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SEBI का बड़ा दांव: विदेशी निवेशकों को वापस लाने के लिए ट्रेडिंग नियमों में बदलाव की तैयारी

शॉर्ट सेलिंग आसान करने से लेकर मार्जिन घटाने तक पर विचार, 9 महीने में लागू हो सकते हैं प्रस्तावित सुधार

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 month ago

भारतीय शेयर बाजार से विदेशी निवेशकों की लगातार निकासी के बीच बाजार नियामक सेबी (SEBI) ट्रेडिंग सिस्टम में बड़े बदलाव की तैयारी कर रहा है. प्रस्तावित सुधारों का मकसद विदेशी निवेशकों के लिए भारतीय बाजार में कारोबार आसान बनाना, लागत और पूंजी की जरूरत घटाना और लंबी अवधि की निवेश रणनीतियों को बढ़ावा देना है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इन बदलावों में नकद बाजार में जमानत की जरूरत कम करना, शॉर्ट सेलिंग को आसान बनाना और लंबी अवधि के डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट को अधिक आकर्षक बनाना शामिल है.

विदेशी निवेशकों की निकासी बनी बड़ी चिंता

ये प्रस्ताव ऐसे समय सामने आए हैं, जब भारतीय शेयरों में विदेशी निवेशकों की हिस्सेदारी करीब 17 साल के निचले स्तर पर पहुंच गई है. वहीं, इस साल रुपया करीब 6 फीसदी कमजोर हुआ है. नेशनल स्टॉक एक्सचेंज के आंकड़ों के मुताबिक, अक्टूबर 2024 से जून 2026 के बीच विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाजार से 50 अरब डॉलर से अधिक की निकासी कर चुके हैं.

वैश्विक MSCI Emerging Markets Index में भारत का भार भी सितंबर 2024 के करीब 21 फीसदी के उच्च स्तर से घटकर 12 फीसदी से नीचे आ गया है. माना जा रहा है कि सेबी के प्रस्तावित सुधारों से वैश्विक सूचकांकों में भारत का वजन बढ़ाने में मदद मिल सकती है.

शॉर्ट सेलिंग को आसान बनाने की तैयारी

सेबी सिक्योरिटीज लेंडिंग एंड बॉरोइंग व्यवस्था को मजबूत करने पर भी विचार कर रहा है. इसके तहत उधार लेने और देने के लिए पात्र शेयरों की संख्या करीब दोगुनी की जा सकती है. इससे नकद बाजार में शॉर्ट सेलिंग करना विदेशी और संस्थागत निवेशकों के लिए आसान हो सकता है.

विदेशी निवेशक लंबे समय से भारत के बाजार नियमों को चीन, दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे प्रमुख एशियाई बाजारों के अनुरूप बनाने की मांग करते रहे हैं. इन बाजारों में शेयरों की लेंडिंग-बॉरोइंग और क्लोजिंग ऑक्शन जैसी व्यवस्थाएं पहले से विकसित हैं.

15-20 फीसदी तक घट सकती है शुरुआती पूंजी जरूरत

सेबी अत्यधिक लिक्विड शेयरों में कारोबार के लिए जमानत यानी मार्जिन की जरूरत घटाने पर भी विचार कर रहा है. सूत्रों के मुताबिक, इससे निवेशकों की शुरुआती पूंजी आवश्यकता 15 से 20 फीसदी तक कम हो सकती है.

इसके अलावा एक साल से अधिक अवधि वाले डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट के लिए शुरुआती जमानत घटाने का भी प्रस्ताव है. विदेशी एसेट मैनेजरों का मानना है कि मौजूदा व्यवस्था छोटी अवधि, खासकर साप्ताहिक डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट में ज्यादा कारोबार को बढ़ावा देती है. इससे लंबी अवधि की हेजिंग रणनीतियों के लिए भारतीय बाजार अपेक्षाकृत कम आकर्षक बनता है.

संस्थागत निवेशकों की भागीदारी बढ़ाने पर जोर

सेबी पिछले दो वर्षों में डेरिवेटिव बाजार में छोटे निवेशकों की सट्टेबाजी सीमित करने के लिए कई कदम उठा चुका है. अब नियामक संस्थागत और पेशेवर निवेशकों की भागीदारी बढ़ाने पर जोर दे रहा है. NSE के आंकड़ों के अनुसार, भारतीय बाजार के कारोबार में खुदरा निवेशकों की हिस्सेदारी 35 फीसदी से अधिक है. इसके मुकाबले अमेरिका में यह हिस्सेदारी करीब 20 फीसदी है, जहां संस्थागत और पेशेवर निवेशकों की भूमिका ज्यादा बड़ी है.

विश्लेषकों का मानना है कि कारोबार की लागत और प्रक्रियागत अड़चनें कम होने से भारत विदेशी संस्थागत निवेश और पैसिव इन्वेस्टमेंट के लिए ज्यादा आकर्षक बन सकता है.

9 महीने में लागू हो सकते हैं बदलाव

सूत्रों के अनुसार, सेबी उद्योग से सलाह लेने और बाजार से जुड़े संस्थानों को अपनी मौजूदा प्रणालियों में बदलाव के लिए समय देने के बाद करीब 9 महीने में इन सुधारों को लागू कर सकता है. हालांकि, कुछ बदलावों के शुरुआती चरण में बाजार में उतार-चढ़ाव बढ़ने की आशंका भी है.

हाल ही में डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट वाले शेयरों के क्लोजिंग प्राइस को तय करने के लिए शुरू की गई नई क्लोजिंग ऑक्शन व्यवस्था के शुरुआती दौर में निफ्टी में तेज उतार-चढ़ाव देखा गया था. बाजार निर्माताओं और निवेशकों की इसमें भागीदारी भी सीमित रही.

सिर्फ नियमों में बदलाव से नहीं लौटेंगे विदेशी निवेशक

विशेषज्ञों का कहना है कि बाजार को नई व्यवस्थाओं के अनुरूप ढलने में समय लगेगा. लंबी अवधि में प्रस्तावित सुधारों से कारोबार की लागत और प्रक्रियागत बाधाएं कम हो सकती हैं. हालांकि, सिर्फ ट्रेडिंग नियमों में बदलाव से विदेशी निवेशकों की बड़ी वापसी सुनिश्चित नहीं होगी. विदेशी निवेशक रुपये की चाल, भारतीय कंपनियों के वैल्यूएशन, आर्थिक वृद्धि और वैश्विक बाजार की परिस्थितियों जैसे कई अन्य कारकों को भी ध्यान में रखते हैं.
 


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