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रेलवे कर्मचारियों को अब नहीं मिलेगा रिटायरमेंट पर चांदी का सिक्का, जानिए वजह

रेलवे का यह फैसला बदलते समय और सिस्टम में पारदर्शिता लाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है. जहां एक ओर इससे फिजूलखर्ची रुकेगी, वहीं दूसरी ओर सप्लाई और गुणवत्ता से जुड़े विवादों पर भी विराम लगेगा.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 5 months ago

भारतीय रेलवे ने एक लंबे समय से चली आ रही परंपरा को खत्म करने का फैसला किया है. अब रिटायर होने वाले रेल कर्मचारियों और अधिकारियों को गोल्ड प्लेटेड चांदी का सिक्का भेंट नहीं किया जाएगा. रेलवे बोर्ड ने इस संबंध में सभी जोन और प्रोडक्शन यूनिट्स को आधिकारिक आदेश जारी कर दिया है. यह फैसला बढ़ती लागत और गुणवत्ता को लेकर उठ रही गंभीर चिंताओं के बीच लिया गया है.

क्यों लिया गया यह फैसला

रेलवे से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, चांदी की कीमतों में तेज बढ़ोतरी और सिक्कों की गुणवत्ता को लेकर सामने आए मामलों ने इस परंपरा पर सवाल खड़े कर दिए थे. हाल ही में मध्य प्रदेश से आई एक शिकायत में सामने आया कि रिटायरमेंट पर दिए गए कुछ सिक्कों में चांदी की मात्रा बेहद कम थी और वे ज्यादातर तांबे के बने हुए थे. इससे सप्लाई सिस्टम में गड़बड़ी और संभावित भ्रष्टाचार की आशंका और गहरी हो गई.

सभी जोन को भेजा गया आधिकारिक आदेश

रेलवे बोर्ड की ओर से जारी चिट्ठी में साफ कहा गया है कि अब रिटायर होने वाले कर्मचारियों और अधिकारियों को कोई गोल्ड प्लेटेड सिल्वर कॉइन या मेडल नहीं दिया जाएगा. साथ ही, पहले से खरीदे गए या स्टॉक में मौजूद चांदी के सिक्कों का पूरा हिसाब रखने और उन्हें किसी अन्य सरकारी उपयोग में लाने के निर्देश भी दिए गए हैं. इस फैसले को राष्ट्रपति की मंजूरी भी मिल चुकी है.

आधिकारिक तौर पर वजह नहीं

हालांकि रेलवे बोर्ड की चिट्ठी में इस फैसले की कोई ठोस वजह नहीं बताई गई है, लेकिन अधिकारियों का कहना है कि बाहर से खरीदे जा रहे सिक्कों की गुणवत्ता पर लगातार सवाल उठ रहे थे. इसके अलावा चांदी की बढ़ती कीमत की वजह से रेलवे पर वित्तीय बोझ भी बढ़ रहा था, जिसे कम करना जरूरी हो गया था.

कब शुरू हुई थी यह परंपरा

रिटायर होने वाले कर्मचारियों को चांदी का सिक्का भेंट करने की परंपरा मार्च 2006 में शुरू हुई थी. उस समय तय किया गया था कि रिटायरमेंट या वॉलंटरी रिटायरमेंट लेने वाले कर्मचारियों को करीब 20 ग्राम वजन का सोने की परत चढ़ा हुआ चांदी का सिक्का दिया जाएगा. तब इसकी कीमत करीब 1,000 रुपये थी, जो अब बढ़कर लगभग 10,000 रुपये तक पहुंच चुकी है.


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