फिर महंगा होने वाला है डीजल-पेट्रोल, तेल उत्‍पादक देशों के इस कदम का होगा असर!

सऊदी अरब पहले अप्रैल में प्रति दिन 1.16 मिलियन बैरल की आश्चर्यजनक कटौती पर सहमत हुआ था, जिसमें उसका अपना हिस्सा 500,000 बैरल था. ये बढ़ोतरी जुलाई से शुरू हो सकती है.

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Monday, 05 June, 2023
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अगर पिछले कु्छ दिनों से आपने तेल के दामों में इजाफे की खबर नहीं सुनी है तो ये खबर आपको जल्‍द ही सुनने को मिल सकती है. क्‍योंकि दुनिया भर में तेल की कीमत में हो रही कमी ने तेल उत्‍पादकों देशों को चिंता में डाल दिया है. इसके कारण उन्‍होंने अब तेल के उत्‍पादन में कमी करने का निर्णय लिया है. माना जा रहा है कि ये कदम कंपनियां इसलिए उठा रही हैं जिससे तेल के दामों में बढ़ोतरी हो सके. अगर ऐसा हुआ तो इससे जहां महंगाई बढ़ने की संभावना है वहीं दूसरी ओर ब्‍याज दरों में भी इजाफा हो सकता है.  

जुलाई से शुरू होगी कटौती 
सऊदी अरब की ये कटौती जुलाई में शुरू होगी, इसके तहत सऊदी प्रति दिन दस लाख बैरल तेल उत्पादन कम करना शामिल है. ओपेक+ के बाकी सदस्य उत्पादक 2024 के अंत तक अपनी पहले की आपूर्ति कटौती को बढ़ाने पर सहमत हुए. सउदी अरब ने जिस कटौती का ऐलान किया है वो जुलाई से शुरू होगी और उसके तहत हर रोज 1 मिलियन तेल का कम उत्‍पादन करेगा. वहीं दूसरी ओर ओपेक और उसके साथ इस साल के आखिरी तक तेल के उत्‍पादन में कमी लाने को लेकर सहमत हो गए हैं. 

क्‍या बोले सऊदी के ऊर्जा मंत्री 
सऊदी अरब के ऊर्जा मंत्री अब्दुलअज़ीज़ बिन सलमान ने एक संवाददाता सम्मेलन के दौरान समझौते पर अपनी संतुष्टि व्यक्त की और इस समझौते की पारदर्शिता पर अपनी बात रखते हुए इसे निष्पक्ष बताया. तेल की कीमतों में गिरावट ने दुनिया भर के उपभोक्ताओं को लाभान्वित किया है, जिससे अमेरिकी ड्राइवरों को कम कीमत पर अपने टैंक भरने और मुद्रास्फीति से राहत देने की अनुमति मिली है. सऊदी अरब द्वारा उत्पादन में कटौती को लागू करने के कारण आने वाले दिनों में मांग में अनिश्‍चित बढ़ोतरी को दर्शा रहा है, अमेरिका और यूरोप में आर्थिक कमजोरी के साथ-साथ चीन की कोविड 19 को देखते हुए ओपेक तेल कार्टेल में एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में, सऊदी अरब ने पहले अप्रैल में प्रति दिन 1.16 मिलियन बैरल की आश्चर्यजनक कटौती पर सहमति व्यक्त की थी, जिसमें उसका अपना हिस्सा 500,000 बैरल था. इसके बाद अक्टूबर में ओपेक+द्वारा उत्पादन को दो मिलियन बैरल प्रति दिन कम करने की घोषणा की गई, जिसकी अमेरिकी राष्‍ट्रपति ने ठीक मध्‍यावधि चुनावों से पहले गैसोलीन के महंगे होने के कारण आलोचना की थी. 

इस कटौती का नहीं हुआ स्‍थाई असर 
हालांकि, इन कटौतियों का तेल की कीमतों पर स्थायी प्रभाव नहीं पड़ा. हालांकि ब्रेंट क्रूड की कीमत अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क 87 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गयी थी, लेकिन तब से यह गिर गयी है और 75 डॉलर प्रति बैरल से नीचे बनी हुई है. अमेरिकी कच्चे तेल की कीमतें भी 70 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ गई हैं. अमेरिकी ऑटोमोबाइल एसोसिएशन (एएए) के अनुसार, गर्मियों में यात्रा के मौसम की शुरुआत में कम कीमतों से अमेरिकी चालकों को लाभ हुआ है, औसत पंप की कीमतें वर्तमान में 3.55 अमेरिकी डॉलर, एक साल पहले की तुलना में 1.02 अमेरिकी डॉलर कम हैं. गिरती ऊर्जा कीमतों ने भी यूरोज़ोन में महंगाई में कमी लाने में भी बड़ी भूमिका निभाई है. 

तेल के दामों में हो सकता है इजाफा 
वहीं अब तेल के उत्‍पादन में ताजा कमी तेल की कीमतों में वृद्धि कर सकती है, इस बारे में अस्थिरता है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में जो महंगाई और बढ़ती ब्‍याज दरों के कारण धीमी वृद्धि का सामना कर रहे हैं उसके यात्रा और उद्योग जैसे दोनों क्षेत्र ईंधन की अपनी मांग को पूरी तरह से कब तक ठीक कर पाएंगे. 

तेल उत्पादन को कम करने का निर्णय अब्दुलअज़ीज़ बिन सलमान की सटोरियों को दी गई उस चुनौती के बाद सामने आया है तेल की कम कीमतों पर दांव लगा रहे थे. सऊदी सरकार को अपनी कई बड़ी परियोजनाओं के लिए पैसों की जरूरत है. वो तेल के दामों में बढोतरी के जरिए अपनी अर्थव्‍यवस्‍था को दुरूस्‍त करने की तैयारी कर रही है, जिसमें 500 अरब अमेरिकी डॉलर की अनुमानित लागत के साथ रेगिस्‍तान में बनने वाला रेगिस्तानी शहर निओम परियोजना भी शामिल है.

तेल उत्पादक देशों को अपने राज्य के बजट के लिए राजस्व की आवश्यकता होती है, लेकिन उन्हें तेल की खपत करने वाले देशों पर उच्च कीमतों के प्रभाव को भी समझने की जरूरत है. अत्यधिक तेल की कीमतें महंगाई को बढ़ाने का काम करती हैं जबकि ग्राहक की खरीद शक्ति को भी कम कर सकती हैं और इससे ब्‍याज दरों में एक बार फिर बढ़ोतरी हो सकती है. इसके कारण आम लोगों और व्यवसायों के लिए खरीद और निवेश के लिए ऋण प्राप्त करना अधिक कठिन हो जाता है जिससे विकास बाधित हो जाता है.
 


पश्चिम एशिया संकट से बढ़ा आर्थिक दबाव, फिर भी मजबूत बनी हुई है भारत की अर्थव्यवस्था: रिपोर्ट

तेल की बढ़ती कीमतें, सप्लाई चेन में रुकावट और विदेशी निवेश में उतार-चढ़ाव के बीच घरेलू मांग और मजबूत वित्तीय सिस्टम भारत को दे रहे सहारा.

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Thursday, 07 May, 2026
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पश्चिम एशिया में जारी तनाव और युद्ध का असर अब वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ-साथ भारत पर भी साफ दिखाई देने लगा है. कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों, व्यापारिक मार्गों में बाधा और विदेशी निवेश में अस्थिरता ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ाया है. हालांकि इन चुनौतियों के बावजूद भारत की आर्थिक स्थिति अपेक्षाकृत मजबूत बनी हुई है. वित्त मंत्रालय और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) का मानना है कि मजबूत घरेलू मांग, स्थिर बैंकिंग व्यवस्था और सरकार की नीतिगत तैयारियों ने अर्थव्यवस्था को बड़े झटकों से बचाए रखा है.

ऊर्जा और व्यापार पर बढ़ा दबाव

इसके बावजूद वित्त मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट कहती है कि भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत है, भले ही थोड़ी हिली हुई है. इसकी वजह है देश के अंदर मजबूत मांग, स्थिर वित्तीय सिस्टम और सरकार की नीतियां, जो झटकों को संभाल रही हैं.

पश्चिम एशिया संकट का सबसे बड़ा असर भारत के ऊर्जा आयात और व्यापार पर पड़ रहा है. भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा तेल और गैस आयात करता है और मिडिल ईस्ट इस आपूर्ति का प्रमुख केंद्र है. तनाव बढ़ने से न केवल तेल महंगा हुआ है, बल्कि शिपिंग लागत और सप्लाई चेन पर भी असर पड़ा है.

विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार बढ़ती भू-राजनीतिक अनिश्चितता से निर्यात, आयात और उत्पादन लागत प्रभावित हो सकती है. कई उद्योगों को कच्चे माल की उपलब्धता और समय पर शिपमेंट को लेकर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है.

महंगाई और ग्रोथ पर बढ़ा जोखिम

कच्चे तेल की कीमतें हाल के दिनों में 110 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गई हैं, जिससे भारत का आयात बिल बढ़ने की आशंका है. तेल महंगा होने का सीधा असर महंगाई पर पड़ता है, क्योंकि परिवहन से लेकर उत्पादन तक लगभग हर क्षेत्र में लागत बढ़ जाती है.

RBI ने भी चेतावनी दी है कि महंगे कच्चे माल और सप्लाई में बाधा आर्थिक विकास की रफ्तार को धीमा कर सकती है. हालांकि सरकार फिलहाल पेट्रोल और डीजल की कीमतों को स्थिर रखने की कोशिश कर रही है, लेकिन लंबे समय तक ऐसा करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है.

विदेशी निवेश में उतार-चढ़ाव

वैश्विक अनिश्चितता का असर विदेशी निवेश पर भी दिखाई दे रहा है. 2026 के शुरुआती महीनों में विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजारों से करीब 1.8 लाख करोड़ रुपये निकाले हैं. इससे शेयर बाजार और रुपये पर दबाव बढ़ा है.

हालांकि घरेलू निवेशकों ने इस दौरान बाजार को स्थिर बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई है. म्यूचुअल फंड और रिटेल निवेशकों की लगातार भागीदारी ने बाजार में भरोसा बनाए रखा.

क्यों मजबूत मानी जा रही है भारतीय अर्थव्यवस्था?

विशेषज्ञों के अनुसार भारत की अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत उसकी घरेलू मांग है. देश की 60 फीसदी से ज्यादा आर्थिक गतिविधियां घरेलू खपत पर आधारित हैं, जिससे बाहरी झटकों का असर सीमित रहता है.

इसके अलावा बैंकिंग सेक्टर की स्थिति मजबूत है, कंपनियों की बैलेंस शीट पहले से बेहतर हुई है और भारत का विदेशी मुद्रा भंडार करीब 697 अरब डॉलर के स्तर पर बना हुआ है. सेवाओं का निर्यात भी अर्थव्यवस्था को मजबूती दे रहा है.

संकट को अवसर में बदलने की चुनौती

अर्थशास्त्रियों का मानना है कि मौजूदा संकट भारत के लिए एक बड़ा सबक भी है. देश को ऊर्जा आयात पर निर्भरता कम करने, सप्लाई चेन को मजबूत बनाने और नवीकरणीय ऊर्जा के इस्तेमाल को तेज करने की जरूरत है.

सरकार पहले से ही ग्रीन एनर्जी, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने पर जोर दे रही है. आने वाले समय में यही कदम भारत को वैश्विक झटकों से ज्यादा सुरक्षित बना सकते हैं.

आगे कैसी रहेगी अर्थव्यवस्था की चाल?

फिलहाल भारत की अर्थव्यवस्था दबाव में जरूर है, लेकिन उसकी बुनियादी स्थिति मजबूत मानी जा रही है. घरेलू मांग, सरकारी निवेश और वित्तीय स्थिरता ने अर्थव्यवस्था को सहारा दिया है. हालांकि पश्चिम एशिया का संकट अगर लंबा खिंचता है तो महंगाई, व्यापार और विकास दर पर असर और गहरा हो सकता है. ऐसे में सरकार और केंद्रीय बैंक के अगले कदम भारतीय अर्थव्यवस्था की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे.
 

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भारत-वियतनाम रिश्तों को मिली नई उड़ान, 2030 तक 25 अरब डॉलर व्यापार का लक्ष्य तय

पीएम नरेंद्र मोदी और वियतनाम के राष्ट्रपति तो लाम की बैठक में रक्षा, डिजिटल पेमेंट, फार्मा और दुर्लभ खनिज समेत 18 अहम समझौतों पर सहमति बनी है.

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Thursday, 07 May, 2026
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भारत और वियतनाम ने अपने द्विपक्षीय संबंधों को नई ऊंचाई देने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वियतनाम के राष्ट्रपति तो लाम के बीच नई दिल्ली के हैदराबाद हाउस में हुई उच्चस्तरीय वार्ता के बाद दोनों देशों ने अपने रिश्तों को “उन्नत व्यापक रणनीतिक साझेदारी” के स्तर तक ले जाने का फैसला किया. इस दौरान 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 25 अरब डॉलर तक पहुंचाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया गया. साथ ही रक्षा, डिजिटल भुगतान, फार्मा, शिक्षा, बैंकिंग, दुर्लभ खनिज और संस्कृति समेत कई क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर सहमति बनी.

18 समझौतों पर हस्ताक्षर, डिजिटल और फार्मा सहयोग को बढ़ावा

भारत और वियतनाम के बीच कुल 18 समझौतों की घोषणा की गई. इनमें दवा नियामक संस्थाओं के बीच हुआ करार खास रहा, जिससे वियतनाम में भारतीय दवाओं की उपलब्धता बढ़ेगी. इसके अलावा दोनों देशों ने डिजिटल भुगतान प्रणाली को जोड़ने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया. भारत के यूपीआई और वियतनाम की भुगतान प्रणाली को जल्द एकीकृत करने की योजना है, जिससे दोनों देशों के बीच वित्तीय लेनदेन आसान होगा.

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारत से वियतनाम को कृषि, मत्स्य और पशु उत्पादों का निर्यात अब और आसान होगा. उन्होंने यह भी कहा कि जल्द ही वियतनाम के लोग भारतीय अंगूर और अनार का स्वाद चख सकेंगे.

रक्षा साझेदारी में तेजी, ब्रह्मोस मिसाइल पर चर्चा

बैठक के दौरान रक्षा सहयोग प्रमुख मुद्दों में शामिल रहा. दोनों देशों के बीच ब्रह्मोस मिसाइल खरीद को लेकर चर्चा हुई, जिसकी संभावित कीमत करीब 62.9 करोड़ डॉलर बताई जा रही है. इस सौदे में प्रशिक्षण और लॉजिस्टिक सहायता भी शामिल हो सकती है.

प्रधानमंत्री मोदी ने वियतनाम को सुखोई-30 लड़ाकू विमानों और किलो श्रेणी की पनडुब्बियों के रखरखाव, मरम्मत और संचालन में भारत की ओर से सहयोग की पेशकश की. भारत पहले भी वियतनाम को तेज रफ्तार नौकाओं, पनडुब्बी बैटरियों और नौसेना जहाजों के विकास के लिए 50 करोड़ डॉलर की ऋण सहायता देने की घोषणा कर चुका है.

दक्षिण चीन सागर और क्षेत्रीय सुरक्षा पर भी चर्चा

भारत और वियतनाम के बीच हुई प्रतिनिधिमंडल स्तर की वार्ता में दक्षिण चीन सागर की स्थिति और क्षेत्रीय सुरक्षा पर भी विस्तार से चर्चा हुई. दोनों नेताओं ने क्षेत्र में शांति, स्थिरता, कानून व्यवस्था और समृद्धि बनाए रखने के लिए मिलकर काम करने पर सहमति जताई.

प्रधानमंत्री मोदी ने वियतनाम को भारत की “एक्ट ईस्ट पॉलिसी” और “विजन ओशन” का अहम स्तंभ बताया. उन्होंने कहा कि दोनों देशों के रिश्ते अब केवल सांस्कृतिक और आर्थिक सहयोग तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि सुरक्षा, आपूर्ति श्रृंखला और सामरिक साझेदारी के नए आयाम भी स्थापित करेंगे.

व्यापार और निवेश को मिलेगी नई गति

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि पिछले एक दशक में भारत और वियतनाम के बीच व्यापार दोगुना होकर 16 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है. अब दोनों देशों ने इसे 2030 तक 25 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य रखा है. साथ ही भारत-आसियान व्यापार समझौते को इस साल के अंत तक उन्नत करने पर भी सहमति बनी है.

दोनों देशों ने केंद्रीय बैंकों के बीच सहयोग बढ़ाने, राज्यों और शहरों के स्तर पर साझेदारी मजबूत करने और निवेश को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया. विशेषज्ञों का मानना है कि यह साझेदारी आने वाले वर्षों में हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की रणनीतिक स्थिति को और मजबूत करेगी.
 


कल बाजार में दिखी जोरदार तेजी, आज इन बड़े शेयरों और ग्लोबल संकेतों पर रहेगी नजर

बुधवार को BSE सेंसेक्स 940.73 अंक की मजबूती के साथ 77,958.52 अंक पर बंद हुआ, जबकि NSE  निफ्टी 298.15 अंक की बढ़त के साथ 24,330.95 अंक पर पहुंच गया था.

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Thursday, 07 May, 2026
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पश्चिम एशिया में तनाव कम होने और कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट के संकेतों के बीच बुधवार को घरेलू शेयर बाजार में शानदार तेजी देखने को मिली थी. बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE)
सेंसेक्स 940.73 अंक यानी 1.22 फीसदी की मजबूती के साथ 77,958.52 अंक पर बंद हुआ, जबकि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE)  निफ्टी 298.15 अंक यानी 1.24 फीसदी की बढ़त के साथ 24,330.95 अंक पर पहुंच गया था. बैंकिंग, ऑटो और एविएशन शेयरों में जोरदार खरीदारी से निवेशकों का भरोसा मजबूत हुआ था. अब गुरुवार को बाजार की नजर वैश्विक संकेतों, अमेरिका और एशियाई बाजारों के रुख, क्रूड ऑयल की चाल और कई बड़ी कंपनियों के मार्च तिमाही नतीजों पर रहेगी. 

इन शेयरों ने दिखाई दमदार तेजी

सेंसेक्स के 30 शेयरों में से 21 शेयर बढ़त के साथ बंद हुए. सबसे ज्यादा तेजी इंडिगो के शेयर में देखने को मिली, जो 6.73 फीसदी चढ़ा. इसके अलावा ट्रेंट, एशियन पेंट्स, एसबीआई, एक्सिस बैंक, एचडीएफसी बैंक, महिंद्रा एंड महिंद्रा, बजाज फाइनेंस, मारुति और बजाज फिनसर्व के शेयरों में भी 2 फीसदी से ज्यादा की तेजी दर्ज की गई.

दूसरी ओर रिलायंस इंडस्ट्रीज के शेयर में सबसे ज्यादा 1.79 फीसदी की गिरावट रही. इसके अलावा पावरग्रिड, एनटीपीसी, लार्सन एंड टुब्रो, एचसीएल टेक और टाइटन के शेयर भी दबाव में रहे.

मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में भी खरीदारी

बाजार की तेजी केवल बड़े शेयरों तक सीमित नहीं रही. व्यापक बाजार यानी ब्रॉडर मार्केट में भी खरीदारी का माहौल देखने को मिला. निफ्टी मिडकैप इंडेक्स 1.76 फीसदी और निफ्टी स्मॉलकैप इंडेक्स 1.93 फीसदी मजबूत होकर बंद हुए. सेक्टोरल इंडेक्स की बात करें तो निफ्टी पीएसयू बैंक, निफ्टी प्राइवेट बैंक, निफ्टी बैंक और निफ्टी रियल्टी इंडेक्स में अच्छी तेजी रही. हालांकि एफएमसीजी सेक्टर अपेक्षाकृत कमजोर रहा.

कच्चे तेल में गिरावट से बाजार को मिला सहारा

बाजार में तेजी की एक बड़ी वजह कच्चे तेल की कीमतों में आई गिरावट भी रही. अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने होर्मुज स्ट्रेट में चल रहे “प्रोजेक्ट फ्रीडम” को फिलहाल रोकने की घोषणा की है. यह परियोजना जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए शुरू की गई थी. ट्रंप के मुताबिक, अमेरिका फिलहाल इस बात का आकलन कर रहा है कि ईरान के साथ किसी संभावित समझौते की गुंजाइश बन सकती है या नहीं. इस बयान के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतों में करीब 7 फीसदी की गिरावट आई और यह 102 डॉलर प्रति बैरल के आसपास ट्रेड करता दिखा. कच्चे तेल की कीमतों में नरमी से भारतीय बाजार को राहत मिली, क्योंकि इससे आयात लागत और महंगाई के दबाव में कमी आने की उम्मीद बढ़ी है.

विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया में तनाव कम होने और क्रूड ऑयल की कीमतों में गिरावट ने निवेशकों की धारणा को मजबूत किया है. बैंकिंग, ऑटो और एविएशन शेयरों में आई खरीदारी ने बाजार को ऊंचे स्तर पर बंद होने में मदद की. आने वाले दिनों में वैश्विक संकेत और कच्चे तेल की चाल बाजार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे.

आज इन शेयरों पर रखें नजर

बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, आज भारतीय शेयर बाजार की शुरुआत मजबूत संकेतों के साथ होने की उम्मीद है और निवेशकों की नजर कई बड़े शेयरों पर रहेगी. GIFT निफ्टी में बढ़त और वैश्विक बाजारों से मिले सकारात्मक संकेतों के बीच Paytm की पैरेंट कंपनी One97 Communications, Bajaj Auto, Meesho, Aditya Birla Real Estate, South Indian Bank, Indian Bank, Mahindra Lifespaces, Larsen & Toubro (L&T), Deepak Fertilizers और Newgen Software Technologies जैसे शेयर फोकस में रह सकते हैं. Paytm ने मार्च तिमाही में घाटे से निकलकर 184 करोड़ रुपये का मुनाफा दर्ज किया है, जबकि Bajaj Auto का शुद्ध लाभ दोगुने से ज्यादा बढ़ा है. Meesho का घाटा घटा है और Aditya Birla Real Estate भी नुकसान से मुनाफे में आई है. South Indian Bank के मजबूत नतीजे और Indian Bank की पूंजी जुटाने की योजना भी निवेशकों का ध्यान खींच सकती है. वहीं Mahindra Lifespaces ने मुंबई में बड़ा प्रीमियम प्रोजेक्ट लॉन्च किया है और L&T को JSW Steel से 10,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का बड़ा ऑर्डर मिला है. Deepak Fertilizers ने अधिग्रहण के जरिए अपने कारोबार का विस्तार किया है, जबकि Newgen Software को अंतरराष्ट्रीय ऑर्डर मिला है. इसके अलावा आज BSE, MRF, Britannia, Biocon, Lupin, Dabur, Bharat Forge, Pidilite और अन्य कई कंपनियां मार्च तिमाही के नतीजे जारी करेंगी, जिससे बाजार में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है.

(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)


उद्योग जगत के दिग्गजों ने लॉन्च की Daksham Capital, प्रीमियम फैमिली ऑफिस और वित्तीय सेवा फर्म

भारत में 2035 तक सर्विसेबल वेल्थ पूल के लगभग 9 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचने की संभावना के बीच, दक्षम् कैपिटल का उद्देश्य बिखरी हुई सलाहकारी सेवाओं को एकीकृत और रिसर्च-आधारित प्लेटफॉर्म के माध्यम से सुव्यवस्थित करना है.

Last Modified:
Wednesday, 06 May, 2026
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वित्तीय सेवा क्षेत्र के चार अनुभवी दिग्गजों ने अपनी साझा सोच और विशेषज्ञता के बल पर “दक्षम् कैपिटल” (Daksham Capital) की शुरुआत की है. यह एक मल्टी-फैमिली ऑफिस, प्रीमियम प्राइवेट बैंकिंग और वेल्थ मैनेजमेंट फर्म है, जो उच्च-नेट-वर्थ (HNI) और अल्ट्रा-हाई-नेट-वर्थ (UHNI) व्यक्तियों, पारिवारिक व्यवसायों, CXO स्तर के पेशेवरों और वैश्विक भारतीय निवेशकों को सेवाएं प्रदान करेगी.

दिल्ली-एनसीआर से संचालन, अनुभवी नेतृत्व टीम

दिल्ली-एनसीआर में मुख्यालय वाली इस कंपनी का नेतृत्व साकेत लखोटिया (ग्रुप CEO), आस्था मागो (COO), अचिन भारद्वाज (जॉइंट CIO) और पंकज केडिया (जॉइंट CIO) कर रहे हैं. इन सभी के पास प्राइवेट बैंकिंग, फंड मैनेजमेंट, इन्वेस्टमेंट बैंकिंग, कॉर्पोरेट एडवाइजरी और संस्थागत वित्त जैसे क्षेत्रों में व्यापक अनुभव है. यह नेतृत्व टीम रणनीतिक प्रबंधन, बाजार की समझ और संस्थागत अनुभव का संतुलित मिश्रण प्रस्तुत करती है.

भारत के वेल्थ सेक्टर में बड़ा अवसर

भारत में 2035 तक सर्विसेबल वेल्थ पूल के लगभग 9 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचने की संभावना के बीच, दक्षम् कैपिटल का उद्देश्य बिखरी हुई सलाहकारी सेवाओं को एकीकृत और रिसर्च-आधारित प्लेटफॉर्म के माध्यम से सुव्यवस्थित करना है.

निवेश दर्शन और कंपनी का दृष्टिकोण

ग्रुप सीईओ साकेत लखोटिया ने कहा, “भारत का वेल्थ मैनेजमेंट क्षेत्र एक महत्वपूर्ण मोड़ पर है. आज के निवेशक पहले से अधिक जागरूक और विवेकशील हैं, वे केवल संबंध-आधारित सलाह नहीं, बल्कि संस्थागत स्तर की मजबूती चाहते हैं. हमारा निवेश ढांचा इसी अपेक्षा पर आधारित है, जो स्वामित्व शोध और अनुशासित प्रक्रियाओं के माध्यम से दीर्घकालिक परिणाम सुनिश्चित करता है.”

रिसर्च-फर्स्ट और प्रोसेस-ड्रिवन प्लेटफॉर्म

दक्षम् कैपिटल का मूल आधार रिसर्च-प्रथम और प्रक्रिया-आधारित दृष्टिकोण है. कंपनी का प्लेटफॉर्म संस्थागत स्तर के शोध, स्वामित्व आवंटन मॉडल, अनुशासित उत्पाद चयन और निरंतर पोर्टफोलियो मॉनिटरिंग को एक साथ जोड़ता है, ताकि निवेशक जटिल वित्तीय माहौल में सही निर्णय ले सकें.

जोखिम प्रबंधन और रिटर्न ऑप्टिमाइजेशन के लिए कंपनी एक व्यवस्थित प्रक्रिया अपनाती है, जिसमें हर निवेश निर्णय को उपयुक्तता, विविधीकरण, लिक्विडिटी, जोखिम और दीर्घकालिक संपत्ति निर्माण के नजरिए से परखा जाता है.

“दक्षम् कम्पास” पर आधारित मूल्य प्रणाली

कंपनी के मार्गदर्शक सिद्धांत “दक्षम् कम्पास” पर आधारित हैं, विजडम (ज्ञान), स्टेबिलिटी (स्थिरता), एथिक्स (नैतिकता) और निच (विशेषज्ञता). ये सिद्धांत अनुभव-आधारित अंतर्दृष्टि, अनुशासित प्रक्रियाओं, व्यक्तिगत समाधान और अटूट ईमानदारी के प्रति कंपनी की प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं.

तकनीक और मानव विशेषज्ञता का संयोजन

दक्षम् कैपिटल मानव समझ और एल्गोरिदमिक सटीकता का संयोजन करते हुए डेटा इंटेलिजेंस, एनालिटिक्स और AI-आधारित सलाह का उपयोग करता है, जिससे निवेशकों को स्पष्टता, लचीलापन और बेहतर नियंत्रण मिलता है.

मजबूत ट्रैक रिकॉर्ड और भविष्य की योजना

600 से अधिक ग्राहकों को सलाह देने और 1 बिलियन डॉलर से अधिक की परिसंपत्तियों के प्रबंधन का पूर्व अनुभव रखने वाली यह फर्म तेजी से बढ़ते इस उद्योग में एक नया दृष्टिकोण लेकर आई है. कंपनी का लक्ष्य अनुशासित, पारदर्शी और दीर्घकालिक वेल्थ रणनीतियां प्रदान करना है.

 


भारत का विदेशी निवेश उछला, FY26 में 26.7 अरब डॉलर के पार

विशेषज्ञों का मानना है कि ODI में यह तेजी भारतीय कंपनियों के बढ़ते आत्मविश्वास को दर्शाती है. कंपनियां नए बाजारों और क्षेत्रों में अवसर तलाशते हुए वैश्विक स्तर पर अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज करा रही हैं.

Last Modified:
Wednesday, 06 May, 2026
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भारत की विदेशी निवेश गतिविधियों में वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान जोरदार तेजी देखने को मिली है. वित्त मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के अनुसार, ओवरसीज डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (ODI) आउटफ्लो बढ़कर 26.7 अरब डॉलर से अधिक हो गया, जो वित्त वर्ष 2023-24 की तुलना में करीब 84 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है.

लगातार बढ़ रहा वैश्विक विस्तार

आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि भारतीय कंपनियों का वैश्विक विस्तार लगातार बढ़ रहा है. FY25 में ODI आउटफ्लो 24.2 अरब डॉलर रहा, जबकि FY24 में यह लगभग 14.5 अरब डॉलर था. यह रुझान बताता है कि भारत की कंपनियां अंतरराष्ट्रीय बाजारों में तेजी से अपनी मौजूदगी बढ़ा रही हैं.

इक्विटी निवेश का दबदबा

FY26 में कुल निवेश का बड़ा हिस्सा इक्विटी निवेश के रूप में रहा, जो 18.6 अरब डॉलर से अधिक था. वहीं, 8 अरब डॉलर से ज्यादा निवेश लोन के रूप में किया गया. इससे साफ है कि कंपनियां रणनीतिक हिस्सेदारी के साथ-साथ वित्तीय सहयोग का भी सहारा ले रही हैं.

सिंगापुर बना सबसे बड़ा गंतव्य

भौगोलिक रूप से सिंगापुर भारतीय निवेश के लिए सबसे बड़ा गंतव्य बना रहा, जहां FY26 में 7.6 अरब डॉलर से अधिक का निवेश गया. इसके बाद अमेरिका का स्थान रहा, जहां 4 अरब डॉलर से ज्यादा निवेश हुआ, जबकि मॉरीशस को 2.4 अरब डॉलर से अधिक का निवेश प्राप्त हुआ.

सेवाएं सेक्टर सबसे आगे

क्षेत्रवार आंकड़ों में वित्तीय, बीमा और व्यवसायिक सेवाएं सबसे आगे रहीं. इस सेक्टर में 11 अरब डॉलर से अधिक निवेश हुआ, जो कुल आउटफ्लो का करीब 45 प्रतिशत है. इसके बाद मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में 4.6 अरब डॉलर से अधिक और थोक-खुदरा व्यापार, रेस्तरां और होटल सेक्टर में करीब 3 अरब डॉलर का निवेश हुआ.

मासिक रुझानों में उतार-चढ़ाव

मासिक आंकड़ों में कुछ अस्थिरता भी देखी गई. सितंबर में सबसे ज्यादा 4 अरब डॉलर से अधिक का निवेश हुआ, जबकि नवंबर में यह घटकर करीब 0.8 अरब डॉलर रह गया.

ODI क्या है और क्यों अहम

ODI का मतलब है भारतीय कंपनियों द्वारा विदेशों में संयुक्त उपक्रम या पूरी तरह स्वामित्व वाली सहायक कंपनियों में किया गया निवेश. इससे कंपनियों को वैश्विक स्तर पर विस्तार करने और अंतरराष्ट्रीय वैल्यू चेन से जुड़ने में मदद मिलती है. सरकार की उदारीकृत नीति के तहत कंपनियां अपनी नेटवर्थ के चार गुना तक विदेश में निवेश कर सकती हैं. इसके अलावा, लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम के तहत व्यक्तिगत निवेश की भी अनुमति है.

नीतिगत सुधार और आगे की राह

अधिकारियों के अनुसार, सरकार का उद्देश्य विदेशी निवेश से जुड़े नियमों को सरल बनाना और उन्हें वैश्विक कारोबारी जरूरतों के अनुरूप बनाना है. भारतीय कंपनियां अब तेजी से अंतरराष्ट्रीय बाजारों में विस्तार और विविधीकरण की ओर बढ़ रही हैं.

विशेषज्ञों का मानना है कि ODI में यह तेजी भारतीय कंपनियों के बढ़ते आत्मविश्वास को दर्शाती है. कंपनियां नए बाजारों और क्षेत्रों में अवसर तलाशते हुए वैश्विक स्तर पर अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज करा रही हैं.
 


सर्विस सेक्टर में तेजी, अप्रैल में PMI 58.8 पर पहुंचा

अप्रैल में सर्विस सेक्टर की गतिविधियों में उछाल का सबसे बड़ा कारण मजबूत घरेलू मांग रही. कंपनियों को नए ऑर्डर्स में तेजी देखने को मिली, जिससे कुल बिजनेस गतिविधियों में सुधार हुआ.

Last Modified:
Wednesday, 06 May, 2026
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भारत के सर्विस सेक्टर ने वित्त वर्ष 2026-27 की शुरुआत दमदार प्रदर्शन के साथ की है. अप्रैल में सर्विसेज PMI बढ़कर 58.8 पर पहुंच गया, जो पिछले पांच महीनों का उच्चतम स्तर है. मजबूत घरेलू मांग, ई-कॉमर्स गतिविधियों में तेजी और नए ऑर्डर्स में सुधार ने इस वृद्धि को गति दी, जबकि वैश्विक चुनौतियों के बावजूद सेक्टर में सकारात्मक रुझान कायम रहा.

घरेलू मांग बनी ग्रोथ की मुख्य ताकत

अप्रैल में सर्विस सेक्टर की गतिविधियों में उछाल का सबसे बड़ा कारण मजबूत घरेलू मांग रही. कंपनियों को नए ऑर्डर्स में तेजी देखने को मिली, जिससे कुल बिजनेस गतिविधियों में सुधार हुआ. ई-कॉमर्स और ट्रांसपोर्ट से जुड़ी सेवाओं में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई. हालांकि, पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण निर्यात मांग कमजोर रही, लेकिन घरेलू बाजार ने इस कमी की भरपाई कर दी.

निर्यात में नरमी, वैश्विक परिस्थितियों का असर

अंतरराष्ट्रीय बाजारों से मिलने वाले नए ऑर्डर्स में गिरावट दर्ज की गई. न्यू एक्सपोर्ट बिजनेस इंडेक्स एक साल से अधिक समय के दूसरे सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया. कंपनियों ने इसके पीछे पश्चिम एशिया संघर्ष और कमजोर इनबाउंड टूरिज्म को प्रमुख कारण बताया. इससे संकेत मिलता है कि फिलहाल सर्विस सेक्टर की निर्भरता घरेलू मांग पर अधिक बढ़ गई है.

लागत दबाव बरकरार, लेकिन राहत के संकेत

सर्विस सेक्टर की कंपनियों को अप्रैल में बढ़ती लागत का सामना करना पड़ा. खाद्य पदार्थों, गैस, श्रम और अन्य इनपुट की कीमतों में वृद्धि से ऑपरेटिंग खर्च बढ़ा. हालांकि, मार्च के मुकाबले इनपुट लागत महंगाई में थोड़ी कमी आई, लेकिन यह अब भी ऊंचे स्तर पर बनी हुई है.

दिलचस्प बात यह रही कि कंपनियों ने बढ़ी हुई लागत का पूरा बोझ ग्राहकों पर नहीं डाला. आउटपुट कीमतों में वृद्धि तीन महीनों की सबसे धीमी रही, जिससे संकेत मिलता है कि कंपनियां प्रतिस्पर्धा बनाए रखने के लिए लागत का कुछ हिस्सा खुद वहन कर रही हैं.

रोजगार में सुधार, हायरिंग में तेजी

नए कारोबार में मजबूती का असर रोजगार पर भी देखने को मिला. कंपनियों ने बढ़ते काम के दबाव को संभालने के लिए शॉर्ट-टर्म और जूनियर लेवल कर्मचारियों की भर्ती बढ़ाई. सर्विस सेक्टर के सभी प्रमुख क्षेत्रों में रोजगार बढ़ा, जिससे लंबित कार्यों का दबाव कुछ हद तक कम हुआ.

कारोबारी भरोसा थोड़ा कमजोर, लेकिन रुख सकारात्मक

हालांकि कंपनियां भविष्य को लेकर आशावादी बनी हुई हैं, लेकिन मार्च के मुकाबले कारोबारी भरोसे में हल्की गिरावट आई है. पश्चिम एशिया का भू-राजनीतिक तनाव और लगातार ऊंची लागत को कंपनियां आगे के लिए प्रमुख जोखिम मान रही हैं.

कंपोजिट PMI में भी मजबूती के संकेत

सिर्फ सर्विस सेक्टर ही नहीं, बल्कि समग्र अर्थव्यवस्था में भी सुधार दिखा. कंपोजिट PMI मार्च के 57.0 से बढ़कर अप्रैल में 58.2 पर पहुंच गया. यह मैन्युफैक्चरिंग और सर्विसेज दोनों क्षेत्रों में मजबूती का संकेत देता है, जिससे निजी क्षेत्र के उत्पादन में तेज वृद्धि दर्ज हुई.

अप्रैल के आंकड़े साफ संकेत देते हैं कि भारत का सर्विस सेक्टर मजबूत घरेलू मांग के सहारे तेजी से आगे बढ़ रहा है. हालांकि वैश्विक अनिश्चितताएं और लागत दबाव चुनौतियां बने हुए हैं, फिर भी सेक्टर की बुनियाद मजबूत नजर आ रही है और आने वाले महीनों में स्थिर वृद्धि की उम्मीद बनी हुई है.


अडानी के अमेरिकी नियामकों के साथ शांत समझौता करने की संभावना

उच्च दांव वाला DOJ–SEC मामला “नो-एडमिशन” समझौते की ओर बढ़ रहा है, जो वाशिंगटन और भारत के सबसे शक्तिशाली व्यापारिक साम्राज्यों में से एक के बीच एक संतुलित रीसेट का संकेत देता है.

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Wednesday, 06 May, 2026
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पलक शाह

अमेरिकी न्याय विभाग (U.S. Department of Justice) से कुछ ही ब्लॉकों की दूरी पर स्थित शांत गलियारों में और यू.एस. सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन (SEC) के प्रवर्तन क्षेत्रों में एक दृष्टिकोण धीरे-धीरे मजबूत हो रहा है: गौतम अडानी से जुड़ा लंबे समय से चल रहा अमेरिकी कानूनी दबाव शायद अदालत में लड़ाई के रूप में समाप्त न हो, बल्कि एक ऐसे बातचीत से तय समझौते के रूप में समाप्त हो, जिसे अत्यंत सटीकता के साथ तैयार किया गया हो, ऐसा समझौता जो औपचारिक दोष स्वीकार किए बिना मामले को बंद करने की अनुमति दे. वरिष्ठ कानूनी और नीतिगत सूत्रों के अनुसार, समझौता लगभग तय है और संभवतः इसी महीने घोषित किया जा सकता है.

सूत्रों ने बताया कि हाल के हफ्तों में संभावित समाधान ढांचे पर चर्चाएँ तेज हुई हैं, जबकि मामला औपचारिक रूप से न्यूयॉर्क के ईस्टर्न डिस्ट्रिक्ट में अपनी प्रक्रियात्मक गति से आगे बढ़ रहा है. अमेरिकी प्रवर्तन प्रथा से परिचित कई लोगों के अनुसार, जिस संरचना पर विचार किया जा रहा है वह अमेरिकी नियामक उपकरणों में असामान्य नहीं है: एक नागरिक समझौता जिसमें आरोपों को “स्वीकार या अस्वीकार किए बिना” निपटाया जाता है, एक ऐसा सूत्र जिसने पिछले दो दशकों में कई जटिल सीमा-पार प्रवर्तन मामलों को हल किया है.

वह मामला जिसने अडानी को वाशिंगटन की निगाह में ला दिया

इस मामले के केंद्र में एक दोहरी अमेरिकी कार्रवाई है सिविल और आपराधिक, जिसने अमेरिकी नियामकों के अधिकार क्षेत्र को भारतीय कॉर्पोरेट क्षेत्र तक काफी बढ़ा दिया.

SEC की सिविल शिकायत में आरोप है कि अडानी और उनके सहयोगियों ने ऊर्जा अनुबंधों से जुड़े कथित तौर पर सैकड़ों मिलियन डॉलर के अनुचित भुगतान की योजना बनाई, जबकि साथ ही अमेरिकी निवेशकों से ऐसी जानकारी के आधार पर पूंजी जुटाई जो नियामकों के अनुसार भ्रामक थी.

इसके समानांतर, अमेरिकी अभियोजकों ने 2024 में एक आपराधिक अभियोग (indictment) जारी किया, जिसमें वरिष्ठ अधिकारियों पर साजिश, प्रतिभूति धोखाधड़ी और अमेरिकी वित्तीय बाजारों से जुड़े भ्रष्टाचार-रोधी कानूनों के उल्लंघन के आरोप लगाए गए.

दोनों कार्रवाइयों के पीछे वाशिंगटन की परिचित कानूनी धारणा है: यदि अमेरिकी निवेशक, डॉलर लेनदेन या अमेरिकी वित्तीय प्रणाली शामिल है, तो अधिकार क्षेत्र लागू होता है, भले ही मूल गतिविधि संयुक्त राज्य के बाहर हुई हो.

इस बाह्य-क्षेत्रीय अधिकार को चुनौती दी गई है. अडानी की कानूनी टीम ने अदालत में दलील दी है कि कथित आचरण मूल रूप से “बाह्य-क्षेत्रीय” है और अमेरिकी अदालतों के पास अधिकार क्षेत्र नहीं है, यह बचाव अभी भी मामले को खारिज करने के लिए दायर याचिका का हिस्सा है.

फिर भी, जैसे-जैसे यह कानूनी चुनौती आगे बढ़ रही है, दोनों पक्षों ने चुपचाप प्रक्रियात्मक समयसीमा पर सहमति जैसा रुख अपनाया है, जो एक वाशिंगटन स्थित प्रतिभूति वकील के अनुसार “सिर्फ मुकदमा नहीं, बल्कि बातचीत की जगह” का संकेत है.

समझौता क्यों और अभी क्यों

अमेरिकी प्रवर्तन संस्कृति में, विशेषकर जटिल सीमा-पार मामलों में, मुकदमे अक्सर अपवाद होते हैं, नियम नहीं.

पूर्व प्रवर्तन अधिकारियों और व्हाइट-कॉलर रक्षा वकीलों के अनुसार, तीन कारक ऐसे हैं जो अडानी मामले में समझौते की संभावना बढ़ाते हैं.

पहला, साक्ष्य की जटिलता, कथित आचरण का अधिकांश हिस्सा अमेरिकी क्षेत्र से बाहर हुआ है, जिसमें विदेशी अधिकारी, ऑफशोर संरचनाएँ और बहुराष्ट्रीय वित्तपोषण शामिल हैं. अमेरिकी आपराधिक मानकों को पूरा करने वाला ट्रायल केस बनाना संसाधन-गहन और अनिश्चित है.

दूसरा, अधिकार क्षेत्र का तनाव, SEC को भारत में समन भेजने में पहले ही प्रक्रियात्मक बाधाओं का सामना करना पड़ा है, और अदालत से पारंपरिक माध्यमों को दरकिनार करने की अनुमति भी माँगनी पड़ी है. यह तनाव मामले की कूटनीतिक और कानूनी संवेदनशीलता को दर्शाता है.

तीसरा, बाजार स्थिरता, अमेरिकी प्रवर्तन कार्रवाई के मात्र सामने आने से अडानी समूह के बाजार मूल्य में समय-समय पर अरबों डॉलर की गिरावट आई, जो लंबे अनिश्चितता के प्रभाव को दर्शाता है.

नियामकों के लिए, एक संतुलित समझौता प्रवर्तन उद्देश्यों दंड, अनुपालन प्रतिबद्धताओं और मिसाल  को प्राप्त कर सकता है, बिना लंबे सीमा-पार मुकदमे के जोखिम के.

“नो एडमिट, नो डिनाई” सिद्धांत

उभरती हुई इस कहानी के केंद्र में एक विशिष्ट अमेरिकी कानूनी उपकरण है.

SEC लंबे समय से ऐसे समझौतों पर निर्भर रहा है जिनमें प्रतिवादी न तो दोष स्वीकार करते हैं और न ही इनकार करते हैं, लेकिन वित्तीय दंड और अनुपालन उपायों पर सहमत होते हैं. यह दृष्टिकोण नियामकों को ट्रायल की अनिश्चितता के बिना लागू करने योग्य परिणाम देता है, जबकि प्रतिवादी औपचारिक स्वीकारोक्ति से बचते हैं जो अन्य क्षेत्रों में अतिरिक्त देनदारियों को जन्म दे सकती है.

वाशिंगटन के कानूनी विशेषज्ञ इसे “स्वीकारोक्ति के बिना समाधान” कहते हैं.

ऐसे समझौतों में आम तौर पर शामिल होते हैं: मौद्रिक दंड या वसूली, भविष्य के उल्लंघनों पर रोक और शासन या अनुपालन संबंधी प्रतिबद्धताएँ, और कुछ मामलों में अधिकारी या निदेशक के रूप में सेवा करने पर प्रतिबंध. महत्वपूर्ण बात यह है कि स्वीकारोक्ति का अभाव परिणाम के अभाव का संकेत नहीं है. आदेश स्वयं कानूनी रूप से बाध्यकारी होता है और उल्लंघन पर लागू किया जा सकता है.

समानांतर रूप से, आपराधिक पक्ष पर, DOJ ने कॉर्पोरेट मामलों में डिफर्ड प्रॉसिक्यूशन एग्रीमेंट (DPA) या नॉन-प्रॉसिक्यूशन एग्रीमेंट (NPA) का अधिक उपयोग किया है, ऐसे तंत्र जो अनुपालन, जुर्माना और निगरानी के बदले आरोपों को स्थगित या समाप्त कर सकते हैं.

सूत्रों के अनुसार, अडानी मामले में किसी भी व्यापक समाधान में SEC के साथ नागरिक समझौता और DOJ के साथ एक संरचित समाधान का संयोजन शामिल हो सकता है — हालांकि सटीक रूप अभी भी बदल रहा है.

अडानी के लिए रणनीतिक गणना

अडानी के लिए यह विकल्प केवल कानूनी नहीं, बल्कि वैश्विक है. अमेरिका में लंबा मुकदमा समूह को अनिश्चितता के घेरे में रखेगा, जबकि वह अंतरराष्ट्रीय पूंजी जुटा रहा है और बुनियादी ढांचे में विस्तार कर रहा है. एक समझौता, भले ही वित्तीय दंड के साथ हो, अंतिमता प्रदान करता है.

समान रूप से महत्वपूर्ण यह है कि दोष स्वीकार करने से बचना. ऐसा स्वीकारोक्ति भारत और अन्य न्याय क्षेत्रों में अतिरिक्त प्रभाव पैदा कर सकती है, जिससे नियामकीय या शेयरधारक कार्रवाई शुरू हो सकती है.

एक वाशिंगटन स्थित रक्षा वकील ने स्पष्ट कहा: “ऐसे मामलों में, पैसे से ज्यादा भाषा मायने रखती है.”

आगे क्या होगा

औपचारिक रूप से मामला अभी भी अदालत में सक्रिय है. खारिज करने की याचिकाएँ लंबित हैं और प्रक्रियात्मक समयसीमाएँ जारी हैं. लेकिन इसके पीछे वाशिंगटन में बातचीत यह संकेत देती है कि दोनों पक्ष अंतिम परिणाम को समझते हैं. एक सावधानीपूर्वक शब्दबद्ध, कानूनी रूप से मजबूत और कूटनीतिक रूप से संतुलित समझौता अमेरिकी नियामकों को अधिकार क्षेत्र और मानक लागू करने की अनुमति देगा, जबकि अडानी को अपने सबसे महत्वपूर्ण कानूनी चुनौतियों में से एक को बंद करने का रास्ता देगा.

यह परिणाम कब और किन शर्तों पर होगा, यह इस पर निर्भर करेगा कि दोनों पक्ष कितनी दूर तक जाने को तैयार हैं. लेकिन वाशिंगटन के प्रवर्तन हलकों में एक बात तेजी से स्पष्ट हो रही है: यह मामला शायद अदालत में जीता या हारा नहीं जाएगा, बल्कि बंद दरवाजों के पीछे, पंक्ति-दर-पंक्ति तय किया जाएगा.

राजनीतिक प्रभाव, संयुक्त राज्य

वाशिंगटन में, बिना दोष स्वीकार किए हुआ समझौता ट्रंप प्रशासन की कमजोरी नहीं, बल्कि संतुलित तरीके से इस्तेमाल की गई नियामक शक्ति का उदाहरण माना जाएगा. DOJ और SEC के लिए यह साफ संदेश है कि अमेरिकी बाजार और डॉलर प्रणाली पर उनका कानूनी अधिकार बना रहता है, चाहे मामला कहीं भी हुआ हो. साथ ही, अदालत की लंबी लड़ाई से बचकर यह कदम भारत के साथ रिश्तों में अनावश्यक तनाव पैदा होने से भी रोकता है, खासकर तब जब अमेरिका व्यापार, तकनीक और आपूर्ति श्रृंखलाओं में भारत को अहम साझेदार मान रहा है. नीति विशेषज्ञ इसे “गोल्डीलॉक्स जोन” कहते हैं, यानी ऐसा संतुलन जहाँ कार्रवाई भी हो और टकराव भी न बढ़े. 

राजनीतिक प्रभाव, भारत

भारत में इसका प्रभाव अधिक जटिल होगा. एक समझौता विशेषकर बिना स्वीकारोक्ति के सरकार और अडानी समूह को इसे दोष के बजाय समाधान के रूप में प्रस्तुत करने की जगह देता है. इससे नई दिल्ली यह तर्क दे सकती है कि भारतीय कॉर्पोरेट दिग्गज वैश्विक जांच का सामना कर सकते हैं, बिना अमेरिकी अदालत में स्पष्ट हार के. साथ ही, विपक्षी आवाजें इसे शासन मानकों और नियामकीय निगरानी पर सवाल उठाने के लिए उपयोग कर सकती हैं. लेकिन राजनीतिक शोर के नीचे एक शांत संकेत है: वैश्विक स्तर पर काम करने वाले भारतीय समूह अब पूरी तरह पश्चिमी वित्तीय प्रणालियों की अधिकार-सीमा और अनुपालन अपेक्षाओं के भीतर हैं.

एक नया मोड़

कुल मिलाकर, यह समाधान एक महत्वपूर्ण मोड़ हो सकता है. लंबे कानूनी टकराव के बजाय, एक संरचित समझौता अमेरिका–भारत आर्थिक संबंधों में अधिक व्यावहारिक चरण का रास्ता खोलता है, जहाँ प्रवर्तन कार्रवाइयाँ और पूंजी प्रवाह तथा रणनीतिक सहयोग साथ-साथ चलते हैं. इस तरह यह विवाद पर एक रेखा खींच देता है और खेल के नियमों को स्पष्ट करता है. वाशिंगटन और नई दिल्ली दोनों के लिए, यह स्पष्टता अंततः मामले से अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है.

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
 


गुजरात में दो नए सेमीकंडक्टर प्रोजेक्ट्स को मंजूरी, 3,936 करोड़ रुपये के निवेश की उम्मीद

सरकार का उद्देश्य आयात पर निर्भरता कम करना और भारत को वैश्विक सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन का मजबूत हिस्सा बनाना है. इन नई परियोजनाओं को इसी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है.

Last Modified:
Wednesday, 06 May, 2026
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भारत सरकार ने देश में सेमीकंडक्टर निर्माण को बढ़ावा देने की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए गुजरात में दो नए चिप प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दे दी है. इस फैसले के साथ भारत में घरेलू चिप निर्माण क्षमता विकसित करने की योजना को और गति मिलेगी.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में भारत सेमीकंडक्टर मिशन के तहत दो नई परियोजनाओं को हरी झंडी दी गई. इनमें एक मिनी/माइक्रो-LED डिस्प्ले मैन्युफैक्चरिंग यूनिट और दूसरी सेमीकंडक्टर पैकेजिंग यूनिट शामिल है. दोनों प्रोजेक्ट्स गुजरात में स्थापित किए जाएंगे.

3,936 करोड़ रुपये का संयुक्त निवेश

इन दोनों परियोजनाओं में कुल मिलाकर लगभग 3,936 करोड़ रुपये का निवेश प्रस्तावित है. सरकार के अनुसार, इन प्रोजेक्ट्स से 2,200 से अधिक कुशल रोजगार अवसर पैदा होने की उम्मीद है.

धोलेरा में बड़ा सेमीकंडक्टर प्लांट

क्रिस्टल मैट्रिक्स (Crystal Matrix) द्वारा गुजरात के धोलेरा में एक इंटीग्रेटेड कंपाउंड सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन और पैकेजिंग यूनिट स्थापित की जाएगी. यह यूनिट मिनी/माइक्रो-LED डिस्प्ले पैनल बनाएगी और गैलियम नाइट्राइड (GaN) फाउंड्री सेवाएं भी प्रदान करेगी.

इस प्लांट की वार्षिक क्षमता 72,000 वर्ग मीटर डिस्प्ले पैनल और 24,000 सेट RGB GaN वेफर्स होगी. इसके उत्पाद टीवी, स्मार्टफोन, स्मार्टवॉच, इन-कार डिस्प्ले और एक्सटेंडेड रियलिटी डिवाइसेज जैसे क्षेत्रों में उपयोग किए जाएंगे.

सूरत में OSAT यूनिट का निर्माण

सुची सेमीकॉन (Suchi Semicon) द्वारा सूरत में एक आउटसोर्स्ड सेमीकंडक्टर असेंबली एंड टेस्ट (OSAT) यूनिट स्थापित की जाएगी. यह यूनिट डिस्क्रीट सेमीकंडक्टर चिप्स का उत्पादन करेगी. इसकी सालाना उत्पादन क्षमता 1 अरब से अधिक चिप्स की होगी, जो ऑटोमोबाइल, औद्योगिक ऑटोमेशन, पावर इलेक्ट्रॉनिक्स और कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे सेक्टर्स में इस्तेमाल होंगे.

सेमीकंडक्टर मिशन में बढ़ी रफ्तार

इन नई मंजूरियों के बाद भारत सेमीकंडक्टर मिशन के तहत कुल परियोजनाओं की संख्या बढ़कर 12 हो गई है. इन सभी परियोजनाओं में कुल अनुमानित निवेश लगभग 1.64 लाख करोड़ रुपये है.

सरकार के अनुसार, इनमें से दो परियोजनाएं पहले ही व्यावसायिक उत्पादन और शिपमेंट शुरू कर चुकी हैं, जबकि दो अन्य जल्द ही शुरू होने की उम्मीद है.

डिजाइन इकोसिस्टम भी मजबूत

सरकार ने बताया कि देश में सेमीकंडक्टर डिजाइन इकोसिस्टम तेजी से विकसित हो रहा है. अब तक 300 से अधिक शैक्षणिक संस्थान और 100 से ज्यादा स्टार्टअप्स को डिजाइन इंफ्रास्ट्रक्चर सपोर्ट दिया जा चुका है.

आत्मनिर्भर भारत की ओर कदम

सरकार का उद्देश्य आयात पर निर्भरता कम करना और भारत को वैश्विक सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन का मजबूत हिस्सा बनाना है. इन नई परियोजनाओं को इसी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है.
 

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L&T का Q4 मुनाफा 3% घटा, लेकिन रेवेन्यू और ऑर्डर बुक में मजबूत बढ़त

इस तिमाही में कंपनी का ऑपरेशनल रेवेन्यू 11% बढ़कर 82,762 करोड़ रुपये पहुंच गया. मजबूत ऑर्डर इनफ्लो और कई सेक्टर्स से मिले बड़े प्रोजेक्ट्स ने कंपनी की टॉपलाइन को सपोर्ट किया.

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Wednesday, 06 May, 2026
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इंफ्रास्ट्रक्चर से लेकर इंजीनियरिंग सेक्टर की दिग्गज कंपनी लार्सन एंड टर्बो  (L&T) ने वित्त वर्ष 2025-26 की चौथी तिमाही के नतीजे जारी किए हैं, जिसमें कंपनी के मुनाफे में हल्की गिरावट दर्ज की गई है, जबकि रेवेन्यू और ऑर्डर इनफ्लो में मजबूत वृद्धि देखने को मिली है.

Q4 में मुनाफे में हल्की गिरावट

जनवरी-मार्च तिमाही में L&T का समेकित शुद्ध लाभ 3% घटकर 5,326 करोड़ रुपये रहा. कंपनी ने बताया कि यह गिरावट मुख्य रूप से पिछले वर्ष हुए एक बार के असाधारण लाभ के कारण बने आधार प्रभावकी वजह से हुई है.

रेवेन्यू में 11% की बढ़ोतरी

इस तिमाही में कंपनी का ऑपरेशनल रेवेन्यू 11% बढ़कर 82,762 करोड़ रुपये पहुंच गया. मजबूत ऑर्डर इनफ्लो और कई सेक्टर्स से मिले बड़े प्रोजेक्ट्स ने कंपनी की टॉपलाइन को सपोर्ट किया.

वेस्ट एशिया तनाव का सीमित असर

कंपनी प्रबंधन ने कहा कि पश्चिम एशिया में चल रहे भू-राजनीतिक तनाव का इस तिमाही पर केवल सीमित प्रभाव पड़ा है. हालांकि, आगे चलकर सप्लाई चेन और इनपुट कॉस्ट पर इसका दबाव बढ़ सकता है, जिसे लेकर कंपनी सतर्क है.

रिकॉर्ड ऑर्डर इनफ्लो और मजबूत ऑर्डर बुक

L&T ने तिमाही के दौरान 89,772 करोड़ रुपये के ऑर्डर हासिल किए, जो बिल्डिंग्स, रोड्स, अर्बन ट्रांसपोर्ट, पावर ट्रांसमिशन और हाइड्रोकार्बन जैसे क्षेत्रों से आए. कंपनी का कुल ऑर्डर बुक 31 मार्च तक 7.40 लाख करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया, जिसमें 52% हिस्सा अंतरराष्ट्रीय बाजारों से आया है.

डिविडेंड की घोषणा

कंपनी के बोर्ड ने 38 रुपये प्रति शेयर के फाइनल डिविडेंड की सिफारिश की है, जो शेयरधारकों की मंजूरी के बाद लागू होगा.

पूरे वित्त वर्ष का प्रदर्शन

वित्त वर्ष 2025-26 में L&T का कंसोलिडेटेड नेट प्रॉफिट 7% बढ़कर 16,084 करोड़ रुपये रहा, जबकि कुल राजस्व 12% बढ़कर 2.85 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया. इसी अवधि में वार्षिक ऑर्डर इनफ्लो 22% बढ़कर 4.35 लाख करोड़ रुपये दर्ज किया गया.

सेगमेंट-वाइज प्रदर्शन

इंफ्रास्ट्रक्चर सेगमेंट ने मजबूत प्रदर्शन करते हुए 26% की वृद्धि दर्ज की, जबकि एनर्जी सेगमेंट में 34% की गिरावट और हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग में 24% की गिरावट देखी गई. आईटी और टेक्नोलॉजी सर्विसेज सेगमेंट में 13% की बढ़त रही, वहीं फाइनेंशियल सर्विसेज सेगमेंट में 22% की वृद्धि दर्ज की गई.

आगे की रणनीति और आउटलुक

कंपनी ने कहा कि वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक अनिश्चितताएं बनी हुई हैं, लेकिन भारत का डिजिटल और सर्विस सेक्टर ग्रोथ का प्रमुख इंजन बना रहेगा. इसमें फिनटेक, क्लाउड, AI-आधारित सेवाएं और ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स अहम भूमिका निभाएंगे.

FY27 का अनुमान

L&T ने संकेत दिया है कि वित्त वर्ष 2026-27 की पहली छमाही में पश्चिम एशिया तनाव का कुछ असर सप्लाई चेन और इनपुट कॉस्ट के जरिए देखने को मिल सकता है. हालांकि कंपनी ने पूरे साल के लिए 10-12% रेवेन्यू ग्रोथ और स्थिर मार्जिन का अनुमान जताया है.
 


AVPN की बड़ी पहल: एशिया में 55 लाख लोगों को AI स्किल्स से लैस करने का लक्ष्य

इस विस्तारित कार्यक्रम के तहत 2030 तक करीब 5.5 मिलियन शिक्षार्थियों, कामगारों और MSMEs तक पहुंचने का लक्ष्य रखा गया है. इसका उद्देश्य AI को केवल तकनीक नहीं बल्कि समावेशी विकास का साधन बनाना है.

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Wednesday, 06 May, 2026
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एशिया की सबसे बड़ी सोशल इन्वेस्टर्स नेटवर्क संस्था AVPN ने अपने AI Opportunity Fund: Asia-Pacific के विस्तार की घोषणा की है. इस नई चरण में Google.org द्वारा 10 मिलियन डॉलर (लगभग 83 करोड़ रुपये) का अतिरिक्त योगदान दिया गया है, जिसका उद्देश्य शिक्षकों, युवाओं, कामगारों और MSMEs को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) स्किल्स से सक्षम बनाना है.

AI को नई बुनियादी साक्षरता बनाने की पहल

इस कार्यक्रम का फोकस अब केवल AI स्किल्स सिखाने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसे रोजमर्रा की पढ़ाई, कामकाज और बिजनेस में लागू करने पर होगा. AVPN का मानना है कि आने वाले समय में AI कोई स्पेशलाइज्ड स्किल नहीं बल्कि एक “बेसिक लिटरेसी” बन जाएगी, जिसे हर छात्र, शिक्षक और बिजनेस को सीखना जरूरी होगा.

शिक्षा और युवाओं पर खास जोर

नई योजना के तहत स्कूलों, कॉलेजों और ट्रेनिंग संस्थानों में AI लर्निंग को मजबूत किया जाएगा. इस पहल से पूरे एशिया-प्रशांत क्षेत्र में लगभग 4.7 मिलियन लोगों को लाभ मिलने की उम्मीद है. नैना सभरवाल बत्रा ने कहा कि शिक्षक इस बदलाव की सबसे अहम कड़ी हैं, क्योंकि जब वे AI को पढ़ाई में शामिल करते हैं, तो पूरा सिस्टम धीरे-धीरे AI-रेडी बनता है. वहीं, संजय गुप्ता ने कहा कि जब शिक्षक जिम्मेदारी से AI का इस्तेमाल करते हैं, तो इसका सीधा फायदा छात्रों और पूरे शिक्षा तंत्र को मिलता है.

क्रिएटर्स और MSMEs के लिए नई स्किलिंग पहल

इस फंड के तहत क्रिएटिव इंडस्ट्री के लिए भी एक खास AI स्किलिंग प्रोग्राम शुरू किया जाएगा, जिसका पहला पायलट प्रोजेक्ट एशिया-प्रशांत क्षेत्र के किसी देश में लागू किया जाएगा. इसके अलावा छोटे और मझोले व्यवसायों (MSMEs) को AI आधारित टूल्स से दक्षता, निर्णय क्षमता और बाजार पहुंच बढ़ाने में मदद दी जाएगी. इस पहल को ASEAN क्षेत्रीय संस्थाओं के सहयोग से आगे बढ़ाया जाएगा.

वर्कफोर्स और रोजगार पर फोकस

कार्यक्रम का एक बड़ा लक्ष्य कामगारों को AI आधारित नई नौकरियों के लिए तैयार करना भी है. इसके तहत ऐसे ट्रेनिंग मॉड्यूल तैयार किए जाएंगे जो छात्रों से लेकर नौकरीपेशा लोगों तक एक निरंतर स्किल डेवलपमेंट पाइपलाइन बनाएं. इससे कामगारों को बदलते रोजगार बाजार में बेहतर अवसर मिल सकेंगे.

नीति और क्षेत्रीय सहयोग

AVPN ने ASEAN फाउंडेशन और क्षेत्रीय शिक्षा मंत्रालयों के साथ मिलकर इस पहल को नीति स्तर पर भी मजबूत करने की योजना बनाई है. इसका लक्ष्य है कि AI ट्रेनिंग को स्थानीय जरूरतों के अनुसार ढाला जाए और पूरे क्षेत्र में एक समान डिजिटल क्षमता विकसित हो.

2030 तक का लक्ष्य

इस विस्तारित कार्यक्रम के तहत 2030 तक करीब 5.5 मिलियन शिक्षार्थियों, कामगारों और MSMEs तक पहुंचने का लक्ष्य रखा गया है. इसका उद्देश्य AI को केवल तकनीक नहीं बल्कि समावेशी विकास का साधन बनाना है.

यह पहल एशिया-प्रशांत क्षेत्र में डिजिटल बदलाव की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर AI स्किल्स को बड़े पैमाने पर अपनाया गया, तो यह आने वाले वर्षों में शिक्षा, रोजगार और छोटे व्यवसायों के लिए विकास के नए अवसर खोल सकता है.