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व्यापार के बंटवारे से 2050 तक वैश्विक GDP में 6.9% की गिरावट का जोखिम: WTO

WTO की रिपोर्ट के मुताबिक, अगर बहुपक्षीय व्यापार सहयोग की जगह FTAs का नेटवर्क हावी होता है तो वैश्विक निर्यात 26.9% तक घट सकता है; भारत-EFTA समझौते में टैरिफ कटौती को FDI प्रतिबद्धताओं से जोड़ा गया है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 month ago

विश्व व्यापार संगठन (WTO) ने वैश्विक व्यापार व्यवस्था में बढ़ते विखंडन को लेकर चेतावनी दी है. WTO की ‘वर्ल्ड ट्रेड रिपोर्ट 2026’ के अनुसार, अगर बहुपक्षीय सहयोग की जगह मुक्त व्यापार समझौतों (FTAs) का नेटवर्क प्रमुख हो जाता है और WTO मौजूदा स्वरूप में काम नहीं करता, तो 2050 तक वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में 6.9% और निर्यात में 26.9% की कमी आ सकती है.

रिपोर्ट के मुताबिक, अगर दुनिया भू-राजनीतिक रूप से जुड़े व्यापारिक गुटों में बंट जाती है, तो अधिक सहयोगी स्थिति की तुलना में 2050 तक वैश्विक GDP 5.1% और निर्यात 18.6% कम रह सकता है. वहीं, बहुपक्षीय सहयोग को और मजबूत करने की स्थिति में इसी अवधि में वैश्विक GDP 2.9% और निर्यात 17.9% बढ़ सकता है.

WTO ने कहा कि उसके सदस्यों के सामने विकल्प केवल मौजूदा व्यवस्था को बनाए रखने या सुधार करने का नहीं है. संगठन के अनुसार, चुनौती यह है कि नियम-आधारित सहयोग को आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था के अनुरूप बनाया जाए, अन्यथा व्यापार व्यवस्था कम समावेशी और अधिक शक्ति-आधारित हो सकती है.

भारत-EFTA समझौते में टैरिफ और FDI का कनेक्शन

रिपोर्ट में भारत और यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ (EFTA) के सदस्य देशों के बीच हुए मुक्त व्यापार समझौते का भी विशेष रूप से उल्लेख किया गया है. यह समझौता 2026 में लागू हुआ है. WTO के अनुसार, इस समझौते में भारत की ओर से टैरिफ में कटौती को EFTA देशों से आने वाले प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) से जुड़ी प्रतिबद्धताओं के साथ जोड़ा गया है. इन निवेश लक्ष्यों को हासिल नहीं किए जाने की स्थिति में भारत के पास कुछ परिस्थितियों में एकतरफा रूप से टैरिफ दोबारा लागू करने का प्रावधान है. हालांकि, इस व्यवस्था में व्यापक परामर्श और अप्रत्याशित परिस्थितियों के कारण लक्ष्यों की दिशा में प्रगति प्रभावित होने पर बदलाव की गुंजाइश भी रखी गई है. WTO के मुताबिक, किसी भी सुधारात्मक टैरिफ उपाय को अस्थायी और अनुपातिक होना जरूरी है.

वैश्विक व्यापार का बड़ा हिस्सा अब भी WTO नियमों के तहत

WTO ने कहा कि प्राथमिकता वाले व्यापार समझौतों की संख्या बढ़ने के बावजूद संगठन के नियम अभी भी वैश्विक व्यापार के बड़े हिस्से के लिए कानूनी आधार बने हुए हैं. रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक वस्तु व्यापार का करीब 72% हिस्सा अब भी मोस्ट-फेवर्ड-नेशन (MFN) टैरिफ शर्तों के तहत होता है, जिन्हें WTO के 166 सदस्य देशों ने तय किया है और जिनका पालन करने के लिए वे कानूनी रूप से प्रतिबद्ध हैं. हालांकि, यह हिस्सेदारी 2022 में करीब 80% से घटकर 2026 की शुरुआत तक लगभग 72% रह गई.

रिपोर्ट के मुताबिक, वैश्विक व्यापार में विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की हिस्सेदारी भी बढ़ी है. वैश्विक व्यापार में इन देशों की संयुक्त हिस्सेदारी 1995 में 23% थी, जो 2024 में बढ़कर 45% हो गई.

विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के सामने ज्यादा व्यापार बाधाएं

WTO ने कम आय वाली अर्थव्यवस्थाओं के लिए गैर-टैरिफ उपायों और सब्सिडी को बड़ी चुनौती बताया है. तकनीकी नियमों, सैनिटरी और फाइटोसैनिटरी मानकों, टेस्टिंग, सर्टिफिकेशन, ट्रेसिबिलिटी और गुणवत्ता मानकों का पालन करने के लिए निर्यातकों को काफी निवेश करना पड़ सकता है.

छोटे निर्यातकों के लिए ये आवश्यकताएं विदेशी बाजारों में प्रवेश की लागत को अपेक्षाकृत अधिक बढ़ा सकती हैं. WTO ने उच्च आय और बड़ी मध्यम आय वाली अर्थव्यवस्थाओं में कृषि उत्पादकों को दी जाने वाली सब्सिडी के बढ़ते इस्तेमाल की ओर भी ध्यान दिलाया है.

कुछ क्षेत्रों में सप्लाई का बढ़ता केंद्रीकरण

रिपोर्ट में कहा गया है कि कुछ क्षेत्रों में व्यापार की आपूर्ति अधिक केंद्रित हो रही है. ऐसे उत्पादों से जुड़ा वस्तु व्यापार, जिनकी सप्लाई कुछ सीमित देशों या स्रोतों में केंद्रित है, 2000 में करीब 8% था, जो 2017 में बढ़कर 18% हो गया. इसके बाद इसमें कुछ कमी आई और यह 16% पर आ गया.

सेवाओं के क्षेत्र में 2025 में कुल सेवा व्यापार का करीब 32% हिस्सा ऐसे क्षेत्रों से जुड़ा था, जहां आपूर्ति केंद्रित थी. 2005 में यह आंकड़ा करीब 20% था.

औद्योगिक नीतियों और सरकारी हस्तक्षेप पर भी चिंता

WTO ने बाजारों में सरकारों के बढ़ते हस्तक्षेप को भी एक चुनौती बताया है. संगठन के मुताबिक, सब्सिडी और अन्य सार्वजनिक हस्तक्षेप वाली औद्योगिक नीतियों का इस्तेमाल अब ज्यादा अर्थव्यवस्थाओं में हो रहा है.

इससे समान अवसर और बाजार पहुंच से जुड़े नियमों को लेकर सवाल बढ़ रहे हैं. WTO ने एंटी-डंपिंग उपायों में भी ऐसी नीतियों के बढ़ते इस्तेमाल का उल्लेख किया है. भारत, अमेरिका, यूरोपीय संघ, चीन, ब्राजील, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया सहित कई बड़ी अर्थव्यवस्थाएं इस समूह में शामिल हैं.

पारदर्शिता से बढ़ सकता है व्यापार

WTO के मुताबिक, व्यापार व्यवस्था में पारदर्शिता सूचना से जुड़ी असमानताओं को कम कर सकती है और बाजारों के बेहतर कामकाज में मदद कर सकती है. क्षेत्रीय व्यापार समझौतों के विश्लेषण में पाया गया कि हर अतिरिक्त पारदर्शिता प्रतिबद्धता द्विपक्षीय व्यापार प्रवाह में 1% से अधिक की वृद्धि से जुड़ी थी. इसका असर खासतौर पर सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSMEs) और कृषि निर्यातकों के लिए महत्वपूर्ण है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि बाजार पहुंच को लेकर अधिक निश्चितता कंपनियों को निर्यात बाजारों में प्रवेश करने, निवेश करने और वैश्विक वैल्यू चेन में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित कर सकती है.

2040 तक AI से वैश्विक व्यापार में 40% बढ़ोतरी की संभावना

WTO ने जहां व्यापार विखंडन को जोखिम बताया है, वहीं तकनीक को अंतरराष्ट्रीय व्यापार में संभावित बढ़ोतरी का बड़ा स्रोत माना है. रिपोर्ट के अनुमान के मुताबिक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) 2040 तक वैश्विक व्यापार को 40% तक बढ़ा सकता है. डिजिटल रूप से उपलब्ध कराई जा सकने वाली सेवाओं में इसका सबसे बड़ा असर देखने को मिल सकता है.

रिपोर्ट के अनुसार, AI अगले 15 वर्षों में वैश्विक GDP में 13% से अधिक की अतिरिक्त वृद्धि कर सकता है. WTO ने कहा कि डिजिटलाइजेशन और तकनीकी बदलाव व्यापार की संरचना और संचालन के तरीके को बदल रहे हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय सहयोग की जरूरत और बढ़ गई है.

WTO की महानिदेशक न्गोजी ओकोंजो-इवेला ने कहा कि वैश्विक व्यापार का परिदृश्य काफी बदल गया है, लेकिन सहयोग के जरिए सभी अर्थव्यवस्थाओं को एकतरफा कदमों की तुलना में अधिक लाभ मिलने का मूल सिद्धांत आज भी प्रासंगिक है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि WTO को बनाए रखने का मतलब उसके मौजूदा नियमों को बिना बदलाव के बनाए रखना नहीं है. इसके बजाय, बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था को अधिक एकीकृत, बहुध्रुवीय और विविध वैश्विक अर्थव्यवस्था के अनुरूप ढालने की जरूरत है.

भारत के संदर्भ में WTO का यह आकलन ऐसे समय आया है जब देश बाजार पहुंच बढ़ाने और व्यापारिक साझेदारों के साथ आर्थिक संबंध मजबूत करने के लिए FTAs पर जोर दे रहा है. भारत-EFTA समझौता यह भी दिखाता है कि नए व्यापार समझौतों में टैरिफ रियायतों के साथ निवेश प्रतिबद्धताओं और उनके क्रियान्वयन से जुड़े प्रावधानों को शामिल किया जा रहा है.
 


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