहानी हैं. लेकिन इसका अस्तित्व एक पैटर्न की ओर संकेत करता है अनुबंध उन लोगों तक पहुंचना जिनके सीईओ के करीबी दायरे से पुराने संबंध रहे हैं, निगरानी संस्थाओं द्वारा सवाल उठाना और प्रबंधन द्वारा दूसरी दिशा में देखने के कारण तलाशना.
यहीं से बात कानून फर्मों तक पहुंचती है. जब चक्रवर्ती ने इस्तीफा दिया, तो एचडीएफसी बैंक ने तेजी से स्वतंत्र समीक्षा के लिए ट्राइलीगल, वाडिया गांधी एंड कंपनी और एक अमेरिकी कानून फर्म को नियुक्त किया. इस प्रक्रिया से मिली क्लीन चिट का उपयोग बाद में उठे हर सवाल के जवाब में किया गया. लेकिन इस प्रक्रिया को स्वतंत्र कहने में एक बुनियादी समस्या है. ट्राइलीगल और वाडिया गांधी कई वर्षों से एचडीएफसी बैंक और एचडीएफसी लिमिटेड के लगभग आंतरिक कानूनी सलाहकार रहे हैं. वे उसी प्रबंधन से नियमित रूप से काम प्राप्त करते रहे हैं, जिसकी जांच करने के लिए उन्हें नियुक्त किया गया था. बैंक नेतृत्व के खिलाफ आरोपों की समीक्षा के लिए उन्हें नियुक्त करना और फिर उनके निष्कर्षों को स्वतंत्र प्रमाण के रूप में प्रस्तुत करना कोई गवर्नेंस समीक्षा नहीं है. अधिक से अधिक, यह एक प्रदर्शन मात्र है.
आरबीआई ने, उसके श्रेय के लिए, इस स्थिति पर ध्यान दिया प्रतीत होता है. चक्रवर्ती के इस्तीफे के बाद बैंक के सार्वजनिक बयान "गवर्नेंस से जुड़ी कोई बड़ी चिंता नहीं" के बावजूद, यह समझा जाता है कि नियामक अपनी स्वतंत्र पर्यवेक्षी जांच कर रहा है, जो वह नियमित रूप से नहीं करता. यह जांच कानून फर्मों की समीक्षा से अलग है. और इसका परिणाम, जब भी सामने आएगा, कहीं अधिक महत्व रखेगा.
जगदीशन ने बहुत कुछ झेला है. सतर्कता आरोप-पत्र, एफआईआर, चेयरमैन का इस्तीफा, एनआरसी के साथ मतभेद, पुराने नेटवर्क से जुड़े आरोप, कानून फर्मों को लेकर उठे सवाल इनमें से प्रत्येक स्थिति का उन्होंने सामना किया, उसे टाला या चुपचाप संभाला. लेकिन अक्टूबर नजदीक है. तीसरे कार्यकाल का आवेदन आरबीआई के पास है. और अब नियामक के सामने उसकी अपनी कराई गई पर्यवेक्षी जांच, एक ऐसा सीईओ जिसका नाम आंतरिक आरोप-पत्र में दर्ज है, तीन महीने से बिना स्थायी चेयरमैन के काम कर रहा बोर्ड और गवर्नेंस का वह रिकॉर्ड मौजूद है, जिसे स्वयं निवर्तमान चेयरमैन ने अपने मूल्यों के अनुरूप नहीं बताया था.
मशीन चलती रहती है. लेकिन मशीनों की भी जांच होती है.
वे सुविधाएं जिनकी कोई बात नहीं करता
एक प्रकार का क्षरण ऐसा भी होता है, जो सतर्कता रिपोर्टों में दिखाई नहीं देता. वह छोटे-छोटे प्रबंधों में सामने आता है, कहीं कोई एहसान, कहीं कोई छूट जो अलग-अलग देखने पर मामूली लगते हैं, लेकिन मिलकर ऐसी संस्था की तस्वीर बनाते हैं, जहां जो नियम बाकी सब पर लागू होते हैं, वे शीर्ष पर बैठे लोगों पर कुछ कम कठोरता से लागू होते हैं.
ऑडिट के पूर्व समूह प्रमुख का मामला देखें, वे एक प्रमुख प्रबंधकीय अधिकारी थे, जिनकी जिम्मेदारियां संस्थागत ईमानदारी के मूल तक जाती थीं. मामले से परिचित सूत्रों के अनुसार, यह अधिकारी बैंक के भीतर एक शांत समानांतर गतिविधि चला रहे थे. वे अपने सहयोगियों से अपनी पत्नी के एनजीओ के लिए दान एकत्र कर रहे थे और उससे भी अधिक उल्लेखनीय बात यह थी कि उन्होंने सैंडोज हाउस तथा बैंक के अन्य प्रमुख परिसरों में दान एकत्र करने के लिए एनजीओ कियोस्क स्थापित करवाए थे. यह संभवतः सबसे गंभीर अपराध नहीं था, लेकिन यह आचरण संबंधी इतना बड़ा टकराव अवश्य था कि एनआरसी और तत्कालीन चेयरमैन अतनु चक्रवर्ती ने उन्हें हटाने का निर्णय लिया.
इस मामले में महत्वपूर्ण बात यह नहीं है कि एनआरसी ने क्या किया. महत्वपूर्ण यह है कि जगदीशन ने क्या किया. बताया जाता है कि उन्होंने उस अधिकारी को बनाए रखने के लिए प्रयास किया और जब ऐसा संभव नहीं हुआ तो सेवानिवृत्ति के बाद उन्हें एक नए पद ग्रुप हेड, चेंज एजेंट पर फिर से नियुक्त कर लिया. केवल यह पदनाम ही बहुत कुछ कहता है. जिस व्यक्ति को बैंक परिसरों के दुरुपयोग के कारण स्वयं एनआरसी ने बाहर किया था, वह कुछ ही महीनों में सीईओ के माध्यम से एक नए पहचान पत्र के साथ वापस लौट आया. यदि चेयरमैन यह देख रहे थे कि सीईओ उन लोगों के साथ क्या करते हैं जिन्हें गवर्नेंस संरचना ने बाहर कर दिया है, तो यह उसका एक प्रारंभिक उत्तर था.
लीलावती फाइल
बॉम्बे हाई कोर्ट ने लीलावती ट्रस्ट मामले में जगदीशन के खिलाफ एफआईआर भले ही रद्द कर दी हो, लेकिन अस्पताल के कुछ ट्रस्टियों द्वारा लिखित रूप में लगाए गए आरोप समाप्त नहीं हुए हैं. उनके लिखित आरोपों, जिनकी चर्चा और आंशिक रिपोर्टिंग हुई, में जगदीशन पर लीलावती अस्पताल के साथ अपने संबंधों को लेकर कई उल्लंघनों के आरोप लगाए गए. सबसे अधिक चर्चा जिस आरोप की हुई, वह यह था कि उन्होंने अपनी सास और पत्नी के अस्पताल खर्चों पर भारी छूट प्राप्त करने के लिए बातचीत की थी.
स्पष्ट रूप से कहा जाए तो यह आरोप ट्रस्टियों के एक गुट द्वारा लगाया गया है और यह एक विवादित आंतरिक मामले का हिस्सा है. अदालतों ने एफआईआर को बरकरार नहीं रखा. बैंक की संचार टीम ने इस मामले को नियंत्रित करने के लिए तेजी से काम किया और अधिकांश आकलनों के अनुसार इसमें सफलता भी प्राप्त की. लेकिन यह आरोप एक व्यापक प्रश्न उठाता है. भारत के दूसरे सबसे बड़े निजी बैंक के प्रबंध निदेशक और सीईओ, जिनके पास पर्याप्त ईएसओपी, बड़ा वेतन और ऐसी सुविधाएं हैं जिनकी अधिकांश भारतीय कल्पना भी नहीं कर सकते, उन्हें उस अस्पताल में छूट के लिए बातचीत करने की आवश्यकता क्यों पड़ी, जिससे उनकी संस्था का संबंध था? यहां प्रश्न संपत्ति का नहीं, बल्कि प्रवृत्ति का है.
इसे केवल एक व्यक्ति के व्यवहार के रूप में खारिज करना आसान होगा. लेकिन यह कोई अकेली घटना नहीं है. इससे पहले यह भी सामने आया था कि दिल्ली की प्रतिष्ठित डिफेंस कॉलोनी में स्थित एक बंगला जो एचडीएफसी बैंक के एक पूर्व प्रबंध निदेशक और सीईओ के परिवार का था, बाजार दर पर बैंक को अतिथि गृह के रूप में लीज पर दिया गया था. उस व्यवस्था में भी एक प्रकार की परस्परता दिखाई देती थी, जिससे किसी को असहज होना चाहिए था. लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि ऐसा नहीं हुआ, या पर्याप्त स्तर पर नहीं हुआ.
हम राजनेताओं और सरकारी अधिकारियों की वीआईपी संस्कृति को दर्ज करने में काफी ऊर्जा खर्च करते हैं, विवेकाधीन आवंटन, कार्यकाल के बाद भी सरकारी बंगलों का उपयोग और सार्वजनिक संसाधनों पर यात्रा करने वाले परिजन. निजी क्षेत्र, उसके अपने अधिकारियों के अनुसार, अलग है. अधिक जवाबदेह. अधिक योग्यता-आधारित बाजार अनुशासन, बोर्ड की निगरानी और शेयरधारकों की जांच के अधीन.
कम से कम हाल के समय में एचडीएफसी बैंक का रिकॉर्ड यह संकेत देता है कि वास्तविकता और इस दावे के बीच का अंतर उतना बड़ा नहीं है, जितना प्रचार सामग्री में दिखाई देता है.
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
सरकार ने औषधि नियम, 1945 के नियम 31 में संशोधन का प्रस्ताव रखा है. मौजूदा व्यवस्था के तहत आयात की जाने वाली दवाओं की कुल स्वीकृत मियाद का कम से कम 60 प्रतिशत हिस्सा आयात के समय बचा होना जरूरी है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
केंद्र सरकार दवाओं के आयात और फार्मास्युटिकल रिसर्च से जुड़े नियमों को आसान बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाने जा रही है. स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने औषधि नियम, 1945 में दो अहम संशोधनों का मसौदा जारी किया है. प्रस्तावित बदलावों से दवाओं के आयात की प्रक्रिया सरल होगी, रिसर्च एवं टेस्टिंग को बढ़ावा मिलेगा और दवा कंपनियों के लिए कारोबार करना आसान हो सकता है.
दवाओं के आयात नियमों में होगा बड़ा बदलाव
सरकार ने औषधि नियम, 1945 के नियम 31 में संशोधन का प्रस्ताव रखा है. मौजूदा व्यवस्था के तहत आयात की जाने वाली दवाओं की कुल स्वीकृत मियाद का कम से कम 60 प्रतिशत हिस्सा आयात के समय बचा होना जरूरी है. अब सरकार इस नियम को बदलकर न्यूनतम 12 महीने की शेष मियाद की शर्त लागू करना चाहती है.
सरकार का मानना है कि इससे दवाओं की आपूर्ति श्रृंखला अधिक प्रभावी बनेगी, स्टॉक प्रबंधन बेहतर होगा और मियाद संबंधी सख्त नियमों के कारण होने वाली दवा बर्बादी को कम किया जा सकेगा.
कुछ दवाओं पर पुराना नियम रहेगा लागू
बायोलॉजिकल उत्पादों और रेडियोफार्मास्युटिकल दवाओं के लिए वर्तमान 60 प्रतिशत शेष मियाद का नियम जारी रहेगा. मंत्रालय के मुताबिक इन उत्पादों की संवेदनशील प्रकृति और जन स्वास्थ्य से जुड़े जोखिमों को देखते हुए इनमें कोई बदलाव नहीं किया जाएगा.
गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों पर नहीं पड़ेगा असर
स्वास्थ्य मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि प्रस्तावित संशोधन केवल आयात के समय बची हुई मियाद की शर्त से संबंधित है. दवाओं की गुणवत्ता, सुरक्षा और प्रभावशीलता से जुड़े सभी मौजूदा नियामकीय मानदंड पहले की तरह लागू रहेंगे.
दवा कंपनियों को मिलेगी राहत
उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि प्रतिशत आधारित गणना के बजाय निश्चित समय सीमा लागू होने से पूरी आपूर्ति श्रृंखला को फायदा मिलेगा. इससे विदेशी निर्यातक बेहतर योजना बना सकेंगे और वेयरहाउसिंग तथा स्टॉक प्रबंधन भी अधिक प्रभावी होगा.
विशेषज्ञों के अनुसार नए नियम से आयातकों के लिए अनुपालन आसान होगा और दवा क्षेत्र में कारोबार करने की प्रक्रिया अधिक पारदर्शी एवं अनुमानित बन सकेगी.
टेस्टिंग और रिसर्च के लिए आसान होगा आयात
सरकार ने एक अन्य मसौदा संशोधन में परीक्षण, विश्लेषण और गैर-क्लीनिकल रिसर्च के लिए कम मात्रा में दवाओं के आयात को भी आसान बनाने का प्रस्ताव दिया है. फिलहाल इसके लिए लाइसेंस या फॉर्म-11 की आवश्यकता होती है.
नए प्रस्ताव के तहत आवेदकों को केवल ऑनलाइन पूर्व सूचना देनी होगी और एक्नॉलेजमेंट मिलने के बाद वे दवाओं का आयात कर सकेंगे. इससे रिसर्च और परीक्षण से जुड़े कार्यों में तेजी आने की उम्मीद है.
इन दवाओं के लिए लाइसेंस की शर्त जारी रहेगी
प्रस्तावित व्यवस्था सेक्स हार्मोन, साइटोटॉक्सिक दवाओं, बीटा-लैक्टम दवाओं, जीवित सूक्ष्मजीवों वाले जैविक उत्पादों तथा मादक एवं साइकोट्रोपिक पदार्थों पर लागू नहीं होगी. इन श्रेणियों की दवाओं के आयात के लिए पहले की तरह लाइसेंस लेना अनिवार्य रहेगा.
हितधारकों से मांगी गई राय
स्वास्थ्य मंत्रालय ने दोनों मसौदा संशोधनों को सार्वजनिक कर दिया है और उद्योग से जुड़े हितधारकों से सुझाव एवं आपत्तियां मांगी हैं. सुझावों पर विचार करने के बाद सरकार अंतिम अधिसूचना जारी कर सकती है.
क्या होगा फायदा?
1. दवाओं के आयात की प्रक्रिया आसान होगी.
2. सप्लाई चेन और स्टॉक प्रबंधन बेहतर होगा.
3. मियाद संबंधी कारणों से होने वाली बर्बादी कम होगी.
4. रिसर्च और परीक्षण गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा.
5. दवा उद्योग में कारोबार करने में आसानी बढ़ेगी.
6. फार्मास्युटिकल क्षेत्र में निवेश और नवाचार को गति मिल सकती है.
गोल्डमैन सैक्स ने अपनी नई रिपोर्ट में भारत की जीडीपी वृद्धि दर का अनुमान 6.1 प्रतिशत से बढ़ाकर 6.5 प्रतिशत कर दिया है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम होने और कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट से भारत की अर्थव्यवस्था के लिए अच्छी खबर सामने आई है. वैश्विक निवेश बैंक गोल्डमैन सैक्स ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की आर्थिक वृद्धि दर का अनुमान बढ़ाकर 6.5 प्रतिशत कर दिया है. साथ ही महंगाई के अनुमान में भी कमी की गई है, जिससे देश की आर्थिक स्थिति और मजबूत होने की उम्मीद बढ़ गई है.
GDP ग्रोथ अनुमान में बढ़ोतरी
गोल्डमैन सैक्स ने अपनी नई रिपोर्ट में भारत की जीडीपी वृद्धि दर का अनुमान 6.1 प्रतिशत से बढ़ाकर 6.5 प्रतिशत कर दिया है. बैंक का मानना है कि पश्चिम एशिया में तनाव कम होने और ऊर्जा कीमतों में नरमी आने से भारतीय अर्थव्यवस्था को बड़ा फायदा मिलेगा.
कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट से राहत
अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम होने के बाद वैश्विक तेल बाजार पर दबाव घटा है. पहले पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष के कारण तेल आपूर्ति बाधित होने की आशंका थी, जिससे कीमतों में तेजी देखने को मिली थी.
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है और देश के 60 प्रतिशत से अधिक ऊर्जा आयात हॉर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते होते हैं. ऐसे में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट भारत के लिए राहत की खबर मानी जा रही है.
महंगाई का अनुमान भी घटा
रिपोर्ट के अनुसार, कच्चे तेल और यूरिया जैसी कमोडिटी की कीमतों में कमी आने से महंगाई पर दबाव कम होगा. इसी वजह से गोल्डमैन सैक्स ने खुदरा महंगाई दर का अनुमान 5.1 प्रतिशत से घटाकर 4.9 प्रतिशत कर दिया है. यूरिया की कीमतों में गिरावट से सरकार के खाद सब्सिडी खर्च में भी कमी आ सकती है, जिससे राजकोषीय स्थिति को मजबूती मिलने की संभावना है.
मौसम से जुड़ी चुनौतियां बरकरार
हालांकि रिपोर्ट में मौसम संबंधी जोखिमों का भी जिक्र किया गया है. भारतीय मौसम विभाग द्वारा हीटवेव की आशंका जताई गई है, जिसका असर ग्रामीण क्षेत्रों की मांग और खपत पर पड़ सकता है. इसके बावजूद तीसरी तिमाही के बाद मांग में सुधार की उम्मीद जताई गई है, क्योंकि पेट्रोल और डीजल की कीमतों में फिलहाल बड़ी बढ़ोतरी की संभावना नहीं है.
ब्याज दरों पर क्या रहेगा असर?
गोल्डमैन सैक्स का अनुमान है कि भारतीय रिजर्व बैंक वर्ष 2026 में दो चरणों में कुल 50 बेसिस प्वाइंट तक ब्याज दरों में बढ़ोतरी कर सकता है. हालांकि यदि कच्चे माल की कीमतों में गिरावट जारी रहती है और महंगाई नियंत्रित रहती है, तो आरबीआई दरों में बढ़ोतरी को कुछ समय के लिए टाल भी सकता है.
आर्थिक माहौल हुआ और मजबूत
पश्चिम एशिया में तनाव कम होने, तेल कीमतों में नरमी और महंगाई के दबाव में कमी से भारत की अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक माहौल बनता दिख रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में इसका असर विकास दर, निवेश और उपभोग पर भी देखने को मिल सकता है.
अडानी समूह मुंबई, नवी मुंबई, अहमदाबाद, लखनऊ, जयपुर और गुवाहाटी एयरपोर्ट के आसपास करीब 655 एकड़ क्षेत्र को विकसित करेगा. पहले चरण में लगभग 2.2 करोड़ वर्ग फुट मिक्स्ड-यूज इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया जाएगा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
अडानी समूह ने देश के एविएशन और शहरी विकास क्षेत्र में बड़ा दांव खेलते हुए मुंबई, नवी मुंबई, अहमदाबाद, लखनऊ, जयपुर और गुवाहाटी में आधुनिक एयरपोर्ट सिटी विकसित करने की घोषणा की है. करीब ₹20,000 करोड़ के निवेश से 655 एकड़ क्षेत्र में बनने वाली इन परियोजनाओं में होटल, शॉपिंग मॉल, ऑफिस, मनोरंजन केंद्र और कन्वेंशन सुविधाएं विकसित की जाएंगी. कंपनी का लक्ष्य एयरपोर्ट को केवल हवाई यात्रा का केंद्र नहीं, बल्कि व्यापार, पर्यटन और निवेश के बड़े हब के रूप में विकसित करना है.
₹20,000 करोड़ के निवेश से विकसित होंगी एयरपोर्ट सिटी
अडानी एयरपोर्ट होल्डिंग्स लिमिटेड (AAHL) की पूर्ण स्वामित्व वाली कंपनी अडानी एयरपोर्ट सिटी लिमिटेड (AACL) ने छह प्रमुख शहरों में एयरपोर्ट सिटी प्रोजेक्ट शुरू करने की घोषणा की है. कंपनी पहले चरण में 20,000 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश करेगी. इन परियोजनाओं को मुंबई, नवी मुंबई, अहमदाबाद, लखनऊ, जयपुर और गुवाहाटी एयरपोर्ट के आसपास करीब 655 एकड़ क्षेत्र में विकसित किया जाएगा. पहले चरण में लगभग 2.2 करोड़ वर्ग फुट मिक्स्ड-यूज इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया जाएगा.
मुंबई और नवी मुंबई पर रहेगा सबसे ज्यादा फोकस
कंपनी के अनुसार, कुल निवेश का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा मुंबई और नवी मुंबई एयरपोर्ट सिटी परियोजनाओं पर खर्च किया जाएगा. इन दोनों शहरों में करीब 440 एकड़ क्षेत्र में विकास कार्य किए जाएंगे. इन परियोजनाओं के पूरा होने के बाद मुंबई क्षेत्र देश के सबसे बड़े एयरपोर्ट आधारित शहरी केंद्रों में शामिल हो सकता है.
होटल, मॉल और ऑफिस का बनेगा एकीकृत हब
एयरपोर्ट सिटी प्रोजेक्ट्स में होटल, शॉपिंग मॉल, कमर्शियल ऑफिस, मनोरंजन केंद्र और कन्वेंशन सुविधाएं एक ही परिसर में विकसित की जाएंगी. इन परियोजनाओं को एयरपोर्ट, मेट्रो और शहर के ट्रांसपोर्ट नेटवर्क से जोड़ा जाएगा. इससे यात्रियों, कारोबारियों और स्थानीय लोगों को एक ही स्थान पर आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध हो सकेंगी.
दुनिया के बड़े एयरपोर्ट मॉडल से प्रेरित होगी परियोजना
कंपनी ने बताया कि इन एयरपोर्ट सिटी को सिंगापुर के चांगी, दुबई इंटरनेशनल, एम्स्टर्डम के शिफोल और सियोल के इंचियोन जैसे विश्वस्तरीय एयरपोर्ट डिस्ट्रिक्ट्स की तर्ज पर विकसित किया जाएगा. इसका उद्देश्य एयरपोर्ट को केवल उड़ानों के केंद्र तक सीमित न रखकर व्यापार, पर्यटन, निवेश और शहरी विकास का प्रमुख केंद्र बनाना है.
जीत अडानी ने बताई कंपनी की रणनीति
AAHL के निदेशक जीत अडानी ने कहा कि दुनिया के कई सफल एयरपोर्ट आज व्यापार, पर्यटन और शहरी विकास के बड़े केंद्र बन चुके हैं. भारत में तेजी से बढ़ते एविएशन सेक्टर को देखते हुए एयरपोर्ट को आधुनिक शहरी केंद्रों के रूप में विकसित करना समय की जरूरत है. उन्होंने कहा कि इन परियोजनाओं से निवेश, रोजगार, बेहतर यात्री अनुभव और शहरों के दीर्घकालिक विकास को बढ़ावा मिलेगा.
पैदल घूमने योग्य आधुनिक शहरी केंद्र होंगे विकसित
एयरपोर्ट सिटी को इस प्रकार डिजाइन किया जाएगा कि लोग आसानी से पैदल चल सकें. यहां होटल, रिटेल स्टोर, ऑफिस, रेस्टोरेंट, मनोरंजन केंद्र और कन्वेंशन सुविधाएं एकीकृत रूप से उपलब्ध होंगी. इससे यात्रियों और स्थानीय नागरिकों दोनों को बेहतर अनुभव मिलेगा.
पांच लग्जरी होटल खोलने की तैयारी
अडानी एयरपोर्ट होल्डिंग्स ने IHG होटल्स एंड रिसॉर्ट्स के साथ पांच लग्जरी और प्रीमियम होटल विकसित करने का समझौता किया है. इसके तहत पहली बार किम्पटन होटल ब्रांड भी भारत में प्रवेश करेगा. कंपनी होटल, फूड एंड बेवरेज, रिटेल और एंटरटेनमेंट क्षेत्र की कई भारतीय और विदेशी कंपनियों के साथ साझेदारी पर भी काम कर रही है.
पर्यावरण संरक्षण पर रहेगा विशेष जोर
कंपनी के मुताबिक, सभी एयरपोर्ट सिटी परियोजनाओं को यूएस ग्रीन बिल्डिंग काउंसिल से LEED गोल्ड प्री-सर्टिफिकेशन मिल चुका है. इन परियोजनाओं में ऊर्जा दक्षता, पर्यावरण संरक्षण और पैदल चलने योग्य सार्वजनिक स्थानों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा.
कई बड़ी कंपनियां होंगी साझेदार
इन परियोजनाओं में डिजाइन, निर्माण और परामर्श सेवाओं के लिए कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय कंपनियां जुड़ी हैं. इनमें कोहन पेडरसन फॉक्स, बेनॉय, ज़नेरा स्पेस, लार्सन एंड टुब्रो, टाटा प्रोजेक्ट्स, पीएसपी प्रोजेक्ट्स, सीबीआरई, जेएलएल और कुशमैन एंड वेकफील्ड शामिल हैं. वर्तमान में अडानी एयरपोर्ट होल्डिंग्स देश की सबसे बड़ी निजी एयरपोर्ट ऑपरेटिंग कंपनी है और मुंबई, अहमदाबाद, लखनऊ, जयपुर, गुवाहाटी, मंगलुरु और तिरुवनंतपुरम एयरपोर्ट का संचालन करती है. कंपनी नवी मुंबई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का विकास भी कर रही है.
कंपनी के मनोरंजन चैनलों के मजबूत प्रदर्शन और हाल ही में लॉन्च किए गए यूनाइट8 स्पोर्ट्स चैनलों की सफलता ने इस उपलब्धि में अहम भूमिका निभाई है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज लिमिटेड (ZEE) ने वर्ष 2026 के 24वें सप्ताह में 20 प्रतिशत नेटवर्क शेयर हासिल कर नया रिकॉर्ड बनाया है. पिछले लगभग आठ वर्षों में यह कंपनी का सबसे बेहतर प्रदर्शन माना जा रहा है. मनोरंजन और खेल कंटेंट की मजबूत पेशकश तथा फीफा वर्ल्ड कप 2026 के प्रसारण ने कंपनी की दर्शक संख्या में उल्लेखनीय बढ़ोतरी की है.
20% नेटवर्क शेयर के साथ नया रिकॉर्ड
कंपनी ने 15 वर्ष से अधिक आयु वर्ग के शहरी दर्शकों के बीच 20 प्रतिशत नेटवर्क शेयर दर्ज किया है. यह उपलब्धि पिछले करीब आठ वर्षों में कंपनी के लिए सबसे ऊंचा स्तर है. कंपनी के मनोरंजन चैनलों के मजबूत प्रदर्शन और हाल ही में लॉन्च किए गए यूनाइट8 स्पोर्ट्स चैनलों की सफलता ने इस उपलब्धि में अहम भूमिका निभाई है.
फीफा वर्ल्ड कप 2026 से मिला बड़ा फायदा
फीफा वर्ल्ड कप 2026 के प्रसारण ने यूनाइट8 स्पोर्ट्स नेटवर्क को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है. कंपनी के मुताबिक, स्पोर्ट्स पोर्टफोलियो ने 6 करोड़ नए दर्शकों को जोड़ा है और यह देश का दूसरा सबसे बड़ा लीनियर स्पोर्ट्स नेटवर्क बनकर उभरा है. लाइव मैचों के अलावा क्षेत्रीय भाषाओं में कमेंट्री, विशेषज्ञों का विश्लेषण और फुटबॉल आधारित विशेष कार्यक्रमों ने दर्शकों को आकर्षित किया है.
300 मिलियन से अधिक दर्शकों तक पहुंचा स्पोर्ट्स पोर्टफोलियो
कंपनी के स्पोर्ट्स पोर्टफोलियो ने 1 जून 2026 से अब तक अपने लीनियर प्लेटफॉर्म, जी5 और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से 300 मिलियन से अधिक यूनिक दर्शकों तक पहुंच बनाई है. इस उपलब्धि के साथ कंपनी ने खुद को मनोरंजन और खेल सामग्री के प्रमुख मल्टी-प्लेटफॉर्म डेस्टिनेशन के रूप में स्थापित किया है.
यूनाइट8 स्पोर्ट्स 2 बना नंबर-1 अंग्रेजी स्पोर्ट्स चैनल
कंपनी के अनुसार, यूनाइट8 स्पोर्ट्स 2 ने भारत के सभी अंग्रेजी स्पोर्ट्स चैनलों के बीच शीर्ष स्थान हासिल किया है. भाषा आधारित कमेंट्री और विशेष कंटेंट रणनीति ने चैनल को दर्शकों के बीच लोकप्रिय बनाया है.
फीफा वर्ल्ड कप 2022 से भी बेहतर प्रदर्शन
कंपनी के लीनियर पोर्टफोलियो ने इसी अवधि के दौरान फीफा वर्ल्ड कप 2022 की तुलना में 17 प्रतिशत अधिक लाइव रीच दर्ज की है. इससे कंपनी के खेल प्रसारण कारोबार को नई मजबूती मिली है.
डिजिटल और टीवी प्लेटफॉर्म पर बढ़ी दर्शक संख्या
यूनाइट8 स्पोर्ट्स और जी5 जैसे कंपनी के डिजिटल एवं लीनियर प्लेटफॉर्म लगातार मजबूत दर्शक वृद्धि दर्ज कर रहे हैं. मल्टी-प्लेटफॉर्म रणनीति ने दर्शकों को विभिन्न स्क्रीन पर सहज अनुभव प्रदान किया है.
जी एंटरटेनमेंट के यूनाइट8 स्पोर्ट्स के मुख्य व्यवसाय अधिकारी बवेश जनावलेकर ने कहा कि फीफा वर्ल्ड कप 2026 को दर्शकों से मिली शानदार प्रतिक्रिया कंपनी के खेल कारोबार के लिए महत्वपूर्ण पड़ाव है. उन्होंने कहा कि कंपनी दर्शकों को मैचों से आगे भी जोड़े रखने के लिए नए प्रोग्रामिंग प्रयोग कर रही है और वैश्विक स्तर का प्रीमियम स्पोर्ट्स कंटेंट बड़े पैमाने पर उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध है.